सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
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दुबलापन भगाइए सौन्दर्य बचाइए
मोटापे की तरह दुबलापन भी एक समस्या है। हालाँकि दुबलेपन की समस्या उतनी बड़ी नहीं है जितनी कि मोटापे की। मोटे लोगों की तुलना में दुबले लोग प्रायः कम ही बीमार पड़ते हैं और उनके ज्यादा दिनों तक जिन्दा रहने की भी संभावना रहती है। फिर भी, अगर देह हड्डियों का कंकाल सा नज़र आए तो समझिए कि कुछ मांसलता लाने की ज़रूरत है। ठीक अनुपात में मांसल शरीर स्वास्थ्य व सौन्दर्य की दृष्टि से उचित है।
आहार-विहार में उचित सुधार करके देह का दुबलापन दूर किया जा सकता है। कुछ लोग वंशगत प्रभाव से दुबले-पतले होते हैं। उनके शरीर की आंतरिक संरचना कुछ ऐसी होती है कि वे कितना भी पौष्टिक खाएँ-पिएँ पर शरीर में चर्बी इकट्ठा ही नहीं हो पाती और चाहकर भी वे मांसल नहीं दिखते। ऐसे लोगों का दुबलापन दूर होना थोड़ा मुश्किल तो है पर असंभव नहीं है।
दुबलापन दूर करने का कार्यक्रम बनाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि कहीं किसी रोग की वजह से तो ऐसा नहीं है। यदि कोई रोग हो तो पहले उसे ठीक करने का उपाय करें। ज्यादा संभव है कि आरोग्य होते ही दुबलापन भी खुद-ब-खुद दूर हो जाएगा। यदि बीमारी ठीक होने के बाद भी दुबलापन बना रहे तो इस अध्याय में दिए उपायों को आजमाकर लाभ उठाएँ। बिना किसी खास बीमारी के होते हुए भी दुबलापन है तो इसके पीछे-कम भोजन करना या भूखे रहना, पौष्टिकता रहित भोजन करना, रात में देर तक जागना, कम विश्राम करना या क्षमता से ज्यादा श्रम करना, ज्यादा उपवास करना, तनाव-चिंता-शोक में जीवन बिताना, पाचनशक्ति कमज़ोर होना आदि कारण हो सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि उक्त कारण जिम्मेदार हों तो दुबलापन दूर करने की कोशिश करने के साथ-साथ इन गड़बड़ियों को भी दूर करना चाहिए और ईर्ष्या, द्वेष, चिंता, शोक, क्रोध से मुक्त होकर प्रसन्नचित्त, उमंग भरा जीवन बिताते हुए निम्न उपाय करने चाहिए—
1— दुबलापन दूर करने की पहली शर्त यह है कि आप अपनी पाचनशक्ति मज़बूत करें ताकि खाया-पिया शरीर में अच्छी तरह ज़ज्ब हो और खुलकर भूख लगे। इसके लिए हफ़्ते भर विधिपूर्वक उपवास कर सकते हैं। तरीका यह है कि जब उपवास करना हो तो एक दिन पहले मूँग की खिचड़ी आदि हल्का भोजन लें। रात में दूध या पानी के साथ 2 चम्मच ईसबगोल, एरण्ड तेल अथवा त्रिफला सेवन करके उदर की सफ़ाई करें। दूसरे दिन रोटी बंद कर दें और मौसमी फलों व उबली हरी साग-सब्जियों पर निर्वाह करें। तीसरे दिन 2-3 घण्टे के अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा करके सिर्फ़ फलों का रस पिएँ। चौथे दिन सिर्फ़ पानी पीकर रहें। साथ में नींबू और शहद ले सकते हैं। पाँचवें दिन पुनः फलों का रस लें। छठे दिन फल व उबली साग-सब्जी पर रहें। सातवें दिन एक-दो चपाती से शुरू करके धीरे-धीरे खुराक बढ़ाएँ। इस उपवास काल में दो-तीन दिन एनिमा द्वारा पेट की सफ़ाई कर लें तो बेहतर परिणाम मिलेगा।
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उपवास करने के बाद प्रायः भूख खूब लगने लगती है और खुराक बढ़ जाती है। इस तरह से बड़ी हुई खुराक दुबलापन दूर करने में अत्यन्त सहायक है।
2— दुबले लोग सबेरे पौष्टिक नाश्ता लें, पर इसका समय भोजन से 3-4 घण्टा पहले और सोकर उठने के 2-3 घण्टे बाद रखें। एक पौष्टिक नाश्ता यह है कि थोड़े चनों में गेहूँ, मूँगफली, मूँग मिलाकर अंकुरित कर लें। इस अंकुरित अन्न में नींबू और थोड़ा नमक निचोड़कर नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। नमक, नींबू न मिलाना चाहें तो इसे गुड़ के साथ या इसमें थोड़ी भिगोई किशमिश व खजूर मिलाकर भी सेवन कर सकते हैं। ऊपर से चाहें तो थोड़ा दूध पिएँ। नमक, नींबू मिलाएँ तो दूध न पिएँ।
इसके अलावा आगे वर्णित खजूर और दूध वाला नाश्ता भी कर सकते हैं या अनुकूल पड़े तो केला-दूध लें। जाड़े के दिनों में उड़द का आटा, बबूल का गोद, देशी घी, अश्वगंधा तथा मेवे मिलाकर बनाया गया लड्डू भी पाचनशक्ति के अनुसार सेवन कर सकते हैं। पौष्टिक नाश्ते और भी कई हैं, उन्हें सोच-समझकर सेवन करके लाभ उठाया जा सकता है।
3— दोपहर और शाम के भोजन में पर्याप्त पौष्टिक पदार्थों का सेवन खूब चबा-चबाकर करें। उपलब्धता के हिसाब से गाजर, पालक, चौलाई, टिण्डा, परवल व विभिन्न हरी सब्जियाँ, मौसमी फल, घी का तड़का लगी दाल, आँवले का murब्बा, दूध, घी, मक्खन, चावल की खीर आदि सेवन करें। रोटियाँ गेहूँ की खाएँ। चाहें तो गेहूँ में तिहाई भाग चने मिलाकर पिसवा लें और इस आटे की रोटी खाएँ। भोजन के बाद एक-दो केले और आगरे का पेठा या आँवले का murब्बा लें तो अच्छा है। रात के भोजन में एकाध रोटी कम खाएँ। भोजन के बाद आगे वर्णित अश्वगंधारिष्ट वाला नुस्खा भी सेवन कर सकते हैं।
4— दोनों भोजनों के बीच 8 घण्टे का अंतर रखते हुए मध्यकाल में किसी मौसमी फल या जूस का हल्का पाचक पौष्टिक अल्पाहार ले सकते हैं।
5— पानी भोजन के डेढ़-दो घण्टे बाद पीने की आदत बनाएँ। इसके अलावा दिन भर में डेढ़-दो घण्टे के अंतराल पर 6-8 गिलास तक खूब पानी पीते रहें।
6— रात में भोजन से दो-तीन घण्टे बाद और सोने से पूर्व गुनगुने दूध में एक चम्मच घी के साथ मिश्री या दो-तीन चम्मच शहद मिलाकर पिएँ। चाहें तो दूध-खजूर वाला आगे लिखा प्रयोग भी कर सकते हैं। सिर्फ़ इतना ध्यान रखें कि रात में यह नुस्खा सेवन करें तो इसमें खजूर की मात्रा सिर्फ़ आठ-दस ही रखें और सबेरे इसे न सेवन करें।
7— इतना उपाय करते हुए सबेरे अपने अनुकूल व्यायाम, योगासन, प्राणायाम अवश्य करें। इस संबंध में किसी पुस्तक या योग्य व्यक्ति से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। याद रखें, पौष्टिक आहार के साथ बिना उचित मात्रा में श्रम, व्यायाम किए स्वस्थ सुडौल बनना नामुमकिन है।
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उपर्युक्त सुझावों पर अमल करने के बाद दो-तीन माह में आप अपनी सेहत में क्रांतिकारी परिवर्तन देखेंगे। इन उपायों के साथ अपनी प्रकृति को देखते हुए औषधीय प्रयोग के तौर पर निम्न नुस्खों से भी लाभ उठाया जा सकता है—
1 भाग विशुद्ध कासीस भस्म को 16 भाग सुदर्शन चूर्ण के साथ तीन घण्टे तक सूखा मर्दन करके चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में प्रातः सायं जल के साथ सेवन करें। फिर भोजनोपरांत 2-2 ग्राम की 3 मात्रा 10-10 मिनट पर सितोपलादि चूर्ण फॉंक लें। इसके बाद आधे घण्टे तक पानी न पिएं।
