सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
‘तेल मर्दन से त्वचा चिकनी, स्पर्श में कोमल, बलवान और सुंदर हो जाती है। साथ ही शरीर भी बलवान और प्रियदर्शी होता है तथा बुढ़ापे के लक्षण कम दिखाई देते हैं।’
संवाहनश्रम हरं वृष्यं निद्रासुखप्रदम्।
मांसासूक्त्यक् प्रसन्नत्वकुर्यादवात कफापहम् ।।
इसका अर्थ यह है कि ‘शरीर की मालिश श्रमनाशक धातुओं को पुष्ट करने वाली, अच्छी नींद लाने वाली, मांस, त्वचा व रक्त को निर्मल करने वाली तथा वात, कफ का शमन करने वाली होती है।’
इतनी चर्चा के बाद उम्मीद है कि आप की समझ में अच्छी तरह आ गया होगा कि स्वास्थ्य और सौन्दर्य बनाए रखने के लिए तेल मालिश कितना जरूरी है। संक्षेप में तेल मालिश का मुख्य लाभ यह है कि त्वचा कांतिमान, झुर्रिरहित, निरोग और मजबूत रहती है। रक्त संचार ठीक रहता है। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है। विभिन्न अंगों को बल मिलता है। शरीर का लचीलापन कायम रहता है तथा बुढ़ापा देर से आता है। यह भी विशेष बात है कि तेल मालिश से दुबले लोगों का शरीर मांसल और पुष्ट होता है तथा मोटे लोगों का मोटापा घटता है। इसके अलावा मालिश से शरीर दर्द, सिरदर्द, हाथ-पैरों का कंपन, वात-व्याधि, जोड़ों का दर्द, अनिद्रा आदि में भी आराम मिलता है। इतना जानने के बाद, आजकल के कुछ अंग्रेजीदा लोग और एलोपैथी के डॉक्टर अगर तेल मालिश को फिजूल की चीज़ ठहराएं तो उनकी बातों पर खास ध्यान न देते हुए आप शौक से इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कीजिए और अपने पोर-पोर में शक्ति, कांति और स्फूर्ति का एहसास करिए।
तेल मालिश के लिए जरूरी बातें
- 1. यूँ तेल मालिश आप पूरे साल कर सकते हैं फिर भी बसंत और जाड़े का 3-4 माह का समय इसके लिए विशेष लाभकारी है।
- 2. उगते सूरज की लालिमा में प्रातःकाल तेल मालिश करना सबसे अच्छा है। वैसे दिन में कभी भी खाली पेट तेल मालिश कर सकते हैं।
- 3. तेल मालिश के समय शरीर पर कम से कम कपड़े रहने चाहिए; जैसे कि निक्कर, जांधिया, लंगोट आदि।
- 4. सामान्यतः मालिश खुले हवादार स्थान पर करनी चाहिए। शरीर निर्बल हो और तेज़ असह्य हवा चल रही हो तो बंद कमरे में भी मालिश कर सकते हैं।
- 5. घर में यदि पति-पत्नी दोनों मौजूद हों तो परस्पर एक-दूसरे की मालिश कर सकते हैं। यह सुविधाजनक रहेगा, अन्यथा अपने शरीर की खुद मालिश करें।
- 6. जमीन पर चटाई आदि बिछाकर बैठकर मालिश करें। जिस अंग की मालिश करें ध्यान उसी अंग पर एकाग्र रखें और मन में उमंग के भाव बनाएं।
- 7. तेल मालिश नीचे के अंगों से शुरू करके ऊपर की ओर करनी चाहिए। अर्थात् पाँव के तलुओं से मालिश की शुरूआत करके क्रमशः पंजे, पिंडिलियों, घुटना, जाँघ, नितंब, कमर, पेट, सीना, पीठ, गर्दन, चेहरा और सिर तक पहुँचें। इसे यूँ कहें कि पहले दोनों पैरों की बारी-बारी से
pg. 42
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
मालिश करने के बाद, कमर, पेट व सीना, फिर दोनों हाथ, गर्दन और चेहरे व सिर की मालिश करें।
8. मालिश की दिशा हृदय की ओर होनी चाहिए। हाथ-पैर की मालिश पंजों से शुरू करें और कंधों व नितंब तक बढ़ें। पेट-कमर पर भी नीचे से ऊपर की ओर हृदय की दिशा में मालिश करें। पेट और सीने की मालिश गोलाकार हाथ घुमाते हुए भी करें। पीठ की मालिश रीढ़ स्थान से शुरू करके किंचित ऊपर दिशा में बाहर की ओर करें। गर्दन की मालिश अंदर से बाहर की ओर तथा चेहरे की मालिश गालों से कनपटी की ओर करें। सामान्य समझ इतनी रखें कि हृदय से निकली धमनियों की गति की विपरीत दिशा में मालिश विशेष लाभप्रद है।
9. अनावश्यक दबाव देने के बजाय हल्का दबाव देते हुए आहिस्ता-आहिस्ता मालिश करनी चाहिए। कम-से-कम 15-20 मिनट और ज्यादा-से-ज्यादा 45 मिनट तक मालिश करें।
10. बच्चों की मालिश प्रातःकालीन सूर्य की रोशनी जहाँ पड़ती हो वहाँ करनी चाहिए। इससे उनके शरीर को विटामिन 'डी' आसानी से प्राप्त हो सकेगी। बच्चों की मालिश के लिए नारियल, सरसों, जैतून के तेल उत्तरोत्तर बेहतर हैं। गाय के घी या मक्खन से मालिश करें तो अति उत्तम।
11. स्त्रियों की तेल मालिश के लिए ध्यान देने वाली विशेष बात यह है कि उन्हें अपने वक्षस्थल की मालिश में सावधानी बरतनी चाहिए। स्तनों पर सावधानी पूर्वक चारों ओर से हल्के हाथों स्तन के अग्रभाग की ओर मालिश करें। मासिक स्त्राव या गर्भकाल की स्थिति हो तो पेट एवं गर्भाशय के हिस्से को छोड़कर शेष शरीर की मालिश करनी चाहिए।
मालिश के लिए उपयोगी तेल
स्थानीय वातावरण और शरीर की प्रकृति को देखते हुए अपने अनुकूल तेल का चुनाव करना विशेष लाभप्रद रहता है। सामान्यतः सर्दी के मौसम में सरसों का तेल, बरसात के दिनों में तिल का तेल तथा गर्मी में नारियल तेल की मालिश विशेष हितकर है। शारीरिक प्रकृति के हिसाब से तेल का चयन करना हो तो कफ प्रकृति वालों को सरसों का तेल, वात प्रकृति वालों को तिल का तेल तथा पित्त प्रकृति वालों को नारियल का तेल चुनना चाहिए।
इन कुछ मुख्य तेलों के अलावा जैतून का तेल किसी भी मौसम में उपयोग में लिया जा सकता है। जैतून के तेल की मालिश से त्वचा की रंगत सुधरती है और उसमें मुलायमियत आती है। यह तेल स्त्रियों के वक्ष को विकसित करने की दृष्टि से भी विशेष लाभदायक है। बादाम का तेल भी काफी फायदेमंद है। यह पलकों और भौंहों को मीम का तेल, महुए का तेल, अरण्डी का तेल, चंदन का तेल, चमेली का तेल आदि भी उपयोग में लाए जाते हैं। आवश्यकतानुसार इन तेलों में औषधियों का मिश्रण करके या दो-तीन तेलों को आपस में मिलाकर मालिश किया जाता है। जैसे कि नारियल, अरण्डी और तिल का तेल समान भाग में मिलाकर सिर में मालिश करने से बालों की कई समस्याएँ दूर होती हैं। पुराना चूना तिल के तेल में मिलाकर लगाने से दाद के कष्ट में राहत मिलती है। पार्यरिया रोग या दाँतों के तमाम कष्टों में सरसों के तेल में चुटकी भर हल्दी और बारीक नमक मिलाकर दाँतों व मसूड़ों की मालिश करने से काफी लाभ मिलता है। शरीर में ताजगी लाने और त्वचा की रूक्षता दूर करने के लिए स्नान से आधा घण्टा पहले सरसों के तेल में समान भाग दही मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
pg. 43
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
