शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२९० * संक्षिप्त शिवपुराण *
ही अग्निमें समा गयीं, यद्यपि ब्राह्मणदेव सामनेसे उन्हें बारंबार ऐसा करनेसे रोक रहे थे। अग्निमें प्रवेश करती हुई पर्वतराजकुमारी पार्वतीकी तपस्याके प्रभावसे वह आग उसी क्षण चन्दनपंकके समान शीतल हो गयी। क्षणभर उस आगके भीतर रहकर जब पार्वती आकाशमें ऊपरकी ओर उठने लगीं, तब ब्राह्मण-रूपधारी शिवने सहसा हँसते हुए उनसे पुनः पूछा—'अहो भद्रे! तुम्हारा तप क्या है, यह कुछ भी मेरी समझमें नहीं आया। इधर अग्निसे तुम्हारा शरीर नहीं जला, यह तो तपस्याकी सफलताका सूचक है; परंतु अबतक तुम्हें अपना मनोरथ प्राप्त नहीं हुआ, इससे उसकी विफलता प्रकट होती है। अतः देवि! सबको आनन्द देनेवाले मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मणके सामने तुम अपने अभीष्ट मनोरथको सच-सच बताओ।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अम्बिकाने अपनी सखीको उत्तर देनेके लिये प्रेरित किया। पार्वतीसे प्रेरित हो उनकी विजया नामक प्राणप्यारी सखीने, जो उत्तम व्रतको जाननेवाली थी, जटाधारी तपस्वीसे कहा।
सखी बोली—साधो! तुमसे पार्वतीके उत्तम चरित्रका और इनकी तपस्याके समस्त कारणोंका वर्णन करती हूँ। आप सुनना चाहते हों तो सुनिये। मेरी सखी गिरिराज हिमाचलकी पुत्री हैं। ये पार्वती और काली नामसे विख्यात हैं तथा माता मेनकाकी कन्या हैं। अबतक किसीने इनके साथ विवाह नहीं किया है। ये भगवान् शिवके सिवा दूसरे किसीको चाहती भी नहीं। उन्हींके लिये तीन हजार वर्षोंसे तपस्या कर रही हैं। भगवान् शिवकी प्राप्तिके लिये ही मेरी इन सखीने ऐसा तप प्रारम्भ किया है। विप्रवर! इसमें जो कारण है, उसे बताती हूँ; सुनिये। ये पर्वतराजकुमारी ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवताओंको भी छोड़कर केवल पिनाकपाणि भगवान् शंकरको ही पतिरूपमें प्राप्त करना चाहती हैं और नारदजीके आदेशसे यह कठोर तपस्या कर रही हैं। द्विजश्रेष्ठ! आपने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी सखीका मनोरथ बता दिया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! विजयाका यह यथार्थ वचन सुनकर जटाधारी तपस्वी रुद्र हँसते हुए बोले—'सखीने यह जो कुछ
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कहा है, उसमें मुझे परिहासका अनुमान होता है। यदि यह सब ठीक हो तो पार्वतीदेवी अपने मुँहसे कहें।'
जटिल ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर पार्वतीदेवी अपने मुँहसे ही यों कहने लगीं।
(अध्याय २६)
पार्वतीकी बात सुनकर जटाधारी ब्राह्मणका शिवकी निन्दा करते हुए पार्वतीको उनकी ओरसे मनको हटा लेनेका आदेश देना
