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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 10 ज्ञानादि का घात होने पर पुद्गल का घात नहीं होता - णाणस्स दंसणस्स य भणिदो घादो तहा चरित्तस्स। ण वि तम्हि को वि पोग्गलदव्वे घादो दु णिद्दिट्ठो॥ (10-62-369) ज्ञान, दर्शन और चारित्र का घात बताया है, (किन्तु) उस पुद्गल द्रव्य में कोई घात नहीं कहा। Destruction of knowledge, faith, and conduct, has been mentioned; (but) destruction of physical matter has not been indicated. सम्यग्दृष्टि को विषयों में राग नहीं है - जीवस्स जे गुणा केई णत्थि ते खलु परसु दव्वेसु। तम्हा सम्मादिट्ठिस्स णत्थि रागो दु विसएसु॥ (10-63-370) जीव के जो कोई गुण हैं, वे वास्तव में परद्रव्यों में नहीं हैं; इसलिए सम्यग्दृष्टि को विषयों में राग नहीं है। The attributes of the soul do not exist in alien substances; therefore, the right believer has no attachment for the sense- objects. 174

अध्याय - 10 जीव के रागादि परिणाम परद्रव्य में नहीं हैं - रागो दोसो मोहो जीवस्स दु ते अणण्णपरिणामा। एदेण कारणेण दु सद्दादिसु णत्थि रागादी॥ (10-64-371) राग, द्वेष, मोह वे जीव के अनन्य परिणाम हैं। इस कारण राग आदि (परिणाम) शब्द आदि में नहीं हैं। Attachment, aversion, and delusion, are the soul's own immutable modes; for this reason, sound (and other sense- objects) do not possess attachment etc. परद्रव्य जीव में रागादि उत्पन्न नही करता - अण्णदवियेण अण्णदवियस्स णो कीरदे गुणुप्पादो। तम्हा दु सव्वदव्वा उप्पज्जंते सहावेण॥ (10-65-372) अन्य द्रव्य के द्वारा अन्य द्रव्य के गुणों की उत्पत्ति नहीं की जा सकती; इसलिए (यही कारण है कि) सब द्रव्य अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न होते हैं। The qualities of a substance cannot be produced by another substance; therefore, all substances are produced by their own, individual nature. 175

अध्याय - 10 पुद्गल शब्द को सुनकर रोष-तोष करना अज्ञान है - णिंदिदसंथुदवयणाणि पोग्गला परिणमंति बहुगाणि। ताणि सुणिदूण रूसदि तूसदि य पुणो अहं भणिदो॥ (10-66-373) पोग्गलदव्वं सद्दत्तपरिणदं तस्स जदि गुणो अण्णो। तम्हा ण तुमं भणिदो किंचि वि किं रूससि अबुद्धो॥ (10-67-374) पुद्गल अनेक प्रकार के निंदा और स्तुति के वचनों के रूप में परिणमित होते हैं। उन वचनों को सुनकर ‘मुझको कहा है’ यह मानकर तू रुष्ट और तुष्ट होता है। पुद्गलद्रव्य शब्दरूप परिणमित हुआ है। उसका गुण यदि तुझसे अन्य है, तो फिर हे अज्ञानी! तुझको कुछ भी नहीं कहा है; फिर तू क्यों रुष्ट होता है? 176

अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से शब्द को सुनता है - असुहो सुहो व सद्दो ण तं भणदि सुणसु मं ति सो चेव। ण य एदि विविग्गहिदुं सोदविसयमागदं सद्दं॥ (10-68-375) अशुभ या शुभ शब्द तुझे नहीं कहता है कि ‘तू मुझको सुन’। वह आत्मा भी श्रोत्र इन्द्रिय के विषय में आये हुए शब्द को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant spoken word does not beckon you and say, “Hear me.” When the word reaches your organ of hearing, the soul does not move to apprehend the incoming word. आत्मा अपने स्वरूप से रूप को देखता है - असुहं सुहं व रूवं ण तं भणदि पॅच्छ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं चक्खुविसयमागदं रूवं॥ (10-69-376) अशुभ या शुभ रूप तुझको यह नहीं कहता कि ‘तू मुझको देख’ और आत्मा भी चक्षु इन्द्रिय के विषय में आये हुए रूप को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant visual form does not beckon you and say, “See me.” When the visual form reaches your organ of sight, the soul does not move to apprehend the incoming visual form. 177

अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से गन्ध को सूंघता है - असुहो सुहो व गंधो ण तं भणदि जिग्घ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं घाणविसयमागदं गंधं॥ (10-70-377) अशुभ या शुभ गन्ध तुझको यह नहीं कहता कि 'तू मुझे सूँघ' और आत्मा भी घ्राणेन्द्रिय के विषय में आये हुए गन्ध को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant odour does not beckon you and say, “Smell me.” When the odour reaches your organ of smell, the soul does not move to apprehend the incoming odour. आत्मा अपने स्वरूप से रस को चखता है - असुहो सुहो व रसो ण तं भणदि रसय मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं रसणविसयमागदं तु रसं॥ (10-71-378) अशुभ या शुभ रस तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे चख' और आत्मा भी रसना इन्द्रिय के विषय में आये हुए रस को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant flavour does not beckon you and say, “Taste me.” When the flavour reaches your organ of taste, the soul does not move to apprehend the incoming flavour. 178

१०. सर्वविशुद्ध ज्ञान अधिकार व उपसंहार

अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से स्पर्श करता है - असुहो सुहो व फासो ण तं भणदि फास मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं कायविसयमागदं फासं॥ (10-72-379) अशुभ या शुभ स्पर्श तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे स्पर्श कर' और आत्मा भी स्पर्शन इन्द्रिय के विषय में आये हुए स्पर्श को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। आत्मा अपने स्वरूप से गुण को जानता है - असुहो सुहो व गुणो ण तं भणदि बुज्झ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं बुद्धिविसयमागदं तु गुणं॥ (10-73-380) अशुभ या शुभ गुण तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे जान' और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए गुण को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। 179

अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से द्रव्य को जानता है - असुहो सुहो व दव्वं ण तं भणदि बुज्झ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं बुद्धिविसयमागदं दव्वं॥ (10-74-381) अशुभ या शुभ द्रव्य तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे जान' और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant substance does not beckon you and say, “Know me.” When the substance reaches your mind, the soul does not move to apprehend the incoming substance. पर में स्व बुद्धि का परिणाम - एवं तु जाणिदूण य उवसमं णोव गच्छदे मूढो। णिग्गहमणा परस्स य सयं च बुद्धिं सिवमपत्तो॥ (10-75-382) इस प्रकार (शब्द, रूप, गन्ध, रस, स्पर्श, परगुण और द्रव्य को) जानकर भी मूढ़जीव उपशम (शान्ति) को प्राप्त नहीं होता। वह पर के ग्रहण करने का मन करता है और स्वयं उसे कल्याणकारी बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) की प्राप्ति नहीं हुई। Thus, even after knowing the true nature (of spoken word, visual form, odour, flavour, physical contact, quality of a substance, and substance itself) the ignorant person does not achieve tranquility. He makes up his mind to acquire the non- Self and, as such, remains devoid of propitious comprehension (right knowledge). 180

अध्याय - 10 निश्चय प्रतिक्रमण का स्वरूप - कम्मं जं पुव्वकयं सुहासुहमणेयवित्थरविसेसं। तत्तो णियत्तदे अप्पयं तु जो सो पडिक्कमणं॥ (10-76-383) पूर्व में किये हुए (मूलोत्तर प्रकृति रूप से) अनेक विस्तार वाले जो शुभ और अशुभ कर्म हैं, उनसे जो जीव अपने को दूर कर लेता है, वह जीव ही प्रतिक्रमण है। The Self who drives himself away from the multitude of karmas, virtuous or wicked, done in the past, is certainly the real repentance. निश्चय प्रत्याख्यान का स्वरूप - कम्मं जं सुहमसुहं जम्हि य भावम्हि बज्झदि भविस्सं। तत्तो णियत्तदे जो सो पच्चक्खाणं हवदि चेदा॥ (10-77-384) और भविष्यकाल में जो शुभाशुभ कर्म जिस भाव के होने पर बँधता है, उस भाव से जो आत्मा निवृत्त होता है, वह आत्मा प्रत्याख्यान होता है। And the Self who drives himself away from the future thought- activities that may cause bondage of karmas, virtuous or wicked, is certainly the real renunciation. 181

