सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
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शरीर और साँसों की बदबू भगाइए
शरीर और साँसों में बदबू आने के आंतरिक और बाह्य दोनों तरह के कारण हो सकते हैं। एक तो खान-पान की गड़बड़ी या किसी रोग की वजह से बदबू आ सकती है, दूसरे शरीर और दाँतों व मुँह की साफ़-सफ़ाई में की जा रही लापरवाही से भी बदबू की समस्या पैदा हो सकती है। बदबू की समस्या के यदि शारीरिक विकार, जैसे कि -दाँतों, मसूड़ों की ख़राबी, पेट की गड़बड़ी, टॉन्सिल की सूजन-पस, नाक व साइनस विकार, श्वासनली व फेफड़ों के विकार, मुँह के छाले, रक्त की कमी, मधुमेह, यकृत-गुर्दों की बीमारी, पीनस आदि कारण हों तो आहार-विहार ठीक रखते हुए आवश्यक उपचार करना चाहिए और यदि बाह्य कारण हों, तो साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखते हुए निम्न उपाय अपनाए जा सकते हैं-
- - - - - बेलपत्र, आँवला, हरड चूर्ण मिलाकर शरीर में लेप करके कुछ देर बाद धो दें। इससे शरीर और पसीने की दुर्गंध से छुटकारा मिलता है।
- - - - - सुपारी, जायफल, शीतलचीनी, कपूर, लौंग तथा लता कस्तूरी को पान में रखकर ज़रा सा चूना लगाकर चबाने से मुख शुद्धि होती है तथा दुर्गंध खत्म होती है। यह पान मसूड़े, दाँत तथा जीभ के लिए भी हितकारी है। ध्यान रखने योग्य इतना सा है कि रक्त-पित्त के रोगियों, बहुत दुर्बल, भूखे, प्यासे तथा मूर्च्छा से पीड़ित लोगों के लिये पान सेवन वर्जित है।
- - - - - साँस में बदबू आती हो तो ऐसे लोगों को नीम की दातून नियमित करनी चाहिए। इसके अलावा खाने के बाद मुँह अच्छी तरह साफ़ रखें।
- - - - - दो चम्मच शहद को 1 गिलास पानी में घोलकर गरारा करने से हफ़्ते भर में मुँह की दुर्गन्ध से आसानी से छुटकारा मिल जाता है। इसके साथ दाँत की सफ़ाई और खान-पान पर भी ध्यान दें तो उत्तम है।
- - - - - मुँह की दुर्गंध दूर करने के लिए दोनों समय भोजन के बाद अथवा यदा-कदा सौफ़ चबाना चाहिए। इससे हाज़मा भी दुरुस्त होता है।
- - - - - चंदन, मुक्ता, हरड, नागरमोथा, उशीर व लोध का लेप बनाकर शरीर में लगाने से दुर्गंध की समस्या से निजात मिलती है।
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कूठ, हरड और नागरपान समान मात्रा में पीसकर पानी के साथ लेप बनाकर शरीर में लगाने से दुर्गंध आनी बंद होती है।
— — — — — वच, कूठ, तज, छोटी इलायची, कमल की जड़, नागकेसर सभी सममात्रा में लेकर कपड़छन चूर्ण बनाएं और शहद में मिलाकर 250 मि. ग्रा. की गोलियाँ बना लें।
इन गोलियों को चूसने से मुँह की दुर्गंध दूर होकर सुगंध आने लगती है।
— — — — — लोध, अनार का छिलका, रीठे के पत्ते, धाय के फूल एक में मिलाकर पीसकर लेप करने से शरीर की दुर्गंध मिटती है
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स्वस्थ, सुन्दर त्वचा के लिए
र हो, नैन-नक्श कितने ही आकर्षक हों, पर अगर त्वचा रोगग्रस्त हो तो सारी संदरता पर ग्रहण सा लग जाता है। हमारे देश में त्वचा को स्वस्थ, संदर बनाए रखने के लिए उबटन आदि की प्राचीन परंपरा रही है। कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के बजाय प्राकृतिक और आयुर्वेदिक स्वदेशी उपायों को अपनाना ही ज्यादा बेहतर है। इस प्रकरण में त्वचा को स्निग्ध, संदर, मुलायम और स्वस्थ बनाये रखने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इन्हें आजमाकर लाभ उठाया जा सकता है—
— — — — — आँवले के चूर्ण का उबटन शरीर पर लगाने से त्वचा साफ, स्वच्छ तथा मुलायम होती है। — — — — —
स्नान से पूर्व एक गिलास पानी में दो चम्मच शहद तथा एक नींबू का रस घोलकर चेहरे और शरीर पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें; इसके बाद स्नान करें। इससे त्वचा की स्निग्धता और चमक बढ़ती है तथा चर्मरोग भी दूर होते हैं। — — — — —
जौ, बाजरा तथा चने का आटा, सब 1-1 चम्मच लेकर इसमें 1 चम्मच नींबू का रस तथा 1 चम्मच हल्दी चूर्ण मिलाएं। अब जैतून का तेल इतना लें कि सब गाढ़ा उबटन बन जाए।
इस उबटन को चेहरे पर लगाएं या शरीर में, इससे त्वचा साफ और संदर बनती है। पूरे शरीर पर लगाना हो तो सभी चीजों की मात्रा बढ़ा लेनी चाहिए। — — — — —
त्वचा को निरोगी रखने के लिए पानी में नींबू का रस मिलाकर स्नान करना चाहिए। — — — — —
पानी में नींबू का रस तथा शहद मिलाकर नियमित पीने से रक्त साफ होता है तथा त्वचा रोग नहीं होते।
हालाँकि साँवली त्वचा को एकदम से गोरा बनाने के लिए अभी तक ऐसा कोई नुस्खा नहीं बना है, परंतु जो लोग अपनी त्वचा का रंग साफ और कातिमान बनाना चाहते हैं, उन्हें कोई भी उपचार अपनाने से पहले अपना आहार-विहार ठीक करना चाहिए। किसी भी हालत में कब्ज़ न होने दें। स्त्रियाँ अनियमित मासिक धर्म और प्रदर आदि की बीमारियों से बचें।
इतने उपाय के बाद 25 ग्राम साफ तथा 25 ग्राम कच्चा नारियल दिन में एक बार सबेरे या भोजन के बाद खूब चबा-चबाकर नियमित 6 माह तक खाएं। इससे त्वचा में निखार आता है और त्वचा का रंग उजला होता है। गर्भवती महिलाएं पूरे गर्भकाल में यह प्रयोग करें तो संतान गोरी पैदा होती है।
इस आंतरिक प्रयोग के साथ अपने अनुकूल कोई बाह्य प्रयोग भी अपना सकते हैं। — — — — —
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नींबू और संतरे का रस मिलाकर शरीर और चेहरे पर लगाने से मैल साफ होता है तथा रंगत सुधरती है।
