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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

२९६ संस्कारविधिः पूर्णरीति से कभी नहीं आ सकता। इसलिए संन्यासी लोग परमात्मा में स्थित रहे और उसकी आज्ञा, अर्थात् पक्षपात- रहित न्यायधर्म में स्थित होकर सत्योपदेश, सत्यविद्या के प्रचार से सब मनुष्यों को सुख पहुँचाता रहे॥७॥ संमानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव। अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥१॥ यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः। यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्॥२॥ अर्थ—संन्यासी जगत् के सन्मान से विष के तुल्य डरता रहे और अमृत के समान अपमान की चाहना करता रहे, क्योंकि जो अपमान से डरता और मान की इच्छा करता है, वह प्रशंसित होकर मिथ्यावादी और पतित हो जाता है। इसलिए चाहे निन्दा चाहे प्रशंसा, चाहे मान्य चाहे अपमान, चाहे जीना चाहे मृत्यु, चाहे हानि चाहे लाभ हो, चाहे कोई प्रीति करे चाहे वैर बाँधे, चाहे अन्न, पान, वस्त्र, उत्तम स्थान न मिले वा मिले, चाहे शीत-उष्ण कितना ही क्यों न हो इत्यादि सबका सहन करे और अधर्म का खण्डन तथा धर्म का मण्डन सदा करता रहे। इससे परे उत्तम धर्म दूसरा किसी को न माने। परमेश्वर से भिन्न किसी की उपासना न करे। न वेदविरुद्ध कुछ माने। परमेश्वर के स्थान में सूक्ष्म वा स्थूल तथा जड़ और जीव को भी कभी न माने। परमेश्वर को सदा अपना स्वामी माने और आप सेवक बना रहे। वैसा ही उपदेश अन्य को भी किया करे। जिस-जिस कर्म से गृहस्थों की उन्नति हो वा माता, पिता, पुत्र, स्त्री, पति, बन्धु, बहिन, मित्र, पड़ोसी, नौकर, बड़े और छोटों में विरोध छूटकर प्रेम बढ़े, उस-उसका उपदेश करे। जो वेद से विरुद्ध मत-मतान्तर के ग्रन्थ बायबल, कुरान, पुराण, मिथ्याभिलाप तथा काव्यालङ्कार कि जिनके पढ़ने-सुनने

अन्त्येष्टिप्रकरणम् २९७ से मनुष्य विषयी और पतित हो जाते हैं, उन सबका निषेध करता रहे। विद्वानों और परमेश्वर से भिन्न न किसी को देव तथा विद्या, योगाभ्यास, सत्सङ्ग और सत्यभाषणादि से भिन्न न किसी को तीर्थ और विद्वानों की मूर्त्तियों से भिन्न पाषाणादि मूर्त्तियों को न माने, न मनवावे। वैसे ही गृहस्थों को चाहिए कि माता, पिता, आचार्य, अतिथि, स्त्री के लिए विवाहित पुरुष ओर पुरुष के लिए विवाहित स्त्री की मूर्त्ति से भिन्न किसी की मूर्त्ति को पूज्य न समझे, न समझावे, किन्तु वैदिक मत की उन्नति और वेदविरुद्ध पाखण्डमतों के खण्डन करने में सदा तत्पर रहे। वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा और तद्विरुद्ध ग्रन्थों वा मतों में अश्रद्धा किया-कराया करे। आप शुभ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त होकर सबको इसी प्रकार का करने में प्रयत्न किया करे और जो पूर्वोक्त उपदेश लिखे हैं, उन-उन अपने संन्यासाश्रम के कर्त्तव्य कर्मों को किया करे। खण्डनीय कर्मों का खण्डन करना कभी न छोड़े। आसुर, अर्थात् अपने को ईश्वर, ब्रह्म माननेवालों का भी यथावत् खण्डन करता रहे। परमेश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव और न्याय आदि गुणों का प्रकाश करता रहे। इस प्रकार कर्म करता हुआ स्वयं आनन्द में रहकर सबको आनन्द में रक्खे। सर्वदा (अहिंसा) निर्वैरता, (सत्यम्) सत्य बोलना, सत्य मानना, सत्य करना, (अस्तेयम्) मन-कर्म-वचन से अन्याय करके पर-पदार्थ का ग्रहण न करना चाहिए, न किसी को करने का उपदेश करे। (ब्रह्मचर्यम्) सदा जितेन्द्रिय होकर अष्टविध मैथुन का त्याग रखके वीर्य की रक्षा और उन्नति करके चिरञ्जीवी होकर सबका उपकार करता रहे। (अपरिग्रहः) अभिमानादि दोषरहित, किसी संसार के धनादि पदार्थों में मोहित होकर कभी न फँसे। इन पाँच यमों का सेवन सदा किया करे

