श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
है। उस पूजनमें विधिरहितपना यह है कि 'सब कुछ भगवान् ही हैं' इस बातको वे जानते नहीं, मानते नहीं तथा देवता आदिका पूजन करके भोग और ऐश्वर्यको चाहते हैं। इसलिये उनका पतन होता है। अगर वे देवता आदिके रूपमें मेरेको ही मानते और उन भगवत्स्वरूप देवताओंसे कुछ भी नहीं चाहते, तो वे देवता अथवा स्वयं मैं भी उनको कुछ देना चाहता, तो भी वे ऐसा ही कहते कि 'हे प्रभो! आप हमारे हैं और हम आपके हैं—आपके साथ इस अपनेपनसे भी बढ़कर कुछ और (भोग तथा ऐश्वर्य) होता, तो हम आपसे चाहते भी और माँगते भी। अब आप ही बताइये, इससे बढ़कर क्या है?' इस तरहके भाववाले वे मेरेको ही आनन्द देनेवाले बन जाते, तो फिर वे तुच्छ और क्षणभंगुर देवलोकोंको प्राप्त नहीं होते।
'पितृयान्ति पितृव्रताः'—जो सकामभावसे पितरोंका पूजन करते हैं, उनको पितरोंसे कई तरहकी सहायता मिलती है। इसलिये लौकिक सिद्धि चाहनेवाले मनुष्य पितरोंके व्रतोंका, नियमोंका, पूजन-विधियोंका सांगोपांग पालन करते हैं और पितरोंको अपना इष्ट मानते हैं। उनको अधिक-से-अधिक और ऊँचा-से-ऊँचा फल यह मिलेगा कि पितर उनको अपने लोकमें ले जायेंगे। इसलिये यहाँ कहा गया कि पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं।
'भूतानि यान्ति भूतेन्यः'—तामस स्वभाववाले मनुष्य सकामभावपूर्वक भूत-प्रेतोंका पूजन करते हैं और उनके नियमोंको धारण करते हैं। जैसे, मन्त्र-जपके लिये गधेकी पूँछके बालोंका धागा बनाकर उसमें ऊँटके दाँतोंकी मणियाँ पिरौना, रात्रिमें श्मशानमें जाकर और मुर्देपर बैठकर भूत-प्रेतोंके मन्त्रोंको जपना, मांस-मदिरा आदि महान् अपवित्र चीजोंसे भूत-प्रेतोंका पूजन करना आदि-आदि। इससे अधिक-से-अधिक उनकी सांसारिक कामनाएँ सिद्ध हो सकती हैं। मरनेके बाद तो उनकी दुर्गति ही होगी अर्थात् उनको भूत-प्रेतकी योनि प्राप्त होगी। इसलिये यहाँ कहा
गया कि भूतोंका पूजन करनेवाले भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं।
'यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्'—जो अनन्यभावसे किसी भी तरह मेरे भजन, पूजन और चिन्तनमें लग जाते हैं, वे निश्चितरूपसे मेरेको ही प्राप्त होते हैं।
विशेष बात
सांसारिक भोग और ऐश्वर्यकी कामनावाले मनुष्य अपने-अपने इष्टके पूजन आदिमें तत्परतासे लगे रहते हैं और इष्टकी प्रसन्नताके लिये सब काम करते हैं; परन्तु भगवान्के भजन-ध्यानमें लगनेवाले जिस तत्त्वको प्राप्त होते हैं, उसको प्राप्त न होकर वे बार-बार सांसारिक तुच्छ भोगोंको और नरकों तथा चौरासी लाख योनियोंको प्राप्त होते रहते हैं। इस तरह जो मनुष्यजन्म पाकर भगवान्के साथ प्रेमका सम्बन्ध जोड़कर उनको भी आनन्द देनेवाले हो सकते थे, वे सांसारिक तुच्छ कामनाओंमें फँसकर और तुच्छ देवता, पितर आदिके फेरेमें पड़कर कितनी अनर्थ-परम्पराको प्राप्त होते हैं! इसलिये मनुष्यको बड़ी सावधानीसे केवल भगवान्में ही लग जाना चाहिये।
देवता, पितर, ऋषि, मुनि, मनुष्य आदिमें भगवदबुद्धि हो और निष्कामभावपूर्वक केवल उनकी पुष्टिके लिये, उनके हितके लिये ही उनकी सेवा-पूजा की जाय, तो भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। इन देवता आदिको भगवान्से अलग मानना और अपना सकामभाव रखना ही पतनका कारण है।
भूत, प्रेत, पिशाच आदि योनि ही अशुद्ध है और उनकी पूजा-विधि, सामग्री, आराधना आदि भी अत्यन्त अपवित्र है। इनका पूजन करनेवाले इनमें न तो भगवदबुद्धि कर सकते हैं* और न निष्कामभाव ही रख सकते हैं। इसलिये उनका तो सर्वथा पतन ही होता है। इस विषयमें थोड़े वर्ष पहलेकी एक सन्ची घटना है। कोई 'कर्णपिशाचिनी' की उपासना करनेवाला था। उसके पास कोई भी कुछ पछुने आता, तो वह उसके बिना पूछे ही बता देता कि यह तुम्हारा
- अगर भक्तका किसी भूत-प्रेतमें भगवद्भाव हो भी जाय तो उस भूत-प्रेतका उद्धार हो जाता है और भक्तको भगवान्के दर्शन हो जाते हैं। जैसे, भक्त नामदेवजीको एक बार लम्बे कदका एक भयंकर प्रेत दिखायी दिया तो वे उसे भगवत्स्वरूप ही समझकर प्रसन्नतापूर्वक कह उठे—
भले पधारै लम्बकनाथ!
धरनी पाँव, स्वर्ग लों माथा, जोजन भरके लाँबे हाथ॥
सिव सनकादिक पार न पावें, अनगिन साज सजाये साथ।
नामदेवके तुम ही स्वामी, कीजै मोकों आज सनाथ॥
इससे उस प्रेतका उद्धार हो गया और उसकी जगह भगवान् प्रकट हो गये!
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
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प्रश्न है और यह उसका उत्तर है। इससे उसने बहुत रुपये कमाये।
अब उस विद्याके चमत्कारको देखकर एक सज्जन उसके पीछे पड़ गये कि 'मेरेको भी यह विद्या सिखाओ, मैं भी इसको सीखना चाहता हूँ।' तो उसने सरलतासे कहा कि 'यह विद्या चमत्कारी तो बहुत है, पर वास्तविक हित, कल्याण करनेवाली नहीं है।' उससे यह पूछा गया कि 'आप दूसरेके बिना कहे ही उसके प्रश्नको और उत्तरको कैसे जान जाते हो?' तो उसने कहा कि 'मैं अपने कानमें बिछा लगाये रखता हूँ। जब कोई पूछने आता है, तो उस समय कर्णपिशाचिनी आकर मेरे कानमें उसका प्रश्न और प्रश्नका उत्तर सुना देती है और मैं वैसा ही कह देता हूँ।' फिर उससे पूछा गया कि 'आपका मरना कैसे होगा—इस विषयमें आपने कुछ पूछा है कि नहीं?' इसपर उसने कहा कि 'मेरा मरना तो नर्मदाके किनारे होगा।' उसका शरीर शान्त होनेके बाद पता लगा कि जब वह (अपना अन्त-समय जानकर) नर्मदामें जाने लगा, तब कर्णपिशाचिनी सूकरी बनकर उसके सामने आ गयी। उसको देखकर वह
परिशिष्ट भाव— 'व्रत' का अर्थ है—नियम। अतः 'देवव्रत' शब्दका अर्थ हुआ—देवताओंकी उपासनाके नियमोंको धारण करना (गीता—सातवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। भगवान्के शरण होकर उन्हींके लिये कर्म करना भगवान्का पूजन है—'स्वकर्मणा तमभ्यर्थ्य सिद्धिं विन्दति मानवः ' (गीता १८।४६)।
मात्र क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करनेसे सब भगवान्का पूजन हो जाता है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। निष्कामभाव और भगवद्वृद्धि होनेसे कोई निषिद्ध क्रिया हो ही नहीं सकती; क्योंकि कामनाके कारण ही निषिद्ध क्रिया होती है (गीता—तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सैंतीसवाँ श्लोक)।
वास्तवमें सब कुछ भगवान्का ही रूप है। परन्तु जो भगवान्के सिवाय दूसरी कोई भी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, उसका उद्धार नहीं होता। वह ऊँचे-से-ऊँचे लोकोंमें भी चला जाय तो भी उसको लौटकर संसारमें आना ही पड़ता है (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—देवताओंके पूजनमें तो बहुत-सी सामग्री, नियमों और विधियोंकी आवश्यकता होती है, फिर आपके पूजनमें तो और भी ज्यादा कठिनता होती होगी? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहतमशनामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
| यः | = जो भक्त | भक्त्या | = प्रेमपूर्वक | भक्त्युपहतम् | = प्रेमपूर्वक दिये हुए |
|---|---|---|---|---|---|
| पत्रम् | = पत्र, | मे | = मेरे | उपहार-(भेंट-) | |
| पुष्पम् | = पुष्प, | प्रयच्छति | = अर्पण करता है, | को | |
| फलम् | = फल, | तत् | = उस (मुझमें) | अहम् | = मैं |
| तोयम् | = जल आदि-(यथा-साध्य एवं अनायास प्राप्त वस्तु-) | प्रयतात्मनः | = तल्लीन हुए अन्तः-करणवाले भक्तके द्वारा | अशनामि | = खा लेता हूँ अर्थात् स्वीकार कर लेता हूँ। |
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
व्याख्या —[ भगवान्की अपरा प्रकृतिके दो कार्य हैं—पदार्थ और क्रिया। इन दोनोंके साथ अपनी एकता मानकर ही यह जीव अपनेको उनका भोक्ता और मालिक मानने लग जाता है और इन पदार्थों और क्रियाओंके भोक्ता एवं मालिक भगवान् हैं—इस बातको वह भूल जाता है। इस भूलको दूर करनेके लिये ही भगवान् यहाँ कहते हैं कि पत्र, पुष्प, फल आदि जो कुछ पदार्थ हैं और जो कुछ क्रियाएँ हैं (नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक), उन सबको मेरे अर्पण कर दो, तो तुम सदा-सदाके लिये आफतसे छूट जाओगे (नवें अध्यायका अठ्ठाईसवाँ श्लोक)। दूसरी बात, देवताओंके पूजनमें विधि-विधानकी, मन्त्रों आदिकी आवश्यकता है। परन्तु मेरा तो जीवके साथ स्वतः-स्वाभाविक अपनेपनका सम्बन्ध है, इसलिये मेरी प्राप्तिमें विधियोंकी मुख्यता नहीं है। जैसे, बालक माँकी गोदीमें जाय, तो उसके लिये किसी विधिकी जरूरत नहीं है। वह तो अपनेपनके सम्बन्धसे ही माँकी गोदीमें जाता है। ऐसे ही मेरी प्राप्तिके लिये विधि, मन्त्र आदिकी आवश्यकता नहीं है, केवल अपनेपनके दृढ़ भावकी आवश्यकता है।]
‘पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति’ —जो भक्त अनायास यथासाध्य प्राप्त पत्र (तुलसीदल आदि), पुष्प, फल, जल आदि भी प्रेमपूर्वक भगवान्के अर्पण करता है, तो भगवान् उसको खा जाते हैं। जैसे, द्रौपदीसे पत्ता लेकर भगवान्ने खा लिया और त्रिलोकीको तृप्त कर दिया। गजेन्द्रने सरोवरका एक पुष्प भगवान्के अर्पण करके नमस्कार किया, तो भगवान्ने गजेन्द्रका उद्धार कर दिया। शबरीके दिये हुए फल खाकर भगवान् इतने प्रसन्न हुए कि जहाँ कहीं भोजन करनेका अवसर आया, वहाँ शबरीके फलोंकी प्रशंसा करते रहे। रतिदेवने अन्त्यजरूपसे आये भगवान्को जल पिलाया तो उनको भगवान्के साक्षात् दर्शन हो गये।
जब भक्तका भगवान्को देनेका भाव बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब वह अपने-आपको भूल जाता है। भगवान् भी भक्तके प्रेममें इतने मस्त हो जाते हैं कि अपने-आपको भूल जाते हैं। प्रेमकी अधिकतामें भक्तको इसका खयाल नहीं रहता कि मैं क्या दे रहा हूँ, तो भगवान्को भी यह
खयाल नहीं रहता कि मैं क्या खा रहा हूँ! जैसे, विदुरानी प्रेमके आवेशमें भगवान्को केलोंकी गिरी न देकर छिलके देती हैं, तो भगवान् उन छिलकोंको भी गिरीकी तरह ही खा लेते हैं।
‘तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः’ —भक्तके द्वारा प्रेमपूर्वक दिये गये उपहारको भगवान् स्वीकार ही नहीं कर लेते, प्रत्युत उसको खा लेते हैं—‘अश्नामि’ । जैसे, पुष्प सृंघनेकी चीज है, पर भगवान् यह नहीं देखते कि यह खानेकी चीज है या नहीं; वे तो उसको खा ही लेते हैं। उसको आत्मसात् कर लेते हैं, अपनेमें मिला लेते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि भक्तका देनेका भाव रहता है, तो भगवान्का भी लेनेका भाव हो जाता है। भक्तमें भगवान्को खिलानेका भाव आता है, तो भगवान्को भी भूख लग जाती है!