पार्वती बोलीं—जटाधारी विप्रवर! मेरा सारा वृत्तान्त सुनिये। मेरी सखीने जो कुछ कहा है, वह ज्यों-का-त्यों सत्य है; उसमें असत्य कुछ भी नहीं है। मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा सत्य ही कहती हूँ, असत्य नहीं। मैंने साक्षात् पतिभावसे भगवान् शंकरका ही वरण किया है। यद्यपि जानती हूँ, वह दुर्लभ वस्तु भला मुझे कैसे प्राप्त हो सकती है; तथापि मनकी उत्कण्ठासे विवश हो मैं तपस्या कर रही हूँ।
ब्राह्मणसे ऐसी बात कहकर पार्वतीदेवी उस समय चुप हो रहीं। तब उनकी वह बात सुनकर ब्राह्मणने कहा।
ब्राह्मण बोले—इस समयतक मेरे मनमें यह जाननेकी प्रबल इच्छा थी कि ये देवी किस दुर्लभ वस्तुको चाहती हैं? जिसके लिये ऐसा महान् तप कर रही हैं। किंतु देवि! तुम्हारे मुखारविन्दसे सब कुछ सुनकर उस अभीष्ट वस्तुको जान लेनेके बाद अब मैं यहाँसे जा रहा हूँ। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो। यदि तुम मुझसे न कहती तो मित्रता निष्फल होती। अब जैसा तुम्हारा कार्य है, वैसा ही उसका परिणाम होगा। जब तुम्हें इसीमें सुख है, तब मुझे कुछ नहीं कहना है।
वहाँ ऐसी बात कहकर ब्राह्मणने ज्यों ही जानेका विचार किया, त्यों ही पार्वतीदेवीने प्रणाम करके उनसे इस प्रकार कहा।
पार्वती बोलीं—विप्रवर! आप क्यों जायँगे? ठहरिये और मेरे हितकी बात बताइये।
पार्वतीके ऐसा कहनेपर दण्डधारी ब्राह्मणदेवता रुक गये और इस प्रकार बोले—‘देवि! यदि मेरी बात सुननेका मन है और मुझे भक्तिभावसे ठहरा रही हो तो मैं वह सब तत्त्व बता रहा हूँ, जिससे तुम्हें हिताहितका ज्ञान हो जायगा। महादेवजीके प्रति मेरे मनमें गौरव-बुद्धि है, अतः मैं उनको सब प्रकारसे जानता हूँ; तो भी यथार्थ बात कहता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। वृषभके चिह्नसे अंकित ध्वजा धारण करनेवाले महादेवजी सारे शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, सिरपर जटा धारण करते हैं, धोतीकी जगह बाघका चाम पहनते और चादरकी जगह हाथीकी खाल ओढ़ते हैं। हाथमें भीख माँगनेके लिये एक खोपड़ी लिये रहते हैं। झुंड-के-झुंड साँप उनके सारे अंगोंमें लिपटे देखे जाते हैं। वे विष खाकर ही पुष्ट होते हैं, अभक्ष्यभक्षी हैं, उनके नेत्र बड़े भद्दे हैं और देखनेमें डरावने लगते हैं। उनका जन्म कब, कहाँ और किससे हुआ, यह आजतक प्रकट नहीं हुआ। घर-गृहस्थीके भोगसे वे सदा दूर ही रहते हैं, नंग-धड़ंग घूमते हैं और भूत-प्रेतोंको सदा
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साथ रखते हैं। उनके एक-दो नहीं, दस भुजाएँ हैं। देवि! मैं समझ नहीं पाता कि किस कारणसे तुम उन्हें अपना पति बनाना चाहती हो। तुम्हारा ज्ञान कहाँ चला गया, इस बातको आज सोच-विचारकर मुझे बताओ। दक्षने अपने यज्ञमें अपनी ही पुत्री सतीको केवल यही सोचकर नहीं बुलाया कि वह कपालधारी भिक्षुककी भार्या है। इतना ही नहीं, उन्होंने यज्ञमें भाग देनेके लिये सब देवताओंको बुलाया, किंतु शम्भुको छोड़ दिया। सती उसी अपमानके कारण अत्यन्त क्रोधसे व्याकुल हो उठी। उसने अपने प्यारे प्राणोंको तो छोड़ा ही; शंकरजीको भी त्याग दिया।
