श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ३-४ ]
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हितमें रत रहे। ऐसे ज्ञानयोगके साधकद्वारा सेवाकार्यका विस्तार चाहे न हो; परन्तु भगवान् कहते हैं कि वह भी (सभी प्राणियोंके हितमें रति होनेके कारण) मेरेको प्राप्त कर लेगा।
सगुणोपासक और निर्गुणोपासक—दोनों ही प्रकारके साधकोंके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव रखना जरूरी है। सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसे अलग अपना हित माननेसे 'अहम्' अर्थात् व्यक्तित्व बना रहता है, जो साधकके लिये आगे चलकर बाधक होता है। वास्तवमें कल्याण 'अहम्' के मिटनेपर ही होता है। अपने लिये किये जानेवाले साधनसे 'अहम्' बना रहता है, इसलिये 'अहम्'को पूर्णतया मिटानेके लिये साधकको प्रत्येक क्रिया (खाना, पीना, सोना आदि एवं जप, ध्यान, पाठ, स्वाध्याय आदि भी) संसारमात्रके हितके लिये ही करनी चाहिये। संसारके हितमें ही अपना हित निहित है। भगवान्की मात्र शक्ति परहितमें लग रही है। अतः जो सबके हितमें लगेगा, भगवान्की शक्ति उसके साथ हो जायगी।
केवल दूसरेके लिये वस्तुओंको देना और शरीरसे सेवा कर देना ही सेवा नहीं है, प्रत्युत अपने लिये कुछ भी न चाहकर दूसरेका हित कैसे हो, उसको सुख कैसे मिले—इस भावसे कर्म करना ही सेवा है। अपनेको सेवक कहलानेका भाव भी मनमें नहीं रहना चाहिये। सेवा तभी हो सकती है, जब सेवक जिसकी सेवा करता है, उसे अपनेसे अभिन्न (अपने शरीरकी तरह) मानता है और बदलेमें उससे कुछ भी लेना नहीं चाहता।
जैसे मनुष्य बिना किसीके उपदेश दिये अपने शरीरकी सेवा स्वतः ही बड़ी सावधानीसे करता है और सेवा करनेका अभिमान भी नहीं करता, ऐसे ही सर्वत्र भगवद्वुद्धि होनेसे भक्तकी स्वतः सबके हितमें रति रहती है (गीता—छठे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। उनके द्वारा प्राणिमात्रका कल्याण होता है; परन्तु उनके मनमें लेशमात्र भी ऐसा भाव नहीं होता कि हम किसीका कल्याण कर रहे हैं। उनमें अहंताका सर्वथा अभाव हो जाता है, अतः ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषोंको आदर्श मानकर साधकको चाहिये कि सर्वत्र आत्मबुद्धि करके संसारके किसी भी प्राणीको किंचिन्मात्र भी दुःख न पहुँचाकर उनके हितमें सदा तत्परतासे स्वाभाविक ही रत रहे।
'सर्वत्र समबुद्धयः' —इस पदका भाव यह है कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासकोंकी दृष्टि सम्पूर्ण प्राणी-
पदार्थोंमें परिपूर्ण परमात्मापर ही रहनेके कारण विषम नहीं होती; क्योंकि परमात्मा सम है (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
यहाँ भगवान् ज्ञाननिष्ठावाले उपासकोंके लिये इस पदका प्रयोग करके एक विशेष भाव प्रकट करते हैं कि ज्ञानमार्गियोंके लिये एकात्ममें रहकर तत्त्वका चिन्तन करना ही एकमात्र साधन नहीं है; क्योंकि 'समबुद्धयः ' पदकी सार्थकता विशेषरूपसे व्यवहारकालमें ही होती है। दूसरी बात, संसारसे हटकर शरीरको निर्जन स्थानमें ले जाना ही सर्वथा एकात्म-सेवन नहीं है; क्योंकि शरीर भी तो संसारका ही एक अंग है। शरीर और संसारको अलग-अलग देखना विषमबुद्धि है। अतः शरीर और संसारको एक देखनेपर ही समबुद्धि हो सकती है। वास्तविक एकात्मकी सिद्धि तो परमात्मतत्त्वके अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थों अर्थात् शरीर और संसारकी सत्ताका अभाव होनेसे ही होती है। साधन करनेके लिये एकात्म भी उपयोगी है; परन्तु सर्वथा एकात्मसेवी साधकके द्वारा व्यवहारकालमें भूल होना सम्भव है। शरीरमें अपनापन न होना ही वास्तविक एकात्म है। अतः साधकको चाहिये कि वास्तविक एकात्मको लक्ष्यमें रखकर अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिसे अपनी अहंता-ममता हटाकर सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्ममें अभिन्न भावसे स्थित रहे। ऐसे साधक ही वास्तवमें समबुद्धि हैं।
गीतामें समबुद्धिका तात्पर्य 'समदर्शन' है न कि 'समवर्तन'। पाँचवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण तथा गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल—इन पाँच प्राणियोंके नाम गिनाये हैं, जिनके साथ व्यवहारमें किसी भी प्रकारसे समता होनी सम्भव नहीं। वहाँ भी 'समदर्शनः ' पद प्रयुक्त हुआ है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि सबके प्रति व्यवहार कभी समान नहीं हो सकता। व्यवहार एक समान कोई कर सकता भी नहीं और होना चाहिये भी नहीं। व्यवहारमें भिन्नता होनी आवश्यक है। व्यवहारमें साधककी विभिन्न प्राणी-पदार्थोंकी आकृति और उपयोगितापर दृष्टि रहते हुए भी वास्तवमें उसकी दृष्टि उन प्राणी-पदार्थोंमें परिपूर्ण परमात्मापर ही रहती है। जैसे विभिन्न प्रकारके गहनोंसे तत्त्व-(सोने-) में कोई अन्तर नहीं आता, ऐसे ही विभिन्न प्रकारके व्यवहारसे साधककी तत्त्व-दृष्टिमें कोई अन्तर नहीं आता। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति साधकमें आन्तरिक समता रहती है। यहाँ 'समबुद्धयः ' पदसे उस
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आन्तरिक समताकी ओर ही लक्ष्य कराया गया है।
सिद्ध महापुरुषोंकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता न रहनेके कारण वे सदा और सर्वत्र 'समबुद्धि' ही हैं। सिद्ध महापुरुषोंकी स्वतःसिद्ध स्थिति ही साधकोंके लिये आदर्श होती है और उसीको लक्ष्य करके वे चलते हैं। साधकोंकी दृष्टिमें परमात्माके सिवाय अन्य पदार्थोंकी जितने अंशमें सत्ता रहती है, उतने ही अंशमें उनकी बुद्धिमें समता नहीं रहती। अतः साधककी बुद्धिमें अन्य पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ता जैसे-जैसे कम होती जायगी, वैसे-वैसे ही उसकी बुद्धि सम होती जायगी।
साधक अपनी बुद्धिसे सर्वत्र परमात्माको देखनेकी चेष्टा करता है, जबकि सिद्ध महापुरुषोंकी बुद्धिमें परमात्मा स्वाभाविकरूपसे इतनी घनतासे परिपूर्ण हैं कि उनके लिये परमात्माके सिवाय और कुछ है ही नहीं। इसलिये उनकी बुद्धिका विषय परमात्मा नहीं है, प्रत्युत उनकी बुद्धि ही परमात्मासे परिपूर्ण है। अतः वे 'सर्वत्र समबुद्धयः' हैं।
'ते प्राप्नुवन्ति मामेव'—निर्गुणके उपासक कहीं यह समझ लें कि निर्गुण तत्त्व कोई दूसरा है और सगुण कोई दूसरा है, इसलिये भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि निर्गुण ब्रह्म मुझसे भिन्न नहीं है (गीता—नवें अध्यायका चौथा और चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। सगुण और निर्गुण दोनों मेरे ही स्वरूप हैं।
इन दोनों श्लोकोंमें भगवान्ने निर्गुण-उपासकोंके लिये चार बातें बतायी हैं, (१) निर्गुण-तत्त्वका स्वरूप क्या है, (२) साधककी स्थिति क्या है, (३) उपासनाका स्वरूप
परिशिष्ट भाव—भगवान्ने यहाँ ब्रह्मके जो लक्षण (अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल, अक्षर, अव्यक्त आदि) बताये हैं, वे ही लक्षण जीवात्माके भी बताये हैं; जैसे—'अचिन्त्य' (दूसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक), 'कूटस्थ' (पन्द्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक), 'अचल' (दूसरे अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक), 'अक्षर' (पन्द्रहवें अध्यायका सोलहवाँ और अठारहवाँ श्लोक), 'अव्यक्त' (दूसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) आदि। दोनोंके समान लक्षण बतानेका तात्पर्य है कि जीव और ब्रह्म—दोनों स्वरूपसे एक ही हैं। देहके साथ सम्बन्ध होनेसे (अनेक रूपसे) जो 'जीव' है, वही देहके साथ सम्बन्ध न होनेसे (एक रूपसे) 'ब्रह्म' है अर्थात् जीव केवल शरीरकी उपाधिसे, देहाभिमानके कारण ही अलग है, अन्यथा वह ब्रह्म ही है। इसलिये ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर उपासकको उपास्यसे सधर्मता प्राप्त हो जाती है—'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः' (गीता १४।२)।
'ते प्राप्नुवन्ति मामेव'—सगुण (गुणसहित) और निर्गुण (गुणरहित)—दोनों विशेषणोंमें विशेष्य (तत्त्व) तो एक ही हुआ, इसलिये भगवान्ने निर्गुणके उपासकोंको भी अपनी ही प्राप्ति बतायी है। भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि निर्गुण-निराकार रूप भी मेरा ही है, मेरे समग्ररूपसे अलग नहीं है।
'सर्वभूतहिते रताः'—जगत्, जीव और परमात्मा—तीनों ही दृष्टियोंसे हम सब एक हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण शरीर अपरा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे एक हैं और सम्पूर्ण जीव परा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे एक हैं। इसलिये जब साधककी सम्पूर्ण प्राणियोंमें समबुद्धि हो जाती है—'सर्वत्र समबुद्धयः' और वह अपने शरीरकी तरह ही सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना
क्या है और (४) साधक क्या प्राप्त करता है।
(१) अर्जुनने इसी अध्यायके पहले श्लोकके उत्तरार्धमें जिस निर्गुण-तत्त्वके लिये 'अक्षरम्' और 'अव्यक्तम्' दो विशेषण प्रयुक्त करके प्रश्न किया था, उसी तत्त्वका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये भगवान्ने छः और विशेषण अर्थात् कुल आठ विशेषण दिये, जिनमें पाँच निषेधात्मक (अक्षरम्, अनिर्देश्यम्, अव्यक्तम्, अचिन्त्यम् और अचलम्) तथा तीन विध्यात्मक (सर्वत्रगम्, कूटस्थम् और ध्रुवम्) विशेषण हैं।
(२) सब देश, काल, वस्तु और व्यक्तियोंमें परिपूर्ण तत्त्वपर दृष्टि रहनेसे निर्गुण-उपासकोंकी सर्वत्र समबुद्धि होती है। देहाभिमान और भोगोंकी पृथक् सत्ता माननेके कारण ही भोग भोगनेकी इच्छा होती है और भोग भोगे जाते हैं। परन्तु इन निर्गुण-उपासकोंकी दृष्टिमें एक परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी वस्तुकी पृथक् (स्वतन्त्र) सत्ता न होनेके कारण उनकी बुद्धिमें भोगोंका महत्त्व नहीं रहता। अतः वे सुगमतापूर्वक इन्द्रियोंका संयम कर लेते हैं। सर्वत्र समबुद्धिवाले होनेके कारण उनकी सब प्राणियोंके हितमें रति रहती है। इसलिये वे 'सर्वभूतहिते रताः' हैं।
(३) साधकका सब समय उस निर्गुण-तत्त्वकी ओर दृष्टि रखना (तत्त्वके सममुख रहना) ही 'उपासना' है।
(४) भगवान् कहते हैं कि ऐसे साधकोंको जो निर्गुण-ब्रह्म प्राप्त होता है, वह मैं ही हूँ। तात्पर्य यह है कि सगुण और निर्गुण एक ही तत्त्व है।
श्लोक ५ ]
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मानने लगता है—‘आत्मीयम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन’ (गीता ६।३२), तब उसकी सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें प्रीति हो जाती है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना ही शरीर माननेसे वह किसीको भी बुरा नहीं समझता, किसीका भी बुरा नहीं चाहता और किसीका भी बुरा नहीं करता। इस प्रकार बुराईका त्याग होनेपर उसके द्वारा स्वतः दूसरोंका हित होता है। इतना ही नहीं, जैसे अपने दाँतोंसे अपनी जीभ कट जाय तो दाँतोंपर क्रोध करके उनको कोई नहीं तोड़ता, ऐसे ही जो सब प्राणियोंको अपना मानता है, उसका कोई बुरा भी करता है, तो भी उसके मनमें उसका बुरा करनेका भाव नहीं आता—‘उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥’ (मानस, सुन्दर० ४१।४)। बुराईका त्याग होनेपर दूसरोंकी जो सेवा होती है, वह बड़े-से-बड़े दान-पुण्यसे भी नहीं हो सकती। इसलिये बुराईका त्याग भलाईका मूल है। जिसने बुराईका त्याग कर दिया है, वही ‘सर्वभूतहिते रताः’ हो सकता है।
सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ बताया और तीसरे-चौथे श्लोकोंमें निर्गुण-उपासकोंको अपनी प्राप्तिकी बात कही। अब दोनों प्रकारकी उपासनाओंके अवान्तर भेद तथा कठिनाई एवं सुगमताका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्धिरवाप्यते ॥५॥
| अव्यक्तासक्त- | क्लेशः | = कष्ट | अव्यक्ता | = अव्यक्त-विषयक |
|---|---|---|---|---|
| चेतसाम् | अधिकतरः | = अधिक होता है; | गतिः | = गति |
| चित्वाले | हि | = क्योंकि | दुःखम् | = कठिनातसे |
| तेषाम् | देहवद्धिः | = देहाभिमानियोंके | अवाप्यते | = प्राप्त की |
| (अपने साधनमें) | द्वारा | जाती है। |
