साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
अष्टमोऽध्यायः
(सूर्यनिगमनम्)
नारद उवाच
आदित्यमूलमखिलं त्रैलोक्यं यदुनन्दन।
भवत्यस्माज्जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥१॥
रुद्रोपेन्द्रमहेन्द्राणां विप्रेन्द्रत्रिदिवौकसाम्।
महाद्युतिमतां चैव तेजो यत् सार्वलौकिकम् ॥२॥
नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन (जाम्बवतीसुत साम्ब)! समस्त त्रिभुवन के मूल आदित्य हैं। देवता, असुर तथा मनुष्य के साथ समस्त जगत् सूर्य से ही उत्पन्न है। रुद्र, उपेन्द्र, महेन्द्र, ब्राह्मणश्रेष्ठ, स्वर्गवासी देवगण एवं महाद्युति-सम्पन्न सबका जो सार्वलौकिक तेज है, वह सूर्य से ही उत्पन्न है॥१-२॥
सर्वात्मा सर्वलोकेशो देवदेवः प्रजापतिः ॥३॥
वे सर्वात्मा, समस्त लोक के ईश्वर, देवताओं के देवता तथा प्रजागण के पालक प्रजापति हैं॥३॥
सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्।
अग्नौ क्षिप्त्वाऽहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजा ॥४॥
सूर्य त्रिलोक के मूल (प्रधान) परम दैवत हैं। अग्नि में प्रक्षिप्त आहुति सम्यक् रूपेण आदित्य को मिलती है। आदित्य से वृष्टि का उदय होता है। वृष्टि से अन्न तथा अन्न से प्रजागण उत्पन्न होते हैं॥४॥
सूर्यात् प्रसूयते सर्वं तत्र चैव प्रलीयते।
भावाभावौ हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा ॥५॥
सततं ध्यायिनो ध्यानं मोक्षश्चाप्येष मोक्षिणाम्।
अत्र गच्छन्ति निर्वाणं जायन्तेऽस्मात् पुनः प्रजाः ॥६॥
सूर्य से ही सब कुछ उत्पन्न होता है और अन्त में वहीं विलीन हो जाता है। समस्त लोक की उत्पत्ति तथा विनाश आदित्य से ही होता है। इनका निरन्तर ध्यान से ध्यानकारीगण ध्यान तथा मोक्षाकांक्षीगण (सूर्य में) मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसी से सबका निर्वाण होता है एवं पुनः सूर्य से ही प्रजागण उत्पन्न होते हैं॥५-६॥
४२ श्रीसाम्बपुराणम्
क्षणा मुहूर्त्ता दिवसा निशाः पक्षास्तथैव च।
मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च ॥७॥
तदादित्यादृते ह्येषां कालसंख्या न विद्यते।
कालादृते न नियमो नाग्नेर्विहरणक्रिया ॥८॥
क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर, षड् ऋतु, चारो युग—इन सबकी आदित्य के अतिरिक्त कोई कालसंख्या नहीं हो सकती। काल के विना कोई नियम नहीं है। निर्दिष्ट काल में ही सभी अनुष्ठानादि सम्पन्न होते हैं। काल के अभाव में अग्नि की कोई विहरण क्रिया भी नहीं है अर्थात् निर्दिष्ट काल में ही अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है॥७-८॥
ऋतूनामभिभावाच्च पुष्पं मूलं फलं कुतः।
कुतश्च सस्यनिष्पत्तिः तृणौषधिगणाः कुतः ॥९॥
अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च।
जगत्प्रतानमृते भास्करे वारितस्करम् ॥१०॥
ऋतुओं का आविर्भाव हुये विना फूल, मूल, फल कैसे उत्पन्न होंगे? कैसे शस्यादि तृण, औषधिगण उत्पन्न होंगे? उसके अभाव से जगत् में प्राणीगण तथा स्वर्ग लोक में देवगण के खाद्य का अभाव परिलक्षित होने लगेगा। जगत् को ताप न देकर भास्कर अपनी रश्मि संहत कर लेंगे। (जब रश्मियाँ संहत हो जायेंगी तब पानी वाष्प होकर कैसे मेघरूप में सञ्चित होगा)॥९-१०॥
नावृष्ट्या तपते सूर्यो नावृष्ट्या परितुष्यति।
नावृष्ट्या परिषध्यन्ते वारिणा दीयते रविः ॥११॥
वृष्टिपात के विना सूर्य ताप नहीं देते, वृष्टिपात के विना उनकी तुष्टि नहीं होती, वृष्टिपात के विना उनकी सिद्धि नहीं होती, जल के द्वारा ही रवि दान करते हैं॥११॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मकाञ्चनसन्निभः।
श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः ॥१२॥
हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः।
इति वर्णा समाख्याताः सूर्यस्य ऋतुसम्भवाः।
ऋतुस्वभावजैर्वर्णैः सूर्यः क्षेमे सुभिक्षकृत् ॥१३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यनिगमनं नामाऽष्टमोऽध्यायः
अष्टमोऽध्यायः ४३
अष्टमोऽध्यायः ४३
वसन्तकाल में सूर्य कपिलवर्ण, ग्रीष्म में स्वर्णतुल्य वर्ण, वर्षा में श्वेतवर्ण, शरत् काल में पाण्डुवर्ण धारण करते हैं। हेमन्त काल में सूर्य ताम्रवर्ण एवं शिशिर में लोहित-वर्ण हो जाते हैं। इस प्रकार सूर्य की प्रति ऋतु में वर्णकला का वर्णन किया गया। प्रति ऋतु में उन-उन वर्ण से रञ्जित होकर सूर्य शोभित होते हैं। यदि ऋतुओं का आविर्भाव न हो तब सूर्य अपने गृह में भिक्षुक के समान श्रीहीन प्रतीत होते हैं॥१२-१३॥
श्रीसाम्बपुराण में सूर्य-निगमन नामक अष्टम अध्याय समाप्त
द्वादशापि पृथक्त्वेन तानि वक्ष्याम्यशेषतः॥१॥
नवमोऽध्यायः
(सूर्यनिगमनम्)
नारद उवाच
अथादित्यस्य नामानि सामान्यानीह द्वादश।
द्वादशापि पृथक्त्वेन तानि वक्ष्याम्यशेषतः॥१॥
