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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

५१८ शतपथ ब्राह्मण

मितीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॒ तस्मादाहेन्द्रा॒येति सु॒षूतम॒मिति सु॒सुतम॒मित्ये॒वैतदा॒- होत्त॒मेन प॒वित्रे॒त्येष वाऽउत्त॒मः प॒वित्रं॒ यत्सोम॒स्तस्मादा॒होत्त॒मेन प॒वित्रे॒त्यूर्ज॑स्वन्तं॒ मधु॑मन्तं॒ पय॑स्वन्तमिति रस॒वन्तमित्ये॒वैतदाह यदाहोर्ज॑स्वन्तं॒ मधु॑मन्तं॒ पय॑स्वन्तमिति ॥ ५ ॥ अथ॒ वाचं॒ यच्छति । दे॒वा ह वै य॒ज्ञं त॒न्वाना॒स्तेऽसु॒ररक्ष॒सेभ्य आस॒ङ्गाद्बिभ- यां च॒क्रुस्ते होचु॒रुपा॒श्वप्सु य॒ज्ञाद्वाचं॑ य॒च्छामेति त॒ऽउपा॒श्वप्सूदन्न॒वाचमयच्छन् ॥ ६ ॥ अथ निग्रा॒भ्या आहरति । तास्वेनं वाचयति निग्रा॒भ्या स्थ देव॒श्रुतस्त॒र्पयत मा मनो मे तर्पयत वाचं मे तर्पयत प्राणं मे तर्पयत चक्षुर्मे तर्पयत श्रोत्रं मे तर्पय- ता॒त्मानं॑ मे तर्पयत प्रजां मे तर्पयत प॒शून्मे तर्पयत ग॒णान्मे तर्पयत ग॒णा मे मा वितृ॑ष॒न्निति र॒सो वाऽआ॒पस्तास्वे॒वैतामाशिष॒माशा॑स्ते॒ सर्वं च मऽआ॒त्मानं॑ तर्प॒- यत प्र॒जां मे तर्पयत प॒शून्मे तर्पयत ग॒णान्मे तर्पयत ग॒णा मे मा वितृ॑ष॒न्निति स य ए॒ष उपा॑ऽशु॒सवनः स वि॒वस्वानादि॒त्यो नि॒दाने॒न सोऽस्यै॒ष व्या॒नः ॥ ७ ॥ त- म॒भिमिमी॑ते । प्र॒ति वाऽए॒नम॑तद्य॒दभि॑षु॒ण्वन्ति॒ तमे॒तेन प्र॒ति तथ्थात॒ उदे॑ति तथ्था संजी॑वति॒ यद्वेव॑ मिमी॒ते त॒स्मान्मात्रा मनु॒ष्ये॑षु मा॒त्रो यो चाय॒न्या मा॑त्रा ॥ ८ ॥ स मि॑मीते । इन्द्रा॑य त्वा॒ वसु॑मते रु॒द्रवत॒ऽइतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॒ तस्मादाहे- न्द्रा॒य त्वेति॒ वसु॑मते रु॒द्रवत॒ऽइति तदिन्द्र॑मेवा॒नु वसू॑श्च रु॒द्रांश्चाभज॑तीन्द्रा॑य त्वादि- त्यव॑त॒ऽइति तदिन्द्र॑मेवा॒न्वादित्या॑नाभज॑तीन्द्रा॑य त्वाभिमातिघ्न॒ऽइति स॒पत्नो वा ऽअ॒भिमा॑ति॒रिन्द्रा॑य त्वा सपत्नघ्न॒ऽइत्ये॒वैतदाह॒ सोऽस्यो॑द्धा॒रो यथा॒ श्रेष्ठन्योद्धा॒र ए॒- वम॒स्यैषऽऋते दे॒वेभ्यः ॥ ९ ॥ श्ये॒नाय॑ त्वा सोम॒भृत॒ऽइति । तद्गाय॒त्र्यै मि॑मीते॒ऽग्नये॑ त्वा रायस्पोषद॒ऽइत्य॒ग्निर्वे गायत्री तद्गाय॒त्र्यै मिमीते स यद्गायत्री श्ये॒नो भूत्वा॒ दि- वः सोम॑माह॒रत्तेन सा श्ये॒नः सोम॑भृत्तेनै॒वास्या ए॒तद्वीर्येण द्वितीयं मि॑मीते ॥ १०॥ अथ यत्पञ्च॒ कृत्वो मि॑मीते । संवत्स॒रसं॑मितो॒ वै य॒ज्ञः पञ्च वाऽऋ॒तवः संवत्स॒र- स्य तं प॒ञ्चभिराप्नोति॒ तस्मात्पञ्च॒ कृत्वो॑ मिमीते ॥ ११ ॥ तम॑भिमृशति । यु॒क्ते सोम

का० ३, अं० ६, ब्रा० ४, कं० ५-११ शतपथब्राह्मण / ५१६ रीति से बनाया गया ।" यज्ञ का देवता इन्द्र है इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए' । “उत्तमेन पविना" (यजु० ६।३०) - सोम सबसे अच्छा वज्र (पवि) है, इसलिए कहा 'उत्तम वज्र से'। “ऊर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तम्” (यजु० ६।३०) - इसके कहने का तात्पर्य कि "रस वाला” ॥५॥ अब वाणी को रोक लेता है (चुप हो जाता है) । यज्ञ को करते हुए देव लोग राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गये । उन्होंने कहा, 'चुपके-चुपके यज्ञ करें। वाणी को रोक लें।' उन्होंने चुपके-चुपके आहुति दी और वाणी को रोक लिया । ६।। अब निग्राभ्य जलों को लेता और उन पर यह जपता है—"निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्प- यत मा । (यजु० ६।३०) मनो मे तर्पयत, वाचं मे तर्पयत, प्राणं मे तर्पयत, चक्षुर्मे तर्पयत, श्रोत्रं मे तर्पयतात्मानं मे तर्पयत, प्रजां मे तर्पयत, पशून्मे तर्पयत, गणान्मे तर्पयत, गण मे मा वितृषन्' (यजु० ६।३१) - "हे जलो ! तुम देवश्रुत निग्राभ्य हो। मुझे तृप्त करो, मेरे मन को तृप्त करो, मेरी वाणी को तृप्त करो, मेरे प्राण को तृप्त करो, मेरी आँख को तृप्त करो, मेरे कान को तृप्त करो, मेरे आत्मा को तृप्त करो, मेरी प्रजा को तृप्त करो, मेरे पशुओं को तृप्त करो, मेरे गणों को तृप्त करो, मेरे गण प्यास से न मरें।” जल रस हैं। उन पर आशीर्वाद कहता है कि मुझ सम्पूर्ण को तृप्त करो - प्रजा को, पशु को, गणों को; मेरे गण प्यासे न मरें। यह उपांशुसवन ही आदित्य विवस्वान् है। यह वस्तुतः इस यज्ञ का ग्यान है ॥७॥ अब वह उसको नापता है। ये जो उसको कुचलते हैं तो मानो उसका हनन करते हैं। वहीं से यह उठता है, जीता है। चूंकि उससे नापते हैं इसलिए नाप होती है—जो मनुष्यों में प्रचलित है वह भी और अन्य नाप (मात्रा) भी ॥८॥ वह इस मन्त्र से नापता है—"इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते" (यजु० ६।३२)- "यह वसुवाले और रुद्रवाले इन्द्र के लिए।" यज्ञ का देवता इन्द्र है, इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए।' 'वसुवाले और रुद्रवाले' कहकर वह इन्द्र के साथ वसु और रुद्रों का भी भाग स्थापित कर देता है। "इन्द्राय त्वादित्यवते" (यजु० ६।३२) - इससे इन्द्र के साथ आदित्यों का भाग भी स्थापित कर देता है। "इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने" (यजु० ६।३२) - 'अभिमाति' का अर्थ है शत्रु, अर्थात् “शत्रु के मारनेवाले इन्द्र के लिए।" यह उस (इन्द्र) का विशेष भाग है जैसे किसी श्रेष्ठ (नेता) का होता है, - अन्य देवों से अलग ॥६॥ "श्येनाय त्वा सोमभृते" (यजु० ६।३२) - "तुम सोम रखनेवाले श्येन के लिए।" यह गायत्री के लिए नापता है। "अग्ने त्वा रायस्पोषदे" (यजु० ६।३२) - "तुझ धन देनेवाले अग्नि के लिए।" अग्नि गायत्री है। इसको गायत्री के लिए नापता है। यह जो गायत्री श्येन होकर सोम को द्यौलोक में ले गई, इसलिए उसको 'सोमभृत श्येन' कहा। इसके उस पराक्रम के लिए वह दूसरा भाग बाँटता है (नापता है) ॥१०॥ पाँच बार क्यों नापता है ? यज्ञ की वही नाप है जो वर्ष में पाँच ऋतुएँ होती हैं। वह इसको पाँच भागों में लेता है। इसलिए पाँच बार नापता है ॥११॥