व्याख्या—‘क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त-चेतसाम्’—अव्यक्तमें आसक्त चित्वाले—इस विशेषणसे यहाँ उन साधकोंकी बात कही गयी है, जो निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं, पर जिनका चित्त निर्गुण-तत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। तत्त्वमें आविष्ट होनेके लिये साधकमें तीन बातोंकी आवश्यकता होती है—रुचि, विश्वास और योग्यता। शास्त्रों और गुरुजनोंके द्वारा निर्गुण-तत्त्वकी महिमा सुननेसे जिनकी (निराकारमें आसक्त चित्वाला होने और निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ माननेके कारण) उसमें कुछ रुचि तो पैदा हो जाती है और वे विश्वासपूर्वक साधन आरम्भ भी कर देते हैं; परन्तु वैराग्यकी कमी और देहाभिमानके कारण जिनका चित्त तत्त्वमें प्रविष्ट नहीं होता—ऐसे साधकोंके लिये यहाँ ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पदका प्रयोग हुआ है।
भगवान्ने छठे अध्यायके सताईसवें-अट्ठाईसवें श्लोकोंमें बताया है कि ‘ब्रह्मभूत’ अर्थात् ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित साधकको सुखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। परन्तु यहाँ इस श्लोकमें ‘क्लेशः अधिकतरः’ पदोंसे यह स्पष्ट किया है कि इन साधकोंका चित्त ब्रह्मभूत साधकोंकी तरह
निर्गुण-तत्त्वमें सर्वथा तल्लीन नहीं हो पाया है। अतः उन्हें अव्यक्तमें ‘आविष्ट’ चित्वाला न कहकर ‘आसक्त’ चित्वाला कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इन साधकोंकी आसक्ति तो देहमें होती है, पर अव्यक्तकी महिमा सुनकर वे निर्गुणोपासनाको ही श्रेष्ठ मानकर उसमें आसक्त हो जाते हैं; जबकि आसक्ति देहमें ही हुआ करती है, अव्यक्तमें नहीं।
तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्यक्तम्’ पद प्रकृतिके अर्थमें आया है तथा और भी कई जगह वह प्रकृतिके लिये ही प्रयुक्त हुआ है; परन्तु यहाँ ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पदमें ‘अव्यक्त’ का अर्थ प्रकृति नहीं, प्रत्युत निर्गुण-निराकार ब्रह्म है। कारण यह है कि इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने ‘त्वाम्’ पदसे सगुण-साकार स्वरूपके और ‘अव्यक्तम्’ पदसे निर्गुण-निराकार स्वरूपके विषयमें ही प्रश्न किया है। उपासनाका विषय भी परमात्मा ही है, न कि प्रकृति; क्योंकि प्रकृति और प्रकृतिका कार्य तो त्याज्य है। इसलिये उसी प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने ‘अव्यक्त’ पदका (व्यक्त रूपके विपरीत) निर्गुण-निराकार स्वरूपके अर्थमें ही प्रयोग किया है। अतः यहाँ प्रकृतिका प्रसंग न होनेके कारण ‘अव्यक्त’ पदका अर्थ
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प्रकृति नहीं लिया जा सकता।
नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें 'अव्यक्तमूर्तिना' पद सगुण-निराकार स्वरूपके लिये आया है। ऐसी दशामें यह प्रश्न हो सकता है कि यहाँ भी 'अव्यक्तासक्तचेतसाम्' पदका अर्थ 'सगुण-निराकारमें आसक्त चित्तवाले पुरुष' ही क्यों न ले लिया जाय? परन्तु ऐसा अर्थ भी नहीं लिया जा सकता; क्योंकि इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नमें 'त्वाम्' पद सगुण-साकारके लिये और 'अव्यक्तम्' पदके साथ 'अक्षरम्' पद निर्गुण-निराकारके लिये आया है। ब्रह्म क्या है?—अर्जुनके इस प्रश्नके उत्तरमें आठवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान् बता चुके हैं कि 'परम अक्षर ब्रह्म है' अर्थात् वहाँ भी 'अक्षरम्' पद
निर्गुण-निराकारके लिये ही आया है। इसलिये अर्जुनने 'अव्यक्तम् अक्षरम्' पदोंसे जिस निर्गुण-ब्रह्मके विषयमें प्रश्न किया था, उसीके उत्तरमें यहाँ ('अक्षर' विशेषण होनेसे) 'अव्यक्त' पदसे निर्गुण-निराकार ब्रह्म ही लेना चाहिये, सगुण-निराकार नहीं।
'क्लेशोऽधिकतरः' पदका भाव यह है कि जिन साधकोंका चित्त निर्गुण-तत्त्वमें तल्लीन नहीं होता, ऐसे निर्गुण-उपासकोंको देहाभिमानके कारण अपनी साधनामें विशेष कष्ट अर्थात् कठिनाई होती है*। गौणरूपसे इस पदका भाव यह है कि साधनाकी प्रारम्भिक अवस्थासे लेकर अन्तिम अवस्थातकके सभी निर्गुण-उपासकोंको सगुण-उपासकोंसे अधिक कठिनाई होती है।
विशेष बात
अब सगुण-उपासनाकी सुगमताओं और निर्गुण-उपासनाकी कठिनताओंका विवेचन किया जाता है—
सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ
१—सगुण-उपासनामें उपास्यतत्त्वके सगुण-साकार होनेके कारण साधकके मन-इन्द्रियोंके लिये भगवान्के स्वरूप, नाम, लीला, कथा आदिका आधार रहता है। भगवान्के परायण होनेसे उसके मन-इन्द्रियाँ भगवान्के स्वरूप एवं लीलाओंके चिन्तन, कथा-श्रवण, भगवत्सेवा और पूजनमें अपेक्षाकृत सरलतासे लग जाते हैं (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। इसलिये उसके द्वारा सांसारिक विषय-चिन्तनकी सम्भावना कम रहती है।
२—सांसारिक आसक्ति ही साधनमें क्लेश देती है। परन्तु सगुणोपासक इसको दूर करनेके लिये भगवान्के ही आश्रित रहता है। वह अपनेमें भगवान्का ही बल मानता
निर्गुण-उपासनाकी कठिनताएँ
१—निर्गुण-उपासनामें उपास्यतत्त्वके निर्गुण-निराकार होनेके कारण साधकके मन-इन्द्रियोंके लिये कोई आधार नहीं रहता। आधार न होने तथा वैराग्यकी कमीके कारण इन्द्रियोंके द्वारा विषय-चिन्तनकी अधिक सम्भावना रहती है।
२—देहमें जितनी अधिक आसक्ति होती है, साधनमें उतना ही अधिक क्लेश मालूम देता है। निर्गुणोपासक उसे विवेकके द्वारा हटानेकी चेष्टा करता है। विवेकका आश्रय लेकर साधन करते हुए वह अपने ही साधन-बलको महत्त्व देता है। बँदरीका छोटा बच्चा जैसे (अपने
- साधक मुख्यतः दो प्रकारके होते हैं—
एक तो वे साधक हैं, जो सत्संग, श्रवण और शास्त्राध्ययनके फलस्वरूप साधनमें प्रवृत्त होते हैं। इनको अपने साधनमें अधिक क्लेश होता है।
दूसरे वे साधक हैं, जिनकी साधनमें स्वाभाविक रुचि तथा संसारसे स्वाभाविक वैराग्य होता है। इनको अपने साधनमें कम क्लेश होता है।
यहाँ यह शंका हो सकती है कि साधक दो ही प्रकारके क्यों होते हैं? इसका समाधान यह है कि गीतामें योगभ्रष्ट पुरुषकी गतिके वर्णनमें भगवान्ने दो ही गतियोंका वर्णन किया है—
(१) कुछ योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यलोकोंमें जाते हैं और वहाँ भोग भोगकर लौटनेपर शुद्ध आचरणवाले श्रीमानोंके घरमें जन्म लेते हैं और पुनः साधनरत होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ, चौवालीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक)।
(२) कुछ योगभ्रष्ट पुरुष सीधे ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेते हैं और फिर साधन करके परमात्माको प्राप्त होते हैं। ऐसे कुलमें जन्म होना 'दुर्लभतर' है (गीता—छठे अध्यायका बयालीसवाँ-तैतालीसवाँ श्लोक)।
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है। बिल्लीका बच्चा जैसे माँपर निर्भर रहता है, ऐसे ही यह साधक भी भगवान्पर निर्भर रहता है। भगवान् ही उसकी सँभाल करते हैं (गीता ९।२२)।
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहोसा।
भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
करउँ सदा तिन कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी॥
(मानस ३।४३।२-३)
अतः उसकी सांसारिक आसक्ति सुगमतासे मिट जाती है।
३—ऐसे उपासकोंके लिये गीतामें भगवान्ने ‘नचिरात्’ आदि पदोंसे शीघ्र ही अपनी प्राप्ति बतायी है (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।
४—सगुण-उपासकोंके अज्ञानरूप अन्धकारको भगवान् ही मिटा देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
५—उनका उद्धार भगवान् करते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।
६—ऐसे उपासकोंमें यदि कोई सूक्ष्म दोष रह जाता है, तो (भगवान्पर निर्भर होनेसे) सर्वज्ञ भगवान् कृपा करके उसको दूर कर देते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अठ्ठावनवाँ और छाछठवाँ श्लोक)।
७—ऐसे उपासकोंकी उपासना भगवान्की ही उपासना है। भगवान् सदा-सर्वदा पूर्ण हैं ही। अतः भगवान्की पूर्णतामें किंचिन्मात्र भी संदेह न रहनेके कारण उनमें सुगमतासे श्रद्धा हो जाती है। श्रद्धा होनेसे वे नित्य-निरन्तर भगवत्परायण हो जाते हैं। अतः भगवान् ही उन उपासकोंको बुद्धियोग प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें भगवत्प्राप्ति हो जाती है (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।
८—ऐसे उपासक भगवान्को परम कृपालु मानते हैं। अतः उनकी कृपाके आश्रयसे वे सब कठिनाइयोंको पार कर जाते हैं। यही कारण है कि उनका साधन सुगम हो जाता है और भगवत्-कृपाके बलसे वे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायके छप्पनवेंसे अठ्ठावनवें श्लोकतक)।
९—मनुष्यमें कर्म करनेका अभ्यास तो रहता ही है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक), इसलिये भक्तको अपने कर्म भगवान्के प्रति करनेमें केवल भाव ही बदलना पड़ता है; कर्म तो वे ही रहते हैं। अतः भगवान्के लिये कर्म करनेसे भक्त कर्म-बन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो
जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)। बलपर निर्भर होनेसे अपनी माँको पकड़े रहता है और अपनी पकड़से ही अपनी रक्षा मानता है, ऐसे ही यह साधक अपने साधनके बलपर अपनी उन्नति मानता है (गीता—अठारहवें अध्यायके इक्यावनवेंसे तिरपनवें श्लोकतक)। इसीलिये श्रीरामचरितमानसमें भगवान्ने इसको अपने समझदार पुत्रकी उपमा दी है—
मोरेँ प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।
बालक सुत सम दास अमानी॥
(३।४३।४)
३—ज्ञानयोगियोंके द्वारा लक्ष्यप्राप्तिके प्रसंगमें चौथे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें ‘अचिरेण’ पद तत्त्वज्ञानके अनन्तर शान्तिकी प्राप्तिके लिये आया है, न कि तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये।
४—निर्गुण-उपासक तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति स्वयं करते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक)।
५—ये अपना उद्धार (निर्गुण-तत्त्वकी प्राप्ति) स्वयं करते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।
६—ऐसे उपासकोंमें यदि कोई कमी रह जाती है, तो उस कमीका अनुभव उनको विलम्बसे होता है और कमीको ठीक-ठीक पहचाननेमें भी कठिनाई होती है। हाँ, कमीको ठीक-ठीक पहचान लेनेपर ये भी उसे दूर कर सकते हैं।
७—चौथे अध्यायके चौतीसवें और तेरहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानयोगियोंको ज्ञानप्राप्तिके लिये गुरुकी उपासनाकी आज्ञा दी है। अतः निर्गुण-उपासनामें गुरुकी आवश्यकता भी है; किंतु गुरुकी पूर्णताका निश्चित पता न होनेपर अथवा गुरुके पूर्ण न होनेपर स्थिर श्रद्धा होनेमें कठिनाई होती है तथा साधनकी सफलतामें भी विलम्बकी सम्भावना रहती है।
८—ऐसे उपासक उपास्य-तत्त्वको निर्गुण, निराकार और उदासीन मानते हैं। अतः उन्हें भगवान्की कृपाका वैसा अनुभव नहीं होता। वे तत्त्वप्राप्तिमें आनेवाले विचारोंको अपनी साधनाके बलपर ही दूर करनेमें कठिनाईका अनुभव करते हैं। फलस्वरूप तत्त्वकी प्राप्तिमें भी उन्हें विलम्ब हो सकता है।
९—ज्ञानयोगी अपनी क्रियाओंको सिद्धान्ततः प्रकृतिके अर्पण करता है; किन्तु पूर्ण विवेक जाग्रत् होनेपर ही उसकी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो सकती हैं। यदि
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[ अध्याय १२ ]
१०—हृदयमें पदार्थोंका आदर रहते हुए भी यदि वे प्राणियोंकी सेवामें लग जाते हैं तो उन्हें पदार्थोंका त्याग करनेमें कठिनाई नहीं होती। सत्यात्रोंके लिये पदार्थोंके त्यागमें तो और भी सुगमता है। फिर भगवान्के लिये तो पदार्थोंका त्याग बहुत ही सुगमतासे हो सकता है।
११—इस साधनमें विवेक और वैराग्यकी उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी प्रेम और विश्वासकी है। जैसे, कौरवोंके प्रति द्वेष-वृत्ति रहते हुए भी द्रौपदीके पुकारनेमात्रसे भगवान् प्रकट हो जाते थे;१ क्योंकि वह भगवान्को अपना मानती थी। भगवान् तो अपने साथ भक्तके प्रेम और विश्वासको ही देखते हैं, उसके दोषोंको नहीं। भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध जोड़ना उतना कठिन नहीं (क्योंकि भगवान्की ओरसे अपनापन स्वतःसिद्ध