नारद कहते हैं—अब आदित्य के सामान्य द्वादश नाम कहता हूँ; पृथक् से भी इनके द्वादश नाम कहे गये हैं, अतः उन सबको विस्तृत रूपेण कहता हूँ॥१॥
आदित्यः सविता सूर्यो मिहिरोऽर्कः प्रभाकरः।
मार्त्तण्डो भास्करो भानुश्चित्रभानुर्दिवाकरः॥२॥
रविर्द्वादशकश्चैव ज्ञेयः सामान्यनामभिः।
विष्णुर्धाता भगः पूषा मित्रेन्द्रो वरुणोर्यमाः॥३॥
विवस्वानांशुमांस्त्वष्टा पर्जन्यो द्वादशः स्मृतः।
इत्येते द्वादशादित्याः पृथक्त्वेन प्रकीर्त्तिताः॥४॥
आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रभाकर, मार्त्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि—ये १२ सूर्य के साधारण नाम हैं। इसके अतिरिक्त विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इन्द्र, वरुण, यम, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये १२ भी अलग से आदित्य के नाम कहे गये हैं॥२-४॥
उत्तिष्ठन्ति सदा ह्येते मासैर्द्वादशभिः क्रमात्।
विष्णुस्तपति चैत्रे तु वैशाखे चार्यमा तथा॥५॥
विवस्वान् ज्येष्ठमासे तु आषाढ़े चांशुमान् स्मृतः।
पर्जन्यः श्रावणे मासे वरुणः प्रोष्ठसंज्ञके॥६॥
इन्द्राख्यश्चाश्विने मासे धाता तपति कार्तिके।
मार्गशीर्षे तपेन्मित्रः पौषे पूषा दिवाकरः॥७॥
माघे भगस्तु विज्ञेयस्त्वष्टा तपति फाल्गुने।
एतैर्द्वादशभिर्विष्णूरश्मिभिर्दीप्यते सदा॥८॥
ये क्रमानुसार सर्वदा द्वादश मास में प्रकट होते हैं। चैत्र मास में विष्णु नामक सूर्य ताप प्रदान करते हैं। वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ में विवस्वान्, आषाढ़ में अंशुमान्, श्रावण में पर्जन्य, भाद्र में वरुण, आश्विन में इन्द्र, कार्तिक में धाता, अग्रहायण में मित्र ताप प्रदान
नवमोऽध्यायः ४५
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करते हैं। पौष मास में पूषा, माघ में भग तथा फाल्गुन में त्वष्टा नामक सूर्य ताप देते हैं। यह द्वादशरूप विष्णुरश्मि द्वारा सदा दीप्त होते हैं॥५-८॥
दीप्यते गोसहस्रेण शतैश्च त्रिभिरर्यमा।
द्विसप्तकैर्विवस्वांस्तु ह्यंशुमान् पञ्चकैस्त्रिभिः ॥९॥
विवस्वानिव पर्जन्यो वरुणश्चार्यमा तथा।
इन्द्रस्तु द्विगुणैः षड्भिर्धतैकादशभिः शतैः ॥१०॥
मित्रस्तु दशभिः सार्द्धः पूषा तु दशभिः शतैः।
मित्रवच्च भगस्त्वष्टा सहस्रेण शतेन च ॥११॥
३०० किरणों द्वारा अर्यमा दीप्त होते हैं। १४०० किरणों से विवस्वान् तथा १५०० किरणों से अंशुमान दीप्त होते हैं। विवस्वान् के ही समान (१४०० किरणों से) पर्जन्य, वरुण तथा अर्यमा दीप्त होते हैं। किन्तु इन्द्र १२०० किरणों से, धाता ११०० किरणों से, मित्र १५०० किरणों से एवं एक हजार किरणों से ही पूषा दीप्त होते हैं। भग १५०० किरणों से तथा सहस्र-शत किरणों से त्वष्टा दीप्त होते हैं॥९-११॥
उत्तरोपक्रमेऽर्कस्य वर्धन्ते रश्मयस्तथा।
दक्षिणोपक्रमे तस्य ह्रसन्ते सूर्यरश्मयः ॥१२॥
एवं रश्मिसहस्रं तत् सूर्यलोकार्थसाधकम्।
भिद्यते ऋतु-मासाद्यैः सहस्रं बहुधा पुनः ॥१३॥
एवं नाम्ना चतुर्विंशतिरेषा च प्रकीर्त्तिता।
विस्तरेण सहस्रं तु पुनरन्यत् प्रकीर्त्तितम् ॥१४॥
उत्तरायणं में सूर्य की रश्मि वृद्धि को प्राप्त होती है एवं दक्षिणायन में उसका ह्रास होता है। इस प्रकार की सहस्र रश्मि से सूर्यलोक के प्रयोजन-साधक ऋतु-मासप्रभृति में भेद होता है और भी बहुरूप सहस्र भेद प्राप्त होते हैं। इस प्रकार चौबीस नाम सूर्य के कहे गये हैं। विस्तृत रूप से और भी १००० नाम कहे गये हैं॥१२-१४॥
अथ चैषां पुनर्नाम्नां धात्वर्थनिगमं शृणु।
दिव्यानां पार्थिवानां च वंशानामिह सर्वशः ॥१५॥
अदनान्नित्यमादित्यस्तपसां तेजसामयम्।
अदितेर्वा सुतो यस्मान्निगमज्ञैरुदाहृतः ॥१६॥
अपत्यप्रत्ययात्तस्मात् सूर्यस्यादित्यता स्मृता ॥१७॥
अब इन नामों की धातु तथा अर्थगत व्युत्पत्ति को सुनो। दिव्य तथा पार्थिव नामों को सर्वतोभावेन (अर्थयुक्त) सुनो। ये तपस्या तथा तेज का ग्रहण करने वाले (भक्षणकारी) हैं; अतः आदित्य हैं। अथवा देवमाता अदिति के पुत्र होने के कारण वेदविद् इन्हें आदित्य
४६ श्रीसाम्बपुराणम्
कहते हैं। अदिति के पुत्र इस अर्थ में अपत्यार्थ ‘ण्य’ प्रत्यय के योग से इनका नाम आदित्य कहा गया है॥१५-१७॥
स्रवन्ति स्यन्दनार्थे च धातुरेषा निपात्यते।
स्रवणात्तेजसोऽब्द्वा च तेनासौ सविता स्मृतः॥१८॥
शश्वच्च जायते यस्माच्छश्वत् संतिष्ठते यतः।
तस्मात् सर्वैः स्मृतः सूर्यो निगमज्ञैर्मनीषिभिः॥१९॥
प्रसव करना तथा क्षरित होना अर्थ में (सू) धातु निपातन से एवं साक्षात् तेज के क्षरणार्थ इन्हें सविता कहते हैं। जिससे निरन्तर प्राणिगण उत्पन्न होते हैं और जिनके कारण जीवगण अवस्थान करते हैं; अतः सभी वेदज्ञों ने इन्हें सूर्य कहा है॥१८-१९॥
नुदिति प्रेरणे धातुर्भादीप्तौ चैव कीर्त्तितः।
नोदनात् कारणादासां भानुरित्यभिधीयते॥२०॥
‘नु’ शब्द के प्रेरण एवं ‘भा’ धातु के ‘दीप्ति पाना’ अर्थ से, रश्मिसमूह का प्रेरण तथा दीप्ति प्राप्त करने के कारण इन्हें भानु कहा गया है॥२०॥