नींबू, आँवला और संतरे का रस दही में मिलाकर चेहरे तथा शरीर की त्वचा पर लगाकर मालिश करें और सूखने पर धो दें या स्नान कर लें। यह त्वचा को निखारने का बड़िया नुस्खा है। कुछ दिन नियमित प्रयोग करें।
स्नान से कुछ समय पहले लगभग 100 ग्राम मिट्टी किसी कटोरे में पानी डालकर भिगो दें। मिट्टी गल जाए तो मसलकर पानी में एकरस कर लेप सा बना लें तथा इसे शरीर में साबुन की तरह मलकर लगाएं। इसके बाद स्नान करके साफ तौलिए से शरीर पांछ लें। मिट्टी का यह प्रयोग त्वचा को स्वच्छ, मुलायम और चमकीला बनाता है। मिट्टी खेत में साफ जगह से एक फुट गहराई से खोदकर लेनी चाहिए।
रात को जब सोने जाएं तो हाथ-पैर-मुँह आदि को अच्छी तरह धोकर पांछ लें। इसके बाद ग्लिसरीन, गुलाबजल बराबर मात्रा में मिलाकर ऊपर से किंचित नींबू का रस डाल लें तथा हाथ, पैर और चेहरे पर मलें। इससे त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनी रहती है।
चुकंदर का रस, टमाटर का रस तथा पिसी हल्दी 4:4:1 के अनुपात में मिलाकर मलने से त्वचा का सौंदर्य कम होता है।
घमौरियों से परेशान हों तो बंदगोभी के रस में गुलाबजल मिलाकर लगाएं, राहत मिलेगी।
दूध की मलाई और टमाटर का रस समान मात्रा में मिलाकर लेप करके लगभग आधे घण्टे बाद धो दें। इससे चेहरे के काले दाग-धब्बे दूर होंगे।
गोमूत्र, बेसन, पिसी हल्दी तथा मुलतानी मिट्टी सभी समान मात्रा में लेकर गाढ़ा लेप बनाएं। इसे चेहरे सहित पूरे शरीर पर लगाएं तथा 15 मिनट बाद धोकर गुनगुने पानी से स्नान कर लें। यह प्रयोग निरंतर कुछ दिनों तक करते रहने से शरीर का रंग निखर उठेगा तथा त्वचा कान्तिपूर्ण हो जाएगी।
कच्चे या गुनगुने दूध में रूई का फाहा भिगोकर चेहरे तथा शरीर के विभिन्न अंगों की त्वचा पर हल्के-हल्के फेरिए। लगभग आधा घण्टा बाद ताजे या गुनगुने पानी से धो दें। दाग, धब्बे, झुर्रियाँ मिट जाएंगे तथा त्वचा स्निग्ध रहेगी।
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एक कटोरी में दूध लेकर इसमें चौथाई नींबू निचोड़ दें। जब दूध फट जाए तो इसे चेहरे के साथ-साथ शरीर के अन्य अंगों पर धीरे-धीरे मलें और कुछ देर बाद स्नान कर लें या धो दें। इससे त्वचा में मुलायमियत आएगी और त्वचा कांतिमय हो उठेगी।
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350 ग्राम पानी में 60 ग्राम इमली भिगोकर फूलने दें। तत्पश्चात् उसे मसलकर लेई सा बनाकर शरीर पर मलें और 15-20 मिनट बाद स्नान करें। कुछ दिनों में वर्ण में सुधार होने लगता है। इससे झाँई, दाग, धब्बे भी ठीक होते हैं। गर्मियों में एक-दो दिन नागा करके तीन-चार सप्ताह तक यह प्रयोग करके देखें।
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यदि बरसात और गर्मी के दिनों में घमौरियों की समस्या से ग्रस्त हों तो बाह्य उपचार के साथ एक गिलास जौ के पानी (बाली वाटर) में एक नींबू निचोड़कर पिएं। यदि दिन में दो बार इसे कुछ दिन पिएं तो घमौरियों से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा।
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जौ हल्का सा भूनकर पीस लें तथा इसमें थोड़ी हल्दी व कुछ बूँदें सरसों का तेल मिलाकर उबटन की भाँति चेहरे तथा शरीर पर लगाएं। त्वचा में धीरे-धीरे निखार आएगा।
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आँवला व सेब का मुरब्बा दोनों का नियमित रूप से प्रातः सेवन करते रहने से त्वचा की खुशकी दूर होकर कांतिमान बनती है।
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नागकेसर, कुमुद, कमल के फूल तथा तगर और तालीसपत्र एक में पीसकर लेप करने से त्वचा कांतिमयता आती है।
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तगर की जड़, कूठ और तालीसपत्र को पानी में लेप बनाकर लगाने से त्वचा में निखार आता है।
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ताजे पानी में तुलसी की पतियाँ तथा गुलाब के फूल की पंखुडियाँ डालकर कुछ देर पड़ा रहने दें। पश्चात् इस पानी से स्नान करें, शरीर में ताज़गी आएगी।
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सर्दी के दिनों में जैतून के तेल में थोड़ा सा नमक मिलाकर शरीर में मालिश करने से त्वचा मुलायम बनती है और यौवन में निखार आता है।
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गाय का गोबर, पीली सरसों, हल्दी, नागरमोथा, कपूर, चिरौंजी, लाल चंदन, छड़ीला, नारंगी का सूखा छिलका-सभी को महीन पीसकर चमेली के तेल में उबटन बनाएं तथा नित्य प्रति चेहरे सहित पूरे शरीर पर मलें। इससे दाग-धब्बे समाप्त होकर त्वचा सुंदर बन जाएगी।
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नारियल के पानी में मलाई मिलाकर त्वचा पर मलने से दाग-धब्बे मिटकर त्वचा की मुलायमियत बढ़ती है।
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चंदन पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा की चमक बढ़ती है।
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स्त्रियों की समस्या अविकसित, बेडौल वक्ष
स्त्री शरीर के लिए वक्ष-सौन्दर्य का विशेष महत्व है। सौन्दर्य की भी अपेक्षा माँ बनने और शिशु के स्वास्थ्य की दृष्टि से नारी शरीर में समुचित विकसित वक्ष का कहीं ज्यादा महत्व है। यूँ यौवनावस्था में कदम रखने के साथ ही स्तनां का भी समुचित विकास शुरू हो जाता है, परंतु यदि किसी कारण से स्तन अविकसित रह जाएँ या अति विकसित होकर बेडौल हो जाएं तो चिन्ता की बात हो जाती है।