मुहासे निकलते हों तो सोते समय नारियल तेल में नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर चेहरे की मालिश करना हितकर रहता है। धूप में त्वचा झुलस जाए तो नारियल के तेल में थोड़ा नमक मिलाकर मालिश करें और 15-20 मिनट बाद धोएं। 5 तोला नारियल तेल में 2 तोला नमक तथा 2 तोला नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से सारे शरीर की त्वचा की कोमलता और सुंदरता बढ़ती है।
इसी तरह अरण्डी के तेल में थोड़ा सा नमक और कपूर मिलाकर दिन में दो बार मसूहों की मालिश करनी चाहिए। अरण्डी के तेल में बराबर मात्रा में शहद मिलाकर चेहरे पर मालिश करने से त्वचा कोमल बनती है और झुर्रियाँ मिटती हैं। चेहरे की त्वचा का सूखापन जैतून के तेल में मलाई मिलाकर मालिश करने से ठीक हो जाता है। धूप में झुलसकर त्वचा साँवली पड़ गई हो तो जैतून के तेल में बराबर मात्रा में सिरका मिलाकर मालिश करें। मुहासों में जैतून के तेल में समान भाग नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से लाभ मिलता है। होंठों का कालापन कम करने के लिए बादाम के तेल में नींबू का रस मिलाकर नियमित मालिश करनी चाहिए। खाज, खुजली में चंदन के तेल में नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर मालिश करना हितकर है। कोढ़ की बीमारी में नीम के तेल में चालमोगरा का तेल मिलाकर मालिश करने से विशेष लाभ मिलता है। पित्ती की तकलीफ़ में नीम के तेल में समान भाग सरसों का तेल मिलाकर मालिश करने से आराम मिलता है। इस तरह से विभिन्न स्थितियों में विभिन्न औषधि द्रव्यों व तेलों के मिश्रण से मालिश करके लाभ उठाया जा सकता है।
तेल मालिश से कब बचें
तेल मालिश के इतने ढेर सारे लाभों के बावजूद कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी हैं जबकि इससे बचने की भी ज़रूरत पड़ सकती है। सामान्यतः ऐसी परिस्थितियाँ कम ही होती हैं, फिर भी इन्हें जान लेना चाहिए और कुछ खास तरह के रोगियों को तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार रक्तस्राव की स्थिति, बुखार, विरेचन के बाद, वमन के बाद, विषग्रस्तता, मूच्छा की उग्रावस्था, उग्र सूजन, दाह-जलन, अत्यन्त कमज़ोरी तथा पेट के कुछ गंभीर रोगों की अवस्था में तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। शेष अनुकूल परिस्थितियों में नियमित तेल मालिश करिए और ताउम्र ताज़गी के अहसास से सराबोर रहिए।
pg. 44
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
सौन्दर्यरक्षक आभ्यंतर प्रयोग
सौन्दर्यरक्षक पाक
जो स्त्रियाँ किसी बीमारी के बाद कमजोरी की शिकार हो गई हों और सौन्दर्य नष्ट हो गया हो, उन्हें यह पाक निम्न अनुसार बनाकर सेवन करने से लाभ मिल जाता है—
सोंठ—डेढ़ तोला, काला जीरा—1 तोला, विधारा—डेढ़ तोला, चव्य—1 तोला, अकरकरा— डेढ़ तोला, तेजपात—1 तोला, धनिया—डेढ़ तोला, सफेद जीरा—डेढ़ तोला, बरियारी की जड़—2 तोला, इलायची—2 तोला, चित्रक—2 तोला, पीपल—1 तोला, जावित्री—1 तोला, त्रिफला—2 तोला, नागकेसर—डेढ़ तोला, गोदुग्ध 5—सेर, चीनी—ढाई सेर तथा गाय का घी तीन—पाव।
निर्माणविधि— पहले दूध को इतना पकाइए कि आधा रह जाए। इसके बाद इसमें सोंठ पीसकर मिला दें। मावा बन जाने पर सभी औषधियों को कपडछन चूर्ण करके इसमें मिला दें तथा एक पाव घी में सेंकें, बाद में शेष घी मिला दें। औषधियाँ अच्छी तरह एकसार हो जाएं तो चीनी की चाशनी बनाकर इसमें डालें तथा पिशता, बादाम, नारियल, चिरोंजी आदि मेवे मिलाकर जमा दें।
इसे 1 तोला से लेकर 5 तोला तक पाचनशक्ति के अनुसार सबेरे—शाम दूध से सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से चुस्ती—फुर्ती, प्रसन्नता तथा पूरे शरीर में सुंदरता का संचार होता है। यह योग भूख की कमी, क्षय, पांडु, कमरदर्द, नेत्रों की कमजोरी, प्रदर आदि अन्यान्य रोगों को भी ठीक करने में समर्थ है। इसे पुरुष भी सेवन कर सकते हैं।
— — — — — एक पाव दूध में असली केसर की चार—पाँच पंखुडियाँ तथा एक छोटी इलाइची डालकर उबालें तथा नियमित सर्दियों में दो—तीन माह पिएं। इससे त्वचा की रंगत निखरती है।
— — — — — आँवले का मुरब्बा 25 ग्राम नित्य तीन—चार माह खाने से वर्ण सुधरता है।
— — — — — गाजर व चुकन्दर का रस एक गिलास एक माह तक पीने से रक्त शुद्ध होता है तथा वर्ण निखरता है।
— — — — — अंगूर, किशमिश व मुनकके के सेवन से रंग साफ होता है।
— — — — — टमाटर, मूली, गाजर, चुकन्दर, प्याज, पतागोभी आदि को सलाद के रूप में सेवन करने से त्वचा स्वस्थ बनती है।
pg. 45
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
त्रिफला चूर्ण तीन ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ सोते समय सेवन करते रहने से पेट साफ रहता है और त्वचा रोगी नहीं होते।
1 तोला मुनक्का साफ करके 5 तोला पानी में शाम को भिगो दें। सबेरे बीज अलग करके मुनक्का खा लें और बचे पानी में मिश्री मिलाकर या वैसे ही पी लें। एक माह में मुहोंसे निकलने कम हो जाएंगे।
यदि आँखें अंदर धँस रही हों और उनके चारों ओर कालापन हो तो 5-6 बादाम की गिरियों रात भर पानी में भिगोकर सबेरे पीसकर एक पाव गर्म मिश्री युक्त दूध के साथ 21 दिनों तक पिएं। इस दौरान रोज सायंकाल देशी गुलाब का गुलकंद भी एक छोटी चम्मच भर सेवन करते रहें। इसके अलावा शहद और बादाम का तेल समान मात्रा में मिलाकर आँखों के चारों ओर हल्के-हल्के मालिश करें तथा आधे घण्टे बाद धो दें।
रतिबल्लभ पाक
आधा किलो-बबूल का गोंद, 100 ग्राम-सोंठ, 50-50 ग्राम-पीपलामूल एवं पीपल, 25-25 ग्राम-शुद्ध शिलाजीत, मोचरस, जायफल, जावित्री, लौंग, 10-10 ग्राम-दालचीनी, नागकेंसर, तेजपात, काली मिर्च, प्रवाल भस्म, इलायची, अन्नक भस्म, लौहभस्म, बंगभस्म तथा 5 ग्राम-केंसर, 250 ग्राम-घी, 2 किलो- शक्कर व जितना ज़रूरी समझें, मेवे ले लें।
गोंद को बारीक कूटकर कढ़ाई में घी गर्म करके तल लें। पीपल, पीपलामूल व सोंठ को कपड़छन चूर्ण करें। केंसर व भस्मों को छोड़कर शेष लौंग आदि द्रव्यों को मिलाकर एक साथ कपड़छन चूर्ण बनाएं। खोपरा, किशमिश, बादाम आदि मेवे भी बारीक काटकर रखें। केंसर को पत्थर के खरल में गुलाबजल के साथ घोंट लें। अब चारों भस्मां को भी साफ खरल में घुटाई करके एक में मिला लें।