चित्रा हि भानवो यस्य वर्णैः शुक्लादिभिर्यतः।
भानवो रश्मयः प्रोक्ताश्चित्रभानुस्ततः स्मृतः॥२१॥
भास्वतस्तु करा ह्यस्य भासोऽत्यर्थं करोति च।
भासृ दीप्तौ स्मृतो धातुर्भास्करस्तेन स स्मृतः॥२२॥
चित्र अर्थात् जिनकी शुक्लादि अनेक वर्ण की रश्मियाँ हैं, (यहाँ भानु शब्द से रश्मि का तात्पर्य है) इसलिये उन्हें चित्रभानु कहते हैं। जिनके किरणसमूह उज्ज्वल हैं, जो अत्यन्त दीप्ति प्रदान करते हैं। ‘भा’ धातु का दीप्ति अर्थ है; अतः इन्हें भास्कर शब्द से कहा जाता॥२१-२२॥
भा दीप्तावित्ययं धातुश्चोपसर्गेण योजितः।
भास्करोति प्रकर्षेण यस्मात्तस्मात् प्रभाकरः॥२३॥
दिवेति चाव्ययं लिङ्गं पठ्यते सूरिभिः सदा।
दिवा करोति यस्माच्च तस्मादेव दिवाकरः॥२४॥
‘भा’ धातु दीप्ति अर्थ में उपसर्ग के साथ युक्त है। प्रकर्षरूपेण जो दीप्ति दान करते हैं, अतः सूर्य का नाम प्रभाकर नाम है। दिवा शब्द को पण्डितगण अव्यय लिङ्ग में कहते हैं; क्योंकि दिन करते हैं, इसलिये वे दिवाकर हैं॥२३-२४॥
अवति त्रीनिमांल्लोकान् यस्मादेष परिभ्रमन्।
अवेति रक्षणे धातुरवनात् सविता स्मृतः॥२५॥
नवमोऽध्यायः ४७
नवमोऽध्यायः ४७
क्योंकि यह सूर्य परिभ्रमण करके लोकत्रय की रक्षा करते हैं। रक्षणार्थ ‘अव’ धातु होता है। रक्षा करने के कारण इनको सविता कहते हैं।।२५।।
देवैरभ्यर्चितो यस्मात्तस्मादर्कः स उच्यते।
अण्डे द्विधा कृते ह्यार्त्तं दृष्ट्वा स्नेहात्पिताऽब्रवीत्।
आर्त्तो मा भव देवेश मार्त्तण्डस्तेन स स्मृतः॥२६॥
देवगण उनकी अर्चना करते हैं, तभी वे अर्क हैं। अण्ड को दो भाग में विभक्त होने पर उन्हें आर्त देखकर पिता ने स्नेह से कहा—हे देवेश! तुम आर्त न हो। तभी उनको मार्तण्ड कहा जाने लगा।।२६।।
यस्माद् धारयते लोकान् भूमिं तेषां ददाति च।
डुधाञ् धारणे धातुस्तस्माद् धाता स उच्यते॥२७॥
क्योंकि लोकों को धारण करते हैं तथा उन्हें भूमिदान करते हैं। धा धातु (डुधाञ्) का अर्थ है—धारण करना। तभी उन्हें धाता कहा जाता है।।२७।।
अचि प्रत्ययपूर्वस्य ऋधातोर्यनिनिपात्यते।
गतौ यस्मात् परो नास्ति तेन सूर्योऽर्यमा स्मृतः॥२८॥
ऋ धातु के गमनार्थक य (ऋ + मन्—कनिन्) प्रत्यय के अर्थ में, जो गमन करते हैं अथवा जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। इस अर्थ में सूर्य को अर्यमा कहा गया है।।२८।।
स्नेहेन सर्वभूतानि यस्मात् त्रायति भास्करः।
ञिमिधा स्नेहने धातुस्तस्मान्मित्रः स उच्यते॥२९॥
भास्कर स्नेहवशात् सभी प्राणियों की विपत्ति से रक्षा, त्राण करते हैं। मिद् धातु का अर्थ है—स्नेह, इसलिये इन्हें मित्र कहा गया है।।२९।।
वरान् विवृणवतो देवान् वरदो हि वरार्थिनाम्।
धातुर्वृङ् वरणे प्रोक्तस्तेनासौ वरुणः स्मृतः॥३०॥
वरप्रार्थी देवगण सर्वदा जिनसे वर माँगते रहते हैं, जो उनके लिये वरद हैं, वृ (वृञ्) धातु का अर्थ है—वरण। इसलिये ये वरुण कहे गये हैं।।३०।।
ऐश्वर्यं परमं यस्य पन्नगाश्च सुरासुराः।
ईद्दिश्च परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततस्तु सः॥३१॥
सभी देवता, असुर तथा पन्नगगण जिनके परम ऐश्वर्य हैं, यहाँ इदि धातु का ऐश्वर्य अर्थ है, अतः ये इन्द्र नाम से ख्यात हैं।।३१।।
शक्तोऽयं जगतः कर्तुं सर्गानुग्रहसंग्रहान्।
शक्लृ शक्तौ स्मृतो धातुः शक्रस्तेन स उच्यते॥३२॥
४८ श्रीसाम्बपुराणम्
ये जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनाश करने में सक्षम हैं, शक् धातु का अर्थ है—समर्थ; अतः इन्हें शक्र कहा गया है॥३२॥
वसत्यदृष्टः सर्वेषु भूतेष्वन्तर्हितो रविः।
धातुर्वस निवासेति विवस्वांस्तेन तूच्यते ॥३३॥
रवि सभी प्राणियों के अभ्यन्तर में अदृश्य तथा अन्तर्हित होकर वास करते हैं। 'वस' धातु का अर्थ है—निवास। इसलिये इनका नाम विवस्वान् कहा गया है॥३३॥
गर्जशब्दे प्रपूर्वस्य धातोः पर्जन्निपातके।
गर्जत्यतीव यस्माच्च तस्मात् पर्जन्य उच्यते ॥३४॥
प्रपूर्वक गर्ज धातु के निपात से पर्जन शब्द निष्पन्न होता है, क्योंकि वे अत्यन्त गर्जन करते हैं, इसलिये इन्हें पर्जन्य नाम से कहा गया है॥३४॥
यस्मात् सिञ्चति लोकांस्त्रीन् भूर्भुवःस्वोऽमृतादिभिः।
पुष पुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् पूषा स उच्यते ॥३५॥
अमृतादि द्वारा भू-भुवः तथा स्वः—इन लोकत्रय का सिञ्चन (पोषण) करते हैं। पुष धातु का अर्थ है—पुष्टि (पोषण करना); इस कारण उनको पूषा कहते हैं॥३५॥
अंशु व्याप्तावयं धातुः प्रियश्चापानुरागतः।
सूर्यो व्याप्तं जगद् यस्मात्तस्मादंशुः स उच्यते ॥३६॥
अंशु धातु का अर्थ है—व्याप्ति एवं प्रीति तथा अनुरागवशात् सूर्य समस्त जगत् को व्याप्त करते हैं; अतः उनको अंशु कहा जाता है॥३६॥
सेव्यते यः सुरैः सर्वैः भांश्चैव भजते यतः।
धातुर्भजेति सेवायां तेनासौ भग उच्यते ॥३७॥
सकल देवगण के द्वारा जो सेवित होते हैं, क्योंकि ये किरणसमूह का भजन करते हैं। भज धातु का अर्थ है—सेवा; अतः यह सूर्य भग नाम से उक्त हैं॥३७॥