स्तनां के अविकसित रह जाने के पीछे अत्यधिक दुबलापन, मासिक विकार, गर्भाशय की दिक्कतें, अधिक चिंता, तनाव जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। इसी तरह शरीर पर मोटापा चढ़ने, आलसी जीवन बिताने, देर तक सोने की आदत, गरिष्ठ व ज्यादा भोजन करने अथवा समय से पूर्व अत्यधिक काम-क्रीड़ाओं में लिप्त होने, कामुक चिन्तन करने जैसे कारणों से भी स्तन अविकसित, बेडौल व ढीले हो सकते हैं। फिलहाल यहाँ नवयुवतियों की इस गंभीर समस्या का समाधान करने के लिए कुछ स्वदेशी उपाय सुझाए जा रहे हैं, जिन्हें आजमाकर अविकसित या बेडौल स्तनां को स्वस्थ, सुडौल बनाया जा सकता है। इतना अवश्य ध्यान रखें कि किसी भी बाह्य चिकित्सा को अपनाते हुए शरीर के आन्तरिक विकार अवश्य दूर करें।
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कोई भी आंतरिक या बाह्य उपचार करते हुए स्तनां के समुचित विकास के लिए योगासन व व्यायाम अवश्य अपनाएं। स्तन सौन्दर्य की दृष्टि से सूर्य नमस्कार, धनुरासन, चक्रासन, भुजंगासन, शलभासन, उष्ट्रासन, पर्वतासन, हस्त पाशर्वासन, गोमुखासन आदि विशेष लाभप्रद हैं। इनकी विधियाँ किसी योगासन विशेषज्ञ से सीखी जा सकती हैं।
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स्तन कम विकसित हों तो मालिश करने से काफी लाभ होता है। तिल, जैतून या सरसों के तेल से स्तनां की नियमित मालिश करनी चाहिए। इसी के साथ ठण्डे तथा गर्म पानी की गीली पट्टी से बारी-बारी करके सेंकने से स्तन आसानी से पुष्ट होने लगते हैं।
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घृतकुमारी की जड़, गोरखमुण्डी, इन्द्रायण की जड़, अरण्डी के पत्ते, छोटी कटेरी 50-50 ग्राम तथा कंले का पंचांग, सहिजन के पत्ते, पीपल के पेड़ की अन्तरछाल, अनार की जड़ व छिलका, खम्भारी की अन्तरछाल, कनेर व कूठ की जड़ 10-10 ग्राम लेकर मोटा-मोटा कूटकर 5 लीटर पानी में उबालकर क्वाथ करें। जब मात्र सवा लीटर पानी बच रहे तो उतारकर छान लें तथा इसमें सरसों व तिल का तेल 250-250 मि.ली. डालकर पुनः उबालें। सिर्फ तेल रह जाए तो उतारकर ठण्डा करके इसमें 15 ग्राम शुद्ध कपूर मिलाकर रख लें।
इस तेल को रात में सोते समय तथा सबेरे नहाने से एकाध घण्टे पहले स्तनां पर हल्के-हल्के मालिश करें। 2-3 माह में स्तन पुष्ट व सुडौल होने लगेंगे।
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गम्भारी की छाल 800 ग्राम तथा गम्भारी की छाल की लुगदी 200 ग्राम को सवा लीटर पानी में इतना उबालें कि चौथाई अंश शेष रह जाए। अब इसमें 800 मि.ली. तिल का तेल डालकर धीमी आँच पर पकाएं। जब सिर्फ तेल बच रहे तो उतार लें। इसी प्रकार से तीन बार गम्भारी छाल व कल्क(लुगदी) के साथ इस तेल को पकाएं। तीसरी बार में पकाने के बाद गर्म तेल में 15 ग्राम मोम डालकर उतारकर ठण्डा होने दें। कुछ ठण्डा होने के बाद तेल छानकर सुरक्षित रख लें।
इस तेल की प्रयोगविधि यह है कि इसमें कपड़े की पट्टी भिगोकर निचोड़ लें तथा स्तनों के ऊपर रखकर पान के पत्ते से ढँककर बाँध दें। प्रतिदिन सोते समय रात में यह प्रयोग करें। इससे धीरे-धीरे स्तन पुष्ट, सुडौल होने लगेंगे। यह 'श्रीपर्णी तेल' के नाम से बाज़ार में भी बिकता है।
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'चेहरे का सौन्दर्य' प्रकरण में वर्णित ताँबे के बरतन में नीबू का रस, तुलसी और कसांदी से बनने वाला नुस्खा प्रयोग करने से स्तन उन्नत, पुष्ट और सुडौल होते हैं।
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कुछ नुस्खे हाथ-पैरों की देखभाल के लिए
एडियों फटती हों तो अरंडी का तेल, गुलाबजल तथा नींबू का रस समान मात्रा में मिलाकर एडियों पर दिन में दो-तीन बार मलें।
— — — — — वाला मोम लेकर गर्म करें। पिघल जाए तो इसमें इसका आधा सरसों का तेल मिलाएं। अब किसी बरतन में पानी भरकर उसी में यह मिश्रण छान दें। जब यह पानी में नीचे बैठ जाए तो पानी फेंककर इसे किसी शीशी में रख लें। सोते समय रात में इस नुस्खे को एडियों में लगाने से एक सप्ताह में बिवाइयों में आराम मिल जाता है।
— — — — — रात को सोने से पहले नारियल का तेल गुनगुना करके बिवाइयों में लगाएं तथा मोजे पहनकर सो जाएं। सबेरे गर्म पानी में पैरों को 15 मिनट तक डुबोएं तथा किसी ब्रश से हल्के-हल्के रगड़कर एडियाँ साफ़ करें। इसके उपरांत भीगे पैरों को कपड़े से सुखाकर कोई तैलीय चीज़ लगा लें।
— — — — — एक चम्मच देशी मोम तथा एक चम्मच देशी घी गर्म करें। दोनों एकसार हो जाएं तो इस मिश्रण की गर्म-गर्म बूँदें बिवाइयों में टपकाएं। यह प्रयोग प्रतिदिन तब तक करें जब तक बिवाइयों से छुटकारा न मिल जाए।
— — — — — जैतून का तेल सहने योग्य गर्म करके नाखूनों को कुछ देर तक उसमें डुबाए रहिए। ऐसा कुछ दिनों तक करने से आपके नाखून मज़बूत होंगे।
— — — — — 100 ग्राम सरसों के तेल में 25 ग्राम मोम डालकर गर्म करें तथा एक उबाल आने के बाद उतारकर मुँह के पात्र में रख लें।
इसे वैसलीन की तरह इस्तेमाल करें, त्वचा नहीं फटेगी। यदि फट रही हो तो ठीक हो जाएगी।
— — — — — पैरों में गट्टे (गोखरू) हों तो पीड़ित स्थान पर मेंहदी का गाढ़ा लेप लगाकर पट्टी बाँध दें। दो-तीन घण्टे बाद इसे खोलकर धो दें। कुछ दिनों के अन्तराल पर कुछ ही बार यह प्रयोग करने से गट्टे समाप्त हो जाएंगे।
