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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

५९४ सात्वतसंहिता धर्माद्याश्चाग्निकोणात् तु यावदीशपदं पुनः । प्रागादावुत्तरान्तं च अधर्माद्यं चतुष्टयम् ॥ ३४८ ॥ शिलानामन्तरे भूमौ षट्कं षट्कं क्रमेण तु । न्यस्तव्यं पूर्ववर्णाच्च वर्णानां सावसानकम् ॥ ३४९ ॥ अग्निकोण से लेकर ईशानकोण पर्यन्त धर्मादि की तथा पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त अधर्मादि चार की स्थापना करे । शिलाओं के अन्तर में भूमि पर छः-छः के क्रम से (अकारादि पूर्व वर्ण से 'स' पर्यन्त ४८ वर्णों की) स्थापना करे ॥ ३४८-३४९ ॥ शब्दब्रह्मानुविद्धां च कृत्वैवं बुद्धिवागुराम् । सूत्रभूतां न्यसेत् सम्यक् प्रासादतलसंस्थिताम् ॥ ३५० ॥ इस प्रकार शब्द ब्रह्म से अनुविद्ध को बुद्धि वागुर बना कर उसे सूत्र रूप बना कर प्रासाद तल में स्थापित करे ॥ ३५० ॥ न्यसेत् प्राङ्गणभित्त्यर्थं तथैव हि शिलाष्टकम् । तासु संरोधयेत् सम्यक् प्रागुक्तांस्तु दिगीश्वरान् ॥ ३५१ ॥ वहाँ प्राङ्गणभित्ति के लिये आठ शिला स्थापित करे । उसमें पहले कहे गये इन्द्रादि आठ दिगीश्वरों का सन्निरोध करे ॥ ३५१ ॥ चक्रं तदन्तर्भूमीनां भ्रमद्वह्निस्फुलिङ्गवत् । क्षार्णेन चिन्तयेद् व्याप्तं भूभागं चाङ्गोणीयकम् ॥ ३५२ ॥ उसके भीतर की भूमि में जहाँ आंगन वाला भूभाग है वहाँ चक्कर काटते हुए अग्नि स्फुलिङ्ग के समान चक्र का 'क्ष' वर्ण से ध्यान करे ॥ ३५२ ॥ आभोगं तदधः शेषं तदूर्ध्वं गगनेश्वरम् । बहिः प्राङ्गणभित्तीनां सास्त्रं सपरिवारकम् ॥ ३५३ ॥ प्राङ्गण भित्ति का जहाँ आभोग है वहाँ शेष का, उसके ऊपर गगनेश्वर का और उसके बाहर सपरिवार अस्त्र मन्त्र का स्मरण करे ॥ ३५३ ॥ प्रागादावीशकोणान्तमिन्द्राद्यं चाष्टकं न्यसेत् । तथाविधेषूपलेषु अन्तर्भूमिगतेषु च ॥ ३५४ ॥ तत् स्वनाम्नाऽर्चयित्वा तु ऋग्वेदान् पाठयेत् ततः । क्लीबो न विद्वानिति वै ये देवास्तु यजुर्मयान् ॥ ३५५ ॥ पूर्व से प्रारम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त भूभाग में इन्द्रादि आठ दिगीश्वरों का न्यास करे । तदनन्तर उस प्रकार की शिला, जो भीतर की भूमि में स्थित है,

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९५ उसका अपने नाम से अर्चन करे । तदनन्तर वहाँ 'क्लीबो न विद्वान्' इस ऋग्वेद का और 'ये देवास्तु' इस यजुर्वेद के मन्त्र का पाठ करावे ॥ ३५४-३५५ ॥ देवव्रतं च सामज्ञान् प्रविश्याभ्यन्तरं ततः । स्थित्वाऽग्रतो मन्त्रमूर्तेरध्वव्याप्तिमनुस्मरेत् ॥ ३५६ ॥ 'देवव्रतम्' इस मन्त्र का पाठ सामवेदी से करावे, इसके बाद भीतर प्रवेश कर मन्त्र मूर्त्ति के आगे खड़े होकर अध्वव्याप्ति का स्मरण करे ॥ ३५६ ॥ बीजतश्चाङ्कुरीभूता पुरस्ताद् व्यक्तिमेति या । प्रासादपीठपर्यन्तं कुम्भाधारोपलात् तु वै ॥ ३५७ ॥ भुवनाध्वा यथावस्थो भावनीयः पुरोदितः । गर्भोच्छ्रायावधिं यावत् पदाध्वानं विलोकयेत् ॥ ३५८ ॥ यह अध्व व्याप्ति जिस प्रकार बीज अङ्कुर रूप से बढ़ते-बढ़ते स्पष्ट रूप से प्रगट दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार कुम्भाधार शिला से प्रासाद पीठ पर्यन्त बढ़ते- बढ़ते 'भुवनाध्वा' दिखाई पड़ता है । उसका ध्यान करे । इसे पहले कहा जा चुका है । गर्भ की ऊँचाई पर्यन्त 'पदाध्वा' का ध्यान करे ॥ ३५७-३५८ ॥ मन्त्राध्वा शुकनासान्तस्तत्त्वाध्वा वेदिकावधिः । कलाध्वाऽनुगलान्तश्च वर्णाध्वा च तदूर्ध्वतः ॥ ३५९ ॥ भुवनासान्त तक 'मन्त्राध्वा' का, वेदिका तक 'तत्त्वाध्वा' का, गले के अन्त तक 'कलाध्वा' का और उसके ऊपर 'वर्णाध्वा' का ध्यान करे ॥ ३५९ ॥ प्रासादलक्षणकथनम् समीकृत्य पुरा सर्वं प्रासादं प्रारभेत् ततः । तलादूनाधिकाच्चैव साङ्गुलैरुचितैः करैः ॥ ३६० ॥ अथ प्रासादलक्षणमाह—समीकृत्य पुरा सर्वं प्रासादं प्रारभेत् तत इत्यारभ्य यावत् परिच्छेदपरिसमाप्ति । अत्र विधिवत् स्थापनं तस्येत्यारभ्य स्थित्यपेक्षावशेनैव ह्यालयस्य तु वै विभो (४०२-४१०) रित्यन्तं द्वारप्रतिष्ठाविधानमुक्तं ज्ञेयम् । एतत्प्रासादप्रतिष्ठां तु बिम्ब- प्रतिष्ठानन्तरं वक्ष्यति ॥ ३६०-४३३ ॥ प्रासाद का लक्षण—तदनन्तर सबको समतल बनाकर तले से कम अथवा अधिक अङ्गुलि सहित हाथ से नाप कर प्रासाद का प्रारम्भ करे ॥ ३६० ॥ द्विद्वादशकरं यावत् तालेनोनाधिकेन तु । शुभाय सिद्धये विद्धि गर्भे देवगृहस्य च ॥ ३६१ ॥

५९६ सात्वतसंहिता वह प्रासाद देवगृह के गर्भ में १ ताल से अधिक अथवा न्यून मान में द्वादश हाथ का होना चाहिये । ऐसा प्रासाद कल्याण के लिये अथवा सिद्धि के योग्य समझना चाहिये ॥ ३६१ ॥ कृत्वा क्षेत्राङ्गुलानां च कराणां वा घनं पुरा । त्यजेत् तदष्टभिः सम्यग् यच्छेषं तद्विचार्य च ॥ ३६२ ॥ क्षेत्राङ्गुल को अथवा हाथ को घना बनाकर आठ भाग का त्याग कर जो शेष हो उसमें विचार कर प्रासाद निर्माण करे ॥ ३६२ ॥ एकाद्यष्टमपर्यन्ता ध्वजधूममृगेश्वराः । श्वा च गोखरमातङ्गवायसास्तु ततः शुभाः ॥ ३६३ ॥ एक से लेकर आठ हाथ तक ध्वज, धूम, मृगेश्वर, श्वा, गौ, खर, मातङ्ग और वायस नामक प्रासाद होते हैं, इसके बाद के प्रासाद शुभ होते हैं ॥ ३६३ ॥ एकत्रिपञ्चसप्ताख्याः सर्वत्रैव विधीयते । गर्भषड्भागमानेन तद्बहिर्भित्तिविस्तृतिः ॥ ३६४ ॥ तन्मानं परितस्त्यक्त्वा भित्तिरन्या विधीयते । एवमत्र क्रमेणैव सह भित्तिगणेन तु ॥ ३६५ ॥ गर्भद्विगुणविस्तीर्णं क्षेत्रं देवगृहस्य च । मन्दिरे त्वेकभित्तीये क्षेत्रमानं विधीयते ॥ ३६६ ॥ सर्वत्र एक, तीन, पाँच और सात संख्या में गर्भ का विधान है । गर्भ के छठे भाग के मान के अनुसार उसके बाहर भित्ति का विस्तार करे । चारों ओर उतने ही मान को छोड़कर अन्य भित्ति का निर्माण करे । इसी प्रकार यहाँ क्रम से भित्तिगण के साथ गर्भ के दुगुने विधान में देवगृह के क्षेत्र का निर्माण करे । इस प्रकार एक भित्ति वाले मन्दिर में क्षेत्र का मान होना चाहिये ॥ ३६४-३६६ ॥ गर्भोक्तं तत्रिभागेन युक्तं युक्तेन वर्त्मना । तत्रापि ह्रासवृद्ध्या तु आयशुद्धिं विचारयेत् ॥ ३६७ ॥ गर्भ में जितना परिमाण कहा गया है उसके तीसरे भाग की वीथी बनानी चाहिये । उस प्रासाद के लम्बाई चौड़ाई के ह्रास वृद्धि के अनुसार आयशुद्धि का विचार करे ॥ ३६७ ॥ एवं निर्जगतीकं च भागं पीठविवर्जितम् । प्रासादक्षेत्रमानं च तद्युक्तमवधारय ॥ ३६८ ॥ इस प्रकार पीठ विवर्जित निर्जगती का भाग होता है । हे सङ्कर्षण ! अब