यह सब तैयार हो जाने के बाद शक्कर की एक तार की चाशनी बनाएं तथा सबसे पहले तले गोंद, सोंठ, पीपल व पीपलामूल का चूर्ण इसमें मिलाएं तथा आँच धीमी रखें। अब इसमें भस्में डालकर कड़छी से चलाते जाएं। जब चाशनी जमने लायक बन जाए तो इसे उतार लें तथा किंचित गर्म रहने पर लौंग आदि द्रव्यों का चूर्ण डालकर अच्छी तरह मिलाएं। केंसर भी इसमें मिला दें। अब किसी थाली आदि में घी चुपड़कर इसे जमा दें और कटे हुए मेवे ऊपर से बुरक दें। बाद में बर्फीनुमा काटकर काँच के बरतन में रख लें।
इस पाक को पाचनशक्ति के अनुसार 2 से 4 तोला तक सबेरे मीठे कुनकुने दूध के साथ चबा-चबाकर सेवन करना चाहिए।
यह योग स्त्रियों व पुरुषों दोनों के लिए ही अत्यन्त गुणकारी है। महिलाओं का प्रदर रोग, प्रसूति रोग व शरीर की दुर्बलता इससे दूर होती है। प्रसव के उपरांत आई कमजोरी को दूर करके यह स्त्री के शरीर को सबल बनाता है और उसके स्वास्थ्य व सौन्दर्य की वृद्धि करता है। विवाहित
pg. 46
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
पुरुषों के लिए यह बल-वीर्यवर्धक, यौन शक्तिदायक व सौन्दर्यरक्षक है। शीतकाल में इस योग का सेवन करना चाहिए।
नागकेसर, कमल व कुमुद का चूर्ण शहद व घी में मिलाकर खाने से त्वचा की रंगत में निखार आता है। घी तथा इसकी आधी मात्रा में शहद सोयाचूर्ण में मिलाकर सेवन करते रहने से सौंदर्य में निखार लाता है।
pg. 47
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
स्वास्थ्य और सौन्दर्य का शत्रु मोटापा
मोटापे का अर्थ है— शरीर में चर्बी यानी वसा का ज्यादा मात्रा में इकट्ठा हो जाना। चर्बी भी अजब चीज है। अगर संतुलन में हो तो शरीर को सुडौल बनाए रखती है, कम हो तो आदमी बेडौल दिखता है और ज्यादा हो जाए तो बेडौल ही क्या पूरा शरीर डॉवॉडोल हो जाता है। अर्थात् एक सीमा तक चर्बी जरूरी है, इसके बाद गैरजरूरी। जिनके शरीर में चर्बी संतुलित मात्रा में है, उनके लिए तो चिंता की कोई बात नहीं है पर जिनके शरीर में चर्बी की कमी है, वे चर्बी बढ़ाने के लिए और जिनके शरीर में चर्बी ज्यादा है, वे इसे घटाने के लिए परेशान दिखते हैं। इस अध्याय में हम चर्बी बढ़ने अर्थात् मोटापे की समस्या से निजात पाने की ही चर्चा करेंगे।
मोटापे की समस्या के जैविक कारणों पर तमाम वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध हैं, पर यहाँ उनकी गंभीर चर्चा बहुत जरूरी नहीं दिखती क्योंकि यह पुस्तक जनसामान्य को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है। अलबत्ता, मोटापे की समस्या के कुछ मोटे-मोटे पहलू जान लेना तो उपयोगी है ही।
दरअसल मोटापे की समस्या मुख्य रूप से दो तरह से पैदा होती है। कुछ लोगों में मोटापा वंशगत प्रभाव से आता है या शरीर की अन्दरूनी मशीनरी ऐसी होती है कि वे जो कुछ खाते हैं उसका ज्यादा हिस्सा चर्बी में तब्दील हो जाता है। यानी एक वर्ग ऐसा है जिनके शरीर में चर्बी जमा करने की खास प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा चौकन्ना रहने की जरूरत होती है। मोटापे का दूसरा और सबसे व्यापक कारण है लापरवाही भरी दिनचर्या। जरूरत से ज्यादा और सारे दिन कुछ न कुछ खाते रहने, आलस्य भरा और श्रमहीन जीवन बिताने, का ज्यादा सेवन करने जैसी आहार-विहार
की वजह से ज्यादातर लोग मोटापे के शिकार बनते हैं। एक सवाल यह है कि आखिर किस स्थिति को हम मोटापा कहेंगे ? तो इसका सामान्य सा उत्तर यह है कि जब तक शरीर की चुस्ती-फुर्ती कायम है और मन में उत्साह-उमंग बना हुआ है, तब तक मोटापे या दुबलेपन जैसी कोई समस्या नहीं है। यूँ सामान्यतः जितने इंच शरीर की लंबाई हो लगभग उतने ही किलो शरीर का वजन हो तो इसे संतुलित स्थिति मानी जाती है। इसमें उन्नीस-बीस के फर्क से कोई खास अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जब फर्क ज्यादा बढ़ने लगे तो समझिए कि सावधान होने का समय आ गया है। जिन बुजुर्गों का वजन, 30-35 वर्ष की उनकी स्वस्थ अवस्था जितना आज भी बना हुआ है, वे अपने को अच्छी स्थिति में मान सकते हैं।
मोटापे का आक्रमण सबसे पहले अक्सर पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों पर होता है। इसके बाद गर्दन, चेहरा, हाथ-पैर व शरीर के शेष अंग इसकी गिरफ्त में आते हैं। ध्यान रखने वाली बात है कि शुरूआती दौर में, या जब तक मोटापा पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों तक ही सीमित है तब तक इसे दूर करना ज्यादा आसान है। लेकिन जब पूरे शरीर पर मोटापा अपना मजबूत कब्जा जमा लेता है तो इसे हटा पाना तकलीफदेह और मशक्कत भरा काम हो जाता है।
pg. 48
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
खैर, स्थिति जो भी हो, अगर मोटापे से ग्रस्त लोग अपना स्वास्थ्य और सौन्दर्य वापस लाना चाहते हैं तो उन्हें अविलम्ब संकल्प की मजबूती के साथ कमर कसकर कुछ उपायों पर अमल करने की तैयारी कर ही लेनी चाहिए, अन्यथा भविष्य की देहरी पर मधुमेह, हाई ब्लडप्रेशर, कब्ज, गैस, हृदय रोग, दमा, गठिया आदि अन्यान्य रोग उनका स्वागत करने को तैयार मिलेंगे, यह तय जान लें।
वैसे मोटापे से ग्रस्त लोग इससे निजात पाने के लिए जाने क्या-क्या करते हैं और कहाँ-कहाँ भटकते हैं, पर ज्यादातर ऐसा ही होता है कि मोटापा अन्तिम दम तक साथ नहीं छोड़ता। यह भी गौरतलब है कि मोटापे के इलाज के चक्कर में अक्सर लोग ज्यादा खतरनाक बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। ऐसे में सीधी सी बात यह है कि मोटापा दूर करने का कार्यक्रम बहुत सोच-समझकर बनाएं और मुस्तैदी से उसका पालन करें। दवाओं का सहारा लेने का इरादा हो तो इतना याद रखें कि एलोपैथी में मोटापा घटाने की अब तक जो भी दवाएं हैं, वे निरापद क़तई नहीं हैं। इन दवाओं से आप ज्यादा बड़ी मुसीबत में फँस सकते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। आयुर्वेद के तमाम नुस्खे निरापद और कारगर हो सकते हैं, पर इनमें भी हर किसी नुस्खे को सिर्फ जड़ी-बूटियों के नाम पर ही आँख मूँदकर नहीं आजमाया जा सकता। पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखते हुए होम्योपैथी और बायोकैमी दवाओं से वजन घटाना पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। कई लोग सोच सकते हैं कि स्वदेशी चिकित्सा की बात करते-करते होम्योपैथी का ज़िक्र कैसे ? तो यहाँ अति संक्षेप में यह बता देना उचित है कि होम्योपैथी के सिद्धांत और आयुर्वेद की मूल मान्यताओं में कहीं कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि कई मायनों में होम्योपैथी कहीं ज्यादा 'आयुर्वेदिक पद्धति' है। यह रहस्य वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्हें होम्योपैथी के सैद्धांतिक पक्ष की गहरी समझ है। यह भी आश्चर्यजनक बात है कि जर्मनी में खोजी गई यह पद्धति भारतीय समाज और सांस्कृतिक मूल्यों के सर्वथा अनुकूल है। ऐसी पद्धति की खोज संभवतः इसलिए भी आसान हुई, क्योंकि इसके आविष्कर्ता महात्मा हनीमेन का जीवन भारतीय ऋषियों-महात्माओं जैसा अध्यात्म प्रेरित नैतिकतावादी रहा।