तुष तुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् त्वष्टा निपात्यते।
सृजत्येष प्रजास्तुष्टस्त्वष्टा तेन स उच्यते ॥३८॥
तुष धातु का अर्थ तुष्टि है। उससे त्वष्टा शब्द का निपातन होता है। ये तुष्ट होकर प्रजागण की सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा गया है॥३८॥
यस्माद्विश्वमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः।
विष्ऌ व्याप्तौ स्मृतो धातुस्तस्माद्विष्णुः स उच्यते ॥३९॥
आदित्य अपनी रश्मि द्वारा इस समस्त विश्व को व्याप्त करते हैं; विष्ऌ धातु का व्याप्ति अर्थ है, तभी वे विष्णु हैं॥३९॥
नवमोऽध्यायः ४९
नवमोऽध्यायः ४९
बृहदस्य शरीरं यदप्रमेयं प्रमाणतः।
बृहद्विस्तीर्णमित्युक्तं ब्रह्मा तेन स उच्यते ॥४०॥
इनका बृहद् शरीर परिमाण में अप्रमेय है; बृहद् का अर्थ है—विस्तीर्ण। अतः वे ब्रह्मा कहे जाते हैं॥४०॥
पूज्यन्ते च सुरैः सर्वैर्महांश्चैव प्रमाणतः।
धातुर्मह तु पूजायां महादेवस्ततः स्मृतः॥४१॥
समस्त देवताओं से जो पूजित होते हैं तथा प्रमाणतः जो महान् हैं। मह धातु का अर्थ है—पूजा; अतः वे महादेव कहे गये हैं॥४१॥
सन्निवर्हति यद्वीक्षेद् यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांस-शोणित-मज्जादौ यत्ततो रुद्र उच्यते ॥४२॥
जो निर्वाह करते हैं, जो देखते हैं, जो उग्र तथा प्रतापवान हैं, जो मांस, रक्त, मज्जादि में वर्त्तमान हैं, इसलिये वे रुद्र कहे जाते हैं॥४२॥
यस्मात् सृष्ट्यनुगृह्लीते गृह्यते चैव यत् पुनः।
गुणात्मना तु त्रैकाले तस्मादेकः स उच्यते ॥४३॥
जो गुणात्मस्वरूप है (सत्त्व, रज, तमरूप); जो सृष्टि तथा अनुग्रह करते हैं, पुनः ग्रहण करते हैं (लय करते हैं); इसीलिये उनको त्रैकाल कहा जाता है॥४३॥
अयं परमयं नेति ब्रुवन्ते भिन्नदर्शनाः।
तामसान् मूढभावाच्च दृष्ट्वा तान् विब्रुवन्ति च॥४४॥
भिन्न दर्शन वाले इन्हें 'हैं, नहीं हैं'—इत्यादि से कहते हैं। तामस तथा मूढ़ भाव वाले ऐसा कहते हैं॥४४॥
ब्रह्मणः कारणः केचित् केचिदाहुर्दिवाकरम्।
केचिद्भक्तिपरत्वेन त्वाहुः विष्णुं तथापरे ॥४५॥
कारणं तु स्मृता होते नानार्थेषु सुरोत्तमाः।
एकः स तु पृथक्त्वेन स्वयम्भुरिति विश्रुतः॥४६॥
कुछ लोग सूर्य को ही ब्रह्मा की उत्पत्ति में कारण मानते हैं, तो कुछ लोग भक्ति के वशीभूत होकर विष्णु को कारण मानते हैं। ये देवश्रेष्ठगण नाना अर्थ में 'कारण' कहे गये हैं। वे इन सबसे पृथक् रूप से अकेले ही स्वयम्भु हैं॥४५-४६॥
यथानुरुध्यते वर्णैर्विचित्रैः स्फटिको मणिः।
तथा गुणवशात्तस्य स्वयम्भोरनुरञ्जनात् ॥४७॥
जैसे स्फटिक मणि विचित्र वर्णाभा से युक्त होती है, वैसे ही गुणवशतः अनुरञ्जन हेतु वे स्वयम्भु नाना रूप से युक्त होते हैं॥४७॥
५० श्रीसाम्बपुराणम्
एको भूत्वा महामेघः पृथक्त्वेनावतिष्ठते।
वर्णतो रूपतश्चैव यथा गुणवशानुगः॥४८॥
जैसे महामेघ एक होने पर भी गुणवशात् वर्ण तथा रूपभेद से पृथक्-पृथक् रूप से अवस्थित रहता है, वैसे ही एक स्वयम्भु सूर्य गुणवशतः पृथक्-पृथक् रूप से प्रतीत होते हैं॥४८॥
नभसः पतितः तोयं याति तोयान्तरं यथा।
भूमे रसविशेषेण तथा गुणवशात्तु सः॥४९॥
जैसे आकाश से पतित जल भूमि तथा विशेष रस के साथ युक्त होकर अन्न-जलरूप में प्रतीत होता है, वैसे ही वे गुणवशात् पृथक् रूप में प्रतीत होते हैं॥४९॥
यथा दिव्यविशेषाद्वा वायुरेकः पृथग् भवेत्।
दुर्गन्धो वा सुगन्धो वा तथा गुणवशात्तु सः॥५०॥
जैसे आकाश में अविशेष एक वायु दुर्गन्ध अथवा सुगन्धभेद से पृथक् होती है, वैसे ही गुणवशात् वह सूर्य पृथक् रूपेण प्रतिभात होता है॥५०॥
यथा वा गार्हपत्योऽग्निरन्यत्संज्ञान्तरं व्रजेत्।
दक्षिणााहवनीयादि ब्रह्मादिषु तथा ह्यसौ॥५१॥
जैसे एक गार्हपत्य अग्नि दक्षिण, आहवानीयादि भेद से पृथक् संज्ञायुक्त हो जाती है, वैसे ही एक सूर्य ब्रह्मादि विविध नाम से अभिहित होते हैं॥५१॥
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्।
तस्माद्भक्तिः परा कार्या देवे ह्यस्मिन् दिवाकरे॥५२॥
एकत्व तथा पृथक्त्व का यही कारण है। अतएव दिवाकर की परम भक्ति करना ही उचित है॥५२॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः।
एष वेदाश्च यज्ञाश्च स्वर्गश्चैव न संशयः॥५३॥
ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही समस्त वेद, यज्ञ तथा स्वर्गलोक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है॥५३॥
सूर्यव्याप्तमिदं विश्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
अद्यते पीयते चैव अन्नपानात्मको रविः॥५४॥
स्थावर-जङ्गमात्मक यह समस्त विश्व सूर्य से ही व्याप्त है। ये ही भक्षित तथा पीत होते हैं। अन्नपानात्मक रवि यही हैं॥५४॥
नवमोऽध्यायः ५१
नवमोऽध्यायः ५१
सर्वत्र सविता देवस्तनूभिर्नामभिश्च सः। नृक्षेषु चातिथौ वायौ व्योम्नि चाग्नौ च सर्वशः ॥५५॥