‘अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्विरवाप्यते’—‘देहै’, ‘देहभूत्’ आदि पदोंका अर्थ साधारणतया ‘देहधारी पुरुष’ लिया जाता है। प्रसंगानुसार इनका अर्थ ‘जीव’ और ‘आत्मा’ भी लिया जाता है। यहाँ ‘देहवद्विः’२ पदका अर्थ ‘देहाभिमानी मनुष्य’ लेना चाहिये; क्योंकि निर्गुण-उपासकोंके लिये इसी श्लोकके पूर्वार्धमें ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पद आया है, जिससे यह प्रतीत होता है कि वे निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं; परन्तु उनका चित्त देहाभिमानके कारण निर्गुण-तत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। देहाभिमानके कारण ही उन्हें साधनमें अधिक क्लेश होता है।
निर्गुण-उपासनामें देहाभिमान ही मुख्य बाधा है—
परिशिष्ट भाव —निर्गुणोपासनामें जो देहसहित है, वह ‘उपासक’ (जीव) है और जो देहरहित है, वह ‘उपास्य’ (ब्रह्म) है। देहके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही जीव और ब्रह्मकी एकतामें खास बाधक है। इसलिये देहाभिमानीके लिये निर्गुणोपासनाकी सिद्धि कठिनातासे तथा देरीसे होती है। परन्तु सगुणोपासनामें भगवान्की विमुखता बाधक है, देहाभिमान बाधक नहीं है। इसलिये सगुणोपासक संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, साधनके आश्रित न होकर भगवान्के आश्रित हो जाता है। अतः भगवान् कृपा करके उसका शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका
१—यह बात उन भक्तोंके लिये है, जिनके स्मरणमात्रसे भगवान् प्रकट हो जाते हैं, सर्वसाधारणके लिये नहीं है। जो भक्त सर्वथा भगवान्पर निर्भर हो जाता है एवं जिसकी भगवान्के साथ इतनी प्रगाढ़ आत्मीयता होती है कि केवल स्मरणसे भगवान् प्रकट हो जाते हैं, उसके दोष दूर करनेका दायित्व भगवान्पर आ जाता है।
२—यहाँ ‘देह’ शब्दमें ‘भूमिनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशयाने। संसर्गेऽस्ति विवक्षायां भवन्ति मनुबादयः ॥’—इस कारिकाके अनुसार संसर्ग अर्थमें ‘तदस्यास्त्यस्मिन्निति मनुप्’ (५।२।१४), इस पाणिनिसूत्रसे ‘मनुप्’ प्रत्यय किया गया है। ‘देहवद्विः’ पदका अर्थ है—वे मनुष्य, जिनका देहके साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध माना हुआ है।
छठे अध्यायके सप्ताईसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मभूत’ होनेपर सुखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति बतायी गयी है, जबकि यहाँ ‘देहभूत’ होनेके कारण दुःखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति बतायी गयी है।
है), जितना कि पात्र बनना कठिन है। विवेककी किंचिन्मात्र भी कमी रही तो क्रियार्थ प्रकृतिके अर्पण नहीं होगी और साधक कर्तृत्वाभिमान रहनेसे कर्म-बन्धनमें बँध जायगा।
१०—जबतक साधकके चित्तमें पदार्थोंका किंचिन्मात्र भी आदर तथा अपने कहलानेवाले शरीर और नाममें अहंता-ममता है, तबतक उसके लिये पदार्थोंको मायामय समझकर उनका त्याग करना कठिन होता है।
११—यह साधक पात्र बननेपर ही तत्त्वको प्राप्त कर सकेगा। पात्र बननेके लिये विवेक और तीव्र वैराग्यकी आवश्यकता होगी, जिनको आसक्ति रहते हुए प्राप्त करना कठिन है।
‘देहाभिमाननि सवै दोषाः प्रादुर्भवन्ति’—इस बाधाकी ओर ध्यान दिलानेके लिये ही भगवान्ने ‘देहवद्विः’ पद दिया है। इस देहाभिमानको दूर करनेके लिये ही (अर्जुनके पूछे बिना ही) भगवान्ने तेरहवाँ और चौदहवाँ अध्याय कहा है। उनमें भी तेरहवें अध्यायका प्रथम श्लोक देहाभिमान मिटानेके लिये ही कहा गया है।
ब्रह्मके निर्गुण-निराकार स्वरूपकी प्राप्तिको यहाँ ‘अव्यक्ता गतिः’ कहा गया है। साधारण मनुष्योंकी स्थिति व्यक्त अर्थात् देहमें होती है। इसलिये उन्हें अव्यक्तमें स्थित होनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। यदि साधक अपनेको देहवाला न माने, तो उसकी अव्यक्तमें सुगमता और शीघ्रतापूर्वक स्थिति हो सकती है।
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
८१९
सातवाँ और आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक। यह सगुणोपासनाकी विलक्षणता है!
सगुणोपासनामें भक्त जगत्को मिथ्या मानकर उसके त्यागपर जोर नहीं देता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें जड़-चेतन, सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—‘सदसच्चाहमजुन’ (गीता ९।१९)। इसलिये सगुणकी उपासना समग्रकी उपासना है। गीताने सगुणको समग्र माना है और ब्रह्म, जीव, कर्म, अधिभूत, अधिदेव और अधियज्ञ—इन सबको समग्र भगवान्के ही अन्तर्गत माना है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। इसलिये गीताको देखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि निर्गुणोपासना (ब्रह्मकी उपासना) समग्र भगवान्के एक अंगकी उपासना है और सगुणोपासना स्वयं समग्र भगवान्की उपासना है—‘त्वां पर्युपासते’ (गीता १२।१), ‘मां ध्यायन्त उपासते’ (१२।६)।
जो समग्र, भगवान्के एक अंगकी उपासना करता है, उसको भी अन्तमें समग्रकी प्राप्ति होती है—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव’ (गीता १२।४), ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (१८।५५)। अतः जिसको निर्गुण अच्छा लगता हो, वह निर्गुणकी उपासना करे, पर उसको निर्गुणका आग्रह रखकर सगुणका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। सगुणका तिरस्कार, निन्दा, खण्डन करना निर्गुणोपासकके लिये बहुत घातक है अर्थात् उसकी साधनाके सिद्ध होनेमें बहुत बाधक है। कारण कि अपरा प्रकृति भगवान्की है; अतः उसकी निन्दा करनेसे वह भगवान्की निन्दा होती है। गुणोंका खण्डन करनेसे गुणोंकी सत्ता आ जाती है, जो बाधक होती है; क्योंकि सत्ता माने बिना साधक निराकरण किसका करेगा? अतः साधक यदि दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करके तत्परतापूर्वक अपने साधनमें लगा रहे तो आगे चलकर सभी साधक एक हो जाते हैं; क्योंकि तत्त्व एक ही है। सगुणकी उपेक्षा करनेसे साधक मुक्त तो हो सकता है, पर मतभेद नहीं मिट सकता। परन्तु सगुणकी उपेक्षा न रहनेसे मतभेद भी नहीं रहता और साधकको समग्रकी प्राप्ति हो जाती है।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥
| तु | = परन्तु | सन्यस्य | = अर्पण करके | माम् | = मेरा |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो | (और) | एव | = ही | |
| सर्वाणि | = सम्पूर्ण | मत्पराः | = मेरे परायण होकर | ध्यायन्तः | = ध्यान करते हुए |
| कर्माणि | = कर्मोंको | अनन्येन | = अनन्य- | उपासते | = (मेरी) उपासना |
| मयि | = मेरे | योगेन | = योग-(सम्बन्ध-) से | करते हैं। |
व्याख्या —[ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने अनन्य भक्तके लक्षणोंमें तीन विध्यात्मक (‘मत्कर्मकृत’, ‘मत्परमः’ और ‘मद्भक्तः’) और दो निषेधात्मक (‘संगवर्जितः’ और ‘निर्वैरः’) पद दिये थे। उन्हीं पदोंका संकेत इस श्लोकमें इस प्रकार किया गया है—
(१) ‘सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य’ पदोंसे ‘मत्कर्मकृत’ की ओर लक्ष्य है।
(२) ‘मत्पराः’ पदसे ‘मत्परमः’ का संकेत है।
(३) ‘अनन्येनैव योगेन’ पदोंमें ‘मद्भक्तः’ का लक्ष्य है।
(४) भगवान्में ही अनन्यतापूर्वक लगे रहनेके कारण उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती; अतः वे ‘संगवर्जितः’ हैं।
(५) कहीं भी आसक्ति न रहनेके कारण उनके मनमें किसीके प्रति भी वैर, द्वेष, क्रोध आदिका भाव नहीं रहता, इसलिये ‘निर्वैरः’ पदका भाव भी इसीके अन्तर्गत आ जाता है। परन्तु भगवान्ने इसे महत्त्व देनेके लिये आगे तेरहवें श्लोकमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें सबसे पहले ‘अद्वेष्टा’ पदका प्रयोग किया है। अतः साधकको किसीमें किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं रखना चाहिये।
‘ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य’—अब
- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मोति परमात्मेति भगवानिति शब्दोते ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १।२।११)
‘तत्त्वज्ञ महापुरुष उस ज्ञानस्वरूप एवं अद्वितीय तत्त्वको ही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन नामोंसे कहते हैं।’
८२०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
यहाँसे निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सगुणोपासनाकी सुगमता बतानेके लिये ‘तु’ पदसे प्रकरण-भेद करते हैं।
यद्यपि ‘कर्मणि’ पद स्वयं ही बहुवचनान्त होनेसे सम्पूर्ण कर्मोंका बोध कराता है, तथापि इसके साथ ‘सर्वाणि’ विशेषण देकर मन, वाणी, शरीरसे होनेवाले सभी लौकिक (शरीर-निर्वाह और आजीविका-सम्बन्धी) एवं पारमार्थिक (जप-ध्यान-सम्बन्धी) शास्त्रविहित कर्मोंका समावेश किया गया है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)।
यहाँ ‘मयि सन्यस्य’ पदोंसे भगवान्का आशय क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करनेका नहीं है। कारण कि एक तो स्वरूपसे कर्मोंका त्याग सम्भव नहीं (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ और अठारहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। दूसरे, यदि सगुणोपासक मोहपूर्वक शास्त्रविहित क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करता है, तो उसका यह त्याग ‘तामस’ होगा (गीता—अठारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और यदि दुःखरूप समझकर शारीरिक क्लेशके भयसे वह उनका त्याग करता है, तो यह त्याग ‘राजस’ होगा (गीता—अठारहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। अतः इस रीतिसे त्याग करनेपर कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूटेगा। कर्मबन्धनसे मुक्त होनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करे; क्योंकि ममता, आसक्ति और फलेच्छासे किये गये कर्म ही बाँधनेवाले होते हैं।
यदि साधकका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति होता है, तो वह पदार्थोंकी इच्छा नहीं करता और अपने-आपको भगवान्का समझनेके कारण उसकी ममता शरीरादिसे हटकर एक भगवान्में ही हो जाती है। स्वयं भगवान्के अपित होनेसे उसके सम्पूर्ण कर्म भी भगवदपित हो जाते हैं।
भगवान्के लिये कर्म करनेके विषयमें कई प्रकार हैं, जिनको गीतामें ‘मदपंण कर्म’, ‘मदर्थ कर्म’ और ‘मत्कर्म’ नामसे कहा गया है।
१—‘मदपंण कर्म’ उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका उद्देश्य पहले कुछ और हो; किन्तु कर्म करते समय अथवा कर्म करनेके बाद उनको भगवान्के अर्पण कर दिया जाय।
२—‘मदर्थ कर्म’ वे कर्म हैं, जो आरम्भसे ही भगवान्के लिये किये जायँ अथवा जो भगवत्सेवारूप हों। भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करना भगवान्की आज्ञा मानकर कर्म करना, और भगवान्की प्रसन्नताके लिये कर्म
करना—ये सभी भगवदर्थ कर्म हैं।
३—भगवान्का ही काम समझकर सम्पूर्ण लौकिक (व्यापार, नौकरी आदि) और भगवत्सम्बन्धी (जप, ध्यान आदि) कर्मोंको करना ‘मत्कर्म’ है।
वास्तवमें कर्म कैसे भी किये जायँ, उनका उद्देश्य एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही होना चाहिये।
उपर्युक्त तीनों ही प्रकारों—(मदपंण-कर्म, मदर्थ-कर्म, मत्कर्म—)से सिद्धि प्राप्त करनेवाले साधकका कर्मोंसे किंचित्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि उसमें न तो फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान है और न पदार्थोंमें और शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंमें ममता ही है। जब कर्म करनेके साधन शरीर, मन, बुद्धि आदि ही अपने नहीं हैं, तो फिर कर्मोंमें ममता हो ही कैसे सकती है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही वास्तविक समर्पण है। सिद्ध पुरुषोंकी क्रियाओंका स्वतः ही समर्पण होता है और साधक पूर्ण समर्पणका उद्देश्य रखकर वैसे ही कर्म करनेकी चेष्टा करता है।