इस योग के सेवन से सातवें दिन से ही रक्तवृद्धि होने लगती है। इस कल्प के सेवन से शुक्र की कमजोरी, दुबलापन, आलस्य समाप्त होकर रोगी स्वस्थ, सबल और उत्साहपूर्ण हो जाता है। इस योग का प्रयोग जीर्ण-ज्वर, विषम-ज्वर के उपरांत होने वाली दुर्बलता में विशेष लाभप्रद है।
जनरल टॉनिक
अर्जनारिष्ट, बलारिष्ट, अंगूरासव, अश्वगंधारिष्ट तथा दशमूलारिष्ट— प्रत्येक 500-500 मि.ली.; लौह भस्म, अम्रक भस्म तथा शुद्ध शिलाजीत—10-10 ग्राम।
सभी आसव अरिष्ट एक में मिलाकर उसमें दोनों भस्म व शिलाजीत अच्छी तरह घोल दें। इसे 2 से 4 चम्मच दिन में दो बार बराबर पानी मिलाकर लेना चाहिए।
यह बढिया जनरल टॉनिक है। इससे शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है। थकावट, आलस्य, कमजोरी दूर होकर चुस्ती-फुर्ती व अच्छी नींद आती है।
सफेद मूसली और असगंध समान मात्रा में लेकर कपडछन चूर्ण बनाएं तथा एक छोटी चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करें। इससे मांस और बल दोनों की वृद्धि होती है।
असगंध का चूर्ण सबेरे-शाम 1-1 चम्मच की मात्रा में शहद में मिलाकर चाटने तथा साथ में एक पाव मिश्री मिला गर्म दूध पीते रहने से शरीर का दुबलापन मिटता है।
शतावरी, छिलका रहित कौंच के बीज, सफेद मूसली, असगंध, गोखरू— सभी 100-100 ग्राम।
सभी चीजों को अलग-अलग कूट-पीसकर कपडछन चूर्ण करके मिलाकर रख लें। यह चूर्ण सबेरे-शाम खाली पेट थोड़े देशी घी में 5-5 ग्राम मिलाकर सेवन करें। चाहें तो एक पाव मिश्री मिला गुनगुना दूध पी सकते हैं। शाम वाली खुराक चाहें तो रात में सोने से आधा घण्टे पूर्व भी सेवन कर सकते हैं। अलबत्ता, भोजन किये हुए कम-से-कम दो घण्टे अवश्य बीत गए हों।
इस प्रयोग से दुबलापन दूर होता है, पौरुषशक्ति बढ़ती है। यह काफी पौष्टिक, धातुवर्द्धक और श्रेष्ठ बाजीकारक नुस्खा है। इसे ब्रह्मचर्य के साथ लगभग तीन माह तक प्रयोग करना चाहिए।
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शरीर दुबला हो और ऐसा किसी विशेष रोग की वजह से न हो तो प्रतिदिन दो पके केले खाकर ऊपर से गर्म मिश्री मिला 1 पाव दूध पिएं। दूध उबालते समय इसमें एक-दो इलायची भी पीसकर मिला दें। तीन चार माह में शरीर मांसल होने लगेगा।
50 ग्राम कच्ची मूँगफली के दानों को तीन-चार घण्टे पानी में भिगोकर छिलका उतारकर पीस लें। अब कढ़ाई में 25 ग्राम देशी घी डालकर धीमी आँच पर सेंकें। जब लालिमा आने लगे तो इसमें 25 ग्राम शक्कर मिलाकर 2 नग छोटी इलाइची पीसकर डाल दें।
इस तरह हलवा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है।
125 ग्राम सालमपंजा तथा 250 ग्राम बादाम मिगी को महीन पीसकर मिला लें।
प्रातः और रात में सोने से पूर्व (भोजन से 2-3 घण्टे बाद) 10-10 ग्राम यह चूर्ण गुनगुने मीठे दूध से सेवन करते रहने से शरीर का दुबलापन व कमजोरी दूर होती है तथा यौनशक्ति बढ़ती है। स्त्री-पुरुष दोनों के लिये उपयोगी है।
छिलका उतारे हुए 60 ग्राम जौ की आधा लीटर दूध में खीर बनाएं और इस खीर का ही नियमित नाश्ता करें। यदि किसी विशेष बीमारी की स्थिति न हो तो दो माह में इस प्रयोग से दुबलापन दूर होने लगता है।
15-20 अच्छे पिंडखजूर, थोड़ी किशमिश, चौथाई चम्मच सोठ व एक-दो छोटी इलायची को एक पाव दूध में उबालें व एक चम्मच घी मिलाकर लगभग दो माह सबेरे नाश्ते के रूप में सेवन करें। शरीर की दुर्बलता दूर होगी। यह प्रयोग कफ, सर्दी को भी दूर करता है।
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शारीरिक सुन्दरता से कहीं ज्यादा जरूरी है मन और वाणी का सौन्दर्य। बाहरी सुन्दरता तभी तक है जब तक शरीर है, पर मन और वाणी की सुन्दरता चारित्रिक विशेषता है और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर बन जाती है। यही आन्तरिक सौन्दर्य समाज में आपसी सामंजस्य का सबसे बड़ा साधन है। मन और वाणी सुन्दर हों तो न पारिवारिक कलह होंगे, न लड़ाई-झगड़े और न ही दंगे-फ़साद। समाज में आज अगर मार-काट, ठगी-बेईमानी, ईर्ष्या-द्वेष का ही माहौल हर तरफ दिखाई दे रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह मन और वाणी की कुरूपता ही है।
मन के सौन्दर्य का अर्थ यह है कि हमारी भावनाओं में पवित्रता का प्रवाह हो, हम अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित न सोचें और प्राणिमात्र के प्रति हमारी दृष्टि प्रेमपूर्ण हो। वाणी की सुन्दरता यह है कि किसी का दिल दुखाने के लिए कोई बात हम न बोलें। हमारा स्वभाव सत्य बोलने का हो। भाषा इतनी मधुर हो और अपनी बात रखने का ढंग इतना प्यारा हो कि लोग हमारे स्वभाव की प्रशंसा करते न थकें। कल्पना करिए मन और वाणी की यह सौन्दर्य-साधना बचपन से ही सबको कराई जाए तो पूरा समाज ही कितना सुन्दर हो जाए। क्रूरता और हिंसा का तांडव बंद हो जाए और हर तरफ सुख-शांति का साम्राज्य हो।
हालाँकि समाज की वर्तमान दिशा और दशा जैसी है उसमें सभी लोगों का एकदम से चारित्रिक सुधार हो जाना आसान बात नहीं है, फिर भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने स्तर पर यह कोशिश तो शुरू ही कर सकते हैं। अपने-अपने स्तर पर हमारी कोशिशों का असर ही हमारे पास-पड़ोसियों और हमारी संतानों पर भी पड़ेगा। इसी तरह से धीरे-धीरे व्यापक स्तर पर सामाजिक सुधार की नींव पड़ जाएगी। कुछ लोग यह मानते हैं कि जिन लोगों की आदतें एक बार बिगड़ चुकी हैं, वे फिर नहीं सुधर सकते; जिनके मन में ईर्ष्या-द्वेष की आँधी चल रही है, वे नहीं बदल सकते; याकि जिनकी जुबान से कटुता ही टपकती रहती है, वे वाणी का संयम नहीं कर सकते। इसके विपरीत लेखक का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति में आत्मसुधार का भाव पैदा हो जाए तो वह अपने चरित्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। यह बात जरूर है कि कोई भी परिवर्तन सिर्फ इच्छा मात्र से या आनन-फानन में ही नहीं हो जाता। इसके लिए संकल्प और अभ्यास (साधना) अनिवार्य है।
जो लोग ईमानदारी से चाहते हैं कि उनके मन से कुविचारों का झंझावात समाप्त हो जाए शुभ संकल्पों का प्रवाह हो; तथा, उनकी वाणी में मधुरता का वास हो, उनके लिए यहाँ कुछ व्यावहारिक उपाय सुझाए जा रहे हैं। ये उपाय ऐसे हैं, जो सदियों से हमारे पूर्वजों द्वारा आजमाए जाते रहे हैं। वास्तव में भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही चरित्र-सुधार या यूँ कहें कि मनुष्य-निर्माण का एक पूरा सुनियोजित कार्यक्रम ही प्रचलित रहा है और जिसके पालन के संस्कार भी बचपन से ही दिये जाते रहे हैं। इन्हीं संस्कारों के परिणामस्वरूप ही इस देश में अपने स्वार्थों को भुलाकर लोक कल्याण के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे देने वाले लोग घर-घर में ही पैदा होते रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के प्रवाह में फँसकर अपने जीवन मूल्यों को काफी कुछ भुला बैठे हैं और इसी का नतीजा है कि आज देश में गंभीर चारित्रिक संकट उठ खड़ा हुआ है।