‘प्रयतात्मनः’ का तात्पर्य है कि जिसका अन्तःकरण भगवान्में तल्लीन हो गया है, जो केवल भगवान्के ही परायण है, ऐसे प्रेमी भक्तके दिये हुए उपहार-(भेंट-) को भगवान् स्वयं खा लेते हैं।
यहाँ पत्र, पुष्प, फल और जल—इन चारोंका नाम लेनेका तात्पर्य यह है कि पत्र, पुष्प और फल—ये तीनों जलसे पैदा होनेके कारण जलके कार्य हैं और जल इनका कारण है। इसलिये ये पत्र, पुष्प आदि कार्य-कारणरूप मात्र पदार्थोंके उपलक्षण हैं; क्योंकि मात्र सृष्टि जलका कार्य है और जल उसका कारण है। अतः मात्र पदार्थोंको भगवान्के अर्पण करना चाहिये।
इस श्लोकमें ‘भक्त्या’ और ‘भक्त्युपहृतम्’ —इस रूपमें ‘भक्ति’ शब्द दो बार आया है। इनमें ‘भक्त्या’ पदसे भक्तका भक्तिपूर्वक देनेका भाव है और ‘भक्त्युपहृतम्’ पद भक्तिपूर्वक दी गयी वस्तुका विशेषण है। तात्पर्य यह हुआ कि भक्तिपूर्वक देनेसे वह वस्तु भक्तिरूप, प्रेमरूप हो जाती है, तो भगवान् उसको आत्मसात् कर लेते हैं; अपनेमें मिला लेते हैं; क्योंकि वे प्रेमके भूखे हैं।
विशेष बात
इस श्लोकमें पदार्थोंकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भक्तके भावकी मुख्यता है; क्योंकि भगवान् भावके भूखे हैं; पदार्थोंके नहीं। अतः अर्पण करनेवालेका भाव मुख्य
१-घर गुरु गृह प्रियसदन सासुरे, भइ जब जहँ पहुनाई। तब तहँ कहि सबरीके फलनिकी, रुचि माधुरी न पाई॥
(विनयपत्रिका १६४।४)
२-‘ततवेता’ तिहुँ लोकमें, भोजन कियो अपार। इक शबरी इक विदुरघर, रुच पायो दो बार॥
श्लोक २७]
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(भक्तिपूर्ण) होना चाहिये। जैसे, कोई अत्यधिक गुरुभक्त शिष्य हो, तो गुरुकी सेवामें उसका जितना समय, वस्तु, क्रिया लगती है, उतना ही उसको आनन्द आता है, प्रसन्नता होती है। इसी तरह पतिकी सेवामें समय, वस्तु, क्रिया लगनेपर पतिव्रता स्त्रीको बड़ा आनन्द आता है; क्योंकि पतिकी सेवामें ही उसको अपने जीवनकी और वस्तुकी सफलता दीखती है। ऐसे ही भक्तका भगवान्के प्रति प्रेम-भाव होता है, तो वस्तु चाहे छोटी हो या बड़ी हो, साधारण हो या कीमती हो, उसको भगवान्के अर्पण करनेमें भक्तको बड़ा आनन्द आता है। उसका भाव यह रहता है कि वस्तुमात्र भगवान्की ही है। मेरेको भगवान्ने सेवा-पूजाका अवसर दे दिया है—यह मेरेपर भगवान्की विशेष कृपा हो गयी है! इस कृपाको देख-देखकर वह प्रसन्न होता रहता है।
भावपूर्वक लगाये हुए भोगको भगवान् अवश्य स्वीकार करते हैं, चाहे हमें दीखे या न दीखे। इस विषयमें एक आचार्य कहते थे कि हमारे मन्दिरमें दीवालीसे होलीतक अर्थात् सरदीके दिनोंमें ठाकुरजीको पिस्ता, बादाम, अखरोट, काजू, चिरौंजी आदिका भोग लगाया जाता था; परन्तु जब यह बहुत मँहगा हो गया, तब हमने मूँगफलीका भोग
लगाना शुरू कर दिया। एक दिन रातमें ठाकुरजीने स्वप्नमें कहा—‘अरे यार! तू मूँगफली ही खिलायेगा क्या?’ उस दिनेके बाद फिर मेवाका भोग लगाना शुरू कर दिया। उनको यह विश्वास हो गया कि जब ठाकुरजीको भोग लगाते हैं, तब वे उसे अवश्य स्वीकार करते हैं।
भोग लगानेपर जिन वस्तुओंको भगवान् स्वीकार कर लेते हैं, उन वस्तुओंमें विलक्षणता आ जाती है अर्थात् उन वस्तुओंमें स्वाद बढ़ जाता है, उनमें सुगन्ध आने लगती है; उनको खानेपर विलक्षण तृप्ति होती है, वे चीजें कितने ही दिनोंतक पड़ी रहनेपर भी खराब नहीं होतीं; आदि-आदि। परन्तु यह कसौटी नहीं है कि ऐसा होता ही है। कभी भक्तका ऐसा भाव बन जाय तो भोग लगायी हुई वस्तुओंमें ऐसी विलक्षणता आ जाती है—ऐसा हमने सन्तोसे सुना है।
मनुष्य जब पदार्थोंकी आहुति देते हैं तो वह यज्ञ हो जाता है; चीजोंको दूसरोंको दे देते हैं तो वह दान कहलाता है, संयमपूर्वक अपने काममें न लेनेसे वह तप हो जाता है और भगवान्के अर्पण करनेसे भगवान्के साथ योग (सम्बन्ध) हो जाता है—ये सभी एक ‘त्याग’के ही अलग-अलग नाम हैं।
परिशिष्ट भाव —देवताओंकी उपासनामें तो अनेक नियमोंका पालन करना पड़ता है (गीता—सातवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक); परन्तु भगवान्की उपासनामें कोई नियम नहीं है। भगवान्की उपासनामें प्रेमकी, अपनेपनकी प्रधानता है, विधिकी नहीं—‘भक्त्या प्रयच्छति ’, ‘भक्त्युपहत्तम् ’।
जैसे भोला बालक जो कुछ हाथमें आये, उसको मुँहमें डाल लेता है, ऐसे ही भोले भक्त भगवान्को जो भी अर्पण करते हैं, उसको भगवान् भी भोले बनकर खा लेते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’ (गीता ४।११); जैसे—विदुरानीने केलेका छिलका दिया तो भगवान्ने उसको ही खा लिया!
‘भक्त्या प्रयच्छति ’ का तात्पर्य है कि भक्त वस्तुको प्रेमपूर्वक भगवान्के अर्पण करता है, किसी कामनासे नहीं। देवताओंकी उपासनामें तो वस्तुविशेषकी आवश्यकता होती है, पर भगवान्की उपासनामें वस्तुविशेषकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत प्रेमकी आवश्यकता है।
सम्बन्ध—संसारमात्रके दो रूप हैं—पदार्थ और क्रिया। इनमें आसक्ति होनेसे ये दोनों ही पतन करनेवाले होते हैं। अतः ‘पदार्थ’ अर्पण करनेकी बात पूर्वश्लोकमें कह दी और अब आगेके श्लोकमें ‘क्रिया’ अर्पण करनेकी बात कहते हैं।
यत्करोषि यदश्नासि यजुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीपुत्र! (तू) | यत् | = जो कुछ | यत् | = जो कुछ |
|---|---|---|---|---|---|
| यत् | = जो कुछ | जुहोषि | = यज्ञ करता है, | तपस्यसि | = तप करता है, |
| करोषि | = करता है, | यत् | = जो कुछ | तत् | = वह (सब) |
| यत् | = जो कुछ | ददासि | = दान देता है | मदर्पणम् | = मेरे अर्पण |
| अश्नासि | = भोजन करता है, | (और) | कुरुष्व | = कर दे। |
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
व्याख्या —[ भगवान्का यह नियम है कि जो जैसे मेरी शरण लेते हैं, मैं वैसे ही उनको आश्रय देता हूँ (गीता—चौथे अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। जो भक्त अपनी वस्तु मेरे अर्पण करता है, मैं उसे अपनी वस्तु देता हूँ। भक्त तो सीमित ही वस्तु देता है, पर मैं अनन्त गुणा करके देता हूँ। परन्तु जो अपने-आपको ही मुझे दे देता है, मैं अपने-आपको उसे दे देता हूँ। वास्तवमें मैंने अपने-आपको संसारमात्रको दे रखा है (गीता—नवें अध्यायका चौथा श्लोक), और सबको सब कुछ करनेकी स्वतन्त्रता दे रखी है। अगर मनुष्य मेरी दी हुई स्वतन्त्रताको मेरे अर्पण कर देता है, तो मैं भी अपनी स्वतन्त्रताको उसके अर्पण कर देता हूँ अर्थात् मैं उसके अधीन हो जाता हूँ। इसलिये यहाँ भगवान् उस स्वतन्त्रताको अपने अर्पण करनेके लिये अर्जुनसे कहते हैं।]
‘यत्करोषि’ —यह पद ऐसा विलक्षण है कि इसमें शास्त्रीय, शारीरिक, व्यावहारिक, सामाजिक, पारमार्थिक आदि यावन्मात्र क्रियाएँ आ जाती हैं। भगवान् कहते हैं कि तू इन सम्पूर्ण क्रियाओंको मेरे अर्पण कर दे अर्थात् तू खुद ही मेरे अर्पित हो जा, तो तेरी सम्पूर्ण क्रियाएँ स्वतः मेरे अर्पित हो जायँगी।
अब आगे भगवान् उन्हीं क्रियाओंका विभाग करते हैं— ‘यदृशनासि’ —इस पदके अन्तर्गत सम्पूर्ण शारीरिक क्रियाएँ लेनी चाहिये अर्थात् शरीरके लिये तू जो भोजन करता है, जल पीता है, कृपथ्यका त्याग और पथ्यका सेवन करता है, ओषधि-सेवन करता है, कपड़ा पहनता है, सरदी-गरमीसे शरीरकी रक्षा करता है, स्वास्थ्यके लिये समयानुसार सोता और जागता है, घूमता-फिरता है, शौच-स्नान करता है, आदि सभी क्रियाओंको तू मेरे अर्पण कर दे।
यह शारीरिक क्रियाओंका पहला विभाग है।
‘यज्जुहोषि’ —इस पदमें यज्ञ-सम्बन्धी सभी क्रियाएँ आ जाती हैं अर्थात् शाकल्य-सामग्री इकट्ठी करना, अग्नि प्रकट करना, मन्त्र पढ़ना, आहुति देना आदि सभी शास्त्रीय क्रियाएँ मेरे अर्पण कर दे।
‘ददासि यत्’ —तू जो कुछ देता है अर्थात् दूसरोंकी सेवा करता है, दूसरोंकी सहायता करता है, दूसरोंकी आवश्यकता-पूर्ति करता है, आदि जो कुछ शास्त्रीय क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।
‘यत्तपस्यसि’ —तू जो कुछ तप करता है अर्थात्
विषयोंसे अपनी इन्द्रियोंका संयम करता है, अपने कर्तव्यका पालन करते हुए अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंको प्रसन्नतापूर्वक सहता है और तीर्थ, व्रत, भजन-ध्यान, जप-कीर्तन, श्रवण-मनन, समाधि आदि जो कुछ पारमार्थिक क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।
उपर्युक्त तीनों पद शास्त्रीय और पारमार्थिक क्रियाओंका दूसरा विभाग है।
‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’ —यहाँ भगवान्ने परस्मैपदी ‘कुरु’ क्रियापद न देकर आत्मनेपदी ‘कुरुष्व’ क्रियापद दिया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि तू सब कुछ मेरे अर्पण कर देगा, तो मेरी कमीकी पूर्ति हो जायगी—यह बात नहीं है; किन्तु सब कुछ मेरे अर्पण करनेपर तेरे पास कुछ नहीं रहेगा अर्थात् तेरा ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन सब खत्म हो जायगा, जो कि बन्धनकारक है। सब कुछ मेरे अर्पण करनेके फलस्वरूप तेरको पूर्णताकी प्राप्ति हो जायगी अर्थात् जिस लाभसे बढ़कर दूसरा कोई लाभ सम्भव ही नहीं है और जिस लाभमें स्थित होनेपर बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता अर्थात् जहाँ दुःखोंके संयोगका ही अत्यन्त वियोग है (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ-तेईसवाँ श्लोक)—ऐसा लाभ तेरको प्राप्त हो जायगा।
इस श्लोकमें ‘यत्’ पद पाँच बार कहनेका तात्पर्य है कि एक-एक क्रिया अर्पण करनेका भी अपार माहात्म्य है, फिर सम्पूर्ण क्रियाएँ अर्पण की जायँ, तब तो कहना ही क्या है!