जैसे भक्तियोगी अपनी क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, ऐसे ही ज्ञानयोगी क्रियाओंको प्रकृतिसे हुई समझकर अपनेको उनसे सर्वथा असंग और निर्लिप्त अनुभव करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
‘मत्पराः’—परायण होनेका अर्थ है—भगवान्को परमपूज्य और सर्वश्रेष्ठ समझकर भगवान्के प्रति समर्पण-भावसे रहना। सर्वथा भगवान्के परायण होनेसे सगुण-उपासक अपने-आपको भगवान्का यन्त्र समझता है। अतः शुभ क्रियाओंको वह भगवान्के द्वारा करवायी हुई मानता है तथा संसारका उद्देश्य न रहनेके कारण उसमें भोगोंकी कामना नहीं रहती और कामना न रहनेके कारण उससे अशुभ क्रियाएँ होती ही नहीं।
‘अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते’—इन पदोंमें इष्ट-सम्बन्धी और उपाय-सम्बन्धी—दोनों प्रकारकी अनन्यताका संकेत है अर्थात् उन भक्तोंके इष्ट भगवान् ही हैं; उनके सिवाय अन्य कोई साध्य उनकी दृष्टिमें है ही नहीं और उनकी प्राप्तिके लिये आश्रय भी उन्हींका है। वे भगवत्कृपासे ही साधनकी सिद्धि मानते हैं, अपने पुरुषार्थ या साधनके बलसे नहीं। वे उपाय भी भगवान्को मानते हैं और उपेय भी। वे एक भगवान्का ही लक्ष्य, ध्येय रखकर उपासना अर्थात् जप, ध्यान, कीर्तन आदि करते हैं।
‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’—इस प्रकार केवल भगवान्से ही सम्बन्ध मानना ‘अनन्ययोग’ है।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
८२९
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मव्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
पार्थ | = हे पार्थ ! | तेषाम् | = उन भक्तोंका | समुद्धरे | ---|---|---|---|---|--- मयि | = मुझमें | अहम् | = मैं | नचिरात् | = शीघ्र ही आवेशित- | | मृत्युसंसार- | | समुद्धर्ता | = उद्धार करनेवाला चेतसाम् | = आविष्ट चित्तवाले | सागरात् | = मृत्युरूप संसार- | भवामि | = बन जाता हूँ।
व्याख्या —'तेषामहं समुद्धर्ता ..... मव्यावेशित-चेतसाम्'—जिन साधकोंका लक्ष्य, उद्देश्य, ध्येय भगवान् ही बन गये हैं और जिन्होंने भगवान्में ही अनन्य प्रेमपूर्वक अपने चित्तको लगा दिया है तथा जो स्वयं भी भगवान्में ही लग गये हैं, उन्हींके लिये यहाँ 'मव्यावेशितचेतसाम्' पद आया है।
जैसे समुद्रमें जल-ही-जल होता है, ऐसे ही संसारमें मौत-ही-मौत है। संसारमें उत्पन्न होनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो कभी क्षणभरके लिये भी मौतके थपेड़ोंसे बचती हो अर्थात् उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण मौतके तरफ ही जा रही है। इसलिये संसारको 'मृत्यु-संसार-सागर' कहा गया है।
मनुष्यमें अनुकूल और प्रतिकूल—दोनों वृत्तियाँ रहती हैं। संसारकी घटना, परिस्थिति तथा प्राणी-पदार्थमें अनुकूल-प्रतिकूल वृत्तियाँ राग-द्वेष उत्पन्न करके मनुष्यको संसारमें बाँध देती हैं (गीता—सातवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। यहाँतक देखा जाता है कि साधक भी सम्प्रदाय-विशेष और संत-विशेषमें अनुकूल-प्रतिकूल भावना करके राग-द्वेषके शिकार बन जाते हैं, जिससे वे संसार-समुद्रसे जल्दी पार नहीं हो पाते। कारण कि तत्त्वको चाहनेवाले साधकके लिये साम्प्रदायिकताका पक्षपात बहुत बाधक है।
परिशिष्ट भाव —छठे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने सब तरहके सामान्य साधकोंके लिये अपने द्वारा अपना उद्धार करनेकी बात कही थी—'उद्धरेदात्मनात्मानम्' और यहाँ कहते हैं कि भक्तोंका उद्धार मैं करता हूँ—'तेषामहं समुद्धर्ता'। इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक साधक आरम्भमें स्वयं ही साधनमें लगता है। साधनमें लगनेवालोंमें जो साधक भगवान्के आश्रित होता है, उसका उद्धार भगवान् करते हैं; क्योंकि उसका भगवान्पर ही भरोसा होता है कि मेरा उद्धार
१-उदाहरणार्थ—'निर्दुःखः' (१।४५); 'निर्दुःखो हि महाबाहो' (५।३); 'ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः' (७।२८); 'द्वन्द्वैर्विमुक्ताः' (९।५५); 'न द्वेष्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते' (१८।१०); 'रागद्वेषौ व्युदस्य च' (१८।५९)।
२-'समुद्धर्ता भवामि' पदोंके अन्तर्गत भगवान्ने ये भाव भी समझने चाहिये कि वह सगुणोपासक मेरी कृपासे साधनकी सब विघ्न-बाधाओंको पार करके मेरी कृपासे ही मेरी प्राप्ति कर लेता है (गीता—अठारहवें अध्यायके छपनवेंसे अड़ानवें श्लोकतक); साधनकी कमीको पूरा करके मैं उसे अपनी प्राप्ति करा देता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); उनके अन्तःकरणमें स्थित हुआ तत्त्वज्ञानसे उनके अज्ञानजनित अन्धकारका नाश कर देता हूँ (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक) और उन्हें सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देता हूँ (गीता—अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)।
सम्प्रदायका मोहपूर्वक आग्रह मनुष्यको बाँधता है। इसलिये गीतामें भगवान्ने जगह-जगह इन द्वन्द्वों-(राग और द्वेष-) से छूटनेके लिये विशेष जोर दिया है।
यदि साधक भक्त अपनी सारी अनुकूलताएँ भगवान्में कर ले अर्थात् एकमात्र भगवान्से ही अनन्य प्रेमका सम्बन्ध जोड़ ले और सारी प्रतिकूलताएँ संसारमें कर ले अर्थात् संसारकी सेवा करके अनुकूलताकी इच्छासे विमुख हो जाय, तो वह इस संसार-बन्धनसे बहुत जल्दी मुक्त हो सकता है। संसारमें अनुकूल और प्रतिकूल वृत्तियोंका होना ही संसारमें बँधना है।
भगवान्का यह सामान्य नियम है कि जो जिस भावसे उनकी शरण लेता है, उसी भावसे भगवान् भी उसको आश्रय देते हैं—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४।११)। अतः वे कहते हैं कि यद्यपि मैं सबमें समभावसे स्थित हूँ—'समोऽहं सर्वभूतेषु' (गीता ९।२९), तथापि जिनका एकमात्र प्रिय मैं हूँ, जो मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्म करते हैं और मेरे परायण होकर नित्य-निरन्तर मेरे ही ध्यान-जप-चिन्तन आदिमें लगे रहते हैं, ऐसे भक्तोंका मैं स्वयं मृत्यु-संसारसागरसे बहुत जल्दी और सम्यक् प्रकारसे उद्धार कर देता हूँ।
८२२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
वे ही करेंगे। वह अपने उद्धारकी चिन्ता न करके केवल भगवान्के भजनमें ही लगा रहता है। उसके साधन और साध्य भगवान् ही होते हैं। परन्तु ज्ञानमार्गमें चलनेवाला अपना उद्धार स्वयं करता है।
स्वरूप-बोध होनेपर भक्ति प्राप्त हो जाय—यह नियम नहीं है, पर भक्ति प्राप्त होनेपर स्वरूप-बोध भी हो जाता है, इसलिये भगवान्ने कहा है—
मम दरसन फल परम अनुपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥
(मानस, अरण्य० ३६।५)
भगवान् अपने भक्तोंको कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों दे देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवों-ग्यारहवों श्लोक); क्योंकि भगवान्का स्वरूप समग्र है।
देहाभिमानके कारण ज्ञानमार्गके साधकका चित्त अव्यक्तमें 'आसक्त' होता है—'अव्यक्तासक्तचेतसाम्' (गीता १२।५)। पर भक्तका चित्त भगवान्में 'आविष्ट' होता है—'मध्यावेशितचेतसाम्'। ज्ञानमें विवेक मुख्य है, भक्तिमें विश्वास मुख्य है। ज्ञानमें अपरा प्रकृति त्याज्य होती है, भक्तिमें वह भगवत्स्वरूप होती है।
सम्बन्ध—भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुण-उपासकोंको श्रेष्ठ योगी बताया तथा छठे और सातवें श्लोकमें यह बात कही कि ऐसे भक्तोंका मैं शीघ्र उद्धार करता हूँ। इसलिये अब भगवान् अर्जुनको ऐसा श्रेष्ठ योगी बननेके लिये पहले आठवें श्लोकमें समर्पणयोगरूप साधनका वर्णन करके फिर नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः अभ्यासयोग, भगवर्द्ध कर्म और सर्वकर्मफलत्यागरूप साधनोंका वर्णन करते हैं।
मध्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मध्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ ८॥
| मयि | = (तू) मुझमें | एव | = ही | मयि | = मुझमें |
|---|---|---|---|---|---|
| मनः | = मनको | बुद्धिम् | = बुद्धिको | एव | = ही |
| आधत्स्व | = स्थापन कर | निवेशय | = प्रविष्ट कर; | निवसिष्यसि | = निवास करेगा— |
| (और) | अतः | = इसके | संशयः, न | = (इसमें) संशय | |
| मयि | = मुझमें | ऊर्ध्वम् | = बाद (तू) | नहीं है। |
व्याख्या —'मध्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय'—भगवान्के मतमें वे ही पुरुष उत्तम योगवेत्ता हैं, जिनको भगवान्के साथ अपने नित्ययोगका अनुभव हो गया है। सभी साधकोंको उत्तम योगवेत्ता बनानेके उद्देश्यसे भगवान् अर्जुनको निमित्त बनाकर यह आज्ञा देते हैं कि मुझ परमेश्वरको ही परमश्रेष्ठ और परम प्रापणीय मानकर बुद्धिको मेरेमें लगा दे और मेरेको ही अपना परम प्रियतम मानकर मनको मेरेमें लगा दे।
भगवान्में हमारी स्वतःसिद्ध स्थिति (नित्ययोग) है; परन्तु भगवान्में मन-बुद्धिके न लगनेके कारण हमें भगवान्के साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्धका अनुभव नहीं होता। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मन-बुद्धिको मेरेमें लगा, फिर तू मेरेमें ही निवास करेगा (जो पहलेसे ही है) अर्थात् तुझे मेरेमें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जायगा।
मन-बुद्धि लगानेका तात्पर्य यह है कि अबतक मनुष्य
जिस मनसे जड़ संसारमें ममता, आसक्ति, सुख-भोगकी इच्छा, आशा आदिके कारण बार-बार संसारका ही चिन्तन करता रहा है और बुद्धिसे संसारमें ही अच्छे-बुरेका निश्चय करता रहा है, उस मनको संसारसे हटाकर भगवान्में लगाये तथा बुद्धिके द्वारा दृढ़तासे निश्चय करे कि 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मेरे लिये सर्वोपरि, परमश्रेष्ठ एवं परम प्रापणीय भगवान् ही हैं।' ऐसा दृढ़ निश्चय करनेसे संसारका चिन्तन और महत्त्व समाप्त हो जायगा और एक भगवान्के साथ ही सम्बन्ध रह जायगा। यही मन-बुद्धिका भगवान्में लगाना है।
मन-बुद्धि लगानेमें भी बुद्धिका लगाना मुख्य है। किसी विषयमें पहले बुद्धिका ही निश्चय होता है और फिर बुद्धिके उस निश्चयको मन स्वीकार कर लेता है। साधन करनेमें भी पहले (उद्देश्य बनानेमें) बुद्धिकी प्रधानता होती है, फिर मनकी प्रधानता होती है। जिन पुरुषोंका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति नहीं है, उनके मन-बुद्धि भी, वे जिस विषयमें लगाना
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
८२३
चाहेंगे, उस विषयमें लग सकते हैं। उस विषयमें मन-बुद्धि लग जानेपर उन्हें सिद्धियाँ तो प्राप्त हो सकती हैं, पर (भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य न होनेसे) भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः साधकको चाहिये कि बुद्धिसे यह दृढ़ निश्चय कर ले कि 'मुझे भगवत्प्राप्ति ही करनी है।' इस निश्चयमें बड़ी शक्ति है। ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि होनेमें सबसे बड़ी बाधा है—भोग और संग्रहका सुख लेना। सुखकी आशासे ही मनुष्यकी वृत्तियाँ धन, मान-बड़ाई आदि पानेका उद्देश्य बनाती हैं, इसलिये उसकी बुद्धि बहुत भेदोंवाली तथा अनन्त हो जाती है (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालिसवाँ श्लोक)। परन्तु अगर भगवत्प्राप्तिका ही एक निश्चय हो, तो इस निश्चयमें इतनी पवित्रता और शक्ति है कि दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषको भी भगवान् साधु माननेके लिये तैयार हो जाते हैं! इस निश्चयमात्रके प्रभावसे वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परमशान्ति प्राप्त कर लेता है (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक)।
'मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—ऐसा निश्चय (साधककी दृष्टिमें) बुद्धिमें हुआ प्रतीत होता है, परन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है। बुद्धिमें ऐसा निश्चय दीखनेपर भी साधकको इस बातका पता नहीं होता कि वह 'स्वयं' पहलेसे ही भगवान्में स्थित है। वह चाहे इस बातको न भी जाने, पर वास्तविकता यही है। 'स्वयं' भगवान्में स्थित होनेकी पहचान यही है कि इस सम्बन्धकी कभी विस्मृति नहीं होती। अगर यह केवल बुद्धिकी बात हो तो भूली भी जा सकती है, पर 'मैं'-पनकी बातको साधक कभी नहीं भूलता। जैसे, 'मैं विवाहित हूँ' यह 'मैं'-पनका निश्चय है, बुद्धिका नहीं। इसीलिये मनुष्य इस बातको कभी नहीं भूलता। अगर कोई यह निश्चय कर ले कि मैं अमुक गुरुका शिष्य हूँ, तो इस सम्बन्धके लिये कोई अभ्यास न करनेपर भी यह निश्चय उसके भीतर अटल रहता है। स्मृतिमें तो स्मृति रहती ही है, विस्मृतिमें भी सम्बन्धकी स्मृतिका अभाव नहीं होता; क्योंकि सम्बन्धका निश्चय 'मैं'-पनमें है। इस प्रकार संसारमें माना हुआ सम्बन्ध भी जब स्मृति और विस्मृति दोनों अवस्थाओंमें अटल रहता है, तब भगवान्के साथ जो सदासे ही नित्य-सम्बन्ध है, उसकी विस्मृति कैसे हो सकती है? अतः 'मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—इस प्रकार 'मैं'-पन (स्वयं-) के भगवान्में लग जानेसे मन-बुद्धि भी
स्वतः भगवान्में लग जाते हैं।
मन-बुद्धिमें अन्तःकरण-चतुष्टयका अन्तर्भाव है। मनके अन्तर्गत चित्तका और बुद्धिके अन्तर्गत अहंकारका अन्तर्भाव है। मन-बुद्धि भगवान्में लगनेसे अहंकारका आधार 'स्वयं' भगवान्में लग जायगा और परिणामस्वरूप 'मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं' ऐसा भाव हो जायगा। इस भावमें निर्विकल्प स्थिति होनेसे 'मैं'-पन भगवान्में लीन हो जायगा।
विशेष बात
साधारणतया अपना स्वरूप-(‘मैं’-पनका आधार ‘स्वयम्’) मन, बुद्धि, शरीर आदिके साथ दीखता है, पर वास्तवमें इनके साथ है नहीं। सामान्य रूपसे प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर सकता है कि बचपनसे लेकर अबतक शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब-के-सब बदल गये, पर मैं वही हूँ। अतः 'मैं बदलनेवाला नहीं हूँ' इस बातको आजसे ही दृढ़तापूर्वक मान लेना चाहिये (साधारणतया मनुष्य बुद्धिसे ही समझनेकी चेष्टा करता है, पर यहाँ स्वयंसे जाननेकी बात है)।
विचार करें—एक ओर अपना स्वरूप नहीं बदला, यह सभीका प्रत्यक्ष अनुभव है और आस्तिकों एवं भगवान्में श्रद्धा रखनेवालोंके भगवान् भी कभी नहीं बदले, दूसरी ओर शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि सब-के-सब बदल गये और संसार भी बदलता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है। इससे सिद्ध हुआ कि कभी न बदलनेवाले ‘स्वयम्’ और ‘भगवान्’ दोनों एक जातिके हैं, जब कि निरन्तर बदलनेवाले ‘शरीर’ और ‘संसार’ दोनों एक जातिके हैं। न बदलनेवाले ‘स्वयम्’ और ‘भगवान्’ दोनों ही व्यक्तृपसे नहीं दीखते, जब कि बदलनेवाले शरीर और संसार—दोनों ही व्यक्तृपसे प्रत्यक्ष दीखते हैं। बदलनेवाले मन-बुद्धि इन्द्रियाँ-शरीरादिको पकड़कर ही ‘स्वयम्’ अपनेको बदलनेवाला मान लेता है। वास्तवमें ‘अहं’ का जो सत्तारूपसे आधार (‘स्वयम्’) है, वह कभी नहीं बदलता; क्योंकि वह परमात्माका अंशस्वरूप है।
वास्तवमें 'मैं क्या हूँ' इसका तो पता नहीं, पर 'मैं हूँ' इस होनेपनमें थोड़ा भी सन्देह नहीं है। जैसे संसार प्रत्यक्ष दीखता है, ऐसे ही 'मैं'-पनका भी भान होता है। इसलिये तत्त्वतः 'मैं' क्या है, इसकी खोज करना साधकके लिये बहुत उपयोगी है।
'मैं' क्या है, इसका तो पता नहीं; परन्तु संसार (शरीर)
८२४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
क्या है, इसका तो पता है ही। संसार (शरीर) उत्पत्ति-विनाशवाला है, सदा एकरस रहनेवाला नहीं है—यह सबका अनुभव है। इस अनुभवको निरन्तर जाग्रत् रखना चाहिये। यह नियम है कि 'संसार' और 'मैं'—दोनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक-ठीक ज्ञान होनेपर दूसरेके स्वरूपका ज्ञान अपने-आप हो जाता है।
'मैं' का प्रकाशक और आधार (अपना स्वरूप) चेतन और नित्य है। इसलिये उत्पत्ति-विनाशवाले जड़ संसारसे स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है। स्वरूपका तो भगवान्से स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्धको पहचानना ही 'मैं' की वास्तविकताका अनुभव करना है। इस सम्बन्धको पहचान लेनेपर मन-बुद्धि स्वतः भगवान्में लग जायेंगे*।
'निवसिष्यसि मध्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः'—यहाँ 'अत ऊर्ध्वम्'—'पदोंका भाव यह है कि जिस क्षण मन-बुद्धि भगवान्में पूरी तरह लग जायेंगे अर्थात् मन-बुद्धिमें किंचिमात्र भी अपनापन नहीं रहेगा, उसी क्षण भगवत्प्राप्ति हो जायगी। ऐसा नहीं है कि मन-बुद्धि पूर्णतया लगनेके बाद भगवत्प्राप्तिमें कालका कोई व्यवधान रह जाय।
भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! मुझमें ही मन-बुद्धि लगानेपर तू मुझमें निवास करेगा, इसमें संशय नहीं है। इससे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनके हृदयमें कुछ संशय है, तभी भगवान् 'न संशयः' पद देते हैं। यदि संशयकी सम्भावना न होती, तो इस पदको देनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वह संशय क्या है? मनुष्यके हृदयमें प्रायः यह बात बैठी हुई है कि कर्म अच्छे होंगे, आचरण अच्छे होंगे, एकात्ममें ध्यान लगायेंगे, तभी परमात्माकी प्राप्ति होगी, और यदि इस प्रकार साधन नहीं कर पाये, तो परमात्मप्राप्ति असम्भव है। इस भ्रमको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरी प्रापिका उद्देश्य रखकर मन-बुद्धिको मेरेमें लगाना जितना कीमती है, ये सब साधन मिलकर भी उतने कीमती नहीं हो सकते। अतः मन-बुद्धिको मेरेमें लगानेसे निश्चय ही मेरी प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है—'मध्यर्पित-
मनोबुद्धिर्माभैवैव्यस्यसंशयम् ॥' (गीता ८।७)।
जबतक बुद्धिमें संसारका महत्त्व है और मनसे संसारका चिन्तन होता रहता है, तबतक (परमात्मामें स्वाभाविक स्थिति होते हुए भी) अपनी स्थिति संसारमें ही समझनी चाहिये। संसारमें स्थिति अर्थात् संसारका संग
रहनेसे ही संसारचक्रमें घूमना पड़ता है।
उपर्युक्त पदोंसे अर्जुनका संशय दूर करते हुए भगवान् कहते हैं कि तू यह चिन्ता मत कर कि मेरेमें मन-बुद्धि सर्वथा लग जानेपर तेरी स्थिति कहाँ होगी। जिस क्षण तेरे मन-बुद्धि एकमात्र मेरेमें सर्वथा लग जायेंगे, उसी क्षण तू मेरेमें ही निवास करेगा।
मन-बुद्धि भगवान्में लगानेके सिवाय साधकके लिये और कोई कर्तव्य नहीं है। मन भगवान्में लगानेसे संसारका चिन्तन नहीं होगा और बुद्धि भगवान्में लगानेसे साधक संसारके आश्रयसे रहित हो जायगा। संसारका किसी प्रकारका चिन्तन और आश्रय न रहनेसे भगवान्का ही चिन्तन और भगवान्का ही आश्रय होगा, जिससे भगवान्की ही प्राप्ति होगी।
यहाँ मनके साथ 'चित्त' को तथा बुद्धिके साथ 'अहम्' को भी ले लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्में चित्त और अहम्को लगे बिना 'तू मेरेमें ही निवास करेगा' यह कहना सार्थक नहीं होगा।
सम्पूर्ण सृष्टिके एकमात्र ईश्वर-(परमात्मा-) का ही साक्षात् अंश यह जीवात्मा है। परन्तु यह इस सृष्टिके एक तुच्छ अंश (शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदि)-को अपना मानकर इनको अपनी ओर खींचता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) अर्थात् इनका स्वामी बन बैठता है। वह (जीवात्मा) इस बातको सर्वथा भूल जाता है कि ये मन-बुद्धि आदि भी तो उसी परमात्माकी समष्टि सृष्टिके ही अंश हैं। मैं उसी परमात्माका अंश हूँ और सर्वदा उसीमें स्थित हूँ, इसको भूलकर वह अपनी अलग सत्ता मानने लगता है। जैसे, एक करोड़पतिका मूर्ख पुत्र उससे अलग होकर अपनी विशाल कोठीके एक-दो कमरोंपर अपना अधिकार जमाकर अपनी उन्नति समझ लेता है, पर जब उसे अपनी भूल समझमें आ जाती है, तब उसे करोड़पतिका उत्तराधिकारी होनेमें कठिनाई नहीं होती। इसी लक्ष्यसे भगवान् कहते हैं कि जब तू इन व्यष्टि मन-बुद्धिको मेरे अर्पण कर देगा (जो स्वतः ही मेरे हैं; क्योंकि मैं ही समष्टि मन-बुद्धिका स्वामी हूँ) तो स्वयं इनसे मुक्त होकर (वास्तवमें पहलेसे ही मेरा अंश और मेरेमें ही स्थित होनेके कारण) निःसन्देह मेरेमें ही निवास करेगा।
- चेतन और अविनाशी स्वरूप-(आत्मा-) को ही 'स्वयं', 'अहम्' का आधार, वास्तविक 'मैं', 'मैं' का प्रकाशक, आधार आदि नामोंसे कहा जाता है।
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
८२५
भगवान्ने सातवें अध्यायके चौथे श्लोकमें पाँच महाभूत, मन, बुद्धि और अहंकार—इस प्रकार आठ भागोंमें विभक्त अपनी 'अपरा (जड़) प्रकृति' का वर्णन किया और पाँचवें श्लोकमें इससे भिन्न अपनी जीवभूता 'परा (चेतन) प्रकृति' का वर्णन किया। इन दोनों प्रकृतियोंको भगवान्ने अपनी कहा; अतः इन दोनोंके स्वामी भगवान् हैं। इन दोनोंमें, जड़ प्रकृतिका कार्य होनेसे 'अपरा प्रकृति' तो निकृष्ट है और चेतन परमात्माका अंश होनेसे 'परा प्रकृति' श्रेष्ठ है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। परन्तु परा प्रकृति (जीव) भूलसे अपरा प्रकृतिको अपनी तथा अपने लिये मानकर उससे बँध जाती है तथा जन्म-मरणके चक्रमें पड़ जाती है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान् इस श्लोकमें यह कह रहे हैं कि मन-बुद्धिरूप अपरा प्रकृतिसे अपनापन हटाकर इनको मेरी ही मान ले, जो वास्तवमें मेरी ही है। इस प्रकार मन-बुद्धिको मेरे अर्पण करनेसे इनके साथ भूलसे माना हुआ सम्बन्ध टूट जायगा और तरेको मेरे साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जायगा।
भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्की प्राप्ति किसी साधनविशेषसे नहीं होती। कारण कि ध्यानादि साधन शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके आश्रयसे होते हैं। शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ आदि प्रकृतिके कार्य होनेसे जड़ वस्तुएँ हैं। जड़ पदार्थोंके द्वारा चिन्मय भगवान् खरीदे नहीं जा सकते; क्योंकि प्रकृतिके सम्पूर्ण पदार्थ मिलकर भी चिन्मय परमात्मके समान कभी नहीं हो सकते।
सांसारिक पदार्थ कर्म (पुरुषार्थ) करनेसे ही प्राप्त होते हैं; अतः साधक भगवान्की प्राप्तिको भी स्वाभाविक
परिशिष्ट भाव— मन-बुद्धि भगवान्की अपरा प्रकृति है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। भगवान्की प्रकृति अर्थात् स्वभाव होते हुए भी अपरा प्रकृति भगवान्से भिन्न स्वभाववाली (जड़ एवं परिवर्तनशील) है। परन्तु परा प्रकृति (जीवात्मा) भगवान्से भिन्न स्वभाववाली नहीं है। इसलिये भगवान्के साथ साधर्म्य प्रकृतिका नहीं है, प्रत्युत जीव-(स्वयं-) का है—'मम साधर्म्यमागताः ' (गीता १४।२)। मन-बुद्धि प्रकृतिकी जातिके हैं अर्थात् वे प्रकृतिके अंश हैं, पर हम स्वयं भगवान्के अंश हैं। अतः स्वयं और मन-बुद्धिमें जातीय भिन्नता है। आकर्षण एवं मिलन सजातीयतामें ही होता है, विजातीयतामें नहीं—यह नियम है। इसलिये मन-बुद्धि भगवान्में नहीं लग सकते, प्रत्युत स्वयं ही भगवान्में लग सकता है। मन-बुद्धिकी स्वतन्त्र सत्ता मान लेनेसे साधकसे यह भूल होती है कि वह स्वयं अलग रहकर मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेका उद्योग करता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि भगवान्में स्वयं ही लगता है, मन-बुद्धि नहीं लगते। जब स्वयं भगवान्में लगता है, तब मन-बुद्धि अपने-आप छूट जाते हैं अर्थात् उनकी सत्ता रहती ही नहीं, प्रत्युत एक भगवान् ही रह जाते हैं। कारण कि वास्तवमें मन-बुद्धिकी सत्ता थी ही नहीं, जीवने ही उनको सत्ता दी थी—
ही कर्मासे होनेवाली मान लेता है। इसलिये भगवत्प्राप्तिके सम्बन्धमें भी वह यही सोचता है कि मेरे द्वारा किये जानेवाले साधनसे ही भगवत्प्राप्ति होगी।
मनु-शतरूपा, पार्वती आदिको तपस्यासे ही अपने इष्टकी प्राप्ति हुई—इतिहास-पुराणादिमें इस प्रकारकी कथाएँ पढ़ने-सुननेसे साधकके अन्तःकरणमें ऐसी छाप पड़ जाती है कि साधनके द्वारा ही भगवान् मिलते हैं और उसकी यह धारणा क्रमशः दृढ़ होती रहती है। परन्तु साधनसे ही भगवान् मिलते हैं, ऐसी बात वस्तुतः है नहीं। तपस्यादि साधनोंसे जहाँ भगवान्की प्राप्ति हुई दीखती है, वहाँ भी वह जड़के साथ माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद होनेसे ही हुई है, न कि साधनोंसे। साधनकी सार्थकता असाधन-(जड़के साथ माने हुए सम्बन्ध-) का त्याग करनेमें ही है। भगवान् सबको सदा-सर्वदा स्वतः प्राप्त हैं ही; किन्तु जड़के साथ माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग होनेपर ही उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। इसलिये भगवत्प्राप्ति जड़ताके द्वारा नहीं, प्रत्युत जड़ताके त्याग-(सम्बन्ध-विच्छेद-) से होती है। अतः जो साधक अपने साधनके बलसे भगवत्प्राप्ति मानते हैं, वे बड़ी भूलमें हैं। साधनकी सार्थकता केवल जड़ताका त्याग करानेमें है—इस रहस्यको न समझकर साधनमें ममता करने और उसका आश्रय लेनेसे साधकका जड़के साथ सम्बन्ध बना रहता है। जबतक हृदयमें जड़ताका किंचिन्मात्र भी आदर है, तबतक भगवत्प्राप्ति कठिन है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह साधनकी सहायतासे जड़ताके साथ सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर ले।