नक्षत्र, अतिथि, वायु, आकाश तथा अग्नि सर्वत्र—यह सविता देव विशेष तनु तथा विभिन्न नाम से विद्यमान हैं॥५५॥
एवंविधो ह्ययं सूर्यः सदा पूज्यो विजानता। आदित्यं वेत्ति यत्नेन स तस्मिन्नेव लीयते ॥५६॥
इस प्रकार से विज्ञजन के लिये सूर्य सदा पूज्य हैं। इन आदित्य को जो जानते हैं, वे इन्हीं में लीन हो जाते हैं॥५६॥
अप्येकं वेत्ति यो नाम धात्वर्थनिगमैः रवेः। स रागैर्वर्जितः सर्वैः सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥५७॥ नहि पापकृतः साम्ब भक्तिर्भवति भास्करे। तस्मात्त्वं परया भक्त्या प्रपद्यस्व दिवाकरम् ॥५८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्य-निगमनं नाम नवमोऽध्यायः
रवि के नाम-धात्वर्थ तथा निगमों द्वारा जो एक सूर्य को भी जानते हैं, वे सभी रोगों से आरोग्य प्राप्त करके सद्यः पापमुक्त हो जाते हैं। हे साम्ब! पापकारी लोग कभी भी भास्कर की भक्ति नहीं पाते। अतएव तुम परम भक्ति के साथ दिवाकर के शरणागत हो जाओ॥५७-५८॥
श्रीसाम्ब पुराणान्तर्गत सूर्य के विभिन्न नामों का अर्थ-निरूपण नामक नवम अध्याय समाप्त
दशमोऽध्यायः
(राज्ञी-निक्षुभोत्पत्तिः)
वशिष्ठ उवाच
एवं श्रुत्वा तु कात्स्न्र्येन दृष्टो जाम्बवतीसुतः।
जातकौतूहलो भूयः परिपप्रच्छ नारदम् ॥१॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—ऐसा समुदाय वृत्तान्त सुनकर आनन्दित होकर जाम्बवती-पुत्र साम्ब ने कौतूहल-वशात् नारद से पूछा।।१।।
साम्ब उवाच
अहो सूर्यस्य माहात्म्यं वर्णितं हर्षवर्धनम्।
येन मे भक्तिरुत्पन्ना परे देवे विभावसौ ॥२॥
अतो राज्ञीं महाभागां निक्षुभां च महामुने।
दण्डिनं पिङ्गलादींश्च एवमेतद् वदस्व मे ॥३॥
साम्ब कहते हैं—अहो! आनन्दवर्धक सूर्य के माहात्म्य का आपने वर्णन किया; जिससे परमदेव विभावसु में मेरी भक्ति उत्पन्न हो गई है। अतः हे महामुने! महाभाग्यवती राज्ञी तथा निक्षुभा, दण्डी तथा पिङ्गलादि की कथा भी मुझसे कहिये।।२-३।।
नारद उवाच
प्रागुक्तेऽर्कस्य द्वे भार्ये ते राज्ञीनिक्षुभे शुभे।
तयोश्च राज्ञी द्यौर्ज्ञेया निक्षुभा पृथिवी स्मृता ॥४॥
पौषस्य कृष्णसप्तम्यां द्यौरर्केणेह पूज्यते।
माघस्य कृष्णसप्तम्यां मह्या सह भवेद्रविः ॥५॥
नारद कहते हैं—पहले जो सूर्य की दो पत्नियों की बातें कही हैं, (मंगलमयी राज्ञी तथा निक्षुभा) इनमें राज्ञी है—स्वर्ग तथा निक्षुभा हैं—पृथिवी। पौष मास के कृष्णपक्ष की सप्तमी को राज्ञी का पूजन अर्क (सूर्य) के साथ होता है एवं माघ मास की कृष्ण सप्तमी को निक्षुभा के साथ रवि पूजित होते हैं।।४-५।।
भूश्चादित्यश्च भगवान् गच्छतः सङ्गमं तदा।
ऋतुस्नाता मही तत्र गर्भं गृह्णाति भास्करात् ॥६॥
द्यौर्जलं सूर्यतो गर्भं वर्षार्त्तुषु भूतले।
तत्र लौकिकवार्त्तार्थं मही सस्यं प्रसूयते ॥७॥
तब पृथिवी एवं भगवान् आदित्य संगत होते हैं। ऋतुस्नाता पृथिवी वहाँ भास्कर से
दशमोऽध्यायः ५३
दशमोऽध्यायः ५३
गर्भ धारण करती हैं। स्वर्ग लोक में सूर्य से जलरूप गर्भ धारण करके वर्षा ऋतु में भूतल पर जल प्रदान करती है। लौकिक जीविकार्थ शस्य उत्पन्न होता है।।६-७।।
सस्योपयोगसंहृष्टा आहुतिं जुह्वति द्विजाः।
स्वाहाकारैः वषट्कारैर्यजन्ते पितृदेवताः ॥८॥
शस्यलाभ से प्रसन्न होकर ब्राह्मणगण यज्ञ में भूतल पर आहुति देते हैं। स्वाहाकार तथा वषट्कार द्वारा पितृदेवों का यजन करते हैं।।८।।
निक्षुभा कुरुते यस्मादोषधीभिः स्वधामृतैः।
मर्त्यान् पितॄंश्च देवांश्च तेन भूर्निक्षुभा स्मृता ॥९॥
निक्षुभा औषधी ही स्वधा तथा अमृत द्वारा मनुष्य, पितृगण तथा देवताओं को स्वस्थ करती हैं, अतएव पृथिवी को निक्षुभा कहा गया है।।९।।
यथा राज्ञी द्विधा भूता यस्य चेयं सुता स्मृता।
अपत्यानि च यान्यस्यास्तानि वक्ष्यामि तच्छृणु ॥१०॥
जिस प्रकार से राज्ञी ने दो स्वरूप ग्रहण किया है और उन्हें कन्या कहा गया है और उनके जितने सन्तान हैं, उन सबको कहता हूँ; सुनो।।१०।।
मरीचिर्ब्रह्मणः पुत्रो मरीचेः कश्यपः सुतः।
तस्माद्धिरण्यकशिपुः प्रह्लादस्तस्य चात्मजः ॥११॥
प्रह्लादस्य सुतो नाम्ना विश्रुतोऽथ विरोचनः।
विरोचनस्य भगिनी सञ्ज्ञाया जननी तु सा ॥१२॥
मरीचि ब्रह्मा के पुत्र हैं। मरीचि के पुत्र हैं—कश्यप। उनके पुत्र थे—हिरण्यकशिपु एवं इनके पुत्र थे—प्रह्लाद। विरोचन नाम का विख्यात प्रह्लाद का पुत्र हुआ। विरोचन की बहन सञ्ज्ञा को उत्पन्न करने वाली हुई।।११-१२।।
हिरण्यकशिपोः पौत्री दितेः पुत्रस्य सा स्मृता।
सा विश्वकर्मणः पत्नी प्रह्लादी चोच्यते बुधैः ॥१३॥
हिरण्यकश्यप की पौत्री दिति विश्वकर्मा की पत्नी थी। उन्हें प्रह्लादी (प्रह्लाद की पुत्री) भी कहते हैं।।१३।।
अथ नाम्ना सुरूपेति मरीचेर्दुहिता शुभा।
पत्नी त्वङ्गिरसः सा तु जननी च बृहस्पतेः ॥१४॥
बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवनी ब्रह्मवादिनी।
प्रभासस्य तु सा पत्नी वसूनामष्टमस्य तु ॥१५॥
