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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

देवताओंका आश्रय है। अतः 'माययापहृतज्ञानाः' में तो विशेष जड़ता है, पर 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' में उनकी अपेक्षा चेतनता है।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥

यः, यः= जो-जोअर्चितुम्= पूजन करनाअहम्= मैं
भक्तः= भक्तइच्छति= चाहता है,ताम्= उसी
याम्, याम्२= जिस-जिसतस्य, तस्य= उस-उसश्रद्धाम्= श्रद्धाको
तनुम्= देवताकादेवतामेंअचलाम्= दृढ़
श्रद्धया= श्रद्धापूर्वकएव= हीविदधामि= कर देता हूँ।

व्याख्या —'यो यो यां यां तनुं भक्तः' '..... तामेव विदधाम्यहम्'—जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताका भक्त होकर श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करना चाहता है, उस-उस मनुष्यकी श्रद्धा उस-उस देवताके प्रति मैं अचल (दृढ़) कर देता हूँ। वे दूसरोंमें न लगकर मेरेमें ही लग जायें—ऐसा मैं नहीं करता। यद्यपि उन-उन देवताओंमें लगनेसे कामनाके कारण उनका कल्याण नहीं होता, फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूँ, तो जो मेरेमें श्रद्धा-प्रेम रखते हैं, अपना कल्याण करना चाहते हैं, उनकी श्रद्धाको मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूँगा अर्थात् अवश्य करूँगा। कारण कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता ५।२९)।

इसपर यह शंका होती है कि आप सबकी श्रद्धा अपनेमें ही दृढ़ क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् मानो यह कहते हैं कि अगर मैं सबकी श्रद्धाको अपने प्रति दृढ़ करूँ तो मनुष्यजन्मकी स्वतन्त्रता, सार्थकता ही कहाँ रही? तथा मेरी स्वार्थपरताका त्याग कहाँ हुआ? अगर लोगोंको अपनेमें ही लगानेका मेरा आग्रह रहे, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि ऐसा बताव तो दुनियाके सभी स्वार्थी जीवोंका स्वाभाविक होता है। अतः मैं इस स्वार्थपरताको मिटाकर ऐसा स्वभाव सिखाना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य पक्षपात करके दूसरोंसे केवल अपनी पूजा-प्रतिष्ठा करवानेमें ही न लगा रहे और किसीको पराधीन न बनाये।

अब दूसरी शंका यह होती है कि आप उनकी श्रद्धाको उन देवताओंके प्रति दृढ़ कर देते हैं, इससे आपकी साधुता तो सिद्ध हो गयी, पर उन जीवोंका तो आपसे विमुख होनेसे अहित ही हुआ? इसका समाधान यह है कि अगर मैं उनकी श्रद्धाको दूसरोंसे हटाकर अपनेमें लगानेका भाव रखूँगा तो उनकी मेरेमें अश्रद्धा हो जायगी। परन्तु अगर मैं अपनेमें लगानेका भाव नहीं रखूँगा और उनको स्वतन्त्रता दूँगा, तो उस स्वतन्त्रताको पानेवालोंमें जो बुद्धिमान् होंगे, वे मेरे इस बतावको देखकर मेरी तरफ ही आकृष्ट होंगे। अतः उनके उद्धारका यही तरीका बढ़िया है।

अब तीसरी शंका यह होती है कि जब आप स्वयं उनकी श्रद्धाको दूसरोंमें दृढ़ कर देते हैं, तो फिर उस श्रद्धाको कोई मिटा ही नहीं सकता। फिर तो उसका पतन ही होता चला जायगा? इसका समाधान यह है कि मैं उनकी श्रद्धाको देवताओंके प्रति ही दृढ़ करता हूँ, दूसरोंके प्रति नहीं—ऐसी बात नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाके अनुसार ही उनकी श्रद्धाको दृढ़ करता हूँ और अपनी इच्छाको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, योग्य है। इच्छाको बदलनेमें वे परवश, निर्बल और अयोग्य नहीं हैं। अगर इच्छाको बदलनेमें वे परवश होते तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही कहाँ रही? और इच्छा (कामना-) का त्याग करनेकी आज्ञा भी मैं कैसे दे सकता था—'जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्' (गीता ३।४३)?

१-जो अपनेको तथा दूसरेको भी जाने, वह 'चेतन' है और जो अपनेको तथा दूसरेको भी नहीं जाने, वह 'जड़' है। २-जैसे यहाँ 'यो यः, यां याम्' आया है, ऐसे ही आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'यं यं वापि स्मरन्भावम्' आया है। दो बार 'यत्' शब्दका अर्थात् 'यो यः' 'यां याम्' और 'यं यम्' शब्दोंका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जैसे मनुष्य उपासना करनेमें स्वतन्त्र है अर्थात् देवताओंकी उपासना करे, चाहे मेरी उपासना करे—इसमें वह स्वतन्त्र है, ऐसे ही अन्तकालमें स्मरण करनेमें भी मनुष्य सर्वथा स्वतन्त्र है अर्थात् मेरा स्मरण करे चाहे किसी औरका स्मरण करे—इसमें वह स्वतन्त्र है।

श्लोक २२]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव— प्रायः मनुष्य दूसरे मनुष्योंको अपनी तरफ लगाना चाहते हैं, अपना शिष्य या दास बनाना चाहते हैं, अपने सम्प्रदायमें लाना चाहते हैं, अपनेमें श्रद्धा करवाना चाहते हैं, अपना पूजन, आदर, मान-सम्मान करवाना चाहते हैं, अपनी बात मनवाना चाहते हैं। परन्तु भगवान् सर्वोपरि होते हुए भी किसीको अपने अधीन नहीं बनाते, प्रत्युत जो जहाँ श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको वहाँ दृढ़ कर देते हैं—यह भगवान्की कितनी उदारता है, निष्पक्षता है।

भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ उनका ही स्वरूप है—‘मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति ’। इसलिये भगवान्में किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है। परन्तु भगवान्का यह पक्षपातरहित स्वभाव सहज ही समझमें नहीं आता, प्रत्युत गहरा विचार करनेसे ही समझमें आता है। अगर यह स्वभाव किसीकी समझमें आ जाय तो वह भगवान्का भक्त हो जायगा—उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहिं भजनु तजि भाव न आना॥

(मानस, सुन्दर० ३४।२)

स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत॥ (गीता १५।१९)

दूसरेको अपना दास वही बनाता है, जिसमें कोई कमी है। भगवान्में कोई कमी है ही नहीं, इसलिये वे अपनी तरफसे किसीको अपना दास (अधीन) कैसे बना सकते हैं? परन्तु कोई उनका दास बनना चाहे तो वे मना नहीं करते और दयापूर्वक उसको दास स्वीकार कर लेते हैं। यह उनकी विशेष उदारता है! जैसे छोटे-से बालकको देखकर कोई व्यक्ति रौझ जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस बालकसे उसका कोई स्वार्थभाव है। ऐसे ही जो भगवान्का दास बनता है, उसके सरलभावसे भगवान् रौझ जाते हैं—‘मोरं अधिक दास पर प्रीती ’ (मानस, उत्तर० १६।४)। गीताके अठारहवें अध्यायमें जब भगवान्के द्वारा ‘यथेच्छसि तथा कुरु ’ सुनकर अर्जुन घबरा गये, तब भगवान् दयापरवश होकर अर्जुनसे बोले कि तू मेरी शरणमें आ जा—‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) परन्तु ऐसा कहनेसे पहले भगवान्ने कहा कि यह सबसे अत्यन्त गोपनीय बात है (अठारहवें अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) और बादमें भी कहा कि इसे हर किसीको मत कहना (अठारहवें अध्यायका सड़सठवाँ श्लोक)। इससे सिद्ध होता है कि दूसरेको अपना दास बनानेकी नीयत न होनेपर भी अगर कोई दूसरा सहारा न मिलनेपर मनुष्य घबरा जाय और उनका दास बनना चाहे तो भगवान् दयापरवश होकर उसको स्वीकार कर लेते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जो किसी देवतापर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् उस देवतामें दृढ़ कर देते हैं और जो भगवान्पर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् अपनेमें दृढ़ कर दें—इसमें सन्देह ही क्या है! कारण कि भगवान्की दृष्टि भक्तके हितके लिये होती है, अपने स्वार्थके लिये नहीं।

स तथा श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ २२ ॥

तया= उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई)भावपूर्वक)हि= परन्तु
श्रद्धया= श्रद्धासेउपासनातान्= वह कामना-पूर्ति
युक्तः= युक्त होकरईहतेमया= मेरे द्वारा
सः= वह मनुष्यएव= ही
तस्य= उस देवताकीततःविहितान्= विहित की हुई
आराधनम्= (सकाम-कामान्होती है।होती है।
लभते

व्याख्या—स तथा श्रद्धया युक्तः : ..... मयैव विहितान्हि तान् ’—मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे सम्पन्न हुआ वह मनुष्य उस देवताकी आराधनाकी चेष्टा करता है और उस देवतासे जिस कामनापूर्तिकी आशा रखता है, उस कामनाकी पूर्ति होती है। यद्यपि वास्तवमें उस कामनाकी

पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है; परन्तु वह उसको देवतासे ही पूरी की हुई मानता है। वास्तवमें देवताओंमें मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधानसे वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं। जैसे सरकारी अफसरोंको एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुम लोग अमुक विभागमें अमुक अवसरपर

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

इतना खर्च कर सकते हो, इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओंमें एक सीमातक ही देनेकी शक्ति होती है; अतः वे उतना ही दे सकते हैं, अधिक नहीं। देवताओंमें अधिक-से-अधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपने-अपने उपासकोंको अपने-अपने लोकोंमें ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासनाका फल भोगनेपर उनको वहाँसे लौटकर पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—आठवें

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने सब देवताओंको अलग-अलग और सीमित अधिकार दिये हुए हैं। परन्तु भगवान्का अधिकार असीम है। भगवान्में यह विशेषता है कि वे किसीपर शासन नहीं करते, किसीको अपना गुलाम नहीं बनाते, किसीको अपना चेला नहीं बनाते, प्रत्युत हर एकको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं। जैसे, निषादराज सिद्ध भक्त था, विभीषण साधक था और सुग्रीव विषयी था, पर भगवान् श्रीरामने तीनोंको ही अपना सखा बनाया। यह विशेषता देवताओं आदि किसीमें भी नहीं है। इसलिये वेदोंमें भी भगवान्को जीवका सखा बताया गया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

(मुण्डक० ३।१।१, श्वेता० ४।६)

गीतामें भी भगवान्ने अर्जुनको कहा है—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति ’ (४।३)। यहाँ भगवान्ने ‘भक्त’ तो अर्जुनकी दृष्टिसे कहा है*, पर अपनी दृष्टिसे ‘सखा’ कहा है। ‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (१५।७)—इन पदोंमें भी भगवान्ने ‘एव’ पदसे जीवको साक्षात् अपना स्वरूप बताया है। यह मेरा ही अंश है—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इसमें प्रकृतिका अंश बिलकुल नहीं है।

सम्बन्ध—अब भगवान् उपासनाके अनुसार फलका वर्णन करते हैं।

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥

तु= परन्तुअन्तवत्= अन्तवालायान्ति= प्राप्त होते हैं
तेषाम्= उन(नाशवान्) ही(और)
अल्पमेधसाम्= तुच्छ बुद्धिवालेभवति= मिलता है।मद्भक्ताः= मेरे भक्त
मनुष्योंकोदेवयजः= देवताओंकामाम्= मुझे
तत्= उन देवताओंकोपूजनअपि= ही
आराधनाकाकरनेवालेयान्ति= प्राप्त
फलम्= फलदेवान्= देवताओंकोहोते हैं।

व्याख्या —‘अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्’—देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धि-युक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये, फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है? इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थकी कामना है और दूसरी बात, वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको

अध्यायका सोलहवाँ श्लोक।

यहाँ ‘मयैव ’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें स्वतः जो कुछ संचालन हो रहा है, वह सब मेरा ही किया हुआ है। अतः जिस किसीको जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है। कारण कि मेरे सिवाय विधान करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अगर कोई मनुष्य इस रहस्यको समझ ले, तो फिर वह केवल मेरी तरफ ही खिंचेगा।

नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है—एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा, वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर, अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी, तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है।

  • अर्जुनकी दृष्टिसे इसलिये ‘भक्त’ कहा कि अर्जुनने भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी—‘शाधि मां त्वां प्रपन्म’ (गीता १।७)

श्लोक २३]

  • साधक-संजीवनी *

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यहाँ 'तत्' कहनेका तात्पर्य है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है, पर कामना होनेसे वह नाशवान् हो जाता है।

यहाँ 'अत्यमेधसाम्' कहनेका तात्पर्य है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं तथा विधियाँ भी अधिक करनी पड़ती हैं, पर फल मिलता है सीमित और अन्तवाला। परन्तु मेरी आराधना करनेमें इतने नियमोंकी जरूरत नहीं है तथा उतनी विधियोंकी भी आवश्यकता नहीं है, पर फल मिलता है असीम और अनन्त। इस तरह देवताओंकी उपासनामें नियम हों अधिक, फल हो थोड़ा और हो जाय जन्म-मरणरूप बन्धन और मेरी आराधनामें नियम हों कम, फल हो अधिक और हो जाय कल्याण—ऐसा होनेपर भी वे उन देवताओंकी उपासनामें लगते हैं और मेरी उपासनामें नहीं लगते। इसलिये उनकी बुद्धि अल्प है, तुच्छ है।

'देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'—देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं। यहाँ 'अपि' पदसे यह सिद्ध होता है कि मेरी उपासना करनेवालोंकी कामनापूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति तो हो ही जाती है अर्थात् मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम, वे सब-के-सब मेरेको ही प्राप्त होते हैं। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवालोंकी सभी कामनाएँ पूरी हो जायँ, यह नियम नहीं है। भगवान् उचित समझें तो पूरी कर भी दें और न भी करें अर्थात् उनका हित होता हो तो पूरी कर देते हैं और अहित होता हो तो कितना ही पुकारनेपर तथा रोनेपर भी पूरी नहीं करते।

यह नियम है कि भगवान्का भजन करनेसे भगवान्के

परिशिष्ट भाव —देवताओंकी उपासना करनेवाले तो सकते हैं, पर भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। हाँ, अगर साधककी देवताओंमें भगवद्बुद्धि हो अथवा अपनेमें निष्कामभाव हो तो उसका उद्धार हो जायगा अर्थात् वह भी भगवान्को प्राप्त हो जायगा। परन्तु देवताओंमें भगवद्बुद्धि न हो और अपनेमें निष्कामभाव भी न हो तो उद्धार नहीं होगा।

देवताओंकी उपासनाका दोष यह है कि उसका फल अन्तवाला अर्थात् नाशवान् होता है; क्योंकि देवता खुद भी सीमित अधिकारवाले हैं। अतः जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अल्प बुद्धिवाले हैं। यदि वे अल्प बुद्धिवाले न होते तो नाशवान् फल देनेवाले देवताओंकी उपासना क्यों करते? भगवान्की ही उपासना करते अथवा देवताओंमें भगवद्बुद्धि करते। भगवान्की उपासना तो बड़ी सुगम है, उसमें विधिकी, नियमकी, परिश्रमकी जरूरत नहीं है। उसमें तो केवल भावकी ही प्रधानता है। परन्तु देवताओंकी उपासनामें क्रिया, विधि और पदार्थकी प्रधानता है।

नित्य-सम्बन्धकी स्मृति हो जाती है; क्योंकि भगवान्का सम्बन्ध सदा रहनेवाला है। अतः भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना पड़ता—'यदगत्वा न निवर्तन्ते' (१५।६)। परन्तु देवताओंका सम्बन्ध सदा रहनेवाला नहीं है; क्योंकि वह कर्मजनित है। अतः देवताओंको लोककी प्राप्ति होनेपर संसारमें लौटकर आना ही पड़ता है—'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' (९।२१)।

मेरा भजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं—इसी भावको लेकर भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चारों प्रकारके भक्तोंको सुकृती और उदार कहा है (सातवें अध्यायका सोलहवाँ और अठारहवाँ श्लोक)।

यहाँ 'मद्भक्ता यान्ति मामपि' का तात्पर्य है कि जीव कैसे ही आचरणोंवाला क्यों न हो अर्थात् वह दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न हो, आखिर है तो मेरा ही अंश। उसने केवल आसक्ति और आग्रहपूर्वक संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया है। अगर संसारकी आसक्ति और आग्रह न हो तो उसे मेरी प्राप्ति हो ही जायगी।

विशेष बात

सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान्का विधान भी भगवत्स्वरूप है—ऐसा होते हुए भी भगवान्से भिन्न संसारकी सत्ता मानना और अपनी कामना रखना—ये दोनों ही पतनके कारण हैं। इनमेंसे यदि कामनाका सर्वथा नाश हो जाय तो संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जायगा और यदि संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जाय तो कामना मिट जायगी। फिर मात्र क्रियाओंके द्वारा भगवान्की सेवा होने लग जायगी। अगर संसारका भगवत्स्वरूप दीखना और कामनाका नाश होना—दोनों एक साथ हो जायँ, तो फिर कहना ही क्या है!

अधिक-से-अधिक देवताओंके पुनरावर्ती लोकोंमें ही जा सकते हैं, पर भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। हाँ, अगर साधककी देवताओंमें भगवद्बुद्धि हो अथवा अपनेमें निष्कामभाव हो तो उसका उद्धार हो जायगा अर्थात् वह भी भगवान्को प्राप्त हो जायगा। परन्तु देवताओंमें भगवद्बुद्धि न हो और अपनेमें निष्कामभाव भी न हो तो उद्धार नहीं होगा।

देवताओंकी उपासनाका दोष यह है कि उसका फल अन्तवाला अर्थात् नाशवान् होता है; क्योंकि देवता खुद भी सीमित अधिकारवाले हैं। अतः जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अल्प बुद्धिवाले हैं। यदि वे अल्प बुद्धिवाले न होते तो नाशवान् फल देनेवाले देवताओंकी उपासना क्यों करते? भगवान्की ही उपासना करते अथवा देवताओंमें भगवद्बुद्धि करते। भगवान्की उपासना तो बड़ी सुगम है, उसमें विधिकी, नियमकी, परिश्रमकी जरूरत नहीं है। उसमें तो केवल भावकी ही प्रधानता है। परन्तु देवताओंकी उपासनामें क्रिया, विधि और पदार्थकी प्रधानता है।

मनुष्यको संसारकी कितनी ही विद्याओंका, कला-कौशल आदिका ज्ञान हो जाय तो भी वह 'अत्यमेधा' (तुच्छ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

बुद्धिवाला) ही है। वह ज्ञान वास्तवमें अज्ञानको दृढ़ करनेवाला है। परन्तु जिसने भगवान्को जान लिया है, उसको किसी सांसारिक विद्या, कला-कौशल आदिका ज्ञान न होनेपर भी वह 'सर्ववित्' (सब कुछ जाननेवाला) है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) !

सम्बन्ध—यद्यपि देवताओंकी उपासनाका फल सीमित और अन्तवाला होता है, फिर भी मनुष्य उसमें क्यों उलझ जाते हैं, भगवान्में क्यों नहीं लगते—इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥

अबुद्धयः= बुद्धिहीन मनुष्यभावम्= भावकोपरमात्मा-को
मम= मेरेअजानन्तः= न जानते हुएव्यक्तिम्= मनुष्यकी तरह
परम्= परम,अव्यक्तम्= अव्यक्त (मन-शरीर
अव्ययम्= अविनाशी (और)इन्द्रियोंसे पर)आपन्तम्= धारण करनेवाला
अनुत्तमम्= सर्वश्रेष्ठमाम्= मुझ-(सच्चिदानन्दधन)मन्यन्ते= मानते हैं।

व्याख्या—'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं ..... ममाव्यय-मनुत्तमम्'—जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरेमें श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वे अल्पमेधाके कारण अर्थात् समझकी कमीके कारण मेरेको साधारण मनुष्यकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् जन्मने-मरनेवाला मानते हैं। मेरा जो अविनाशी अव्ययभाव है अर्थात् जिससे बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता और जो देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत, सदा एकरूप रहनेवाला, निर्मल और असम्बद्ध है—ऐसे मेरे अविनाशी भावको वे नहीं जानते और मेरा अवतार लेनेका जो तत्त्व है, उसको नहीं जानते। इसलिये वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नहीं करते, प्रत्युत देवताओंकी उपासना करते हैं।

'अबुद्धयः' पदका यह अर्थ नहीं है कि उनमें बुद्धिका अभाव है, प्रत्युत बुद्धिमें विवेक रहते हुए भी अर्थात् संसारको उत्पत्ति-विनाशशील जानते हुए भी इसे मानते नहीं—यही उनमें बुद्धिरहितपना है, मूढ़ता है।

दूसरा भाव यह है कि कामनाको कोई रख नहीं सकता, कामना रह नहीं सकती; क्योंकि कामना पहले नहीं थी और कामनापूर्तिके बाद भी कामना नहीं रहेगी। वास्तवमें कामनाकी सत्ता ही नहीं है, फिर भी उसका त्याग नहीं कर सकते—यही अबुद्धिपना है।

मेरे स्वरूपको न जाननेसे वे अन्य देवताओंकी उपासनामें लग गये और उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी

कामनामें लग जानेसे वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरेसे विमुख हो गये। यद्यपि वे मेरेसे अलग नहीं हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नहीं हो सकता, तथापि कामनाके कारण ज्ञान ढक जानेसे वे देवताओंकी तरफ खिंच जाते हैं। अगर वे मेरेको जान जाते, तो फिर केवल मेरा ही भजन करते।

(१) बुद्धिमान् मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्के शरण होते हैं। वे भगवान्को ही सर्वोपरि मानते हैं।

(२) अल्पमेधावाले मनुष्य वे होते हैं, जो देवताओंके शरण होते हैं। वे देवताओंको अपनेसे बड़ा मानते हैं, जिससे उनमें थोड़ी नम्रता, सरलता रहती है।

(३) अबुद्धिवाले मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्को देवता-जैसा भी नहीं मानते; किन्तु साधारण मनुष्य-जैसा ही मानते हैं। वे अपनेको ही सर्वोपरि, सबसे बड़ा मानते हैं (गीता—सोलहवें अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक)। यही तीनोंमें अन्तर है।

'परं भावमजानन्तः' का तात्पर्य है कि मैं अज रहता हुआ, अविनाशी होता हुआ और लोकोंका ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृतिको वशमें करके योगमायासे प्रकट होता हूँ—इस मेरे परमभावको बुद्धिहीन मनुष्य नहीं जानते।

'अनुत्तमम्' कहनेका तात्पर्य है कि पन्द्रहवें अध्यायमें जिसको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम बताया है अर्थात् जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नहीं, ऐसे मेरे अनुत्तम भावको वे नहीं जानते।

श्लोक २४]

  • साधक-संजीवनी *

५५५

विशेष बात

इस (चौबीसवें) श्लोकका अर्थ कोई ऐसा करते हैं कि '(ये) अत्यक्त मां व्यक्तिमापनं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः' अर्थात् जो सदा निराकार रहनेवाले मेरेको केवल साकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे अत्यक्त, निर्विंकार और निराकार स्वरूपको नहीं जानते। दूसरे कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि '(ये) व्यक्तिमापनं मां अत्यक्तं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः' अर्थात् मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हुआ हूँ—ऐसे मेरेको केवल निराकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भावको नहीं जानते।

उपर्युक्त दोनों अर्थोंमेंसे कोई भी अर्थ ठीक नहीं है। कारण कि ऐसा अर्थ माननेपर केवल निराकारको माननेवाले साकाररूपकी और साकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे और केवल साकार माननेवाले निराकाररूपकी और निराकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे। यह सब एकदेशीयपना ही है।

पृथ्वी, जल, तेज आदि जो महाभूत हैं, जो कि विनाशी और विकारी हैं, वे भी दो-दो तरहके होते हैं—स्थूल और सूक्ष्म। जैसे, स्थूलरूपसे पृथ्वी साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है; जल बर्फ, बूँदें, बादल और

परिशिष्ट भाव —भगवान् व्यक्त भी हैं और अत्यक्त भी हैं, लौकिक भी हैं और अलौकिक भी हैं—'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९), 'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९।१९)। परन्तु बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्को उन प्राणियोंकी तरह अत्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् लौकिक (जन्मने-मरनेवाला) मानते हैं, जिनके लिये भगवान्ने कहा है—

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

(गीता २।२८)

'हे भारत! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायेंगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं; अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?'