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९७ प्रासाद और क्षेत्र का जो उचित मान है, उसे समझिए ॥ ३६८ ॥ षड्भागेनाथ पादेन त्रिभागेनोभयात्मिका । विहिता जगती गर्भा तत्क्रियाविस्तृतिर्भवेत् ॥ ३६९ ॥ छः भाग से अथवा पाद भाग से अथवा तीन भाग से अथवा उभयात्मिका जगती गर्भ विहित है उसी की क्रिया से विस्तार होता है ॥ ३६९ ॥ अधिकार्धं चतुर्दिक्षु तत्पञ्चांशैस्तु वै त्रिभिः । तृतीयांशेन वै मध्ये निर्गमस्तु विधीयते ॥ ३७० ॥ उसके चारों ओर अधिक आधा अथवा उसका पञ्चम अंश अथवा तीन अंश का मध्य में निर्गम (निकलने के द्वार) का विधान है ॥ ३७० ॥ कोणात् कोणात् तु वै शेषं भागं भागं प्रवेशयेत् । उच्चं गर्भसमं पीठं तत्पीठेन दलेन वा ॥ ३७१ ॥ पीठोक्तालयपीठस्य लक्ष्मस्थित्यंशकल्पना । चतुर्दिक्षु विधेया वै बहुधाऽनन्तपूर्विका ॥ ३७२ ॥ कोण कोण से शेष का भाग भाग कर प्रवेश करावे । पीठ को ऊँचाई में गर्भ के समान बनावे, अथवा पीठ के समान, अथवा दल के समान बनावे । पीठ में जो आलय पीठ है उसके चारों दिशाओं में बहुधा अनन्त पूर्विका उसमें लक्ष्मी स्थित्यंश की कल्पना करे ॥ ३७१-३७२ ॥ अथोच्छ्रायं तु वै क्षेत्रात् त्रिगुणं मन्दिरस्य च । कुर्यात् त्र्यर्धगुणं चैव द्विगुणं वा यथेच्छया ॥ ३७३ ॥ इसके बाद मन्दिर की ऊँचाई क्षेत्र का तिगुना निर्माण कर अथवा डेढ़ गुना रखे अथवा दुगुना रखे । उसमें अपनी इच्छा है ॥ ३७३ ॥ द्विरेकादशधा कुर्यात् तं च भागैः समं पुरा । विधेयं पीठवत् पश्चादेकांशने मसूरकम् ॥ ३७४ ॥ उसे समान भाग से बाइस भाग में प्रविभक्त करे । पीठ के समान उसका निर्माण करे । पश्चात् एक अंश से मसूरक निर्माण करे ॥ ३७४ ॥ तदूर्ध्वं विहिता जङ्घा गर्भमानेन चोन्नता । भवोपकरणीयाभिर्देवताभिरलङ्कृता ॥ ३७५ ॥ उसके ऊपर गर्भमान की ऊँचाई में जङ्घा निर्माण करे और उसे भवो- पकरणीय देवताओं से अलङ्कृत करे ॥ ३७५ ॥

५९८ सात्वतसंहिता जङ्घायामंशयुग्मेन उपर्यूनाधिकेन च । कार्यं शिखरपीठं तु पूर्वलक्षणलक्षितम् ॥ ३७६ ॥ किन्तु प्रवेशनिर्यासौ तत्र चार्धांशसम्मितौ । शिखरं चात्र विहितं भूमिकानवकान्वितम् ॥ ३७७ ॥ जङ्घा में दो अंश से ऊपर कम अथवा अधिक परिमाण का पूर्वलक्षण लक्षित शिखर पीठ निर्माण करे । किन्तु उसमें प्रवेश और निर्यास (निकलने का मार्ग) शिखर का अर्धांश के समान बनावे । किन्तु यहाँ जो शिखर बनावे वह भूमि के नवांश से युक्त निर्माण करे ॥ ३७६-३७७ ॥ संकोच्य तत्पुरासूत्रमादायोन्नतिसम्मितम् । एकस्मादेकवर्णात् तु जङ्घोर्ध्व्यात् प्रसार्य च ॥ ३७८ ॥ संस्पृशेत् शिखरं पीठमञ्जसा तं निरोध्य च । प्रासादाद् बहिराद्यन्त भूभागे त्वमलेक्षण ॥ ३७९ ॥ कर्णादूर्ध्वं नयेत् सूत्रं लाञ्छ्यमानं क्रमेण तु । शिखरोन्नतिपर्यन्तं चतुर्दिक्ष्वेवमेव हि ॥ ३८० ॥ फिर पूर्व के सूत्र को संकुचित कर उसे ऊँचाई के समान नाप कर एक वर्ण वाले एक जङ्घा के ऊर्ध्व भाग से फैला कर शिखर पीठ पर्यन्त ले जावे । फिर उसे अकस्मात् रोक कर प्रासाद के बाहर आदि अन्त वाले भू भाग में, हे महामते! क्रमशः चिह्न युक्त सूत्र को कर्ण से ऊपर शिखर की ऊँचाई पर्यन्त चारों दिशाओं में घुमावे ॥ ३७८-३८० ॥ पर्यटेल्लाञ्छ्यमानं तु कर्णात् कर्णं महामते । यावत् कुमुदपत्राभा सा स्याच्छिखरमञ्जरी ॥ ३८१ ॥ इस प्रकार कर्ण से कर्ण पर्यन्त घुमाई गई वह शिखर मञ्जरी कुमुद पत्र की आभा के समान बन जायेगी ॥ ३८१ ॥ एवमालेख्य दृष्ट्या तु सम्पाद्या तन्तुपाततः । भूमिकाण्डप्रसिद्ध्यर्थं कार्या सा दशधा पुनः ॥ ३८२ ॥ उपरिष्टात् तु भागेन भवेदामलसारकम् । भूमयो भागमानास्तु ततस्तासां समाचरेत् ॥ ३८३ ॥ इस प्रकार दृष्टि द्वारा चित्र बनाकर पुनः सूत्र पात से उसे सम्पादित करे । तदनन्तर भूमि काण्ड की प्रसिद्धि के लिये उस मञ्जरी का दश भाग करे । ऊपर के भाग से वह अमल सार के समान हो जायेगी । फिर उस मञ्जरी की भूमि को मान के अनुसार प्रविभक्त कर देवे ॥ ३८२-३८३ ॥