२९८ संस्कारविधिः और इनके साथ पाँच नियम, अर्थात् (शौच) बाहर-भीतर से पवित्र रहना, (सन्तोष) पुरुषार्थ करते जाना और हानि-लाभ में प्रसन्न और अप्रसन्न न होना। (तपः) सदा पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म का सेवन प्राणायामादि, योगाभ्यास करना, (स्वाध्याय) सदा प्रणव का जप, अर्थात् मन में चिन्तन और उसके अर्थ ईश्वर का विचार करते रहना। (ईश्वरप्रणिधान), अर्थात् अपने आत्मा को वेदोक्त परमेश्वर की आज्ञा में समर्पित करके जीते हुए परमानन्द परमेश्वर के सुख को भोगकर शरीर छोड़के सर्वानन्दयुक्त मोक्ष को प्राप्त होना संन्यासियों के मुख्य कर्म हैं। हे जगदीश्वर ! सर्वशक्तिमन्, सर्वान्तर्यामिन्, दयालो, न्यायकारिन्, सच्चिदानन्द, अनन्त, नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, अजर, अमर, पवित्र, परमात्मन् ! आप अपनी कृपा से संन्यासियों को पूर्वोक्त कर्मों में प्रवृत्त रखके परममुक्ति-सुख को प्राप्त कराते रहिए॥ ॥ इति संन्याससंस्कारविधिः समाप्तः ॥

अथान्त्येष्टिकर्मविधिं वक्ष्यामः 'अन्त्येष्टि' कर्म उसे कहते हैं कि जो शरीर के अन्त का संस्कार है। जिसके आगे उस शरीर के लिए कोई भी अन्य संस्कार नहीं है। इसी को नरमेध, पुरुषमेध, नरयाग, पुरुषयाग भी कहते हैं। भस्मा॑न्त॒ꣳ शरी॑रम्। —यजुः० अ० ४० । मं० १५ ॥ निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ॥ —मनु० अर्थः—शरीर का संस्कार (भस्मान्तम्), अर्थात् भस्म करने पर्यन्त है ॥ १ ॥ शरीर का आरम्भ ऋतुदान और अन्त में श्मशान, अर्थात् मृतक कर्म है ॥ २ ॥ प्रश्न—गरुड़पुराण आदि में दशगात्र, एकादशाह, द्वादशाह, सपिण्डी कर्म, मासिक, वार्षिक, गयाश्राद्ध आदि क्रिया लिखी हैं क्या ये सब असत्य हैं? उत्तर—हाँ, अवश्य मिथ्या हैं, क्योंकि वेदों में इन कर्मों का विधान नहीं है, इसलिए अकर्त्तव्य हैं और मृतक जीव का सम्बन्ध पूर्व सम्बन्धियों के साथ कुछ भी नहीं रहता और न इन जीते हुए सम्बन्धियों का। वह जीव.अपने कर्म के अनुसार जन्म पाता है। प्रश्न—मरण के पीछे जीव कहाँ जाता है! उत्तर—यमालय को। प्रश्न—यमालय किसको कहते हैं? उत्तर—वाय्वालय को।