भगवान् मनुष्योंकी तरह अत्यक्तसे व्यक्त नहीं होते, प्रत्युत अत्यक्त रहते हुए ही व्यक्त होते हैं और व्यक्त होते हुए भी अत्यक्त रहते हैं।

'परम्'—भगवान् देवताओंकी उपासना करनेवालोंको श्रद्धा भी देते हैं और उनकी उपासनाका फल भी देते हैं—यह भगवान्का परम अर्थात् पक्षपातरहित भाव है।

'अव्ययम्'—देवता सापेक्ष अविनाशी (अमर) हैं, सर्वथा अविनाशी नहीं। परन्तु भगवान् निरपेक्ष अविनाशी हैं। उनके समान अविनाशी दूसरा कोई नहीं है और हो भी नहीं सकता।

'अनुत्तमम्'—भगवान् प्राणिमात्रका हित चाहते हैं—यह भगवान्का सर्वश्रेष्ठ भाव है। इससे श्रेष्ठ दूसरा कोई भाव हो ही नहीं सकता।

सम्बन्ध—भगवान्को साधारण मनुष्य माननेमें क्या कारण है? इसपर आगेका श्लोक कहते हैं।

५५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥

अयम्= यह जोन, अभि-= टीक तरहसेसमावृतः= योगमायासे
मूढः= मूढ़जानातिनहीं जानताअच्छी तरह
लोकः= मनुष्यसमुदाय(मानता),ढका हुआ
माम्= मुझेसर्वस्य= उन सबकेअहम्= मैं
अजम्= अज (और)(सामने)प्रकाशः= प्रकट
अव्ययम्= अविनाशीयोगमाया-= नहीं होता।

व्याख्या —‘मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामज-मव्ययम्’—मैं अज और अविनाशी हूँ अर्थात् जन्म-मरणसे रहित हूँ। ऐसा होनेपर भी मैं प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ अर्थात् जब मैं अवतार लेता हूँ, तब अज (अजन्मा) रहता हुआ ही अवतार लेता हूँ और अव्ययात्मा रहता हुआ ही अन्तर्धान हो जाता हूँ। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं, छिप जाते हैं, ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ। जो मेरेको इस प्रकार जन्म-मरणसे रहित मानते हैं, वे तो असम्भूढ हैं (गीता—दसवें अध्यायका तीसरा और पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो मेरेको साधारण प्राणियोंकी तरह जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, वे मूढ हैं (गीता—नवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

भगवान्को अज, अविनाशी न माननेमें कारण है कि इस मनुष्यका भगवान्के साथ जो स्वतः अपनापन है, उसको भूलकर इसने शरीरको अपना मान लिया कि ‘यह शरीर ही मैं हूँ और यह शरीर मेरा है।’ इसलिये उसके सामने परदा आ गया, जिससे वह भगवान्को भी अपने समान ही जन्मने-मरनेवाला मानने लगा।

मूढ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी नहीं जानते। उनके न जाननेमें दो कारण हैं—एक तो मेरा योगमायासे छिपा रहना और एक उनकी मूढ़ता। जैसे, किसी शहरमें किसीका एक घर है और वह अपने घरमें बंद है तथा शहरके सब-के-सब घर शहरकी चहारदीवारी (परकोटे) में बंद हैं। अगर वह मनुष्य बाहर निकलना चाहे तो अपने घरसे निकल सकता है, पर शहरकी चहारदीवारीसे निकलना

उसके हाथकी बात नहीं है। हाँ, यदि उस शहरका राजा चाहे तो वह चहारदीवारीका दरवाजा भी खोल सकता है और उसके घरका दरवाजा भी खोल सकता है। अगर वह मनुष्य अपने घरका दरवाजा नहीं खोल सकता तो राजा उस दरवाजेको तोड़ भी सकता है। ऐसे ही यह प्राणी अपनी मूढ़ताको दूर करके अपने नित्य स्वरूपको जान सकता है। परन्तु सर्वथा भगवत्तत्त्वका बोध तो भगवान्की कृपासे ही हो सकता है। भगवान् जिसको जानना चाहें, वही उनको जान सकता है—‘सोऽ जानइ जेहि देहु जानई’ (मानस २।१२७।२)। अगर मनुष्य सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् उसके अज्ञानको भी दूर कर देते हैं और अपनी मायाको भी दूर कर देते हैं।

‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः’—उन सबके सामने अर्थात् उस मूढ समुदायके सामने मैं भगवद्दृपसे प्रकट नहीं होता। कारण कि वे मेरेको अज-अविनाशी भगवद्दृपसे जानना अथवा मानना ही नहीं चाहते, प्रत्युत वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना करते हैं। अतः उनके सामने मैं अपने भगवत्-स्वरूपसे कैसे प्रकट होऊँ? तात्पर्य है कि जो मेरेको अज-अविनाशी नहीं मानते, प्रत्युत मेरेको जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उनके सामने मैं अपनी योगमायामें छिपा रहता हूँ और सामान्य मनुष्य-जैसा ही रहता हूँ। परन्तु जो मेरेको अज, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर मानते हैं, मेरेमें श्रद्धा-विश्वास रखते हैं, उनके भावोंके अनुसार मैं उनके सामने प्रकट रहता हूँ।

भगवान्की योगमाया विचित्र, विलक्षण, अलौकिक है। मनुष्योंका भगवान्के प्रति जैसा भाव होता है, उसके अनुसार ही वे योगमाया-समावृत भगवान्को देखते हैं।*

  • (१) मल्लानामशनिर्नुणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्

योगानां स्वजनेऽसतां क्षितिभुजो शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।

मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां

वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ (श्रीमद्भा० १०।४३।१७)

श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५५७

यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मेरेको अज-अविनाशी नहीं जानते, वे मूढ़ हैं और दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा है कि देवता और महर्षि मेरे प्रभावको नहीं जानते। इसपर शंका होती है कि भगवान्को अज-अविनाशी नहीं जानना और उनके प्रभवको नहीं जानना—ये दोनों बातें तो एक ही हो गयीं; परन्तु यहाँ न जाननेवालोंको मूढ़ बताया है और वहाँ उनको मूढ़ नहीं बताया है, ऐसा क्यों ? इसका समाधान है कि भगवान्के प्रभवको अर्थात् प्रकट होनेको न जानना दोषी नहीं है; क्योंकि वहाँ भगवान्ने स्वयं कहा है कि मैं सब तरहसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। जैसे

परिशिष्ट भाव —जो बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्को नहीं मानते, भगवान् अवतारकालमें सबके सामने प्रकट होते हुए भी उनके सामने प्रकट नहीं होते—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’ (गीता ४।११)। वास्तवमें भगवान् अप्रकट रहना चाहते नहीं, पर जो उनको नहीं मानते, उनके सामने वे कैसे प्रकट हों ?

अवतारकालमें भगवान् लौकिक रूपमें दीखनेपर भी वास्तवमें सदा अलौकिक ही रहते हैं। परन्तु राग-द्वेषके कारण अज्ञानी मनुष्योंको भगवान् लौकिक दीखते हैं अर्थात् भगवान् रूपसे न दीखकर मनुष्य रूपसे ही दीखते हैं।

सम्बन्ध —जो भगवान्को अज-अविनाशी नहीं मानते, उनके ही सामने मायाका परदा रहता है, पर भगवान्के सामने वह परदा नहीं रहता—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥

अर्जुन= हे अर्जुन != औरतु= परन्तु
भूतानि= जो प्राणीभविष्याणि= जो भविष्यमेंमाम्= मुझे
समतीतानि= भूतकालमें हो चुके हैं,होंगे, (उन सब प्राणियोंको तो)कश्चन= (भक्तके सिवाय कोई भी)
= तथाअहम्= मैं= नहीं
वर्तमानानि= जो वर्तमानमें हैंवेद= जानता हूँ;वेद= जानता।

व्याख्या —‘वेदाहं समतीतानि ..... मां तु वेद न कश्चन ’—यहाँ भगवान्ने प्राणियोंके लिये तो भूत, वर्तमान और भविष्यकालके तीन विशेषण दिये हैं; परन्तु अपने लिये ‘अहं वेद’ पदोंसे केवल वर्तमानकालका ही प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान्की दृष्टिमें भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीनों काल वर्तमान ही हैं। अतः

भूतके प्राणी हों, भविष्यके प्राणी हों अथवा वर्तमानके प्राणी हों—सभी भगवान्की दृष्टिमें वर्तमान होनेसे भगवान् सभीको जानते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीनों काल तो प्राणियोंकी दृष्टिमें हैं, भगवान्की दृष्टिमें नहीं। जैसे सिनेमा देखनेवालोंके लिये भूत, वर्तमान और भविष्य-कालका भेद रहता है, पर सिनेमाकी फिल्ममें सब कुछ

‘जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकट्टर-शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिताके समान बड़े-बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परमतत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णविशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े।’

(२) जिन्ह के रही भावना जैसी। प्रभु मूर्ति तिन्ह देखी तैसी। (मानस १।२४१।२)

५५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

वर्तमान है, ऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिमें भूत, वर्तमान और भविष्यकालका भेद रहता है, पर भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ वर्तमान ही रहता है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी कालके अन्तर्गत हैं और भगवान् कालसे अतीत हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि बदलते रहते हैं और भगवान् हरदम वैसे-के-वैसे ही रहते हैं। कालके अन्तर्गत आये हुए प्राणियोंका ज्ञान सीमित होता है और भगवान्का ज्ञान असीम है। उन प्राणियोंमें भी कोई योगका अभ्यास करके ज्ञान बढ़ा लेंगे तो वे 'युञ्जान योगी' होंगे और जिस समय जिस वस्तुको जानना चाहेंगे, उस समय उसी वस्तुको वे जानेंगे। परन्तु भगवान् तो 'युक्त योगी' हैं' अर्थात् बिना योगका अभ्यास किये ही वे मात्र जीवोंको और मात्र संसारको सब समय स्वतः जानते हैं।

भूत, भविष्य और वर्तमानके सभी जीव नित्य-निरन्तर भगवान्में ही रहते हैं, भगवान्से कभी अलग हो ही नहीं सकते। भगवान्में भी यह ताकत नहीं है कि वे जीवोंसे अलग हो जायें। अतः प्राणी कहीं भी रहें, वे कभी भी भगवान्की दृष्टिसे ओझल नहीं हो सकते।

'मां तु वेद न कश्चन' का तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें कहे हुए मूढ़ समुदायमेंसे मेरेको कोई नहीं जानता अर्थात् जो मेरेको अज और अविनाशी नहीं मानते, प्रत्युत मेरेको साधारण मनुष्य-जैसा जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उन मूढ़ोंमेंसे मेरेको कोई भी नहीं जानता, पर मैं सबको जानता हूँ।

जैसे बाँसकी चिक दरवाजेपर लटका देनेसे भीतरवाले तो बाहरवालोंको पूर्णतया देखते हैं, पर बाहरवाले केवल दरवाजेपर टँगी हुई चिकको ही देखते हैं, भीतरवालोंको नहीं। ऐसे ही योगमारा रूपी चिकसे अच्छी तरहसे आवृत होनेके कारण भगवान्को मूढ़ लोग नहीं देख पाते, पर भगवान् सबको देखते हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि भगवान् जब भविष्यमें होनेवाले सब प्राणियोंको जानते हैं, तो किसकी मुक्ति होगी और कौन बन्धनमें रहेगा—यह भी जानते ही हैं; क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है। अतः वे जिनकी मुक्ति जानते हैं, उनको तो मुक्ति होगी और जिनको बन्धनमें जानते हैं, वे बन्धनमें ही रहेंगे। भगवान्की इस सर्वज्ञतासे तो मनुष्यकी मुक्ति परतन्त्र हो गयी, मनुष्यके प्रयत्नसे साध्य नहीं रही।