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९९ क्षयवृद्ध्या विधानं तु त्यक्त्वा स्थानं च भूमिकाम् । चतुस्त्रिद्व्येकसंख्यानि सममानाङ्गुलानि च ॥ ३८४ ॥ निजभूमेः समारभ्य तानि योज्यान्यधः क्रमात् । पूर्वभूमेः समारभ्य ह्यधःस्थे भूमिकागणे ॥ ३८५ ॥ फिर उस स्थान तथा भूमिका की क्षय वृद्धि का त्याग कर चार, तीन, एक, अथवा सम मान के अङ्गुलियों से निजभूमि से आरम्भ कर नीचे तक एक भूमि में मिला देवे ॥ ३८३-३८५ ॥ सर्वासां व्यवधानं तु तद् द्विरष्टांशसम्मितम् । विभिन्ना पीठरचना तासु कार्या यथास्थिता ॥ ३८६ ॥ सचक्रैर्विविधैः पद्मैः प्रादुर्भावैस्तु चाखिलैः । सर्वैर्वा लाञ्छनैर्मूर्तैर्नृत्तगीतरसस्थितैः ॥ ३८७ ॥ नवांशेनोर्ध्वभागात् तु स्वपादेन विनिर्गतम् । उष्णीषमूर्ध्वभूमेस्तु कार्यं वै रचनोज्झितम् ॥ ३८८ ॥ सभी भूमि में १६ वे अंश का व्यवधान रखे । उस भूमि पर यथा स्थित विभिन्न पीठ रचना करे । चक्र सहित पद्म का निर्माण करे, अनेक का प्रादुर्भाव करे । सभी प्रकार के लाञ्छन, मूर्ति, नृत्य, गीत और रस की स्थिति करे । ऊर्ध्व भूमि के ऊर्ध्व भाग से नवांश में स्वपाद पर्यन्त उष्णीष निर्माण करे ॥ ३८६-३८८ ॥ शिष्टं कृत्वा त्रिधा पीठमण्डस्यैकेन पूर्ववत् । द्वितीयेन ततः कण्ठं तृतीयेनोर्ध्वगेन तु ॥ ३८९ ॥ सुसमं श्रीयुतं कुर्यादण्डं धात्रीफलान्डवत् । नवधोष्णीषकं कृत्वा चतुर्भिर्वेदिकाभ्रमम् ॥ ३९० ॥ उस पीठ के तीन भाग को शेष रखे । एक से अण्ड निर्माण करे । तदनन्तर द्वितीय एवं तृतीय भाग से कण्ठ निर्माण करे । ऊपर के शेष धात्री फल के अण्डे के समान, शोभा सम्पन्न अण्ड का निर्माण करे । नव भाग से उष्णीष निर्माण करे और चार भाग से गोलाकार वेदी निर्माण करे ॥ ३८९-३९० ॥ त्रिभागपृथुलं कण्ठमण्डं पञ्चाङ्गसम्मितम् । पञ्चधा सप्तधा कृत्वा गर्भं वा नवधा पुरा ॥ ३९१ ॥ विहाय पक्षगौ भागौ मध्यभागगणेन तु । प्रासादनाडिका कार्या गर्भाद्धेन विनिर्गता ॥ ३९२ ॥ तीन भाग से मोटा कण्ड निर्माण करे । अण्ड पञ्चाङ्ग सम्मित निर्माण करे । फिर गर्भ को पाँच, सात अथवा नव भागों में विभक्त कर पक्ष के दो भागों को

६०० सात्वतसंहिता छोड़कर गर्भ के आधे वाले मध्य भाग से निकली हुई प्रासाद की नाड़िका का निर्माण करे ॥ ३९१-३९२ ॥ पादेन वा त्रिभागेन सस्तम्भाऽप्यथ केवला । उन्नता शिखराधेन साऽप्युत्पलदलोपमा ॥ ३९३ ॥ दोनों पक्ष में रहने वाले दो भागों को छोड़कर मध्य भाग गण से गर्भ के आधे भाग से निकली हुई प्रासाद नाड़िका निर्माण करे । वह एक पाद से अथवा तीन भाग से स्तम्भ के साथ अथवा केवल निर्माण करे । शिखर के आधे भाग के समान ऊँची कमल दल के आकार की बनावे ॥ ३९२-३९३ ॥ कार्या शिखरपीठोध्र्वे दिव्यकर्मविभूषिता । ततः शुभतरं कुर्यान्मण्टपं स्तम्भसंयुक्तम् ॥ ३९४ ॥ शिखर पीठ के ऊर्ध्व भाग में दिव्यकर्म से विभूषित बनावे । तदनन्तर स्तम्भ से युक्त शुभ मण्डप निर्माण करे ॥ ३९४ ॥ भूषितं विहगेन्द्रेण बलिमण्डलगेन च । चतुर्द्वारि तथा दिक्षु विधेयं मण्टपत्रयम् ॥ ३९५ ॥ उसको गरुड़ से तथा बलि मण्डल में रहने वाले देवताओं से युक्त बनावे । चारों द्वार में तथा दिशाओं में तीन मण्डप बनवाना चाहिये ॥ ३९५ ॥ प्रवेशत्रितयोपेतं मण्टपे मण्टपं भवेत् । कुर्यान्मण्टपमुक्तं वा यथाभिमतनिर्गमम् ॥ ३९६ ॥ उसमें तीन प्रवेश द्वार बनावे, मण्डप में मण्डप बनवाये, उसमें से निकलने के लिये द्वार मण्डप को छोड़कर बनावे, अथवा यथाभिमत बनावे ॥ ३९६ ॥ रथोपरथकाद्यं तु तेषां गर्भाद् विधीयते । निर्यासो दशमांशेन द्वादशांशेन लाङ्गलिन् ॥ ३९७ ॥ अथवा षोडशांशेन ते कार्या नेमिवत् पुनः । चतुर्दिक्पक्षसंलिप्ताः पीठकर्मविभूषिताः ॥ ३९८ ॥ रथ उपरथकादि उनके गर्भ से निर्माण करे । हे लाङ्गलिन ! उसके निर्यास (निकलने के लिये स्थान?) दशमांश अथवा द्वादशांश से निर्माण करावे । अथवा षोडशांस से अथवा नेमिवत् करावे उसके चारों दिशाओं में पक्ष निर्माण करावे और उसे पीठ कर्म से विभूषित करे ॥ ३९७-३९८ ॥ शिखरस्य चतुर्दिक्षु पीठोपरि समापयेत् । समं रथकयुक्त्या तु नासिकामञ्जरीगणम् ॥ ३९९ ॥

चतुर्विंशः परिच्छेदः ६०१ उसे शिखर के चारों ओर पीठ के ऊपर समाप्त करे, रथक युक्ति के समान नासिका मञ्जरीगण का निर्माण करे ॥ ३९९ ॥ मध्यदेशचतुर्दिक्षु कुर्याद् द्वारगणं समम् । त्रिचतुःपञ्चषड्भागे ततो गर्भाद् विधीयते ॥ ४०० ॥ प्रासाद के मध्य देश के चारों ओर बराबर-बराबर मान वाले द्वार समूह का निर्माण करे । ये द्वार गर्भ के तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें भाग में निर्माण करना चाहिये ॥ ४०० ॥ द्विगुणं चोन्नतत्वेन त्रिपञ्चनवशाखिकम् । युक्तं द्वारस्थद्वयेनैव कुम्भेभदशनैस्तु वा ॥ ४०१ ॥ द्वारों की ऊँचाई गर्भ से दूनी बनावे, जिसमें तीन, पाँच, नव शाखा होनी चाहिये । इन द्वारों पर कलश तथा दशनयुक्त हाथी का निर्माण करावे ॥ ४०१ ॥ विधिवत् स्थापनं तस्य मन्त्रपूर्वं समाचरेत् । संस्नाप्य मूलमन्त्रेण सम्पूज्यार्घ्यादिना हृदा ॥ ४०२ ॥ इन द्वारों पर कलश तथा दशनयुक्त हाथी का स्थापन शास्त्र की दृष्टि से मन्त्रपूर्वक करावे । मूल मन्त्र से इनको स्नान करावे और अर्ध्यादि से नमस्कार- पूर्वक इनका पूजन करे ॥ ४०२ ॥ शाखामूलगतां कुर्याद् धातुरत्नमयीं स्थितिम्। सर्वाधारमयं मन्त्रं सन्निरोध्य हि तत्र च ॥ ४०३ ॥ ज्ञानक्रियात्मकं ध्यात्वा शिखामन्त्रेण शाश्वतम् । दक्षिणोत्तरभागाभ्यां शाखायुग्मं तु विन्यसेत् ॥ ४०४ ॥ शाखा के मूल में धातु तथा रत्न स्थापित करे । उसमें सर्वाधारमय मन्त्र का निरोध कर शिखा मन्त्र से शाश्वत् ज्ञान एवं क्रियात्मक शक्तियों का ध्यान करे तथा दक्षिण और उत्तर भागों में दो शाखायें स्थापित करे ॥ ४०३-४०४ ॥ हृन्मन्त्रेण तदूर्ध्वे तु रुद्ध्वाद्यं परमेश्वरम् । सन्निधीकृत्य सम्पूज्य गगनस्थे हृदम्बरे ॥ ४०५ ॥ उन शाखाओं के ऊपर हृन्मन्त्र (नमः) से आद्य परमेश्वर को अवरुद्ध कर गगनस्थ हृदम्बर में सन्निधान कर पूजन करे ॥ ४०५ ॥ द्विविधं धातुजालं तु रत्नं सिद्धार्थकांस्तिलान् । चन्दनाद्या हि गन्धा ये क्षीरं दधि घृतं मधु ॥ ४०६ ॥ शालयः सर्वबीजानि सर्वौषध्यः सविद्रुमाः । सा० सं० - 42