बहरहाल, मोटापा घटाने के लिए आप कुछ भी करें, अंततः आहार-विहार संयमित करने से ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इसमें से पहले आहार की बात की जाए तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि आपको अपना खान-पान ऐसा संयोजित करना होगा कि शरीर को बाहर से वसा और ऊर्जामान (कैलोरी) की आपूर्ति कम से कम हो। चूँकि वसा शरीर के लिए ऊर्जा का स्रोत है, इसलिए बाहर से कम वसा और कम कैलोरी पहुँचेगी तो शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए अन्दर जमा चर्बी अपघटित होकर शरीर के काम आने लगेगी और इस तरह मोटापा कम होना शुरू हो जाएगा। कैलोरी कम करने के चक्कर में अक्सर लोग भोजन एकदम कम कर देते हैं। आजकल प्रचलित 'डायटिंग' का यह तरीका काफी नुकसानदेह हो सकता है और इससे आप शक्तिहीनता और कई दूसरी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।
pg. 49
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
दरअसल आहार को कम करने के बजाय उसे संतुलित करने की जरूरत है। भोजन में ऐसी चीजें शामिल करनी चाहिए जो कम वसायुक्त हों और जिनका ऊर्जामान (कैलोरी) कम हो, परंतु वे शरीर के लिए जरूरी पोषकता की पूर्ति करने वाली हों।
आहार संतुलन के बाद विहार में भी संतुलन जरूरी है। अर्थात् पूरे दिन में से कुछ समय आपको शारीरिक श्रम के लिए अवश्य ही निकालना चाहिए। जितनी ऊर्जा शरीर को भोजन से मिलती है अगर उससे ज्यादा श्रम में खर्च होती है तो समझिए कि मोटे लोगों के लिए सार्थक परिणाम निकल सकते हैं। आहार-विहार को संतुलित करते हुए मोटापा घटाने का फिलहाल एक कार्यक्रम दिया जा रहा है, मोटे लोग इसे अपनाएं और लाभ उठाएं—
1. 6-7 घण्टे की पर्याप्त नींद लेने के बाद सबेरे जल्दी उठने की आदत बनाएं। उठने के बाद सबसे पहले 1 गिलास गुनगुने गरम पानी में 2 चम्मच नींबू का रस और दो चम्मच शुद्ध शहद मिलाकर गटागट पी जाएं। अब कुछ देर टहलने के बाद शौच के लिए जाएं।
2. शौचादि से निवृत्त होकर कम से कम 3-4 किलोमीटर तेज कदमों से टहलने निकलें, हो सके तो थोड़ी दौड़ भी लगाएं। याद रखें धीरे-धीरे चलकदमी करने से मोटापे पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। टहलने के बाद समय हो तो कुछ योगासन व्यायाम करें। टहलने के बजाय चाहें तो केवल आसन व्यायाम से भी काम चला सकते हैं। आसनों में सूर्यनमस्कार, उत्तान पादासन, हलासन, धनुरासन, जानुशिरासन, वक्रासन, तांडासन, पश्चिमोत्तान आसन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन में से पहले आसन आसनों से शुरूआत करके धीरे-धीरे जितने आसन कर सकें, करें। उड्डियान बंध तथा भस्त्रिका प्राणायाम भी करें। आसन-व्यायाम फुरसत हो तो सबेरे शाम दोनों समय खाली पेट कर सकते हैं; और बेहतर परिणाम मिलेगा। इतना अवश्य समझ लें कि आसन-व्यायाम योग्य व्यक्ति से सीख-समझकर ही शुरू करना चाहिए।
3. नाश्ता हल्का-फुल्का करें। कोई एक किस्म का एक पाव फल या फल का रस लें। 50 ग्राम मूँग में थोड़ा गेहूँ, थोड़ी मेथी मिलाकर अंकुरित करके सेंधा नमक और नींबू का रस मिलाकर भी नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। दूध पीते हों तो मलाई उतारकर एक पाव दूध में आधा चम्मच सोंठ तथा 6-7 मुनक्का या थोड़ा अंजीर डालकर उबालें और गुनगुना रहने पर पिएं। चाय पीने का इरादा हो तो अदरक या सोंठ, तुलसी, काली मिर्च, लौंग, इलायची, मुलहठी आदि जड़ी-बूटियों की चाय इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरह की आयुर्वेदिक चाय गुरुकुल कांगड़ी, दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट (स्वामी रामदेव), गायत्री परिवार, संत आसाराम बापू आश्रम आदि की बनी हुई मिलती है।
4. मोटापे से ग्रस्त लोगों को दोपहर और शाम के भोजन में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। तेल, घी से बनी वसायुक्त और ज्यादा प्रोटीन व कार्बोज युक्त चीजों का सेवन हर हाल में सीमित कर देना चाहिए। भोजन से पहले पर्याप्त मात्रा में सलाद खाएं। हरी सब्जियों की मात्रा भरपूर रखें और गेहूँ की रोटी कम खाएं। अगर मोटापे की समस्या ज्यादा हो
pg. 50
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
तो कम से कम एक माह के लिए गेहूँ की रोटी खाना एकदम बंद कर दें। इस दौरान जौ के आटे से बनी रोटी भोजन में लें या साबुत चने में जौ मिलाकर पिसवा लें। इस आटे की रोटी स्वादिष्ट भी लगेगी। 10 किलो चना हो तो दो किलो जौ मिलाएं तो अच्छा लाभ मिलेगा। दालों में छिलकायुक्त मूँग, मसूर का सेवन बेहतर रहेगा।
चिकित्सा के शुरू में यदि एकाध हफ्ते तक सिर्फ मौसमी फल, फलों के रस, सलाद और हरी सब्जियों व दाल पर ही निर्वाह करें तो अच्छा है। इसके बाद धीरे-धीरे जौ की रोटी सेवन करना शुरू करें। एक डेढ़ माह बाद गेहूँ की रोटी खाना शुरू कर सकते हैं। दोनों समय का भोजन इसी तरह का करें। शाम को सोने से दो-तीन घण्टे पूर्व भोजन कर लेना हितकर है। कब्जियत दूर करने के लिए एनिमा ले सकते हैं या सोने से पूर्व एक गिलास गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला में दो चम्मच ईसबगोल मिलाकर सेवन करें। त्रिफला के स्थान पर आँवले का चूर्ण भी ले सकते हैं। वैसे भी भोजन आदि के साथ ताज़ा या सूखे आँवले का चूर्ण, जो भी मिले, अवश्य सेवन करें।
दोपहर के भोजन के साथ मलाई रहित दूध से जमाई दही या छाछ भी ले सकते हैं। इससे मोटापा घटाने में मदद मिलेगी। भोजन में यह पूरा सुधार अपनाते हुए इतना याद रखें कि शुरू में एक हफ्ते तक फल-सब्जियों पर निर्वाह करने के बाद अचानक ही ढेर सारी रोटियाँ न खाना शुरू कर दें। एक-दो रोटी से शुरू करके धीरे-धीरे रोटियों की संख्या यथोचित मात्रा तक बढ़ाएं।