दिवि ज्योति॒र्पृथिव्या॑मु॒रावन्तरि॑क्षे । तेना॒स्मै यज॑मानायो॒रु रा॒ये कृ॑ध्यधि दा॒त्रे वोच॒ इति॒ यत्र वाऽए॒षोऽग्रे॑ दे॒वानाꣳ ह॒विर्ब॒भूव तद्ध्ये॒लां चक्रे॑ नैव सर्वैणेवा- त्मना दे॒वानाꣳ ह॒विर्भूर्वमिति॒ स ए॒तास्ति॒स्रस्त॒नूरे॒षु लो॒केषु विन्य॑धत्त ॥ १२ ॥ तद्वै दे॒वा अ॑शृण्वन् । तेऽस्यै॒तेनै॒वैतास्त॒नूरा॒प्नुवन्त्स कृत्स्न॑ एव दे॒वानाꣳ ह॒विर॑- भवत्तथो॒ऽए॒वास्यै॒ष ए॒तेनै॒वैतास्त॒नूरा॒प्नोति॒ स कृत्स्न॑ एव दे॒वानाꣳ ह॒विर्भ॑वति तस्मा॑दे॒वम॒भिमृ॑शति ॥ १३ ॥ अथ निग्रा॒भ्याभि॒रुप॑सृजति । आपो॑ ह॒ वै वृ॒त्रं जघ्नु॒- स्तैने॒वैतद्वी॒र्ये॑णापः स्यन्द॑न्ते॒ तस्मा॑दे॒नाः स्यन्द॑माना॒ न किं च॒न प्रति॑धारयति ता ह॒ स्वमे॒व वशं॑ चेरुः कस्मै॒ नु व॒यं ति॑ष्ठेमहि याभि॑र॒स्माभि॑र्वृ॒त्रो ह॒त इति॒ सर्वं वाऽइ॒दमिन्द्रा॑य तस्थ्यानमास॒ यदि॒दं किं चापि॒ योऽयं पव॑ते ॥ १४ ॥ स इन्द्रो॒ऽब्र- वीत् । सर्वं॒ वै म॒ऽइदं त॒स्यानं॒ यदि॒दं किं च ति॒ष्ठद्धमे॒व म॒ऽइति॒ ता हो॑चुः किं नस्ततः॒ स्यादिति॑ प्रथम॒भक्ष॑ ए॒व वः सो॑मस्य॒ राज्ञ॒ इति॒ तथेति॒ ता अ॒स्माऽअति॑- ष्ठन्त तास्त॑स्था॒ना उ॒रसि॒ न्य॑गृह्णीत तद्य॒देना उ॒रसि॒ न्य॑गृह्णीत॒ तस्मान्निग्रा॒भ्या ना॑- म तथै॒वैता एतद्यज॑मान उ॒रसि॑ नि॒गृह्णी॑ते॒ स आ॑सामेष प्रथमभक्षः सो॑मस्य॒ राज्ञो॒ यन्निग्रा॒भ्याभि॒रुप॑सृजति॒ ॥ १५ ॥ स ऽउप॑सृजति । श्वा॒त्रा स्थ॑ वृत्र॒तुर॒ इति॒ शिवा ह्य्ा- पस्तस्मा॑दाह॒ श्वा॒त्रा स्थेति॑ वृत्र॒तुर॒ इति वृ॒त्रꣳ ह्येता अ॑घ्नन्त्राधोगूर्ता अ॒मृत॑स्य॒ प- त्नीरि॒त्यमृ॑ता ह्य्ाप॒स्ता दे॒वीर्दे॒वेभ्यं॑ य॒ज्ञं न॑य॒तेति नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्त्युपहूताः सो॒मस्य पिब॒तेति॒ तदुप॑हूता ए॒व प्र॑थमभ॒क्षꣳ सो॒मस्य॒ राज्ञो भ॑क्षयन्ति ॥ १६ ॥ अ- थ प्रह॑रि॒ष्यन् । यं द्वि॒ष्यात्तं मन॑सा ध्यायेदमुष्माऽअ॒हं प्रह॑रामि॒ न तुभ्य॒मिति॒ यो न्वैवेमं मानु॑षं ब्राह्म॒णाꣳ ह॒न्ति तं न्वेव परि॑चक्षते॒ऽथ किं य ए॒तं दे॒वो हि सोमो॑ ऽस्ति वाऽए॒नमेतद्यद॒भिषु॒ण्वन्ति॒ तमे॒तेन घ्न॑न्ति तथात उदे॑ति तथा संजी॑वति त- थानेन॒स्यं॑ भवति॒ यद्यु॒ न द्वि॒ष्यादपि॑ तृ॒णमेव मन॑सा ध्यायेत्तथो॒ऽअनेन॒स्यं॑ भवति ॥ १७॥ स प्रह॑रति । मा भेर्मा सं॑विक्था॒ इति॒ मा त्वं भैषीर्मा सं॑विक्था अ॒मुष्मा

का० ३, अ० ६, ब्रा० ४, क० १२-१८ शतपथब्राह्मण / ५२१ वह इस मन्त्र से छूता है—‘‘यत् ते सोम दिवि ज्योतिर्यत् पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे । तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोचः’’ (यजु० ६।३३)—‘‘हे सोम, जो तेरा प्रकाश द्युलोक में है, जो पृथिवी में, जो अन्तरिक्ष में, उससे इस यजमान के लिए और उसके धन के लिए स्थान कर । दाता के लिए आज्ञा दे।’’ जब यह (सोम) देवों की हवि बना तो उसने चाहा कि मैं अपनी पूर्ण सत्ता (आत्मा) के साथ देवों का हवि न बनूँ। इसलिए उसने अपने तीन शरीरों को संसार में छोड़ दिया ॥१२॥ तब देव विजयी हो गये। उन्होंने इसी मन्त्र द्वारा उसके इन तीनों शरीरों को प्राप्त कर लिया, और वह सम्पूर्ण देवों का हवि हो गया। इसी प्रकार यह भी इसके शरीरों को प्राप्त करता है और यह सोम सम्पूर्णतया देवों का हवि हो जाता है। इसी कारण से वह इस प्रकार उसको छूता है ॥१३॥ अब निग्राह्य जल को उस पर छिड़कता है। जलों ने ही वृत्र को मारा। उसी पराक्रम से ये बहते हैं। इसीलिए जब जल बहते हैं तो कोई उनको रोक नहीं सकता। वे अपनी ही इच्छा से चले थे। उन्होंने सोचा कि जब हम वृत्र को मार चुके तो किसके लिए रुकें? सृष्टि में यह जो कुछ है वह सब इन्द्र के लिए रुक गया, यहाँ तक कि पवन भी ॥१४॥ इन्द्र बोला कि ‘सृष्टि में जो कुछ है सब मेरे लिए रुक गया। तुम भी रुको।' उन्होंने कहा कि ‘तो हमारा क्या होगा ?’ उसने कहा कि ‘सोम राजा का पहला घूंट तुमको मिलेगा।' उन्होंने कहा, ‘अच्छा।' वे उसके लिए रुक गये। जब वे उसके लिए रुक गये तो उसने उनको छाती से लगा लिया (न्यगृह्णीत), इसलिए इनका नाम ‘निग्राह्य' है। इसी प्रकार यह यजमान भी इनको छाती से लगाता है। यह उनका सोम राजा का पहला घूंट है कि वह इन जलों को (सोम पर) छोड़ता है ॥१५॥ वह इस मन्त्र से छोड़ता है—‘स्वात्रा स्थ वृत्रतुरः' (यजु० ६।३४) जल कल्याणकारक होते हैं इसलिए कहा—‘‘वृत्र को मारनेवाले कल्याणकारी’’ क्योंकि इन्होंने वृत्र को मारा। ‘‘राधोगूर्ताऽमृतस्य पत्नीः’’ (यजु० ६।३४)—‘‘ऐश्वर्य की देनेवाली अमृत की पत्नियां ।’’ जल अमृत हैं। ‘‘ता देवीर्देवत्रेमं यज्ञं नय’’ (यजु० ६।३४)—‘‘हे देवियो, देवों के लिए इस यज्ञ को ले जाओ।’’ यह सब स्पष्ट है। ‘‘उपहूताः सोमस्य पिबत’’ (यजु० ६।३४)—‘‘आप निमन्त्रित होकर सोम को पियो।’’ ये जल निमन्त्रित हैं और सोम राजा के पहले घूंट को पीते हैं ॥१६॥ जब सोम को कुचले तो मन में अपने शत्रु का विचार करे—‘मैं अमुक शत्रु को कुचलता हूँ। तुझको नहीं।' जो कोई ब्राह्मण मनुष्य को मारते हैं वे पाप करते हैं, फिर उनका क्या कहना जो सोम राजा का हनन करते हैं क्योंकि सोम तो देव है! ये जो उसको पत्थर से कुचलते हैं तो इसका हनन करते हैं। वहीं से वह उठता है, जीता है, इस प्रकार पाप नहीं होता। यदि कोई उसका शत्रु न हो तो तृण का ही चिन्तन कर ले। इससे भी पाप न लगेगा ॥१७॥ वह इस मन्त्र से कुचलता है—‘‘मा भेर्मा संविक्था’’ (यजु० ६।३५)—अर्थात् ‘‘डरे

ऽअरुं प्रकृरामि न तुभ्यमित्ये॒वैतदा॒होर्जं॑ धत्स्वेति॒ रसं॑ धत्स्वेत्ये॒वैतदा॒ह धिषणे॑ वीडू॒ सती॒ वोडेया॒मूर्जं॑ दधाथामितोभेऽए॒वैतत्फलकेऽअ॒ङ्कूरित्यु॒ कैकऽअ॒ङ्कः किं नु तत्र योऽप्येते फलके भिन्यादिमे ह वै द्यावापृथिवीऽए॒तस्माद्व्याङ्क्यतात्सꣳ- रेजेते तदाभ्यामेवैनमेतद्द्यावापृथिवीभ्याꣳ शमयति तथैमे शान्ते न हिनस्त्यूर्जं॑ दधाथामिति॒ रसं॑ दधाथामित्ये॒वैतदा॒ह पाप्मा कृतो न सोम॒ इति॒ तद॒स्य सर्वं॑ पा- प्मानꣳ कृन्ति ॥ १८॥ स वै त्रि॒रभिषु॒णोति॑ । त्रिः सम्भरति चतुर्निग्राभमु॒पैति त- दृश दशाक्षरा वै विराड्वैरा॒जः सोम॒स्तस्माद्दश कृत्वः सम्पा॒दयति ॥ १९॥ अथ॒ प्र॒- न्निग्राभमुपैति । यत्र वा॒ऽएषोऽग्रे॑ दे॒वानाꣳ ह॒विर्बभूव॒ तदेमा दिशोऽभि॒द्यावा- भि॒र्दिग्भि॒र्मिथु॒नेन प्रियेण धाम्ना॒ सꣳस्पृश्येति॒ तमे॒तद्देवा॒ आभि॒र्दिग्भि॒र्मिथु॒नेन प्रियेण॒ धाम्ना॒ सम॑स्पर्शयन्निग्राभमुपायंस्तथो॒ऽए॒वैनमेष ए॒ताभि॒र्दिग्भि॒र्मिथु॒नेन प्रियेण॒ धाम्ना॒ सꣳस्पर्शयति यन्निग्राभमुपैति ॥ २०॥ स उपैति । प्रागपागुदगधरा- क्सर्वतस्त्वा दिश आ॒धावन्त्विति॒ तदेनमाभिर्दिग्भिर्मिथुनेन प्रियेण॒ धाम्ना॒ सꣳस्प- र्शयत्यम्ब॒ निष्व॑र॒ समरीवि॒दामिति॒ योषा वाऽअ॒म्बा योषा॒ दिश॒स्तस्मादा॒हाम्ब॒ निष्वरेति॒ समरीविदामिति प्रजा वाऽअ॒रीः सं प्रजा जानतामित्ये॒वैतदा॒ह तस्मा- द्या अ॒पि वि॒दूरमिव प्रजा भवन्ति॒ समेव ता जानते तस्मादाह समरीविदामिति ॥२१॥ अथ यस्मात्सोमो नाम । यत्र वाऽए॒षोऽग्रे॑ दे॒वानाꣳ ह॒विर्बभूव॒ तद्भे॒क्षां चक्रे नैव सर्वे॑णेवा॒त्मना दे॒वानाꣳ ह॒विर्भूव॒मिति॒ तस्य या जुष्टतमा तनूरास ता- मपनिदधे तद्वै देवा॒ अस्पृण्वत ते होचुरूपैवेतां प्रवृ॑ङ्ग्ध्व स॒हैव न एतया ह॒वि- र्धेहीति तां दूर॒ऽइवोपप्रावृङ्क्त स्वा वै मऽए॒षेति॒ तस्मात्सोमो नाम ॥ २२॥ अ- थ यस्माद्यज्ञो नाम । घ्नन्ति वाऽए॒नमेतद्यद॒भिषु॒ण्वन्ति॒ तद्यदे॒नं तन्वते॒ तदे॒नं ज- नयन्ति स॒ ताय॑मानो जायते स यन्जाय॑ते तस्माद्य॒ज्ञो यज्ञो ह॒वै नमित्याच॑क्ष इति ॥ २३॥ तत्रैतामपि वाचमुवाद । त्वमङ्ग प्र॒शꣳसिषो दे॒वः शविष्ठ मर्त्यम् ।