— — — — — सर्दी के मौसम में या पानी में काम करने से हाथ-पैरों की त्वचा फटती हो तो ग्लिसरीन में नींबू का रस मिलाकर मलना चाहिए।
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नींबू के छिलके नाखूनों पर मलने से नाखून चमकदार होते हैं।
हथेलियों, कोहनी और एड़ियों का कालापन मिटाने और मैल हटाने के लिए नींबू के छिलकों को प्रभावित हिस्सों पर घिसकर गुनगुने पानी से धोना चाहिए।
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सौन्दर्य में निखार लाए मालिश
तेल मालिश का आनन्द जानना हो तो उगते सूरज की लाली में तेल मालिश कराते किसी पहलवान से मिलिए। मालिश से शरीर में जो उमंग-स्फूर्ति, कांतिमयता पैदा होती है, उसका एहसास कुछ दिन नियमपूर्वक मालिश करने के बाद ही जाना जा सकता है। मालिश इतना प्राकृतिक है कि पशु-पक्षी भी अपने-अपने तरीके से इसका लाभ लेते ही हैं। गधों को लोट-लोटकर मालिश का आनंद उठाते तो आपने देखा ही होगा। पशु बच्चे जनने के बाद चाट-चाटकर एक तरह से अपने बच्चों की मालिश ही करते हैं। घोड़े को खराश देने की कितनी ज़रूरत पड़ती है, यह उसका मालिक ही जानता है। पक्षियों भी अपने बच्चों को चोंच और पंखों से सहला-सहलाकर उनमें उमंग भरती रहती है।
मतलब यह कि मालिश बड़े काम की चीज़ है। दुनिया के विभिन्न मानव समाजों में मालिश का इतिहास कोई नया नहीं है। अगर यूनान व रोम की महिलाएं अपना रूप यौवन कायम रखने के लिए मालिश का सहारा लेती थीं, तो मेडागास्कर-अफ्रीका की जंगली जातियों तक में शरीर में खून बढ़ाने के लिए हजार साल पहले भी मालिश का प्रचलन था। अफ्रीका में विवाह से पूर्व वर-वधू दोनों की नित्य मालिश की प्रथा रही है। हिंदुस्तान में तो यह परंपरा कहीं 'हल्दी' और से आज तक बनी ही हुई है। इटली, ईरान, तुर्की व अरब देशों की यात्रा करने वालों को मालूम ही होगा कि वहाँ के हामामखानों में आज भी मालिश को कितनी अहमियत दी जाती है। पश्चिमी देशों में तो खैर मसाज सेण्टरों की भरमार ही होने लगी है। फ्रांस मालिश विद्या को प्रचारित करने में एक तरह से अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वहाँ इसे बाकायदा चिकित्सा व्यवसाय और कला की दृष्टि से अपनाया जा रहा है।
हमारे लिए गर्व की बात यह है कि मालिश के चिकित्सकीय लाभों का ज्ञान दुनिया ने प्राचीन भारत से ही प्राप्त किया। हमारे आयुर्वेदिक ग्रंथों में मालिश की जितनी वैज्ञानिक जानकारी और विधियाँ वर्णित हैं, वह अपने आपमें आश्चर्यजनक ही है। यूँ मालिश की विधियाँ कई तरह की हैं, पर यहाँ हम सौन्दर्य की दृष्टि से सिर्फ़ तेल मालिश की चर्चा करेंगे। चरक संहिता के पाँचवें अध्याय के निम्न श्लोक तेल मालिश की महत्ता अच्छी तरह व्यक्त करते हैं-
न चाभिधाताभिहतं गात्रमभ्यंग सेविनः।
विकारं भजतेऽत्यर्थं बलकर्मणि वा क्वचित्॥
अर्थात्-
को
संपन्न करने में समर्थ होता है तथा मालिश से त्वचा विकार रहित रहती है। यानि कि मालिश से शक्ति और सामर्थ्य में वृद्धि होती है।
पचित्तांगश्च बलवान प्रियदर्शिनः।
भवत्यभ्यंग नित्यत्वान्नरोऽल्प जर एव च॥
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‘तेल मर्दन से त्वचा चिकनी, स्पर्श में कोमल, बलवान और सुंदर हो जाती है। साथ ही शरीर भी बलवान और प्रियदर्शी होता है तथा बुढ़ापे के लक्षण कम दिखाई देते हैं।’
संवाहनश्रम हरं वृष्यं निद्रासुखप्रदम्।
मांसासूक्त्यक् प्रसन्नत्वकुर्यादवात कफापहम् ।।
इसका अर्थ यह है कि ‘शरीर की मालिश श्रमनाशक धातुओं को पुष्ट करने वाली, अच्छी नींद लाने वाली, मांस, त्वचा व रक्त को निर्मल करने वाली तथा वात, कफ का शमन करने वाली होती है।’
इतनी चर्चा के बाद उम्मीद है कि आप की समझ में अच्छी तरह आ गया होगा कि स्वास्थ्य और सौन्दर्य बनाए रखने के लिए तेल मालिश कितना जरूरी है। संक्षेप में तेल मालिश का मुख्य लाभ यह है कि त्वचा कांतिमान, झुर्रिरहित, निरोग और मजबूत रहती है। रक्त संचार ठीक रहता है। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है। विभिन्न अंगों को बल मिलता है। शरीर का लचीलापन कायम रहता है तथा बुढ़ापा देर से आता है। यह भी विशेष बात है कि तेल मालिश से दुबले लोगों का शरीर मांसल और पुष्ट होता है तथा मोटे लोगों का मोटापा घटता है। इसके अलावा मालिश से शरीर दर्द, सिरदर्द, हाथ-पैरों का कंपन, वात-व्याधि, जोड़ों का दर्द, अनिद्रा आदि में भी आराम मिलता है। इतना जानने के बाद, आजकल के कुछ अंग्रेजीदा लोग और एलोपैथी के डॉक्टर अगर तेल मालिश को फिजूल की चीज़ ठहराएं तो उनकी बातों पर खास ध्यान न देते हुए आप शौक से इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कीजिए और अपने पोर-पोर में शक्ति, कांति और स्फूर्ति का एहसास करिए।
तेल मालिश के लिए जरूरी बातें
- 1. यूँ तेल मालिश आप पूरे साल कर सकते हैं फिर भी बसंत और जाड़े का 3-4 माह का समय इसके लिए विशेष लाभकारी है।
- 2. उगते सूरज की लालिमा में प्रातःकाल तेल मालिश करना सबसे अच्छा है। वैसे दिन में कभी भी खाली पेट तेल मालिश कर सकते हैं।
- 3. तेल मालिश के समय शरीर पर कम से कम कपड़े रहने चाहिए; जैसे कि निक्कर, जांधिया, लंगोट आदि।
- 4. सामान्यतः मालिश खुले हवादार स्थान पर करनी चाहिए। शरीर निर्बल हो और तेज़ असह्य हवा चल रही हो तो बंद कमरे में भी मालिश कर सकते हैं।