इसका समाधान यह है कि भगवान्ने अपनी तरफसे मनुष्यको अन्तिम जन्म दिया है। अब इस जन्ममें मनुष्य अपना उद्धार कर ले अथवा पतन कर ले—यह उसके ऊपर निर्भर करता है (गीता—सातवें अध्यायका सताईसवाँ और आठवें अध्यायका छठा श्लोक)। उसके उद्धार अथवा पतनका निर्णय भगवान् नहीं करते।

इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् यह कह आये हैं कि बहुत जन्मोंके इस अन्तिम मनुष्यजन्ममें जो 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसे मेरे शरण होता है, वह महात्मा दुर्लभ है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यशरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको यह स्वतन्त्रता है कि वे अपने अनन्त जन्मोंके संचित कर्म-समुदायका नाश करके भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, अपनी मुक्ति कर सकते हैं। अगर यही माना जाय कि कौन-सा प्राणी आगे किस गतिमें जायगा—ऐसा भगवान्का संकल्प है, तो फिर अपना उद्धार करनेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता ही नहीं रहेगी और 'ऐसा करो, ऐसा मत करो'—यह भगवान्, सन्त, शास्त्र, गुरु आदिका उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा। इसके सिवाय 'जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताकी उपासना करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ कर देता हूँ' (सातवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक) और 'अन्त-समयमें मनुष्य जिस-जिस भावका स्मरण करके शरीर छोड़ता है, वह उस-उसको ही प्राप्त होता है' (आठवें अध्यायका छठा श्लोक)—इस तरह उपासना और अन्तकालीन स्मरणमें स्वतन्त्रता भी नहीं रहेगी, जो भगवान्ने मनुष्यमात्रको दे रखी है।

बिना कारण कृपा करनेवाले प्रभु जीवको मनुष्यशरीर देते हैं*, जिससे यह जीव मनुष्यशरीर पाकर स्वतन्त्रतासे अपना कल्याण कर ले। गीतामें ग्यारहवें अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें जैसे भगवान्ने अर्जुनसे कहा—'मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' अर्थात् मेरे द्वारा ये पहले ही मारे जा चुके हैं, तू केवल निमित्तमात्र बन जा। ऐसे ही मनुष्यमात्रको विवेक और उद्धारकी पूरी सामग्री देकर भगवान्ने कहा है कि तू अपना उद्धार कर ले अर्थात् अपने उद्धारमें तू केवल निमित्तमात्र बन जा, मेरी कृपा तेरे साथ है। इस मनुष्यशरीररूपी नौकाको पाकर मेरी कृपारूपी अनुकूल हवासे जो भवसागरको नहीं तरता अर्थात् अपना

  • कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईम बिनु हेतु सनेही॥ (मानस ७।४४।३)

श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५५९

उद्धार नहीं करता, वह आत्महत्यार है—‘मयानुकूलेन न भस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तेरेत् स आत्मह’ (श्रीमद्भा० ११।२०।१७)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि जो परमात्माको सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण देखता है, वह अपनी हत्या नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त होता है (तेरहवें अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक)। इससे भी यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर अपना उद्धार करनेका अधिकार, सामर्थ्य, समझ आदि पूरी सामग्री मिलती है। ऐसा अमूल्य अवसर पाकर भी जो अपना उद्धार नहीं करता, वह अपनी हत्या करता है और इसीसे वह जन्म-मरणमें जाता है। अगर यह जीव मनुष्यशरीर पाकर शास्त्र और भगवान्से विरुद्ध न चले तथा मिली हुई सामग्रीका ठीक-ठीक उपयोग करे, तो इसकी मुक्ति स्वतःसिद्ध है। इसमें कोई बाधा लग ही नहीं सकती।

मनुष्यके लिये यह खास बात है कि भगवान्ने कृपा करके जो सामर्थ्य, समझ आदि सामग्री दी है, उसका मैं दुरुपयोग नहीं करूँगा, भगवान्के सिद्धान्तके विरुद्ध नहीं चलूँगा—ऐसा वह अदल निश्चय कर ले और उस निश्चयपर डटा रहे। अगर अपनी असामर्थ्यसे कभी दुरुपयोग भी हो जाय तो मनमें उसकी जलन पैदा हो जाय और भगवान्से कह दे कि ‘हे नाथ! मेरेसे गलती हो गयी, अब ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा। हे नाथ! ऐसा बल दो, जिससे कभी आपके सिद्धान्तसे विपरीत न चलूँ’ तो उसका प्रायश्चित्त हो जाता है और भगवान्से मदद मिलती है।

परिशिष्ट भाव —यहाँ शंका हो सकती है कि जब भगवान् सब जीवोंको जानते ही हैं तो फिर जिसको बद्ध जानते हैं, वह बद्ध ही रहेगा और जिसको मुक्त जानते हैं, वही मुक्त होगा; क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है! यह शंका वस्तुतः संसारकी सत्ता और महत्ताको लेकर (हमारी दृष्टिमें) है। वास्तवमें भगवान् और महात्मा—दोनोंकी ही दृष्टिमें संसार नहीं है, प्रत्युत केवल भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’। हमने ही अहम्के कारण संसारको सत्ता और महत्ता दे रखी है। इसलिये भगवान् हमारी भाषामें भूत-भविष्य-वर्तमानकी बात कहते हैं। अगर वे हमारी भाषामें नहीं बोलेंगे तो हम समझेंगे कैसे? जैसे, हमें अंग्रेजी भाषा सिखानेवाला अगर अंग्रेजी भाषामें ही बोले तो हम अंग्रेजी सीख ही नहीं सकेंगे।

भगवान्का ज्ञान नित्य है। सब कुछ भगवान्के ज्ञानके अन्तर्गत है। उनके ज्ञानसे बाहर कुछ भी नहीं है। भगवान्के ज्ञानमें उनके सिवाय कुछ नहीं है—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिकिंचिदस्ति’ (गीता ७।७)। जीवने ही अहम्के कारण (अज्ञानसे) जगत्को धारण कर रखा है—‘यथेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। अतः बन्धन और मोक्ष जीवके ही बनाये हुए हैं। तत्त्वसे न बन्धन है, न मोक्ष; किन्तु केवल परमात्मा ही हैं*।

दो बार ‘च’ पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी काल स्थायी नहीं है। न भूतकाल सदा रहता है, न वर्तमान सदा

  • न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षूर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ (आत्मोपनिषद् ३१)

‘न प्रलय है और न उत्पत्ति है, न बद्ध है और न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त है—यही परमार्थता अर्थात् वास्तविक तत्त्व है।’

मनुष्यकी असामर्थ्य दो तरहसे होती है—एक असामर्थ्य यह होती है कि वह कर ही नहीं सकता; जैसे—किसी नौकरसे कोई मालिक यह कह दे कि तुम इस मकानको उठाकर एक मीलतक ले जाकर रख दो, तो वह यह काम कर ही नहीं सकता। दूसरी असामर्थ्य यह होती है कि वह कर तो सकता है और करना चाहता भी है, फिर भी समयपर प्रमादवश नहीं करता। यह असामर्थ्य साधकमें आती रहती है। इसको दूर करनेके लिये साधक भगवान्से कहे कि ‘हे नाथ! मैं ऐसा प्रमाद फिर कभी न करूँ, ऐसी मेरेको शक्ति दो।’

भगवान्की ही दी हुई स्वतन्त्रताके कारण भगवान् ऐसा संकल्प कभी कर ही नहीं सकते कि इस जीवके इतने जन्म होंगे। इतना ही नहीं, चर-अचर अनन्त जीवोंके लिये भी भगवान् ऐसा संकल्प नहीं करते कि उनके अनेक जन्म होंगे। हाँ, यह बात जरूर है कि मनुष्यके सिवाय दूसरे प्राणियोंके पीछे परम्परासे कर्म-फलोंका ताँता लगा हुआ है, जिससे वे बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। ऐसी परम्परामें पड़े हुए जीवोंमेंसे कोई जीव किसी कारणसे मनुष्यशरीरमें अथवा किसी अन्य योनिमें भी प्रभुके चरणोंकी शरण हो जाता है, तो भगवान् उसके अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट कर देते हैं— कोटि बिप्र बधु लागहिं जाहू। आरुं सरन तजउं नहिं ताहू॥ सनमुख होइ जीव मोहिजबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

(मानस ५।४४।१)

५६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

रहता है और न भविष्य सदा रहता है, पर भगवान् सदा रहते हैं। जैसे भूतकाल और भविष्यकाल अभी नहीं हैं, ऐसे ही वर्तमानकाल भी नहीं है। भूतकाल और भविष्यकालकी सन्धिको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। पाणिनि-व्याकरणका एक सूत्र है—‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ (३।३।१३१) अर्थात् वर्तमानसामीप्य भी वर्तमानकी तरह होता है। जैसे, भूतकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी आया हूँ’ और भविष्यकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी जा रहा हूँ’—यह वर्तमानसामीप्य है। वास्तवमें वर्तमानसामीप्यको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। अगर वर्तमानकाल वास्तवमें होता तो वह कभी भूतकालमें परिणत नहीं होता। वास्तवमें काल वर्तमान नहीं है, प्रत्युत भगवान् ही वर्तमान हैं। तात्पर्य है कि जो प्रतिक्षण बदलता है, वह वर्तमान नहीं है, प्रत्युत जो कभी नहीं बदलता, वही वर्तमान है। इसलिये भगवान्ने श्लोकके आरम्भमें वर्तमान-क्रिया दी है—‘वेदाहम्’ (मैं जानता हूँ)। भगवान् भूत, भविष्य और वर्तमान—सबमें सदा वर्तमान हैं, पर भगवान्में न भूत है, न भविष्य है और न वर्तमान है। भगवान्का वर्तमानपना कालके अधीन नहीं है; क्योंकि भगवान् कालातीत हैं। काल न भगवान्की दृष्टिमें है, न महात्माकी दृष्टिमें।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह कहा कि मुझे कोई भी नहीं जानता, तो भगवान्को न जाननेमें मुख्य कारण क्या है? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्रन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गं यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥

कारण कि—

भारत= हे भरतवंशमें उत्पन्नद्रन्द्वमोहेन= द्वन्द्व-मोहसे (मोहित)सर्गं= संसारमें (अनादिकालसे)
परन्तप= शत्रुतापन अर्जुन!सम्मोहम्= सम्पूर्ण प्राणीयान्ति= प्राप्त हो रहे हैं।
इच्छा-द्वेषसमुत्थेन= इच्छा (राग) और

व्याख्या —‘इच्छाद्वेषसमुत्थेन ..... सर्गं यान्ति परन्तप’—इच्छा और द्वेषसे द्रन्द्वमोह पैदा होता है, जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान्से बिलकुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होनेसे बार-बार संसारमें जन्म लेते हैं।

मनुष्यको संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्में लगनेकी आवश्यकता है। भगवान्में न लगनेमें बड़ी बाधा क्या है? यह मनुष्यशरीर विवेक-प्रधान है; अतः मनुष्यकी प्रवृत्ति और निवृत्ति पशु-पक्षियोंकी तरह न होकर अपने विवेकके अनुसार होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर राग और द्वेषको लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है, जिससे उसका पतन होता है।

मनुष्यकी दो मनोवृत्तियाँ हैं—एक तरफ लगाना और एक तरफसे हटाना। मनुष्यको परमात्मामें तो अपनी वृत्ति लगानी है और संसारसे अपनी वृत्ति हटानी है अर्थात् परमात्मासे तो प्रेम करना है और संसारसे वैराग्य करना है। परन्तु इन दोनों वृत्तियोंको जब मनुष्य केवल संसारमें ही लगा देता है, तब वही प्रेम और वैराग्य क्रमशः राग