६०२ सात्वतसंहिता कृत्वा नेत्रेण नेत्रस्थान् द्वारोर्ध्वे विनिवेश्य तान् ॥ ४०७ ॥ दो प्रकार के धातुजाल, रत्न, पीली सरसों, तिल, चन्दनादि, गन्ध, क्षीर, दधि, घृत, मधु, शालि, सर्व बीज, सर्वौषधि, सविद्रुम इनको नेत्र से नेत्र में स्थापित कर द्वार के ऊपरी भाग में इन्हें सन्निविष्ट करे ॥ ४०६-४०७ ॥ दृश्यं भोगाप्तये चैव त्वदृश्यं मोक्षसिद्धये । चतुष्यात् सकलो धर्मस्तत्रोर्ध्वं सन्निरोध्य च ॥ ४०८ ॥ चत्वारि शृङ्गा इति यत् पाठयेदृङ्मयांस्ततः । कर्म होमचयं कृत्वा पूर्णां मूलेन पातयेत् ॥ ४०९ ॥ ये दृश्य भोग की प्राप्ति कराते हैं और अदृश्य मोक्ष प्रदान करते हैं। उसके ऊपर चतुष्यात् धर्म को सन्निरुद्ध करे। तदनन्तर 'चत्वारि शृङ्गा त्रयोऽस्य पादा' इत्यादि ऋग्वेद के मन्त्रों को पाठ करावे। फिर उसी मन्त्र से होम कर मूल मन्त्र से पूर्णाहूति करे ॥ ४०८-४०९ ॥ एतद्बिम्बप्रतिष्ठानात् प्राग्वत् पश्चात् समाचरेत् । स्थित्यपेक्षावशेनैव ह्यालयस्य तु वै विभोः ॥ ४१० ॥ यह क्रिया बिम्ब स्थापन से पहले की तरह पश्चात् भी भगवान् के आलय (प्रासाद) की स्थिति की अपेक्षा से करे ॥ ४१० ॥ अनन्तभुवनं नाम सर्वकामापवर्गदम् । चतुष्प्रकारमेवं हि प्रासादं विद्धि पीठवत् ॥ ४११ ॥ इस प्रकार के प्रासाद का नाम अनन्तभुवन है, जो सभी कामनाओं तथा मोक्ष को भी प्रदान करने वाला है। इस प्रकार पीठ के समान यह प्रासाद चार प्रकार का जानना चाहिये ॥ ४११ ॥ रचनासन्निवेशोत्थभेदेनानेकधा तथा । पतत्रीशमृगेन्द्रैस्तु निधिभूतोपमैर्घटैः ॥ ४१२ ॥ शङ्खपद्माङ्किताभिस्तु सोपानपदपङ्क्तिभिः । युक्तं द्वारवशेनैव तथा पीठवशात् तु वै ॥ ४१३ ॥ विस्तारः प्रतिदिक्संस्थस्त्वरुणस्य विधीयते । गर्भोत्थक्षेत्रसंज्ञा च जगतीकस्य लाङ्गलिन् ॥ ४१४ ॥ ये प्रासाद रचना सन्निवेश से उत्पन्न भेदों के कारण अनेक प्रकार के होते हैं। गरुड़ के चिह्न से, मृगेन्द्र के चिह्न से, खजाना स्थापित किये जाने वाले घटों के समान घटों के चिह्न से, शङ्ख, पद्म के चिह्न से, सोपान पद पङ्क्ति के निर्माण

चतुर्विंशः परिच्छेदः ६०३ भेद से, द्वार के निर्माण से, पीठ के निर्माण से और प्रत्येक दिशाओं में विस्तार से जो प्रासाद निर्माण किया जाता है । वह 'अरुण' नामक प्रासाद कहा जाता है । हे लाङ्गलिन् ! 'जगतीक' प्रासाद की 'गर्भोत्थ क्षेत्र' संज्ञा है ॥ ४१२-४१४ ॥ ज्ञेयः सजगतीकस्य तन्मानेनापि सर्वदिक् । एभ्यः पादाधिकं कुर्यात् पादाद्यंशोज्झितं तु वै ॥ ४१५ ॥ बुद्ध्वा चायतनानां च संस्थितिश्वाङ्गणे पुरा । चतुरायतनं विद्धि प्रासादैर्दिक्त्रयस्थितैः ॥ ४१६ ॥ आद्येन सह कोणस्थैस्तत्पञ्चायतनं स्मृतम् । विज्ञेयमष्टायतनं त्रिभिरन्यैस्तु दिग्गतैः ॥ ४१७ ॥ क्योंकि सजगतीक प्रासाद का भी वही मान होता है । इनसे एक पाद अधिक अथवा पादाद्यंश से रहित इस प्रकार अङ्गण में आयतनों को समझ कर प्रासाद निर्माण करे । तीन दिशाओं में स्थित प्रासाद की 'चतुरायतन' संज्ञा कही गई है और आदि के साथ कोण में स्थित प्रासाद को 'पञ्चायतन' कहा जाता है । अन्य तीन दिशाओं में होने वाले प्रासाद 'अष्टायतन' कहे जाते हैं ॥ ४१५-४१७ ॥ विना मध्यस्थितेनैव दिग्गतैस्तु द्विभिर्द्विभिः । तद्दशायतनं तेन युक्तमेकाधिकं भवेत् ॥ ४१८ ॥ मध्य स्थिति के बिना दो-दो दिशाओं में दो-दो प्रासाद 'दशायतन' कहे जाते हैं । उसकी अपेक्षा एक प्रासाद अधिक हो, तब उसे 'एकादशायतन' कहा जाता है ॥ ४१८ ॥ प्रतोलीपक्षगेणैव प्रासादद्वितयेन तु । द्वादशायतनं विद्धि सह मध्यस्थितेन तु ॥ ४१९ ॥ तदेवाधिकसंज्ञं तु अतोऽन्योऽनन्तसंज्ञकः । परस्परमुखौ कुर्यात् प्रासादौ द्वारदेशगौ ॥ ४२० ॥ प्रासादाभिमुखाच्चैव दिक्त्रयेऽवस्थितास्तु ये । कोणस्थाभ्यां च साम्मुख्यं द्वाभ्यां द्वाभ्यां विधीयते ॥ ४२१ ॥ प्रतोली (वीथी) तथा पक्षगण से युक्त दो प्रासाद को 'द्वादशायतन' कहा जाता हैं । वही यदि उसी के मध्य में एक प्रासाद और हो तो उसकी अधिक संज्ञा कही गई है । इसके अतिरिक्त अन्य प्रासादों की अनन्त संज्ञा है । द्वार देश पर आमने- सामने मुख वाले दो प्रासाद, प्रासाद के सामने तीन दिशाओं में तीन प्रासाद और दो कोणों के आमने-सामने दो-दो प्रासाद का निर्माण विहित है ॥ ४१९-४२१ ॥ द्वाभ्यामभिमताभ्यां तु कुर्यादुचितदिङ्मुखम् ।