विशेष बात
छब्बीसवें श्लोकमें तो भगवान्ने पत्र, पुष्प आदि अर्पण करनेकी बात कही, जो कि अनायास अर्थात् बिना परिश्रमके प्राप्त होते हैं। परन्तु इसमें कुछ-न-कुछ उद्योग तो करना ही पड़ेगा अर्थात् सुगम-से-सुगम वस्तुको भी भगवान्के अर्पण करनेका नया उद्योग करना पड़ेगा। परन्तु इस सताईसवें श्लोकमें भगवान्ने उससे भी विलक्षण बात बतायी है कि कोई नये पदार्थ नहीं देने हैं, कोई नयी क्रिया नहीं करनी है और कोई नया उद्योग भी नहीं करना है, प्रत्युत हमारे द्वारा जो लौकिक, पारमार्थिक आदि स्वाभाविक क्रियाएँ होती हैं, उनको भगवान्के अर्पण कर देना है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के लिये किसी वस्तु और क्रियाविशेषको अर्पण करनेकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत खुदको ही अर्पित करनेकी जरूरत है। खुद अर्पित होनेसे
श्लोक २८ ]
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सब क्रियाएँ स्वाभाविक भगवान्के अर्पण हो जायँगी, भगवान्की प्रसन्नताका हेतु हो जायँगी। जैसे बालक अपनी माँके सामने खेलता है, कभी दौड़कर दूर चला जाता है और फिर दौड़कर गोदमें आ जाता है, कभी पीठपर चढ़ जाता है, आदि जो कुछ क्रिया बालक करता है, उस क्रियासे माँ प्रसन्न होती है। माँकी इस प्रसन्नतामें बालकका माँके प्रति अपनेपनका भाव ही हेतु है। ऐसे ही शरणागत भक्तका भगवान्के प्रति अपनेपनका भाव होनेसे भक्तकी प्रत्येक क्रियासे भगवान्को प्रसन्नता होती है।
यहाँ ‘करोषि’ क्रियाके साथ सामान्य ‘यत्’ पद होनेसे अर्थात् ‘तू जो कुछ करता है’—ऐसा कहनेसे निषिद्ध क्रिया भी आ सकती है। परन्तु अन्तमें ‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’ ‘वह मेरे अर्पण कर दे’—ऐसा आया है। अतः जो चीज या क्रिया भगवान्के अर्पण की जायगी, वह भगवान्की आज्ञाके
परिशिष्ट भाव —आदरपूर्वक देना और उसीकी वस्तु उसीको देना ‘अर्पण’ कहलाता है। भगवान्ने पदार्थोंको तो देनेकी बात बतायी है—‘प्रयच्छति’ और क्रियाओंको अर्पण करनेकी बात बतायी है—‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’; क्योंकि क्रियाएँ दी नहीं जातीं।
ज्ञानयोगी तो संसारके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करता है, पर भक्त एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता मानता ही नहीं। दूसरे शब्दोंमें, ज्ञानयोगी ‘मैं’ और ‘मेरा’ का त्याग करता है तथा भक्त ‘तू’ और ‘तेरा’ को स्वीकार करता है। इसलिये ज्ञानयोगी पदार्थ और क्रियाका ‘त्याग’ करता है तथा भक्त पदार्थ और क्रियाको भगवान्के ‘अर्पण’ करता है अर्थात् उनको अपना न मानकर भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है।
जिस वस्तुमें मनुष्यकी सत्यत्व एवं महत्त्वबुद्धि होती है, उसको मिथ्या समझकर यों ही त्याग देनेकी अपेक्षा किसी व्यक्तिके अर्पण कर देना, उसकी सेवामें लगा देना सुगम पड़ता है। फिर जो परम श्रद्धास्पद, परम प्रेमास्पद भगवान् हैं, उनको अर्पण करनेकी सुगमताका तो कहना ही क्या है! दूसरी बात, त्यागीको त्यागका अभिमान भी आ सकता है, पर अर्पण करनेवालेको अभिमान नहीं आ सकता; क्योंकि जिसकी वस्तु है, उसीको देनेसे अभिमान कैसे आयेगा? ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’। सम्पूर्ण वस्तुएँ (मात्र संसार) सदासे ही भगवान्की हैं। उनको भगवान्के अर्पण करना केवल अपनी भूल (उनको अपना मान लिया—यह भूल) मिटाना है। भूल मिटनेपर अभिमान नहीं होता, प्रत्युत प्रसन्नता होती है।
संसारको भगवान्का मानते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् संसार लुप्त हो जाता है, संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती (जो वास्तवमें है ही नहीं), प्रत्युत भगवान् ही रह जाते हैं (जो वास्तवमें हैं)। अतः संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये भक्तको विवेककी जरूरत नहीं है। वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद (त्याग) नहीं करता, प्रत्युत उसको भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है; क्योंकि अपरा प्रकृति भगवान्की ही है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा श्लोक)।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें पदार्थों और क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करनेका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें उस अर्पणका फल बताते हैं।
शुभाशुभफलैरिव मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
| एवम् | = इस प्रकार (मेरे | (निषिद्ध) सम्पूर्ण | सब कुछ मेरे अर्पण |
|---|---|---|---|
| अर्पण करनेसे) | कर्मके फलोंसे | करनेवाला (और) | |
| कर्मबन्धनैः | = कर्मबन्धनसे | मोक्ष्यसे | = (तू) मुक्त हो |
| (और) | जायगा। | ||
| शुभाशुभफलैः | = शुभ (विहित) | सन्यासयोग- | विमुक्तः |
| और अशुभ | युक्तात्मा | = मुझे | |
| = ऐसे अपनेसहित | उपैष्यसि | ||
| = प्राप्त हो जायगा। |
व्याख्या—‘शुभाशुभफलैरेव मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः’— पूर्वांक प्रकारसे सब पदार्थ और क्रियाएँ मेरे अर्पण करनेसे अर्थात् तेरे स्वयंके मेरे अर्पित हो जानेसे अनन्त जन्मोंके जो शुभ-अशुभ कर्मके फल हैं, उन सबसे तू मुक्त हो जायगा। वे कर्मफल तेरेको जन्म-मरण देनेवाले नहीं होंगे।
यहाँ शुभ और अशुभ कर्मोंसे अनन्त जन्मोंके किये हुए संचित शुभ-अशुभ कर्म लेने चाहिये। कारण कि भक्त वर्तमानमें भगवदज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्को अर्पण करता है। भगवदज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म शुभ ही होते हैं, अशुभ होते ही नहीं। हाँ, अगर किसी रीतिसे, किसी परिस्थितिके कारण, किसी पूर्वाभ्यासके प्रवाहके कारण भक्तके द्वारा कदाचित् किंचिन्मात्र भी कोई आनुषंगिक अशुभकर्म बन जाय, तो उसके हृदयमें विराजमान भगवान् उस अशुभकर्मको नष्ट कर देते हैं।
जितने भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी बाह्य होते हैं अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके द्वारा ही होते हैं। इसलिये उन शुभ और अशुभकर्मोंका अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें जो फल आता है, वह भी बाह्य ही होता है। मनुष्य भूलसे उन परिस्थितियोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता रहता है। यह सुखी-दुःखी होना ही कर्मबन्धन है और इसीसे वह जन्मता-मरता है। परन्तु भक्तकी दृष्टि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंपर न रहकर भगवान्की कृपापर रहती है अर्थात् भक्त उनको भगवान्का विधान ही मानता है, कर्मोंका फल मानता ही नहीं। इसलिये वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
‘सन्यासयोगयुक्तात्मा’ —सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेका नाम ‘सन्यासयोग’ है। इस संन्यासयोग
अर्थात् समर्पणयोगसे युक्त होनेवालेको यहाँ ‘सन्यासयोगयुक्तात्मा’ कहा गया है। ऐसे तो गीतामें बहुत जगह ‘संन्यास’ शब्द सांख्ययोगका वाचक आता है, पर इसका प्रयोग भक्तिमें भी होता है; जैसे—‘मयि सन्यस्य’ (१८।५७)।
जैसे सांख्ययोगी सम्पूर्ण कर्मोंको मनसे नवद्वारवाले शरीरमें रखकर स्वयं सुखपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही भक्त कर्मोंके साथ अपने माने हुए सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे कोई सज्जन अपनी धरोहरको कहीं रख देता है, ऐसे ही भक्त अपनेसहित अनन्त जन्मोंके संचित कर्मोंको, उनके फलोंको और उनके सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। इसलिये इसको ‘सन्यासयोग’ कहा गया है।
‘विमुक्तो मामुपैष्यसि’ —पूर्वश्लोकमें ‘तत्कुरुष्व मदर्पणाम्’ कहकर अर्पण करनेकी आज्ञा दी। यहाँ कहते हैं कि ‘इस प्रकार अर्पण करनेसे तू शुभ-अशुभ कर्मफलोंसे मुक्त हो जायगा। शुभ-अशुभ कर्मफलोंसे मुक्त होनेपर तू मेरेको प्राप्त हो जायगा।’ तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण कर्मफलोंसे मुक्त होना तो प्रेम-प्राप्तिका साधन है और भगवान्की प्राप्ति होना प्रेमकी प्राप्ति है।
विशेष बात
शुभ और अशुभ कर्मोंका बन्धन क्या है?
शुभ अथवा अशुभ किसी भी कर्मको किया जाय, उस कर्मका आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही उन कर्मोंके फलस्वरूपमें जो परिस्थिति आती है, उसका भी संयोग और वियोग होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब कर्म और उनके फल निरन्तर नहीं रहते, तो फिर उनके साथ सम्बन्ध निरन्तर कैसे रह सकता है? परन्तु जब कर्ता (कर्म करनेवाला)
१-विकर्म यच्चोत्पत्तितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ (श्रीमद्भा० ११।५।४२)
२-जैसे अशुभकर्म बन्धनकारक हैं, ऐसे ही शुभकर्म भी बन्धनकारक हैं। जैसे, बेड़ी लोहेकी हो चाहे सोनेकी, पर बन्धन दोनोंसे ही होता है। शुभकर्म भी जन्मारम्भक होनेसे बन्धनकारक होता है और अशुभकर्म तो जबर्दस्ती बांधनेवाला होता ही है।
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
६६९
कर्मोंके साथ अपनापन कर लेता है, तब उसका फलके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। यद्यपि कर्म और फलके साथ सम्बन्ध कभी रह नहीं सकता, तथापि कर्ता उस सम्बन्धको अपनेमें मान लेता है। कर्ता स्वयं (स्वरूपसे) नित्य है, इसलिये उस सम्बन्धको अपनेमें स्वीकार करनेसे वह सम्बन्ध भी नित्य प्रतीत होने लगता है।
कर्ता शुभकर्मोंका फल चाहता है, जो कि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है। उस परिस्थितिमें यह सुख मानता है। जबतक इस सुखकी चाहना रहती है, तबतक वह दुःखसे बच नहीं सकता। कारण कि सुखके आदिमें और अन्तमें दुःख ही रहता है तथा सुखसे भी प्रतिक्षण स्वाभाविक वियोग होता रहता है। जिसके वियोगको यह प्राणी नहीं चाहता, उसका वियोग तो हो ही जाता है, यह नियम है। तात्पर्य यह हुआ कि सुखकी इच्छाको यह नहीं छोड़ता और दुःख इसको नहीं छोड़ता।
जीव जब अपने-आपको प्रभुके समर्पित कर देता है, तब (साक्षात् परमात्माका ही अंश होनेसे) इसकी परमात्माके साथ स्वतः अभिन्नता हो जाती है; और शरीरके साथ भूलसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। यह परमात्माके साथ अभिन्न तो पहलेसे ही था। केवल अपने लिये कर्म करनेसे इस अभिन्नताका अनुभव नहीं होता था। अब अपनेसहित कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेसे उसकी अपने लिये कर्म करनेकी मान्यता मिट जाती है, तो उसको स्वाभाविक प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है। इसीको भगवान्ने
परिशिष्ट भाव— भगवान्ने 'यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्' (१।२५) से जो बात कहनी आरम्भ की थी, उसीका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको अपनेसहित मेरे अर्पण करनेसे तू कर्मबन्धनसे तथा शुभ-अशुभ दोनों कर्मोंके फलोंसे मुक्त होकर मेरेको ही प्राप्त हो जायगा।
'कर्म' भी शुभ-अशुभ होते हैं और 'फल' भी शुभ-अशुभ होता है। दूसरोंके हितके लिये करना 'शुभकर्म' है और अपने लिये करना 'अशुभकर्म' है। अनुकूल परिस्थिति 'शुभ फल' है और प्रतिकूल परिस्थिति 'अशुभ फल' है। भगवान्का भक्त शुभकर्मोंको भगवान्के अर्पण कर देता है, अशुभकर्म करता ही नहीं और शुभ-अशुभ फलसे अर्थात् अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिसे सुखी-दुःखी नहीं होता। उसके अनन्त जन्मोंके संचित शुभाशुभ-कर्म भस्म हो जाते हैं; जैसे—जलता हुआ घासका टुकड़ा फेंकनेसे सब घास जल जाता है!