अध्याय - 10 निश्चय आलोचना का स्वरूप - जं सुहमसुहमुदिण्णं संपडि य अणेयवित्थरविसेसं। तं दोसं जो चेददि सो खलु आलोयणं चेदा॥ (10-78-385) वर्तमान काल में उदय में आये हुए (मूलोत्तर प्रकृति के रूप में) अनेक विस्तार वाले जो कर्म हैं, उस दोष को जो जीव (भेदरूप) अनुभव करता है, वह जीव वास्तव में आलोचना है। The Self who realizes as evil the multitude of karmas, virtuous or wicked, which come to fruition in the present, is certainly the real confession. निश्चय चारित्र का स्वरूप - णिच्चं पच्चक्खाणं कुव्वदि णिच्चं पि जो पडिक्कमदि। णिच्चं आलोचेयदि सो हु चरित्तं हवदि चेदा॥ (10-79-386) जो आत्मा नित्य प्रत्याख्यान करता है, नित्य ही जो प्रतिक्रमण करता है, जो नित्य आलोचना करता है, वह आत्मा निश्चय से चारित्र है। The Self who is always engaged in renunciation, who is always engaged in repentance, and who is always engaged in confession, is certainly the right conduct. 182

अध्याय - 10 अज्ञानचेतना ही कर्म-बंध का कारण है - वेदंतो कम्मफलं अप्पाणं जो दु कुणदि कम्मफलं। सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥ (10-80-387) वेदंतो कम्मफलं मये कदं जो दु मुणदि कम्मफलं। सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥ (10-81-388) वेदंतो कम्मफलं सुहिदो दुहिदो य हवदि जो चेदा। सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥ (10-82-389) कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा कर्म के फल को निजरूप करता है (मानता है) वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है। कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा ‘कर्म का फल मैंने किया' ऐसा मानता है, वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है। कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा सुखी और दुखी होता है, वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है। Experiencing the fruits of karmas, the Self who identifies himself with those fruits of karmas, bonds himself again with the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas. Experiencing the fruits of karmas, the Self who believes that he is the creator of those fruits of karmas, bonds himself again with •••••••••••••••••••• 183

अध्याय - 10 the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas. Experiencing the fruits of karmas, the Self who gets happy or miserable with those fruits of karmas, bonds himself again with the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas. शास्त्र ज्ञान से भिन्न है - सत्थं णाणं ण हवदि जम्हा सत्थं ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं सत्थं जिणा विंति॥ (10-83-390) शास्त्र ज्ञान नहीं है क्योंकि शास्त्र कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, शास्त्र अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Scripture is not knowledge because scripture does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and scripture another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. शब्द ज्ञान से भिन्न है - सद्दो णाणं ण हवदि जम्हा सद्दो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं सद्दं जिणा विंति। (10-84-391) 184

अध्याय - 10 शब्द ज्ञान नहीं है क्योंकि शब्द कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, शब्द अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। रूप ज्ञान से भिन्न है - रूवं णाणं ण हवदि जम्हा रूवं ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं रूवं जिणा विंति॥ (10-85-392) रूप ज्ञान नहीं है क्योंकि रूप कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, रूप अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। वर्ण ज्ञान से भिन्न है - वण्णो णाणं ण हवदि जम्हा वण्णो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं वण्णं जिणा विंति॥ (10-86-393) 185