६०४ सात्वतसंहिता द्वौ परस्परवक्त्रौ तु कोणदेशसमाश्रितौ ॥ ४२२ ॥ अपनी इच्छा के अनुसार निर्माण किये जाने वाले दो प्रासादों को उचित दिशा में निर्माण करावे । परस्पर सटे हुए दो मुख वाले दो प्रासादों को कोण देश के समाश्रित निर्माण करावे ॥ ४२२ ॥ द्वाराण्यनन्तायतने प्रासादानां महामते । यथाभिमतदिक्स्थानि कर्तव्यान्यविशङ्कया ॥ ४२३ ॥ हे महामते ! अनन्तायतन नामक प्रासाद में यथाभिमत दिशा में द्वार निर्माण करावे, इनमें संदेह किञ्चिन्मात्र भी न करे ॥ ४२३ ॥ न तत्र तेषां भवति वेधदोषः परस्परम् । अङ्गभावगतत्वाच्च प्रधानायतनस्य वै ॥ ४२४ ॥ इस प्रकार के प्रासाद निर्माण में कभी भी परस्पर वेध दोष नहीं लगता । क्योंकि वे प्रधानायतन के अङ्गभाव बन जाते हैं ॥ ४२४ ॥ अर्धेन च त्रिभागेन हितः पादेन चाङ्गणात् । परण्डकस्य चोच्छ्रायस्तद्विस्तारस्तथोच्छ्रितेः ॥ ४२५ ॥ अङ्गण के आधे अथवा तीन भाग अथवा एक पाद के मान में परण्डक को ऊँचा निर्माण करे तथा उसका विस्तार उसकी ऊँचाई के अनुसार करे ॥ ४२५ ॥ तच्च पीठोपमं कुर्यात् श्लक्ष्णं सोष्णीषमेव वा । युक्तं कोटिगणेनाथ नानादेवान् गणेन तु ॥ ४२६ ॥ उसे पीठ के समान चिकना तथा उष्णीश युक्त बनावे उसे करोड़ों गणों से युक्त करे ॥ ४२६ ॥ यदेकायतनं चैव त्वङ्गणं तन्महामते । युक्तं लघुपरण्डेन केवलं वा परण्डकम् ॥ ४२७ ॥ हे महामते ! जो एक आयतन वाला अङ्गण है उसे लघु परण्डक से युक्त करे अथवा केवल परण्डक ही निर्माण करे ॥ ४२७ ॥ यदा द्व्यायतनार्थं च द्वादशायतनान्तिकम् । एकदिग्विीक्षमाणं च चतुरश्रायतेऽङ्गणे ॥ ४२८ ॥ जब चौकोर अथवा आयत अङ्गण में द्व्रायतन से लेकर द्वादशायतन हो, तब उसे एक दिशा की ओर देखते हुए निर्माण करावे ॥ ४२८ ॥ वृत्तायते वा वितते प्रासादे चोक्तलक्षणे ।

चतुर्विंशः परिच्छेदः ६०५ यस्माद् देवालयानां च अङ्गणानां विशेषतः ॥ ४२९ ॥ चतुरश्रादिपीठानां नित्यमेव महामते । अन्योन्यानुगतत्वं तु हितं सापेक्षकं तु वै ॥ ४३० ॥ भूमिभागवशेनैव तथैवार्चावशेन तु । नानाफलवशेनपि तथा शोभावशेन च ॥ ४३१ ॥ वृत्त, आयत, वितत अथवा उक्त लक्षण प्रासाद में जिस कारण से देवालयों का या अङ्गणों का विशेष कर चौकोर पीठों का, हे महामते ! नित्य ही भूमिभाग वश से, उसी प्रकार अर्चावश से तथा नाना फल वश से एवं शोभावश से सापेक्षक अन्योन्यानुगतत्व रहता है । अतः वे हितकारी होते हैं ॥ ४२९-४३१ ॥ भूलाभश्चतुरश्रात् तु चतुरश्रायताद् धनम् । वर्तुलात् सर्वकामाप्तिर्निर्वृत्तिस्तु तदायतात् ॥ ४३२ ॥ दृष्टादृष्टफलेप्सूनां लोकास्तु महदादयः । यच्छन्ति वैष्णवं स्थानमारोग्यं भूमिमुत्तमाम् ॥ वैष्णवानामकामानां च्युतेरन्ते परं पदम् ॥ ४३३ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां प्रतिमापीठप्रासादलक्षणं नाम चतुर्विंशः परिच्छेदः ॥ २४ ॥ चौकोर प्रासाद से भू-लाभ, चतुरश्र और आयत प्रासाद से धन-लाभ, वर्त्तुल प्रासाद से सर्व कामाप्ति, आयत से निर्वृत्ति प्राप्त होती है । दृष्टादृष्ट फल चाहने वाले प्रासाद निर्माण कर्त्ताओं को महदादि लोक वैष्णव स्थान देते हैं । आरोग्य एवं उत्तम भूमि देते हैं । इतना ही नहीं निष्काम वैष्णवों को मरने के बाद परम पद देते हैं ॥ ४२९-४३३ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के प्रतिमापीठप्रासादलक्षण नामक चौबीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २४ ॥

पञ्चविंशः परिच्छेदः प्रतिष्ठादिविधिः नारद उवाच सर्वलोकगुरुर्विप्रा यदुक्तो विश्वधारिणा । तदिदानीं प्रवक्ष्यामि मन्त्रबिम्बनिवेशनम् ॥ १ ॥ भोगेप्सूनां च वर्णानां साम्प्रतं यदभीष्टदम् । कैवल्यदं शमाच्चैव चातुराश्रम्यसेविनाम् ॥ २ ॥ अथ पञ्चविंशतिः परिच्छेदो व्याख्यास्यते । इह वासुदेवेन सङ्कर्षणायोपदिष्टं भोगापवर्गादिफलप्रदां मन्त्रबिम्बप्रतिष्ठां वक्ष्यामीत्याह—सर्वेति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १-३ ॥ नारद जी ने कहा—हे ब्राह्मणो ! सभी लोकों के गुरु भगवान् श्री कृष्ण ने भगवान् सङ्कर्षण से जो मन्त्र-बिम्ब का सन्निवेश कहा था । वह मै आप लोगों से कह रहा हूँ ॥ १ ॥ यह मन्त्र-बिम्बनिवेश भोगेच्छु वर्ण वालों के लिये अभीष्टप्रद है । शम के कारण चातुराश्रम सेवियों के लिये यह अपवर्ग (मोक्ष) प्रदान करने वाला है ॥ २ ॥ यज्ञधर्मरतानां च सहायं च फलैस्तु तत् । इतना ही नहीं जो इस प्रकार के यज्ञ करने वालों की सहायता करता है उसे भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ यागमण्डपलक्षणम् प्राग्वद् देवगृहस्याग्रे दिग्भागे सति मण्टपम् ॥ ३ ॥ चतुरश्रं चतुर्द्वारं दर्भमालान्तरीकृतम् । अन्यत्र तदलाभे तु यथाभिमतदिङ्मुखम् ॥ ४ ॥ चतुर्दशकराच्चैव यावत् त्रिंशत्करावधि । षट्करान्तं पुनस्तस्माद् बिम्बमानव्यपेक्षया ॥ ५ ॥ यागशालालक्षणमाह—प्राग्वदिति सार्धद्वाभ्याम् । प्राग्वत् कुम्भस्थापन- प्रकरणोक्तवदित्यर्थः । देवगृहस्याग्रे पुरतः, दिग्भागे सति अवकाशे सति, तत्र चतु-

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६०७ द्वारं यागमण्टपं कुर्यात् । तदलाभे अग्रालाभे, अन्यत्र दक्षिणादिदिक्षु विदिक्षु वा यथा- भिमतदिङ्मुखं यागमण्टपं कुर्यात् । चतुर्दशकराच्चैव यावत् त्रिंशत्करावधि चतुर्दश- हस्तमारभ्य त्रिंशद्धस्तपर्यन्तं बिम्बमानव्यपेक्षया बिम्बबृहत्त्वानुगुण्येन वर्धितविस्तारायामं पुनस्तस्माच्चतुर्दशकरादारभ्य षट्करान्तं बिम्बाल्पत्वानुसारेण ह्रासितविस्तारायामं वा यागमण्टपं कुर्यादिति पूर्वेणान्वयः ॥ ३-५ ॥ पूर्ववत् कुम्भ स्थापन प्रकरण में कही गई विधि के अनुसार देवगृह के अग्र- भाग में यदि अवकाश हो, तो किसी दिशा में चतुर्द्वार याग मण्डप स्थापित करे । यदि आगे अथवा दिशाओं में अवकाश न हो, तब यथाभिमत जिस-किसी दिक्- विदिक् स्थान में चौकोर मण्डप स्थापित करे । उस मण्डप को स्थान-स्थान में जहाँ-तहाँ कुशा और पुष्पमाला से सुसज्जित करे । वह मण्डप १४ हाथ से लेकर ३० हाथ पर्यन्त बिम्ब के मान की अपेक्षा करते हुए, उसके अनुसार महान् लम्बा चौड़ा बनावे, अथवा चौदह हाथ से लेकर ६ हाथ पर्यन्त आयाम वाला (लघु भी बिम्ब की अल्पता के अनुसार) ह्रस्व मण्डप भी बनाया जा सकता है ॥ ३-५ ॥ वेदिकलक्षणम् कार्या मध्ये स्थला तेषां द्विसप्तांशैस्ततोऽष्टभिः । समन्तभद्रा सुश्लक्ष्णा चिता पक्वेष्टकादिकैः ॥ ६ ॥ तालोन्नतेः समारभ्य सामान्येऽस्मिन् हि कर्मणि । उन्नताङ्गुलवृद्ध्या तु नीता तद् ह्रासतां क्रमात् ॥ ७ ॥ तत्र वेदिकलक्षणमाह—कार्येति द्वाभ्याम् । तेषां चतुर्दशादिहस्तमाभेदैर्बहु- विधानां मण्टपानां मध्ये द्विसप्तांशैश्चतुर्दशभागैः स्थला कार्या वेदिः कर्तव्या । सा चाष्टभिरष्टभिर्भागैः समन्तभद्रा परितो वीथियुक्तेत्यर्थः । एवं च मण्टपविस्तारायामौ त्रिंशद्भागान् कृत्वा तेषु चतुर्दशभागैर्वेदिकाकल्पनं शिष्टेषु षोडश भागेषूभयतोऽष्ट- भिरष्टवीथीकल्पनमिति ज्ञेयम् । तदौन्नत्यं तु तालोन्नतेः समारभ्याङ्गुलवृद्धयोन्नता, तद्- ह्रासतोऽङ्गुलह्रासतो नीचा वा वेदिका कल्पनीयेत्यर्थः । चतुर्दशकरविस्तारायामयाग- गृहस्थवेदिकायास्तालमानमौन्नत्यम् । तस्मादारभ्य त्रिंशत्करपर्यन्तं यागगेहस्यायाम- विस्तारयोर्वृद्ध्यां षट्करान्तं ह्रासे वा तद्धस्तसंख्यानुरोधेन वेदिकौन्नत्यस्याप्येकैका- ङ्गुलिवृद्धिह्रासौ कार्याविति भावः । एवं च त्रिंशद्धस्तविस्तारायामयागगेहस्थवेदि- कायाश्चतुरङ्गुलाधिकहस्तमानमौन्नत्यं भवति ॥ ६-७ ॥ इस प्रकार मण्डप का विस्तार आयाम अर्थात् लम्बाई चौड़ाई का तीस भाग करके करे । उस (तीस) में से चतुर्दश भाग में पके हुए ईंटों की अत्यन्त सुन्दर चिकनी वेदी बनावे । शेष सोलह के दो भाग करे जिसमें आठ-आठ भाग की दो वीथी बनानी चाहिये । उस वेदी की ऊँचाई ताल के परिमाण से आरम्भ कर क्रमशः एक-एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये और निचाई एक अङ्गुल तक की होनी चाहिये ॥ ६-७ ॥