और द्वेषका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे मनुष्य संसारमें उलझ जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है। फिर भगवान्की तरफ चलनेका अवसर ही नहीं मिलता। कभी-कभी वह सत्संगकी बातें भी सुनता है, शास्त्र भी पढ़ता है, अच्छी बातोंपर विचार भी करता है, मनमें अच्छी बातें पैदा हो जाती हैं तो उनको ठीक भी समझता है। फिर भी उसके मनमें रागके कारण यह बात गहरी बैठी रहती है कि मुझे तो सांसारिक अनुकूलताको प्राप्त करना है और प्रतिकूलताको हटाना है, यह मेरा खास काम है; क्योंकि इसके बिना मेरा जीवन-निर्वाह नहीं होगा। इस प्रकार वह हृदयमें दृढ़तासे राग-द्वेषको पकड़े रखता है; जिससे सुनने, पढ़ने और विचार करनेपर भी उसकी वृत्ति राग-द्वेषरूप द्रन्द्वको नहीं छोड़ती। इसीसे वह परमात्माकी तरफ चल नहीं सकता।

द्रन्द्वोंमें भी अगर उसका राग मुख्यरूपसे एक ही विषयमें हो जाय, तो भी ठीक है। जैसे, भक्त बिल्बमंगलकी वृत्ति चिन्तामणि नामक वेश्यामें लग गयी,

श्लोक २७]

  • साधक-संजीवनी *

५६१

तो उनकी वृत्ति संसारसे तो हट ही गयी। जब वेश्याने यह ताड़ना की—‘ऐसे हाड़-मांसके शरीरमें तू आकृष्ट हो गया, अगर भगवान्में इतना आकृष्ट हो जाता तो तू निहाल हो जाता’ तब उनकी वृत्ति वेश्यासे हटकर भगवान्में लग गयी और उनका उद्धार हो गया। इसी तरहसे गोपियोंका भगवान्में राग हो गया, तो वह राग भी कल्याण करनेवाला हो गया। शिशुपालका भगवान्के साथ वैर (द्वेष) रहा तो वैरपूर्वक भगवान्का चिन्तन करनेसे भी उसका कल्याण हो गया। कंसको भगवान्से भय हुआ, तो भयवृत्तिसे भगवान्का चिन्तन करनेसे उसका भी कल्याण हो गया। हाँ, यह बात जरूर है कि वैर और भयसे भगवान्का चिन्तन करनेसे शिशुपाल और कंस भक्तिके आनन्दको नहीं ले सके। तात्पर्य यह है कि किसी भी तरहसे भगवान्की तरफ आकर्षण हो जाय तो मनुष्यका उद्धार हो जाता है। परन्तु संसारमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, ठीक-बेठीक, अनुकूल-प्रतिकूल आदि द्रष्ट्र रहनेसे मूढ़ता दृढ़ होती है और मनुष्यका पतन हो जाता है।

दूसरी रीतिसे यों समझें कि संसारका सम्बन्ध द्रष्ट्रसे दृढ़ होता है। जब कामनाको लेकर मनोवृत्तिका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है, तब सांसारिक अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर राग-द्वेष हो जाते हैं अर्थात् एक ही पदार्थ कभी ठीक लगता है, कभी बेठीक लगता है; कभी उसमें राग होता है, कभी द्वेष होता है, जिनसे संसारका सम्बन्ध दृढ़ हो जाता है। इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें ‘निर्द्वन्द्वः’ (२।४५) पदसे द्रष्ट्ररहित होनेकी आज्ञा दी है। निर्द्वन्द्व पुरुष सुखपूर्वक मुक्त होता है—‘निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (५।३)। सुख-दुःख आदि द्रष्ट्रोंसे रहित होकर भक्तजन अनिवासी पदको प्राप्त होते हैं—‘द्रष्ट्रैर्विमुक्ताः सुखदुःख-सञ्जर्गैश्चन्त्यमूहाः पदमव्ययं तत्’ (१५।५)। भगवान्ने द्रष्ट्रको मनुष्यका खास शत्रु बताया है (तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। जो द्रष्ट्रमोहसे रहित होते हैं, वे दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं (सातवें अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक) इत्यादि रूपसे गीतामें द्रष्ट्ररहित होनेकी बात बहुत बार आयी है।

जन्म-मरणमें जानेका कारण क्या है? शास्त्रोंकी दृष्टिसे तो जन्म-मरणका कारण अज्ञान है; परन्तु सन्तवाणीको देखा जाय तो जन्म-मरणका खास कारण रागके कारण प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग है। फलेच्छापूर्वक शास्त्रविहित कर्म करनेसे और प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् भगवदाज्ञा-विरुद्ध कर्म करनेसे सत्-असत् योनियोंकी

प्राप्ति होती है अर्थात् देवताओंकी योनि, चौरासी लाख योनि और नरक प्राप्त होते हैं।

प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेसे सम्मोह अर्थात् जन्म-मरण मिट जाता है। उसका सदुपयोग कैसे करें? हमारेको जो अवस्था, परिस्थिति मिली है, उसका दुरुपयोग न करनेका निर्णय किया जाय कि ‘हम दुरुपयोग नहीं करेंगे अर्थात् शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम नहीं करेंगे।’ इस प्रकार रागरहित होकर दुरुपयोग न करनेका निर्णय होनेपर सदुपयोग अपने-आप होने लगा। अर्थात् शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुकूल काम होने लगा। जब सदुपयोग होने लगा तो उसका हमें अभिमान नहीं होगा। कारण कि हमने तो दुरुपयोग न करनेका विचार किया है, सदुपयोग करनेका विचार तो हमने किया ही नहीं, फिर करनेका अभिमान कैसे? इससे तो कर्तृत्व-अभिमानका त्याग हो जायगा। जब हमने सदुपयोग किया ही नहीं तो उसका फल भी हम कैसे चाहेंगे? क्योंकि सदुपयोग तो हुआ है, किया नहीं। अतः इससे फलेच्छाका त्याग हो जायगा। कर्तृत्व-अभिमान और फलेच्छाका त्याग होनेसे अर्थात् बन्धनका अभाव होनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है।

प्रायः साधकोंमें यह बात गहराईसे बैठी हुई है कि साधन-भजन, जप-ध्यान आदि करनेका विभाग अलग है और सांसारिक काम-धंधा करनेका विभाग अलग है। इन दो विभागोंके कारण साधक भजन-ध्यान आदिको तो बढ़ावा देते हैं, पर सांसारिक काम-धंधा करते हुए राग-द्वेष, काम-क्रोध आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते, प्रत्युत ऐसी दृढ़ भावना बना लेते हैं कि काम-धंधा करते हुए तो राग-द्वेष होते ही हैं, ये मिटनेवाले थोड़े ही हैं। इस भावनासे बड़ा भारी अनर्थ यह होता है कि साधकके राग-द्वेष बने रहते हैं, जिससे उसके साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। वास्तवमें साधक चाहे पारमार्थिक कार्य करें, चाहे सांसारिक कार्य करें उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं रहने चाहिये।

पारमार्थिक और सांसारिक क्रियाओंमें भेद होनेपर भी साधकके भावमें भेद नहीं होना चाहिये अर्थात् पारमार्थिक और सांसारिक दोनों क्रियाएँ करते समय साधकका भाव एक ही रहना चाहिये कि ‘मैं साधक हूँ और मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है।’ इस प्रकार क्रियाभेद तो रहेगा ही और रहना भी चाहिये, पर भावभेद नहीं रहेगा। भावभेद न रहनेसे अर्थात् एक भगवत्प्राप्तिका ही भाव (उद्देश्य) रहनेसे पारमार्थिक और सांसारिक दोनों ही क्रियाएँ साधन बन जायँगी।

५६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

परिशिष्ट भाव —यद्यपि संसार-बन्धनका मूल कारण अज्ञान है, तथापि अज्ञानकी अपेक्षा भी मनुष्य राग-द्वेषरूप द्रन्द्वसे संसारमें ज्यादा फँसता है। किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिको अपने सुख-दुःखका कारण माननेसे राग-द्वेष पैदा होते हैं। जिसको अपने सुखका कारण मानते हैं, उसमें 'राग' हो जाता है और जिसको अपने दुःखका कारण मानते हैं, उसमें 'द्वेष' हो जाता है। राग-द्वेष मिटनेपर मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है—'निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्ममुच्यते' (गीता ५।३)।

पहले तेरहवें श्लोकमें भी भगवान् कह चुके हैं कि तीनों गुणोंसे मोहित प्राणी मेरेको नहीं जानता। ऐसे मोहित प्राणी न संसारको जानते हैं, न भगवान्को। संसारमें रचे-पचे रहकर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता और भगवान्से अलग (दूर) रहकर मनुष्य भगवान्को नहीं जान सकता। वास्तवमें संसारका ज्ञान संसारसे अलग होनेपर और भगवान्का ज्ञान भगवान्से अभिन्न होनेपर ही होता है। संसार नहीं है—यही संसारका ज्ञान है। वास्तवमें जो है ही नहीं, रहता ही नहीं, उसका ज्ञान कैसा? संसार है—ऐसा मानना ही अज्ञान है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने द्रन्द्वमोहसे मोहित होनेवालोंकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें द्रन्द्वमोहसे रहित होनेवालोंकी बात कहते हैं।

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्रन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥

तु= परन्तुपापम्= पापरहित हुए मनुष्य
येषाम्= जिनअन्तगतम्= नष्ट हो गये हैं,दृढव्रताः
पुण्यकर्मणाम्= पुण्यकर्मते= वेमाम्
जनानाम्= मनुष्योंकेद्रन्द्वमोहनिर्मुक्ताः= द्रन्द्वमोहसेभजन्ते

व्याख्या —'येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्य-कर्मणाम्'—द्रन्द्वमोहसे मोहित मनुष्य तो भजन नहीं करते और जो द्रन्द्वमोहसे मोहित नहीं हैं, वे भजन करते हैं, तो भजन न करनेवालोंकी अपेक्षा भजन करनेवालोंकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है।

जिन मनुष्योंने 'अपनेको तो भगवत्प्राप्ति ही करनी है'— इस उद्देश्यको पहचान लिया है अर्थात् जिनको उद्देश्यकी यह स्मृति आ गयी है कि यह मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपासे केवल उनकी प्राप्तिके लिये ही मिला है—ऐसा जिनका दृढ़ निश्चय हो गया है, वे मनुष्य ही 'पुण्यकर्म' हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपने एक निश्चयसे जो शुद्धि होती है, पवित्रता आती है, वह यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाओंसे नहीं आती। कारण कि 'हमें तो एक भगवान्की तरफ ही चलना है', यह निश्चय स्वयंमें होता है और यज्ञ, दान आदि क्रियाएँ बाहरसे होती हैं।

'अन्तगतं पापम्' कहनेका भाव यह है कि जब यह निश्चय हो गया कि 'मेरेको तो केवल भगवान्की तरफ ही चलना है' तो इस निश्चयसे भगवान्की समुखता होनेसे

विमुखता चली गयी, जिससे पापोंकी जड़ ही कट गयी; क्योंकि भगवान्से विमुखता ही पापोंका खास कारण है। सन्तोने कहा है कि डेढ़ ही पाप है और डेढ़ ही पुण्य है। भगवान्से विमुख होना पूरा पाप है और दुर्गुण-दुराचारोंमें लगना आधा पाप है। ऐसे ही भगवान्के समुख होना पूरा पुण्य है और सदगुण-सदाचारोंमें लगना आधा पुण्य है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य भगवान्के सर्वथा शरण हो जाता है, तब उसके पापोंका अन्त हो जाता है।

दूसरा भाव यह है कि जिनका लक्ष्य केवल भगवान् हैं, वे पुण्यकर्म हैं; क्योंकि भगवान्का लक्ष्य होनेपर सब पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान्का लक्ष्य होनेपर पुराने किसी संस्कारसे पाप हो भी जायगा, तो भी वह रहेगा नहीं; क्योंकि हृदयमें विराजमान भगवान् उस पापको नष्ट कर देते हैं—'विकर्म यच्चोत्पत्तिं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः' (श्रीमद्भगवद्गीता ११।५।४२)।

तीसरा भाव यह है कि मनुष्य सच्चे हृदयसे यह दृढ़ निश्चय कर ले कि 'अब आगे मैं कभी पाप नहीं करूँगा' तो उसके पाप नहीं रहते।

'ते द्रन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः'—

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

५६३

पुण्यकर्मा लोग द्वन्दरूप मोहसे रहित होकर और दृढ़व्रती होकर भगवान्‌का भजन करते हैं। द्वन्द्व कई तरहका होता; जैसे-

१-भगवान्‌में लगें या संसारमें लगें ? क्योंकि परलोकके लिये भगवान्‌का भजन आवश्यक है और इहलोकके लिये संसारका काम आवश्यक है।

२-वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत और सौर-इन सम्प्रदायोंमेंसे किस सम्प्रदायमें चलें और किस सम्प्रदायमें न चलें ?