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दरअसल प्राचीन भारत में लोगों की दिनचर्या का प्राण था – योगाभ्यास (पतंजलि निर्देशित) और 'पंच महायज्ञ'। पंचमहायज्ञों का पालन करते हुए योगमय जीवन अपनाने का ही परिणाम था कि भारत 'विश्वगुरु' रहा। जिन्हें योग और पंचमहायज्ञ को समग्रता में जानना हो, उन्हें इस विषय के प्राचीन साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यहाँ सिर्फ़ इतनी सी सामान्य जानकारी अवश्य दी जा सकती है कि ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, बलिवेश्वदेवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा पितृयज्ञ को मिलाकर हमारे शास्त्रों में पंचमहायज्ञ नाम दिया गया है। इनमें से ब्रह्मयज्ञ का उद्देश्य यह था कि हमें जिस सृष्टि रचयिता ने पैदा किया हम उसके प्रति कृतज्ञ रहें, आत्मविश्लेषण करके अपनी कमियों को दूर करें, आत्मिकशक्ति बढ़ाएँ और स्वाध्याय से ज्ञानवृद्धि करें। देवयज्ञ का विधान इसलिए किया गया था कि इस संसार में रहते हुए हम लोग परस्पर सहयोग का तत्त्व सीखें। वैश्वदेवयज्ञ इसलिए किया जाता था कि मनुष्य के अन्दर से अभिमान की भावना दूर रहे। अतिथियज्ञ का उद्देश्य उपदेशकर्ता से ज्ञान प्राप्ति तथा उसकी सेवा करना था। सबसे अन्तिम पितृयज्ञ का विधान इस
ने हमें पाला-पोसा उनके प्रति हम कृतज्ञता की
भावना रखें तथा उनके अनुभवों से अपनी जीवन-यात्रा के लिए ज़रूरी ज्ञान प्राप्त करें।
वास्तव में कोई भी व्यक्ति इन पंचमहायज्ञों के यथार्थ उद्देश्यों को देखकर समझ सकता है कि ये किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए न होकर मानवमात्र के लिए हैं और किसी भी समाज की बेहतरी के लिए आवश्यक हैं। जिनकी रुचि पंचमहायज्ञों के विधि-विधान के बारे में गहरी समझ बनाने की हो, वे चाहें तो स्वामी समर्पणानन्द द्वारा लिखित 'पंचयज्ञ प्रकाश' नामक पुस्तक पढ़ सकते हैं। यह पुस्तक-समर्पण शोध संस्थान, 4/42 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-5, साहिबाबाद, गाजियाबाद (उ.प्र.)-के पते से प्राप्त की जा सकती है।
अब आइए, इस प्राचीन जीवन पद्धति में से हर परिस्थिति के लिए व्यावहारिक कुछ उपायों की चर्चा करें, ताकि जनसामान्य सहजता से इन्हें अपनाकर मन और वाणी के संयम की ओर अपने कदम बढ़ा सकें।
1. यदि अभी तक आपके आहार में तामसिक (मद्य, मांसाहार आदि) चीज़ें शामिल रही हों, तो सबसे पहले इनका सेवन बन्द करिए। यदि आहार सात्विक होगा तो मन और विचारों में भी सात्विकता का प्रवेश आसानी से होगा। आहार के विषय में इस पुस्तक और 'स्वदेशी चिकित्सा-आसान और कारगर नुस्खे' में पर्याप्त जानकारी दी गई है।
2. 6-7 घंटे की पर्याप्त नींद के बाद सबेरे बिस्तर से उठने में यदि आपको आलस्य आता है, तो इस आदत को अविलम्ब त्याग दीजिए। नींद खुलते ही जिसकी असीम कृपा से यह मनुष्य शरीर मिला है, उस परमात्मा को स्मरण करते हुए उठकर बैठ जाइए। दिन भर के ज़रूरी कामों की रूपरेखा बनाइए और ईश्वर को साक्षी मानकर और बिना किसी प्रमाद के उन्हें पूरा करने का संकल्प धारण कीजिए। इतना करने के बाद शौचादि निवृत्ति के लिए जाइए। शौचादि क्रिया के बाद सबेरे स्नान करते हों तो ठीक, अन्यथा हाथ, पैर व मुँह
धोकर मन व विचार की असली सौन्दर्य-साधना के लिए तैयार होइए। इसके लिए आपको बाहर से किसी तरह के अतिरिक्त साधन जुटाने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। ज़रूरत है तो सिर्फ़ प्रतिदिन नियमित रूप से सबेरे-शाम आधा-आधा घंटा समय देने की। इतना समय न दे सकें
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तो कम से कम 15-20 मिनट तो लगाएं ही। इस समय में आपको नियमित रूप से प्रणव (ओ॒डम्) का अर्थचिन्तन के साथ जप करना है।
जप का तरीका यह है कि सबसे पहले आप पवित्र भाव के साथ सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं। रीढ़ सीधी रखें। अब कम से कम तीन और अभ्यास अच्छा हो तो अधिक से अधिक 21 प्राणायाम करें। इस दौरान ओम् या प्राणायाम मंत्र (ओं भूः ओं भुवः ओं स्वः ओं महः ओं जनः ओं तपः ओं सत्यम्) का मानसिक जाप करते रह सकते हैं। प्राणायाम के बाद लम्बी गहरी साँस लेकर धीरे-धीरे मुँह से साँस छोड़ते हुए 'ओम्' का सस्वर उच्चारण करिए। ओंकार जप के साथ इसका अर्थचिन्तन भी अवश्य करिए। शुरु में 'ओ॒डम्' का उच्चारण करने के बाद थोड़ी देर रुककर अर्थ का विचार कर सकते हैं, बाद में जप के साथ ही अर्थ की भावना करने का भी अभ्यास हो जाता है।
जहाँ तक 'ओ॒डम्' के अर्थ का सवाल है तो इसमें शामिल अकार, उकार और मकार से ईश्वर के वाचक बहुत से नाम बनते हैं, पर सामान्यतः 'ओ॒डम्' के 'सर्वरक्षक' अर्थ की भावना कर सकते हैं। अर्थात् अपनी बुरी आदतों के प्रति प्रायश्चित्त का भाव रखते हुए स्मरण करिए कि परमात्मा सर्वरक्षक है, वह हमारी हर प्रकार के दुर्गुणों से रक्षा करे और हममें भी दूसरों के प्रति रक्षक बनने का भाव प्रबल हो। अलबत्ता, अपनी जिन बुराइयों को आप दूर करना चाहते हैं उन पर क्रमशः एक-एक करके अभ्यास करें और संकल्प के साथ-साथ आत्मसुधार के लिए पुरुषार्थ करें तो एक दिन आप पाएंगे की अपनी तमाम बुरी आदतों पर आपने नियंत्रण कर लिया है। 'ओ॒डम्' का जप आप सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय नियमित करें। जप के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात अर्थ की भावना है। याद रखें कि सिर्फ मिश्री-मिश्री चिल्लाने से मुँह मीठा नहीं होता। इसलिए जो लोग मन्त्रों का सिर्फ उच्चारण करते हैं, उनकी जप क्रिया को निष्फल ही समझिए। चरित्र में सार्थक बदलाव लाने के लिए तो महर्षि पंतजलि के 'तज्जपस्तदर्थावन्म' योगसूत्र के अनुसार ही जप करना चाहिए। जो लोग विधिपूर्वक ध्यान-संध्या करते हैं, उन्हें तो खैर यह सब समझाने की जरूरत ही नहीं है।