- 5. घर में यदि पति-पत्नी दोनों मौजूद हों तो परस्पर एक-दूसरे की मालिश कर सकते हैं। यह सुविधाजनक रहेगा, अन्यथा अपने शरीर की खुद मालिश करें।
- 6. जमीन पर चटाई आदि बिछाकर बैठकर मालिश करें। जिस अंग की मालिश करें ध्यान उसी अंग पर एकाग्र रखें और मन में उमंग के भाव बनाएं।
- 7. तेल मालिश नीचे के अंगों से शुरू करके ऊपर की ओर करनी चाहिए। अर्थात् पाँव के तलुओं से मालिश की शुरूआत करके क्रमशः पंजे, पिंडिलियों, घुटना, जाँघ, नितंब, कमर, पेट, सीना, पीठ, गर्दन, चेहरा और सिर तक पहुँचें। इसे यूँ कहें कि पहले दोनों पैरों की बारी-बारी से
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मालिश करने के बाद, कमर, पेट व सीना, फिर दोनों हाथ, गर्दन और चेहरे व सिर की मालिश करें।
8. मालिश की दिशा हृदय की ओर होनी चाहिए। हाथ-पैर की मालिश पंजों से शुरू करें और कंधों व नितंब तक बढ़ें। पेट-कमर पर भी नीचे से ऊपर की ओर हृदय की दिशा में मालिश करें। पेट और सीने की मालिश गोलाकार हाथ घुमाते हुए भी करें। पीठ की मालिश रीढ़ स्थान से शुरू करके किंचित ऊपर दिशा में बाहर की ओर करें। गर्दन की मालिश अंदर से बाहर की ओर तथा चेहरे की मालिश गालों से कनपटी की ओर करें। सामान्य समझ इतनी रखें कि हृदय से निकली धमनियों की गति की विपरीत दिशा में मालिश विशेष लाभप्रद है।
9. अनावश्यक दबाव देने के बजाय हल्का दबाव देते हुए आहिस्ता-आहिस्ता मालिश करनी चाहिए। कम-से-कम 15-20 मिनट और ज्यादा-से-ज्यादा 45 मिनट तक मालिश करें।
10. बच्चों की मालिश प्रातःकालीन सूर्य की रोशनी जहाँ पड़ती हो वहाँ करनी चाहिए। इससे उनके शरीर को विटामिन 'डी' आसानी से प्राप्त हो सकेगी। बच्चों की मालिश के लिए नारियल, सरसों, जैतून के तेल उत्तरोत्तर बेहतर हैं। गाय के घी या मक्खन से मालिश करें तो अति उत्तम।
11. स्त्रियों की तेल मालिश के लिए ध्यान देने वाली विशेष बात यह है कि उन्हें अपने वक्षस्थल की मालिश में सावधानी बरतनी चाहिए। स्तनों पर सावधानी पूर्वक चारों ओर से हल्के हाथों स्तन के अग्रभाग की ओर मालिश करें। मासिक स्त्राव या गर्भकाल की स्थिति हो तो पेट एवं गर्भाशय के हिस्से को छोड़कर शेष शरीर की मालिश करनी चाहिए।
मालिश के लिए उपयोगी तेल
स्थानीय वातावरण और शरीर की प्रकृति को देखते हुए अपने अनुकूल तेल का चुनाव करना विशेष लाभप्रद रहता है। सामान्यतः सर्दी के मौसम में सरसों का तेल, बरसात के दिनों में तिल का तेल तथा गर्मी में नारियल तेल की मालिश विशेष हितकर है। शारीरिक प्रकृति के हिसाब से तेल का चयन करना हो तो कफ प्रकृति वालों को सरसों का तेल, वात प्रकृति वालों को तिल का तेल तथा पित्त प्रकृति वालों को नारियल का तेल चुनना चाहिए।
इन कुछ मुख्य तेलों के अलावा जैतून का तेल किसी भी मौसम में उपयोग में लिया जा सकता है। जैतून के तेल की मालिश से त्वचा की रंगत सुधरती है और उसमें मुलायमियत आती है। यह तेल स्त्रियों के वक्ष को विकसित करने की दृष्टि से भी विशेष लाभदायक है। बादाम का तेल भी काफी फायदेमंद है। यह पलकों और भौंहों को मीम का तेल, महुए का तेल, अरण्डी का तेल, चंदन का तेल, चमेली का तेल आदि भी उपयोग में लाए जाते हैं। आवश्यकतानुसार इन तेलों में औषधियों का मिश्रण करके या दो-तीन तेलों को आपस में मिलाकर मालिश किया जाता है। जैसे कि नारियल, अरण्डी और तिल का तेल समान भाग में मिलाकर सिर में मालिश करने से बालों की कई समस्याएँ दूर होती हैं। पुराना चूना तिल के तेल में मिलाकर लगाने से दाद के कष्ट में राहत मिलती है। पार्यरिया रोग या दाँतों के तमाम कष्टों में सरसों के तेल में चुटकी भर हल्दी और बारीक नमक मिलाकर दाँतों व मसूड़ों की मालिश करने से काफी लाभ मिलता है। शरीर में ताजगी लाने और त्वचा की रूक्षता दूर करने के लिए स्नान से आधा घण्टा पहले सरसों के तेल में समान भाग दही मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
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मुहासे निकलते हों तो सोते समय नारियल तेल में नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर चेहरे की मालिश करना हितकर रहता है। धूप में त्वचा झुलस जाए तो नारियल के तेल में थोड़ा नमक मिलाकर मालिश करें और 15-20 मिनट बाद धोएं। 5 तोला नारियल तेल में 2 तोला नमक तथा 2 तोला नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से सारे शरीर की त्वचा की कोमलता और सुंदरता बढ़ती है।
इसी तरह अरण्डी के तेल में थोड़ा सा नमक और कपूर मिलाकर दिन में दो बार मसूहों की मालिश करनी चाहिए। अरण्डी के तेल में बराबर मात्रा में शहद मिलाकर चेहरे पर मालिश करने से त्वचा कोमल बनती है और झुर्रियाँ मिटती हैं। चेहरे की त्वचा का सूखापन जैतून के तेल में मलाई मिलाकर मालिश करने से ठीक हो जाता है। धूप में झुलसकर त्वचा साँवली पड़ गई हो तो जैतून के तेल में बराबर मात्रा में सिरका मिलाकर मालिश करें। मुहासों में जैतून के तेल में समान भाग नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से लाभ मिलता है। होंठों का कालापन कम करने के लिए बादाम के तेल में नींबू का रस मिलाकर नियमित मालिश करनी चाहिए। खाज, खुजली में चंदन के तेल में नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर मालिश करना हितकर है। कोढ़ की बीमारी में नीम के तेल में चालमोगरा का तेल मिलाकर मालिश करने से विशेष लाभ मिलता है। पित्ती की तकलीफ़ में नीम के तेल में समान भाग सरसों का तेल मिलाकर मालिश करने से आराम मिलता है। इस तरह से विभिन्न स्थितियों में विभिन्न औषधि द्रव्यों व तेलों के मिश्रण से मालिश करके लाभ उठाया जा सकता है।