६०८ सात्वतसंहिता वेदिकायां मण्डलादिस्थलविभागक्रमकथनम् द्वित्रिरष्टांशकैर्मध्ये सर्वासां मण्डलं भवेत् । चतुरश्रं चतुर्द्वारं चक्राम्बुरुहभूषितम् ॥ ८ ॥ दक्षिणे शयनं सौम्ये कुण्डमग्नेस्तु पूर्ववत् । समेखलं द्विहस्तं तु चक्रपद्माङ्कितं शुभम् ॥ ९ ॥ अथ वेदिकायां मण्डलादिस्थलविभागक्रममाह—द्वित्रिरिति द्वाभ्याम् । सर्वासाम् मानभेदैर्बहुविधानां वेदिकानां मध्ये चतुरश्रत्वादिविशिष्टमण्डलम्, तद्दक्षिणे शयनम्, सौम्ये समेखलत्वादिविशिष्टमग्नेः कुण्डं च क्रमात् क्रमालङ्कारेण द्वित्रिरष्टांशकैः कुर्यादिति योजना । एवं च द्वाभ्यामंशाभ्यां मण्डलं त्रिभिरंशैः शयनमष्टांशैः कुण्ड- स्थानं च कार्यमित्यर्थः । पारमेश्वरव्याख्याने तु ‘‘द्वित्रिरष्टांशकैः क्रमेण नीचा नालोन्न- तेर्न्यूनता न कर्तव्येत्यर्थः’’ इति लिखितम् । तदुपहासास्पदम् ॥ ८-९ ॥ अब वेदिका में मण्डलादि स्थल का विभाग क्रम कहते हैं—उस वेदिका के मध्य में दो अंशों से मण्डल निर्माण करे । तीन अंशों से शयन तथा आठ अंशों से कुण्ड स्थान का निर्माण करे । वह मण्डल मध्य में चौकोर, चतुर्द्वार और चक्र तथा कमल से अलङ्कृत होना चाहिये । उसके दक्षिण में शयन तथा उत्तर में मेखला युक्त दो हाथ का चक्र बनाकर पद्माङ्कित अग्निकुण्ड का निर्माण कराना चाहिये ॥ ८-९ ॥ कुण्डाष्टकनिर्माणकथनम् तदधश्चतुरश्रं प्राग् दाममेखलिकान्वितम् । अथ दक्षिणदिग्भागे कुर्याद् वै चक्रचिह्नितम् ॥ १० ॥ वर्तुलं पश्चिमे सौम्ये कमलाङ्गं मनोहरम् । शङ्खाङ्गं सर्वकोणेषु मानमेषां यथोर्ध्वगे ॥ ११ ॥ अथ वेदिकाया अधस्तात् प्रागाद्यष्टदिक्षु कुण्डाष्टकमाह—तदध इति द्वाभ्याम् । ऊर्ध्वगे कुण्डे यथा मानं = द्विहस्तत्वादिरूपं मानम्, एषां प्रागादिकुण्डनामपि तथैवेत्यर्थः ॥ १०-११ ॥ अब वेदिका के नीचे पूर्वादि क्रम से आठो दिशाओं में आठ कुण्डों के निर्माण का प्रकार कहते हैं—ऊपर के कुण्ड का जितना मान हो उतना ही मान पूर्वादि कुण्डों का भी बनाना चाहिये । पूर्व का कुण्ड चौकोर, दाम एवं मेखला से युक्त बनावे । दक्षिण का कुण्ड चक्र के चिह्न से युक्त हो । पश्चिम का कुण्ड गोला, उत्तर का कुण्ड मनोहर कमलाकार और सभी कोणों का कुण्ड शङ्ख के चिह्न से युक्त होना चाहिये । उसका मान ऊपर के कुण्ड के समान होना चाहिये जो पहले कहा जा चुका है ॥ १०-११ ॥

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६०९ त्रयोदशहस्तपरिमितमण्डपादिषु कुण्डप्रकारकथनम् सर्वे दशान्तहस्तानां चतुर्णामेकमेखलाः । मण्टपानां तु किन्त्वत्र ऊर्ध्वगं सर्वमेखलम् ॥ १२ ॥ त्रयोदशहस्तपरिमितमण्डपादिषु कुण्डप्रकारमाह—सर्व इति । दशान्तहस्तानां = दशहस्तपरिमितमण्डपानामित्यर्थः । चतुर्णां मण्डपानां त्रयोदशहस्तपरिमितद्वादशहस्त- परिमितैकादशहस्तपरिमितदशहस्तपरिमितचतुर्मण्टपानां सर्वे प्रागाद्यष्टकुण्डा अपि, एकमेखलाः स्थलसंकटादेकथैव मेखलयाऽन्विताः कार्याः । किन्तूर्ध्वगं वेदिको- परिस्थं कुण्डं सर्वमेखलं सर्वाभिर्मेखलाभिरन्वितं कार्यमित्यर्थः ॥ १२ ॥ चौदह, तेरह, बारह एवं ग्यारह से लेकर दश हाथ तक के चार मण्डपों में बनाये जाने वाले सभी आठ कुण्डों की एक मेखला होनी चाहिये । किन्तु ऊपरी वेदिका के ऊपर बनाया जाने वाला कुण्ड सभी मेखलाओं से युक्त बनावे ॥ १२ ॥ अतोऽधः संस्थिताः सर्वे एककुण्डास्तु मण्टपाः । तेषां समेखलं चाद्यं द्वाविंशत्यङ्गुलेर्भवेत् ॥ १३ ॥ ह्रासादङ्गुलयुग्मस्य यावद् वै षोडशाङ्गुलम् । स्यात् षट्करे गृहे कुण्डं कार्या वा मेखलाधिका ॥ १४ ॥ नवहस्तपरिमितमण्डपादिषु प्रागादिकुण्डाभावमाह—अत इत्यर्धेन । अतोऽधः- संस्थिताः सर्वे मण्डपा नवहस्तमिता अष्टहस्तमिताः सप्तहस्तमिताः षड्ढस्तमिता- श्चत्वारो मण्डपाः, एककुण्डाः = वेदिकोर्ध्वकुण्डमात्रसहिता इत्यर्थः । तत्रापि मध्यकुण्डस्य मानभेदमाह—तेषामिति सार्धेन । तेषां षट्करान्तानां चतुर्णां मण्डपानामाद्ये नवहस्तपरिमिते मण्टपे द्वाविंशत्यङ्गुलैः समेखलं कुण्डं भवेत् । एवं षट्करगृहे क्रमेणाङ्गुलयुग्मस्य ह्रासात् षोडशाङ्गुलं कुण्डं यावत् स्यात् । अष्टकरे गृहे विंशत्यङ्गुलमितं कुण्डम्, सप्तकरे गृहेऽष्टादशाङ्गुलमितं कुण्डमित्युक्तं भवति । एवं चेदमप्यूह्यते, चतुर्दशकरमिते गृहेऽष्टाङ्गुलाधिकहस्तमितं कुण्डम्, त्रयो- दशकरमिते गृहे षडङ्गुलाधिकहस्तमितं कुण्डम्, द्वादशकरे गृहे चतुरङ्गुलाधिकहस्तमितं कुण्डम्, एकादशकरमिते गृहे द्व्यङ्गुलाधिकहस्तमितं कुण्डम्, दशकरमिते गृहे हस्त- मितं कुण्डमिति । किञ्च, पञ्चदशकरगृहादित्रिंशत्करगृहपर्यन्तमेकाङ्गुलिवृद्धिश्चोच्यते । अतः पञ्चदशकरे गृहे नवाङ्गुलाधिकहस्तमितं कुण्डम्, षोडशकरे गृहे दशाङ्गुलाधिक- हस्तमितं कुण्डम्, एवं क्रमेण त्रिंशत्करे गृहे द्विहस्तमितं कुण्डमिति ज्ञेयम् । कार्या वा मेखलाधिका षोडशाङ्गुलादिकुण्डानामेकैव मेखला, अधिका वा द्व्यादिका मेखला वा कार्येत्यर्थः ॥ १३-१४ ॥ इसके नीचे नव हस्त चार मण्डप में एक कुण्ड बनाना चाहिये जो ऊपर की वेदी में बनाये गये एक कुण्ड के सहित हो । उसमें आदि (नव हस्त परिमित) मण्डप का कुण्ड मेखला सहित बाइस अङ्गुल का होना चाहिये ॥ १३ ॥