तदनन्तर सुरूपा नामक मरीचि की जो कन्या थीं, वे ऋषि अंगिरस की पत्नी तथा बृहस्पति की जननी थीं। बृहस्पति की भगिनी ब्रह्मवादिनी भुवनी अष्टम वसु प्रभास की पत्नी हैं।।१४-१५।।
५४
श्रीसाम्बपुराणम्
प्रसूता विश्वकर्माणं सर्वशिल्पवतां वरम्।
स वै नाम्ना पुनस्त्वष्टा त्रिदशानां स वर्धकिः॥१६॥
उन्होंने सभी शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा को जन्म किया। वे पुनः देवताओं के संवर्धक त्वष्टा भी कहे जाते हैं॥१६॥
देवाचार्यस्य तस्यायं दुहिता विश्वकर्मणः।
सरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भाविनी ॥१७॥
इन देवाचार्य विश्वकर्मा की कन्या सरेणु नाम से प्रख्यात है। ये त्रैलोक्य का उत्पादन करने वाली हैं॥१७॥
राज्ञी संज्ञा च सा स्त्री च प्रभा सैव तु भास्वतः।
तस्या एव सुता छाया निक्षुभा सा महीयसी ॥१८॥
राज्ञी, संज्ञा तथा प्रभा नाम से ख्यात ये सूर्यपत्नी हैं। उनकी कन्या है—छाया, जो पृथ्वीमयी निक्षुभा हैं॥१८॥
विशेष—पुराणों में छाया को सूर्यपत्नी कहा गया है—'छायामार्त्तण्ड सम्भूत'। छाया एवं सूर्यसम्भूत (पुत्र) शनि हैं। परन्तु यहाँ इस श्लोक के अनुसार छाया सूर्यपुत्री हैं। यह संदेहास्पद कथन है। हो सकता है कि यह पाठ की त्रुटि हो। इसका पाठान्तर है—तस्या एषा तु या छाया। विज्ञजन सत्यासत्य का निर्णय स्वयं करें।
सापि भार्या भगवतो मार्तण्डस्य महात्मनः।
साध्वी पतिव्रता देवी रूपयौवनशालिनी।
रन्तुं वै नररूपेण सूर्यो भवति वै पुरा ॥१९॥
वे भी भगवान् मार्तण्ड की भार्या हैं। वे साध्वी, पतिव्रता, रूप-यौवनशालिनी देवी हैं। पूर्व में सूर्य से रमण करने के लिये उन्होंने नररूप धारण किया था॥१९॥
आदित्यस्य तु यद्रूपं महता स्वेन तेजसा।
गात्रेषु प्रतिरुद्धेषु नातिकान्तमिवाभवत् ॥२०॥
अन्विष्यन्नेषु गात्रेषु भगं दृष्ट्वा पिताब्रवीत्।
आर्त्तत्त्वं भव मार्त्तण्ड मार्त्तण्डस्तेन न स्मृतः ॥२१॥
इति साम्बपुराणे राज्ञीनिक्षुभोत्पत्तिर्नाम दशमोऽध्यायः
निज के महान् तेज से आदित्य का जो रूप है, गात्र में प्रतिरुद्ध होकर वह अति कमनीय नहीं है। (उनके शरीर का) गात्र का अन्वेषण करके भग को देखकर (सूर्य को देखकर) पिता ने कहा है—मार्त्तण्ड! तुम आर्त न होओ, अतः उनका नाम मार्त्तण्ड पड़ा॥२०-२१॥
श्री साम्बपुराण में राज्ञी तथा निक्षुभा की उत्पत्ति-नामक दशम अध्याय समाप्त
एकादशोऽध्यायः
(सूर्यपुत्राणां विवरणम्)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रजास्तस्य महात्मनः।
त्रीण्यपत्यानि संज्ञायां जनयामास वै रविः॥१॥
द्वौ पुत्रौ तु महाभागौ कन्यां कालिन्दिमेव च।
मनुर्वैवस्वतो ज्येष्ठः श्राद्धदेवः प्रजापतिः॥२॥
ततो यमो यमी चैव यमलौ सम्बभूवतुः।
तेजस्त्वभ्यधिकं तस्य नित्यमेव विवस्वतः॥३॥
नारद कहते हैं—इसके पश्चात् महात्मा सूर्य के सन्तानों का वर्णन करता हूँ। रवि की संज्ञा नामक भार्या से तीन सन्तानें हुईं। महाभाग्यवान दो पुत्र हुये तथा कन्या कालिन्दी का जन्म हुआ। ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु तथा द्वितीय हैं—प्रजापति श्राद्धदेव। तत्पश्चात् यमज (जुड़वा) सन्तान हुई—यम तथा यमी। इस प्रकार इन सूर्य का तेज नित्य अधिक होने लगा॥१-३॥
तेनातितापयामास त्रींल्लोकान् सचराचरान्।
गोलाकारं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः।
असहन्ती तु तत्तेजः स्वां छायां प्रेष्य चाब्रवीत्॥४॥
सूर्य का वह तेज तीनों लोकों को तापित करने लगा। सूर्य का वह गोलाकार रूप देखकर संज्ञा उसे सहन न कर सकी। उन्होंने अपनी छाया से कहा॥४॥
संज्ञोवाच
भव नारीस्वरूपा त्वं लक्षणैः सदृशी मम॥५॥
एवमुक्त्वा समुत्तिष्ठत्तस्याः सदृशलक्षणा।
महीमयी तु सा संज्ञा तस्या च्छाया समुत्थिता॥६॥
संज्ञा कहती है—‘तुम मेरे समान नारीरूपा हो जाओ’। तत्पश्चात् संज्ञा पृथिवीमयी होकर छायारूपेण उत्थित हो गयीं॥५-६॥
प्राञ्जलिः प्रणता भूत्वा छाया संज्ञामभाषत॥७॥
यदर्थमहमुत्पन्ना तदाज्ञापय शोभने।
सर्वमेव करिष्यामि यद्यपि स्यात्तु दुष्करम्॥८॥
५६ | श्रीसाम्बपुराणम्
विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके छाया ने संज्ञा से कहा कि मैं जिस कार्य के लिये उत्पन्न हुई हूँ, मुझसे कहें। आप जो भी कहेंगी, वह सब मैं करूँगी, यद्यपि यह बहुत ही दुष्कर है॥७-८॥
संज्ञोवाच
अहं यास्यामि भद्रं ते स्वयमेव गृहं विभुः।
निर्विकारेण वक्तव्यं त्वयेह भवने मम ॥९॥
हेमौ च बालकौ ह्यङ्के कन्या च वरवर्णिनी।
सम्भाव्या नैव चाख्येयमिदं भगवतस्त्वया ॥१०॥
संज्ञा कहती है—तुम्हारा मंगल हो, मैं अपने पिता के घर जाऊँगी। तुम मेरे रूप में स्थिर भाव से अवस्थान करो। इन दो बालकों की तथा वरवर्णिनी गोद की कन्या की तुम देखभाल करो। तुम भगवान् सूर्य से कभी भी यह सब नहीं कहना॥९-१०॥
नाख्यास्यामि मतं तस्मै गच्छ देवि! यथासुखम्।
इत्युक्ता छायया संज्ञा जगाम भवनं पितुः ॥११॥
पितुः समीपे गत्वा तु व्रीड़िता सा तपस्विनी।