अध्याय - 10 वर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि वर्ण कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, वर्ण अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Colour (sight) is not knowledge because colour does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and colour another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. गन्ध ज्ञान से भिन्न है - गंधो णाणं ण हवदि जम्हा गंधो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं गंधं जिणा विंति॥ (10-87-394) गन्ध ज्ञान नहीं है, क्योंकि गन्ध कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, गन्ध अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Smell (odour) is not knowledge because smell does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and smell another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. रस ज्ञान से भिन्न है - ण रसो दु होदि णाणं जम्हा दु रसो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं रसं च अण्णं जिणा विंति॥ (10-88-395) 186

अध्याय - 10 रस ज्ञान नहीं है, क्योंकि रस तो कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है और रस अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Taste (flavour) is not knowledge because taste does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and taste another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. स्पर्श ज्ञान से भिन्न है - फासो णाणं ण हवदि जम्हा फासो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं फासं जिणा विंति॥ (10-89-396) स्पर्श ज्ञान नहीं है, क्योंकि स्पर्श कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, स्पर्श अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Touch (physical contact) is not knowledge because touch does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and touch another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. कर्म ज्ञान से भिन्न है - कम्मं णाणं ण हवदि जम्हा कम्मं ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं कम्मं जिणा विंति॥ (10-90-397) 187

अध्याय - 10 कर्म ज्ञान नहीं है, क्योंकि कर्म कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य है, कर्म अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Karma is not knowledge because karma does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and karma another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. धर्मद्रव्य ज्ञान से भिन्न है - धम्मो णाणं ण हवदि जम्हा धम्मो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं धम्मं जिणा विंति॥ (10-91-398) धर्मद्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि धर्मद्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य है, धर्मद्रव्य अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Medium of motion (dharma – the non-soul substance) is not knowledge because medium of motion does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and medium of motion another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. अधर्मद्रव्य ज्ञान से भिन्न है - णाणमधम्मो ण हवदि जम्हाधम्मो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णमधम्मं जिणा विंति॥ (10-92-399) ........................ 188

अध्याय – 10 अधर्म द्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि अधर्म द्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य है, अधर्म द्रव्य अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Medium of rest (adharma – the non-soul substance) is not knowledge because medium of rest does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and medium of rest another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. काल द्रव्य ज्ञान से भिन्न है – कालो णाणं ण हवदि जम्हा कालो ण याणदे किंचि। तम्हा अण्णं णाणं अण्णं कालं जिणा विंति॥ (10-93-400) काल द्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि काल द्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य है, काल द्रव्य अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Time (kāla – the non-soul substance) is not knowledge because time does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and time another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. आकाश द्रव्य ज्ञान से भिन्न है – आयासं पि ण णाणं जम्हायासं ण याणदे किंचि। तम्हायासं अण्णं अण्णं णाणं जिणा विंति॥ (10-94-401) 189

अध्याय - 10 आकाश द्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि आकाश द्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए आकाश द्रव्य अन्य है, ज्ञान अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। Space (ākāṣ – the non-soul substance) is not knowledge because space does not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and space another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord. अध्यवसान ज्ञान नहीं है - णाज्झवसाणं णाणं अज्झवसाणं अचेदणं जम्हा। तम्हा अण्णं णाणं अज्झवसाणं तहा अण्णं॥ (10-95-402) अध्यवसान ज्ञान नहीं है, क्योंकि अध्यवसान अचेतन है; इसलिए ज्ञान अन्य है तथा अध्यवसान अन्य है। Thought-activity is not knowledge because thought-activity is non-conscious. Therefore, knowledge is one thing and thought- activity another. ज्ञान ही दीक्षा है - जम्हा जाणदि णिच्चं तम्हा जीवो दु जाणगो णाणी। णाणं च जाणयादो अव्वदिरित्तं मुणेदव्वं॥ (10-96-403) 190