६१० सात्वतसंहिता यहाँ तीस हाथ तक के मण्डपों में बनाये जाने वाले कुण्डों का विवरण इस प्रकार समझना चाहिये—छः हाथ के मण्डप में दो-दो अङ्गुल की कमी होने से वहाँ सोलह अङ्गुल का कुण्ड होता है और आठ हाथ के मण्डप में बीस अङ्गुल का कुण्ड तथा सात हाथ के मण्डप में अठारह अङ्गुल का कुण्ड होना चाहिये । विमर्श—चौदह हाथ के मण्डप में आठ अङ्गुल का कुण्ड, तेरह हाथ के मण्डप में छः अङ्गुल अधिक का कुण्ड, बारह हाथ के मण्डप में चार अङ्गुल अधिक का कुण्ड, ग्यारह हाथ के मण्डप में दो अङ्गुल अधिक का कुण्ड और दश हाथ के मण्डप में एक हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये । इसी प्रकार पन्द्रह हाथ से लेकर तीस हाथ तक के मण्डप में एक-एक अङ्गुली की वृद्धि के क्रम से कुण्ड समझना चाहिये । इस प्रकार पन्द्रह हाथ के मण्डप में नव अधिक अङ्गुल का कुण्ड, सोलह हाथ के मण्डप में दश अङ्गुल अधिक और इसी प्रकार तीस हाथ के मण्डप में दो हाथ का कुण्ड निर्माण करना चाहिये । इस प्रकार सोलह अङ्गुलादि क्रम से निर्मित कुण्ड में एक ही मेखला अथवा उससे अधिक दो या तीन मेखलाओं का निर्माण करना चाहिये ॥ १४ ॥ मण्डपोच्छ्रायकथनम् अष्टहस्तोच्छ्रितं पूर्वमतोऽर्धकरवर्धिता । न ह्रासः षट्करान्तानां न्यूनानामुच्छ्रितेर्भवेत् ॥ १५ ॥ त्रयोदशकरादीनां चतुर्णां पातयेत् ततः । अष्टकं चाङ्गुलानां तु सप्तपञ्चचतुः क्रमात् ॥ १६ ॥ अथ मण्टपोच्छ्रायमाह—अष्टहस्तोच्छ्रितमिति द्वाभ्याम् । पूर्वमाद्यं चतुर्दशकर- मितं गृहमष्टहस्तोच्छ्रितम् । अतः परं पञ्चदशकरादयो मण्टपाः क्रमेणार्धकरवर्धिताः । यथा त्रिंशत्करविस्तृतो मण्टपः षोडशहस्तोच्छ्रितः स्यादिति भावः । त्रयोदशकरादीनां चतुर्णां मण्टपानां पूर्वोक्तहस्तोच्छ्राये क्रमादङ्गुलानां मष्टकं सप्तकं पञ्चकं चतुष्कं पात- येत्, ह्रासयेदित्यर्थः । षट्करान्तानां = नवकरादिषट्करान्तानां चतुर्णां तु न्यूनानां = न्यूनहस्तसंख्यानां मण्डपानामुच्छ्रितेरुच्छ्रायस्य ह्रासो न भवेत्, दशहस्तमण्टपोच्छ्रा- यन्यूनो न भवेदित्यर्थः । अत्र मूलभूतसात्वतानुसारेण ह्रास इत्यादिवाक्यस्य पूर्वं विद्यमानत्वेऽपि पाठक्रमादर्थक्रमस्य बलीयस्त्वादित्थं व्याख्यातम् । पारमेश्वरे (१५।११९-१२०) त्वर्थक्रमेणैव पाठोऽप्युपबृंहितः ॥ १५-१६ ॥ पूर्व में कहा गया चौदह हाथ का मण्डप आठ हाथ ऊँचा होना चाहिये । किन्तु नव हाथ से लेकर छः हाथ तक न्यून हाथ वाले मण्डपों की ऊँचाई में ह्रास (कम) करने का नियम नहीं है । इसके बाद पन्द्रह से लेकर तीस हाथ तक के सभी मण्डप क्रमशः आधे हाथ ऊँचे बनाने चाहिये । इसका तात्पर्य यह है कि तीस हाथ का मण्डप सोलह हाथ ऊँचा बनाना चाहिये । तेरह हाथ से लेकर

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६११ सोलह हाथ पर्यन्त मण्डपों की ऊँचाई क्रमशः आठ, सात, पाँच और चार हाथ कम करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥ एवं स्नानगृहाणां तु विस्तारश्चोन्नतैः सह । किन्तु वै वालुकापीठैर्मध्यतश्चोपशोभिताः ॥ १७ ॥ बालुकापीठमानकथनम् द्विचतुर्भिर्द्विसप्तांशैर्विस्तृताः प्राग्वदुन्नताः । एवं यागमण्टपोक्तं लक्षणं स्नानगेहेऽप्यतिदिशति—एवमिति । उन्नतैः सह औन्नत्यैः सह इत्यर्थः । भावप्रधानो निर्देशः । तत्र विशेषमाह—किन्त्विति । वालुका- पीठैर्मध्यतो वालुकापूरितवेदिकामध्यत उपशोभिताः, स्नानगृहा इति शेषः । बालुकापीठमानमाह—द्विचतुर्भिरिति । द्विसप्तांशैश्चतुर्दशभागैर्द्विचतुर्भिरष्टभिरं- शैश्च विस्तृताः प्राग्वदुन्नताश्च, बालुकापीठा इति शेषः । यागगेहे परितः कुण्ड- निर्माणार्थमुभयतोऽप्यष्टभिरष्टभिरंशैर्वीथीकल्पनमुक्तम् । अत्र कुण्डाभावाच्चतुर्भि- श्चतुर्भिरंशैरेव वीथीकल्पनम्, द्वाविंशत्यंशैर्वालुकापीठकल्पनमिति बोध्यम् । इसी प्रकार स्नानगृह का विस्तार भी उसकी ऊँचाई के साथ विस्तृत करना चाहिये । किन्तु स्नानगृह की वेदी को मध्य में बालुका से परिपूर्ण कर शोभायुक्त बनानी चाहिये । यागगृह में दोनों ओर से कुण्ड निर्माण के लिये आठ-आठ और चौदह अंशों से पहले कही गई ऊँचाई के अनुसार विस्तृत वीथी का निर्माण करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥ स्नानशालादिनिर्माणकथनम् स्नानीयादग्रगेहाद् वा दिक्त्रयेऽभिमते शुभम् ॥ १८ ॥ स्नानशालादिनिर्माणस्थाने नियममाह—स्नानीया इति । स्नानीयाः, गृहा इति शेषः । अग्रगेहाद् = अग्रभागस्थितयागगेहं विहाय, दिक्त्रये दक्षिणादिदिक्षु अभिमते शुभे मनोहरे स्थाने कार्या इत्यर्थः ॥ १८ ॥ अब स्नानशालादि निर्माण स्थान के लिये नियम कहते हैं—अग्रभाग में स्थित यागगृह को छोड़कर शेष दक्षिण आदि तीन दिशायें कल्याणकारी कही गयीं हैं ॥ १८ ॥ नयनोन्मीलनगेहलक्षणकथनम् अर्धमानसमं मुख्यात् सुपीठशयनान्वितम् । दृग्दानभवनं कुर्यान्माङ्गल्यकलशैः सह ॥ १९ ॥ नयनोन्मीलनगेहलक्षणमाह—अर्धेति । मुख्याद् यागगेहाद् अर्धमानसमं तदर्ध- विस्तारायामं माङ्गल्यकलशैः सह वक्ष्यमाणकलशैः सह सुपीठशयनान्वितं दृग्दान-