३०० संस्कारविधिः प्रश्न—वाय्वालय किसको कहते हैं? उत्तर—अन्तरिक्ष को, जोकि यह पोल है। प्रश्न—क्या गरुड़पुराण आदि में जो यमलोक लिखा है वह झूठा है? उत्तर—अवश्य मिथ्या है। प्रश्न—पुनः संसार क्यों मानता है? उत्तर—वेद के [विषय में] अज्ञान और वेद-उपदेश के न होने से। जो यम की कथा लिख रक्खी है वह सब मिथ्या है, क्योंकि 'यम' इतने पदार्थों का नाम है— षळिद् य॒मा ऋष॑यो दे॒व॒जा इति॑ ॥ १ ॥ —ऋ० म० १। सू० १६४। मं० १५ ॥ शके॑म वा॒जिनो॒ यम॑म् ॥ २ ॥ —ऋ० म० २। सू० ५। मं० १ ॥ य॒माय॑ जुहुता ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो अरं॑कृतः ॥ ३ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १४। मं० १३ ॥ य॒मः सूयमा॑नो॒ विष्णु॑ः स॒म्भ्रियमा॑णो वा॒युः पू॒यमा॑नः ॥ ४ ॥ —यजुः० अ० ८। मं० ५७ ॥ वा॒जिनं॑ य॒मम् ॥ ५ ॥ —ऋ० म० ८। सू० २४। मं० २२ ॥ य॒मं मा॑त॒रिश्वान॑माहुः ॥ ६ ॥ —ऋ० म० १। सू० १६४। मं० ४६ ॥ अर्थ—यहाँ ऋतुओं का यम नाम है ॥ १ ॥ यहाँ परमेश्वर का नाम है ॥ २ ॥ यहाँ अग्नि का नाम है ॥ ३ ॥ यहाँ वायु, विद्युत्, सूर्य के यम नाम हैं ॥ ४ ॥ यहाँ भी वेगवाला होने से वायु का नाम यम है ॥ ५ ॥

अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०१ यहाँ परमेश्वर का नाम यम है॥६॥ इत्यादि पदार्थों का नाम ‘यम’ है। इसलिए पुराण आदि की सब कल्पना झूठी है। विधि— संस्थिते भूमिभागं खानयेद् दक्षिणपूर्वस्यां दिशि दक्षिणापरस्यां वा॥१॥ दक्षिणाप्रवणं प्राग्दक्षिणाप्रवणं वा प्रत्यग्दक्षिणा- प्रवणमित्येके॥२॥ यावानुद् बाहुकः पुरुषस्तावदायामम्॥३॥ व्याममात्रं तिर्यक्॥४॥ वितस्त्यर्वाक् ॥५॥ केशश्मश्रुलोमनखानीत्युक्तं पुरस्तात्॥६॥ द्विगुल्फं बर्हिराज्यं च॥७॥ दध्यन्यत्र सर्पिरानयन्त्येतत् पित्र्यं पृषदाज्यम्॥८॥ अथैतां दिशमग्नीन् नयन्ति यज्ञपात्राणि च॥९॥ अर्थ—जब कोई मर जावे तब यदि पुरुष हो तो पुरुष और स्त्री हो तो स्त्रियाँ उसे स्नान करावें। चन्दनादि सुगन्धलेपन और नवीन वस्त्र धारण करावें। जितना उसके शरीर का भार हो उतना घृत, यदि अधिक सामर्थ्य हो तो अधिक लेवें और जो महादरिद्र, भिक्षुक हो कि जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसे कोई श्रीमान् वा पञ्च बनके अध मन से कम घी न देवें, और श्रीमान् लोग शरीर के बराबर तोलके चन्दन, सेरभर घी में एक रत्ती कस्तूरी, एक मासा केसर, एक-एक मण घी के साथ सेर-सेरभर अगर-तगर और घृत में चन्दन का चूरा भी यथाशक्ति डाल कपूर, पलाश आदि के पूर्ण काष्ठ, शरीर के भार से दूनी सामग्री शमशान में पहुँचावें। तत्पश्चात् मृतक को वहाँ शमशान में ले-जाएँ।