'तुम तो स्त्रियोंमें रत्न हो, तुम्हारे पिता समस्त पर्वतोंके राजा हैं, फिर तुम क्यों इस उग्र तपस्याके द्वारा वैसे पतिको पानेकी अभिलाषा करती हो? सोनेकी मुद्रा (अशर्फी) देकर बदलेमें उतना ही बड़ा काँच लेना चाहती हो? उज्ज्वल चन्दन छोड़कर अपने अंगोंमें कीचड़ लपेटना चाहती हो? सूर्यके तेजका परित्याग करके जुगनूकी चमक पाना चाहती हो? महीन वस्त्र त्यागकर अपने शरीरको चमड़ेसे ढकनेकी इच्छा करती हो? घरमें रहना छोड़कर वनमें धूनी रमाना चाहती हो? तथा देवेश्वरि! यदि तुम इन्द्र आदि लोकपालोंको त्यागकर शिवके प्रति अनुरक्त हो तो अवश्य ही रत्नोंके उत्तम भंडारको त्यागकर लोहा पानेकी इच्छा करती हो। लोकमें इस बातको अच्छा नहीं कहा गया है। शिवके साथ तुम्हारा सम्बन्ध मुझे इस समय परस्परविरुद्ध दिखायी देता है। कहाँ तुम, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं और कहाँ वे रुद्र, जो तीन भद्दी आँखें धारण करते हैं। तुम तो चन्द्रमुखी* हो और शिव पंचमुख कहे गये हैं। तुम्हारे सिरपर दिव्य वेणी सर्पिणी-सी शोभा पा रही है; परंतु शिवके मस्तकपर जो जटाजूट बताया जाता है, वह प्रसिद्ध ही है। तुम्हारे अंगमें चन्दनका अंगराग होगा और शिवके शरीरमें चिताका भस्म! कहाँ तुम्हारी सुन्दर मृदुल साड़ी और कहाँ शंकरजीके उपयोगमें आनेवाली हाथीकी खाल? कहाँ तुम्हारे अंगोंमें दिव्य आभूषण और कहाँ शंकरके सर्वांगमें लिपटे हुए सर्प? कहाँ तुम्हारी सेवाके लिये उद्यत रहनेवाले सम्पूर्ण देवता और कहाँ भूतोंकी दी हुई बलिको पसंद करनेवाले शिव? कहाँ तो मृदंगकी मधुर ध्वनि और कहाँ डमरूकी डिमडिम? कहाँ भेरियोंके समूहकी गड़गड़ाहट और कहाँ अशुभ शृंगीनाद? कहाँ ढक्काका शब्द और कहाँ अशुभ गलनाद? तुम्हारा यह उत्तम रूप शिवके योग्य कदापि नहीं है। यदि उनके पास धन होता तो वे दिगम्बर (नंगे) क्यों रहते? सवारीके नामपर उनके पास एक बूढ़ा बैल है और दूसरी कोई भी सामग्री उनके पास नहीं है। कन्याके लिये ढूँढ़े
* अंकोंकी संज्ञाओंमें चन्द्रमाको एक संख्याका बोधक माना गया है। एक मुखवाले पुरुष और स्त्रियाँ ही सुन्दर माने जाते हैं, एकसे अधिक मुखवाले नहीं। इस प्रकार एकमुख और पंचमुखकी भी तुलना की गयी है। 'चन्द्रमुखी' पदका दूसरा भाव है—तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान मनोहर है और वे पंचानन सिंहके समान भयंकर हैं।
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* रुद्रसंहिता * २९३