अध्याय - 10 णाणं सम्मादिट्ठिं दु संजमं सुत्तमंगपुव्वगदं। धम्माधम्मं च तहा पव्वज्जं अब्भुवेत्ति बुहा॥ (10-97-404) क्योंकि जीव सदा जानता है, इसलिए ज्ञायक जीव ज्ञानी है और ज्ञान ज्ञायक से अभिन्न है, ऐसा जानना चाहिये। ज्ञानीजन (गणधरदेव) ज्ञान को ही सम्यग्दृष्टि, संयम, अंगपूर्वगत सूत्र, धर्म और अधर्म तथा दीक्षा मानते हैं। आत्मा अनाहारक है - अत्ता जस्स अमुत्तो ण हु सो आहारगो हवदि एवं। आहारो खलु मुत्तो जम्हा सो पोग्गलमओ दु॥ (10-98-405) ण वि सक्कदि घेंत्तुं जं ण वि मोत्तुं चेव जं परं दव्वं। सो को वि य तस्स गुणो पाओग्गिय विस्ससो वा वि॥ (10-99-406) 191

अध्याय - 10 तम्हा दु जो विसुद्धो चेदा सो णैव गिण्हदे किंचि। णैव विमुंचदि किंचि वि जीवाजीवाण दव्वाणं॥ (10-100-407) इस प्रकार जिसकी आत्मा आमूर्तिक है, वह निश्चय ही आहारक नहीं है। वास्तव में आहार मूर्तिक है, क्योंकि आहार पुद्गलमय है। उस आत्मा का वह कोई प्रायोगिक अथवा वैस्रसिक गुण है कि वह परद्रव्य को न ग्रहण कर सकता है, न छोड़ सकता है, अतः (अनाहारक होने के कारण) जो विशुद्ध आत्मा है, वह जीव-अजीव परद्रव्यों में न तो कुछ ग्रहण ही करता है और न कुछ छोड़ता ही है। Since the soul is incorporeal, it is certainly non-assimilative (of food). In reality food is corporeal, comprising physical matter. There is no attribute, acquired or natural, in the soul that it can either assimilate or discard any alien substance. Therefore (being non-assimilative) the pure soul neither assimilates nor discards any alien substances – animate or inanimate. बाह्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं है - पासंडियलिंगाणि य गिहिलिंगाणि य बहुप्पयाराणि। घेत्तं वंदति मूढा लिंगमिणं मॉक्खमग्गो त्ति॥ (10-101-408) ण दु होदि मॉक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा। लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि सेवंते॥ (10-102-409) 192

अध्याय - 10 अनेक प्रकार के साधु-वेष और गृहस्थ-वेष धारण करके अज्ञानी जन यह कहते हैं कि वेष ही मोक्ष का मार्ग है; किन्तु द्रव्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं है; क्योंकि अर्हन्तदेव देह से ममत्वहीन हुए (बाह्य) लिंग को छोड़कर दर्शन, ज्ञान, चारित्र का सेवन करते हैं। Ignorant persons adopt various kinds of alleged external insignia of monks and householders and claim that adoption of these insignia leads to liberation. But external insignia cannot lead to liberation as the Omniscient Lords, discarding all external symbols, and giving up attachment to body itself, only get immersed in right faith, knowledge, and conduct.

दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग है - ण वि एस मॉक्खमग्गो पासंडियगिहिमयाणि लिंगाणि। दंसणणाणचरित्ताणि मॉक्खमग्गं जिणा विंति॥ (10-103-410) तम्हा जहित्तु लिंगे सागारणगारिये हि वा गहिदे। दंसणणाणचरित्ते अप्पाणं जुंज मॉक्खपहे॥ (10-104-411) साधु और गृहस्थ के लिंग - यह भी मोक्ष-मार्ग नहीं हैं। दर्शन, ज्ञान और चारित्र मोक्ष-मार्ग हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं; इसलिए गृहस्थ और साधुओं द्वारा ग्रहण किये हुए लिंगो को छोड़कर अपनी आत्मा को दर्शन, ज्ञान और चारित्रस्वरूप मोक्ष-मार्ग में लगाओ। ••••••••••••••••••••••••••••• 193