३०२ संस्कारविधिः यदि प्राचीन वेदी बनी हुई न हो तो नवीन वेदी भूमि में खोदे। वह श्मशान का स्थान बस्ती से दक्षिण तथा आग्नेय, अथवा नैर्ऋत्य कोण में हो, वहाँ भूमि को खोदे। मृतक के पग दक्षिण, नैर्ऋत्य, अथवा आग्नेय कोण में रहें। शिर उत्तर, ईशान वा वायव्य कोण में रहे॥ १॥ मृतक के पग की ओर वेदी के तले में नीचा और शिर की ओर थोड़ा ऊँचा रहे॥ २॥ उस वेदी का परिमाण पुरुष खड़ा होकर ऊपर को हाथ उठावे उतनी लम्बी और दोनों हाथों को लम्बे उत्तर दक्षिण पार्श्व में करने से जितना परिमाण हो, अर्थात् मृतक् के साढ़े तीन हाथ, अथवा तीन हाथ ऊपर से चौड़ी होवे और छाती के बराबर गहरी होवे॥ ३॥ और नीचे आध हाथ, अर्थात् एक बीताभर रहे॥ ४॥ उस वेदी में थोड़ा-थोड़ा जल छिटकावे, यदि गोमय उपस्थित हो तो लेपन भी करदे। उसमें नीचे से आधी वेदी तक लकड़ियाँ चिने जैसेकि भित्ती में ईंटें चिनी जाती हैं, अर्थात् बराबर जमाकर लकड़ियाँ धरे। लकड़ियों के बीच में थोड़ा- थोड़ा कपूर थोड़ी-थोड़ी दूर पर रक्खे। उसके ऊपर मध्य में मृतक को रक्खे, अर्थात् चारों ओर वेदी बराबर खाली रहे और पश्चात् चारों ओर ऊपर चन्दन तथा पलाश आदि के काष्ठ बराबर चिने। वेदी से ऊपर एक बीताभर लकड़ियाँ चिने। जबतक यह क्रिया होवे, तबतक अलग चूल्हा बना, अग्नि जला, घी तपा और छानकर पात्रों में रक्खे। उसमें कस्तूरी आदि सब पदार्थ मिलावे। लम्बी-लम्बी लकड़ियों में चार चमसों को चाहे वे लकड़ी के हों वा चाँदी, सोने के अथवा लोहे के हों, जिस चमसा में एक छटाँकभर से अधिक और आधी छटांकभर से न्यून घृत न आवे, खूब दृढ़ बन्धनों से दण्डों के

अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०३ साथ बाँधे। पश्चात् घृत का दीपक करके कपूर में लगाकर शिर से आरम्भ कर पादपर्यन्त मध्य-मध्य में अग्नि-प्रवेश करावे। अग्नि-प्रवेश कराके— ॐ अग्नये स्वाहा ॥ ॐ सोमाय स्वाहा ॥ ॐ लोकाय स्वाहा ॥ ॐ अनुमतये स्वाहा ॥ ॐ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ॥ इन पाँच मन्त्रों से आहुतियाँ देके अग्नि को प्रदीप्त होने देवे। तत्पश्चात् चार मनुष्य पृथक्-पृथक् खड़े रहकर वेदों के मन्त्रों से आहुति देते जाएँ। जहाँ ‘स्वाहा' आवे वहाँ आहुति छोड़ देवें। अथ वेदमन्त्राः सूर्यं चक्षु॑र्गच्छतु॒ वात॑मा॒त्मा द्यां च॑ गच्छ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑णा। अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा शरी॑रैः स्वाहा॑ ॥ १ ॥ अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒ तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु॒ लो॒कं स्वाहा॑ ॥ २ ॥ अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑त॒श्चर॑ति स्व॒धाभि॑ः। आयुर्वसा॑न॒ उप॑वेतु॒ शेष॒ः सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ जातवेदः॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ अग्ने॒र्वर्म॒ परि॒ गोभि॑र्व्ययस्व॒ संप्रोर्णु॑ष्व॒ पीव॑सा॒ मेद॑सा च। नेत्त्वा॑ धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒ जहृ॑षाणो द॒धृग्वि॒धक्ष्यन्पर्य्यङ्ख्या॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ यं त्वम॑ग्ने॒ समद॑ह॒स्तमु॒ निर्वा॑पय॒ पुनः॑ । कि॒याम्ब्वत्र॒ रोह॑तु पाक॒दूर्वा व्य॑ल्क॒शा स्वाहा॑ ॥ ५ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १६। मं० ३-५, ७, १३॥