मोटापा, खासतौर से पेट और कमर का, घटाने के लिए एक अच्छा प्रयोग यह है कि दोनों समय भोजन करने के तुरंत बाद आधा गिलास उबला हुआ गर्म पानी चाय की तरह जितना गर्म पी सकें पी जाएं। यह प्रयोग डेढ़-दो माह तक कर सकते हैं। इसे बहुत लंबे समय तक नहीं चलाना चाहिए। यह प्रयोग प्रसव के बाद महिलाओं के पेट बढ़ने की समस्या में विशेष लाभप्रद है। गठिया, कृब्ज, गैस, यकृत रोग, मासिक धर्म की अनियमितता, आँखों के नीचे के कालेपन आदि में भी गर्म पानी का प्रयोग काफी हितकर है।
5. दोपहर और शाम के भोजन में 8-9 घण्टे का अंतराल हो तो बीच में 3 या 4 बजे तक कोई हल्का पेय या फल लें। थोड़े भुने चनों के साथ आयुर्वेदिक चाय लेकर भी काम चला सकते हैं।
इतने उपायों पर अमल करते हुए आप कुछ दिनों में मोटापे की समस्या पर तो विजय पा ही जाएंगे, आपके पोर-पोर में स्फूर्ति का भी संचार होगा। इन उपायों के साथ चाहें तो बायोकैमी की कल्केरिया फास 3g या 6g, काली फास 3g, काली म्यूर 6g, नेट्रम म्यूर 3g तथा साइलीशिया 12g नामक दवाओं की एक-एक टिकिया मिलाकर एक घूँट गरम पानी के साथ दिन में तीन-चार बार जब तक मोटापा न कम हो जाए तब तक सेवन कर सकते हैं। याद रखें कि बायोकैमिक दवा की टिकिया निगलने के बजाय जीभ पर रखकर चूसनी होती है। यह उपाय सोने पर सुहागा का काम करेगा। इसके अलावा चरित्रगत विशेषताओं के आधार पर चुनी गई कई होम्योपैथी औषधियाँ भी मोटापा घटाने में अच्छा प्रभाव दिखा सकती हैं।
मोटापा घटाने में सहायक कुछ अन्य नुस्खे
pg. 51
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
1 गिलास पानी में 4 बड़े चम्मच भर सिरका खाली पेट सेवन करते रहने से कमर का मोटापा दूर होता है।
कुलथों को पकाकर खाने से शरीर की चर्बी छँटती है।
सायंकाल के समय 6 माशा त्रिफला कोरे मिट्टी के पात्रा में लगभग छटॉक भर जल में भिगो दें। प्रातः मसल-छानकर तथा एक तोला शहद मिलाकर नियमित पिएं।
पेट, कमर व कूल्हों की चर्बी कम करने के लिए भाप सेंक करना चाहिए। यदि प्राकृतिक चिकित्सालय आदि में व्यवस्था न हो तो यह उपाय आप घर में भी कर सकते हैं। इसके लिए एक बड़े भगोने या पतीली में एक चम्मच नमक तथा तीन-चार चम्मच अजवायन डालकर पानी भर दें। बरतन पर जाली या चलनी आदि रखकर पानी को उबालें। जब भाप उठने लगे तो दो छोटे तौलिए ठण्डे पानी में भिगोकर निचोड़ लें तथा बारी-बारी से जाली पर रखकर भाप से गर्म करके पेट, कमर तथा कूल्हों की सेंक करें। इस उपाय से धीरे-धीरे चर्बी छँटने लगेगी।
प्रातः शौच जाने से पूर्व एक गिलास ठण्डे पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से चर्बी कम होने लगती है।
तुलसी के पत्तों के रस में शहद मिलाकर नियमित चाटते रहने से चर्बी कम होती है।
1 तोला मूली चूर्ण इतने ही शहद में मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से चर्बी छँटती है।
बड़ी हरड, आँवला तथा बहेड़े का छिलका (त्रिफला) समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर इसमें से 1 में मोटापा कम होने लगता है।
त्रिफला व गिलोय के काढ़े में 250 मि.ग्रा. लौह भस्म मिलाकर पीने से मोटापा बढ़ना रुक जाता है।
12 ग्राम शहद में 3 ग्राम चित्रकमूल का चूर्ण मिलाकर चाटने से पेट बढ़ना रुक जाता है।
1 तोला गिलोय, 3 तोला बायबिडंग, 2 तोला छोटी इलायची, 4 तोला इन्द्रजौ, ढाई तोला बहेड़ा, 5 तोला बड़ी हरड, 7 तोला आँवला तथा 8 तोला शुद्ध गुग्गुल लें।
गुग्गुल के अलावा पहले शेष सभी चीजों का चूर्ण बनाएं, इसके बाद गुग्गुल में मिलाकर अच्छी तरह कूटकर रख लें। आधा से 1 तोला यह चूर्ण शहद में मिलाकर सबेरे शाम पानी के
pg. 52
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
साथ सेवन करने से मोटापा कम होने लगता है। इसके साथ पथ्य – अपथ्य का विशेष ध्यान रखें तो जल्दी सफलता मिलती है।
pg. 53
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
दुबलापन भगाइए सौन्दर्य बचाइए
मोटापे की तरह दुबलापन भी एक समस्या है। हालाँकि दुबलेपन की समस्या उतनी बड़ी नहीं है जितनी कि मोटापे की। मोटे लोगों की तुलना में दुबले लोग प्रायः कम ही बीमार पड़ते हैं और उनके ज्यादा दिनों तक जिन्दा रहने की भी संभावना रहती है। फिर भी, अगर देह हड्डियों का कंकाल सा नज़र आए तो समझिए कि कुछ मांसलता लाने की ज़रूरत है। ठीक अनुपात में मांसल शरीर स्वास्थ्य व सौन्दर्य की दृष्टि से उचित है।
आहार-विहार में उचित सुधार करके देह का दुबलापन दूर किया जा सकता है। कुछ लोग वंशगत प्रभाव से दुबले-पतले होते हैं। उनके शरीर की आंतरिक संरचना कुछ ऐसी होती है कि वे कितना भी पौष्टिक खाएँ-पिएँ पर शरीर में चर्बी इकट्ठा ही नहीं हो पाती और चाहकर भी वे मांसल नहीं दिखते। ऐसे लोगों का दुबलापन दूर होना थोड़ा मुश्किल तो है पर असंभव नहीं है।
दुबलापन दूर करने का कार्यक्रम बनाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि कहीं किसी रोग की वजह से तो ऐसा नहीं है। यदि कोई रोग हो तो पहले उसे ठीक करने का उपाय करें। ज्यादा संभव है कि आरोग्य होते ही दुबलापन भी खुद-ब-खुद दूर हो जाएगा। यदि बीमारी ठीक होने के बाद भी दुबलापन बना रहे तो इस अध्याय में दिए उपायों को आजमाकर लाभ उठाएँ। बिना किसी खास बीमारी के होते हुए भी दुबलापन है तो इसके पीछे-कम भोजन करना या भूखे रहना, पौष्टिकता रहित भोजन करना, रात में देर तक जागना, कम विश्राम करना या क्षमता से ज्यादा श्रम करना, ज्यादा उपवास करना, तनाव-चिंता-शोक में जीवन बिताना, पाचनशक्ति कमज़ोर होना आदि कारण हो सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि उक्त कारण जिम्मेदार हों तो दुबलापन दूर करने की कोशिश करने के साथ-साथ इन गड़बड़ियों को भी दूर करना चाहिए और ईर्ष्या, द्वेष, चिंता, शोक, क्रोध से मुक्त होकर प्रसन्नचित्त, उमंग भरा जीवन बिताते हुए निम्न उपाय करने चाहिए—