३-परमात्माके स्वरूपके विषयमें द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि कई तरहके सिद्धान्त हैं। इनमेंसे किस सिद्धान्तको स्वीकार करें और किस सिद्धान्तको स्वीकार न करें ?

४-परमात्माकी प्राप्तिके भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, हठयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि कई मार्ग हैं। उनमेंसे किस मार्गपर चलें और किस मार्गपर न चलें ?

५-संसारमें होनेवाले अनुकूल-प्रतिकूल, हर्ष-शोक, ठीक-बेठीक, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि सभी द्वन्द्व हैं।

उपर्युक्त सभी पारमार्थिक और सांसारिक द्वन्दरूप मोहसे मुक्त हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर भगवान्‌का भजन करते हैं।

मनुष्यका एक ही पारमार्थिक उद्देश्य हो जाय, तो पारमार्थिक और सांसारिक सभी द्वन्द्व मिट जाते हैं। पारमार्थिक उद्देश्यवाले साधक अपनी-अपनी रुचि, योग्यता और श्रद्धा-विश्वासके अनुसार अपने-अपने इष्टको सगुण मानें, साकार मानें, निर्गुण मानें, निराकार मानें, द्विभुज मानें, चतुर्भुज मानें अथवा सहस्रभुज आदि कैसे ही मानें, पर संसारकी विमुखतामें और परमात्माकी सम्मुखतामें वे सभी एक हैं। उपासनाकी पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न होनेपर भी लक्ष्य सबका एक होनेसे कोई भी पद्धति छोटी-बड़ी नहीं है। जिस साधकका जिस पद्धतिमें श्रद्धा-विश्वास होता है, उसके लिये वही पद्धति श्रेष्ठ है और उसको उसी पद्धतिका ही अनुसरण करना चाहिये। परन्तु दूसरोंकी पद्धति या निष्ठाकी निन्दा करना, उसको दो नम्बरका

मानना दोष है। जबतक यह साधनविषयक द्वन्द्व रहता है और साधकमें अपने पक्षका आग्रह और दूसरोंका निरादर रहता है, तबतक साधकको भगवान्‌के समग्ररूपका अनुभव नहीं होता। इसलिये आदर तो सब पद्धतियों और निष्ठाओंका करे, पर अनुसरण अपनी पद्धति और निष्ठाका ही करे; तो इससे साधनविषयक द्वन्द्व मिट जाता है।

मनुष्यमात्रकी यह प्रकृति होती है, ऐसा एक स्वभाव होता है कि जब वह पारमार्थिक बातें सुनता है, तब वह यह समझता है कि साधन करके अपना कल्याण करना है; क्योंकि मनुष्यजन्मकी सफलता इसीमें है। परन्तु जब वह व्यवहारमें आता है, तब वह ऐसा सोचता है कि 'साधन-भजन' से क्या होगा ? सांसारिक काम तो करना पड़ेगा; क्योंकि संसारमें बैठे हैं; चीज-वस्तुकी आवश्यकता पड़ती है, उसके बिना काम कैसे चलेगा ? अतः संसारका काम मुख्य रहेगा ही और भजन-स्मरणका नित्य-नियम तो समयपर कर लेना है; क्योंकि सांसारिक कामकी जितनी आवश्यकता है, उतनी भजन-स्मरण, नित्य-नियमकी नहीं। ऐसी धारणा रखकर भगवान्‌में लगे हुए मनुष्य बहुत हैं।

भगवान्‌की तरफ चलनेवालोंमें भी जिन्होंने एक निश्चय कर लिया है कि मेरेको अपना कल्याण करना है, सांसारिक लाभ-हानि कुछ भी हो जाय, इसकी कोई परवाह नहीं। कारण कि सांसारिक जितनी भी सिद्धि है, वह आँख मीचते ही कुछ नहीं है-'सम्मीलने नयनयोर्हि किंचिदस्ति' और इन सांसारिक वस्तुओंको प्राप्त करनेसे कितने दिनतक हमारा काम चलेगा ? ऐसा विचार करके जो एक भगवान्‌की तरफ ही लग जाते हैं और सांसारिक आदर-निरादर आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते, ऐसे मनुष्य ही द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए हैं।

'दृढ़व्रता:' कहनेका तात्पर्य है कि हमें तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है, हमारा और कोई लक्ष्य है ही नहीं। वह परमात्मा द्वैत है कि अद्वैत है, शुद्धाद्वैत है कि विशिष्टाद्वैत है, सगुण है कि निर्गुण है, द्विभुज है कि चतुर्भुज है-इससे हमें कोई मतलब नहीं*। वह हमारे लिये कैसी भी परिस्थिति भेजे; हमें कहीं भी रखे और कैसे भी

  • जैसा कि गजेन्द्रने कहा था- यः कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात् प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्। भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्व्यानमृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि।। (श्रीमद्भा० ८।२।३३) 'जो कोई ईश्वर प्रचण्ड वेगसे (सबको निगल जानेके लिये) दौड़ते हुए अत्यन्त बलवान् कालरूपी साँपसे भयभीत होकर शरणमें आये हुएकी रक्षा करता है और जिससे भयभीत होकर मृत्यु भी दौड़ रही है, उसीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।'

५६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

रखे—इससे भी हमें कोई मतलब नहीं है। बस, हमें तो केवल परमात्माकी तरफ चलना है—ऐसे निश्चयसे वे दृढ़व्रती हो जाते हैं।

परमात्माकी तरफ चलनेवालोंके सामने तीन बातें आती हैं—परमात्मा कैसे हैं? जीव कैसा है? और जगत् कैसा है? तो उनके हृदयमें इनका सीधा उत्तर यह होता है कि ‘परमात्मा हैं।’ वे कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं आदिसे हमें कोई मतलब नहीं, हमें तो परमात्मासे मतलब है। जीव क्या है, उसका कैसा स्वरूप है, वह कहाँ रहता है, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही पर्याप्त है कि ‘मैं हूँ।’ जगत् कैसा है, ठीक है कि बेठीक है, हमें इससे कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही समझना पर्याप्त है कि ‘जगत् त्याज्य है’ और हमें इसका त्याग करना है। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माकी तरफ चलना है, संसारको छोड़ना है और हमें चलना है अर्थात् ‘हमें संसारसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख होना है’—यही सम्पूर्ण दर्शनोंका सार है और यही दृढ़व्रती होना है। दृढ़व्रती होनेसे उनके द्रढ़ नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक निश्चय न होनेसे ही द्रढ़ रहते हैं।

दूसरा भाव है कि उनको न तो निर्गुणका ज्ञान है और न उनको सगुणके दर्शन हुए हैं; किन्तु उनकी मान्यतामें संसार निरन्तर नष्ट हो रहा है, निरन्तर अभावमें जा रहा है और सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें भावरूपसे एक परमात्मा ही हैं—ऐसा मानकर वे दृढ़व्रती होकर भजन करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री पतिके परायण रहती है, ऐसे ही भगवान्के परायण रहना ही उनका भजन है।

विशेष बात

शास्त्रोंमें, सन्तवाणोंमें और गीतामें भी यह बात आती है कि पापी मनुष्य भगवान्में प्रायः नहीं लग पाते; पर यह एक स्वाभाविक सामान्य नियम है। वास्तवमें कितने ही पाप क्यों न हों, वे भगवान्से विमुख कर ही नहीं सकते; क्योंकि जीव साक्षात् भगवान्का अंश है; अतः उसकी शुद्धि पापोंसे आच्छादित भले ही हो जाय, पर मिट नहीं सकती। इसलिये दुराचारी भी दुराचार छोड़कर भगवान्के भजनमें लग जाय, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा ( भक्त )

हो जाता है—‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’* (गीता ९।३१)। अतः मनुष्यको कभी भी ऐसा नहीं मानना चाहिये कि पुराने पापोंके कारण मेरेसे भजन नहीं हो रहा है; क्योंकि पुराने पाप केवल प्रतिकूल परिस्थितिरूप फल देनेके लिये होते हैं, भजनमें बाधा देनेके लिये नहीं। प्रतिकूल परिस्थिति देकर वे पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर ऐसा मान लिया जाय कि पापोंके कारण ही भजन नहीं होता, तो ‘अपि चेतसुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्’ (गीता ९।३०) ‘दुराचारी—से—दुराचारी पुरुष अनन्यभावसे मेरा भजन करता है’—यह कहना बन नहीं सकता। पापोंके कारण अगर भजन-ध्यानमें बाधा लग जाय, तो बड़ी मुश्किल हो जायगी; क्योंकि बिना पापके कोई प्राणी है ही नहीं। पाप-पुण्यसे ही मनुष्यशरीर मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि पुराने पाप भजनमें बाधक नहीं हो सकते। इसलिये जो दृढ़व्रती पुरुष भगवान्के शरण होकर वर्तमानमें भगवान्के भजनमें लग जाते हैं, उनके पुराने पापोंका अन्त हो जाता है। मनुष्यशरीर भजन करनेके लिये ही मिला है, अतः जो परिस्थितियाँ शरीरतक रहनेवाली हैं, वे भजनमें बाधा पहुँचायें—ऐसा कभी सम्भव ही नहीं है।

सकाम पुण्यकर्मीकी मुख्यता होनेसे जीव स्वर्गमें जाते हैं और पापकर्मीकी मुख्यता होनेसे नरकोंमें जाते हैं। परन्तु भगवान् विशेष कृपा करके पापों और पुण्योंका पूरा फल-भोग न होनेपर भी अर्थात् चौरासी लाख योनियोंके बीचमें ही जीवको मनुष्यशरीर दे देते हैं। मनुष्यशरीरमें भगवद्भजनका अवसर विशेषतासे प्राप्त होता है। अतः मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर भगवत्प्राप्तिके तरफसे कभी निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिलता है।

यह मनुष्यशरीर भोगयोनि नहीं है। इसको सामान्यतः कर्मयोनि कहते हैं। परन्तु संतोंकी वाणी और सिद्धान्तोंके अनुसार मनुष्यशरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही है। इसमें पुराने पुण्योंके अनुसार जो अनुकूल परिस्थिति आती है और पुराने पापोंके अनुसार जो प्रतिकूल परिस्थिति आती है—ये दोनों ही केवल साधन-सामग्री हैं। इन दोनोंमेंसे अनुकूल

  • अन्य योनियोंमें पाप नष्ट होनेपर भी स्वभाव सुधर जाय—यह नियम नहीं है; जैसे—चौरासी लाख योनियाँ और नरक भोगते हुए पाप तो नष्ट हो जाते हैं, पर स्वभाव नहीं सुधरता। परन्तु मनुष्ययोनियोंमें पाप रहनेपर भी साधकका स्वभाव सुधर सकता है, जैसे—पापोंके रहनेसे उनके फलरूपमें प्रतिकूल परिस्थिति ( बीमारी आदि ) आती है, पर सत्संगसे, साधनपरायणतासे, अहंता-परिवर्तनसे पारमार्थिक साधकका स्वभाव सुधर जाता है।

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

५६५

परिस्थिति आनेपर दुनियाकी सेवा करना और प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अनुकूलताकी इच्छिका त्याग करना—यह साधकका काम है। ऐसा करनेसे ये दोनों ही परिस्थितियाँ साधन-सामग्री हो जायँगी। इनमें भी देखा जाय तो अनुकूल परिस्थितियोंमें पुराने पुण्योंका नाश होता

है और वर्तमानमें भोगोंमें फँसनेकी सम्भावना भी रहती है। परन्तु प्रतिकूल परिस्थितियोंमें पुराने पापोंका नाश होता है और वर्तमानमें अधिक सजगता, सावधानी रहती है, जिससे साधन सुगमतासे बनता है। इस दृष्टिसे संतजन सांसारिक प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते आये हैं।