३०४ संस्कारविधिः परेयि॒वांसं॑ प्र॒वतो॑ म॒हीरनु॑ ब॒हुभ्यः॑ पन्था॑मनुपस्पशा॒नम्। वै॒व॒स्व॒तं सं॒गम॑नं॒ जना॑नां य॒मं राजा॑नं ह॒विषा॑ दुवस्य॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ य॒मो नो गा॒तुं प्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्तवा उ॑। यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परेयु॒रेना॑ जज्ञा॒नाः प॒थ्या॒३॒॑अनु॒ स्वाः स्वाहा॑ ॥ ७ ॥ मात॑ली क॒व्यैर्य॒मो अङ्गि॑रोभि॒र्बृह॒स्पति॒र्ऋक्व॑भिर्वावृधा॒नः। याँश्च॑ दे॒वा वा॑वृधु॒र्ये च॑ दे॒वान्त्स्वाहा॒न्ये स्व॒धया॒न्ये म॑द॒न्ति स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ इमं॑ यम प्रस्तर॒मा हि सीदाङ्गिरोभिः॑ पि॒तृभिः॑ संविदा॒नः। आ त्वा॒ मन्त्राः॑ क॒विश॑स्ता वहन्त्वे॒ना रा॑जन् ह॒विषा॑ मादयस्व॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥ अङ्गि॑रोभि॒रा ग॑हि य॒ज्ञिये॑भि॒र्यम॑ वैरू॒परि॒ह मा॑दयस्व। वि॒वस्व॑न्तं हुवे॒ यः पि॒ता ते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिष्या नि॒षद्य॒ स्वाहा॑ ॥ १० ॥ प्रेहि॒प्रेहि॑ प॒थिभिः॑ पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परे॒युः। उ॒भा राजा॑ना स्व॒धया॒ मद॑न्ता य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वं स्वाहा॑ ॥ ११ ॥ सं ग॑च्छस्व पि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ प॒रमे व्यो॑मन्। हि॒त्वाया॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः स्वाहा॑ ॥ १२ ॥ अपे॑त॒ वी॑त॒ वि च॑ सर्पतातॊ॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन्। अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्य॑क्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै॒ स्वाहा॑ ॥ १३ ॥ य॒माय॒ सोमं॑ सुनुत य॒माय॑ जुहुता ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः॒ स्वाहा॑ ॥ १४ ॥ य॒माय॑ घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत। सं नो॑ दे॒वेष्वा य॑मद्दी॒र्घमायुः॒ प्र जी॒वसे॒ स्वाहा॑ ॥ १५ ॥

अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०५ य॒माय॒ मधु॑मत्तमं॒ राजे॑ ह॒व्यं जु॑होतन। इ॒दं नम॒ ऋषि॑भ्यः पूर्व॒जेभ्यः॒ पूर्वे॑भ्यः पथि॒कृद्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १६ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १४॥ कृ॒ष्णः श्वे॒तौऽरु॑षो यामो अस्य ब्र॒ध्न ऋ॒ज्र उत॑ शो॒णो य॑श॒स्वान्। हिर॑ण्यरूपं॒ जनि॑ता जजान॒ स्वाहा॑ ॥ १७ ॥ —ऋ० म० १०। सू० २०। मं० ९॥ इन ऋग्वेद के मन्त्रों से चारों जने सत्रह आज्याहुति देकर, निम्नलिखित मन्त्रों से उसी प्रकार आहुति देवें— प्रा॒णेभ्यः॒ सार्धि॑पति॒केभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ पृ॒थि॒व्यै स्वाहा॑ ॥ २ ॥ अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ अ॒न्तरि॑क्षाय॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ५ ॥ दि॒वे स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ सूर्या॑य॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥ दिग्भ्यः स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥ नक्ष॑त्रेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १० ॥ अ॒द्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ११ ॥ वरु॑णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १२ ॥ ना॒भ्यै स्वाहा॑ ॥ १३ ॥ पू॒ताय॒ स्वाहा॑ ॥ १४ ॥ वा॒चे स्वाहा॑ ॥ १५ ॥ प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १६ ॥ प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १७ ॥ चक्षु॑षे स्वाहा॑ ॥ १८ ॥ चक्षु॑षे स्वाहा॑ ॥ १९ ॥ श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ २० ॥ श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ २१ ॥ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २२ ॥ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २३ ॥ त्व॒चे स्वाहा॑ ॥ २४ ॥ त्व॒चे स्वाहा॑ ॥ २५ ॥ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॑ ॥ २६ ॥ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॑ ॥ २७ ॥