1— दुबलापन दूर करने की पहली शर्त यह है कि आप अपनी पाचनशक्ति मज़बूत करें ताकि खाया-पिया शरीर में अच्छी तरह ज़ज्ब हो और खुलकर भूख लगे। इसके लिए हफ़्ते भर विधिपूर्वक उपवास कर सकते हैं। तरीका यह है कि जब उपवास करना हो तो एक दिन पहले मूँग की खिचड़ी आदि हल्का भोजन लें। रात में दूध या पानी के साथ 2 चम्मच ईसबगोल, एरण्ड तेल अथवा त्रिफला सेवन करके उदर की सफ़ाई करें। दूसरे दिन रोटी बंद कर दें और मौसमी फलों व उबली हरी साग-सब्जियों पर निर्वाह करें। तीसरे दिन 2-3 घण्टे के अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा करके सिर्फ़ फलों का रस पिएँ। चौथे दिन सिर्फ़ पानी पीकर रहें। साथ में नींबू और शहद ले सकते हैं। पाँचवें दिन पुनः फलों का रस लें। छठे दिन फल व उबली साग-सब्जी पर रहें। सातवें दिन एक-दो चपाती से शुरू करके धीरे-धीरे खुराक बढ़ाएँ। इस उपवास काल में दो-तीन दिन एनिमा द्वारा पेट की सफ़ाई कर लें तो बेहतर परिणाम मिलेगा।
pg. 54
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
उपवास करने के बाद प्रायः भूख खूब लगने लगती है और खुराक बढ़ जाती है। इस तरह से बड़ी हुई खुराक दुबलापन दूर करने में अत्यन्त सहायक है।
2— दुबले लोग सबेरे पौष्टिक नाश्ता लें, पर इसका समय भोजन से 3-4 घण्टा पहले और सोकर उठने के 2-3 घण्टे बाद रखें। एक पौष्टिक नाश्ता यह है कि थोड़े चनों में गेहूँ, मूँगफली, मूँग मिलाकर अंकुरित कर लें। इस अंकुरित अन्न में नींबू और थोड़ा नमक निचोड़कर नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। नमक, नींबू न मिलाना चाहें तो इसे गुड़ के साथ या इसमें थोड़ी भिगोई किशमिश व खजूर मिलाकर भी सेवन कर सकते हैं। ऊपर से चाहें तो थोड़ा दूध पिएँ। नमक, नींबू मिलाएँ तो दूध न पिएँ।
इसके अलावा आगे वर्णित खजूर और दूध वाला नाश्ता भी कर सकते हैं या अनुकूल पड़े तो केला-दूध लें। जाड़े के दिनों में उड़द का आटा, बबूल का गोद, देशी घी, अश्वगंधा तथा मेवे मिलाकर बनाया गया लड्डू भी पाचनशक्ति के अनुसार सेवन कर सकते हैं। पौष्टिक नाश्ते और भी कई हैं, उन्हें सोच-समझकर सेवन करके लाभ उठाया जा सकता है।
3— दोपहर और शाम के भोजन में पर्याप्त पौष्टिक पदार्थों का सेवन खूब चबा-चबाकर करें। उपलब्धता के हिसाब से गाजर, पालक, चौलाई, टिण्डा, परवल व विभिन्न हरी सब्जियाँ, मौसमी फल, घी का तड़का लगी दाल, आँवले का murब्बा, दूध, घी, मक्खन, चावल की खीर आदि सेवन करें। रोटियाँ गेहूँ की खाएँ। चाहें तो गेहूँ में तिहाई भाग चने मिलाकर पिसवा लें और इस आटे की रोटी खाएँ। भोजन के बाद एक-दो केले और आगरे का पेठा या आँवले का murब्बा लें तो अच्छा है। रात के भोजन में एकाध रोटी कम खाएँ। भोजन के बाद आगे वर्णित अश्वगंधारिष्ट वाला नुस्खा भी सेवन कर सकते हैं।
4— दोनों भोजनों के बीच 8 घण्टे का अंतर रखते हुए मध्यकाल में किसी मौसमी फल या जूस का हल्का पाचक पौष्टिक अल्पाहार ले सकते हैं।
5— पानी भोजन के डेढ़-दो घण्टे बाद पीने की आदत बनाएँ। इसके अलावा दिन भर में डेढ़-दो घण्टे के अंतराल पर 6-8 गिलास तक खूब पानी पीते रहें।
6— रात में भोजन से दो-तीन घण्टे बाद और सोने से पूर्व गुनगुने दूध में एक चम्मच घी के साथ मिश्री या दो-तीन चम्मच शहद मिलाकर पिएँ। चाहें तो दूध-खजूर वाला आगे लिखा प्रयोग भी कर सकते हैं। सिर्फ़ इतना ध्यान रखें कि रात में यह नुस्खा सेवन करें तो इसमें खजूर की मात्रा सिर्फ़ आठ-दस ही रखें और सबेरे इसे न सेवन करें।
7— इतना उपाय करते हुए सबेरे अपने अनुकूल व्यायाम, योगासन, प्राणायाम अवश्य करें। इस संबंध में किसी पुस्तक या योग्य व्यक्ति से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। याद रखें, पौष्टिक आहार के साथ बिना उचित मात्रा में श्रम, व्यायाम किए स्वस्थ सुडौल बनना नामुमकिन है।
pg. 55
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
उपर्युक्त सुझावों पर अमल करने के बाद दो-तीन माह में आप अपनी सेहत में क्रांतिकारी परिवर्तन देखेंगे। इन उपायों के साथ अपनी प्रकृति को देखते हुए औषधीय प्रयोग के तौर पर निम्न नुस्खों से भी लाभ उठाया जा सकता है—
1 भाग विशुद्ध कासीस भस्म को 16 भाग सुदर्शन चूर्ण के साथ तीन घण्टे तक सूखा मर्दन करके चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में प्रातः सायं जल के साथ सेवन करें। फिर भोजनोपरांत 2-2 ग्राम की 3 मात्रा 10-10 मिनट पर सितोपलादि चूर्ण फॉंक लें। इसके बाद आधे घण्टे तक पानी न पिएं।
इस योग के सेवन से सातवें दिन से ही रक्तवृद्धि होने लगती है। इस कल्प के सेवन से शुक्र की कमजोरी, दुबलापन, आलस्य समाप्त होकर रोगी स्वस्थ, सबल और उत्साहपूर्ण हो जाता है। इस योग का प्रयोग जीर्ण-ज्वर, विषम-ज्वर के उपरांत होने वाली दुर्बलता में विशेष लाभप्रद है।
जनरल टॉनिक
अर्जनारिष्ट, बलारिष्ट, अंगूरासव, अश्वगंधारिष्ट तथा दशमूलारिष्ट— प्रत्येक 500-500 मि.ली.; लौह भस्म, अम्रक भस्म तथा शुद्ध शिलाजीत—10-10 ग्राम।
सभी आसव अरिष्ट एक में मिलाकर उसमें दोनों भस्म व शिलाजीत अच्छी तरह घोल दें। इसे 2 से 4 चम्मच दिन में दो बार बराबर पानी मिलाकर लेना चाहिए।
यह बढिया जनरल टॉनिक है। इससे शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है। थकावट, आलस्य, कमजोरी दूर होकर चुस्ती-फुर्ती व अच्छी नींद आती है।
सफेद मूसली और असगंध समान मात्रा में लेकर कपडछन चूर्ण बनाएं तथा एक छोटी चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करें। इससे मांस और बल दोनों की वृद्धि होती है।
असगंध का चूर्ण सबेरे-शाम 1-1 चम्मच की मात्रा में शहद में मिलाकर चाटने तथा साथ में एक पाव मिश्री मिला गर्म दूध पीते रहने से शरीर का दुबलापन मिटता है।
शतावरी, छिलका रहित कौंच के बीज, सफेद मूसली, असगंध, गोखरू— सभी 100-100 ग्राम।
सभी चीजों को अलग-अलग कूट-पीसकर कपडछन चूर्ण करके मिलाकर रख लें। यह चूर्ण सबेरे-शाम खाली पेट थोड़े देशी घी में 5-5 ग्राम मिलाकर सेवन करें। चाहें तो एक पाव मिश्री मिला गुनगुना दूध पी सकते हैं। शाम वाली खुराक चाहें तो रात में सोने से आधा घण्टे पूर्व भी सेवन कर सकते हैं। अलबत्ता, भोजन किये हुए कम-से-कम दो घण्टे अवश्य बीत गए हों।
इस प्रयोग से दुबलापन दूर होता है, पौरुषशक्ति बढ़ती है। यह काफी पौष्टिक, धातुवर्द्धक और श्रेष्ठ बाजीकारक नुस्खा है। इसे ब्रह्मचर्य के साथ लगभग तीन माह तक प्रयोग करना चाहिए।
pg. 56
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