जानेवाले वरोंमें जो नारियोंको सुख देनेवाले गुण बताये गये हैं, उनमेंसे एक भी गुण भद्दी आँखवाले रुद्रमें नहीं है। तुम्हारे परम प्रिय कामको भी उन हर देवताने दग्ध कर दिया और तुम्हारे प्रति उनका अनादर तो तभी देख लिया गया, जब वे तुम्हें छोड़कर अन्यत्र चले गये। उनकी कोई जाति नहीं देखी जाती। उनमें विद्या तथा ज्ञानका भी पता नहीं चलता। पिशाच ही उनके सहायक हैं और विष तो उनके कण्ठमें ही दिखायी देता है। वे सदा अकेले रहनेवाले और विशेषरूपसे विरक्त हैं। इसलिये तुम्हें हरके साथ अपने मनको नहीं जोड़ना चाहिये। कहाँ तुम्हारे कण्ठमें सुन्दर हार और कहाँ उनके गलेमें नरमुण्डोंकी माला? देवि! तुम्हारे और हरके रूप आदि सब एक-दूसरेके विरुद्ध हैं। अतः मुझे तो यह सम्बन्ध नहीं रुचता। फिर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो। संसारमें जो कुछ भी असद्वस्तु है, वह सब तुम स्वयं चाहने लगी हो। अतः मैं कहता हूँ कि तुम उस असत्की ओरसे अपने मनको हटा लो। अन्यथा जो चाहो, वह करो; मुझे कुछ नहीं कहना है।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! यह बात सुनकर पार्वती शिवकी निन्दा करनेवाले ब्राह्मणपर मन-ही-मन कुपित हो उठीं और उससे इस प्रकार बोलीं।
(अध्याय २७)
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पार्वतीजीका परमेश्वर शिवकी महत्ताका प्रतिपादन करना, रोषपूर्वक जटिल ब्राह्मणको फटकारना, सखीद्वारा उन्हें फिर बोलनेसे रोकना तथा भगवान् शिवका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दे अपने साथ चलनेके लिये कहना
पार्वती बोलीं—बाबा जी! अबतक तो मैंने यह समझा था कि कोई दूसरे ज्ञानी महात्मा आ गये हैं। परंतु अब सब ज्ञात हो गया—आपकी कलई खुल गयी। आपसे क्या कहूँ—विशेषतः उस दशामें, जब आप अवध्य ब्राह्मण हैं? ब्राह्मणदेवता! आपने जो कुछ कहा है, वह सब मुझे ज्ञात है। परंतु वह सब झूठा ही है, सत्य कुछ नहीं है। आपने कहा था कि मैं शिवको जानता हूँ। यदि आपकी यह बात ठीक होती तो आप ऐसी युक्ति एवं बुद्धिके विरुद्ध बात नहीं बोलते। यह ठीक है कि कभी-कभी महेश्वर अपनी लीलाशक्तिसे प्रेरित हो तथाकथित अद्भुत वेष धारण कर लिया करते हैं। परंतु वास्तवमें वे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं। उन्होंने स्वेच्छासे ही शरीर धारण किया है। आप ब्रह्मचारीका स्वरूप धारण कर मुझे ठगनेके लिये उद्यत हो यहाँ आये हैं और अनुचित एवं असंगत युक्तियोंका सहारा ले छल-कपटसे युक्त बातें बोल रहे हैं! मैं भगवान् शंकरके स्वरूपको भलीभाँति जानती हूँ। इसलिये यथायोग्य विचार करके उनके तत्त्वका वर्णन करती हूँ। वास्तवमें शिव निर्गुण ब्रह्म हैं, कारणवश सगुण हो गये हैं। जो निर्गुण हैं, समस्त गुण जिनके स्वरूपभूत हैं, उनकी जाति कैसे हो सकती है? वे भगवान् सदाशिव समस्त विद्याओंके आधार हैं। फिर उन पूर्ण परमात्माको किसी विद्यासे क्या काम? पूर्वकालमें कल्पके आरम्भमें भगवान् शम्भुने श्रीविष्णुको
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