३०६ संस्कारविधिः मे॒दोभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २८ ॥ मे॒दोभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २९ ॥ माथ्ंसेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३० ॥ माथ्ंसेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३१ ॥ स्त्राव॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३२ ॥ स्त्राव॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३३ ॥ अ॒स्थिभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३४ ॥ अ॒स्थिभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३५ ॥ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३६ ॥ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३७ ॥ रेत॑से॒ स्वाहा॑ ॥ ३८ ॥ पा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ३९ ॥ आ॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४० ॥ प्रा॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४१ ॥ सं॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४२ ॥ वि॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४३ ॥ उ॒द्या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४४ ॥ शुचे॒ स्वाहा॑ ॥ ४५ ॥ शोच॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ४६ ॥ शोच॑मानाय॒ स्वाहा॑ ॥ ४७ ॥ शोका॑य॒ स्वाहा॑ ॥ ४८ ॥ तप॑से॒ स्वाहा॑ ॥ ४९ ॥ तप्य॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ५० ॥ तप्य॑मानाय॒ स्वाहा॑ ॥ ५१ ॥ तृ॒प्ताय॒ स्वाहा॑ ॥ ५२ ॥ घ॒र्माय॒ स्वाहा॑ ॥ ५३ ॥ निष्कृत्यै॒ स्वाहा॑ ॥ ५४ ॥ प्राय॑श्चित्यै॒ स्वाहा॑ ॥ ५५ ॥ भेष॒जाय॒ स्वाहा॑ ॥ ५६ ॥ य॒माय॒ स्वाहा॑ ॥ ५७ ॥ अ॒न्त॒काय॒ स्वाहा॑ ॥ ५८ ॥ मृ॒त्यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ५९ ॥ ब्रह्म॑णे॒ स्वाहा॑ ॥ ६० ॥ ब्र॒ह्म॒हत्यायै॒ स्वाहा॑ ॥ ६१ ॥ विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ६२ ॥ द्यावा॑पृथि॒वीभ्याꣳ॒ स्वाहा॑ ॥ ६३ ॥ —यजुः० अ० ३९ ॥ इन तिरसठ मन्त्रों से ६३ आहुति पृथक्-पृथक् देके, निम्नलिखित मन्त्रों से आहुति देवें—

अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०७ सूर्य॒ चक्षु॑षा गच्छ॒ वात॑मा॒त्मना॒ दिवं॑ च॒ गच्छ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑भिः। अ॒पो वा॒ गच्छ॒ यदि॒ तत्र ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा॒ शरी॑रैः स्वाहा॑॥१॥ सोम॒ एके॑भ्यः पवते घृ॒तमेक॒ उपा॑सते । येभ्यो॒ मधु॑ प्र॒धाव॑ति॒ तांश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् स्वाहा॑॥२॥ ये चि॒त्पूर्व॑ ऋ॑तसाता ऋत॒जाता ऋ॒तावृध॑ः । ऋषीं॑स्तप॑स्वतो यम॒ तपो॑जाँ अ॒पि ग॑च्छतात् स्वाहा॑॥३॥ तप॑सा॒ ये अ॑नाधृ॒ष्यास्तप॑सा॒ ये स्व॒र्य॑युः । तपो॒ ये च॑क्रि॒रे मह॒स्तांश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् स्वाहा॑॥४॥ ये युध्य॑न्ते प्र॒धने॑षु॒ शूरा॑सो॒ ये त॑नू॒त्यज॑ः । ये वा॑ स॒हस्र॑दक्षिणा॒स्तांश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् स्वाहा॑॥५॥ स्यो॒नास्मै॑ भव पृथिव्यनृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी । यच्छा॑स्मै॒ शर्म॑ स॒प्रथ॑ः स्वाहा॑ ॥६॥ अपे॒मं जी॒वा अ॑रुधन् गृ॒हेभ्य॒स्तं निर्व॑ह॒त परि॒ ग्रामा॑दितः। मृ॒त्युर्यमस्या॑सीद्दू॒तः प्रचे॑ता॒ असूंन् पितृ॑भ्यो गम॒यां च॑कार॒ स्वाहा॑॥७॥ य॒मः परो॒ऽवरो॑ वि॒वस्वांस्तत॒ः परं नार्ति पश्या॒मि किं च॒न। य॒मे अध्व॒रो अधि॑ मे निवि॑ष्टो भुवो॑ वि॒वस्वा॒न्वार्ततान् स्वाहा॑॥८॥