शरीर दुबला हो और ऐसा किसी विशेष रोग की वजह से न हो तो प्रतिदिन दो पके केले खाकर ऊपर से गर्म मिश्री मिला 1 पाव दूध पिएं। दूध उबालते समय इसमें एक-दो इलायची भी पीसकर मिला दें। तीन चार माह में शरीर मांसल होने लगेगा।
50 ग्राम कच्ची मूँगफली के दानों को तीन-चार घण्टे पानी में भिगोकर छिलका उतारकर पीस लें। अब कढ़ाई में 25 ग्राम देशी घी डालकर धीमी आँच पर सेंकें। जब लालिमा आने लगे तो इसमें 25 ग्राम शक्कर मिलाकर 2 नग छोटी इलाइची पीसकर डाल दें।
इस तरह हलवा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है।
125 ग्राम सालमपंजा तथा 250 ग्राम बादाम मिगी को महीन पीसकर मिला लें।
प्रातः और रात में सोने से पूर्व (भोजन से 2-3 घण्टे बाद) 10-10 ग्राम यह चूर्ण गुनगुने मीठे दूध से सेवन करते रहने से शरीर का दुबलापन व कमजोरी दूर होती है तथा यौनशक्ति बढ़ती है। स्त्री-पुरुष दोनों के लिये उपयोगी है।
छिलका उतारे हुए 60 ग्राम जौ की आधा लीटर दूध में खीर बनाएं और इस खीर का ही नियमित नाश्ता करें। यदि किसी विशेष बीमारी की स्थिति न हो तो दो माह में इस प्रयोग से दुबलापन दूर होने लगता है।
15-20 अच्छे पिंडखजूर, थोड़ी किशमिश, चौथाई चम्मच सोठ व एक-दो छोटी इलायची को एक पाव दूध में उबालें व एक चम्मच घी मिलाकर लगभग दो माह सबेरे नाश्ते के रूप में सेवन करें। शरीर की दुर्बलता दूर होगी। यह प्रयोग कफ, सर्दी को भी दूर करता है।
pg. 57
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
शारीरिक सुन्दरता से कहीं ज्यादा जरूरी है मन और वाणी का सौन्दर्य। बाहरी सुन्दरता तभी तक है जब तक शरीर है, पर मन और वाणी की सुन्दरता चारित्रिक विशेषता है और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर बन जाती है। यही आन्तरिक सौन्दर्य समाज में आपसी सामंजस्य का सबसे बड़ा साधन है। मन और वाणी सुन्दर हों तो न पारिवारिक कलह होंगे, न लड़ाई-झगड़े और न ही दंगे-फ़साद। समाज में आज अगर मार-काट, ठगी-बेईमानी, ईर्ष्या-द्वेष का ही माहौल हर तरफ दिखाई दे रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह मन और वाणी की कुरूपता ही है।
मन के सौन्दर्य का अर्थ यह है कि हमारी भावनाओं में पवित्रता का प्रवाह हो, हम अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित न सोचें और प्राणिमात्र के प्रति हमारी दृष्टि प्रेमपूर्ण हो। वाणी की सुन्दरता यह है कि किसी का दिल दुखाने के लिए कोई बात हम न बोलें। हमारा स्वभाव सत्य बोलने का हो। भाषा इतनी मधुर हो और अपनी बात रखने का ढंग इतना प्यारा हो कि लोग हमारे स्वभाव की प्रशंसा करते न थकें। कल्पना करिए मन और वाणी की यह सौन्दर्य-साधना बचपन से ही सबको कराई जाए तो पूरा समाज ही कितना सुन्दर हो जाए। क्रूरता और हिंसा का तांडव बंद हो जाए और हर तरफ सुख-शांति का साम्राज्य हो।
हालाँकि समाज की वर्तमान दिशा और दशा जैसी है उसमें सभी लोगों का एकदम से चारित्रिक सुधार हो जाना आसान बात नहीं है, फिर भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने स्तर पर यह कोशिश तो शुरू ही कर सकते हैं। अपने-अपने स्तर पर हमारी कोशिशों का असर ही हमारे पास-पड़ोसियों और हमारी संतानों पर भी पड़ेगा। इसी तरह से धीरे-धीरे व्यापक स्तर पर सामाजिक सुधार की नींव पड़ जाएगी। कुछ लोग यह मानते हैं कि जिन लोगों की आदतें एक बार बिगड़ चुकी हैं, वे फिर नहीं सुधर सकते; जिनके मन में ईर्ष्या-द्वेष की आँधी चल रही है, वे नहीं बदल सकते; याकि जिनकी जुबान से कटुता ही टपकती रहती है, वे वाणी का संयम नहीं कर सकते। इसके विपरीत लेखक का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति में आत्मसुधार का भाव पैदा हो जाए तो वह अपने चरित्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। यह बात जरूर है कि कोई भी परिवर्तन सिर्फ इच्छा मात्र से या आनन-फानन में ही नहीं हो जाता। इसके लिए संकल्प और अभ्यास (साधना) अनिवार्य है।
जो लोग ईमानदारी से चाहते हैं कि उनके मन से कुविचारों का झंझावात समाप्त हो जाए शुभ संकल्पों का प्रवाह हो; तथा, उनकी वाणी में मधुरता का वास हो, उनके लिए यहाँ कुछ व्यावहारिक उपाय सुझाए जा रहे हैं। ये उपाय ऐसे हैं, जो सदियों से हमारे पूर्वजों द्वारा आजमाए जाते रहे हैं। वास्तव में भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही चरित्र-सुधार या यूँ कहें कि मनुष्य-निर्माण का एक पूरा सुनियोजित कार्यक्रम ही प्रचलित रहा है और जिसके पालन के संस्कार भी बचपन से ही दिये जाते रहे हैं। इन्हीं संस्कारों के परिणामस्वरूप ही इस देश में अपने स्वार्थों को भुलाकर लोक कल्याण के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे देने वाले लोग घर-घर में ही पैदा होते रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के प्रवाह में फँसकर अपने जीवन मूल्यों को काफी कुछ भुला बैठे हैं और इसी का नतीजा है कि आज देश में गंभीर चारित्रिक संकट उठ खड़ा हुआ है।
pg. 58
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
दरअसल प्राचीन भारत में लोगों की दिनचर्या का प्राण था – योगाभ्यास (पतंजलि निर्देशित) और 'पंच महायज्ञ'। पंचमहायज्ञों का पालन करते हुए योगमय जीवन अपनाने का ही परिणाम था कि भारत 'विश्वगुरु' रहा। जिन्हें योग और पंचमहायज्ञ को समग्रता में जानना हो, उन्हें इस विषय के प्राचीन साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यहाँ सिर्फ़ इतनी सी सामान्य जानकारी अवश्य दी जा सकती है कि ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, बलिवेश्वदेवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा पितृयज्ञ को मिलाकर हमारे शास्त्रों में पंचमहायज्ञ नाम दिया गया है। इनमें से ब्रह्मयज्ञ का उद्देश्य यह था कि हमें जिस सृष्टि रचयिता ने पैदा किया हम उसके प्रति कृतज्ञ रहें, आत्मविश्लेषण करके अपनी कमियों को दूर करें, आत्मिकशक्ति बढ़ाएँ और स्वाध्याय से ज्ञानवृद्धि करें। देवयज्ञ का विधान इसलिए किया गया था कि इस संसार में रहते हुए हम लोग परस्पर सहयोग का तत्त्व सीखें। वैश्वदेवयज्ञ इसलिए किया जाता था कि मनुष्य के अन्दर से अभिमान की भावना दूर रहे। अतिथियज्ञ का उद्देश्य उपदेशकर्ता से ज्ञान प्राप्ति तथा उसकी सेवा करना था। सबसे अन्तिम पितृयज्ञ का विधान इस