एकमात्र भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाले साधनसे जड़ताका सम्बन्ध सुगमतापूर्वक छूट जाता है।
८२६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५), ‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५।७)। इसलिये गीतामें ‘मव्यासक्तमनाः’ (७।१) ‘मन्मना भव’ (१।३४, १८।६५), ‘मव्यावेश मनो ये माम्’ (१२।२), ‘मव्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय’ (१२।८), ‘मच्चित्तः सततं भव’ (१८।५७) आदि पदोंमें जो मन लगानेकी बात आयी है, वह वास्तवमें स्वयंको भगवान्में लगानेका ही उपाय है। भगवान्में मन-बुद्धि लगानेसे मन-बुद्धि तो नहीं लगते, पर स्वयं लग जाता है—‘निवसिष्यसि मव्येव’। कारण कि जीवका स्वभाव है कि वह वहीं लगता है, जहाँ उसके मन-बुद्धि लगते हैं। जैसे सुई जहाँ जाती है, धागा वहीं जाता है, ऐसे ही मन-बुद्धि जहाँ जाते हैं, स्वयं वहीं जाता है। संसारको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे मन-बुद्धि संसारमें लग गये और संसारमें मन-बुद्धि लगनेसे जीव स्वयं संसारमें लग गया, इसलिये जीवको संसारसे हटानेके लिये भगवान् मन-बुद्धिको अपनेमें लगानेकी आज्ञा देते हैं। जैसे सुनार सोनेको शुद्ध करनेके लिये उसको अग्निमें तपाता है तो सोनेमें मिला हुआ विजातीय पदार्थ (खोट) अलग हो जाता है और शुद्ध सोना रह जाता है, ऐसे ही भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि अलग हो जाते हैं और स्वयं भगवान्में मिल जाता है अर्थात् केवल भगवान् रह जाते हैं। श्रीमद्भगवतमें भगवान् कहते हैं—
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते। मामनुस्मरतश्चित्तं मव्येव प्रविलीयते ॥
(११।१४।२७)
विषयोंका चिन्तन करनेसे मन विषयोंमें फँस जाता है और मेरा स्मरण करनेसे मन मेरेमें विलीन हो जाता है अर्थात् मनकी सत्ता रहती ही नहीं।
तात्पर्य है कि भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि भगवान्में लगते नहीं, प्रत्युत लीन हो जाते हैं; क्योंकि मूलमें अपरा प्रकृति भगवान्का ही स्वभाव है। भगवान्में लीन होनेपर मन-बुद्धिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’। दूसरे शब्दोंमें, मन-बुद्धि संसारसे तो हट गये, पर भगवान्को पकड़ सके नहीं, इसलिये उनकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं, केवल भगवान् रह जाते हैं।
ज्ञानमें स्वरूप मुख्य है और भक्तिमें भगवान् मुख्य हैं। इसलिये ज्ञानी स्वरूपमें स्थित होता है—‘समदुःखसुरः स्वस्थः’ (गीता १४।२४) और भक्त भगवान्में स्थित होता है—‘निवसिष्यसि मव्येव’। स्वरूपमें स्थित होनेपर अखण्डरसका अनुभव होता है और भगवान्में स्थित होनेपर प्रतिक्षण वर्धमान अनन्तरसका अनुभव होता है। भगवान्में स्थित होनेपर फिर भक्त सब जगह भगवान्को ही देखता है (गीता—छठे अध्यायका तीसवाँ श्लोक); क्योंकि उसका पहलेसे ही यह भाव है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं।
इस श्लोकमें यह क्रम बताया गया है कि भगवान्में पहले साधकका मन लगता है, फिर बुद्धि लगती है, फिर स्वयं लगता है। स्वयं लगनेसे अहम् मिट जाता है।
प्रेममें मन लगता है और श्रद्धामें बुद्धि लगती है। भगवान्में मन-बुद्धि लगानेका तात्पर्य है—भगवान्में प्रेम और श्रद्धा होना अर्थात् संसारकी प्रियता और महत्ता न रहकर केवल भगवान्में ही प्रियता और महत्ता हो जाना।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छापत्तुं धनञ्जय ॥ ९ ॥
| अथ | = अगर (तू) | करनेमें | अभ्यासयोगेन | = अभ्यासयोगके |
|---|---|---|---|---|
| चित्तम् | = मनको | न, शक्नोषि | = अपनेको समर्थ | द्वारा (तू) |
| मयि | = मुझमें | नहीं मानता, | माम् | |
| स्थिरम् | = अचलभावसे | ततः | = तो | आप्नुम् |
| समाधातुम् | = स्थिर (अर्पण) | धनञ्जय | = हे धनंजय! | इच्छ |
व्याख्या—‘अथ चित्तं समाधातुं ..... मामिच्छापत्तुं’ श्लोकका पीछेके श्लोकमें वर्णित साधनसे सम्बन्ध है, धनंजय—यहाँ ‘चित्तम्’ पदका अर्थ ‘मन’ है। परन्तु इस, इसलिये ‘चित्तम्’ पदसे यहाँ मन और बुद्धि दोनों ही लेना
श्लोक ९ ]
- साधक-संजीवनी *
८२७
युक्तिसंगत है।
भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अगर तू मन-बुद्धिको मेरेमें अचलभावसे स्थापित करनेमें अर्थात् मेरे अर्पण करनेमें अपनेको असमर्थ मानता है, तो अभ्यासयोगके द्वारा मेरेको प्राप्त करनेकी इच्छा कर।
‘अभ्यास’ और ‘अभ्यासयोग’ पृथक्-पृथक् हैं। किसी लक्ष्यपर चित्तको बार-बार लगानेका नाम ‘अभ्यास’ है और समताका नाम ‘योग’ है। समता रखते हुए अभ्यास करना ही ‘अभ्यासयोग’ कहलाता है। केवल भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे किया गया भजन, नाम-जप आदि ‘अभ्यासयोग’ है।
अभ्यासके साथ योगका संयोग न होनेसे साधकका उद्देश्य संसार ही रहेगा। संसारका उद्देश्य होनेपर स्त्री-पुत्र, धन-सम्पत्ति, मान-बड़ाई, नीरोगता, अनुकूलता आदिकी अनेक कामनाएँ उत्पन्न होंगी। कामनावाले पुरुषकी क्रियाओंके उद्देश्य भी (कभी पुत्र, कभी धन, कभी मान-बड़ाई आदि) भिन्न-भिन्न रहेंगे (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालिसर्वाँ श्लोक)। इसलिये ऐसे पुरुषकी क्रियामें योग नहीं होगा। योग तभी होगा, जब क्रियामात्रका उद्देश्य (ध्येय) केवल परमात्मा ही हो।
साधक जब भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर बार-बार नाम-जप आदि करनेकी चेष्टा करता है, तब उसके मनमें दूसरे अनेक संकल्प भी पैदा होते रहते हैं, अतः साधकको ‘मेरा ध्येय भगवत्प्राप्ति ही है’—इस प्रकारकी दृढ़ धारणा करके अन्य सब संकल्पोंसे उपराम हो जाना चाहिये।
‘मामिच्छान्तुम् ’ पदोंसे भगवान् ‘अभ्यासयोग’ को अपनी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताते हैं।
पीछेके श्लोकमें भगवान्ने अपनेमें मन-बुद्धि अर्पण करनेके लिये कहा। अब इस श्लोकमें अभ्यासयोगके लिये कहते हैं। इससे यह धारणा हो सकती है कि अभ्यासयोग भगवान्में मन-बुद्धि अर्पण करनेका साधन है; अतः पहले अभ्यासके द्वारा मन-बुद्धि भगवान्के अर्पण होंगे, फिर भगवान्की प्राप्ति होगी। परन्तु मन-बुद्धिको अर्पण करनेसे ही भगवत्प्राप्ति होती हो, ऐसा नियम नहीं है। भगवान्के
परिशिष्ट भाव— छठे अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें तो केवल ‘अभ्यास’ की बात आयी थी; परन्तु यहाँ ‘अभ्यासयोग’ की बात आयी है, जिससे कल्याण हो जाता है। केवल अभ्यास हो, योग न हो तो एक स्थिति (अवस्था) बनेगी, पर कल्याण नहीं होगा।
मनका निरोध करना अथवा मनको बार-बार भगवान्में लगाना अभ्यास है। अभ्यासयोगमें मनका निरोध नहीं है, प्रत्युत मनसे सम्बन्ध-विच्छेद है—‘समत्वं योग उच्यते ’ (गीता २।४८)।
कथनका तात्पर्य यह है कि यदि उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही हो अर्थात् उद्देश्यके साथ साधककी पूर्ण एकता हो तो केवल ‘अभ्यास’ से ही उसे भगवत्प्राप्ति हो जायगी।
जब साधक भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे बार-बार नाम जप, भजन-कीर्तन, श्रवण आदिका अभ्यास करता है, तब उसका अन्तःकरण शुद्ध होने लगता है और भगवत्प्राप्तिकी इच्छा जाग्रत् हो जाती है। सांसारिक सिद्धि-असिद्धिमें सम होनेपर भगवत्प्राप्तिकी इच्छा तीव्र हो जाती है। भगवत्प्राप्तिकी तीव्र इच्छा होनेपर भगवान्से मिलनेके लिये व्याकुलता पैदा हो जाती है। यह व्याकुलता उसकी अवशिष्ट सांसारिक आसक्ति एवं अनन्त जन्मोंके पापोंको जला डालती है। सांसारिक आसक्ति तथा पापोंका नाश होनेपर उसका एकमात्र भगवान्में ही अनन्य प्रेम हो जाता है और वह भगवान्के वियोगको सहन नहीं कर पाता। जब भक्त भगवान्के बिना नहीं रह सकता, तब भगवान् भी उस भक्तके बिना नहीं रह सकते अर्थात् भगवान् भी उसके वियोगको नहीं सह सकते और उस भक्तको मिल जाते हैं।
साधकको भगवत्प्राप्तिमें देरी होनेका कारण यही है कि वह भगवान्के वियोगको सहन कर रहा है। यदि उसको भगवान्का वियोग असह्य हो जाय, तो भगवान्के मिलनेमें देरी नहीं होगी। भगवान्की देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिसे दूरी है ही नहीं। जहाँ साधक है, वहाँ भगवान् हैं ही। भक्तमें उत्कण्ठाकी कमीके कारण ही भगवत्प्राप्तिमें देरी होती है। सांसारिक सुखभोगकी इच्छाके कारण ही ऐसी आशा कर ली जाती है कि भगवत्प्राप्ति भविष्यमें होगी। जब भगवत्प्राप्तिके लिये व्याकुलता और तीव्र उत्कण्ठा होगी, तब सुख-भोगकी इच्छाका स्वतः नाश हो जायगा और वर्तमानमें ही भगवत्प्राप्ति हो जायगी।
साधकका यदि आरम्भसे ही यह दृढ़ निश्चय हो कि मेरेको तो केवल भगवत्प्राप्ति ही करनी है (चाहे लौकिक दृष्टिसे कुछ भी बने या बिगड़े) तो कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग—किसी भी मार्गसे उसे बहुत जल्दी भगवत्प्राप्ति हो सकती है।
८२८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमाप्स्यसि ॥ १० ॥
| अभ्यासे | = (अगर तू) | असि | = है, (तो) | कर्माणि | = कर्मोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| अभ्यास- (योग-) | मत्कर्मपरमः | = मेरे लिये कर्म | कुर्वन् | = करता हुआ | |
| में | करनेके परायण | अपि | = भी (तू) | ||
| अपि | = भी (अपनेको) | भव | = हो जा। | सिद्धिम् | = सिद्धिको |
| असमर्थः | = असमर्थ (पाता) | मदर्थम् | = मेरे लिये | अवाप्स्यसि | = प्राप्त हो जायगा। |
व्याख्या —‘अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव’—
यहाँ ‘अभ्यासे’ पदका अभिप्राय पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णित ‘अभ्यासयोग’ से है। गीताकी यह शैली है कि पहले कहे हुए विषयका आगे संक्षेपमें वर्णन किया जाता है। आठवें श्लोकमें भगवान्ने अपनेमें मन-बुद्धि लगानेके साधनको नवें श्लोकमें पुनः ‘चित्तं समाधातुम्’ पदोंसे कहा अर्थात् ‘चित्तम्’ पदके अन्तर्गत मन-बुद्धि दोनोंका समावेश कर लिया। इसी प्रकार नवें श्लोकमें आये हुए अभ्यासयोगके लिये यहाँ (दसवें श्लोकमें) ‘अभ्यासे’ पद आया है।
भगवान् कहते हैं कि अगर तू पूर्वश्लोकमें वर्णित अभ्यासयोगमें भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्म करनेके परायण हो जा। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण कर्मों- (वर्णाश्रमधर्मानुसार शरीरनिर्वाह और आजीविका-सम्बन्धी लौकिक एवं भजन, ध्यान, नाम-जप आदि पारमार्थिक कर्मों- ) का उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रह न होकर एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही हो। जो कर्म भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदज्ञानुसार किये जाते हैं, उनको ‘मत्कर्म’ कहते हैं। जो साधक इस प्रकार कर्मोंके परायण हैं, वे ‘मत्कर्मपरम’ कहे जाते हैं। साधकका अपना सम्बन्ध भी भगवान्से हो और कर्मोंका सम्बन्ध भी भगवान्के साथ रहे, तभी मत्कर्मपरायणता सिद्ध होगी।
साधकका ध्येय जब संसार (भोग और संग्रह) नहीं रहेगा, तब निषिद्ध क्रियाएँ सर्वथा छूट जायँगी; क्योंकि निषिद्ध क्रियाओंके अनुष्ठानमें संसारकी ‘कामना’ ही हेतु है (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। अतः भगवत्प्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधककी सम्पूर्ण क्रियाएँ शास्त्रविहित और भगवदर्थ ही होंगी।
‘मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमाप्स्यसि’— भगवान्ने जिस साधनकी बात इसी श्लोकके पूर्वार्धमें ‘मत्कर्मपरमो भव’ पदोंसे कही है, वही बात इन पदोंमें पुनः कही गयी है। भाव यह है कि केवल परमात्माका उद्देश्य होनेसे उस
साधककी और जगह स्थिति हो ही कैसे सकती है?