६१२ सात्वतसंहिता भवनं दृशोर्दानमुन्मीलनम्, 'दो अवखण्डने' (१।९४८ दि०) इति धातोः, तदर्थं भवनं गृहं कुर्यात् ॥ १९ ॥ अब नेत्रोन्मीलन के लिये गृह का लक्षण कहते हैं—मुख्य यागगृह का आधा लम्बा चौड़ा मङ्गलकलशों के साथ (वक्ष्यमाण कलश के साथ) सुपीठ शयनान्वित नेत्रोन्मीलन के लिये गृह निर्माण करना चाहिये ॥ १९ ॥ . यागमण्टपादिसाधारणमलङ्कारकथनम् सर्वेषां कर्मभूभागं कोणस्तम्भैर्विभूषितम् । सुनेत्रैर्वेष्टितं कुर्याच्चक्राद्यैः पूर्ववद् युतम् ॥ २० ॥ यागमण्टपादिसाधारणमलङ्कारमाह—सर्वेषामिति । सुनेत्रैः शोभनवस्त्रैः, वितानैरिति यावत् । चक्राद्यैः चक्रध्वजादि-भिरित्यर्थः ॥ २० ॥ इसके अनन्तर सभी के नेत्रों के लिए सुखदायी वितान जो सुन्दर वस्त्रों एवं चक्र ध्वजादि से सुशोभित हो उसका निर्माण करना चाहिये ॥ २० ॥ स्नानपीठलक्षणकथनम् सुस्थिरं दृढपादं च स्नानाम्भोग्रहणक्षमम् । अर्धेन वालुकापीठाद् दीर्घमाद्यक्रमेण तु ॥ २१ ॥ वर्धितं सार्धहस्तेन ह्रासितं चतुरङ्गुलैः । स्वदैर्घ्यादर्धविस्तीर्णं कृत्वैवं सप्रणालकम् ॥ २२ ॥ तेन तद्वालुकापीठं भूषयेन्मध्यगेन तु । अथ स्नानपीठलक्षणमाह—सुस्थितमिति सार्धद्वाभ्याम् । स्नानाम्भोग्रहणक्षमं = स्नानजलग्रहणार्थं पीठोपरि परितश्चतुरङ्गुलोत्सेधावरणयुक्तमित्यर्थः । वालुकापीठा- दर्धेन दीर्घं चतुर्दशहस्तविस्तारायामस्नानगेहस्थितावालुकापीठार्धमानेन दीर्घम्, आद्य- क्रमेण तदादित्रिंशत्करगृहपर्यन्तं क्रमेणार्धहस्तेन वर्धितं तदादिष्ट्करगृहपर्यन्तं क्रमेण चतुरङ्गुलैर्ह्रासितं स्वदैर्घ्यादर्धविस्तीर्णं सप्रणालकं स्नानपीठं कृत्वा तेन तद्वालुकापीठं भूषयेत् ॥ २१-२३ ॥ अब स्नानपीठ का लक्षण कहते हैं—स्नान जल ग्रहण करने के लिये पीठ के ऊपर चारों ओर चार अङ्गुल ऊँचा आवरण बनाना चाहिये । फिर वालुका पीठ के अर्ध मान तक दधि तथा तीस हाथ पर्यन्त लम्बे स्नानगृह के मान तक आधा- आधा हाथ बढ़ाते हुए, प्रणाली (= नाली) से युक्त स्नान पीठ का निर्माण करे । फिर मध्य में बालुका पीठ को भूषित करे ॥ २१-२३ ॥ द्वारतोरणलक्षणकथनम् यागागारस्य वै दिक्षु द्वारार्थं तत्र चान्तरे ॥ २३ ॥

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६१३ (शा? श)मार्थवृद्धियोगेन ह्रासोऽन्यत्र कलादिकः । तोरणानि बहिः कुर्याद् दृढैः काष्ठैः सुपूजितैः ॥ २४ ॥ अथ द्वारतोरणलक्षणमाह—यागागारस्येत्यादिभिः ॥ २३-२८ ॥ इसके बाद स्नानागार से बाहर चारों दिशाओं में द्वारों पर दृढ़ काष्ठ का बना हुआ कल्याण हेतु छोटा बड़ा कलापूर्ण प्रशस्त तोरण निर्माण करे ॥ २३-२४ ॥ पञ्चहस्तानि चार्धेन वर्धितानि करेण तु । न ह्रासमाचरेत् तेषामन्यत्र करणे सति ॥ २५ ॥ न शमात् पञ्च हस्तानामृते भूमौ प्रवेशयेत् । शमार्थं वर्धितानां च द्वे द्वे संवर्धयेत् कले ॥ २६ ॥ दैर्घ्यात् प्रवेशशिष्टात् तु त्रिभागेन तदन्तरम् । सर्वे चक्रध्वजाः कार्या वस्त्रस्रङ्‌मञ्जरीयुताः ॥ २७ ॥ सुधाद्यैर्वर्णकैः पीतैश्चन्दनाद्यैस्तु लेपिताः । वह तोरण पाँच हाथ का होना चाहिये । यागगृह के लम्बे होने पर एक-एक हाथ उसे बढ़ाते रहना चाहिये । यदि तोरण अन्यत्र भी बनाना हो, तो उसे पाँच हाथ से कम में निर्माण न करे । यदि तोरण केवल पाँच हाथ का ही हो, तो उसे शम प्रमाण से अधिक भूमि में न गाड़े । यदि पृथ्वी में गाड़ना ही हो, तो उसे दो-दो कला बढ़ा कर पृथ्वी में गाड़े । इस प्रकार तोरण स्थापित कर उसका पूजन करे । फिर तोरणध्वज तथा ध्वजाष्टक स्थापित करे । ये सभी चक्र, ध्वज, वस्त्र, माला और मञ्जरी से भूषित होने चाहिये और सुधा (चूना) आदि से अनुलिप्त अथवा पीत वर्णानुलिप्त तथा चन्दनादि लेपों से विभूषित होना चाहिये ॥ २५-२८ ॥ विभवाद्यभावे पक्षान्तरकथनम् भिन्नाङ्गमेतदखिलं यथैकस्मिन् हि युज्यते ॥ २८ ॥ कर्म यागगृहे शश्वद् विभूतेर्वाऽवनेर्विना । पञ्चत्रिंशत्करं क्षेत्रं स्वतुर्यांशेन विस्तृतम् ॥ २९ ॥ विभवाद्यभावे पक्षान्तरमाह—भिन्नाङ्गमित्यादिभिः । भिन्नाङ्गं विभिन्नपृथक्- शालाद्यङ्गसहितमेतदखिलं कर्म नयनोन्मीलनस्नपनार्चनहवनाधिवासादिकं समस्तं कार्यम्, विभूतेर्वाऽवनेर्विना विभवाभावात् प्रदेशाभावाद्वा, एकस्मिन् यागगृहे यथा युज्यते, स्नानशालां नयनोन्मीलनशालां च विना यागगेह एव यथा कर्तुं शक्यते, तथा सन्निवेशार्थं पञ्चत्रिंशकरं स्वतुर्यांशेन विस्तृतं क्षेत्रं यागमण्डपं कुर्यादिति शेषः । पार- मेश्वरव्याख्याने तु—"भिन्नाङ्गं वेदिकुण्डतोरणादिभिर्भिन्नलक्षणम् । एकस्मिन्नेकत्र शालास्थले यथा युज्यते तथा कुर्यादित्यर्थः" इति लिखितम् । तन्मन्दम् । तन्मध्ये चतुर्हस्तविस्तारायां स्थलसप्तकं = वेदिकासप्तकमापाद्यं कल्पनीयमित्यर्थः ।