कां० ३; अ० ६, ब्रा० ४, कं० १८-२४ शतपथब्राह्मण / ५२३ मत, कांपे मत ।" क्योंकि मैं अमुक को कुचलता हूँ, तुझको नहीं। "ऊर्जं धत्स्व" (यजु० ६।३५)- अर्थात् "रस को धारण कर ।" "धिषणे वीड़्वी सती वीड़ेयेथामूर्जं दधाथाम्" (यजु० ६।३५)- "हे निश्चल धिषण, तुम निश्चल रहो और रस को धारण करो।" कुछ लोग कहते हैं कि इससे उन दो पट्टों से तात्पर्य है। यदि इनको कोई तोड़ दे तो क्या हो ? ये वस्तुतः द्यौ और पृथिवी हैं जो इस उद्यत वज्र से कांपते हैं। इसलिए इसको शान्त करता है और यह शान्त होकर हानि नहीं पहुँचाता। 'ऊर्जं दधाथाम्' का अर्थ है 'रस को धारण कर ।' "पाप्मा हतो न सोमः" (यजु० ६।३५) -"पापी मर गया, न कि सोम।" इस प्रकार इसके सब पापों का नाश करता है ॥१८॥ वह तीन बार कुचलता है, तीन बार बटोरता है। चार बार निग्राभ-क्रिया करता है। इस प्रकार दस हुए। दस अक्षर का विराट् छन्द होता है। सोम विराट्वाला है। इस प्रकार दस बार में सम्पादन करता है ॥१९॥ वह निग्राभ-क्रिया क्यों करता है? जब यह सोम पहले देवताओं की हवि बना तो इसने इन चार दिशाओं का ध्यान किया कि मैं इन चार दिशाओं के द्वारा अपने प्रिय तेज का स्पर्श करूँ। निग्राभ के द्वारा देवों ने इन दिशाओं से प्रिय प्रकाश के साथ स्पर्श कराया। यह यजमान भी निग्राभ करके इन दिशाओं के द्वारा प्रिय प्रकाश से इसका स्पर्श कराता है ॥२०॥ वह (निग्राभ क्रिया) इस मन्त्र से करता है- "प्रागपागुदगधराक् सर्वतस्त्वा दिशऽ- आधावन्तु" (यजु० ६।३६) - "पूर्व से, पश्चिम से, उत्तर से, दक्षिण से, चारों ओर से दिशाएँ तुझे धारण करें।" इस प्रकार वह दिशाओं से उसका जोड़ा मिला देता है, उसके प्रिय प्रकाश से। "अम्ब निष्पर समरीर्विदाम्" (यजु० ६।३६) - "हे मा, इसको सन्तुष्ट कर। उच्च लोग मिलें।" 'अम्बा' स्त्री हैं। 'दिशाएँ' स्त्री हैं। इसलिए कहा, 'अम्ब निष्पर।' 'अरीः' प्रजा हैं। इसका तात्पर्य है कि प्रजाएँ परस्पर मेल से रहें। जो दूर-दूर रहते हैं वे भी मेल से रहते हैं। इसलिए कहा कि प्रजाएँ मेल से रहें ॥२१॥ अब सोम नाम क्यों पड़ा ? जब यह पहले देवताओं का हवि बना तो इसने चाहा कि मैं अपनी पूर्ण सत्ता से देवों का हवि न बनूं। उसका जो सबसे प्यारा शरीर (अंश) था उसको उसने अलग कर लिया। अब देव विजयी हो गये। उन्होंने कहा, 'तू इसको अपने में धारण कर। तब तू हमारा हवि होगा।' उसने उस अपने अंश को दूर से खींच लिया। यह मेरा ही है। (स्वा वं म) इससे सोम हो गया ॥२२॥ इसको यज्ञ क्यों कहते हैं ? जब उसको कुचलते हैं तो उसको मारते हैं। जब उसको फैलाते हैं तो उसको उत्पन्न करते हैं। वह फैलाया जाकर उत्पन्न होता है। उत्पन्न होता है, इसलिए 'यन् जायते', 'यञ्ज', 'यज्ञ' हुआ ॥२३॥ उसने उस समय यह कहा- "त्वमङ्ग प्रशँसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः" (यजु० ६।३७, ऋ० १।८४।१६) -"हे श्रेष्ठ देव, तू

५२४ शतपथ ब्राह्मण न॒ ह्य॒न्यो म॑घवन्नस्ति मर्डि॒तेन्द्र॒ ब्रवी॑मि ते॒ वच॒ इति॒ मर्त्यो॒ ह्यैवैतद्ब्रुवन्नु॑वाच त्वमे॑वेतो ज॑नयितासि नान्यस्त्वदिति ॥ २४॥ अथ॑ निग्रा॒भ्याभ्यो॒ ग्रहा॒न्विगृह्ण॑ते । आपो॒ ह वै वृ॒त्रं ज॑घ्नुस्तेनैवैतद्वीर्ये॑णापः स्यन्दन्ते स्यन्द॑मानानां वै व॒सती॑वरीर्गृ- ह्णाति वसतीवरी॒भ्यो निग्रा॒भ्या निग्रा॒भ्याभ्यो॒ ग्रहा॒न्विगृह्ण॑ते तेनै॒वैतद्वीर्ये॑ण ग्रहा॒- न्विगृह्ण॑ते होतृ॑चमसाद्योषा वाऽऋग्घोता योषायै वाऽइमाः प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते तदे- नमेतस्यै योषायैऽऋचो होतुः प्र॒जनय॑ति तस्माद्धोतृचमसात् ॥ २५॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [१.४] ॥ सप्तमः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या ११४ ॥ नवमोऽध्यायः [३४.] ॥ ॥ अस्मिन्काण्डे कण्डिकासंख्या ८५१ ॥ ॥ इति माध्यन्दिनीये शतपथब्राह्मणे अध्वरनाम तृतीयं काण्डं समाप्तम् ॥ ३ ॥ ॥

का० ३, अ० ६, ब्रा० ४, कं० २४-२५ शतपथब्राह्मण / ५२५ मर्त्य को प्रशंसित करेगा। तुझसे अन्य कोई सुख का दाता नहीं है। हे ऐश्वर्यवान्, मैं तुझसे यह वचन कहता हूँ।" यह मर्त्य ही था जो इसने यह कहा, अर्थात् तू ही इसको उत्पन्न करनेवाला है, तुझसे अन्य कोई दूसरा नहीं ॥२४॥ अब निग्राभ्य जलों से कई ग्रहों (प्यालों) को भरते हैं। जलों ने ही वृत्र को मारा था। उसी पराक्रम से जल बहते हैं। बहते हुओं से ही वसतीवरी को ग्रहण करता है, वसतीवरी से निग्राभ्य को, निग्राभ्य से ग्रहों को। उसी पराक्रम के द्वारा होता के चमसे से वह ग्रहों को लेता है। यह जो होता है, वह ऋक् है, ऋक् स्त्री है, स्त्री से ही यह प्रजा उत्पन्न होती है। इसलिए वह (इस सोम) को स्त्री, ऋक् होता से उत्पन्न कराता है। इसलिए वह होतृ के चमसे से ग्रहों को लेता है ॥२५॥ माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका' भाषा व्याख्या का अध्वरनाम तृतीय काण्ड समाप्त हुआ। तृतीय काण्ड प्रपाठक कण्डिका-संख्या प्रथम [ ३. २. १ ] १२४ द्वितीय [ ३. ३. ३ ] १२८ तृतीय [ ३. ४. ४ ] १२२ चतुर्थ [ ३. ६. १ ] १३२ पञ्चम [ ३. ७. ३ ] १२७ षष्ठ [ ३. ८. ४ ] ११२ सप्तम [ ३.६. ४ ] ११४ योग ८५६ पूर्वं के काण्डों का योग १३८७ पूर्णयोग २२४६ तृतीय काण्ड के विशेष शीर्षक अवान्तर दीक्षा [३।४।३]; उपसदिष्ट: [३।४।४]; महावेदिनामम् [३।५।१]; अग्निप्रणयनादि [३।५।२]; सदो हविर्धाननिर्माणानि [३।५।३]; उपरवनिर्माणम् [३।५।४]; सदस्यौदुम्बरी निखननम् [३।६।१]; धिष्ण्याँ निवापादि [३।६।२]; वैसर्जनहोम: [३।६।३]; अग्निषोमीय पशुप्रयोग:, तत्र यूपच्छेदनम् [३।६।४]; यूपोच्छ्रयणादि [३।७।१]; यूपैकादशिनी [३।७।२]; पशूपकरणादि [३।७।३]; पशुनियोजन प्रोक्षणादि [३।७।४]; पशु संज्ञपनम्; तत्रोपवेशनादि विधिः [३।८।१]; अग्निषोमीय वपायागः [३।८।२]; पशुपुरोडाशयागः [३।८।३]; उपयड्ढोमः [३।८।४]; पश्वेकादशिनी [३।६।१]; वसतीवर ग्रहणविधिः [३।६।२]; सवनीयपशुप्रयोगः [३।६।३]; सोमाभिषवः [३।६।४]।