ने हमें पाला-पोसा उनके प्रति हम कृतज्ञता की
भावना रखें तथा उनके अनुभवों से अपनी जीवन-यात्रा के लिए ज़रूरी ज्ञान प्राप्त करें।
वास्तव में कोई भी व्यक्ति इन पंचमहायज्ञों के यथार्थ उद्देश्यों को देखकर समझ सकता है कि ये किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए न होकर मानवमात्र के लिए हैं और किसी भी समाज की बेहतरी के लिए आवश्यक हैं। जिनकी रुचि पंचमहायज्ञों के विधि-विधान के बारे में गहरी समझ बनाने की हो, वे चाहें तो स्वामी समर्पणानन्द द्वारा लिखित 'पंचयज्ञ प्रकाश' नामक पुस्तक पढ़ सकते हैं। यह पुस्तक-समर्पण शोध संस्थान, 4/42 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-5, साहिबाबाद, गाजियाबाद (उ.प्र.)-के पते से प्राप्त की जा सकती है।
अब आइए, इस प्राचीन जीवन पद्धति में से हर परिस्थिति के लिए व्यावहारिक कुछ उपायों की चर्चा करें, ताकि जनसामान्य सहजता से इन्हें अपनाकर मन और वाणी के संयम की ओर अपने कदम बढ़ा सकें।
1. यदि अभी तक आपके आहार में तामसिक (मद्य, मांसाहार आदि) चीज़ें शामिल रही हों, तो सबसे पहले इनका सेवन बन्द करिए। यदि आहार सात्विक होगा तो मन और विचारों में भी सात्विकता का प्रवेश आसानी से होगा। आहार के विषय में इस पुस्तक और 'स्वदेशी चिकित्सा-आसान और कारगर नुस्खे' में पर्याप्त जानकारी दी गई है।
2. 6-7 घंटे की पर्याप्त नींद के बाद सबेरे बिस्तर से उठने में यदि आपको आलस्य आता है, तो इस आदत को अविलम्ब त्याग दीजिए। नींद खुलते ही जिसकी असीम कृपा से यह मनुष्य शरीर मिला है, उस परमात्मा को स्मरण करते हुए उठकर बैठ जाइए। दिन भर के ज़रूरी कामों की रूपरेखा बनाइए और ईश्वर को साक्षी मानकर और बिना किसी प्रमाद के उन्हें पूरा करने का संकल्प धारण कीजिए। इतना करने के बाद शौचादि निवृत्ति के लिए जाइए। शौचादि क्रिया के बाद सबेरे स्नान करते हों तो ठीक, अन्यथा हाथ, पैर व मुँह
धोकर मन व विचार की असली सौन्दर्य-साधना के लिए तैयार होइए। इसके लिए आपको बाहर से किसी तरह के अतिरिक्त साधन जुटाने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। ज़रूरत है तो सिर्फ़ प्रतिदिन नियमित रूप से सबेरे-शाम आधा-आधा घंटा समय देने की। इतना समय न दे सकें
pg. 59
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
तो कम से कम 15-20 मिनट तो लगाएं ही। इस समय में आपको नियमित रूप से प्रणव (ओ॒डम्) का अर्थचिन्तन के साथ जप करना है।
जप का तरीका यह है कि सबसे पहले आप पवित्र भाव के साथ सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं। रीढ़ सीधी रखें। अब कम से कम तीन और अभ्यास अच्छा हो तो अधिक से अधिक 21 प्राणायाम करें। इस दौरान ओम् या प्राणायाम मंत्र (ओं भूः ओं भुवः ओं स्वः ओं महः ओं जनः ओं तपः ओं सत्यम्) का मानसिक जाप करते रह सकते हैं। प्राणायाम के बाद लम्बी गहरी साँस लेकर धीरे-धीरे मुँह से साँस छोड़ते हुए 'ओम्' का सस्वर उच्चारण करिए। ओंकार जप के साथ इसका अर्थचिन्तन भी अवश्य करिए। शुरु में 'ओ॒डम्' का उच्चारण करने के बाद थोड़ी देर रुककर अर्थ का विचार कर सकते हैं, बाद में जप के साथ ही अर्थ की भावना करने का भी अभ्यास हो जाता है।
जहाँ तक 'ओ॒डम्' के अर्थ का सवाल है तो इसमें शामिल अकार, उकार और मकार से ईश्वर के वाचक बहुत से नाम बनते हैं, पर सामान्यतः 'ओ॒डम्' के 'सर्वरक्षक' अर्थ की भावना कर सकते हैं। अर्थात् अपनी बुरी आदतों के प्रति प्रायश्चित्त का भाव रखते हुए स्मरण करिए कि परमात्मा सर्वरक्षक है, वह हमारी हर प्रकार के दुर्गुणों से रक्षा करे और हममें भी दूसरों के प्रति रक्षक बनने का भाव प्रबल हो। अलबत्ता, अपनी जिन बुराइयों को आप दूर करना चाहते हैं उन पर क्रमशः एक-एक करके अभ्यास करें और संकल्प के साथ-साथ आत्मसुधार के लिए पुरुषार्थ करें तो एक दिन आप पाएंगे की अपनी तमाम बुरी आदतों पर आपने नियंत्रण कर लिया है। 'ओ॒डम्' का जप आप सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय नियमित करें। जप के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात अर्थ की भावना है। याद रखें कि सिर्फ मिश्री-मिश्री चिल्लाने से मुँह मीठा नहीं होता। इसलिए जो लोग मन्त्रों का सिर्फ उच्चारण करते हैं, उनकी जप क्रिया को निष्फल ही समझिए। चरित्र में सार्थक बदलाव लाने के लिए तो महर्षि पंतजलि के 'तज्जपस्तदर्थावन्म' योगसूत्र के अनुसार ही जप करना चाहिए। जो लोग विधिपूर्वक ध्यान-संध्या करते हैं, उन्हें तो खैर यह सब समझाने की जरूरत ही नहीं है।
3. आपकी जो भी बुरी आदतें हों, उन्हें स्पष्ट रूप से एक पर्ची या डायरी में लिखें। दिन में यदा-कदा इन्हें पढ़ें और दुर्गुणों को दूर करने का संकल्प दोहराएं। मान लीजिए कि आपको गुस्सा बहुत जल्दी आता है तो सबसे पहले ध्यान दीजिए कि आपको किन स्थितियाँ में गुस्सा जल्दी आता है और फिर वैसी स्थितियाँ की संभावना बनते ही अपना संकल्प दोहराना शुरू कर दीजिए और धैर्य से काम लेने की मानसिकता बनाइए। यदि गुस्सा आने ही लगे तो धीरे-धीरे गहरी साँस लेकर धीरे-धीरे ही छोड़ने का प्राणायाम करिए। इससे क्रोध पर काबू पाना आसान हो जाएगा। कुछ दिनों तक जैसे तैसे भी अगर आप यह अभ्यास कर ले गए तो धीरे-धीरे गुस्सा न करने की आपकी सहज प्रवृत्ति ही बन जाएगी। इसी तरह एक-एक कर अपने अन्य दुर्गुणों से भी छुटकारा पा सकते हैं।
की समीक्षा अवश्य करें। जितने अंश में आपको सफलता मिली हो, उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो उसके लिए प्रायश्चित्त का भाव बनाइए और अपनी संकल्प-शक्ति
pg. 60
WWW.RAJIVDIXITJI.COM | AUDIO | VIDEO | ANDROID APP
को और मज़बूत बनाकर 'ओऽम्' का मानसिक जप करते हुए सोने की तैयारी करिए। वैसे तो प्रातःजागरण, शयनकालीन और संध्या के लिए वेदों में बड़े सुन्दर मंत्र हैं, जिनकी विशेष रुचि हो वे अलग से जानकारी कर सकते हैं। इसके अलावा आत्मसुधार के इच्छुक लोगों को महात्मा गाँधी की आत्मकथा(मेरे सत्य के प्रयोग) भी अवश्य पढ़नी चाहिए।
यह मन और विचार को सुन्दर बनाने का अनुभूत अभ्यासक्रम है। लेखक ने ध्यान-संध्या के अभ्यास से अपने कई दुगुणों को दूर भगाने में सफलता पाई है, इसलिए उम्मीद है कि जनसामान्य को भी इस तरह के अभ्यासक्रम से अवश्य ही लाभ होगा।
pg. 61