भगवान्के अर्पण करनेसे संसारका सम्बन्ध (गुणसंग) नहीं रहता, केवल भगवान्का सम्बन्ध रह जाता है, जो कि स्वतः पहलेसे ही है—'ममैवांशो जीवलोकै जीवभूतः सनातनः' (गीता १५।७)। जो अपना नहीं है, उसको अपना माननेसे सिवाय बन्धनके कुछ नहीं होता। अपना माननेसे वस्तु तो रहती नहीं, केवल बन्धन रह जाता है। भक्तका किसी भी वस्तु, व्यक्ति और क्रियामें अपनापन न रहनेसे वह 'विमुक्त' हो जाता है।
यहाँ समर्पणयोगको 'संन्यासयोग' नामसे कहा गया है।
'मामुपैष्यसि ' पदका तात्पर्य है कि भक्त भगवान्से अभिन्न हो जाता है, उसकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती—'ज्ञानी त्वामैव मे मतम् ' (गीता ७।१८)। इसीको प्रेमाद्वैत कहा गया है।
यहाँ 'विमुक्तो मामुपैष्यसि ' कहा है।
जब यह जीव अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देता है तो फिर उसके सामने जो कुछ अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है, वह सब दया और कृपाके रूपमें परिणत हो जाती है। तात्पर्य है कि जब उसके सामने अनुकूल परिस्थिति आती है, तब वह उसमें भगवान्की 'दया' को मानता है और जब प्रतिकूल परिस्थिति आती है, तब वह उसमें भगवान्की 'कृपा' को मानता है। दया और कृपामें भेद यह है कि कभी भगवान् प्यार, स्नेह करके जीवको कर्मबन्धनसे मुक्त करते हैं—यह 'दया' है और कभी शासन करके, ताड़ना करके उसके पापोंका नाश करते हैं—यह 'कृपा' है। इस प्रकार दया और कृपा करके भगवान् भक्तको सबल, सहिष्णु बनाते हैं। परन्तु भक्त तो दोनोंमें ही प्रसन्न रहता है। कारण कि उसकी दृष्टि अनुकूलता-प्रतिकूलताकी तरफ न रहकर केवल भगवान्की तरफ ही रहती है। अतः उसकी दृष्टिमें भगवान्की दया और कृपा दो रूपसे नहीं होती, प्रत्युत एक ही रूपसे होती है। जैसा कि कहा है—
लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथाभ्येके।
तद्वदेव महेशस्य नियन्त्रुणोदोषयोः॥
'जिस प्रकार बालकका पालन करने और ताड़ना करने—दोनोंमें माँकी कहीं अकृपा नहीं होती, उसी प्रकार जीवोंके गुण-दोषोंका नियन्त्रण करनेवाले परमेश्वरकी कहीं किसीपर अकृपा नहीं होती।'
६७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
सम्बन्ध—अब एक शंका होती है कि जो भगवान् के समर्पित होते हैं, उनको तो भगवान् मुक्त कर देते हैं और जो भगवान् के समर्पित नहीं होते, उनको भगवान् मुक्त नहीं करते—इसमें तो भगवान्की दयालुता और समता नहीं हुई, प्रत्युत विषम-दृष्टि और पक्षपात हुआ? इसपर कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
| अहम् | = मैं | अस्ति | = है (और) | भजन्ति | = भजन करते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वभूतेषु | = सम्पूर्ण प्राणियोंमें | न | = न कोई | ते | = वे |
| समः | = समान हूँ। | प्रियः | = प्रिय है। | मयि | = मुझमें हैं |
| न | = (उन प्राणियोंमें) न | तु | = परन्तु | च | = और |
| तो कोई | ये | = जो | अहम् | = मैं | |
| मे | = मेरा | भक्त्या | = प्रेमपूर्वक | अपि | = भी |
| द्वेष्यः | = द्वेषी | माम् | = मेरा | तेषु | = उनमें हूँ।१ |
व्याख्या —‘समोऽहं सर्वभूतेषु’—मैं स्थावर-जंगम आदि सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्यापकरूपसे और कृपा-दृष्टिसे सम हूँ। तात्पर्य है कि मैं सबमें समानरूपसे व्यापक, परिपूर्ण हूँ—‘मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४), और मेरी सबपर समानरूपसे कृपादृष्टि है—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)।
मैं कहीं कम हूँ और कहीं अधिक हूँ अर्थात् चींटी छोटी होनेसे उसमें कम हूँ और हाथी बड़ा होनेसे उसमें अधिक हूँ; अन्त्यजमें कम हूँ और ब्राह्मणमें अधिक हूँ; जो मेरे प्रतिकूल चलते हैं, उनमें मैं कम हूँ और जो मेरे अनुकूल चलते हैं, उनमें मैं अधिक हूँ—यह बात है ही नहीं। कारण कि सब-के-सब प्राणी मेरे अंश हैं, मेरे स्वरूप हैं। मेरे स्वरूप होनेसे वे मेरेसे कभी अलग नहीं हो सकते और मैं भी उनसे कभी अलग नहीं हो सकता। इसलिये मैं सबमें समान हूँ, मेरा कहीं कोई पक्षपात नहीं है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राणियोंमें जन्मसे, कर्मसे, परिस्थितिसे, घटनासे, संयोग, वियोग आदिसे अनेक तरहसे विषमता होनेपर भी मैं सर्वथा-सर्वदा सबमें समान रीतिसे व्यापक हूँ, कहीं कम और कहीं ज्यादा नहीं हूँ।
‘न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः’२—पहले भगवान्ने कहा कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ, अब उसीका विवेचन करते हुए कहते हैं कि कोई भी प्राणी मेरे राग-द्वेषका
विषय नहीं है। तात्पर्य है कि मेरेसे विमुख होकर कोई प्राणी शास्त्रीय यज्ञ, दान आदि कितने ही शुभकर्म करे, तो भी वह मेरे ‘राग’ का विषय नहीं है और दूसरा शास्त्रनिषिद्ध अन्याय, अत्याचार आदि कितने ही अशुभकर्म करे, तो भी वह मेरे ‘द्वेष’ का विषय नहीं है। कारण कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान रीतिसे व्याप्त हूँ, सबपर मेरी समान रीतिसे कृपा है और सब प्राणी मेरे अंश होनेसे मेरेको समान रीतिसे प्यारे हैं। हाँ, यह बात जरूर है कि जो सकामभावपूर्वक शुभकर्म करेगा, वह ऊँची गतिमें जायगा और जो अशुभ-कर्म करेगा, वह नीची गतिमें अर्थात् नरकों तथा चौरासी लाख योनियोंमें जायगा। परन्तु वे दोनों पुण्यात्मा और पापात्मा होनेपर भी मेरे राग-द्वेषके विषय नहीं हैं।
मेरे रचे हुए पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये भौतिक पदार्थ भी प्राणियोंके अच्छे-बुरे आचरणों तथा भावोंको लेकर उनको रहनेका स्थान देनेमें, उनकी प्यास बुझानेमें, उनको प्रकाश देनेमें, उनको चलने-फिरनेके लिये अवकाश देनेमें राग-द्वेषपूर्वक विषमता नहीं करते, प्रत्युत सबको समान रीतिसे देते हैं। फिर प्राणी अपने अच्छे-बुरे आचरणोंको लेकर मेरे राग-द्वेषके विषय कैसे बन सकते हैं? अर्थात् नहीं बन सकते। कारण कि वे साक्षात् मेरे ही अंश हैं, मेरे ही स्वरूप हैं।
जैसे, किसी व्यक्तिके एक हाथमें पीड़ा हो रही है, वह
१-इस श्लोकके दो विभाग हैं—पूर्वार्धमें तो भजन न करनेवालोंका वर्णन है और उत्तरार्धमें भजन करनेवालोंका वर्णन है।
२-यहाँ ‘प्रिय’ शब्दको रागका ही वाचक मानना चाहिये; क्योंकि प्राणिमात्रपर भगवान्की समान रीतिसे प्रियता है—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस ७।८६।२); अतः भगवान् इसका निषेध कैसे कर सकते हैं? दूसरी बात, ‘द्वेष’ शब्दके साथ ‘राग’ शब्द ही ठीक बैठ सकता है; क्योंकि राग और द्वेष—यह द्वन्द्व है। इसी द्वन्द्वका यहाँ निषेध किया गया है।
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
६७१
हाथ शरीरके किसी काममें नहीं आता, दर्द होनेसे रातमें नींद नहीं लेने देता, काम करनेमें बाधा डालता है और दूसरा हाथ सब प्रकारसे शरीरके काम आता है। परन्तु उस व्यक्तिका किसी हाथके प्रति राग या द्वेष नहीं होता कि यह तो अच्छा है और यह मन्द है; क्योंकि दोनों ही हाथ उसके अंग हैं और अपने अंगके प्रति किसीके राग-द्वेष नहीं होते। ऐसे ही कोई मेरे वचनों, सिद्धान्तोंके अनुसार चलनेवाला हो, पुण्यात्मा-से-पुण्यात्मा हो और दूसरा कोई मेरे वचनों, सिद्धान्तोंका खण्डन करनेवाला हो, मेरे विरुद्ध चलनेवाला हो, पापी-से-पापी हो, तो उन दोनोंको लेकर मेरे राग-द्वेष नहीं होते। उनके अपने-अपने बर्तावोंमें, आचरणोंमें भेद है, इसलिये उनके परिणाम-(फल-) में भेद होगा, पर मेरा किसीके प्रति राग-द्वेष नहीं है। अगर किसीके प्रति राग-द्वेष होता; तो 'समोऽहं सर्वभूतेषु' यह कहना ही नहीं बनता; क्योंकि विषमताके कारण ही राग-द्वेष होते हैं।
'ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्'—परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं अर्थात् जिनकी संसारमें आसक्ति, राग, खिंचाव नहीं है, जो केवल मेरेको ही अपना मानते हैं, केवल मेरे ही परायण रहते हैं, केवल मेरी प्रसन्नताके लिये ही रात-दिन काम करते हैं और जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, वाणीके द्वारा मेरी तरफ ही चलते हैं (गीता—नवें अध्यायका चौदहवाँ और दसवें अध्यायका नवाँ श्लोक), वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।
प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ—इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो सामान्य जीव हैं तथा मेरी आज्ञाके विरुद्ध चलनेवाले हैं, वे मेरेमें और मैं उनमें नहीं हूँ, प्रत्युत वे अपनेको मेरेमें मानते ही नहीं। वे ऐसा कह देते हैं कि हम तो संसारी जीव हैं, संसारमें रहनेवाले हैं! वे यह नहीं समझते कि संसार, शरीर तो कभी एकरूप, एकरस रहता ही नहीं, तो ऐसे संसार, शरीरमें हम कैसे स्थित रह सकते हैं? इसको न जाननेके कारण ही वे अपनेको संसार, शरीरमें स्थित मानते हैं। उनकी अपेक्षा जो रात-दिन मेरे भजन-स्मरणमें लगे हुए हैं, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे, सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिमें और अपने-आपमें भी मेरेको ही मानते हैं, वे मेरेमें विशेषरूपसे
हैं और मैं उनमें विशेषरूपसे हूँ।
दूसरा भाव यह है कि जो मेरे साथ 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' ऐसा सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, उनकी मेरे साथ इतनी घनिष्ठता हो जाती है कि मैं और वे एक हो जाते हैं—'तस्मिन्स्तज्जे भेदाभावात्' (नारदभक्तिसूत्र ४१)। इसलिये वे मेरेमें और मैं उनमें हूँ।
तीसरा भाव यह है कि उनमें 'मैं'-पन नहीं रहता; क्योंकि 'मैं'-पन एक परिच्छिन्ना है। इस परिच्छिन्ना-(एक-देशीयता-) के मिटनेसे वे मेरेमें ही रहते हैं।
अब कोई भगवान्से कहे कि आप भक्तोंमें विशेषतासे प्रकट हो जाते हैं और दूसरोंमें कमरूपसे प्रकट होते हैं—यह आपकी विषमता क्यों? तो भगवान् कहते हैं कि भैया! मेरेमें यह विषमता तो भक्तोंके कारण है। अगर कोई मेरा भजन करे, मेरे परायण हो जाय, शरण हो जाय और मैं उससे विशेष प्रेम न करूँ, उसमें विशेषतासे प्रकट न होऊँ; तो यह मेरी विषमता हो जायगी। कारण कि भजन करनेवाले और भजन न करनेवाले—दोनोंमें मैं बराबर ही रहूँ, तो यह न्याय नहीं होगा; प्रत्युत मेरी विषमता होगी। इससे भक्तोंके भजनका और उनका मेरी तरफ लगनेका कोई मूल्य ही नहीं रहेगा। यह विषमता मेरेमें न आ जाय, इसलिये जो जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनको आश्रय देता हूँ—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४। ११)। अतः यह विषमता मेरेमें भक्तोंके भावोंको लेकर ही है।*