वर्षाणां तु सहस्रं वै वसमाना पितुर्गृहे ॥१२॥
छाया ने उत्तर दिया—मैं तुम्हारी बात को सूर्यदेव से कभी प्रकट नहीं करूँगी। हे देवि! तुम यथासुख जाओ। छाया द्वारा ऐसा कहने पर संज्ञा पिता के घर चली गयीं; किन्तु पिता के पास जाकर लज्जित होकर सहस्र वर्ष-पर्यन्त पिता के घर में रहती हुई तपस्या करने लगीं॥११-१२॥
भर्तुः समीपं याहीति पित्रोक्ता सा पुनः पुनः।
आगच्छत् बड़वा भूत्वा त्यक्त्वा रूपं यशस्विनी ॥१३॥
जब पिता ने बार-बार यह कहा कि स्वामी के पास जाओ, तब उन यशस्विनी ने अपना रूप छोड़कर घोड़ी का रूप धारण कर लिया॥१३॥
उत्तरांश्च कुरून् गत्वा तृणान्यथ चचार ह।
ततो गतायां संज्ञायां संज्ञायां वचनेन सा ॥१४॥
संज्ञारूपं ततः कृत्वा छाया सूर्यमुपस्थिता।
द्वितीयायां तु संज्ञायां संज्ञेयमित्यचिन्तयत् ॥१५॥
तदनन्तर संज्ञा उत्तर कुरु में जाकर तृण खाती हुई रहने लगी। इधर संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर छाया संज्ञा के कथनानुसार संज्ञा का रूप धारण करके सूर्य के पास गई और उन्हें भगवान् सूर्यदेव ने भी संज्ञा ही समझा॥१४-१५॥
एकादशोऽध्यायः ५७
एकादशोऽध्यायः ५७
भास्करो जनयामास पुत्रौ कन्यां च रूपिणीम् । पूर्वजस्य मनोस्तुल्यौ सादृश्येन च तावुभौ ॥१६॥ छाया को सूर्यदेव से दो पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई। उन पुत्रद्वय ने ज्येष्ठ भ्राता मनु का सादृश्यलाभ किया॥१६॥
श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ श्रुतकर्मा तथैव च । श्रुतकर्मा मनुस्ताभ्यां सावर्ण्यो भविष्यति ॥१७॥ श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ एवं श्रुतकर्मा भी उसी प्रकार थे। श्रुतश्रवा तथा मनु से बहुत से सूर्यवंशीगणों का उद्भव हुआ। श्रुतश्रवा भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥१७॥
श्रुतकर्मा स विज्ञेयो ग्रहो यो वै शनैश्चरः । कन्या च तपती नाम्ना रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥१८॥ श्रुतकर्मा ग्रहरूप में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वे शनिग्रह नाम से प्रसिद्ध हैं और कन्या तपती रूप में अत्यन्त अपूर्व थी॥१८॥
संज्ञा तु पार्थिवी तेषामात्मजानां तथाकरोत् । स्नेहेन पूर्वजानां तु तथा कृतवती तु सा ॥१९॥ पृथिवी संज्ञा (अर्थात् छाया) अपने पुत्र से जितना स्नेह करती थी, वैसा पूर्वजात (पहले उत्पन्न हुये) संज्ञा के पुत्रों से नहीं करती थी॥१९॥
मनुस्तु क्षमते तस्या यमस्तस्या न च क्षमेत् । बहुशो शोच्यमानस्तु पितुः पत्न्या सुदुःखितः ॥२०॥ स वै कोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य गौरवात् । पादेन तर्जयामास छायां वैवस्वतो यमः ॥२१॥ वह मनु को जिस प्रकार प्रेम करती थी, उस प्रकार यम को प्रेम नहीं करती थी, इस कारण अत्यधिक शोक करते हुये अपने पिता की पत्नी से दुःखित उन वैवस्वत यम ने क्रोध से बाल्यवशात् तथा भावी दैवावेश के कारण पैर से छाया का तर्जन किया॥२०-२१॥
तं शशाप ततः क्रुद्धा संज्ञा सा पार्थिवी शुभा । यदा तर्जयसे यन्मां पितुर्भार्या गरीयसीम् । तस्मात्तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ॥२२॥ इससे क्रुद्ध होकर पार्थिवी संज्ञा (छाया) ने यम को अभिशाप दिया कि 'पिता की भार्या गरीयसी होती है; क्योंकि तुमने मेरा तर्जन किया है, अतएव तुम्हारा यह पैर (जिससे मुझ पर प्रहार किया है) गिर जायेगा'। यह निःसंदिग्ध है॥२२॥
५८ | श्रीसाम्बपुराणम्
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः।
मनुना सह धर्मात्मा पृष्टः सर्वं न्यवेदयत्॥२३॥
स्नेहेन तुल्यं महता माता देव! न वर्त्तते॥२४॥
इससे धर्मात्मा यम ने उस शाप से अत्यन्त पीड़ित होकर मनु के साथ पिता के पास जाकर समस्त वृत्तान्त बताया। 'हे देव (पिता)! माँ के समान स्नेह की समता इसमें कहीं नहीं है॥२३-२४॥
सन्त्यज्य प्रायशोऽस्मान् सा कनीयांसो विधित्सति।
तस्यां मयोद्यतः पादो न च देहे निपातितः॥२५॥
प्रायः हमारा परित्याग करके वे छोटे भाइयों का अधिक यत्न करती हैं। मैंने उन्हें पैर दिखलाया था, किन्तु वह उनके शरीर से नहीं लगा॥२५॥
बालाद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् वक्तुमर्हसि।
शप्तोऽहमेव देवेश जनन्या तपसा वर।
तव प्रसादाच्चरणस्त्रायतां महतो भयात्॥२६॥
हे देवेश! बालक-स्वभाव से अथवा मोह से आप जो भी कहें, हे तपश्रेष्ठ! जननी द्वारा मैं अभिशप्त हो गया हूँ। उस महाभय से आपकी कृपा से मेरी रक्षा हो॥२६॥
रविरुवाच
असंशयं मरुत्पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं धर्मशालिनम्॥२७॥
रवि कहते हैं—हे पुत्र! इस व्यापार में निश्चय ही विशेष कारण है; क्योंकि धर्मज्ञ तथा धर्मशाली तुममें क्रोध ने प्रवेश किया है॥२७॥
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातस्तु विद्यते।
न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिन्मोक्षो भवेदिह॥२८॥