3. आपकी जो भी बुरी आदतें हों, उन्हें स्पष्ट रूप से एक पर्ची या डायरी में लिखें। दिन में यदा-कदा इन्हें पढ़ें और दुर्गुणों को दूर करने का संकल्प दोहराएं। मान लीजिए कि आपको गुस्सा बहुत जल्दी आता है तो सबसे पहले ध्यान दीजिए कि आपको किन स्थितियाँ में गुस्सा जल्दी आता है और फिर वैसी स्थितियाँ की संभावना बनते ही अपना संकल्प दोहराना शुरू कर दीजिए और धैर्य से काम लेने की मानसिकता बनाइए। यदि गुस्सा आने ही लगे तो धीरे-धीरे गहरी साँस लेकर धीरे-धीरे ही छोड़ने का प्राणायाम करिए। इससे क्रोध पर काबू पाना आसान हो जाएगा। कुछ दिनों तक जैसे तैसे भी अगर आप यह अभ्यास कर ले गए तो धीरे-धीरे गुस्सा न करने की आपकी सहज प्रवृत्ति ही बन जाएगी। इसी तरह एक-एक कर अपने अन्य दुर्गुणों से भी छुटकारा पा सकते हैं।
की समीक्षा अवश्य करें। जितने अंश में आपको सफलता मिली हो, उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो उसके लिए प्रायश्चित्त का भाव बनाइए और अपनी संकल्प-शक्ति
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को और मज़बूत बनाकर 'ओऽम्' का मानसिक जप करते हुए सोने की तैयारी करिए। वैसे तो प्रातःजागरण, शयनकालीन और संध्या के लिए वेदों में बड़े सुन्दर मंत्र हैं, जिनकी विशेष रुचि हो वे अलग से जानकारी कर सकते हैं। इसके अलावा आत्मसुधार के इच्छुक लोगों को महात्मा गाँधी की आत्मकथा(मेरे सत्य के प्रयोग) भी अवश्य पढ़नी चाहिए।
यह मन और विचार को सुन्दर बनाने का अनुभूत अभ्यासक्रम है। लेखक ने ध्यान-संध्या के अभ्यास से अपने कई दुगुणों को दूर भगाने में सफलता पाई है, इसलिए उम्मीद है कि जनसामान्य को भी इस तरह के अभ्यासक्रम से अवश्य ही लाभ होगा।
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द्वितीय खण्ड
कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से सावधान !
एक फोटो स्टूडियो वाले ने एक ही साइज़ के फोटो खिंचवाने के तीन रेट लिख रखे थे—10 रु., 20 रु. और 30 रु.। एक ग्राहक ने उत्सुकता जताते हुए पूछा — क्यों जनाब ! एक ही साइज़ के फोटो उतारने के तीन तरह के रेट क्यों लिख रखे हैं? क्या लोग इतने मूर्ख हैं, कि जो फोटो 10 रु. में उतर सकता है, उसके 30 रु. दें? फोटोग्राफर बोला—देखिए महाशय, लोग मूर्ख हैं या बुद्धिमान, इस पर तो मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, पर इतना सत्य जानें कि जब से मैंने स्टूडियो खोला है तब से जितने भी ग्राहक आ रहे हैं, सब खिंचवाते 30 रु. रेट वाला ही फोटो हैं। आज तक कोई 10 रु. या 20 रु. वाला फोटो खिंचवाने को तैयार नहीं हुआ। ग्राहक चकित होकर बोला—क्यों भई ऐसा क्यों? तो फोटोग्राफर ने समझाते हुए कहा— इसकी वजह यह है कि 10 रु. वाला फोटो वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप वास्तव में हैं, 20 रु. वाला वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप दिखाई देते हैं; और 30 रु. वाला वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप दिखाई देना पसन्द करते हैं। दरअसल कोई भी वैसा दिखना नहीं चाहता जैसा वास्तव में होता है या जैसा दिखता है और इसलिए सब 30 रु. देकर वैसा ही फोटो उतरवाते हैं जैसे कि वे दिखाई देना पसन्द करते हैं।
यह बोधकथा जिस मानसिकता को उजागर करती है, यह वास्तव में वही मानसिकता है जिसके चलते भाँति-भाँति के कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों की बाढ़ सी आ गई है। लोग दरअसल जैसा दिखना पसन्द करते हैं, वैसा दिखने के लिए ही तरह-तरह के बाजारू सौन्दर्य प्रसाधनों को आजमाने में लगे हुए हैं। गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह ब्यूटी पालर खुलने लगे हैं तो इसकी भी वजह वही है। यूँ सुन्दर दिखना कोई बुरी बात नहीं है, पर सुन्दरता में इतनी कृत्रिमता आ जाए, सौन्दर्यबोध विकृत हो जाए और दो पल की चमक-दमक के पीछे लोग प्रकृति, स्वास्थ्य और अपनी संस्कृति तक भूल जाएं, तो बात चिन्ताजनक हो जाती है। महिलाएं जिस तरह से इस बाजारू सौन्दर्य के मायाजाल में फँस रही है वह ज्यादा गंभीर स्थिति है, इसलिए कि महिलाएं ही वास्तव में सांस्कृतिक परम्पराओं के निर्वहन का सबसे अहम दायित्व निभाती रही हैं।
लेखक देश की नारियों को इस बात के लिए सचेत करना अपना कर्तव्य मानता है कि अगर वे बाजारू सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे की पागल दौड़ में शामिल हो रही हैं तो निश्चित जान लें कि
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वर्तमान और भावी पीढ़ियों के चारित्रिक पतन की आधारभूमि भी तैयार कर रही हैं। इसके अलावा बनावटी सौन्दर्य के इस पश्चिमी तौर-तरीके के चलते सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण के लिए जिस तरह से जीव-जन्तुओं की बड़े पैमाने पर क्रूर हत्याएं की जा रही हैं, वह भी निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के खिलाफ है। होठों को लिपिस्टिक से लाल करते समय यह बात एक बार जरूर याद कर लेना चाहिए कि इसे बनाने के लिए जाने कितने पशु-पक्षियों का खून निचोड़ा गया होगा। संवेदनशील व्यक्ति के लिए कितना हृदय विदारक दृश्य होता होगा जबकि 'स्लेण्डलोरिस' नामक बन्दर की आँखें और दिल निकालकर बेस पाउडर जैसी चीजें बनाने में इस्तेमाल की जाती होंगी। भाँति-भाँति के इत्रों की खुशबुओं में तर रहने वाले लोगों को शायद ही मालूम होगा कि बिज्जू को बेंतां से पीटा जाता है और उसकी ग्रन्थियों को चाकू से खरांचा जाता है तो वह व्यग्र होकर एक प्रकार का स्राव छोड़ता है। इसी स्राव को इकट्ठा करके इस्तेमाल किया जाता है। तालाबां से कछुए पकड़कर मारना और उनका तेल निकालकर सौन्दर्य प्रसाधन निर्माताओं को बेचना तो जैसे कुछ जातियों का पेशा ही बनता जा रहा है। स्थिति यह है सौन्दर्य प्रसाधनों के अंधाधुंध व्यापार के चलते जीव-जन्तुओं की तमाम प्रजातियाँ विलुप्त के कगार पर पहुँच गई हैं।
इस तरह के बाकी सारे मुद्दों को किनारे रखते हुए सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो भी कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से यथासंभव दूरी बनाये रखने में ही भलाई है। भाँति-भाँति के शैम्पू, साबुन, क्रीम, फेस पाउडर, टेलकम पाउडर, नेल पालिश, पालिश रिमूवर, हेअर डाई, हैंड व बाडी लोशन, आई लाइनर, हेअर रिमूवर, हेअर स्प्रे, आई शैडो, लिपिस्टिक, परफ्यूम आदि जितनी भी सौन्दर्य प्रसाधन की चीजें हैं, ज्यादातर में हानिकारक किस्म के रसायन होते हैं। लिपिस्टिक में इस्तेमाल किये जाने वाले रसायन इतने नुकसानदेह होते हैं कि अक्सर इनके प्रभाव से होठों का प्राकृतिक रंग तक समाप्त हो जाता है और उन पर सफेद धब्बे उभर आते हैं। महिलाओं के होठों के काले पड़ जाने के पीछे भी सबसे बड़ा कारण रसायन मिश्रित लिपिस्टिक ही है। लिपिस्टिक में कई तरह के अघुलनशील एवं अखाद्य रंग आदि पदार्थ मिले होते हैं। इनमें मिलाए जाने वाले मोम, सीसा और कैडमियम जैसे पदार्थ भी शरीर के लिए नुकसानदेह ही होते हैं। ये पदार्थ होठों के सहारे पेट में पहुँचते हैं तो शारीरिक विकृतियों, एलर्जी तथा कैंसर जैसे रोगों के कारण बनते हैं। एओसिन, एमरेन्थ, बिस्मथ, रोडोगाइन-बी, टारटूजीन, लैनोनिन सरीखे तत्व भी हर तरह से हानिकारक ही हैं। एमरेन्थ तो प्रजजन प्रणाली तक में विकृतियाँ पैदा कर देता है।