जैसे, कोई पुत्र अच्छा काम करता है तो सुपुत्र कहलाता है और खराब काम करता है तो कुपुत्र कहलाता है। यह सुपुत्र-कुपुत्रका भेद तो उनके आचरणोंके कारण हुआ है। माँ-बापके पुत्रभावमें कोई फरक नहीं पड़ता। गायके थनोंमें चींचड़ रहते हैं, वे दूध न पीकर खून पीते हैं, तो यह विषमता गायकी नहीं है, प्रत्युत चींचड़ोंकी अपनी बनायी हुई है। बिजलीके द्वारा कहीं बर्फ जम जाती है और कहीं आग पैदा हो जाती है, तो यह विषमता बिजलीकी नहीं है, प्रत्युत यन्त्रोंकी है। ऐसे ही जो भगवान्में रहते हुए भी भगवान्को नहीं मानते, उनका भजन नहीं करते, तो यह विषमता उन प्राणियोंकी ही है, भगवान्की नहीं। जैसे लकड़ीका टुकड़ा,
- तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥ (मानस २। २११। ३)
केवल भगवान्में ही नहीं, प्रत्युत जीवन्मुक्त श्रेष्ठ महापुरुषोंमें भी सामनेवालेके गुणों, भावों, आचरणों आदिको लेकर पक्षपात हो जाता है—
वीतस्यूहाणामपि मुक्तिभाजं भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाताः ॥ (किराता ३। १२)
६७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
काँचका टुकड़ा और आतशी शीशा—इन तीनोंमें सूर्यकी कोई विषमता नहीं है; परन्तु सूर्यके सामने (धूपमें) रखनेपर लकड़ीका टुकड़ा सूर्यकी किरणोंको रोक देता है, काँचका टुकड़ा किरणोंको नहीं रोकता और आतशी शीशा किरणोंको एक जगह केन्द्रित करके अग्नि प्रकट कर देता है। तात्पर्य है कि यह विषमता सामने आनेवाले पदार्थोंकी है, सूर्यकी नहीं। सूर्यकी किरणें तो सबपर एक समान ही पड़ती हैं। वे पदार्थ उन किरणोंको जितनी पकड़ लेते हैं, उतनी ही वे किरणें उनमें प्रकट हो जाती हैं। ऐसे ही भगवान् सब प्राणियोंमें समानरूपसे व्यापक हैं, परिपूर्ण हैं। परन्तु जो प्राणी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं, भगवान्का और भगवान्की कृपाका प्राकट्य उनमें विशेषतासे हो जाता है। उनकी भगवान्में जितनी अधिक प्रियता होती है, भगवान्की भी उतनी ही अधिक प्रियता प्रकट हो जाती है। वे अपने-आपको भगवान्को दे देते हैं, तो भगवान् भी अपने-आपको उनको दे देते हैं। इस प्रकार भक्तोंके भावोंके अनुसार ही भगवान्की विशेष कृपा, प्रियता आदि प्रकट होती है।
परिशिष्ट भाव—‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ —जीव भगवान्को अपनी क्रियाएँ और पदार्थ अर्पण करे अथवा न करे, भगवान्में कुछ फर्क नहीं पड़ता। वे तो सदा समान ही रहते हैं। किसी वर्णविशेष, आश्रमविशेष, जातिविशेष, कर्मविशेष, योग्यताविशेष आदिका भी भगवान्पर कोई असर नहीं पड़ता। अतः प्रत्येक वर्ण, आश्रम, जाति आदिका मनुष्य उनके सम्मुख हो सकता है, उनका भक्त हो सकता है, उनको प्राप्त कर सकता है।
‘न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः’ —भगवान्की दृष्टिमें भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं, फिर उनके द्वेष और प्रेमका विषय दूसरा कैसे हो सकता है? जीव ही शुभाशुभ-कर्म और उनके फलसे राग-द्वेष करके संसारमें बँध जाता है और राग-द्वेषका त्याग करके मुक्त हो जाता है। इसलिये बन्धन और मुक्ति जीवकी ही होती है, भगवान्की नहीं। विषमता जीव करता है, भगवान् नहीं। भगवान् तो ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं।
चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’, वही बात भगवान्ने यहाँ ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ’ पदोंसे कही है। भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंमें समानरूपसे परिपूर्ण हैं, उनमें विषमता नहीं है। परन्तु जो प्रेमपूर्वक भगवान्का भजन करते हैं, वे भगवान्में हैं और भगवान् उनमें हैं अर्थात् भगवान् उनमें विशेषरूपसे प्रकट हैं। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें जल सब जगह रहता है, पर कुएँमें वह विशेष प्रकट (आवरणरहित) होता है, ऐसे ही भगवान् संसारमात्रमें परिपूर्ण होते हुए भी भक्तोंमें विशेष प्रकट होते हैं। भक्तोंमें यह विलक्षणता प्रेमपूर्वक भगवान्का भजन करनेसे भगवत्कृपासे ही आयी है। जैसे गायके शरीरमें रहनेवाला घी गायके काम नहीं आता, प्रत्युत उसके दूधसे निकाला हुआ घी ही उसके काम आता है, ऐसे ही संसारमें परिपूर्ण होनेमात्रसे भगवान्के द्वारा लोगोंके पाप नहीं कटते, प्रत्युत जो भगवान्के सम्मुख होते हैं, प्रेमपूर्वक उनका भजन करते हैं, उनके ही पाप कटते हैं*। सामान्य प्राणी भगवान्के अन्तर्गत होते हुए भी भगवान्को नहीं देखते, पर भक्त सब जगह भगवान्को देखते हैं (गीता—छठें अध्यायका तीसवाँ श्लोक)। भक्त भगवान्से प्रेम करते हैं और भगवान् भक्तसे प्रेम करते हैं—‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ’ (गीता ७।१७)। इसलिये भक्त भगवान्में हैं और भगवान् भक्तोंमें
तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य सांसारिक रागके कारण ही अपनेको संसारमें मानते हैं। जब वे भगवान्का प्रेमपूर्वक भजन करने लग जाते हैं, तब उनका सांसारिक राग मिट जाता है और वे अपनी दृष्टिसे भगवान्में हो जाते हैं और भगवान् उनमें हो जाते हैं। भगवान्की दृष्टिसे तो वे वास्तवमें भगवान्में ही थे और भगवान् भी उनमें थे। केवल रागके कारण वे अपनेको भगवान्में और भगवान्को अपनेमें नहीं मानते थे।
भगवान्ने यहाँ ‘ये भजन्ति ’ पदोंमें ‘ये ’ सर्वनाम पद दिया है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य किसी भी देशके हों, किसी भी वेशमें हों, किसी भी अवस्थाके हों, किसी भी सम्प्रदायके हों, किसी भी वर्णके हों, किसी भी आश्रमके हों, कैसी ही योग्यतावाले हों, वे अगर भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, तो वे मेरेमें और मैं उनमें हूँ। अगर भगवान् यहाँ किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, जाति आदिको लेकर कहते, तब तो भगवान्में विषमता, पक्षपातका होना सिद्ध हो जाता। परन्तु भगवान्ने ‘ये ’ पदसे सबको भजन करनेकी और ‘मैं भगवान्में हूँ और भगवान् मेरेमें हैं’—इसका अनुभव करनेकी पूरी स्वतन्त्रता दे रखी है।
- सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस, सुन्दर० ४४।१)
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
६७३
है—‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’। तात्पर्य यह निकला कि विषमता भगवान्में नहीं है, प्रत्युत प्राणियोंने ही विषमता की है, जो कि भगवान्से विमुख हैं।
तत्त्वसे तो भगवान् ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ हैं, पर अनुभव करनेमें भगवान् ‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें समानरूपसे परिपूर्ण होनेपर भी भगवान्का अनुभव भक्त ही करते हैं, अन्य प्राणी नहीं। वास्तवमें अनुभव करनेकी शक्ति भी भगवान्से ही प्राप्त होती है। मनुष्यका काम केवल भगवान्के सम्मुख होना है।
रामायणमें आया है—
सातवें सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
(मानस, अरण्य० ३६। २)
तात्पर्य है कि भगवान्की सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान व्यापकता, प्रियता, कृपा तथा आत्मीयता है, पर भक्तोंमें वे विशेष दीखते हैं। भक्तोंमें यह विशेषता भगवान्में प्रेम होनेसे भगवत्कृपासे आती है और भगवान्की ही दी हुई होती है। भक्तोंकी भगवान्में जैसी तल्लीनता, प्रियता होती है, वैसी दूसरोंकी नहीं होती। इसलिये भगवान्की भी भक्तोंमें प्रियता होती है। भक्त और भगवान्की परस्पर प्रियताको ‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ पदोंसे कहा गया है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या’ पदोंसे भक्तिपूर्वक अपना भजन करनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें भजन करनेवालोंका विवेचन आरम्भ करते हैं।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥
| चेत् | = अगर (कोई) | भजते | = भजन करता | हि | = कारण कि |
|---|---|---|---|---|---|
| सुदुराचारः | = दुराचारी-से- | है (तो) | सः | = उसने | |
| दुराचारी | सः | = उसको | सम्यक्, | ||
| अपि | = भी | साधुः | = साधु | व्यवसितः | = निश्चय बहुत |
| अनन्यभाक् | = अनन्यभक्त होकर | एव | = ही | अच्छी तरह | |
| माप् | = मेरा | मन्तव्यः | = मानना चाहिये। | कर लिया है। |
व्याख्या —[कोई करोड़पति या अरबपति यह बात कह दे कि मेरे पास जो कोई आयेगा, उसको मैं एक लाख रुपये दूँगा, तो उसके इस वचनकी परीक्षा तब होगी, जब उससे सर्वथा ही विरुद्ध चलनेवाला, उसके साथ वैर रखनेवाला, उसका अनिष्ट करनेवाला भी आकर उससे एक लाख रुपये माँगे और वह उसको दे दे। इससे सबको यह विश्वास हो जायगा कि यह जो माँगे, उसको दे देता है। इसी भावको लेकर भगवान् सबसे पहले दुराचारीका नाम लेते हैं।]
‘अपि चेत्’—सातवें अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें आया है कि जो पापी होते हैं, वे मेरे शरण नहीं होते और यहाँ कहा है कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है—इन दोनों बातोंमें आपसमें विरोध प्रतीत होता है। इस विरोधको दूर करनेके लिये ही यहाँ
‘अपि’ और ‘चेत्’ ये दो पद दिये गये हैं। तात्पर्य है कि सातवें अध्यायमें ‘दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते’ ऐसा कहकर उनके स्वभावका वर्णन किया है। परन्तु वे भी किसी कारणसे मेरे भजनमें लगना चाहें तो लग सकते हैं। मेरी तरफसे किसीको कोई मना नहीं है*; क्योंकि किसी भी प्राणीके प्रति मेरा द्वेष नहीं है। ये भाव प्रकट करनेके लिये ही यहाँ ‘अपि’ और ‘चेत्’ पदोंका प्रयोग किया है।
‘सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्’—जो सुष्ठु दुराचारी है, सांगोपांग दुराचारी है अर्थात् दुराचार करनेमें कोई कमी न रहे, दुराचारका अंग-उपांग न छूटे—ऐसा दुराचारी है, वह भी अनन्यभाक् होकर मेरे भजनमें लग जाय तो उसका उद्धार हो जाता है।
यहाँ ‘भजते’ क्रिया वर्तमानकी है, जिसका कर्ता
- कोटि बिप्र बध लागहि जाहू।आई सरन तजई नहि ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस ५। ४४। १)
६७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