३०८ संस्कारविधिः अपा॑गूहन्न॒मृतां॒ मर्त्ये॑भ्यः कृ॒त्वा सव॑र्णामदधुर्विव॑स्वते । उ॒ताश्वि-नाव॑भर॒द्यत्तदासी॒दज॑हादु द्वा मि॑थु॒ना सर॑ण्यूः स्वाहा॑ ॥ ९ ॥ इ॒मौ यु॑नज्मि ते॒ ब॒ह्नी असु॑नीताय॒ वोढ॑वे । ताभ्यां॑ य॒मस्य॒ साद॑नं॒ समि॑तीश्चाव॑ गच्छता॒त् स्वाहा॑ ॥ १० ॥ —अथर्व० का० १८ । सू० २ ॥ इन दश मन्त्रों से दश आहुति देकर— अग्नये रयिमते स्वाहा ॥ १ ॥ पुरुषस्य सयावर्यपेदघानि मृज्महे। यथा नो अत्र नापरः पुरा जरस आयति स्वाहा ॥ २ ॥ य एतस्य पथो गोप्तारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ३ ॥ य एतस्य पथो रक्षितारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ४ ॥ य एतस्य पथोऽभिरक्षितारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ५ ॥ ख्यात्रे स्वाहा ॥ ६ ॥ अपाख्यात्रे स्वाहा ॥ ७ ॥ अभिलालपते स्वाहा ॥ ८ ॥ अपलालपते स्वाहा ॥ ९ ॥ अग्नये कर्मकृते स्वाहा ॥ १० ॥ यमन्न नाधीमस्तस्मै स्वाहा ॥ ११ ॥ अग्नये वैश्वानराय सुवर्गाय लोकाय स्वाहा ॥ १२ ॥ आयातु देवः सुमनाभिरूतिभिर्यमो ह वेह प्रयताभिरक्ता । आसीदताँ सुप्रयते ह बर्हिष्यूर्जाय जात्यै मम शत्रुहत्यै स्वाहा ॥ १३ ॥ योऽस्य कोष्ठ्य जगतः पार्थिवस्यैक इदद्वशी । यमं भङ्गन्यश्रवो गाय यो राजाऽनपरोध्यः स्वाहा ॥ १४ ॥

अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०९ यमं गाय भङ्ग्यश्रवो यो राजाऽनपरोध्यः । येनाऽऽपो नद्यो धन्वानि येन द्यौः पृथिवी दृढा स्वाहा ॥ १५ ॥ हिरण्यकक्ष्यान्त्सुधुरान् हिरण्याक्षानयःशफान् । अश्वानानः शतो दानं यमो राजाभितिष्ठति स्वाहा ॥ १६ ॥ यमो दाधार पृथिवीं यमो विश्वमिदं जगत् । यमाय सर्वमित्तस्थे यत् प्राणद्वायुरक्षितं स्वाहा ॥ १७ ॥ यथा पञ्च यथा षड् यथा पञ्चदशर्षयः । यमं यो विद्यात् स ब्रूयाद्यथैक ऋषिर्विजानते स्वाहा ॥ १८ ॥ त्रिकद्रुकेभिः पतति षडुर्वीरेकमिद् बृहत् । गायत्री त्रिष्टुप्छन्दांसि सर्वा ता यम आहिता स्वाहा ॥ १९ ॥ अहरहर्नयमानो गामश्वं पुरुषं जगत् । वैवस्वतो न तृप्यति पञ्चभिर्मानवैर्यमः स्वाहा ॥ २० ॥ वैवस्वते विविच्यन्ते यमे राजनि ते जनाः । ये चेह सत्येनेच्छन्ते य उ चानृतवादिनः स्वाहा ॥ २१ ॥ ते राजन्निह विविच्यन्तेऽथा यन्ति त्वामुप । देवांश्च ये नमस्यन्ति ब्राह्मणांश्चापचित्यति स्वाहा ॥ २२ ॥ यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिबते यमः । अत्रा नो विशपतिः पिता पुराणा अनुवेनति स्वाहा ॥ २३ ॥ उत्ते तभ्नोमि पृथिवीं त्वत्परीमं लोकं निदधन्मो अहँ रिषम् । एताथँ स्थूणां पितरो धारयन्तु तेऽत्रा यमः सादनात् ते मिनोतु स्वाहा ॥ २४ ॥ यथाऽहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथर्तव ऋतुभिर्यन्ति क्लृप्ताः । यथा नःपूर्वमपरो जहात्येवा धातरायूथँषि कल्पयैषाथँ स्वाहा ॥ २५ ॥