०४-चतुर्थ काण्ड-०४

ओम् । प्राणो॒ ह॒ वाऽअ॒स्योपा॑ꣳशुः । व्या॒न उ॒पाꣳशु॑सवन उदान॒ श्त्वा॒त्पर्या॑- मः ॥ १॥ अथ॒ यस्मा॑दुपा॒ꣳशुर्नाम॑ । अ॒ꣳशुर्वै नाम॒ ग्रहः॒ स प्र॒जाप॑तिस्तस्यै॒ष प्राण॑- स्तद्य॒दस्यै॒ष प्राण॒स्तस्मा॑दुपा॒ꣳशुर्नाम॑ ॥ २॥ तं ब॒हिष्प॑वित्राद्गृह्णाति । परा॒ञ्चमे॒वा- स्मिन्ने॒तत्प्रा॒णं द॑धाति॒ सोऽस्या॑यं॒ परा॑ङेव॒ प्राणो॒ निर्द॑ति तम॒ꣳशुभिः॑ पावयति पू॒- तोऽस॒दिति॒ षड्भिः॑ पावयति षड्वाऽऋतव ऋ॒तुभि॑रेवैनमेतत्पावयति ॥ ३॥ तदा॑- हुः । यद॒ꣳशु॑भिरुपा॒ꣳशुं पु॒नाति॒ सर्वे॒ सोमाः॑ प॒वित्र॑पूता॒ अथ॒ केना॒स्या॑ꣳशवः पू॒ता भव॒न्तीति॑ ॥ ४॥ ता॒नुप॑निवपति । धृ॒त्ते सोमादाभ्यं॒ नाम॒ जागृ॑वि॒ तस्मै॑ ते सोम॒ सोमा॑य॒ स्वाहेति॒ तद॑स्य॒ स्वाहा॑कारेणैवा॒ꣳशवः॑ पू॒ता भव॑न्ति॒ सर्वं॒ वाऽए॒ष ग्रहः॒ सर्वे॑षाꣳ हि॒ सव॑नानाꣳ रू॒पम् ॥ ५॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॒न्वानाः॑ । तेᳪसुररक्ष॒सेभ्य आस॒ङ्गाद्बिभ॑यां चक्रुस्ते॑ होचुः स॒ꣳस्था॑पयाम य॒ज्ञं यदि॑ नो॒ऽसुर॑रक्ष॒सान्या॒सजे॑युः स॒ꣳ- स्थित ए॒व नो॑ य॒ज्ञः स्या॒दिति॑ ॥ ६॥ ते प्रा॒तःस॑वन्ऽए॒व । सर्वं॑ य॒ज्ञꣳ स॒म॑स्थाप- यन्ने॒तस्मि॑न्नेव॒ ग्रहे॒ यजु॑ष्टः प्रथ॒मे स्तोत्रे॒ साम॑तः प्रथ॒मे शस्त्रे॒ऽभक्तस्तेन॑ स॒ꣳस्थि॑ते- नैवा॑त ऊ॒र्ध्वं य॒ज्ञेना॑चर॒न्त्स ए॒षोऽप्येतर्हि॑ तथै॒व य॒ज्ञः संति॑ष्ठतऽए॒तस्मि॑न्नेव॒ ग्रहे॒ यजु॑ष्टः प्रथ॒मे स्तोत्रे॒ साम॑तः प्रथ॒मे शस्त्रे॒ऽभक्तस्तेन॑ स॒ꣳस्थि॑तेनैवा॑त ऊ॒र्ध्वं य॒ज्ञेन॑ चरति ॥ ७॥ स वाऽअ॒ष्टौ कृ॒त्वोऽभि॒षुणो॑ति । अ॒ष्टाक्ष॑रा वै गाय॒त्री गा॑य॒त्रं प्रा॒- तःसव॑नं प्रा॒तःस॑वनमे॒वैतत्क्रि॑यते ॥ ८॥ स गृह्णाति । वाच॒स्पत॑ये पव॒स्वेति॑ प्रा॒णो वै वाच॒स्पतिः॑ प्रा॒ण ए॒ष ग्रह॒स्तस्मा॑दाह वाच॒स्पत॑ये पव॒स्वेति॒ वृष्णो॑ऽअ॒ꣳशुभ्यां॒ गभ॑स्तिपूत॒ इति॑ सोमा॒ꣳशुभ्या॑ꣳ ह्येनं॑ पावयति॒ तस्मा॑दाह॒ वृष्णो॑ऽअ॒ꣳशुभ्या॒मिति॑ ५२६

अध्याय-१, ब्राह्मण-१

का० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ५२७ चतुर्थ काण्ड अथ ग्रह नामकं चतुर्थ काण्डम् उपांशुग्रहः क्षुल्लकाभिषवश्च अध्याय १—ब्राह्मण १ उपांशु यज्ञ का प्राण है। उपांशु सवन व्यान है और अन्तर्याम ग्रह उदान है ॥१॥ इसको उपांशु क्यों कहते हैं? अंशु नामी ग्रह प्रजापति है। यह ग्रह उसका प्राण है। चूंकि वह इसका प्राण है इसलिए उपांशु हुआ ॥२॥ इसको पवित्रे के विना लेता है। उससे परांच प्राण (दूर जाते हुए प्राण) को धारण करता है। उसका यह बाहर की ओर जाता हुआ निकलता है। उसको सोम के अंशु या डालियों से पवित्र करता है, क्योंकि ये पवित्र होती हैं। छः डालियों से पवित्र करता है। छः ऋतुएँ हैं। इस प्रकार ऋतुओं से पवित्र करता है ॥३॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उपांशु ग्रह को तो सोम की डालियों से पवित्र करते हैं और अन्य सोम पवित्रे से पवित्र किये जाते हैं, तो ये डालियाँ किससे पवित्र होती हैं ? ॥४॥ उन (डालियों) को इस मन्त्र को पढ़कर (सोम पर) डाल देता है या उपवपन करता है—“यत् ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा” (यजु० ७।२)—“हे सोम, तेरा जो दमन करने योग्य जगानेवाला नाम है उस तुझ सोम के लिए स्वाहा।” इस स्वाहाकार से ही ये डालियाँ पवित्र हो जाती हैं। यह ग्रह सब-कुछ है, क्योंकि यह सब सवनों का रूप है ॥५॥ जब देवों ने यज्ञ ताना तो वे राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गए। उन्होंने कहा कि पहले हम यज्ञ की स्थापना कर लें, फिर यदि राक्षस आक्रमण भी करेंगे तो हमारा यज्ञ तो स्थापित रहेगा ही ॥६॥ उन्होंने प्रातः-सवन में ही सम्पूर्ण यज्ञ स्थापित कर दिया—इसी (उपांशु) ग्रह में यजुः से, पहले स्तोत्र में साम से, पहले शस्त्र में ऋक् से। इसी पूर्णतया स्थापित यज्ञ के द्वारा उन्होंने अर्चन किया। यह भी इसी प्रकार यज्ञ को स्थापित करता है,—पहले इसी ग्रह में यजुः से, पहले स्तोत्र में सोम से, प्रथम शस्त्र में ऋक् से। उसी स्थापित यज्ञ से वह अर्चन करता है ॥७॥ यह सोम आठ बार कुचला जाता है। आठ अक्षर की गायत्री होती है। प्रातः-सवन गायत्री-सम्बन्धी है। इस प्रकार यह प्रातः-सवन होता है ॥८॥ वह इस मन्त्र से लेता है—“वाचस्पतये पवस्व” (यजु० ७।१)—“वाचस्पति के लिए पवित्र हो।” वाचस्पति प्राण है। यह ग्रह भी प्राण है। इसलिए कहा कि वाचस्पति के लिए पवित्र हो। “वृष्णोऽअ॑ंशुभ्यां गभस्तिपूतः” (यजु० ७।१) सोम की दो डालियों से इसे पवित्र करता है, इसलिए कहा कि “शक्तिशाली के दो अंशुओं से।” ‘गभस्ति’ का अर्थ है हाथ। हाथ से