जिस प्रकार भगवान्ने आठवें श्लोकमें मन-बुद्धि अपनेमें अर्पण करनेके साधनको तथा नवें श्लोकमें अभ्यासयोगके साधनको अपनी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताया, उसी प्रकार यहाँ भगवान् ‘मत्कर्मपरमो भव’ (केवल मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो)—इस साधनको भी अपनी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बता रहे हैं।
जैसे धन-प्राप्तिके लिये व्यापार आदि कर्म करनेवाले मनुष्यको ज्यों-ज्यों धन प्राप्त होता है, त्यों-त्यों उसके मनमें धनका लोभ और कर्म करनेका उत्साह बढ़ता है, ऐसे ही साधक जब भगवान्के लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है, तब उसके मनमें भी भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा और साधन करनेका उत्साह बढ़ता रहता है। उत्कण्ठा तीव्र होनेपर जब उसको भगवान्का वियोग असह्य हो जाता है, तब सर्वत्र परिपूर्ण भगवान् उससे छिपे नहीं रहते। भगवान् अपनी कृपासे उसको अपनी प्राप्ति करा ही देते हैं। यदि साधकका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही है और सम्पूर्ण क्रियाएँ वह भगवान्के लिये ही करता है, तो इसका अभिप्राय यह है कि उसने अपनी सारी समझ, सामग्री, सामर्थ्य और समय भगवत्प्राप्तिके लिये ही लगा दिया। इसके सिवाय वह और कर भी क्या सकता है? भगवान् उस साधकसे इससे अधिक अपेक्षा भी नहीं रखते। अतः उसे अपनी प्राप्ति करा देते हैं। इसका कारण यह है कि भगवान् किसी साधन-विशेषसे खरीदे नहीं जा सकते। भगवान्के महत्त्वके सामने सृष्टिमात्रका महत्त्व भी कुछ नहीं है, फिर एक व्यक्तिके द्वारा अर्पित सीमित सामग्री और साधनसे उनका मूल्य चुकाया ही कैसे जा सकता है! अतः अपनी प्राप्तिके लिये भगवान् साधकसे इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी पूरी योग्यता, सामर्थ्य आदिको मेरी प्राप्तिमें लगा दे अर्थात् अपने पास बचाकर कुछ न रखे और इन योग्यता, सामर्थ्य आदिको अपना भी न समझे।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —अभ्यासकी अपेक्षा क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करना सुगम है। कारण कि अभ्यास तो नया काम है, जो करना पड़ता है, पर कर्म स्वतः होते हैं; क्योंकि कर्म करनेका स्वभाव पड़ा हुआ है। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है—‘कर्मणा बध्यते जन्तुः ’। इसलिये कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक भगवान्को प्राप्त हो जाता है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ-अठ्ठाईसवाँ श्लोक)।
‘मदर्थमपि ’ पदका तात्पर्य है कि आरम्भसे भगवान्के लिये ही कर्म किये जायँ।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
| अथ | = अगर | साधन- | को | यतात्मवान् | = मन-इन्द्रियोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| मद्योगम् | = मेरे योग- | अपि | = भी | वशमें करके | |
| (समता-) के | कर्तुम् | = करनेमें (अपनेको) | सर्वकर्मफल- | ||
| आश्रितः | = आश्रित हुआ | अशक्तः | = असमर्थ | त्यागम् | = सम्पूर्ण कर्मोंके |
| (तू) | (पाता) | फलकी इच्छाका | |||
| एतत् | = इस-(पूर्वश्लोकमें) | असि | = है, | त्याग | |
| कहे गये | ततः | = तो | कुरु | = कर। |
व्याख्या —‘अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योग- माश्रितः ’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने लिये ही सम्पूर्ण कर्म करनेसे अपनी प्राप्ति बतायी और अब इस श्लोकमें वे सम्पूर्ण कर्मोंके फलत्यागरूप साधनकी बात बता रहे हैं। वहाँ भगवान्के लिये समस्त कर्म करनेमें भक्तिकी प्रधानता होनेसे उसे ‘भक्तियोग’ कहेंगे और यहाँ सर्वकर्मफलत्यागमें केवल फलत्यागकी मुख्यता होनेसे इसे ‘कर्मयोग’ कहेंगे। इस प्रकार भगवत्प्राप्तिके ये दोनों ही स्वतन्त्र (पृथक्-पृथक्) साधन हैं।
इस श्लोकमें ‘मद्योगमाश्रितः ’ पदका सम्बन्ध ‘अथैतदप्यशक्तोऽसि ’ के साथ मानना ही ठीक मालूम देता है; क्योंकि यदि इसका सम्बन्ध ‘सर्वकर्मफलत्यागं कुरु ’ के साथ माना जाय, तो भगवान्के आश्रयकी मुख्यता हो जानेसे यहाँ ‘भक्तियोग’ ही हो जायगा। ऐसी दशामें दसवें श्लोकमें कहे हुए भक्तियोगके साधनसे इसकी भिन्नता नहीं रहेगी, जबकि भगवान् दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः ‘भक्तियोग’ और ‘कर्मयोग’—दो भिन्न-भिन्न साधन बताना चाहते हैं।
दूसरी बात, भगवान्ने इस श्लोकमें ‘यतात्मवान् ’ (मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके सहित शरीरपर विजय प्राप्त करनेवाला) पद भी दिया है। आत्मसंयमकी विशेष आवश्यकता कर्मयोगमें ही है; क्योंकि आत्मसंयमके बिना सर्वकर्म-फलत्याग होना असम्भव है। इसलिये भी ‘मद्योगमाश्रितः ’
पदका सम्बन्ध ‘अथैतदप्यशक्तोऽसि ’ के साथ मानना चाहिये, न कि सर्वकर्मफलत्याग करनेकी आज्ञाके साथ।
जिसका भगवान्पर तो उतना विश्वास नहीं है, पर भगवान्के विधानमें अर्थात् देश-समाजकी सेवा आदि करनेमें अधिक विश्वास है, उसके लिये भगवान् इस श्लोकमें सर्वकर्मफलत्याग-रूप साधन बताते हैं। तात्पर्य है कि अगर वह सम्पूर्ण कर्मोंको मेरे अर्पण न कर सके, तो जिस फलको प्राप्त करना उसके हाथकी बात नहीं है, उस फलकी इच्छाका त्याग कर दे—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ’ (गीता २।४७)। फलकी इच्छाका त्याग करके कर्तव्य कर्म करनेसे उसका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा।
‘सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ’—कर्मयोगके साधनमें स्वाभाविक ही कर्मोंका विस्तार होता है; क्योंकि योगकी प्राप्तिमें अनासक्त भावसे कर्म करना ही हेतु कहा गया है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। इससे कर्मोंमें फलासक्ति होनेके कारण बँधनेका भय रहता है। अतः ‘यतात्मवान् ’ पदसे भगवान् कर्मफलत्यागके साधनमें मन-इन्द्रियों आदिके संयमकी आवश्यकता बताते हैं। यह ध्यान देनेकी बात है कि मन-इन्द्रियोंका संयम होनेपर कर्मफलत्यागमें भी सुगमता होती है। अगर साधक मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका संयम नहीं करता, तो स्वाभाविक ही उसके मनद्वारा विषयोंका चिन्तन होगा और उसकी उन विषयोंमें आसक्ति हो जायगी। इससे उसका
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
पतन होनेकी बहुत सम्भावना रहेगी (गीता—दूसरे अध्यायका बासटवॉ-तिरसटवॉ श्लोक)। त्यागका उद्देश्य होनेसे साधक मन-इन्द्रियोंका संयम सुगमतासे कर सकता है।
यहाँ ‘सर्वकर्म’ पद यज्ञ, दान, तप, सेवा और वर्णाश्रमके अनुसार जीविका तथा शरीर-निर्वाहके लिये किये जानेवाले शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंका वाचक है। सर्वकर्मफलत्यागका अभिप्राय स्वरूपसे कर्मफलका त्याग न होकर कर्मफलमें ममता, आसक्ति, कामना, वासना आदिका त्याग ही है।
कर्मफलत्यागके साधनमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी बात नहीं कही गयी; क्योंकि कर्म करना तो जरूरी है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। जैसा कि पहले कह चुके हैं, आवश्यकता केवल कर्म और उनके फलोंमें ममता, आसक्ति, कामना आदिके त्यागकी ही है।
कर्मयोगके साधकको अकर्मण्य नहीं होना चाहिये; क्योंकि कर्मफल-त्यागकी बात सुनकर प्रायः साधक सोचता है कि जब कुछ लेना ही नहीं है, तो फिर कर्मोंको करनेकी क्या जरूरत! इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगकी बात कहते हुए ‘मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि’ ‘तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो’—यह कहकर साधकके लिये अकर्मण्यता-(कर्मके त्याग-) का निषेध किया है।
अठारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने सात्त्विक त्यागके लक्षण बताते हुए कर्मोंमें फलासक्तिके त्यागको ही ‘सात्त्विक त्याग’ कहा है, न कि स्वरूपसे कर्मोंके त्यागको।
फलासक्तिका त्याग करके क्रियाओंको करते रहनेसे क्रियाओंको करनेका वेग शान्त हो जाता है और पुरानी आसक्ति मिट जाती है। फलकी इच्छा न रहनेसे कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और नयी आसक्ति पैदा नहीं होती। फिर साधक कृतकृत्य हो जाता है। पदार्थोंमें राग, आसक्ति, कामना, ममता, फलेच्छा आदि ही
परिशिष्ट भाव— अगर साधक सर्वथा भगवान्के लिये कर्म न कर सके तो उसको फलेच्छाका त्याग करके कर्म करना चाहिये; क्योंकि फलेच्छा ही बाँधनेवाली है—‘फले सत्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)।
सम्बन्ध— भगवान्ने आठवें श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक एक साधनमें असमर्थ होनेपर दूसरा, दूसरे साधनमें असमर्थ होनेपर तीसरा और तीसरे साधनमें असमर्थ होनेपर चौथा साधन बताया। इससे यह शंका हो सकती है कि क्या अन्तमें बताया गया ‘सर्वकर्मफलत्याग’ साधन सबसे निम्न श्रेणीका है? क्योंकि उसको सबसे अन्तमें कहा गया है तथा भगवान्ने उस-(सर्वकर्मफलत्याग-)का कोई फल भी नहीं बताया। इस शंकाका निवारण करते हुए भगवान् सर्वकर्मफलत्यागरूप साधनकी श्रेष्ठता तथा उसका फल बताते हैं।
क्रियाओंका वेग पैदा करनेवाली है। इनके रहते हुए हठपूर्वक क्रियाओंका त्याग करनेपर भी क्रियाओंका वेग शान्त नहीं होता। राग-द्वेष रहनेके कारण साधककी प्रकृति पुनः उसे कर्मोंमें लगा देती है। अतः राग-द्वेषादिका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करनेसे ही क्रियाओंका वेग शान्त होता है।
जिन साधकोंकी सगुण-साकार भगवान्में स्वाभाविक श्रद्धा और भक्ति नहीं है, प्रत्युत व्यावहारिक और लोकहितके कार्य करनेमें ही अधिक श्रद्धा और रुचि है, ऐसे साधकोंके लिये यह (सर्वकर्मफलत्यागरूप) साधन बहुत उपयोगी है।
भगवान्ने जहाँ भी कर्मफलत्यागकी बात कही है, वहाँ आसक्ति और फलेच्छाके त्यागका अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्के मतमें आसक्ति और फलेच्छाका पूरी तरह त्याग होनेसे ही कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका छठा श्लोक)।
सम्पूर्ण कर्मोंके फल-(फलेच्छा-) का त्याग भगवत्-प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है। कर्मफलत्यागसे विषयासक्तिका नाश होकर शान्ति-(सात्त्विक सुख-) की प्राप्ति हो जाती है। उस शान्तिका उपभोग न करनेसे (उसमें सुख-बुद्धि करके उसमें न अटकनेसे) वह शान्ति परमतत्त्वका बोध कराकर उससे अभिन्न करा देती है।
ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने साधक भक्तके पाँच लक्षणोंमें एक लक्षण ‘संगवर्जितः’ (आसक्तिसे रहित) बताया था। इस श्लोकमें भगवान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलत्यागकी बात कहते हैं, जो संसारकी आसक्तिके सर्वथा त्यागसे ही सम्भव है। इस-(सर्वकर्मफलत्याग-)का फल भगवान्ने इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें तत्काल परमशान्तिकी प्राप्ति होना बताया है। अतः यह समझना चाहिये कि केवल आसक्तिका सर्वथा त्याग करनेसे भी परमशान्ति अथवा भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानादध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥
| अभ्यासात् | = अभ्याससे | विशिष्यते | = श्रेष्ठ है (और) | त्याग (श्रेष्ठ है); | |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञानम् | = शास्त्रज्ञान | ध्यानात् | = ध्यानसे | हि | = क्योंकि |
| श्रेयः | = श्रेष्ठ है, | (भी) | त्यागात् | = त्यागसे | |
| ज्ञानात् | = शास्त्रज्ञानसे | कर्मफल- | अनन्तरम् | = तत्काल ही | |
| ध्यानम् | = ध्यान | त्यागः | = सब कर्मोंके | शान्तिः | = परमशान्ति प्राप्त हो |
| फलकी इच्छाका | जाती है। |
व्याख्या —[ भगवान्ने आठवें श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक एक-एक साधनमें असमर्थ होनेपर क्रमशः समर्पणयोग, अभ्यासयोग, भगवदर्थ कर्म और कर्मफलत्याग—ये चार साधन बताये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि क्रमशः पहले साधनकी अपेक्षा आगेका साधन नीचे दर्जका है, और अन्तमें कहा गया कर्मफलत्यागका साधन सबसे नीचे दर्जका है। इस बातकी पुष्टि इससे भी होती है कि पहलेके तीन साधनोंमें भगवत्प्राप्तिरूप फलकी बात (‘निवसिष्यसि मध्येव’, ‘मामिच्छानुम्’ तथा ‘सिद्धिमवाप्यसि’—इन पदोंद्वारा) साथ-साथ कही गयी; परन्तु ग्यारहवें श्लोकमें जहाँ कर्मफलत्याग करनेकी आज्ञा दी गयी है, वहाँ उसका फल भगवत्प्राप्ति नहीं बताया गया।
उपर्युक्त धारणाओंको दूर करनेके लिये यह बारहवाँ श्लोक कहा गया है। इसमें भगवान्ने कर्मफलत्यागको श्रेष्ठ और तत्काल परमशान्ति देनेवाला बताया है, जिससे कि इस चौथे साधनको कोई निम्न श्रेणीका न समझ ले। कारण कि इस साधनमें आसक्ति, ममता और फलेच्छाके त्यागकी ही प्रधानता होनेसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति समर्पणयोग, अभ्यासयोग एवं भगवदर्थ कर्म करनेसे होती है, ठीक उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्मफलत्यागसे भी होती है।
वास्तवमें उपर्युक्त चारों साधन स्वतन्त्रतासे भगवत्प्राप्ति करानेवाले हैं। साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भगवान्ने आठवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक अलग-अलग साधन कहे हैं।
जहाँतक कर्मफलत्यागके फल-(भगवत्प्राप्ति-) को अलगसे बारहवें श्लोकमें कहनेका प्रश्न है, उसमें यही विचार करना चाहिये कि समर्पणयोग, अभ्यासयोग एवं भगवदर्थ कर्म करनेसे भगवत्प्राप्ति होती है, यह तो प्रायः प्रचलित ही है; किंतु कर्मफलत्यागसे भी भगवत्प्राप्ति होती है, यह बात प्रचलित नहीं है। इसीलिये प्रचलित साधनोंकी अपेक्षा इसकी श्रेष्ठता बतानेके लिये बारहवाँ श्लोक कहा
गया है और उसीमें कर्मफलत्यागका फल कहना उचित प्रतीत होता है।]
‘श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात्’—महर्षि पतंजलि कहते हैं—‘तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः।’ (योगदर्शन १।१३)
अर्थात् किसी एक विषयमें स्थिति (स्थिरता) प्राप्त करनेके लिये बार-बार प्रयत्न करनेका नाम ‘अभ्यास’ है।
यहाँ (इस श्लोकमें) ‘अभ्यास’ शब्द केवल अभ्यास-रूप क्रियाका वाचक है, अभ्यासयोगका वाचक नहीं; क्योंकि इस (प्राणायाम, मनोनिग्रह आदि) अभ्यासमें शास्त्रज्ञान और ध्यान नहीं है तथा कर्मफलकी इच्छाका त्याग भी नहीं है। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही योग होता है, जबकि उपर्युक्त अभ्यासमें जड़ता-(शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि-) का आश्रय रहता है।
यहाँ ‘ज्ञान’ शब्दका अर्थ शास्त्रज्ञान है, तत्त्वज्ञान नहीं; क्योंकि तत्त्वज्ञान तो सभी साधनोंका फल है। अतः यहाँ जिस ज्ञानकी अभ्याससे तुलना की जा रही है, उस ज्ञानमें न तो अभ्यास है, न ध्यान है और न कर्मफलत्याग ही है। जिस अभ्यासमें न ज्ञान है, न ध्यान है और न कर्मफलत्याग ही है—ऐसे अभ्यासकी अपेक्षा उपर्युक्त ज्ञान ही श्रेष्ठ है।
शास्त्रोंके अध्ययन और सत्संगके द्वारा आध्यात्मिक जानकारीको तो प्राप्त कर ले, पर न तो उसके अनुसार वास्तविक तत्त्वका अनुभव करे और न ध्यान, अभ्यास और कर्मफलत्यागरूप किसी साधनका अनुष्ठान ही करे—ऐसी (केवल शास्त्रोंकी) जानकारीके लिये यहाँ ‘ज्ञानम्’ पद आया है। इस ज्ञानको उपर्युक्त अभ्यासकी अपेक्षा श्रेष्ठ कहनेका तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक ज्ञानसे रहित अभ्यास भगवत्प्राप्तिमें उतना सहायक नहीं होता, जितना अभ्याससे रहित ज्ञान सहायक होता है। कारण कि ज्ञानसे भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा जाग्रत् हो सकती है, जिससे संसारसे ऊँचा उठना जितना सुगम हो सकता है, उतना अभ्यासमात्रसे नहीं।
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[ अध्याय १२ ]
‘ज्ञानादध्यानं विशिष्यते’—यहाँ ‘ध्यान’ शब्द केवल मनकी एकाग्रतरूप क्रियाका वाचक है, ध्यानयोगका वाचक नहीं। इस ध्यानमें शास्त्रज्ञान और कर्मफलत्याग नहीं है। ऐसा ध्यान उस ज्ञानकी अपेक्षा श्रेष्ठ है, जिस ज्ञानमें अभ्यास, ध्यान और कर्मफलत्याग नहीं है। कारण कि ध्यानसे मनका नियन्त्रण होता है, जब कि केवल शास्त्रज्ञानसे मनका नियन्त्रण नहीं होता। इसलिये मन-नियन्त्रणके कारण ध्यानसे जो शक्ति संचित होती है, वह शास्त्रज्ञानसे नहीं होती। यदि साधक उस शक्तिका सदुपयोग करके परमात्माकी तरफ बढ़ना चाहे, तो जितनी सुगमता उसको होगी, उतनी शास्त्रज्ञानवालेको नहीं। इसके साथ-साथ ध्यान करनेवाले साधकको (अगर वह शास्त्रका अध्ययन करे, तो) मनकी एकाग्रताके कारण वास्तविक ज्ञानकी प्राप्ति बहुत सुगमतासे हो सकती है, जबकि केवल शास्त्राध्यायी साधकको (चाहेनेपर भी) मनकी चंचलताके कारण ध्यान लगानेमें कठिनाता होती है। [आजकल भी देखा जाय तो शास्त्रका अध्ययन करनेवाले आदमी जितने मिलते हैं, उतने मनकी एकाग्रताके लिये उद्योग करनेवाले नहीं मिलते।]
‘ध्यानात्कर्मफलत्यागः’—ज्ञान और कर्मफलत्यागसे रहित ‘ध्यान’की अपेक्षा ज्ञान और ध्यानसे रहित ‘कर्मफलत्याग’ श्रेष्ठ है। यहाँ कर्मफलत्यागका अर्थ कर्मों तथा कर्मफलोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है, प्रत्युत कर्मों और उनके फलोंमें ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग ही है। उत्पत्ति-विनाशशील सब-की-सब वस्तुएँ कर्मफल हैं। उनकी आसक्तिका त्याग करना ही सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंका त्याग करना है।
कर्मोंमें आसक्ति और फलेच्छा ही संसारमें बन्धनका कारण है। आसक्ति और फलेच्छा न रहनेसे कर्मफलत्यागी पुरुष सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य, पदार्थ आदि जो कुछ मनुष्यके पास है, वह सब-का-सब संसारसे ही मिला हुआ है, उसका व्यक्तिगत नहीं है। इसलिये कर्मफलत्यागी अर्थात् कर्मयोगी मिली हुई (शरीरादि) सब सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर उसको निष्कामभावपूर्वक संसारकी ही सेवामें लगा देता है। इस प्रकार मिली हुई सामग्री-(जडता-) का प्रवाह संसार-(जडता-) की ही तरफ हो जानेसे उसका जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और उसको परमात्मासे अपने
स्वाभाविक और नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगीके लिये अलगसे ध्यान लगानेकी जरूरत नहीं है। अगर वह ध्यान लगाना भी चाहे, तो कोई सांसारिक कामना न होनेके कारण वह सुगमतापूर्वक ध्यान लगा सकता है, जब कि सकामभावके कारण सामान्य साधकको ध्यान लगानेमें कठिनाई होती है।
गीताके छठे अध्यायमें (ध्यानयोगके प्रकरणमें) भगवान्ने बताया है कि ध्यानका अभ्यास करते-करते अन्तमें जब साधकका चित्त एकमात्र परमात्मामें अच्छी तरहसे स्थित हो जाता है, तब वह सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो जाता है और चित्तके उपराम होनेपर वह स्वयंसे परमात्मतत्वमें स्थित हो जाता है (छठे अध्यायके अठारहवेंसे बीसवें श्लोकतक)। परन्तु कर्मयोगी सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके तत्काल स्वयंसे परमात्मतत्वमें स्थित हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक)। कारण यह है कि ध्यानमें परमात्मामें चित्त लगाया जाता है, इसलिये उसमें चित्त-(जडता-) का आश्रय रहनेके कारण चित्त-(जडता-) के साथ बहुत दूरतक सम्बन्ध बना रहता है। परन्तु कर्मयोगमें ममता और कामनाका त्याग किया जाता है, इसलिये उसमें ममता और कामना-(जडता-) का त्याग करनेके साथ ही चित्त-(जडता-) का भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये परिणाममें समानरूपसे परमात्मतत्वकी प्राप्ति होनेपर भी ध्यानका अभ्यास करनेवाले साधकको ध्येयमें चित्त लगानेमें कठिनाई होती है तथा उसे परमात्मतत्वका अनुभव भी देरीसे होता है, जब कि कर्मयोगीको परमात्मतत्वका अनुभव सुगमतापूर्वक तथा शीघ्रतासे होता है। इससे सिद्ध होता है कि ध्यानकी अपेक्षा कर्मयोगका साधन श्रेष्ठ है।
अपना कुछ नहीं, अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है—यही कर्मयोगका मूल महामन्त्र है, जिसके कारण यह सब साधनोंसे विलक्षण हो जाता है—‘कर्मयोगो विशिष्यते’ (गीता ५।२)।
‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’—यहाँ ‘त्यागात्’ पद ‘कर्मफलत्याग’के लिये ही आया है। त्यागके स्वरूपको विशेषरूपसे समझनेकी आवश्यकता है। त्याग न तो उसका हो सकता है, जो अपना स्वरूप है और न उसीका हो सकता है, जिसके साथ अपना सम्बन्ध नहीं है। जैसे, अपना स्वरूप होनेके कारण प्रकाश और उष्णतासे सूर्यका वियोग नहीं हो सकता, और जिससे वियोग नहीं हो सकता, उसका त्याग