तेल मालिश से कब बचें
तेल मालिश के इतने ढेर सारे लाभों के बावजूद कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी हैं जबकि इससे बचने की भी ज़रूरत पड़ सकती है। सामान्यतः ऐसी परिस्थितियाँ कम ही होती हैं, फिर भी इन्हें जान लेना चाहिए और कुछ खास तरह के रोगियों को तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार रक्तस्राव की स्थिति, बुखार, विरेचन के बाद, वमन के बाद, विषग्रस्तता, मूच्छा की उग्रावस्था, उग्र सूजन, दाह-जलन, अत्यन्त कमज़ोरी तथा पेट के कुछ गंभीर रोगों की अवस्था में तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। शेष अनुकूल परिस्थितियों में नियमित तेल मालिश करिए और ताउम्र ताज़गी के अहसास से सराबोर रहिए।
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सौन्दर्यरक्षक आभ्यंतर प्रयोग
सौन्दर्यरक्षक पाक
जो स्त्रियाँ किसी बीमारी के बाद कमजोरी की शिकार हो गई हों और सौन्दर्य नष्ट हो गया हो, उन्हें यह पाक निम्न अनुसार बनाकर सेवन करने से लाभ मिल जाता है—
सोंठ—डेढ़ तोला, काला जीरा—1 तोला, विधारा—डेढ़ तोला, चव्य—1 तोला, अकरकरा— डेढ़ तोला, तेजपात—1 तोला, धनिया—डेढ़ तोला, सफेद जीरा—डेढ़ तोला, बरियारी की जड़—2 तोला, इलायची—2 तोला, चित्रक—2 तोला, पीपल—1 तोला, जावित्री—1 तोला, त्रिफला—2 तोला, नागकेसर—डेढ़ तोला, गोदुग्ध 5—सेर, चीनी—ढाई सेर तथा गाय का घी तीन—पाव।
निर्माणविधि— पहले दूध को इतना पकाइए कि आधा रह जाए। इसके बाद इसमें सोंठ पीसकर मिला दें। मावा बन जाने पर सभी औषधियों को कपडछन चूर्ण करके इसमें मिला दें तथा एक पाव घी में सेंकें, बाद में शेष घी मिला दें। औषधियाँ अच्छी तरह एकसार हो जाएं तो चीनी की चाशनी बनाकर इसमें डालें तथा पिशता, बादाम, नारियल, चिरोंजी आदि मेवे मिलाकर जमा दें।
इसे 1 तोला से लेकर 5 तोला तक पाचनशक्ति के अनुसार सबेरे—शाम दूध से सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से चुस्ती—फुर्ती, प्रसन्नता तथा पूरे शरीर में सुंदरता का संचार होता है। यह योग भूख की कमी, क्षय, पांडु, कमरदर्द, नेत्रों की कमजोरी, प्रदर आदि अन्यान्य रोगों को भी ठीक करने में समर्थ है। इसे पुरुष भी सेवन कर सकते हैं।
— — — — — एक पाव दूध में असली केसर की चार—पाँच पंखुडियाँ तथा एक छोटी इलाइची डालकर उबालें तथा नियमित सर्दियों में दो—तीन माह पिएं। इससे त्वचा की रंगत निखरती है।
— — — — — आँवले का मुरब्बा 25 ग्राम नित्य तीन—चार माह खाने से वर्ण सुधरता है।
— — — — — गाजर व चुकन्दर का रस एक गिलास एक माह तक पीने से रक्त शुद्ध होता है तथा वर्ण निखरता है।
— — — — — अंगूर, किशमिश व मुनकके के सेवन से रंग साफ होता है।
— — — — — टमाटर, मूली, गाजर, चुकन्दर, प्याज, पतागोभी आदि को सलाद के रूप में सेवन करने से त्वचा स्वस्थ बनती है।
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त्रिफला चूर्ण तीन ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ सोते समय सेवन करते रहने से पेट साफ रहता है और त्वचा रोगी नहीं होते।
1 तोला मुनक्का साफ करके 5 तोला पानी में शाम को भिगो दें। सबेरे बीज अलग करके मुनक्का खा लें और बचे पानी में मिश्री मिलाकर या वैसे ही पी लें। एक माह में मुहोंसे निकलने कम हो जाएंगे।
यदि आँखें अंदर धँस रही हों और उनके चारों ओर कालापन हो तो 5-6 बादाम की गिरियों रात भर पानी में भिगोकर सबेरे पीसकर एक पाव गर्म मिश्री युक्त दूध के साथ 21 दिनों तक पिएं। इस दौरान रोज सायंकाल देशी गुलाब का गुलकंद भी एक छोटी चम्मच भर सेवन करते रहें। इसके अलावा शहद और बादाम का तेल समान मात्रा में मिलाकर आँखों के चारों ओर हल्के-हल्के मालिश करें तथा आधे घण्टे बाद धो दें।
रतिबल्लभ पाक
आधा किलो-बबूल का गोंद, 100 ग्राम-सोंठ, 50-50 ग्राम-पीपलामूल एवं पीपल, 25-25 ग्राम-शुद्ध शिलाजीत, मोचरस, जायफल, जावित्री, लौंग, 10-10 ग्राम-दालचीनी, नागकेंसर, तेजपात, काली मिर्च, प्रवाल भस्म, इलायची, अन्नक भस्म, लौहभस्म, बंगभस्म तथा 5 ग्राम-केंसर, 250 ग्राम-घी, 2 किलो- शक्कर व जितना ज़रूरी समझें, मेवे ले लें।
गोंद को बारीक कूटकर कढ़ाई में घी गर्म करके तल लें। पीपल, पीपलामूल व सोंठ को कपड़छन चूर्ण करें। केंसर व भस्मों को छोड़कर शेष लौंग आदि द्रव्यों को मिलाकर एक साथ कपड़छन चूर्ण बनाएं। खोपरा, किशमिश, बादाम आदि मेवे भी बारीक काटकर रखें। केंसर को पत्थर के खरल में गुलाबजल के साथ घोंट लें। अब चारों भस्मां को भी साफ खरल में घुटाई करके एक में मिला लें।
यह सब तैयार हो जाने के बाद शक्कर की एक तार की चाशनी बनाएं तथा सबसे पहले तले गोंद, सोंठ, पीपल व पीपलामूल का चूर्ण इसमें मिलाएं तथा आँच धीमी रखें। अब इसमें भस्में डालकर कड़छी से चलाते जाएं। जब चाशनी जमने लायक बन जाए तो इसे उतार लें तथा किंचित गर्म रहने पर लौंग आदि द्रव्यों का चूर्ण डालकर अच्छी तरह मिलाएं। केंसर भी इसमें मिला दें। अब किसी थाली आदि में घी चुपड़कर इसे जमा दें और कटे हुए मेवे ऊपर से बुरक दें। बाद में बर्फीनुमा काटकर काँच के बरतन में रख लें।