है—सांगोपांग दुराचारी। इसका तात्पर्य हुआ कि पहले भी उसके दुराचार बनते आये हैं और अभी वर्तमानमें वह अनन्यभावसे भजन करता है, तो भी उसके द्वारा दुराचार सर्वथा नहीं छूटे हैं अर्थात् कभी-कभी किसी परिस्थितिमें आकर पूर्वसंस्कारवश उसके द्वारा पाप-क्रिया हो सकती है। ऐसी अवस्थामें भी वह मेरा भजन करता है। कारण कि उसका ध्येय (लक्ष्य) अन्यका नहीं रहा है अर्थात् उसका लक्ष्य अब धन, सम्पत्ति, आदर-सत्कार, सुख-आराम आदि प्राप्त करनेका नहीं रहा है। उसका एकमात्र लक्ष्य अनन्यभावसे मेरेमें लगनेका ही है।
अब शंका यह होती है कि ऐसा दुराचारी अनन्यभावसे भगवान्के भजनमें कैसे लगेगा? उसके लगनेमें कई कारण हो सकते हैं; जैसे—
(१) वह किसी आफतमें पड़ जाय और उसको कहीं किंचिन्मात्र भी कोई सहारा न मिले। ऐसी अवस्थामें अचानक उसको सुनी हुई बात याद आ जाय कि 'भगवान् सबके सहायक हैं और उनकी शरणमें जानेसे सब काम ठीक हो जाता है' आदि।
(२) वह कभी किसी ऐसे वायुमण्डलमें चला जाय, जहाँ बड़े-बड़े अच्छे सन्त-महापुरुष हुए हैं और वर्तमानमें भी हैं, तो उनके प्रभावसे भगवान्में रुचि पैदा हो जाय।
(३) वाल्मीकि, अजामिल, सदन कसाई आदि पापी भी भगवान्के भक्त बन चुके हैं और भजनके प्रभावसे उनमें विलक्षणता आयी है—ऐसी कोई कथा सुन करके पूर्वका कोई अच्छा संस्कार जाग उठे, जो कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें रहता है*।
(४) कोई प्राणी ऐसी आफतमें आ गया, जहाँ उसके बचनेकी कोई सम्भावना ही नहीं थी, पर वह बच गया। ऐसी घटनाविशेषको देखनेसे उसके भीतर यह भाव पैदा हो जाय कि कोई ऐसी विलक्षण शक्ति है, जो ऐसी आफतसे बचाती है। वह विलक्षण शक्ति भगवान् ही हो सकते हैं; इसलिये अपनेको भी उनके परायण हो जाना चाहिये।
(५) उसको किसी सन्तके दर्शन हो जाय और उसका पतन करनेवाले दुष्कर्मोंको देखकर उसपर सन्तकी कृपा हो जाय; जैसे—वाल्मीकि, अजामिल आदि पापियोंपर सन्तोंकी कृपा हुई।
—ऐसे कई कारणोंसे अगर दुराचारीका भाव बदल जाय, तो वह भगवान्के भजनमें अर्थात् भगवान्की तरफ
लग सकता है। चोर, डाकू, लुटेरे, हत्या करनेवाले बंधिक आदि भी अचानक भाव बदल जानेसे भगवान्के अच्छे भक्त हुए हैं—ऐसी कई कथाएँ पुराणोंमें तथा भक्तमाल आदि ग्रन्थोंमें आती हैं।
अब एक शंका होती है कि जो वर्षोंसे भजन-ध्यान कर रहे हैं, उनका मन भी तत्परतासे भगवान्में नहीं लगता, फिर जो दुराचारी-से-दुराचारी है, उसका मन भगवान्में तैलधाराम्बुत कैसे लगेगा? यहाँ 'अनन्यभाक् ' का अर्थ 'वह तैलधाराम्बुत चिन्तन करता है'—यह नहीं है, प्रत्युत इसका अर्थ है—'न अन्यं भजति ' अर्थात् वह अन्यका भजन नहीं करता। उसका भगवान्के सिवाय अन्य किसीका सहारा, आश्रय नहीं है, केवल भगवान्का ही आश्रय है। जैसे पतिव्रता स्त्री केवल पतिका चिन्तन ही करती हो—ऐसी बात नहीं है। वह तो हरदम पतिकी ही बनी रहती है, स्वप्नमें भी वह दूसरोंकी नहीं होती। तात्पर्य है कि उसका तो एक पतिसे ही अपनापन रहता है। ऐसे ही उस दुराचारीका केवल भगवान्से ही अपनापन हो जाता है और एक भगवान्का ही आश्रय रहता है।
'अनन्यभाक् ' होनेमें खास बात है 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' इस प्रकार अपनी अहंताको बदल देना। अहंता-परिवर्तनसे जितनी जल्दी शुद्धि आती है, जप, तप, यज्ञ, दान आदि क्रियाओंसे उतनी जल्दी शुद्धि नहीं आती। इस अहंताके परिवर्तनके विषयमें तीन बातें हैं—
(१) अहंताको मिटना —ज्ञानयोगसे अहंता मिट जाती है। जिस प्रकाशमें 'अहम्' (मैं-पन)-का भान होता है, वह प्रकाश मेरा स्वरूप है और एकदेशीयरूपमें प्रतीत होनेवाला 'अहम्' मेरा स्वरूप नहीं है। कारण यह है कि 'अहम्' दृश्य होता है, और जो दृश्य होता है, वह अपना स्वरूप नहीं होता। इस प्रकार दोनोंका विभाजन करके अपने ज्ञापिमात्र स्वरूपमें स्थित होनेसे 'अहंता' मिट जाती है।
(२) अहंताको शुद्ध करना —कर्मयोगसे अहंता शुद्ध हो जाती है। जैसे, पुत्र कहता है कि 'मैं पुत्र हूँ और ये मेरे पिता हैं' तो इसका तात्पर्य है कि पिताकी सेवा करनामात्र मेरा कर्तव्य है; क्योंकि पिता-पुत्रका सम्बन्ध केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही है। पिता मेरेको पुत्र न मानें, मेरेको दुःख दें, मेरा अहित करें, तो भी मेरेको उनकी सेवा करनी है, उनको सुख पहुँचाना है। ऐसे ही माता, भाई, भौजाई, स्त्री, पुत्र, परिवारके प्रति भी मेरेको केवल अपने
- सुमति कुमति सब के उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ (मानस ५।४०।३)
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
६७५
कर्तव्यका ही पालन करना है। उनके कर्तव्यकी तरफ मेरेको देखना ही नहीं है कि वे मेरे प्रति क्या करते हैं, दुनियाके प्रति क्या करते हैं। उनके कर्तव्यको देखना मेरा कर्तव्य नहीं है; क्योंकि दूसरोंके कर्तव्यको देखनेवाला अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है। अतः उनका तो मेरेपर पूरा अधिकार है, पर वे मेरे अनुकूल चलें—ऐसा मेरा किसीपर भी अधिकार नहीं है। इस प्रकार दूसरोंका कर्तव्य न देखकर केवल अपना कर्तव्य-पालन करनेसे अहंता शुद्ध हो जाती है। कारण कि अपने सुख-आरामकी कामना होनेसे ही अहंता अशुद्ध होती है।
(३) अहंताका परिवर्तन करना —भक्तियोगसे अहंता बदल जाती है। जैसे, विवाहमें पतिके साथ सम्बन्ध होते ही कन्याकी अहंता बदल जाती है और वह पतिके घरको ही अपना घर, पतिके धर्मको ही अपना धर्म मानने लग जाती है। वह पतिव्रता अर्थात् एक पतिकी ही हो जाती है, तो फिर वह माता-पिता, सास-ससुर आदि किसीकी भी नहीं होती। इतना ही नहीं, वह अपने पुत्र और पुत्रीकी भी नहीं होती; क्योंकि जब वह सती होती है, तब पुत्र-पुत्रीके, माता-पिताके स्नेहकी भी परवाह नहीं करती। हाँ, वह पतिके नाते सेवा सबकी कर देती है, पर उसकी अहंता केवल पतिकी ही हो जाती है। ऐसे ही मनुष्यकी अहंता 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' इस प्रकार भगवान्के साथ हो जाती है, तो उसकी अहंता बदल जाती है। इस अहंताके बदलनेको ही यहाँ 'अनन्यभाक् ' कहा है।
'साधुरेव स मन्तव्यः :'—अब यहाँ एक प्रश्न होता है कि वह पहले भी दुराचारी रहा है और वर्तमानमें भी उसके आचरण सर्वथा शुद्ध नहीं हुए हैं, तो दुराचारोंको लेकर उसको दुराचारी मानना चाहिये या अनन्यभावको लेकर साधु ही मानना चाहिये? तो भगवान् कहते हैं कि उसको तो साधु ही मानना चाहिये। यहाँ 'मन्तव्यः ' (मानना चाहिये) विधि-वचन है अर्थात् यह भगवान्की विशेष आज्ञा है।
माननेकी बात वहीँ कही जाती है, जहाँ साधुता नहीं दीखती। अगर उसमें किंचिन्मात्र भी दुराचार न होते, तो भगवान् 'उसको साधु ही मानना चाहिये' ऐसा क्यों कहते? तो भगवान्के कहनेसे यही सिद्ध होता है कि उसमें अभी दुराचार हैं। वह दुराचारोंसे सर्वथा रहित नहीं हुआ है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि वह अभी सांगोपांग साधु नहीं हुआ है, तो भी उसको साधु ही मानना चाहिये अर्थात्
बाहरसे उसके आचरणोंमें, क्रियाओंमें कोई कमी भी देखनेमें आ जाय, तो भी वह असाधु नहीं है। इसका कारण यह है कि वह 'अनन्यभाक् ' हो गया अर्थात् 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं; मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है' इस प्रकार वह भीतरसे ही भगवान्का हो गया, उसने भीतरसे ही अपनी अहंता बदल दी। इसलिये अब उसके आचरण सुधरते देरी नहीं लगेगी; क्योंकि अहंताके अनुसार ही सब आचरण होते हैं।
उसको साधु ही मानना चाहिये—ऐसा भगवान्को क्यों कहना पड़ रहा है? कारण कि लोगोंमें यह रीति है कि वे किसीके भीतरी भावोंको न देखकर बाहरसे जैसा आचरण देखते हैं, वैसा ही उसको मान लेते हैं। जैसे, एक आदमी वर्षोंसे परिचित है अर्थात् भजन करता है, अच्छे आचरणोंवाला है—ऐसा बीसों, पचीसों वर्षोंसे जानते हैं। पर एक दिन देखा कि वह रात्रिके समय एक वेश्याके यहाँसे बाहर निकला, तो उसे देखते ही लोगोंके मनमें आता है कि देखो! हम तो इसको बड़ा अच्छा मानते थे, पर यह तो वैसा नहीं है, यह तो वेश्यागामी है! ऐसा विचार आते ही उनका जो अच्छेपनका भाव था, वह उड़ जाता है। जो कई दिनोंकी श्रद्धा-भक्ति थी, वह उठ जाती है। इसी तरहसे लोग वर्षोंसे किसी व्यक्तिको जानते हैं कि वह अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है और वही एक दिन गंगाके किनारे स्नान किये हुए, हाथमें गोमुखी लिये हुए बैठे है। उसका चेहरा बड़ा प्रसन्न है। उसको देखकर कोई कहता है कि देखो भगवान्का भजन कर रहा है, बड़ा अच्छा पुरुष है, तो दूसरा कहता है कि अरे! तुम इसको जानते नहीं, मैं जानता हूँ; यह तो ऐसा-ऐसा है, कुछ नहीं है, केवल पाखण्ड करता है। इस प्रकार भजन करनेपर भी लोग उसको वैसा ही पापी मान लेते हैं और उधर साधन-भजन करनेवालेको भी वेश्याके घरसे निकलता देखकर खराब मान लेते हैं। उसको न जाने किस कारणसे वेश्याने बुलाया था, क्या पता वह दयापरवश होकर वेश्याको शिक्षा देनेके लिये गया हो, उसके सुधारके लिये गया हो—उस तरफ उनकी दृष्टि नहीं जाती। जिनका अन्तःकरण मैला हो, वे मैलापनकी बात करके अपने अन्तःकरणको और मैला कर लेते हैं। उनका अन्तःकरण मैलापनकी बात ही पकड़ता है। परन्तु उपर्युक्त दोनों प्रकारकी बातें होनेपर भी भगवान्की दृष्टि मनुष्यके
६७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ९
भावपर ही रहती है, आचरणोंपर नहीं-
‘रहित न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सय बार हिए की॥’
(मानस १।२९।३)
क्योंकि भगवान् भावग्राही हैं- ‘भावग्राही जनार्दन:।’
‘सम्यग्व्यवसितो हि स:’- दूसरे अध्यायमें कर्मयोगके
प्रकरणमें ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ की बात आयी है
(इकतालीसवाँ श्लोक) अर्थात् वहाँ बुद्धिमें यह
निश्चय होता है कि ‘मेरेको राग-द्वेष नहीं करने हैं,
कर्तव्य-कर्म करते हुए सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना है।’
अतः कर्मयोगीकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है और यहाँ
कर्ता स्वयं व्यवसित है- ‘सम्यग्व्यवसित:।’ कारण कि
‘मैं केवल भगवान्का ही हूँ, अब मेरा काम केवल भजन
करना ही है’- यह निश्चय स्वयंका है, बुद्धिका नहीं।
अतः सम्यक् निश्चयवालेकी स्थिति भगवान्में है। तात्पर्य
यह हुआ कि वहाँ निश्चय ‘करण’-(बुद्धि-) में है और
यहाँ निश्चय ‘कर्ता’-(स्वयं-) में है। करणमें निश्चय
होनेपर भी जब कर्ता परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है,
तो फिर कर्तामें निश्चय होनेपर करणमें भी निश्चय हो
जाय-इसमें तो कहना ही क्या है!