५२८ शतपथ ब्राह्मण ग॒भ॒स्ति॒पूत॒ इति॑ पा॒णी वै ग॒भस्ती॑ पा॒णिभ्या॑ꣳ ह्ये॑नं पाव॒यति॑ ॥ ९॥ अथेकादश कृत्वो॒ऽभिषु॑णाति । एकादशाक्षरा वै त्रि॒ष्टुब्त्रैष्टु॑भं माध्यन्दिनꣳ सवनं माध्यन्दिनमे- वैतत्सव॑नं क्रियते ॥१०॥ स गृह्णाति । दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ पव॒स्वेति॑ दे॒वो ह्येष॑ दे॒वे- भ्यः॑ पव॑ते॒ येषां॑ भागो॒ऽसीति॒ तेषाम॒ ह्येष भागः॑ ॥ ११॥ अथ द्वादश कृत्वो॒ऽभिषु॑- णोति । द्वादशाक्षरा वै जगती जागतं तृतीयसवनं तृतीयसवनमेवैतत्क्रियते ॥१२॥ स गृह्णाति । मधु॑मतीर्न इ॒षस्कृ॑धीति॒ रस॑मे॒वास्मिन्नेतद्द॑धाति स्वदयत्येवैनमेतद्देवे- भ्यस्तस्मादेष शृतो न पूयत्यथ यज्जु॒होति॑ सꣳस्थापयत्येवैनमेतत् ॥ १३॥ अष्टाव- ष्टौ कृत्वः । ब्रह्मवर्चसकामस्याभिषुणुयादित्याहुरष्टाक्षरा वै गायत्री ब्रह्म गायत्री ब्रह्मवर्चसी हैव भवति ॥ १४॥ तच्चतुर्विꣳशतिं कृत्वो॒ऽभिषु॑तं भवति । चतुर्विꣳ- शतिर्वै संवत्सर॒स्यार्धमासाः॑ संवत्सरः प्रजापतिः प्रजापतिर्यज्ञः स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावतमेवैतत्संस्थापयति ॥ १५॥ पञ्च-पञ्च कृत्वः । पशुकाम स्याभिषुणुयादित्याहुः पाङ्क्ताः पशवः पशूने॒वाव॑रुन्द्धे पञ्च वा॒ऽऋतवः॑ संवत्सर॒स्य संवत्सरः प्रजापतिः प्रजापतिर्यज्ञः स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्तमे- वैतत्संस्थापयति सोऽऽएषा मीमाꣳसैवैतरं त्वेव क्रियते ॥ १६॥ तं गृहीत्वा परि- मार्ष्टि । नेह्यवश्चोतदिति तं न सादयति प्राणो ह्यस्यैष तस्मादयमसन्नः प्राणः सं- चरति यदीद्यभिचरेद्येनꣳ सादयेदमुष्य वा प्रा॒णं सादयामीति तथाह तस्मिन्न पुनरस्ति यन्नानुमृशति तेनोऽऽअध्वर्युश्च यजमानश्च ज्योग्जीवतः ॥ १७॥ अथोऽऽअप्ये- वेनं दध्यात् । अमुष्य वा प्राणमपिदधामीति तथाह तस्मिन्न पुनरस्ति यन्न साद॒- यति तेनो प्राणा॒न्न लो॑भयति ॥ १८॥ स वाऽऽअन्तरेव सꣳस्वाहा॒कृति॑ करोति । दे॒- वा ह॒ वै बिभयां चक्रुर्यद्वै नः पुरो॒वाक्य॑ ग्र॒हस्य॑ होमादसुररक्षसानीमं ग्रहं न हन्युरिति॒ तमन्त॑रेव सन्तः स्वाहाका॒रेणाजु॑हवुस्तꣳ शृतमेव सन्तमग्नावजुहवुस्त- थो॒ऽएवैनमेष एतदन्तरेव सन्तस्वाहाकारेण जुहोति तꣳ शृतमेव सन्तमग्नौ जुहो-

कां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० ९-१६ शतपथब्राह्मण / ५२६ उसको पवित्र करता है, इसलिए कहा 'गभस्तिपूतः' ॥९॥ अब वह ग्यारह बार कुचलता है। त्रिष्टुप् में ग्यारह अक्षर होते हैं। त्रिष्टुप् दोपहर का सवन है। इस प्रकार यह दोपहर का सवन हो जाता है ॥१०॥ वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है—"देवो देवेभ्यः पवस्व" (यजु० ७।१)—"देव देवों के लिए पवित्र हो ।" यह (सोम) देव है और देवों के लिए पवित्र होता है। "येषां भागोऽसि" (यजु० ७।१)—वस्तुतः यह उनका भाग है ॥११॥ अब बारह बार कुचलता है । जगती बारह अक्षर की होती है। तीसरा सवन जगती का है । इस प्रकार यह तीसरा सवन हो जाता है ॥१२॥ वह इस मन्त्र के द्वारा ग्रहण करता है—"मधुमतीर्नऽइषस्कृधि" (यजु० ७।२)— "हमारे अन्नों की मीठा कर ।" इस प्रकार इसमें रस डालता है और देवों के चखने योग्य बनाता है। इस प्रकार मारा जाकर वह सड़ता नहीं। और जब वह इस ग्रह की आहुति देता है तो उसकी वहाँ स्थापना करता है ॥१३॥ ब्रह्मवर्चस् की इच्छावाला आठ बार कुचले । गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री ब्रह्मवर्चसी है ॥१४॥ इस प्रकार चौबीस चोटों से कुचलना हो जाता है। वर्ष के अर्ध मास चौबीस होते हैं। संवत्सर प्रजापति हैं, प्रजापति यज्ञ है। वह यज्ञ जितना है और जितनी उसकी मात्रा है उतनी ही उसकी संस्थापना हो जाती है ॥१५॥ पशु की कामनावाला पाँच बार कुचले । कहते हैं कि पशु पांचवाले हैं। इस प्रकार पशु की प्राप्ति करता है। संवत्सर में पाँच ऋतुएँ होती हैं। संवत्सर ही प्रजापति है। प्रजापति यज्ञ है। जितना यह यज्ञ है, जितनी इसकी मात्रा है उतनी ही इसकी संस्थापना है। यह केवल मीमांसा (कल्पना) है। दूसरी क्रिया इस प्रकार है—॥१६॥ ग्रह को लेकर पोंछता है कि कुछ टपके न। वह इसको रखता नहीं है। यह उसका प्राण है। इस प्रकार उसका प्राण निरन्तर चलता है। यदि इसको रोकना चाहे तो इसको रख दे और कहे 'मैं अमुक के तुम प्राण को रोकता हूँ।' चूंकि अध्वर्यु उसको छोड़ता नहीं, अतः वह (प्राण) उस (शत्रु) में नहीं रहता । इस प्रकार अध्वर्यु और यजमान दीर्घ जीवन को प्राप्त होते हैं ॥१७॥ या उसको हाथ से दबाकर कहे कि 'मैं अमुक के तुझ प्राण को दबाता हूँ।' चूंकि वह उसको रखता नहीं, अतः वह (प्राण) शत्रु में नहीं रहता । इस प्रकार वह प्राणों को नष्ट नहीं करता ॥१८॥ जब वह हविर्धान के भीतर ही होता है तभी 'स्वाहा' कहता है। देवों को डर था कि होम से पहले जो कुछ इस ग्रह का अंश है उसको असुर राक्षस नष्ट न कर दें। इसलिए जब वे हविर्धान के भीतर थे तभी उन्होंने स्वाहा कह दिया, और जो कुछ आहुति दी उससे अग्नि में फिर आहुति दे दी। इस प्रकार यह भी जब हविर्धान के भीतर है तभी स्वाहा करके आहुति देता है, और जो कुछ आहुति दी जाती है उसी को फिर आग में छोड़ देता है ॥१९॥

५३० शतपथ ब्राह्मण ति ॥१९॥ अथोप॒निष्क्रामति । उ॒र्वन्तरि॑क्षमन्वेमीत्य॒न्तरि॑क्षं वाऽअनु॒ रक्ष॑श्चरत्य- मूलमुभयतः परिच्छिन्नं यथायं पुरुषोऽमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरत्येतद्वै यजुर्ब्रह्म रक्षोहा स ए॒तेन॒ ब्रह्म॑णान्तरि॑क्षमभयमना॒ष्ट्रं कुरुते ॥२०॥ अथ॒ वरं॑ वृ- णीते । बलवद्ध॒ वै दे॒वा ए॒तस्य॒ ग्रह॑स्य होमं प्रेप्सन्ति तेऽस्मा॒ग्दतं वर॒ सम॑र्ध- यन्ति क्षिप्रे न इमं ग्रहं जुहुव॒दिति॒ तस्मा॒द्द्वरं॑ वृणीते ॥२१॥ स जु॑होति । स्वां- कृतो॒ऽसीति प्राणो वाऽअ॒स्यैष ग्रह॑ः स स्व॒यमे॒व कृतः स्वयं॑ जातस्तस्मादाह॒ स्वां- कृतो॒ऽसीति॒ विश्वे॑भ्य इन्द्रिये॑भ्यो दि॒व्येभ्यः॒ पार्थि॑वेभ्य इति॒ सर्वाभ्यो ह्येष प्रजा॑- भ्यः स्वयं॑ जातो मन॑स्त्वाष्ट्विति प्रजापति॒र्वै मन॑ः प्रजापति॑ष्ट्वाश्नुतामित्ये॒वैतदा॑ह॒ स्वा- हा वा सुभव॒ सूर्या॑येति तद्वर॒॰ स्वाहाकार॒ करोति परां॑ दे॒वताम् ॥२२॥ अ॒मु- ष्मिन्वाऽए॒तमगृह्णीत् । य ए॒ष तपति॒ सर्वं वाऽए॒ष तदेन॑ सर्व॒स्यैव परार्ध्यं क- रोत्यथ यद्वरं दे॒वतां॑ कुर्यात्पर॒॰ स्वाहाकार॑ स्या॒ड्ढैवामुष्मादादित्यात्परं॒ त- स्माद्वर॒॰ स्वाहाकारं करोति परां॑ दे॒वताम् ॥२३॥ अथ ध्रुवोर्ध्वं ग्रह॒मुन्मा॑ष्टि॑ । परा॒ञ्चमे॒वास्मिन्नेतत्प्राणं॑ दधात्यथोत्ताने॑न पाणि॑ना मध्यमे॑ परिधौ प्रागुप॑माष्टिं प॒- रा॒ञ्चमे॒वास्मिन्नेतत्प्राणं॑ दधाति दे॒वेभ्य॑स्त्वा मरीचि॒पेभ्य॒ इति ॥ २४॥ अ॒मुष्मिन्वा ऽए॒तं मण्डलेऽगृह्णीत् । य ए॒ष तपति तस्य॒ ये र॒श्मय॒स्ते दे॒वा मरीचिपास्ताने॒- वैतत्प्रीणाति तऽएनं॑ दे॒वाः प्रीताः स्वर्गं लो॒कम॒भिव॑हन्ति ॥ २५॥ तस्य॒ वाऽए॒- तस्य॒ ग्रह॑स्य । नानुवाक्या॑स्ति न या॒ज्या तं मन्त्रे॑ण जुहोत्येतेनो हास्यैषोऽनुवा॒- क्यवान्भवत्येतेन या॒ज्यावानथ॒ यद्य॒भिचरे॒द्योऽस्या॑ऽप्रियः स्याद्धाल्लो॒र्वीरेमि वा वाससि वा तं जु॑हुयाद्दिवा॒॰शो यस्मै॑ वेडे तत्सत्यमुप॑रिप्लुता भङ्गेन हतो॒ऽसौ फ- डिति यथा ह॒ वै हन्यमानानामपधाविदे॒वमेषो॒ऽभिषूय॑माणाना॒॰ स्कन्दति तथा ह॒ तस्य॒ नैव धावन्नापधावत्परिशिष्यते यस्मा॒ऽएवं करोति त॒॰ सादयति प्राणाय त्वेति प्राणो ह्यस्यैषः ॥ २६॥ दक्षिणार्धे हैके सादयन्ति । ए॒ता॒॰ ह्येष दिश॒मनु