३१० संस्कारविधिः न हि ते अग्ने तनुवै क्रूरं चकार मर्त्यः। कपिर्बभस्ति तेजनं पुनर्जरायुर्गौरिव। अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्। अप नः शोशुचदघं मृत्यवे स्वाहा॥ २६॥ —तैत्ति० प्रपा० ६। अनु० १।१०॥ इन छब्बीस आहुतियों को करके ये सब (ओम् अग्नये स्वाहा) इस मन्त्र से लेके (मृत्यवे स्वाहा) तक एकसौ इक्कीस आहुति हुईं, अर्थात् चार जनों की मिलके चार सौ चौरासी और जो दो जने आहुति देवें तो दो सौ बयालीस। यदि घृत विशेष हो तो पुनः इन्हीं एक सौ इक्कीस मन्त्रों से आहुति देते जाएँ, यावत् शरीर भस्म न हो जाए तावत् देवें। जब शरीर भस्म हो जावे पुनः सब जने वस्त्र प्रक्षालन, स्नान करके जिसके घर में मृत्यु हुआ हो उसके घर की मार्जन, लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके, पृष्ठ १३-२१ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन शान्तिकरण का पाठ और पृष्ठ ९-१२ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना करके इन्हीं स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों से जहाँ अङ्क, अर्थात् मन्त्र पूरा हो, वहाँ ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण करके सुगन्ध्यादि मिले हुए घृत की आहुति घर में देवें कि जिससे मृतक का वायु घर से निकल जाए और शुद्ध वायु घर में प्रवेश करे और सबका चित्त प्रसन्न रहे। यदि उस दिन रात्रि हो जाए तो थोड़ी-सी आहुति देकर दूसरे दिन प्रातःकाल उसी प्रकार स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों से आहुति देवें। तत्पश्चात् जब तीसरा दिन हो तब मृतक का कोई सम्बन्धी श्मशान में जाकर चिता से अस्थि उठाके उस श्मशान भूमि में कहीं पृथक् रख देवे। बस, इसके आगे मृतक के लिए कुछ भी कर्म कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि पूर्व (भस्मान्तꣳ शरीरम्) यजुर्वेद

अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३११ के मन्त्र के प्रमाण से स्पष्ट हो चुका है कि दाहकर्म और अस्थिसञ्चयन से पृथक् मृतक के लिए दूसरा कोई भी कर्म- कर्त्तव्य नहीं है। हाँ, यदि वह सम्पन्न हो तो अपने जीतेजी वा मरे पीछे उसके सम्बन्धी वेदविद्या, वेदोक्तकर्म का प्रचार, अनाथपालन, वेदोक्त धर्मोपदेश की प्रवृत्ति के लिए चाहे जितना धन प्रदान करें, बहुत अच्छी बात है॥ ॥ इति मृतक-संस्कारविधिः समाप्तः ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां श्रीयुतविरजानन्द- सरस्वतीस्वामिनां महाविदुषां शिष्यस्य वेदविहिताचारधर्म- निरूपकस्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनः कृतौ संस्कारविधिर्ग्रन्थः पूर्तिमगात्॥

आर्यसमाज के नियम १. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है। २. ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। ३. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना- पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। ४. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। ५. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिएँ। ६. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। ७. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए। ८. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए। ९. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए। १०. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें॥

० टकारा

संस्कार विधि भारतीय संस्कृति में संस्कारों का विशेष महत्त्व है। संस्कार हमारे जीवन के आधार हैं। संस्कार का अर्थ होता है शुद्ध करना, साफ करना, चमकाना और भीतरी रूप को प्रकाशित करना। हमारी दिनचर्या की भांति हमारी जीवनचर्या भी नियमित है। जन्म से लेकर मृत्यूपर्यंत के मानव जीवन का गंभीर अध्ययन करके महर्षि दयानन्द ने मनुष्य के पूर्ण विकास के लिए- ऐसा विकास जिसमें शरीर, मन, आत्मा तीनों की उन्नति हो, जिन सुनहरे नियमों की रचना की है उन्हें हम अपनी जीवनचर्या के नियम कहते हैं। हमारे संस्कार भी इसी जीवनचर्या के प्रमुख अंग हैं। आइये महर्षि दयानन्द कृत संस्कार विधि द्वारा सोलह संस्कारों की पूर्ण विधि जानें। विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द