इस पाक को पाचनशक्ति के अनुसार 2 से 4 तोला तक सबेरे मीठे कुनकुने दूध के साथ चबा-चबाकर सेवन करना चाहिए।
यह योग स्त्रियों व पुरुषों दोनों के लिए ही अत्यन्त गुणकारी है। महिलाओं का प्रदर रोग, प्रसूति रोग व शरीर की दुर्बलता इससे दूर होती है। प्रसव के उपरांत आई कमजोरी को दूर करके यह स्त्री के शरीर को सबल बनाता है और उसके स्वास्थ्य व सौन्दर्य की वृद्धि करता है। विवाहित
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पुरुषों के लिए यह बल-वीर्यवर्धक, यौन शक्तिदायक व सौन्दर्यरक्षक है। शीतकाल में इस योग का सेवन करना चाहिए।
नागकेसर, कमल व कुमुद का चूर्ण शहद व घी में मिलाकर खाने से त्वचा की रंगत में निखार आता है। घी तथा इसकी आधी मात्रा में शहद सोयाचूर्ण में मिलाकर सेवन करते रहने से सौंदर्य में निखार लाता है।
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स्वास्थ्य और सौन्दर्य का शत्रु मोटापा
मोटापे का अर्थ है— शरीर में चर्बी यानी वसा का ज्यादा मात्रा में इकट्ठा हो जाना। चर्बी भी अजब चीज है। अगर संतुलन में हो तो शरीर को सुडौल बनाए रखती है, कम हो तो आदमी बेडौल दिखता है और ज्यादा हो जाए तो बेडौल ही क्या पूरा शरीर डॉवॉडोल हो जाता है। अर्थात् एक सीमा तक चर्बी जरूरी है, इसके बाद गैरजरूरी। जिनके शरीर में चर्बी संतुलित मात्रा में है, उनके लिए तो चिंता की कोई बात नहीं है पर जिनके शरीर में चर्बी की कमी है, वे चर्बी बढ़ाने के लिए और जिनके शरीर में चर्बी ज्यादा है, वे इसे घटाने के लिए परेशान दिखते हैं। इस अध्याय में हम चर्बी बढ़ने अर्थात् मोटापे की समस्या से निजात पाने की ही चर्चा करेंगे।
मोटापे की समस्या के जैविक कारणों पर तमाम वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध हैं, पर यहाँ उनकी गंभीर चर्चा बहुत जरूरी नहीं दिखती क्योंकि यह पुस्तक जनसामान्य को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है। अलबत्ता, मोटापे की समस्या के कुछ मोटे-मोटे पहलू जान लेना तो उपयोगी है ही।
दरअसल मोटापे की समस्या मुख्य रूप से दो तरह से पैदा होती है। कुछ लोगों में मोटापा वंशगत प्रभाव से आता है या शरीर की अन्दरूनी मशीनरी ऐसी होती है कि वे जो कुछ खाते हैं उसका ज्यादा हिस्सा चर्बी में तब्दील हो जाता है। यानी एक वर्ग ऐसा है जिनके शरीर में चर्बी जमा करने की खास प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा चौकन्ना रहने की जरूरत होती है। मोटापे का दूसरा और सबसे व्यापक कारण है लापरवाही भरी दिनचर्या। जरूरत से ज्यादा और सारे दिन कुछ न कुछ खाते रहने, आलस्य भरा और श्रमहीन जीवन बिताने, का ज्यादा सेवन करने जैसी आहार-विहार
की वजह से ज्यादातर लोग मोटापे के शिकार बनते हैं। एक सवाल यह है कि आखिर किस स्थिति को हम मोटापा कहेंगे ? तो इसका सामान्य सा उत्तर यह है कि जब तक शरीर की चुस्ती-फुर्ती कायम है और मन में उत्साह-उमंग बना हुआ है, तब तक मोटापे या दुबलेपन जैसी कोई समस्या नहीं है। यूँ सामान्यतः जितने इंच शरीर की लंबाई हो लगभग उतने ही किलो शरीर का वजन हो तो इसे संतुलित स्थिति मानी जाती है। इसमें उन्नीस-बीस के फर्क से कोई खास अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जब फर्क ज्यादा बढ़ने लगे तो समझिए कि सावधान होने का समय आ गया है। जिन बुजुर्गों का वजन, 30-35 वर्ष की उनकी स्वस्थ अवस्था जितना आज भी बना हुआ है, वे अपने को अच्छी स्थिति में मान सकते हैं।
मोटापे का आक्रमण सबसे पहले अक्सर पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों पर होता है। इसके बाद गर्दन, चेहरा, हाथ-पैर व शरीर के शेष अंग इसकी गिरफ्त में आते हैं। ध्यान रखने वाली बात है कि शुरूआती दौर में, या जब तक मोटापा पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों तक ही सीमित है तब तक इसे दूर करना ज्यादा आसान है। लेकिन जब पूरे शरीर पर मोटापा अपना मजबूत कब्जा जमा लेता है तो इसे हटा पाना तकलीफदेह और मशक्कत भरा काम हो जाता है।
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खैर, स्थिति जो भी हो, अगर मोटापे से ग्रस्त लोग अपना स्वास्थ्य और सौन्दर्य वापस लाना चाहते हैं तो उन्हें अविलम्ब संकल्प की मजबूती के साथ कमर कसकर कुछ उपायों पर अमल करने की तैयारी कर ही लेनी चाहिए, अन्यथा भविष्य की देहरी पर मधुमेह, हाई ब्लडप्रेशर, कब्ज, गैस, हृदय रोग, दमा, गठिया आदि अन्यान्य रोग उनका स्वागत करने को तैयार मिलेंगे, यह तय जान लें।