कां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० २०-२७ शतपथब्राह्मण / ५३१ अब वह 'हविर्धान' से बाहर आता है यह कहता हुआ कि मैं अन्तरिक्ष में होकर आता हूँ। अन्तरिक्ष में राक्षस दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित फिरता है। इसी प्रकार यह पुरुष भी दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित अन्तरिक्ष में फिरता है। यह यजुः है, राक्षस को मारनेवाली स्तुति । इसी स्तुति के द्वारा वह अन्तरिक्ष को निर्भय और राक्षस से मुक्त कर देता है ॥२०॥ अब वर मांगता है—देव इस ग्रह के होम को अत्यन्त चाहते हैं। और वे इसके लिए उसको वर देते हैं कि शीघ्र ही यह होम हमारे लिए दे देवे। इसलिए वर को माँगता है ॥२१॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"स्वां कृतोऽसि" (यजु० ७।३)—"यह ग्रह इसका प्राण है।" वह उसी का किया हुआ स्वयं उत्पन्न हुआ है, इसलिए कहा कि 'स्वांकृतः' अर्थात् अपने-आप बना हुआ है। "विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यः" (यजु० ७।३)—"सब प्रजाओं के लिए यह स्वयं ही बना है।" "मनस्त्वाष्टु" (यजु० ७।३)—"तुझको मन प्राप्त करे।" मन प्रजापति है, इसलिए इसका अर्थ हुआ कि प्रजापति तुझको पावे। "स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय" (यजु० ७।३)—"हे भलीभाँति उत्पन्न तुझ सूर्य के लिए स्वाहा।" इस प्रकार वह दूसरे देवता के लिए स्वाहाकार करता है ॥२२॥ यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसी में उसने आहुति दी है। यही सब-कुछ है। इसलिए वह उस (सूर्य) को सर्वोपरि बनाता है। यदि वह दूसरे स्वाहाकार को पहले देवता के लिए करता तो वह सूर्य से भी बड़ा हो जाता। इसलिए दूसरे स्वाहाकार को उसी देवता के लिए करता है ॥२३॥ अब आहुति देकर ग्रह को पोंछता है। इसमें वह जाते हुए प्राण को फिर रखता है। अब हथेली से मध्यपरिधि में वह पोंछा हुआ सोम लगाता है। इस प्रकार उसमें जाते हुए प्राण को धारण कराता है इस मन्त्र से —"देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः" (यजु० ७।३)—"किरणों को पीनेवाले देवों के लिए तुझको" ॥२४॥ उसी (सूर्यमंडल) में उसने आहुति दी है, जो कि तपता है। उसी की किरणें 'मरीचिपा' (प्रकाश का पान करनेवाली) हैं। उन्हीं को वह प्रसन्न करता है। उसी से प्रसन्न होकर देव उसे स्वर्गलोक को ले जाते हैं ॥२५॥ इस ग्रह के लिए न कोई अनुवाक्य है न याज्य । वह एक मन्त्र से आहुति देता है, इसी से वह अनुवाक्य और याज्य दोनों से युक्त हो जाता है। यदि वह कोई अभिचार करना चाहे तो सोम की डाली को चिपका ले, बाहों से, छाती से या कपड़े से, और इस मन्त्र से आहुति देवे— 'देवाऽशो यस्मै त्वेडे तत् सत्यमुंपरिप्लुता भङ्गेन हतोऽसौ फट्"—"हे दिव्य सोम ! जिस काम के लिए मैं तेरी स्तुति करता हूँ, वह पूरा होवे। और अमुक पुरुष (मेरा शत्रु) नष्ट हो जाय।" जिस प्रकार मारे जानेवाले शत्रुओं में से कोई भाग जाता है, इसी प्रकार सोम की कुचली जानेवाली शाखाओं में से यह एक बच सकती है। जो इस प्रकार करता है उसका कोई शत्रु भागकर बचने नहीं पाता। इस मन्त्र से वह ग्रह को रख देता है—"प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह ग्रह इस यज्ञ का प्राण है ॥२६॥ कुछ लोग इसको दक्षिण की ओर रखते हैं। वे कहते हैं कि इसी दिशा में सूर्य चलता

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

५३२ शतपथ ब्राह्मण सं॒चर॑तीति॒ तदु॒ तथा॒ न कुर्या॒दुत्त॑रार्द्धऽए॒वैनꣳ॑ सादये॒न्नो ह्ये॑तस्या॒ आहु॑तेः का च॒न परा॑स्ति॒ तꣳ सादयति प्रा॒णाय॑ त्वेति प्रा॒णो ह्य॑स्यै॒षः ॥ २७॥ अथो॑पा॒ꣳ॒श॒सव॑- न॒माद॑त्ते । तं॒ न दशा॑भि॒र्न प॒वित्रे॑णोपस्पृशति य॒था व्य॒ह्निः प्र॒णिक्त॑मे॒वं तद्य॒द्य॑थ- श्च॒राक्लि॑ष्टः स्यात्पा॒णिनै॑व प्र॒ध्र्क्ष्योध्व॑म॒पनि॑पादये॒द्याना॑य त्वेति व्या॒नो ह्य॑स्यै॒षः ॥ २८ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ १ ॥ ॥ प्रा॒णो ह्य॒ वाऽअ॑स्योपा॒ꣳ॒शुः । व्या॒न उपा॑ꣳश॒सवन॒ उदा॑न॒स्त्व॒न्तर्या॒मः ॥ १॥ अथ॒ यस्मा॑दन्तर्या॒मो नाम॑ । यो वै प्रा॒णः स॒ उ॑दानः स॒ व्यान॒स्तमे॒वास्मि॑न्नेत॒त्परा॑- चं प्रा॒णं द॑धाति॒ यदु॑पा॒ꣳ॒शुं गृह्णा॑ति॒ तमे॒वास्मि॑न्नेत॒त्प्रत्यञ्च॑मुदा॒नं द॑धाति॒ यद॑न्तर्या॒मं गृह्णा॑ति॒ सो॑ऽस्यायमुदा॒नोऽन्त॒रात्म॒न्यत॑स्तद्यद॒स्यैषो॑ऽन्त॒रात्म॒न्यतो यद्वैनेनेमाः प्र॒जा य॒तास्तस्मा॑दन्तर्या॒मो नाम॑ ॥ २॥ त॒मतः॑प॒वित्रा॑द्गृह्णाति । प्रत्यञ्च॑मे॒वास्मि॑न्नेत॒दुदा॑नं द॑धाति॒ सो॑ऽस्यायमुदा॒नोऽन्त॒रात्म॒न्हित॒ श्तेनो॑ हास्याप्युपा॒ꣳ॒शुर॒तः॑प॒वित्रा॑द्गृही॒तो भव॑ति स॒मानꣳ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳ॒श्वन्तर्या॒मौ प्रा॒णोदा॒नौ ह्ये॑तेनो॒ हैवास्यैषो॑ऽपीत॒रेषु॑ ग्र॒हेष्व॑नाच्छिद्रवति ॥ ३॥ अथ य॒स्मात्सोमं॑ प॒वित्रे॑ण पाव॒यति॑ । य॒त्र वै सोमः॑ स्वं पु॒रोहि॑तं॒ बृह॒स्पति॑म॒जिज्ञा॑ तस्मै॒ पुन॑र्ददौ तेन सꣳशशास तस्मिन्पुनर्द॒ऽइवा॑- तिशिष्ट॒मेनो॑ यद्दी॒क्षूंनं ब्रह्म॒ ड्यानायाभिद॒धौ ॥ ४॥ तं दे॒वाः प॒वित्रे॑णापावयन् । स मेध्यः॑ पू॒तो दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भव॒त्तथो॑ऽए॒वैन॑मे॒ष ए॒तत्प॒वित्रे॑ण पाव॒यति॒ स मे॑- ध्यः पू॒तो दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भव॑ति ॥ ५॥ तद्यदुपया॒मेन॒ ग्रहा॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । इ॒यं वाऽअ॑- दि॒तिस्तस्या॑ अदः प्रायणी॒यꣳ ह॒विरा॑सावादि॒त्यश्च॒रुस्तद्द्वे तत्पु॑रेव सु॒त्या॑यै सा हेयं दे॒वेषु॑ सु॒त्याया॑मपिबन्मीषेऽस्त्वेव मे॑ऽपि प्रसु॒ते भा॒ग इ॑ति ॥ ६॥ ते ह देवा ऊ- चुः । व्यादि॑ष्टोऽयं दे॒वता॑भ्यो य॒ज्ञस्त्वयै॑व ग्र॒हा गृ॒ह्यन्तां॑ दे॒वता॑भ्यो हूयन्ता॒मिति॑ तथे॑ति॒ सो॑ऽस्या ए॒ष प्रसु॑ते भा॒गः ॥ ७॥ तद्यदुपया॒मेन॒ ग्रहा॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । इ॒यं वाऽउ॑- पया॒म इ॒यं वाऽइ॒दमन्नाद्य॒मुप॑यच्छति प॒शुभ्यो॑ मनु॒ष्ये॑भ्यो॒ वन॒स्पति॑भ्य इ॒तो वाऽउ॑-