न शक्यमेतन्मिथ्या तु कर्तुं मातुर्वचस्तव।
क्वचित्तेऽहं विधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम्॥२९॥
कृमयो मांसमादाय पतिष्यन्ति महीतले।
कृतमस्या वचः सत्यं त्वं च त्राता भविष्यसि॥३०॥
समस्त शाप का प्रतिकार है; किन्तु माता के अभिशाप को मिथ्या कर सकने में मैं भी समर्थ नहीं हूँ। किन्तु पुत्रस्नेह के कारण कुछ कृपा कर सकता हूँ। कृमिगण मांस लेकर भूमि पर पतित होंगे, इससे उनके वाक्य की सत्यता भी होगी और तुम भी त्राण पा जाओगे॥२८-३०॥
एकादशोऽध्यायः ५९
एकादशोऽध्यायः ५९
नारद उवाच
आदित्यस्त्वब्रवीत् छायां किमर्थं तनयेषु वै।
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेह एकत्र क्रियते त्वया ॥३१॥
सा परिहरन्त्यस्मै नाचचक्षे विवस्वतः।
आत्मानं स समाधाय युक्तस्तथ्यमपश्यतः ॥३२॥
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुपितः प्रभुः।
ततः छाया यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वतः ॥३३॥
नारद कहते हैं—तत्पश्चात् आदित्य भगवान् ने छाया से पूछा कि तुम बराबर के पुत्रों में से एक में अधिक स्नेह करती हो? युक्तियुक्त कोई मार्ग न देखकर स्वयं को संयत करके छाया ने परिहार करने की इच्छा से सूर्य को कोई उत्तर नहीं दिया। इससे क्रुद्ध होकर प्रभु सूर्यदेव छाया के विनाश के लिये शाप देने हेतु कुपित हो गये। तदनन्तर छाया ने सूर्य को सब वृत्तान्त बतलाया॥३१-३३॥
विवस्वांस्तु ततः श्रुत्वा क्रुद्धः श्वशुरमभ्यगात्।
स चापि तं यथान्यायमर्चयित्वा तु रोपितम् ॥३४॥
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास तं शनैः ॥३५॥
विवस्वान् छाया के वचन सुनकर क्रोधित हो अपने श्वसुर के पास गये। उन्होंने (विश्वकर्मा ने) भी उनकी यथायोग्य संवर्धना करके उनके कोप से दग्धकाम चित्त को धीरे-धीरे सान्त्वना प्रदान किया॥३४-३५॥
विश्वकर्मोवाच
तवातितेजसाविष्टमिदं रूपं सुदुःसहम्।
असहन्ती तु सा संज्ञा वने वसति शाद्वले ॥३६॥
द्रक्ष्यसे तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम्।
रूपार्थं भवतोऽरण्ये चरन्तीं सुमहत्तपः ॥३७॥
तुम्हारा यह तेजोरूप अत्यन्त दुःसह है। वह संज्ञा उसे सहन न कर पाने से तृणाच्छादित वन में तप कर रही है। आज तुम अपनी मंगलचारिणी भार्या को देख सकोगे। तुम्हारे इस तेजोरूप के कारण वह अरण्य में महान् तप कर रही है॥३६-३७॥
मतं मे ब्रह्मणो वाक्यं यदि ते देव! रोचते।
रूपं निवर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिन्दम ॥३८॥
रूपं विवस्वतश्चासीत्तिर्यगूर्ध्वमधः समम्।
तेनापि पीड़ितो देवो रूपेण ते दिवस्पतिः ॥३९॥
६० श्रीसाम्बपुराणम्
सन्तुष्टस्तस्य तद्वाक्यं बहु मेने महातपाः।
अनुज्ञातस्ततस्त्वष्टा रूपनिर्वर्त्तनस्य तु॥४०॥
हे देव! मेरे समान ब्राह्मण का वाक्य यदि आपको रुचिकर लगे, तब हे अरिन्दम! आपके इस रूप को मैं कमनीय बना दूँ। सूर्य का रूप तब तिर्यक्, ऊर्ध्व, अधः, सम था। उस रूप से सूर्यदेव स्वयं पीड़ित थे। सन्तुष्ट होकर महातपा सूर्य ने उनके वाक्य का सम्मान किया और रूप-परिवर्त्तनार्थ त्वष्टा (विश्वकर्मा) को अनुमति प्रदान किया॥३८-४०॥
विश्वकर्माभ्यनुज्ञातः शकद्वीपे विवस्वतः।
भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शान्तयमास तस्य वै॥४१॥
आज्ञया लिखितश्चासौ निपुणं विश्वकर्मणा।
नाभ्यनन्दत्तल्लिखनं ततस्तेनावतारितः॥४२॥
तत्तु निष्पादितं रूपं तेजसापहृतेन तु।
कान्तात् कान्तरं भूत्वा ह्यधिकं शुशुभे ततः॥४३॥
विश्वकर्मा ने अनुज्ञात होकर शकद्वीप में चक्र का आरोपण करके सूर्य के उस तेज को संयत किया। आदेश पाकर विश्वकर्मा ने निपुणता से रेखा बनाया; किन्तु उस अङ्कन को सूर्य ने पसन्द नहीं किया। तब उन्होंने वहाँ से उतर कर तेज का अपहार करके (तेज-संवरण करके) अपना रूप निष्पन्न किया। तदनन्तर सुन्दर से सुन्दर रूप में इनकी आकृति शोभित हो गयी॥४१-४३॥
ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां बड़वां तदा।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा स्वेन संवृताम्॥४४॥
अश्वरूपेण मार्तण्डस्तां मुखे समभावयत्।
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसो विशङ्कया॥४५॥
सा तद्विवस्वतः शुक्रं नासिकाभ्यां निरावमत्।
देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ॥४६॥
तब सूर्यदेव ने अपने योगबल से अपने तेज को संवृत करके सकल प्राणियों द्वारा अधृष्य घोड़ी रूप से वर्तमान अपनी भार्या को देखा। तब मार्त्तण्ड ने भी अश्वरूप धारण करके उनसे मुख मिलाया। परपुरुष से मैथुन असंगत जानकर संज्ञा ने सूर्य के शुक्र को अपनी नासिका से बाहर निकाल दिया, जिससे चिकित्सकश्रेष्ठ अश्विनीकुमार उत्पन्न हुये॥४४-४६॥
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ तौ नामतोऽश्विनौ।
ततः कान्तं स्वकं रूपं दर्शयामास भास्करः॥४७॥