वैसे मोटापे से ग्रस्त लोग इससे निजात पाने के लिए जाने क्या-क्या करते हैं और कहाँ-कहाँ भटकते हैं, पर ज्यादातर ऐसा ही होता है कि मोटापा अन्तिम दम तक साथ नहीं छोड़ता। यह भी गौरतलब है कि मोटापे के इलाज के चक्कर में अक्सर लोग ज्यादा खतरनाक बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। ऐसे में सीधी सी बात यह है कि मोटापा दूर करने का कार्यक्रम बहुत सोच-समझकर बनाएं और मुस्तैदी से उसका पालन करें। दवाओं का सहारा लेने का इरादा हो तो इतना याद रखें कि एलोपैथी में मोटापा घटाने की अब तक जो भी दवाएं हैं, वे निरापद क़तई नहीं हैं। इन दवाओं से आप ज्यादा बड़ी मुसीबत में फँस सकते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। आयुर्वेद के तमाम नुस्खे निरापद और कारगर हो सकते हैं, पर इनमें भी हर किसी नुस्खे को सिर्फ जड़ी-बूटियों के नाम पर ही आँख मूँदकर नहीं आजमाया जा सकता। पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखते हुए होम्योपैथी और बायोकैमी दवाओं से वजन घटाना पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। कई लोग सोच सकते हैं कि स्वदेशी चिकित्सा की बात करते-करते होम्योपैथी का ज़िक्र कैसे ? तो यहाँ अति संक्षेप में यह बता देना उचित है कि होम्योपैथी के सिद्धांत और आयुर्वेद की मूल मान्यताओं में कहीं कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि कई मायनों में होम्योपैथी कहीं ज्यादा 'आयुर्वेदिक पद्धति' है। यह रहस्य वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्हें होम्योपैथी के सैद्धांतिक पक्ष की गहरी समझ है। यह भी आश्चर्यजनक बात है कि जर्मनी में खोजी गई यह पद्धति भारतीय समाज और सांस्कृतिक मूल्यों के सर्वथा अनुकूल है। ऐसी पद्धति की खोज संभवतः इसलिए भी आसान हुई, क्योंकि इसके आविष्कर्ता महात्मा हनीमेन का जीवन भारतीय ऋषियों-महात्माओं जैसा अध्यात्म प्रेरित नैतिकतावादी रहा।
बहरहाल, मोटापा घटाने के लिए आप कुछ भी करें, अंततः आहार-विहार संयमित करने से ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इसमें से पहले आहार की बात की जाए तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि आपको अपना खान-पान ऐसा संयोजित करना होगा कि शरीर को बाहर से वसा और ऊर्जामान (कैलोरी) की आपूर्ति कम से कम हो। चूँकि वसा शरीर के लिए ऊर्जा का स्रोत है, इसलिए बाहर से कम वसा और कम कैलोरी पहुँचेगी तो शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए अन्दर जमा चर्बी अपघटित होकर शरीर के काम आने लगेगी और इस तरह मोटापा कम होना शुरू हो जाएगा। कैलोरी कम करने के चक्कर में अक्सर लोग भोजन एकदम कम कर देते हैं। आजकल प्रचलित 'डायटिंग' का यह तरीका काफी नुकसानदेह हो सकता है और इससे आप शक्तिहीनता और कई दूसरी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।
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दरअसल आहार को कम करने के बजाय उसे संतुलित करने की जरूरत है। भोजन में ऐसी चीजें शामिल करनी चाहिए जो कम वसायुक्त हों और जिनका ऊर्जामान (कैलोरी) कम हो, परंतु वे शरीर के लिए जरूरी पोषकता की पूर्ति करने वाली हों।
आहार संतुलन के बाद विहार में भी संतुलन जरूरी है। अर्थात् पूरे दिन में से कुछ समय आपको शारीरिक श्रम के लिए अवश्य ही निकालना चाहिए। जितनी ऊर्जा शरीर को भोजन से मिलती है अगर उससे ज्यादा श्रम में खर्च होती है तो समझिए कि मोटे लोगों के लिए सार्थक परिणाम निकल सकते हैं। आहार-विहार को संतुलित करते हुए मोटापा घटाने का फिलहाल एक कार्यक्रम दिया जा रहा है, मोटे लोग इसे अपनाएं और लाभ उठाएं—
1. 6-7 घण्टे की पर्याप्त नींद लेने के बाद सबेरे जल्दी उठने की आदत बनाएं। उठने के बाद सबसे पहले 1 गिलास गुनगुने गरम पानी में 2 चम्मच नींबू का रस और दो चम्मच शुद्ध शहद मिलाकर गटागट पी जाएं। अब कुछ देर टहलने के बाद शौच के लिए जाएं।
2. शौचादि से निवृत्त होकर कम से कम 3-4 किलोमीटर तेज कदमों से टहलने निकलें, हो सके तो थोड़ी दौड़ भी लगाएं। याद रखें धीरे-धीरे चलकदमी करने से मोटापे पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। टहलने के बाद समय हो तो कुछ योगासन व्यायाम करें। टहलने के बजाय चाहें तो केवल आसन व्यायाम से भी काम चला सकते हैं। आसनों में सूर्यनमस्कार, उत्तान पादासन, हलासन, धनुरासन, जानुशिरासन, वक्रासन, तांडासन, पश्चिमोत्तान आसन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन में से पहले आसन आसनों से शुरूआत करके धीरे-धीरे जितने आसन कर सकें, करें। उड्डियान बंध तथा भस्त्रिका प्राणायाम भी करें। आसन-व्यायाम फुरसत हो तो सबेरे शाम दोनों समय खाली पेट कर सकते हैं; और बेहतर परिणाम मिलेगा। इतना अवश्य समझ लें कि आसन-व्यायाम योग्य व्यक्ति से सीख-समझकर ही शुरू करना चाहिए।
3. नाश्ता हल्का-फुल्का करें। कोई एक किस्म का एक पाव फल या फल का रस लें। 50 ग्राम मूँग में थोड़ा गेहूँ, थोड़ी मेथी मिलाकर अंकुरित करके सेंधा नमक और नींबू का रस मिलाकर भी नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। दूध पीते हों तो मलाई उतारकर एक पाव दूध में आधा चम्मच सोंठ तथा 6-7 मुनक्का या थोड़ा अंजीर डालकर उबालें और गुनगुना रहने पर पिएं। चाय पीने का इरादा हो तो अदरक या सोंठ, तुलसी, काली मिर्च, लौंग, इलायची, मुलहठी आदि जड़ी-बूटियों की चाय इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरह की आयुर्वेदिक चाय गुरुकुल कांगड़ी, दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट (स्वामी रामदेव), गायत्री परिवार, संत आसाराम बापू आश्रम आदि की बनी हुई मिलती है।
4. मोटापे से ग्रस्त लोगों को दोपहर और शाम के भोजन में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। तेल, घी से बनी वसायुक्त और ज्यादा प्रोटीन व कार्बोज युक्त चीजों का सेवन हर हाल में सीमित कर देना चाहिए। भोजन से पहले पर्याप्त मात्रा में सलाद खाएं। हरी सब्जियों की मात्रा भरपूर रखें और गेहूँ की रोटी कम खाएं। अगर मोटापे की समस्या ज्यादा हो
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