का० ४, अ० १, ब्रा० १-२, कं० २७-२८ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५३३ है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। उसको उत्तर की ओर रक्खे। क्योंकि इससे उत्तर (उत्कृष्ट) कोई ग्रह है ही नहीं। इसको "प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) कहकर रखता है क्योंकि यह उसका प्राण है ॥२७॥ अब वह उपांशु सवन को लेता है। वह इसको न झालर से छूता है न पवित्रे से। ऐसा करने से तो पानी से धोने के तुल्य होगा। यदि कोई अंशु या सोमलता का टुकड़ा लगा हो तो उसे हाथ से छुटा दे और उस (उपांशु सवन) को (उपांशु-ग्रह के) पास रख दे उत्तर की ओर मुंह करके, इस मन्त्र से—"व्यानाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह यज्ञ का व्यान है ॥२८॥ अन्तर्यामग्रहः अध्याय १—ब्राह्मण २ इस (यज्ञ) का प्राण उपांशु ग्रह है, व्यान उपांशु सवन है और अन्तर्याम ग्रह उदान है ॥१॥ अन्तर्याम नाम यों पड़ा—जो प्राण है सो उदान, वही व्यान है, इसी में उस जाते हुए प्राण को धारण करता है; जो उपांशु ग्रह को लेता है, और जो अन्तर्याम ग्रह को लेता है उसमें लौटते हुए उदान को लेता है, यह उदान उसके अन्तरात्मा में ही है; यह जो उदान अन्तरात्मा में है और चूंकि इसमें यह प्रजा 'यताः' अर्थात् व्याप्त है, इसलिए इस ग्रह का नाम 'अन्तर्याम' पड़ गया ॥२॥ उसको पवित्रे के भीतर से निकालता है। इस प्रकार लौटके निकलते हुए उदान को उसमें धारण करता है। यह उदान उसी में स्थित होता है। इसीसे उसकी उपांशु-आहुति पवित्रे के भीतर से निकली हुई हो जाती है, क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम एक ही हैं, क्योंकि वे प्राण और उदान हैं। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा उसका प्राण अन्य ग्रहों में भी निरन्तर स्थित हो जाता है ॥३॥ सोम को पवित्रे से शुद्ध करने का कारण यह है-जब सोम ने अपने ही पुरोहित बृहस्पति को सताया था तो पीछे से उसने उसका माल वापस कर दिया था और वह शान्त हो गया था। माल लौटा देने पर भी कुछ दोष तो शेष रह ही गया क्योंकि उसने ब्राह्मण को सताने का विचार कर लिया था ॥४॥ उसको देवों ने पवित्रे से शुद्ध किया। वह पवित्र होकर देवों की हवि बन गया। इसी प्रकार यह भी इसे पवित्रे से शुद्ध करता है। यह पवित्र होकर देवों की हवि बन जाता है ॥५॥ उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि यह पृथिवी आहुति है। आदित्य चरु इसका प्रायणीय हवि है। वह सोम के बनाने से पूर्व की बात है। उसने चाहा कि देवों के साथ मेरा भी भाग मिल जाय, और कहा कि निचोड़े हुए सोम में से मुझे भी भाग मिले ॥६॥ उन देवों ने कहा, 'यज्ञ तो देवताओं में बँट चुका। तेरे द्वारा ही ग्रह लिये जायेंगे, और तेरे ही द्वारा देवताओं की आहुतियां दी जावेंगी।' उसने कहा 'अच्छा।' वस्तुतः यह उस अर्पित सोम का उस (अदिति) का भाग है ॥७॥ उपयाम के साथ ग्रह इसलिए भी लिये जाते हैं कि यह पृथिवी उपयाम है क्योंकि यह अन्न आदि को रखती है (उपयच्छति) - पशुओं के लिए, मनुष्यों के लिए और वनस्पतियों के लिए।

४. अध्य शतपथ ब्राह्मण र्धी दे॒वा दि॒वि हि दे॒वाः ॥ ८॥ तद्य॒दुपया॒मेन ग्रहा गृह्य॑न्ते । अन्न॑मेव॒ तद्गृह्य॑न्ते ऽथ॒ यद्योनौ॑ सा॒दय॑तीयं वाऽअ॒स्य सर्व॑स्य॒ योनि॒रस्यै वाऽइ॒माः प्र॒जाः प्र॒जाताः ॥ ९॥ तं वाऽए॒तत् । रेतो भूतं सो॒ममृ॒त्विजो बिभ्रति॒ यद्वाऽअयोनौ रेतः॑ सिच्य॑- ते प्र वै तन्मीयते॒ऽथ॒ यद्योनौ॑ सा॒दय॑त्य॒स्यामे॒व तत्सा॒दय॑ति ॥ १०॥ प्रा॒णो॒दा॒नौ ह वाऽअ॒स्यैतौ ग्रहौ॑ । तयो॒रुदि॑ते॒ऽन्यत॑रं जुहो॒त्यनु॑दिते॒ऽन्यत॑रं प्रा॒णोदा॒नयो॒- र्व्याकृ॑त्यै प्रा॒णोदा॒नावै॒वैतद्व्याक॑रोति॒ तस्मा॑देतौ समा॒नावेव सन्ता॒ नाने॑वाचक्षते प्रा॒ण इति॒ चोदा॒न इति॑ च ॥ ११॥ अ॒हो॒रा॒त्रे ह वाऽअ॒स्यैतौ ग्रहौ॑ । तयो॒रुदि॑ते ऽन्यत॑रं जुहो॒त्यनु॑दिते॒ऽन्यत॑रमहोरा॒त्रयो॒र्व्याकृ॑त्या॒ऽअहोरा॒त्रेऽए॒वैतद्व्याक॑रोति ॥ १२॥ अहः॒ सन्त॑मुपां॒शुम् । तं रात्रौ॑ जुहोत्य॒हरे॒वैतद्रात्रौ॑ दधाति॒ तस्मा॒दपि॑ सुतमि- श्रायामिव॒ किंचि॑त्ख्यायते ॥ १३॥ रात्रिं॒ सन्त॑मन्तर्या॒मम् । तमुदि॑ते जुहोति॒ रात्रि॑- मे॒वैतदु॒रुन्ध॑धाति॒ तेनो॒ हासा॒वादित्य उ॒द्यन्ने॒वेमाः प्र॒जा न प्रद॑हति॒ तेने॒माः प्र॒जा- स्त्राताः ॥ १४॥ अथातो गृह्णात्येव । उपयामगृहीतोऽसीत्युक्त उपयामस्य बन्धु॒र्- ऽए॒ह म॒घव॒न्पाहि सोम॒मितीन्द्रो॒ वै म॒घवानिन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता तस्मा॒दाह॑ मघ- व॒न्निति॑ पा॒हि सोम॒मिती॑ गोपाय॒ सोम॒मित्ये॒वैतदा॒होरु॒ष्य रा॒य एषो॑ य॒ज्ञस्वेति॑ प॒शवो॒ वै रा॒यो गोपाय॑ प॒शूनित्ये॒वैतदा॒हैषो॑ य॒ज्ञस्वेति॑ प्र॒जा वाऽइ॒षस्ता ए॒वैत- द्यायजू॒काः क॑रोति॒ ता इ॒माः प्र॒जा यज॑माना अ॒र्चन्त्यः श्राम्य॑न्त्यश्चरन्ति ॥ १५॥ अ- न्तस्ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी द॑धामि । अन्त॑र्दधाम्यु॒र्वन्तरि॑क्षम् स॒जूर्दे॒वेभि॒रवरैः परैश्चेति॑ त॒- देनं॑ वैश्वदे॒वं करोति तद्य॒देने॑ने॒माः प्र॒जाः प्राणा॒त्यञ्चोद॑न॒त्यश्चा॑न्त॒रिक्ष॒मनु॒चर॑न्ति ते- न वैश्वदे॒वोऽन्त॑र्यामे मघवन्मा॒दय॑स्वेतीन्द्रो॒ वै म॒घवानिन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता तस्मा॒- दाह॑ मघव॒न्नित्यथ॒ यद॒न्तरिति॑ गृह्णात्य॒न्तस्त्वा॒त्मन्द॑ध॒ऽइत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १६॥ तं गृ- ही॒त्वा प॒रिमा॒ष्टि॑ । नेद्ब॒हिश्चोत॒दिति॒ तं न सा॒दय॑त्युदा॒नो ह्येष तस्मा॑दयमस॒न्न उदा॒नः संचरति॒ यद्यु॑त्वभिचरे॒द्येने॑तं सा॒दये॑द॒मुष्य त्वोदा॒नं सादया॒मीति॑ ॥ १७॥ स

का० ४, अ० १, ब्रा० २. कं० ८-१७ शतपथब्राह्मण / ५३५ देव इससे ऊपर हैं क्योंकि वे द्युलोक में हैं ॥८॥ उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि इसी पृथिवी के साथ लिये जाते हैं। इसी योनि में वे रक्खे जाते हैं क्योंकि पृथिवी योनि है, इसी से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥९॥ ऋत्विज लोग रेत (वीर्य) के रूप में सोम को रखते हैं। जो रेत योनि के बाहर जाता है वह खराब हो जाता है और जो योनि में रहता है वह ठीक रक्खा जाता है ॥१०॥ ये दोनों ग्रह उसके प्राण और उदान हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे देता है और दूसरे की पहले, जिससे प्राण और उदान अलग-अलग रहें। इस प्रकार वह प्राण और उदान को अलग-अलग रखता है। इसलिए ये दोनों अर्थात् प्राण और उदान एक होते हुए भी अलग-अलग कहे जाते हैं ॥११॥ ये दोनों ग्रह उसके लिए रात और दिन हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे दी जाती है और दूसरे की पहले-रात और दिन को अलग-अलग करने के लिए। इस प्रकार वह रात और दिन को अलग-अलग करता है ॥१२॥ उपांशु दिन है, उसकी आहुति रात में देता है। इस प्रकार दिन को रात्रि में रखता है। इसलिए अन्धकार-से-अन्धकार में भी कुछ तो दिखाई देता ही है ॥१३॥ अन्तर्याम रात है। उसकी आहुति दिन में देता है। इस प्रकार रात को दिन में रखता है। इसलिए यह सूर्य उदय होकर इन प्रजाओं को नहीं जलाता। इसी से यह प्रजा सुरक्षित रहती हैं ॥१४॥ वह उसमें से अन्तर्याम ग्रह को इस मन्त्र से लेता है—"उपयामगृहीतोऽसि” (यजु० ७।४)—"तू उपयाम अर्थात् 'सहारे (आश्रय)' के साथ लिया हुआ है।" यह 'उपयाम' का योग कहा। "अन्तर्यच्छ मघवन् पाहि सोमम्” (यजु० ७।४)—'मघवा' है इन्द्र या यज्ञ का नेता, इसलिए कहा कि "हे इन्द्र, सोम की रक्षा कर।" "उरुष्य राय एषो यजस्व" (यजु० ७।४)— "पशु राय हैं अर्थात् पशुओं की रक्षा कर।" प्रजा इष हैं, इस प्रकार प्रजा को यज्ञ के इच्छुक बनाता है जिससे ये प्रजा यज्ञ करते हुए, अर्चन करते हुए और श्रम करते हुए रहें ॥१५॥ “अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधामि । अन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् । सजूर्देवैभिरवरैः परैश्च" (यजु० ७।५)—"तेरे भीतर द्यौ और पृथिवी को रखता हूँ। तेरे भीतर विस्तृत अन्तरिक्ष को। देवों से युक्त निचले और ऊँचे।" इस प्रकार इस ग्रह को सब देवों से सम्बन्धित करता है। यह सब देवों का इसलिए है कि इसी से यह प्रजा प्राण और उदान लेती है और अन्तरिक्ष में चलती हैं। "अन्तर्यमि मघवन् मादयस्व" (यजु० ७।५)—"हे मघवन् ! अन्तर्याम में आनन्द करो।" मघवा इन्द्र है। इन्द्र यज्ञ का नेता है इसलिए कहा 'मघवा'। यह जो "अन्तः-अन्तः” कहकर उसे लेता है इसका अर्थ यह है कि 'मैं तुझे आत्मा के भीतर रखता हूँ' ॥१६॥ उस ग्रह को लेकर पोंछता है कि इसमें से कुछ सोम टपक न जाय। वह इसको रखता नहीं। यह उदान है। इसीलिए उदान निरन्तर चलता रहता है। यदि उसको कुछ पुरश्चरण करना हो तो कहे, 'अमुक पुरुष के उदान ! मैं तुझको रखता हूँ' ॥१७॥