परिशिष्ट भाव —भगवान्के सम्मुख होना सबसे बड़ा पुण्य है; क्योंकि यह सब पुण्योंका मूल है*। परन्तु भगवान्से विमुख होना सबसे बड़ा पाप है; क्योंकि यह सब पापोंका मूल है। जिन मनुष्योंके पाप नष्ट हो गये हैं अर्थात् जो संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो गये हैं, वे राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होकर भगवान्का भजन करते हैं। भजन करनेवालोंके प्रकारका वर्णन भगवान् सोलहवें श्लोकमें 'चतुर्विधा भजन्ते माम्' पदोंसे कर चुके हैं।

राग-द्वेष मनुष्यको संसारकी तरफ खींचते रहते हैं। जबतक एक वस्तुमें राग रहता है, तबतक दूसरी वस्तुमें द्वेष रहता ही है; क्योंकि मनुष्य किसी वस्तुके सम्मुख होगा तो किसी वस्तुसे विमुख होगा ही। जबतक मनुष्यके भीतर राग-द्वेष रहते हैं; तबतक वह भगवान्के सर्वथा सम्मुख नहीं हो सकता; क्योंकि उसका सम्बन्ध संसारसे जुड़ा रहता है। उसका जितने अंशमें संसारसे राग रहता है, उतने अंशमें भगवान्से द्वेष अर्थात् विमुखता रहती है।

'दुद्वन्ताः' —ढीली प्रकृतिवाला अर्थात् शिथिल स्वभाववाला मनुष्य असत्का जल्दी त्याग नहीं कर सकता। एक विचार किया और उसको छोड़ दिया, फिर दूसरा विचार किया और उसको छोड़ दिया—इस प्रकार बार-बार विचार करने और उसको छोड़ते रहनेसे आदत बिगड़ जाती है। इस बिगड़ी हुई आदतके कारण ही वह असत्के त्यागकी बातें तो सीख जाता है, पर असत्का त्याग नहीं कर पाता। अगर वह असत्का त्याग कर भी देता है तो स्वभावकी ढिलाईके कारण फिर उसको सता दे देता है। स्वभावकी यह शिथिलता स्वयं साधककी बनायी हुई है। अतः साधकके लिये यह बहुत आवश्यक है कि वह अपना स्वभाव दृढ़ रहनेका बना ले। एक बार वह जो विचार कर ले, उसपर वह दृढ़ रहे। छोटी-से-छोटी बातमें भी वह दृढ़ (पक्का) रहे तो ऐसा स्वभाव बननेसे उसमें असत्का त्याग करनेकी, संसारसे विमुख होनेकी शक्ति आ जायगी।

सम्बन्ध—सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने साधकके लिये तीन बातें कही थीं—'मव्यासक्तमनाः'—'मेरेमें प्रेम करके और 'मदाश्रयः'—'मेरा आश्रय लेकर 'योगं युज्जन्'—'योगका अनुष्ठान करता है, वह मेरे समग्ररूपको जान जाता है। उन्हीं तीन बातोंका उपसंहार अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।

ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २१ ॥

जरामरण-माम्= मेराकृत्स्नम्= सम्पूर्ण
मोक्षायआश्रित्य= आश्रय लेकरअध्यात्मम्= अध्यात्मको
यतन्ति= प्रयत्न करते हैं,= और
ते= वेअखिलम्= सम्पूर्ण
तत्= उसकर्म= कर्मको
येब्रह्म= ब्रह्मको,विदुः= जान जाते हैं।

व्याख्या —[इन उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें आये 'मामाश्रित्य' पदमें 'मदाश्रयः' का, 'यतन्ति' पदमें 'योगं युज्जन्' का और 'युक्तचेतसः' पदमें 'मव्यासक्तमनाः' का उपसंहार किया गया है। इसी अध्यायके आरम्भमें जो 'समग्रम्' पद आया था, उसको यहाँ ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ कहा गया है।]

  • सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥ (मानस, सुन्दर० ४४।१)

५६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

‘जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये’—यहाँ जरा (वृद्धावस्था) और मरणसे मुक्ति पानेका तात्पर्य यह नहीं है कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मका ज्ञान होनेपर वृद्धावस्था नहीं होगी, शरीरकी मृत्यु नहीं होगी। इसका तात्पर्य यह है कि बोध होनेके बाद शरीरमें आनेवाली वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही, पर ये दोनों अवस्थाएँ उसको दुःखी नहीं कर सकेंगी। जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें ‘भूतप्रकृतिमोक्षम्’ कहनेका तात्पर्य भूत और प्रकृति अर्थात् कार्य और कारणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेमें है, ऐसे ही यहाँ ‘जरामरणमोक्षाय’ कहनेका तात्पर्य जरा, मृत्यु आदि शरीरके विकारोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेमें है।

जैसे कोई युवा पुरुष है, तो उसकी अभी न वृद्धावस्था है और न मृत्यु है; अतः वह जरा-मरणसे अभी मुक्त है। परन्तु वास्तवमें वह जरा-मरणसे मुक्त नहीं है; क्योंकि जरा-मरणके कारण शरीरके साथ जबतक सम्बन्ध है, तबतक जरा-मरणसे रहित होते हुए भी वह इनसे मुक्त नहीं है। परन्तु जो जीवन्मुक्त महापुरुष हैं, उनके शरीरमें जरा और मरण होनेपर भी वे इनसे मुक्त हैं। अतः जरा-मरणसे मुक्त होनेका तात्पर्य है—जिसमें जरा और मरण होते हैं, ऐसे प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होना। जब मनुष्य शरीरके साथ तादात्म्य (‘मैं यही हूँ’) मान लेता है, तब शरीरके वृद्ध होनेपर ‘मैं वृद्ध हो गया’ और शरीरके मरनेको लेकर ‘मैं मर जाऊँगा’—ऐसा मानता है। यह मान्यता ‘शरीर मैं हूँ और शरीर मेरा है’ इसीपर टिकी हुई है। इसलिये तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आया है—‘जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’ अर्थात् जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिमें दुःख-रूप दोषोंको देखना—इसका तात्पर्य है कि शरीरके साथ ‘मैं’ और ‘मेरा-पन’ का सम्बन्ध न रहे। जब मनुष्य ‘मैं’ और ‘मेरा-पन’ से मुक्त हो जायगा, तब वह जरा, मरण आदिसे भी मुक्त हो जायगा; क्योंकि शरीरके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही वास्तवमें जन्मका कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। वास्तवमें इसका शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है, तभी सम्बन्ध मिटता है। मिटता वही है, जो वास्तवमें नहीं होता।

यहाँ ‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ पदोंमें आश्रय लेना और

यत्न करना—इन दो बातोंको कहनेका तात्पर्य है कि मनुष्य अगर स्वयं यत्न करता है, तो अभिमान आता है कि ‘मैंने ऐसा कर लिया, जिससे ऐसा हो गया’ और अगर स्वयं यत्न न करके ‘भगवान्के आश्रयसे सब कुछ हो जायगा’ ऐसा मानता है, तो वह आलस्य और प्रमादमें तथा संग्रह और भोगमें लग जाता है। इसलिये यहाँ दो बातें बतायीं कि शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वयं तत्परतासे उद्योग करे और उस उद्योगके होनेमें तथा उद्योगकी सफलतामें कारण भगवान्को माने।

जो नित्य-निरन्तर वियुक्त हो रहा है, ऐसे शरीर-संसारको मनुष्य प्राप्त और स्थायी मान लेता है। जबतक वह शरीर और संसारको स्थायी मानकर उसे महत्ता देता रहता है, तबतक साधन करनेपर भी उसको भगवत्प्राप्ति नहीं होती। अगर वह शरीर-संसारको स्थायी न माने और उसको महत्त्व न दे, तो भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी। अतः इन दोनों बाधाओंको अर्थात् शरीर-संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको और महत्ताको विचारपूर्वक हटाना ही यत्न करना है। परन्तु जो भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उनका तो यही भाव रहता है कि उस प्रभुकी कृपासे ही साधन-भजन हो रहा है। भगवान्की कृपाका आश्रय लेनेसे और अपने बलका अभिमान न करनेसे वे भगवान्के समग्रूपको जान लेते हैं।

जो भगवान्का आश्रय न लेकर अपना कल्याण चाहते हुए उद्योग करते हैं, उनको अपने-अपने साधनके अनुसार भगवत्स्वरूपका बोध तो हो जाता है, पर भगवान्के समग्रूपका बोध उनको नहीं होता। जैसे, कोई प्राणायाम आदिके द्वारा योगका अभ्यास करता है, तो उसको अणिमा, महिमा आदि सिद्धियाँ मिलती हैं और उनसे ऊँचा उठनेपर परमात्माके निराकार-स्वरूपका बोध होता है अथवा अपने स्वरूपमें स्थिति होती है। ऐसे ही बौद्ध, जैन आदि सम्प्रदायोंमें चलनेवाले जितने मनुष्य हैं, जो कि ईश्वरको नहीं मानते, वे भी अपने-अपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंके अनुसार साधन करके असत्-जड़रूप संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो संसारसे विमुख होकर भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं, उनको भगवान्के समग्रूपका बोध होकर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है—यह विलक्षणता बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

५६७

‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ कहा है।

‘ते ब्रह्म तत् (विदुः) ’—इस तरहसे यत्न (साधन) करनेपर वे मेरे स्वरूपको* अर्थात् जो निर्गुण-निराकार है, जो मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, जो सामने नहीं है, शास्त्र जिसका परोक्षरूपसे वर्णन करते हैं, उस सच्चिदानन्दधन ब्रह्मको जान जाते हैं।

‘ब्रह्म’ के साथ ‘तत्’ शब्द देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी ‘तत्’ शब्दसे कहे जानेवाले जिस परमात्माको परोक्षरूपसे ही देखते हैं, ऐसे परमात्माका भी वे साक्षात् अपरोक्षरूपसे अनुभव कर लेते हैं।

उस परमात्माकी सत्ता प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। कारण कि वह परमात्मा किसी देशमें न हो, किसी समयमें न हो, किसी वस्तुमें न हो और किसी व्यक्तिमें न हो—ऐसा नहीं है, प्रत्युत वह सब देशमें है, सब समयमें है, सब वस्तुओंमें है और सब व्यक्तियोंमें है। ऐसा होनेपर भी वह अप्राप्त क्यों दीखता है? जो पहले नहीं था, बादमें नहीं रहेगा, अभी मौजूद रहते हुए भी प्रतिक्षण वियुक्त हो रहा है, अभावमें जा रहा है—ऐसे शरीर-संसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार कर ली, इसीसे नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्व अप्राप्त दीख रहा है।

‘कृत्स्नमध्यात्मम् (विदुः) ’—वे सम्पूर्ण अध्यात्मको जान जाते हैं अर्थात् सम्पूर्ण जीव तत्त्वसे क्या हैं, इस बातको वे जान जाते हैं। पंद्रहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें कहा है कि ‘जीवके द्वारा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरको प्राप्त करनेको विमूह पुरुष नहीं जानते और ज्ञानचक्षुवाले जानते हैं।’ इसको जाननेका तात्पर्य यह नहीं है कि ‘जीव कितने हैं, वे क्या-क्या करते हैं और उनकी क्या-क्या गति हो रही है’—इसको जान जाते हैं, प्रत्युत आत्मा शरीरसे अलग है—इसको तत्त्वसे जान जाते हैं अर्थात् अनुभव कर लेते हैं।

भगवान्के आश्रयसे साधकका जब क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब वह अध्यात्म-तत्त्वको—अपने स्वरूपको जान जाता है। केवल अपने स्वरूपको ही नहीं, प्रत्युत तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबके स्वरूपको भी जान जाता है कि सबका स्वरूप शुद्ध है, निर्मल है, प्रकृतिसे असम्बद्ध है। अनन्त जन्मोंतक अनन्त क्रियाओं

और शरीरोंके साथ एकता करनेपर भी उनकी कभी एकता हो ही नहीं सकती और अनन्त जन्मोंतक अपने स्वरूपका बोध न होनेपर भी वे अपने स्वरूपसे कभी अलग हो ही नहीं सकते—ऐसा जानना सम्पूर्ण अध्यात्म-तत्त्वको जानना है।

‘कर्म चाखिलं विदुः’—वे सम्पूर्ण कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् सृष्टिकी रचना क्यों होती है, कैसे होती है और भगवान् कैसे करते हैं—इसको भी वे जान जाते हैं।