जहाँ बुद्धिका निश्चय होता है, वहाँ वह निश्चय
तबतक एकरूप नहीं रहता, जबतक स्वयं कर्ता उस
निश्चयके साथ मिल नहीं जाता। जैसे; सत्संग-स्वाध्यायके
समय मनुष्योंका ऐसा निश्चय होता है कि अब तो हम
केवल भजन-स्मरण ही करेंगे। परन्तु यह निश्चय सत्संग-
स्वाध्यायके बाद स्थिर नहीं रहता। इसमें कारण यह है कि
उनकी स्वयंकी स्वाभाविक रुचि केवल परमात्माकी तरफ
चलनेकी नहीं है, प्रत्युत साथमें संसारका सुख-आराम
आदि लेनेकी भी रुचि रहती है। परन्तु जब स्वयंका यह
निश्चय हो जाता है कि अब हमें परमात्माकी तरफ ही
चलना है, तो फिर यह निश्चय कभी मिटता नहीं; क्योंकि
यह निश्चय स्वयंका है।
जैसे, कन्याका विवाह होनेपर ‘अब मैं पतिकी हो
गयी, अब मेरेको पतिके घरका काम ही करना है’ ऐसा
निश्चय स्वयंमें हो जानेसे यह कभी मिटता नहीं, प्रत्युत
बिना याद किये ही हरदम याद रहता है। इसका कारण
यह है कि उसने स्वयंको ही पतिका मान लिया। ऐसे ही
जब मनुष्य यह निश्चय कर लेता है कि ‘मैं भगवान्का
हूँ और अब केवल भगवान्का ही काम (भजन) करना
है, भजनके सिवाय और कोई काम नहीं, किसी कामसे
कोई मतलब नहीं, तो यह निश्चय स्वयंका होनेसे सदाके
लिये पक्का हो जाता है, फिर कभी मिटता ही नहीं।’
इसलिये भगवान् कहते हैं कि उसको साधु ही मानना
चाहिये। केवल माननेकी ही बात नहीं, स्वयंका निश्चय
होनेसे वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है- ‘क्षिप्रं
भवति धर्मात्मा’ (९।३१)।
भक्तियोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण दुर्गुण-दुराचार भगवान्की
विमुखतापर ही टिके रहते हैं। जब प्राणी अनन्यभावसे
भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब सभी दुर्गुण-दुराचार
मिट जाते हैं।
परिशिष्ट भाव-ज्ञानयोग और कर्मयोगमें बुद्धिकी प्रधानता रहती है- ‘एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोगे
त्विमां शृणु’ (गीता २।३९)। इसलिये ज्ञानयोगी और कर्मयोगीकी बुद्धि व्यवसित होती है- ‘व्यवसायात्मिका
बुद्धिरेकेह’ (गीता २।४१), ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि:’ (गीता २।४४)। परन्तु भक्तियोगमें स्वयंकी प्रधानता रहती
है, इसलिये भक्त स्वयं व्यवसित होता है- ‘सम्यग्व्यवसितो हि स:।’
मन-बुद्धिमें बैठी हुई बातकी विस्मृति हो सकती है, पर स्वयंमें बैठी हुई बातकी विस्मृति नहीं हो सकती।
कारण कि मन-बुद्धि अपने साथ निरन्तर नहीं रहते, सुषुप्तिमें हमें उनके अभावका अनुभव होता है, पर स्वयंके
अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। उस स्वयंमें जो बात होती है, वह अखण्ड रहती है। इसलिये ‘मैं
भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’- यह स्वीकृति स्वयंमें होती है, मन-बुद्धिमें नहीं। एक बार यह स्वीकृति होनेपर
फिर कभी अस्वीकृति होती ही नहीं; क्योंकि स्वयं मूलमें भगवान्का ही अंश होनेसे भगवान्से अभिन्न है। परन्तु
भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध स्वीकार कर लेता है (गीता-पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। अतः
वास्तवमें केवल अपनी भूल ही मिटती है। भूल मिटते ही भगवान्के नित्य-सम्बन्धकी स्वतः जागृति हो जाती है-
‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८।७३)। दूसरेके साथ सम्बन्ध माना था, यही भूल थी, मोह था।
सम्बन्ध-अब आगेके श्लोकमें सम्यक् निश्चयका फल बताते हैं।
श्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
६७७
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
क्षिप्रम् | = (वह) तत्काल (उसी क्षण) | शश्वत् | = निरन्तर रहनेवाली | भक्तः | = भक्तका ---|---|---|---|---|--- धर्मात्मा | = धर्मात्मा | शान्तिम् | = शान्तिको | प्रणश्यति, न | = पतन नहीं होता— भवति | = हो जाता है | निगच्छति | = प्राप्त हो जाता है । | प्रतिजानीहि | = (ऐसी तुम) प्रतिज्ञा करो । | (और) | मे | = मेरे | |
व्याख्या—‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’— वह तत्काल धर्मात्मा हो जाता है अर्थात् महान् पवित्र हो जाता है। कारण कि यह जीव स्वयं परमात्माका अंश है और जब इसका उद्देश्य भी परमात्माकी प्राप्ति करना हो गया तो अब उसके धर्मात्मा होनेमें क्या देरी लगेगी? अब वह पापात्मा कैसे रहेगा? क्योंकि वह धर्मात्मा तो स्वतः था ही, केवल संसारके सम्बन्धके कारण उसमें पापात्मापन आया था, जो कि आगन्तुक था। अब जब अहंता बदलनेसे संसारका सम्बन्ध नहीं रहा, तो वह ज्यों-का-त्यों (धर्मात्मा) रह गया।
यह जीव जब पापात्मा नहीं बना था, तब भी पवित्र था और जब पापात्मा बन गया, तब भी वैसा ही पवित्र था। कारण कि परमात्माका अंश होनेसे जीव सदा ही पवित्र है। केवल संसारके सम्बन्धसे वह पापात्मा बना था। संसारका सम्बन्ध छूटते ही वह ज्यों-का-त्यों पवित्र रह गया।
पाप करनेकी भावना रहते हुए मनुष्य ‘मेरेको केवल भगवान्की तरफ ही चलना है’—ऐसा निश्चय नहीं कर सकता, यह बात ठीक है। परन्तु पापी मनुष्य ऐसा निश्चय नहीं कर सकता—यह नियम नहीं है। कारण कि जीवमात्र परमात्माका अंश होनेसे तत्त्वतः निर्दोष है। संसारकी आसक्तिके कारण ही उसमें आगन्तुक दोष आ जाते हैं। यदि उसके मनमें पापोंसे घृणा हो जाय और ऐसा निश्चय हो जाय कि अब भगवान्का ही भजन करना है, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है। कारण कि जहाँ संसारकी कामना है, वहीं भगवान्की तरफ चलनेकी रुचि भी है। अगर भगवान्की तरफ चलनेकी रुचि जम जाय, तो कामना, आसक्ति नष्ट हो जाती है। फिर भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लग सकती।
वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है—इसका तात्पर्य यह हुआ कि उसमें जो यत्किंचित् दुराचार दीखते हैं, वे भी टिकेंगे नहीं। कारण कि सब-के-सब दुराचार टिके
हुए हैं—संसारको महत्त्व देनेपर। परन्तु जब वह संसारकी कामनासे रहित होकर केवल भगवान्को ही चाहता है, तब उसके भीतर संसारका महत्त्व न रहकर केवल भगवान्का महत्त्व हो जाता है। भगवान्का महत्त्व होनेसे वह धर्मात्मा हो जाता है।
मार्मिक बात
यह एक सिद्धान्त है कि कर्ताके बदलनेपर क्रियाएँ अपने-आप बदल जाती हैं, जैसे कोई धर्मरूपी क्रिया करके धर्मात्मा होना चाहता है, तो उसे धर्मात्मा होनेमें देरी लगेगी। परन्तु अगर वह कर्ताको ही बदल दे अर्थात् ‘मैं धर्मात्मा हूँ’ ऐसे अपनी अहंताको ही बदल दे, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जायगा। ऐसे ही दुराचारी-से-दुराचारी भी ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ ऐसे अपनी अहंताको बदल देता है, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है, साधु हो जाता है, भक्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जब संसार-शरीरके साथ ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन करके संयोगजन्य सुख चाहने लगता है, तब वह ‘कामात्मा’ (गीता—दूसरे अध्यायका तैतालसीर्वा श्लोक) बन जाता है और जब संसारसे सर्वथा विमुख होकर भगवान्के साथ अनन्य सम्बन्ध जोड़ लेता है, जो कि वास्तवमें है, तब वह ‘धर्मात्मा’ बन जाता है।
साधारण दृष्टिसे लोग यही समझते हैं कि मनुष्य सत्य बोलनेसे सत्यवादी होता है और चोरी करनेसे चोर होता है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। जब स्वयं सत्यवादी होता है अर्थात् ‘मैं सत्य बोलनेवाला हूँ’ ऐसी अहंताको अपनेमें पकड़ लेता है, तब वह सत्य बोलता है और सत्य बोलनेसे उसकी सत्यवादिता दृढ़ हो जाती है। ऐसे ही चोर होता है, वह ‘मैं चोर हूँ’ ऐसी अहंताको पकड़कर ही चोरी करता है और चोरी करनेसे उसका चोरपना दृढ़ हो जाता है। परन्तु
६७८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ९
जिसकी अहंतामें 'मैं चोर हूँ ही नहीं' ऐसा दृढ़ भाव है,
वह चोरी नहीं कर सकता। तात्पर्य यह हुआ कि अहंताके
परिवर्तनसे क्रियाओंका परिवर्तन हो जाता है।
इन दोनों दृष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि कर्ता जैसा
होता है, उसके द्वारा वैसे ही कर्म होते हैं और जैसे कर्म
होते हैं, वैसा ही कर्तापन दृढ़ हो जाता है। ऐसे ही यहाँ
दुराचारी भी 'अनन्यभाक्' होकर अर्थात् 'मैं केवल
भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं' ऐसे
अनन्यभावसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तो
उसकी अहंतामें 'मैं भगवान्का हूँ, संसारका नहीं हूँ' यह
भाव दृढ़ हो जाता है, जो कि वास्तवमें सत्य है। इस प्रकार
अहंताके बदल जानेपर क्रियाओंमें किंचिन्मात्र कमी
रहनेपर भी वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है।
यहाँ शंका हो सकती है कि पूर्वश्लोकमें भगवान्
'सुराचार:' कहकर आये हैं, तो फिर यहाँ भगवान्ने
उसको 'धर्मात्मा' क्यों कहा है? इसका समाधान है कि
दुराचारीके दुराचार मिट जायँ, तो वह सदाचारी अर्थात्
धर्मात्मा ही होगा। अतः सदाचारी कहो या धर्मात्मा कहो-
एक ही बात है।
'शश्वच्छान्तिं निगच्छति' - केवल धार्मिक क्रियाओंसे
जो धर्मात्मा बनता है, उसके भीतर भोग और ऐश्वर्यकी
कामना होनेसे उसको भोग और ऐश्वर्य तो मिल सकते
हैं, पर शाश्वती शान्ति नहीं मिल सकती। दुराचारीकी
अहंता बदलनेपर जब वह भगवान्के साथ भीतरसे एक
हो जाता है, तब उसके भीतर कामना नहीं रह सकती,
असत्का महत्त्व नहीं रह सकता। इसलिये उसको निरन्तर
रहनेवाली शान्ति मिल जाती है।
दूसरा भाव यह है कि स्वयं परमात्माका अंश होनेसे
'चेतन अमल सहज सुखरासी' है। अतः उसमें अपने
स्वरूपकी जो अनादि अनन्त स्वतःसिद्ध शान्ति है, धर्मात्मा
होनेसे अर्थात् भगवान्के साथ अनन्यभावसे सम्बन्ध होनेसे
वह शाश्वती शान्ति प्राप्त हो जाती है। केवल संसारके साथ
सम्बन्ध माननेसे ही उसका अनुभव नहीं हो रहा था।
'कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति'-
यहाँ 'मेरे भक्तका पतन नहीं होता' ऐसी प्रतिज्ञा भगवान्
अर्जुनसे करवाते हैं, स्वयं नहीं करते। इसका आशय यह
है कि अभी युद्धका आरम्भ होनेवाला है और भगवान्ने
पहले ही हाथमें शस्त्र न लेनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; परन्तु
जब आगे भीष्मजी यह प्रतिज्ञा कर लेंगे कि 'आजु जौ
हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ। तौ लाजों गंगा-जननीकों
शान्तनु सुत न कहाऊँ' तो उस समय भगवान्की प्रतिज्ञा
तो टूट जायगी, पर भक्त-(भीष्मजी-)की प्रतिज्ञा नहीं
टूटेगी। भगवान्ने चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'भक्तोऽसि
मे सखा चेति' कहकर अर्जुनको अपना भक्त स्वीकार
किया है। अतः भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि भैया! तू
प्रतिज्ञा कर ले। कारण कि तेरे द्वारा प्रतिज्ञा करनेपर अगर
मैं खुद भी तेरी प्रतिज्ञा तोड़ना चाहूँगा, तो भी तोड़ नहीं
सकूँगा, फिर और तोड़ेगा ही कौन? तात्पर्य हुआ कि अगर
भक्त प्रतिज्ञा करे, तो उस प्रतिज्ञाके विरुद्ध मेरी प्रतिज्ञा भी
नहीं चलेगी।
मेरे भक्तका विनाश अर्थात् पतन नहीं होता-यह
कहनेका तात्पर्य है कि जब वह सर्वथा मेरे सम्मुख हो गया
है, तो अब उसके पतनकी किंचिन्मात्र भी सम्भावना नहीं
रही। पतनका कारण तो शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान
लेना ही था। उस माने हुए सम्बन्धसे सर्वथा विमुख होकर
जब वह अनन्यभावसे मेरे ही सम्मुख हो गया, तो अब
उसके पतनकी सम्भावना हो ही कैसे सकती है?
दुराचारी भी जब भक्त हो सकता है, तो फिर भक्त
होनेके बाद वह पुनः दुराचारी भी हो सकता है-ऐसा
न्याय कहता है। इस न्यायको दूर करनेके लिये भगवान्
कहते हैं कि यह न्याय यहाँ नहीं लगता। मेरे यहाँ तो
दुराचारी-से-दुराचारी भी भक्त बन सकते हैं, पर भक्त
होनेके बाद उनका फिर पतन नहीं हो सकता अर्थात् वे
फिर दुराचारी नहीं बन सकते। इस प्रकार भगवान्के
न्यायमें भी दया भरी हुई है। अतः भगवान् न्यायकारी और
दयालु-दोनों ही सिद्ध होते हैं।
परिशिष्ट भाव-जैसे रोगीका वैद्यके साथ सम्बन्ध हो जाता है, ऐसे ही अपनी निर्बलताका और भगवान्की
सर्वसमर्थताका विश्वास होनेपर मनुष्यका भगवान्के साथ सम्बन्ध हो जाता है। तात्पर्य है कि जब मनुष्य संसारके दुःखोंसे
घबरा जाता है और उनको मिटानेमें अपनी निर्बलता अनुभव करता है, पर साथ-ही-साथ उसमें यह विश्वास रहता
है कि सर्वसमर्थ भगवान्की कृपाशक्तिसे मेरी यह निर्बलता दूर हो सकती है, मैं सांसारिक दुःखोंसे बच सकता हूँ,
तब वह तत्काल 'भक्त' हो जाता है-'क्षिप्रं भवति धर्मात्मा'। भूखे व्यक्तिको अन्न मिल जाय तो क्या भोजन करनेमें
देरी लगेगी?