यह भी एक भ्रम है कि सख्त नाखूनों के ऊपर लगे होने के कारण नेल पालिश से कोई नुकसान नहीं हो पाता। वास्तव में नेल पालिश में कई तरह के जटिल रसायन मिले होते हैं। ऐसे में इसके नियमित इस्तेमाल से नाखून रोगग्रस्त हो सकते हैं। नेल पालिश नाखूनों की प्राकृतिक चमक को तो नष्ट करता ही है, वे कमजोर होकर टूटने लगते हैं और खुरदुरेपन के शिकार भी हो सकते हैं। इसी तरह नेल पालिश रिमूवर के इस्तेमाल से भी नाखून और समीप की त्वचा पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
सुहाग के प्रतीक के तौर पर प्रयोग किया जाने वाला सिन्दूर आज जिस तरह से बनाया जाता है वह भी कम घातक नहीं है। सिन्दूर में प्रायः बेहद खतरनाक किस्म का रसायन लेड
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आक्साइड मिला होता है। इसका विषैला प्रभाव कैंसरकारक तो है ही, यह रक्त में पहुँचकर हीमोग्लोबिन के निर्माण को प्रभावित करके रक्ताल्पता भी पैदा कर सकता है। गर्भस्थ शिशु भी इससे प्रभावित हो सकता है। इसलिए एक तो महिलाएं रसायन मिश्रित सिन्दूर की जगह माँग में प्राकृतिक लालिमा लगाएं तो अति उत्तम; अन्यथा, सिन्दूर लगाएं भी तो कम से कम मात्रा में लगाएं और जिस हाथ से लगाएं उस हाथ को अच्छी तरह से अवश्य धो लें। सिन्दूर की ही भाँति आजकल बाजारों में बिकने वाला सुरमा भी अक्सर अपमिश्रित होता है। आजकल के सुरमा निर्माता कम लागत में ज्यादा मुनाफा बटोरने के लोभ में प्राकृतिक उपादानों के बजाय लेड सल्फाइड जैसे जहरीले रसायन इस्तेमाल करने लगे हैं। लगभग ऐसा ही हाल काजल का भी है। आँखें कजारी करने के चक्कर में कई बार आँखों की रोशनी तक चली जा सकती है। बेहतर है कि काजल या सुरमा घर में ही शुद्धता से बना लिया जाय। बाज़ार से खरीदना पड़े तो विश्वसनीय आयुर्वेदिक सुरमा या काजल ही लेना चाहिए। माथे पर लगाई जाने वाली छोटी सी बिन्दी के पीछे चिपकाने के लिए लगा गोंद अगर अच्छे दर्जे का न हो तो वह भी नुकसानदेह हो सकता है। जहाँ बिन्दी चिपकाई जाती है वहाँ की खाल उधड़ सकती है, खुजली हो सकती है और दूसरे किस्म के चर्मरोग भी हो सकते हैं। इसलिए बिन्दी लगाने में भी सावधानी बरतने की जरूरत है।
तमाम तरह के सुगन्धित सौन्दर्य प्रसाधन शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। इस तरह के प्रसाधनों के निर्माण में लगभग 5000 प्रकार के घटक द्रव्य इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें से कोई भी घटक त्वचा में एलर्जी, जलन या विकार पैदा कर सकता है। आजकल पसीना निरोधक प्रसाधनों का व्यापक उपयोग होने लगा है। ऐसे प्रसाधनों को लगाने से त्वचा के रोमछिद्र बन्द हो जाते हैं और पसीने के जरिए शरीर के विजातीय तत्त्व बाहर नहीं निकल पाते। नतीजन, त्वचा पर बुरा असर तो होता ही है, गुर्दों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है और वे विकारग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे प्रसाधनों में प्रायः आक्सीक्विनोलिन सल्फा नामक रसायन मिला रहता है जो केन्द्रीय नाड़ी संस्थान पर बुरा प्रभाव डालता है। इसके अलावा इस तरह के प्रसाधनों में ज़िंक सल्फोकार्बोनेट, प्रोपेलेनि ग्लाइकोल, कास्टिक, बेंजोइक अम्ल, फ्लोरल हाइड्रेट तथा फार्मैलिडहाइड जैसे हानिकारक रसायन भी मिले होते हैं, जो त्वचा में जलन, एलर्जी या दूसरी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इनमें से फार्मैलिडहाइड शैम्पू, एण्टिसेप्टिक क्रीम, प्रिजर्वेटिव, नाखूनों को सख्त बनाने वाले घोलों, स्नानघर में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों आदि में भी मिलाया जाता है। इसका विषैला प्रभाव कैंसर रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी कर रहा है।
बालों को खिज़ाब (हेअर डाई) से रंगने का प्रचलन जिस स्फ़ुतार से बढ़ रहा है, वह भी कम हानिकारक नहीं है। खिज़ाब में मिला हुआ विषैला रसायन पैराफिनेलेन डाई एमीन रोग प्रतिरक्षक प्रणाली पर बुरा प्रभाव डालता है। इसमें कई ऐसे रसायन मिले होते हैं जो शरीर में एलर्जी की समस्या पैदा कर सकते हैं। कई खिज़ाब त्वचा में जलन, पीड़ा व चकत्ते की समस्या उत्पन्न करते हैं। खिज़ाब की गन्ध से सर्दी-जुकाम की भी समस्या पैदा हो सकती है। इसी तरह से मिनी आक्सीडिल रसायन मिले हुए हेअर क्रीम व लोशन के अधिक इस्तेमाल से सिर में भारीपन, झनझनाहट, धमक व झंझलाहट बढ़ती है व निम्न रक्तचाप हो सकता है।
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ब्यूटी पार्लरों की दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती तादाद को देखते हुए इनके भी नुकसानदेह पक्ष पर एक नजर डालना जरूरी है। ब्यूटी पार्लरों के सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रमुख रूप से अमोनिया, हाइड्रोजन-पर-आक्साइड, चर्बी, एसीटोन वैक्सीन, वैसलीन, ज़िंक, स्पिरिट, अल्कोहल, ग्रीस जैसे पदार्थ प्रयोग किये जाते हैं। वास्तव में ये सभी चीज़ें त्वचा को किसी न किसी प्रकार से हानि पहुँचाती हैं। त्वचा में निखार लाने के लिए ब्लैचिंग की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसमें अमोनिया का इस्तेमाल होता है और यह त्वचा को जलाकर कड़ी कर देता है। बालों को काला करने के लिए ब्यूटी पार्लरों में हाइड्रोजन पर-आक्साइड और आर्गनिक हाइड्रोकार्बन जैसे रसायन प्रयोग किए जाते हैं। ये इतने नुकसानदेह होते हैं कि बालों का झड़ना और पकना दोनों ही तेज़ हो जाते हैं। हेअर स्प्रे जैसे साधनों से भी सिर में जलन और सूजन की समस्या पैदा हो सकती है।
कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के इतने सारे नुकसानों को जानने के बाद भी अगर लोग इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से बाज़ न आएँ और ब्यूटी पार्लरों के चक्कर लगाएँ तो इसे एक तरह के पागलपन के अलावा और क्या कहा जा सकता है? वास्तव में कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे भागने के बजाय नींबू, खीरा, नीम, तुलसी, बेसन, गुलाबजल, चन्दन, चिरौंजी, दूध, हल्दी, दही, बादाम आदि ढेरों प्राकृतिक चीज़ों के सहारे सौन्दर्य को ज्यादा बेहतर तरीके से निखारा जा सकता है। यह भी मज़े की बात है कि जो फिल्मी अभिनेत्रियाँ कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का दिन-रात विज्ञापन करती नज़र आती हैं वे खुद निजी तौर पर इनसे दूर ही रहती हैं। पत्रिकाओं-अख़बारों में प्रकाशित होने वाले अभिनेत्रियों के व्यक्तिगत साक्षात्कारों से इस तथ्य का खुलासा होता है कि वे अपना रूप और लावण्य बनाये रखने के लिए प्राकृतिक-आयुर्वेदिक उपायों को ही प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में देश की नारियों को विशेष रूप से चाहिए कि वे विज्ञापनी मायाजाल से बाहर आएँ और कृत्रिमता से दूर हटकर प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधनों को अपनाएँ। इस तरह से यदि देश की स्त्रियाँ ऐसा करने लगेँ तो वे अपने स्वास्थ्य और अपनी संस्कृति दोनों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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सुन्दरता का शत्रु है साबुन
दुनिया का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा, जहाँ साबुन का साम्राज्य न फैला हुआ हो। आज की पीढ़ी को नहाने के समय साबुन की ज़रूरत कुछ वैसे ही महसूस होती है जैसे कि भूख के समय भोजन की। शायद ही इने-गिने लोग हों जो साबुन के गुलाम न होंगे। आदत तो कुछ ऐसी हो गई है कि अगर एक-दो दिन भी बगैर साबुन के नहाना पड़ जाय तो लगता है कि जैसे कई दिनों से शरीर पर पानी ही न पड़ा हो।
वास्तव में विज्ञापनी मायाजाल ने साबुन को हमारी अनिवार्यताओं में शामिल कर दिया है। अन्यथा, त्वचा के स्वास्थ्य की दृष्टि से साबुन एकदम गैरज़रूरी और नुकसानदेह चीज़ है। साबुन में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन तमाम चर्मरोगों के कारण बनते हैं। हालाँकि जैसे-जैसे की स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है वैसे-वैसे त्वचा के प्रति अहानिकर होने का दावा करने वाले साबुनों की संख्या भी बढ़ने लगी है। कई साबुन निर्माता दावा करते हैं कि उनका साबुन रसायन मुक्त है या जड़ी-बूटियां के मिश्रण से बनाया गया है, परंतु यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि उच्च से उच्च कोटि के साबुन में भी झाग पैदा करने के लिए कम से कम एक नुकसानदेह रसायन एस.एल.एस. (सोडियम लॉरेल सल्फेट) तो प्रायः मिलाया ही जाता है। अलबत्ता, कुछ निर्माता साबुन या शैम्पू के रैपर पर जड़ी-बूटियां की लंबी फेहरिस्त तो लिखते हैं पर हानिप्रद रसायन मिलाने के बावजूद इनका नाम नहीं देते। भक्त किस्म के जो लोग साबुन मल-मलकर नहाने के बाद पवित्र (?) होकर घंटों भजन-पूजन करते हैं, उन्हें यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि ज्यादातर साबुनों में बूचड़खानों से भारी मात्र में निकली चर्बी धड़ल्ले से मिलाई जाती है।
जो लोग यह सोचकर शरीर पर साबुन मलते हैं कि इससे मैल साफ होती है या सौन्दर्य में निखार आता है, वे बहुत हद तक भ्रम में जीते हैं। याद रखें कि साबुन से अगर कुछ ऊपरी गंदगी साफ होती है तो रसायनों की कहीं ज्यादा खतरनाक गंदगी त्वचा के रोम छिद्रों से शरीर के भीतर भी प्रवेश कर जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आजकल की अपने को सभ्य और आधुनिक समझने वाली कई माँएं अपने नन्हे-मुन्ने शिशुओं तक को भाँति-भाँति के साबुनों से खूब रगड़-रगड़कर इसलिए नहलाती हैं कि इससे धीरे-धीरे उनके वर्ण में कुछ निखार आ जाएगा। अब इन सभ्य किस्म की मूर्ख माताओं को कौन समझाए कि अपने बच्चों का हित साधने की कोशिश में वे उनका अहित ही कर रही हैं। साबुन रगड़ने से रंग सुधरने के बजाय त्वचा कुछ बदरंग ही होगी, यह तय है। भाँति-भाँति के 'बेबी-सोप' भी अंततः निरापद नहीं हैं।
गौर करने वाली बात यह भी है कि जो फिल्मी हिरोइनें साबुनों के लुभावने विज्ञापनों में नज़र आती हैं वे ही अपनी असली जिन्दगी में उन साबुनों को इस्तेमाल करने लायक नहीं समझतीं। साबुन के बजाय अपनी सौन्दर्य-रक्षा के लिए वे प्राकृतिक और घरेलू तरीके ही ज्यादा अपनाती हैं।
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साबुन विरोधी इतनी बातों के बाद सवाल यह है कि अब अगर साबुन न लगाएँ तो कैसे नहाएँ ? साबुन लगाने की जिनकी रोज की आदत है, उनके लिए बगैर साबुन के स्नान की कल्पना तो और भी कष्टदायी है। पर यह वास्तव में एकदम से मुश्किल नहीं है। मन को थोड़ा दृढ़ कर लीजिए तो साबुन की ज़रूरत बड़ी आसानी से समाप्त हो जाएगी। त्वचा प्रकरण में वर्णित नुस्खों में साबुन के कई बेहतर घरेलू विकल्प मिल जाएँगे। उन्हें इस्तेमाल करके त्वचा के सौन्दर्य की ज्यादा अच्छी देखभाल की जा सकती है। यूँ शरीर पर कुछ भी न लगाएँ तो भी नहाते समय गीले तौलिये से रगड़-रगड़कर त्वचा की सफाई कर लेना पर्याप्त है। अगर तेल मालिश करते हों तो एक छोटी तौलिया अलग से रखें। स्नान के बाद इसी सूखी तौलिया से शरीर को रगड़-रगड़कर पांछ लें, तो आपकी त्वचा स्निग्ध और स्वस्थ तो बनेगी ही और साबुन की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। इसके अलावा सुविधा हो तो बेसन, मुलतानी मिट्टी और कई तरह के उबटन बेहतर विकल्प हैं। इनकी विधियाँ इसी पुस्तक के 'त्वचा प्रकरण' और 'स्वदेशी चिकित्सा' नामक पुस्तक में वर्णित हैं। आगे के पृष्ठों पर वर्णित दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने का नुस्खा भी आजमा सकते हैं। अब यदि इतने पर भी साबुन को अलविदा कह पाना मुश्किल ही लग रहा हो तो नीम, रीठा, शिकाकाई आदि जड़ी-बूटियों के योग से बने कुछ अच्छे किस्म के साबुन यदा-कदा इस्तेमाल किए जा सकते हैं। बच्चों के लिए साबुन के बजाय स्नान कराने से पहले उबटन लगाना सबसे अच्छा उपाय है।
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टूथब्रशः स्वास्थ्य का साधन या रोगाणुओं की सराय
हमेशा स्वास्थ्यप्रद आहार-विहार का पालन करने वाले भी अगर अचानक बीमार पड़ जाएं उनकी बीमारी रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले उन्हीं के टूथब्रश से उपहार में मिल गई हो। जी हाँ, दाँतों, मसूड़ों को स्वस्थ, सुंदर रखने की मंशा से अपनाया जाने वाला स्वास्थ्य का यह साधन कभी भी बीमारियों की सौगात ला सकता है।