जैसे भगवान्ने चारों वर्णोंकी रचना की। उस रचनामें जीवोंके जो गुण और कर्म हैं अर्थात् उनके जैसे भाव हैं और उन्होंने जैसे कर्म किये हैं, उनके अनुसार ही शरीरोंकी रचना की गयी है। उन वर्णोंमें जन्म होनेमें स्वयं भगवान्की तरफसे कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये भगवान्में कर्तृत्व नहीं है और फलेच्छा भी नहीं है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिकी रचना करते हुए भी भगवान् कर्तृत्व और फलासक्तिसे सर्वथा निलिप्त रहते हैं। ऐसे ही मनुष्यमात्रको देश, काल, परिस्थितिके अनुरूप जो भी कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जाय, उसे कर्तृत्व और फलासक्तिसे रहित होकर करनेसे वह कर्म मनुष्यको बाँधनेवाला नहीं होता अर्थात् वह कर्म फलजनक नहीं बनता। तात्पर्य है कि कर्मके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं है, इस तरह उनके साथ निलिप्तताका अनुभव करना ही अखिल कर्मको जानना है।

जो अनन्यभावसे केवल भगवान्का आश्रय लेता है, उसका प्राकृत क्रियाओं और पदार्थोंका आश्रय छूट जाता है। इससे उसको यह बात ठीक तरहसे समझमें आ जाती है कि ये सब क्रियाएँ और पदार्थ परिवर्तनशील और नाशवान् हैं अर्थात् क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा पदार्थोंकी भी उत्पत्ति और विनाश, संयोग और वियोग होता है। ब्रह्मलोकतककी कोई भी क्रिया और पदार्थ नित्य रहनेवाला नहीं है। अतः कर्मके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है—यह भी अखिल कर्मको जानना है।

तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का आश्रय लेकर चलने-वाले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् भगवान्ने जैसे कहा है कि ‘यह सम्पूर्ण

  • यहाँ अट्टाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें भगवान्ने अस्मत् शब्द ‘माम्’ का प्रयोग किया है, इसलिये यहाँ व्याख्यामें ‘मेरा स्वरूप’ ऐसा अर्थ लिया है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

संसार मेरेमें ही ओतप्रोत है' (सातवें अध्यायका सातवों श्लोक) और 'सब कुछ वासुदेव ही है' (सातवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक), ऐसे ही वे भगवान्के

समग्ररूपको जान जाते हैं कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं, भगवान्के सिवाय इनमें दूसरी कोई सत्ता नहीं है।

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।

प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः ॥ ३० ॥

ये = जो मनुष्य साधि- भूताधिदैवम् = अधिभूत तथा अधिदैवके सहित च = और साधियज्ञम् = अधियज्ञके सहित

माम् = मुझे विदुः = जानते हैं, ते = वे युक्तचेतसः = मुझमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्य

प्रयाणकाले = अन्तकालमें अपि = भी माम् = मुझे च = ही विदुः = जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

व्याख्या —'साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः'—[पूर्वश्लोकमें निर्गुण-निराकारको जाननेका वर्णन करके अब सगुण-साकारको जाननेकी बात कहते हैं।] यहाँ 'अधिभूत' नाम भौतिक स्थूल सृष्टिका है, जिसमें तमोगुणकी प्रधानता है। जितनी भी भौतिक सृष्टि है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसका क्षणमात्र भी स्थायित्व नहीं है। फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य दीखती है अर्थात् इसमें सत्यता, स्थिरता, सुखरूपता, श्रेष्ठता और आकर्षण दीखता है। यह सत्यता आदि सब-के-सब वास्तवमें भगवान्के ही हैं, क्षणभंगुर संसारके नहीं। तात्पर्य है कि जैसे बर्फकी सत्ता जलके बिना नहीं हो सकती, ऐसे ही भौतिक स्थूल सृष्टि अर्थात् अधिभूतकी सत्ता भगवान्के बिना नहीं हो सकती। इस प्रकार तत्त्वसे यह संसार भगवत्स्वरूप ही है—ऐसा जानना ही अधिभूतके सहित भगवान्को जानना है।

'अधिदैव' नाम सृष्टिकी रचना करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीका है, जिनमें रजोगुणकी प्रधानता है। भगवान् ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होते हैं अर्थात् तत्त्वसे ब्रह्माजी भगवत्स्वरूप ही हैं—ऐसा जानना ही अधिदैवके सहित भगवान्को जानना है।

'अधियज्ञ' नाम भगवान् विष्णुका है, जो अन्तर्यामी-रूपसे सबमें व्याप्त हैं और जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है। तत्त्वसे भगवान् ही अन्तर्यामीरूपसे सबमें परिपूर्ण हैं—ऐसा जानना ही अधियज्ञके सहित भगवान्को जानना है।

अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्को जाननेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्णके शरीरके किसी

एक अंशमें विराट्रूप है (गीता—दसवें अध्यायका बयालीसवों और ग्यारहवें अध्यायका सातवों श्लोक) और उस विराट्रूपमें अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (ब्रह्माजी) और अधियज्ञ (विष्णु) आदि सभी हैं, जैसा कि अर्जुनने कहा है—हे देव! मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको; जिनकी नाभिसे कमल निकला है, उन विष्णुको, कमलपर विराजमान ब्रह्माको और शंकर आदिको देख रहा हूँ (गीता—ग्यारहवें अध्यायका पन्द्रहवों श्लोक)। अतः तत्त्वसे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण ही समग्र भगवान् हैं।

'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः' —जो संसारके भोगों और संग्रहकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें समान रहनेवाले हैं तथा संसारसे सर्वथा उपरत होकर भगवान्में लगे हुए हैं, वे पुरुष युक्तचेता हैं। ऐसे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मेरेको ही जानते हैं अर्थात् अन्तकालकी पीड़ा आदिमें भी वे मेरेमें ही अटलरूपसे स्थित रहते हैं। उनकी ऐसी दृढ़ स्थिति होती है कि वे स्थूल और सूक्ष्म-शरीरमें कितनी ही हलचल होनेपर भी कभी किंचिन्मात्र भी विचलित नहीं होते।

भगवान्के समग्ररूप-सम्बन्धी

विशेष बात

(१)

प्रकृति और प्रकृतिके कार्य—क्रिया, पदार्थ आदिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही सभी विकार पैदा होते हैं और उन क्रिया, पदार्थ आदिकी प्रकटरूपसे सत्ता दीखने लग जाती है। परन्तु प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा

श्लोक ३० ]

  • साधक-संजीवनी *

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सम्बन्ध-विच्छेद करके भगवत्स्वरूपमें स्थित होनेसे उनकी स्वतन्त्र सत्ता उस भगवतत्वमें ही लीन हो जाती है। फिर उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं दीखती।

जैसे, किसी व्यक्तिके विषयमें हमारी जो अच्छे और बुरेकी मान्यता है, वह मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो वह व्यक्ति भगवान्का स्वरूप है अर्थात् उस व्यक्तिमें तत्त्वके सिवाय दूसरा कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व ही नहीं है। ऐसे ही संसारमें 'यह ठीक है, यह बेठीक है' इस प्रकार ठीक-बेठीककी मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो संसार भगवान्का स्वरूप ही है। हाँ, संसारमें जो वर्ण-आश्रमकी मर्यादा है, 'ऐसा काम करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये'-यह जो विधि-निषेधकी मर्यादा है, इसको महापुरुषोंने जीवोंके कल्याणार्थ व्यवहारके लिये मान्यता दी है।

जब यह भौतिक सृष्टि नहीं थी, तब भी भगवान् थे और इसके लीन होनेपर भी भगवान् रहेंगे—इस तरहसे जब वास्तविक भगवतत्त्वका बोध हो जाता है, तब भौतिक सृष्टिकी सत्ता भगवान्में ही लीन हो जाती है अर्थात् इस सृष्टिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न रहनेपर संसार मिट जाता है, उसका अभाव हो जाता है, प्रत्युत अन्तःकरणमें सत्यत्वने जो संसारकी सत्ता और महत्ता बैठी हुई थी, जो कि जीवके कल्याणमें बाधक थी, वह नहीं रहती। जैसे सोनेके गहनोंकी अनेक तरहकी आकृति और अलग-अलग उपयोग होनेपर भी उन सबमें एक ही सोना है, ऐसे ही भगवद्भक्तके द्वारा अनेक तरहका यथायोग्य सांसारिक व्यवहार होनेपर भी उन सबमें एक ही भगवतत्त्व है—ऐसी अटलबुद्धि रहती है। इस तत्त्वको समझनेके लिये ही उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें समग्ररूपका वर्णन हुआ है।

(२)

उपासनाकी दृष्टिसे भगवान्के प्रायः दो रूपोंका विशेष वर्णन आता है—एक सगुण और एक निर्गुण। इनमें

सगुणके दो भेद होते हैं—एक सगुण-साकार और एक सगुण-निराकार। परन्तु निर्गुणके दो भेद नहीं होते, निर्गुण निराकार ही होता है। हाँ, निराकारके दो भेद होते हैं—एक सगुण-निराकार और एक निर्गुण-निराकार।

उपासना करनेवाले दो रुचिके होते हैं—एक सगुण विषयक रुचिवाला होता है और एक निर्गुणविषयक रुचिवाला होता है। परन्तु इन दोनोंकी उपासना भगवान्के 'सगुण-निराकार' रूपसे ही शुरू होती है; जैसे—परमात्म-प्राप्तिके लिये कोई भी साधक चलता है तो वह पहले 'परमात्मा है'—इस प्रकार परमात्माकी सत्ताको मानता है और 'वे परमात्मा सबसे श्रेष्ठ हैं, सबसे दयालु हैं, उनसे बढ़कर कोई है नहीं'—ऐसे भाव उसके भीतर रहते हैं, तो उपासना सगुण-निराकारसे ही शुरू हुई। इसका कारण यह है कि बुद्धि प्रकृति कार्य (सगुण) होनेसे निर्गुणको पकड़ नहीं सकती। इसलिये निर्गुणके उपासकका लक्ष्य तो निर्गुण-निराकार होता है, पर बुद्धिसे वह सगुण-निराकार-का ही चिन्तन करता है*।

सगुणकी ही उपासना करनेवाले पहले सगुण-साकार मानकर उपासना करते हैं। परन्तु मनमें जबतक साकार-रूप दृढ़ नहीं होता, तबतक 'प्रभु हैं और वे मेरे सामने हैं' ऐसी मान्यता मुख्य होती है। इस मान्यतामें सगुण भगवान्की अभिव्यक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें जब वह सगुण-साकाररूपसे भगवान्के दर्शन, भाषण, स्पर्श और प्रसाद प्राप्त कर लेता है, तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है।

निर्गुणकी उपासना करनेवाले परमात्माको सम्पूर्ण संसारमें व्यापक समझते हुए चिन्तन करते हैं। उनकी वृत्ति जितनी ही सूक्ष्म होती चली जाती है, उतनी ही उनकी उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें सांसारिक आसक्ति और गुणोंका सर्वथा त्याग होनेपर जब 'मैं', 'तू' आदि कुछ भी नहीं रहता, केवल चिन्मय-तत्त्व शेष रह जाता है, तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है।

इस प्रकार दोनोंकी अपनी-अपनी उपासनाकी पूर्णता

  • उपासना सगुण-निराकारसे शुरू होती है—इसीलिये भगवान्ने इस (सातवें) अध्यायके अठ्ठाईसवें श्लोकमें 'सगुण-निराकार' का वर्णन किया है। फिर उन्तीसवें श्लोकमें 'निर्गुण-निराकार' का और तीसवें श्लोकमें 'सगुण-साकार' का वर्णन किया है। इस प्रकार यहाँ तो तीनों स्वरूपोंका एक-एक श्लोकमें वर्णन किया गया है, पर आगे आठवें अध्यायमें इन तीनोंका तीन-तीन श्लोकोंमें वर्णन किया गया है, जैसे—आठवें अध्यायके आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें 'सगुण-निराकार' की उपासनाका; ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें 'निर्गुण-निराकार' की उपासनाका तथा चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें 'सगुण-साकार' की उपासनाका विशद वर्णन किया गया है।