जबतक मनुष्यको अपनेमें कुछ बल, योग्यता, विशेषता दीखती है, तबतक वह 'अनन्यभाक्' नहीं होता। वह
श्लोक ३१]
- साधक-संजीवनी *
६७९
‘अनन्यभाक्’ तभी होता है, जब उसको दूसरा कोई उसके दुःखोंको मिटानेवाला नहीं दीखता। ‘अनन्यभाक्’ होते ही वह धर्मात्मा अर्थात् भगवान्का भक्त हो जाता है।
भक्तका पतन नहीं होता; क्योंकि वह भगवन्निष्ठ होता है अर्थात् उसके साधन और साध्य भगवान् ही होते हैं; उसका अपना बल नहीं होता, प्रत्युत भगवान्का ही बल होता है। यहाँ शंका हो सकती है कि अगर भक्तका पतन नहीं होता तो भगवान्ने अठारहवें अध्यायमें अर्जुनको ‘अथ चैत्त्वमहंकारान श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि’ (१८।५८) ‘यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा’—ऐसा क्यों कहा? जबकि भगवान् अर्जुनको अपना भक्त भी मानते हैं—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति’ (गीता ४।३)? इसका समाधान है कि भक्तका पतन तभी हो सकता है, जब वह भगवान्का आश्रय छोड़कर अहंकारका आश्रय ले ले—‘अहंकारान श्रोष्यसि’। भगवान्का आश्रय रहते हुए उसका पतन नहीं हो सकता।
भक्त भगवान्के छोटे बालक हैं और ज्ञानी बड़े बालक हैं। जैसे माँको छोटे-बड़े सभी बालक समानरूपसे प्रिय लगते हैं, पर वह सँभाल छोटे बालककी ही करती है, बड़ेकी नहीं। कारण कि छोटा बालक सर्वथा माँके ही आश्रित रहता है; अतः उसके सँभालकी जितनी आवश्यकता है, उतनी बड़ेके लिये आवश्यकता नहीं है। ऐसे ही भगवान् अपने आश्रित भक्तकी पूरी सँभाल करते हैं और स्वयं उसके योगक्षेमका वहन करते हैं (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। परन्तु ज्ञानीके योगक्षेमका वहन कौन करे? इसलिये ज्ञानका साधक तो योगभ्रष्ट हो सकता है, पर भक्त योगभ्रष्ट नहीं हो सकता।
ब्रह्मादि देवता भगवान्से कहते हैं—
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वयस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुग्मद्वययः॥
(श्रीमद्भा० १०।२।३२)
‘हे कमलनयन! जो लोग आपके चरणोंकी शरण नहीं लेते और आपकी भक्तिसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको मुक्त तो मानते हैं, पर वास्तवमें वे बद्ध ही हैं। वे यदि कष्टपूर्वक साधन करके ऊँचे-से-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायँ, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं।’
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्विच्य बद्धसौहृदाः। त्व्याभिगुप्ता विचरन्ति निभंया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥
(श्रीमद्भा० १०।२।३३)
‘परन्तु भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी उन ज्ञानाभिमानियोंकी तरह अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! आपके द्वारा सुरक्षित होनेके कारण वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निभंय होकर विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकता।’
भगवान्की स्तुति करते हुए वेद कहते हैं—
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥ बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥
(मानस, उत्तर० १३।३)
ज्ञानयोगके साधकमें कुछ कमी रहनेसे पतन हो सकता है, पर भक्तियोगके साधकमें कुछ कमी रहनेपर भी पतन नहीं होता। इसलिये भगवान् कहते हैं—
बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेन्द्रियः। प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१८)
‘उद्धवजी! मेरा जो भक्त अभी जितेन्द्रिय नहीं हो सका है और संसारके विषय बार-बार उसे बाधा पहुँचाते रहते
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
हैं, अपनी ओर खींचते रहते हैं तो भी वह प्रतिक्षण बढ़नेवाली मेरी भक्तिके प्रभावसे प्रायः विषयोंसे पराजित नहीं होता।' न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
(महाभारत, अनु० १४९।१३९)
‘भगवान्के भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता।’
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तामू। बड़ रखवार रमापति जासू॥
(मानस, बाल० १२६।४)
‘कौन्तेय प्रतिजानीहि’—भगवान् अर्जुनको प्रतिज्ञा करनेके लिये कहते हैं; क्योंकि भक्तको प्रतिज्ञा भगवान् भी टाल नहीं सकते। भक्ति भगवान्की कमजोरी है। इसलिये भगवान्ने दुर्वासासे कहा है—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिर्गस्तद्वयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
(श्रीमद्भ० ९।४।६३)
‘हे द्विज! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। मुझे भक्तजन बहुत प्रिय हैं। उनका मेरे हृदयपर पूर्ण अधिकार है।’
‘कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति’—इन पदोंसे साधकको यह दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि मेरा पतन हो ही नहीं सकता; क्योंकि मैं भगवान्का ही हूँ।
सम्बन्ध—इस प्रकरणमें भगवान्ने अपनी भक्तिके सात अधिकारी बताये हैं। उनमेंसे दुराचारीका वर्णन दो श्लोकोंमें किया। अब आगेके श्लोकमें भक्तिके चार अधिकारियोंका वर्णन करते हैं।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ ३२॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | वैश्याः | = वैश्य | व्यपाश्रित्य | = सर्वथा मेरे शरण |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो | तथा | = और | होकर | |
| अपि | = भी | शूद्राः | = शूद्र (हों), | हि | = निःसन्देह |
| पापयोनयः | = पापयोंनिवाले | ते | = वे | पराम् | = परम |
| स्युः | = हों (तथा जो भी) | अपि | = भी | गतिम् | = गतिको |
| स्त्रियः | = स्त्रियाँ, | माम्, | यान्ति | = प्राप्त हो जाते हैं। |
व्याख्या —‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य ..... यान्ति परां गतिम्’—जिनके इस जन्ममें आचरण खराब हैं अर्थात् जो इस जन्मका पापी है, उसको भगवान्ने तीसवें श्लोकमें ‘दुराचारी’ कहा है। जिनके पूर्वजन्ममें आचरण खराब थे अर्थात् जो पूर्वजन्मके पापी हैं और अपने पुराने पापोंका फल भोगनेके लिये नीच योनियोंमें पैदा हुए हैं, उनको भगवान्ने यहाँ ‘पापयोंनि’ कहा है।
यहाँ ‘पापयोंनि’ शब्द ऐसा व्यापक है, जिसमें असुर, राक्षस, पशु, पक्षी आदि सभी लिये जा सकते हैं* और ये सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी माने जाते हैं। शाण्डिल्य ऋषिने कहा है—‘आनिन्द्योऽन्यधिक्रियते परम्पर्यात्
सामान्यवत्।’ (शाण्डिल्य-भक्तिसूत्र ७८) अर्थात् जैसे दया, क्षमा, उदारता आदि सामान्य धर्मोंके मात्र मनुष्य अधिकारी हैं, ऐसे ही भगवद्भक्तिके नीची-से-नीची योनिसे लेकर ऊँची-से-ऊँची योनि तकके सब प्राणी अधिकारी हैं। इसका कारण यह है कि मात्र जीव भगवान्के अंश होनेसे भगवान्की तरफ चलनेमें, भगवान्की भक्ति करनेमें, भगवान्के सम्मुख होनेमें अनधिकारी नहीं हैं। प्राणियोंकी योग्यता-अयोग्यता आदि तो सांसारिक कार्योंमें हैं; क्योंकि ये योग्यता आदि बाह्य हैं और मिली हुई हैं तथा बिछुड़नेवाली हैं। इसलिये भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेमें योग्यता-अयोग्यता कोई कारण नहीं है अर्थात् जिसमें योग्यता है, वह
- केवलनेन हि भावेन गोष्यो गावो नगा मुगाः। येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरंजसा॥ (श्रीमद्भ० ११।१२।८)
‘गोपियाँ, गायें, वृक्ष, पशु, नाग तथा इस प्रकारके और भी मूढबुद्धि प्राणियोंने अनन्यभावके द्वारा सिद्ध होकर अनायास ही मेरी प्राप्ति कर ली है।’
श्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
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भगवान्में लग सकता है और जिसमें अयोग्यता है, वह भगवान्में नहीं लग सकता—यह कोई कारण नहीं है। प्राणी स्वयं भगवान्के हैं; अतः सभी भगवान्के सम्मुख हो सकते हैं। तात्पर्य हुआ कि जो हृदयसे भगवान्को चाहते हैं, वे सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी हैं। ऐसे पापयोनिवाले भी भगवान्के शरण होकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, परम पवित्र हो जाते हैं।
लौकिक दृष्टिसे तो आचरण भ्रष्ट होनेसे अपवित्रता मानी जाती है, पर वास्तवमें जो कुछ अपवित्रता आती है, वह सब-की-सब भगवान्से विमुख होनेसे ही आती है। जैसे, अंगार अग्निसे विमुख होते ही कोयला बन जाता है। फिर उस कोयलेको साबुन लगाकर कितना ही धो लें, तो भी उसका कालापन नहीं मिटता। अगर उसको पुनः अग्निमें रख दिया जाय, तो फिर उसका कालापन नहीं रहता और वह चमक उठता है। ऐसे ही भगवान्के अंश इस जीवमें कालापन अर्थात् अपवित्रता भगवान्से विमुख होनेसे ही आती है। अगर यह भगवान्के सम्मुख हो जाय, तो इसकी वह अपवित्रता सर्वथा मिट जाती है और यह महान् पवित्र हो जाता है तथा दुनियामें चमक उठता है। इसमें इतनी पवित्रता आ जाती है कि भगवान् भी इसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं!
जब स्वयं आर्त होकर प्रभुको पुकारता है, तो उस पुकारमें भगवान्को द्रवित करनेकी जो शक्ति है, वह शक्ति शुद्ध आचरणोंमें नहीं है। जैसे, माँका एक बेटा अच्छा काम करता है तो माँ उससे प्यार करती है और एक बेटा कुछ भी काम नहीं करता, प्रत्युत आर्त होकर माँको पुकारता है, रोता है, तो फिर माँ यह विचार नहीं करती कि यह तो कुछ भी अच्छा काम नहीं करता, इसको गोदमें कैसे लूँ? वह उसके रोनको सह नहीं सकती और चट उठाकर गोदमें ले लेती है। ऐसे ही खराब-से-खराब आचरण करनेवाला, पापी-से-पापी व्यक्ति भी आर्त होकर भगवान्को पुकारता है, रोता है, तो भगवान् उसको अपनी गोदमें ले लेते हैं, उससे प्यार करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वयंके भगवान्की ओर लगनेपर जब इस जन्मके पाप भी बाधा नहीं दे सकते, तो फिर पुराने पाप बाधा कैसे दे
सकते हैं ?
कारण कि पुराने पाप-कर्मोंका फल जन्म और भोगरूप प्रतिकूल परिस्थिति है; अतः वे भगवान्की ओर चलनेमें बाधा नहीं दे सकते।
यहाँ ‘स्त्रियः’ पद देनेका तात्पर्य है कि किसी भी वर्णकी, किसी भी आश्रमकी, किसी भी देशकी, किसी भी वेशकी कैसी ही स्त्रियाँ क्यों न हों, वे सभी मेरे शरण होकर परम पवित्र बन जाती हैं और परमगतिको प्राप्त होती हैं। जैसे, प्राचीन कालमें देवहूति, शबरी, कुन्ती, द्रौपदी, व्रजगोपियाँ आदि और अभीके जमानेमें मीरा, करमैती, करमाबाई, फूलीबाई आदि कई स्त्रियाँ भगवान्की भक्ता हो गयी हैं। ऐसे ही वैश्योंमें समाधि, तुलाधार आदि और शूद्रोंमें विदुर, संजय, निषादराज गुह आदि कई भगवान्के भक्त हुए हैं। तात्पर्य यह हुआ कि पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र—ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त होते हैं।
विशेष बात
इस श्लोकमें ‘पापयोनयः’ पद स्वतन्त्ररूपसे आया है। इस पदको स्त्रियाँ, वैश्यों और शूद्रोंका विशेषण नहीं माना जा सकता; क्योंकि ऐसा माननेपर कई बाधाएँ आती हैं। स्त्रियाँ चारों वर्णोंकी होती हैं। उनमेंसे ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी स्त्रियोंको अपने-अपने पतियोंके साथ यज्ञ आदि वैदिक कर्मोंमें बैठनेका अधिकार है। अतः स्त्रियोंको पापयोनि कैसे कह सकते हैं? अर्थात् नहीं कह सकते। चारों वर्णोंमें आते हुए भी भगवान्ने स्त्रियोंका नाम अलगसे लिया है। इसका तात्पर्य है कि स्त्रियाँ पतिके साथ ही मेरा आश्रय ले सकती हैं, मेरी तरफ चल सकती हैं—ऐसा कोई नियम नहीं है। स्त्रियाँ स्वतन्त्रतापूर्वक मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकती हैं। इसलिये स्त्रियोंको किसी भी व्यक्तिका मनसे किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल मेरा ही आश्रय लेना चाहिये।
अगर इस ‘पापयोनयः’ पदको वैश्योंका विशेषण माना जाय, तो यह भी युक्तिसंगत नहीं बैठता। कारण कि श्रुतिके अनुसार वैश्योंको पापयोनि नहीं माना जा सकता।
- ‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येन्न ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ च इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येश्चव्योनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।’ (छान्दोग्यो ५।१०।७)
‘अर्थात् जो अच्छे आचरणोंवाले हैं, उनका जन्म तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंमें होता है; परन्तु जो नीच आचरणोंवाले हैं, वे कुत्ते, सूकर तथा चाण्डालयोनियोंमें जन्म लेते हैं।’