यह ताज्जुब की बात जरूर लग सकती है, पर है एकदम सच। और, यह आश्चर्यजनक खोज की है स्वानंद अनुसंधान पीठम, पुणे के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की एक टीम ने। आजादी बचाओ आन्दोलन के यवतमाल (महाराष्ट्र) जिले के वरिष्ठ कार्यकर्ता जितेन्द्र लोड्या और उनके चिकित्सा विशेषज्ञ साथियों की टीम फिलहाल टूथब्रश के नुकसानदेह पहलुओं को काफी गम्भीरता से आमजन के बीच उजागर करने में लग गए हैं। शुरुआती दौर में ही टूथब्रश में पनपने वाली कई बीमारियों के जीवाणु ढूँढ़ निकाले गये हैं। इनमें हैजा जैसे संक्रामक रोगों तक के भी जीवाणु शामिल हैं। सेहत बरकरार रखने के नाम पर पूरी दुनिया में इस्तेमाल हो रहे टूथब्रश के कई दूसरे नुकसान तो खेर पूरी रिपोर्ट आ जाने के बाद ही पता चलेंगे, पर शुरुआती सूचनाओं से ही ख़तरे का संकेत तो मिल ही जाता है।
टूथब्रश और टूथपेस्ट जैसी चीजों के परीक्षण में लगे चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार मुँह से निकली गन्दगी की एक परत दरअसल टूथब्रश में नीचे की ओर ब्रश की जड़ों में धुलने के बाद भी अक्सर जमी ही रहती है। अब ऐसा तो होता नहीं कि ब्रश करने के बाद आप पानी गरम करें
टूथब्रश अच्छी तरह धुलकर रखें। यूँ गरम पानी से भी कोई गारण्टी नहीं है कि ब्रश की जड़ें ठीक से धुल ही जाएँ। वैसे भी काफी साफ़-सुथरी चिकनी चीजों को लगातार पानी से साफ़ करते रहने पर भी हफ़्ते दो हफ़्ते में जब साबुन वगैरह से अच्छी तरह रगड़ने की जरूरत महसूस होने लगती है, तो फिर साल-छः महीने लगातार इस्तेमाल होने वाले टूथब्रश को साफ़ रख पाना कितना कठिन होगा, यह समझा जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रश की जड़ों में जमी गन्दगी तरह-तरह की बीमारियों के जीवाणुओं के पनपने का अच्छा साधन है। इसके अलावा टूथब्रश सामान्यतः बाथरूम में लगे किसी स्टैंपड पर ही रखे जाते हैं। आधुनिकता के चलते लैट्रिन और बाथरूम अक्सर एक साथ जुड़े तो रहते ही हैं। ऐसे में पूरे घर में तरह-तरह के रोगाणुओं की संभावना वाली एकमात्र यही जगह है। स्पष्टतः यहाँ रखे टूथब्रश में जमे अन्न-कण रोगाणुओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बड़ी आसानी से बन ही जाते हैं और इस तरह इनका हमारे शरीर में पहुँचना एकदम आसान हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि तमाम तकनीकी बाजीगरी दिखाने के बावजूद भाँति-भाँति के टूथब्रश अंततः निरापद नहीं ही हैं।
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स्वास्थ्य की दृष्टि से निश्चित रूप से सबसे अच्छा उपाय नीम या बबूल की दातून है, पर दुर्भाग्य कि मुनाफ़ाखोरों की बिरादरी ने आधुनिकता और क्वालिटी के नाम पर दातून को दकियानूसी और घटिया प्रचारित कर-करके उसे हाशिए पर पहुँचा दिया। आज हालत यह हो गई है कि गाँव तक के लोग ब्रश से दाँत रगड़ते मिल जाते हैं। यह टूथब्रश और टूथपेस्ट का ही कमाल है कि आजकल के युवाओं की बत्तीसी कम उम्र में ही जवाब देने लगती है। कितनी विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि विदेशी लोग टूथब्रश से तौबा करके हिन्दुस्तानी नीम की दातून के हिमायती बन रहे हैं और हिन्दुस्तान के नौनिहाल अपनी ही उच्च क्वालिटी की विरासत को भूलाने में लगे हैं।
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शीतल पेय भी हैं सौन्दर्य के शत्रु
‘लाइफ स्टेटस’ का प्रतीक बन चुके कोका-पेप्सी जैसे शीतल पेय स्वास्थ्य और सौन्दर्य की दृष्टि से धीमे जहर ही हैं। शीतल पेय ज्यादा पीने से होठों व त्वचा का रूखापन तो बढ़ता ही है, बुढ़ापे का आक्रमण भी जल्दी होता है। पर इस जमाने की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि लोग बेवकूफ़ियाँ करते जाते हैं और तब तक नहीं चेतते जब तक कि पानी नाक से ऊपर नहीं पहुँच जाता। मैक्सिको में पानी सचमुच लोगों की नाक तक पहुँच आया है तो अब वे चेतने और चेताने का जोर-शोर से अभियान शुरू कर रहे हैं। यह अभियान पेप्सी, कोका जैसे विभिन्न ब्रांड के शीतल पेयों के ही खिलाफ़ है। मैक्सिकोवासी और मामलों में भले ही फ़िसड़ि हों, पर पेप्सी और कोकाकोला जैसे पेय गटकने की बहादुरी में दुनिया भर में अव्वल नम्बर पर रहे हैं। मैक्सिको का आम आदमी साल भर में औसतन 160 लीटर शीतल पेय उदरस्थ कर जाता है। यानि मैक्सिको के लोग नशे की हद तक शीतल पेयों की गिरफ़्त में हैं। नतीजा यह है कि वहाँ के लोगों की खान-पान की आदतें गड़बड़ा गई हैं और काफी लोगों को शीतल पेयों के साइड-इफ़ेक्ट्स झेलने पड़ रहे हैं।
पिछले एक साल पूर्व हालात बिगड़ते दिखे तो मैक्सिको के डॉक्टरों और उपभोक्ता मामलों में नज़र रखने वाली संस्था ने मिलकर शीतल पेयों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर व्यापक अध्ययन और परीक्षण करके एक चौकाने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की है। रिपोर्ट में आश्चर्यजनक रूप से कुछ वैसी ही बातें उभरकर आई हैं जैसी कि भारत में बहुराष्ट्रीय गुलामी के खिलाफ़ संघर्ष कर रहा आज़ादी बचाओ आंदोलन लंबे अरसे से करता रहा है। मैक्सिको के डॉक्टरों की रिपोर्ट इतनी प्रभावी और प्रामाणिक है कि पेप्सी और कोक जैसी कंपनियों की बोलती बंद है और वे कोई भी सफ़ाई देने से कतरा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शीतल पेय ज्यादा पीने से डि-कैल्सीफ़िकेशन जैसी ख़तरनाक बीमारी हो सकती है। सिरदर्द, गैस्ट्रिक अल्सर व चिंता जैसी बीमारियों का ख़तरा तो बना ही रहता है। मैक्सिकन एसोसिएशन ऑफ़ स्टडीज फ़ॉर कंज्यूमर डिफ़ेन्स और चिकित्सकों के स्वास्थ्य अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार इन शीतल पेयों में प्रोटीन,
की मात्रा शून्य होती है। इसलिए इन्हें लेने से भूख घट जाती है और कुपोषण हो सकता है। स्वास्थ्य अध्ययन की विभिन्न रिपोर्टों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि कोला पेय से बनाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। कैफीन, फ़ॉस्फ़ेट जैसी चीजों की मौजूदगी से दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर असामान्य तो होते ही हैं, रिफ़ाइण्ड शर्करा और फ़्रक्टोज़ जब फ़ॉस्फ़ोरिक अम्ल के साथ मिलते हैं तो फ़ॉस्फ़ोरस और कैल्सियम का संतुलन भी बिगड़ जाता है। नतीजतन बच्चों, किशोरों और महिलाओं को विशेष रूप से हड्डी संबंधी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ सकता है। डॉक्टरों ने चौकाने वाली एक नई जानकारी यह दी है कि
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कोला को भूरा रंग देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ई-150 जैसे डाई से शरीर में विटामिन बी-6 की कमी हो सकती है।