५३६ शतपथ ब्राह्मण

य॒द्यु॑पा॒ꣳशु॑ꣳ सा॒दये॑त् । अथैन॑ꣳ सादये॒द्यद्यु॑पा॒ꣳशुं॒ न सा॒दये॒न्नैन॑ꣳ सादये॒द्यद्यु॑पा॒ꣳशु- म॑पिद॒ध्याद्ये॑नं द॒ध्याद्यद्यु॑पा॒ꣳशुं॒ नापि॑दध्या॒न्नैन॑मपिदध्या॒द्यथो॑पा॒ꣳशोः कर्म॑ तथै॒तस्य॑ समा॒नꣳ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मौ प्रा॒णो॒दानौ हि ॥ १८ ॥ ताण्ड ह चरकाः । ना- नैव म॒न्त्राभ्यां॑ जुह्वति प्रा॒णो॒दानौ वा॒ऽअस्यै॒तौ ना॑नावी॒र्यौ प्रा॒णो॒दानौ॑ कुर्म॒ इति॑ वद॑न्त॒स्तदु॑ तथा॒ न कु॑र्यान्मो॒हुर्य॑न्ति ह ते यज॑मानस्य प्रा॒णो॒दानावपी॒द्वाऽए॑नं तू- ष्णीं जु॑हुयात् ॥ १९ ॥ स यद्वा॒ऽउपा॒ꣳशुं मन्त्रे॑ण जु॒होति॑ । तदे॑वास्ये॒ष्टोऽपि॒ मन्त्रे॑ण हु॒तो भ॑वति॒ किमु॒ तत्तू॒ष्णीं जु॑हुयात्स॒मानꣳ॒ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मौ प्रा॒णो॒दानौ हि॑ ॥ २० ॥ स येनै॒वोपा॒ꣳशुं मन्त्रे॑ण जु॒होति॑ । तेनै॒वैतं मन्त्रे॑ण जुहोति॒ स्वांकृ॑तोऽसि विश्वे॑भ्य इन्द्रि॒येभ्यो॑ दि॒व्येभ्यः॒ पार्थि॑वेभ्यो॒ मन॑स्त्वाष्टु॒ स्वाहा॑ सु॒भव॒ सूर्या॑ये॒त्युक्तो॑ यजु॑षो॒ बन्धुः॑ ॥ २१ ॥ अथ ध्रु॒वावा॑चं॒ ग्रहम॑वमा॒र्ष्टि । इदं॒ वाऽउ॑पा॒ꣳशुं॒ ध्रुवोᳵर्द्ध- मु॒न्मा॒र्क्ष्यथा॒त्रावा॑चमवमा॒र्ष्टि प्र॒त्यञ्च॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तदु॑दा॒नं द॑धाति ॥ २२ ॥ अथ॒ नीचा॑ पाणि॑ना । मध्य॑मे परि॒धौ प्र॒त्यगु॑पमा॒र्ष्टीदं॒ वा उपा॒ꣳशुं॒ ध्रुवोत्ताने॑न पाणि॑ना म- ध्य॑मे परि॒धौ प्रागु॑पमा॒र्क्ष्यत्र॒ नीचा॑ पाणि॑ना मध्य॑मे परि॒धौ प्र॒त्यगु॑पमा॒र्ष्टि प्र॒त्य- ञ्च॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तदु॑दा॒नं द॑धाति दे॒वेभ्य॑स्त्वा मरीचि॒पेभ्य॒ इति॒ सोऽसा॑वे॒व बन्धुः॑ ॥२३॥ तं प्र॒त्याक्र॑म्य सा॒दय॑ति । उदा॒नाय॑ त्वे॒त्युदा॒नो ह्य॑स्यै॒ष तानि॒ वै सृ॒ष्ट्य॒ष्टानि॑ सा- दयति प्रा॒णो॒दाना॒वेवैतत्सꣳ॑स्प॒र्शय॑ति प्रा॒णो॒दाना॒न्त्सन्द॑धाति ॥ २४॥ तानि॒ वाऽग्र- नि॒ङ्ग्यमा॑नानि॒ शेरॆ॑ । आ तृ॒तीय॑सवना॒त्तस्मा॑दि॒मे म॑नु॒ष्याः॑ स्वप॑न्ति॒ तानि॒ पुन॑- स्तृ॒तीय॑सवने प्र॒युज्य॑न्ते॒ तस्मा॑दि॒मे म॑नु॒ष्याः॑ सु॒प्ता प्र॒बुध्य॑न्ते॒ तेऽनि॑शिताश्चराच॒रा य- ज्ञस्यै॒वैतद्वि॑धा॒मनु॒ वय॒-इव॑ ह॒ वै य॒ज्ञो वि॑धी॒यते॒ तस्यो॑पा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मावे॑व प॒क्षावा- त्मो॑पा॒ꣳशु॒सवनः॑ ॥ २५ ॥ तानि॒ वाऽअनि॑ङ्ग्यमानानि॒ शेरॆ॑ । आ तृ॒तीय॑सवना॒त्ता- यते य॒ज्ञ इति॑ वै॒ तद्यत्ताय॑ते॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ वया॑ꣳसि वि॒गृह्य॑ प॒क्षाव॒नायु॑वानानि पत॑न्ति॒ तानि॒ पुन॑स्तृतीयसवने प्र॒युज्य॑न्ते॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ वया॑ꣳसि समा॒सं प॒क्षावा-

का० ४, अ० १, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ५३७ - अगर वह उपांशु को रक्खे तो इस अर्थात् अन्तर्याम को भी रक्खे । यदि उपांशु को न रक्खे तो इसको भी न रक्खे । यदि उपांशु को (हाथ से) ढके तो इस अन्तर्याम को भी ढके । वह उपांशु को न ढके तो इस अन्तर्याम को भी न ढके । जैसा उपांशु के लिए, वैसा इसके लिए, क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं । वे प्राण और उदान हैं ॥१८॥ चरक लोग इन आहुतियों को दो और मन्त्रों से देते हैं । उनका कहना है कि दोनों यज्ञ के प्राण और उदान हैं। हम इन दोनों को भिन्न-भिन्न पराक्रमवाले बनाते हैं। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। इससे यजमान के प्राण और उदान बिगड़ जाते हैं। इस आहुति को चुपचाप भी दिया जा सकता है ॥१९॥ जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति दी जाती है उसी से इसकी भी दी हुई समझ ली जाती है। फिर इसको चुपचाप कैसे दिया जाय ? क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं। ये उसके प्राण और उदान हैं ॥२०॥ वह जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति देता है उसी से इस (अन्तर्याम) की भी देता है— “स्वाङ्कृतोऽसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा सुभव सूर्याय” (यजु० ७।६)—"तू स्वयं-बना हुआ है, सब पार्थिव और दिव्य शक्तियों के लिए । मन तेरा हो । हे स्वयं होनेवाले ! सूर्य के लिए।" इस मन्त्र का महत्त्व कहा जा चुका ॥२१॥ आहुति देकर ग्रह को नीचे से पोंछ डालता है । उपांशु की आहुति देकर उसने ग्रह को ऊपर से पोंछा था। इसको नीचे से पोंछता है। इस प्रकार उदान को उसमें निर्धारित करता है ॥२२॥ अब हथेली को नीचे को करके बीच की परिधि (समिधा) में सोम मलता है । उपांशु की आहुति देकर उसने हथेली को ऊपर को करके पश्चिम से पूर्व की ओर मध्य समिधा को मला था । परन्तु अब की बार पूर्व से पश्चिम की ओर हथेली को नीचा करके मलता है, इस मन्त्र से, “देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः” (यजु० ७।६)—इसका महत्त्व वही है जो पहले का ॥२३॥ (हविर्धान की ओर) चलकर वह ग्रह को इस मन्त्र से रख देता है, “उदानाय त्वा” (यजु० ७।६)—यह उसका उदान है। वह इस प्रकार रखता है कि वे एक-दूसरे को छूते हैं। इस प्रकार वह प्राण और उदान को छुआता है। उन दोनों में संसर्ग उत्पन्न करता है ॥२४॥ ये (उपांशु और सवन) सायंकाल के सवन तक वैसे ही रक्खे रहते हैं जैसे मनुष्य भूमि पर सोते हैं। इनका सायंकाल के सवन में प्रयोग होता है। जैसे ये मनुष्य सोकर उठते हैं, और कारबार में लगते हैं। यह यज्ञ के अनुसार है। यज्ञ एक पक्षी है। उपांशु और अन्तर्याम इसके पक्ष हैं। उपांशु-सवन इसका आत्मा (शरीर) है ॥२५॥ सायंकाल के सवन तक वे वैसे ही रहते हैं। यज्ञ ताना जाता है। जो ताना जाता है उसमें गति होती है। जैसे पक्षी पंख खोलकर उड़ते हैं, सिकोड़कर नहीं उड़ते । सायंकाल के सवन में इनका फिर प्रयोग होता है। ये पक्षी अपने पंखों को सिकोड़कर उड़ते हैं जब उड़ान को बन्द