फिलहाल मैक्सिको में शीतल पेयों से होने वाले खतरों के प्रति सावधान करने के लिए प्रेस कांग्रेस से लेकर जगह-जगह कार्यशालाएं तक आयोजित की जा रही हैं। इन आयोजनों के मार्फत एक तरफ लोगों को पोषण संबंधी जरूरतों के बारे में जानकारी दी जा रही है, दूसरी तरफ इन कार्बोनेटेड शीतल पेयों के नुकसानों के प्रति लोगों को सावधान किया जा रहा है। शुभ संकेत यह है कि कोला विरोधी मुहिम को मैक्सिको के लोगों का जबरदस्त समर्थन मिलना शुरू हो गया है और वे कोला कंपनियों के विज्ञापनी भ्रमजाल से बाहर निकलने को कसमसाने लगे हैं।
मुश्किल हिन्दुस्तान की 'सांस्कृतिक बंदर' बनती जा रही पीढ़ी के लिए है। यह पीढ़ी तो आधुनिकता की बयार में बेरोक-टोक बही जा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नवजवानों को 'कल्चर्ड' बनाने के लिए लाखों डॉलर विज्ञापनों पर पानी की तरह बहा रही हैं और नतीजे के तौर पर देश के नवजवानों पर कल्चर्ड होने की खुमारी भी कायदे से चढ़ने लगी है। अलबक्ता, आजादी बचाओ आंदोलन जैसे संगठन शीतल पेयों को कार्बोनेटेड जहरीला पानी, लहर पेप्सी को जहर पेप्सी और कोकाकोला को धोखा कोला की संज्ञा देकर लोगों को उनके खतरों से सावधान करने के लिए कमर कसे हुए हैं।
इस मुहिम का नतीजा कुछ तो हुआ है कि अब हिन्दुस्तान में भी तमाम लोग इन शीतल पेयों से तौबा करने का मन बनाने लगे हैं। इनमें ऐसे भी धनी टाइप के लोग शामिल हैं जिन्होंने अपने घरों में पेप्सी-कोक के कैन पर कैन बतौर स्टॉक जमा कर रखे हैं। मुश्किल ये है कि जब इन्हें अहसास हुआ है कि स्टैण्डर्ड बनाने के चक्कर में पेप्सी-कोक का एक घूँट भी हलक नीचे उतारना मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं है तो ये लोग इन शीतल पेयों के जहर से अब दूर तो रहना चाहते हैं पर अपने घरों में स्टॉक के तौर पर जो जमा कर रखा है उसका क्या करें? फिलहाल, इनकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल नहीं हुई है कि पेप्सी-कोक के कैन पर कैन नालियों में उड़ेले सकें। तो ऐसे सभी लोगों के लिए आजादी बचाओ आन्दोलन की सलाह है कि जिनके पास पेप्सी या कोकाकोला जैसे शीतल पेयों का स्टॉक है वे इन्हें फेंकने के बजाय संडास की सफाई के काम में ले लें। है न जोरदार सलाह ! आन्दोलन का कहना है कि आखिर लोग अपने घरों में संडास की सफाई के लिए हाइड्रोकलोरिक एसिड का इस्तेमाल करते ही हैं। पेप्सी-कोक में भी फास्फोरिक एसिड और कार्बोलिक एसिड जैसी चीजें हैं। संडास की सफाई वाले एसिड और पेप्सी-कोक का पी.एच. मान भी तीन के आस-पास लगभग एक जैसा ही है। इस पी.एच मान की चीजों को आँतों में पहुंचाना निश्चित रूप से नुकसानदेह है। ऐसे में अगर आपने गलतीवश पेप्सी या कोकाकोला खरीद ही लिया है तो पैसे और सेहत के नुकसान से बचने के लिए इनसे संडास की सफाई कर लेना ही बेहतर उपाय है।
आन्दोलन के कार्यकर्ता कोई हवा में ये बातें नहीं कर रहे हैं। उन्होंने बाकायदा प्रयोग करके देखा और पाया है कि पेप्सी और कोकाकोला जैसे शीतल पेयों से संडास की गन्दगी वैसे ही चमाचम साफ होती है जैसे कि दूसरे एसिड से। तो चलिए, आप भी अपने घर में पड़े
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पेप्सी-कोक की बोतल या कैन निकालिए और फटाफट अपने संडास की सफाई में लग जाइए। आखिर पेप्सी-कोक असलियत में हैं तो इसी लायक न !
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सौन्दर्य का नाश करता है नशा
नशा, या थोड़ा और व्यापक अर्थ में कहें तो 'व्यसन', मनुष्य के मन और शरीर दोनों को ही असुंदर बनाता है। नशेड़ी या व्यसनी व्यक्ति की मानसिक शक्तियाँ कमजोर पड़ जाती हैं, स्मरणशक्ति दुर्बल हो जाती है, संकल्प-क्षमता ढीली हो जाती है और विवेक कुंद हो जाता है। व्यसनी व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ परिवार व समाज की भी तबाही का कारण बनता है।
शराब, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू, गुटखा आदि व्यसन के जितने भी रूप हैं, सारे के सारे ही शरीर को जर्जर बनाते हैं और स्थिति ऐसी हो जाती है कि असाध्य किसिम के तमाम रोग बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि नशा करने वालों का सौन्दर्य धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह भी अच्छी तरह सिद्ध कर दिया है कि धूम्रपान करने वालों पर बुढ़ापा जल्दी झलकने लगता है। दरअसल धूम्रपान का धुआँ शरीर के अंदर जाकर कुछ ऐसी क्रियाओं को बढ़ावा देता है जिससे त्वचा ढीली और पतली होने लगती है। त्वचा में झुर्रियाँ भी पड़ने लगती हैं तथा कम उम्र में ही बुढ़ापे का शारीरिक झुकाव शुरू हो जाता है। लंदन के सेंट थामस नामक अस्पताल में 50 समान जोड़ों का अध्ययन करने पर मालूम हुआ कि धूम्रपान करने वालों की त्वचा धूम्रपान न करने वालों से 28 प्रतिशत पतली हो गई थी। यह एक सच्चाई है कि सिगरेट, सिगार आदि ज्यादा पीने वालों के चेहरों पर इतना स्पष्ट परिवर्तन आ जाता है कि सामान्य लोग भी दूर से देखकर ही अक्सर उनकी पहचान कर लेते हैं।
रोजमर्रा सिगरेट पीने वालों को फेफड़ों का कैंसर 90 प्रतिशत, अन्य प्रकार के कैंसर 80 प्रतिशत, ब्रोंकाइटिस 80 प्रतिशत, हृदय रोग 30 प्रतिशत और एम्फिसीमा 20 प्रतिशत तक होने की आशंका रहती है। इसके अलावा पायरिया, बहरापन, मोतियाबिंद, श्वासनलियों में सूजन, अल्सर, भाँति-भाँति के मुख व मसूड़ों के रोग, हड्डी का कैंसर, मूत्राशय का कैंसर, आँतों का कैंसर, श्वासनली का कैंसर, शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, मानसिक विकार आदि भी होने की संभावना बनी रहती है। सिगरेट आदि के धुएँ में मौजूद कार्बन-मोनो-ऑक्साइड खून के ऑक्सीजन को अवशोषित करके मस्तिष्क में इसकी आपूर्ति बाधित कर देती है। इसका नतीजा यह होता है कि मनुष्य की सहनशक्ति व स्मरणशक्ति कम होने लगती है और नाना प्रकार के मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार धूम्रपान से आँखों के लेंस पर धुँधलापन छाने लगता है और मोतियाबिन्द की संभावना बढ़ जाती है। धूम्रपान के धुएँ में मौजूद हाइड्रोजन साइनाइड व अन्य हानिकारक रसायन श्वासनलिका को मोटी कर देते हैं, जिससे दमे की आशंका बढ़ जाती है। धूम्रपान से पेट में एसिड अधिक बनने लगता है, जिससे अल्सर की संभावना भी प्रबल हो जाती है। इसके अलावा धूम्रपान रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ाकर मधुमेह को भी आमंत्रण देता है। धूम्रपान का हृदय पर घातक असर होता है। सिगरेट के धुएँ की कार्बन-मोनो-ऑक्साइड गैस रक्त में हीमोग्लोबिन कम कर देती है तथा रक्त वाहिनियाँ की भीतरी सतह पर वसा का जमाव ज्यादा कर
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