उच्छ्वासरूपसे सम्पूर्ण वेद प्रदान किये थे। अतः उनके समान उत्तम प्रभु दूसरा कौन है? जो सबके आदि कारण हैं, उनकी अवस्था अथवा आयुका माप-तौल कैसे हो सकता है? प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है। फिर उनकी शक्तिका दूसरा क्या कारण हो सकता है? जो लोग सदा प्रेमपूर्वक शक्तिके स्वामी भगवान् शंकरका भजन करते हैं, उन्हें भगवान् शम्भु प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति—ये तीनों अक्षय शक्तियाँ प्रदान करते हैं। भगवान् शिवके भजनसे ही जीव मृत्युको जीत लेता और निर्भय हो जाता है। इसलिये तीनों लोकोंमें उनका ‘मृत्युंजय’ नाम प्रसिद्ध है। उन्हींके अनुग्रहसे विष्णु विष्णुत्वको, ब्रह्मा ब्रह्मत्वको और देवता देवत्वको प्राप्त हुए हैं। शिवजीका पक्ष लेकर बहुत बोलनेसे क्या लाभ? वे भगवान् स्वयं ही महाप्रभु हैं। कल्याणरूपी शिवकी सेवासे यहाँ कौन-सा मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता? उन महादेवजीके पास किस बातकी कमी है, जो वे भगवान् सदाशिव स्वयं मुझे पानेकी इच्छा करें? यदि शंकरकी सेवा न करे तो मनुष्य सात जन्मोंतक दरिद्र होता है और उन्हींकी सेवासे सेवकको लोकमें कभी नष्ट न होनेवाली लक्ष्मी प्राप्त होती है। जिनके सामने आठों सिद्धियाँ नित्य आकर सिर नीचा किये इस इच्छासे नृत्य करती हैं कि वे भगवान् हमपर संतुष्ट हो जायें, उनके लिये कोई भी हितकर वस्तु दुर्लभ कैसे हो सकती है? यद्यपि यहाँ मांगलिक कही जानेवाली वस्तुएँ शंकरका सेवन नहीं करतीं, तथापि उनके स्मरणमात्रसे ही सबका मंगल होता है। जिनकी पूजाके प्रभावसे उपासककी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं, सदा निर्विकार रहनेवाले उन परमात्मा शिवमें विकार कहाँसे आ सकता है? जिस पुरुषके मुखमें निरन्तर ‘शिव’ यह मंगलमय नाम निवास करता है, उसके दर्शनमात्रसे ही अन्य सब सदा पवित्र होते हैं। जैसा कि आपने कहा है, वे चिताका भस्म लगाते हैं। परंतु यदि उनका लगाया हुआ भस्म अपवित्र होता तो उनके शरीरसे झड़कर गिरे हुए उस भस्मको देवतालोग सदा अपने सिरपर कैसे धारण करते? (अतः शिवके अंगोंके स्पर्शसे अपवित्र वस्तु भी पवित्र हो जाती है।) जो महादेव सगुण होकर तीनों लोकोंके कर्ता-भर्ता और हर्ता होते हैं तथा निर्गुणरूपमें शिव कहलाते हैं, वे बुद्धिके द्वारा पूर्णरूपसे कैसे जाने जा सकते हैं? परब्रह्म परमात्मा शिवका जो निर्गुण रूप है, उसे आप-जैसे बहिर्मुख लोग कैसे जान सकते हैं? जो दुराचारी और पापी हैं, वे देवताओंसे बहिष्कृत हो जाते हैं। ऐसे लोग निर्गुण शिवके तत्त्वको नहीं जानते। जो पुरुष तत्त्वको न जाननेके कारण यहाँ शिवकी निन्दा करता है, उसके जन्मभरका सारा संचित पुण्य भस्म हो जाता है। आपने जो यहाँ अमित तेजस्वी महादेवजीकी निन्दा की है और मैंने जो आपकी पूजा की है, उससे मुझे पापकी भागिनी होना पड़ा है। शिवद्रोहीको देखकर वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये, शिवद्रोहीका दर्शन हो जानेपर प्रायश्चित्त करना चाहिये।
इतना कहकर पार्वतीजी उस ब्राह्मणपर अधिक रुष्ट होकर बोलीं—अरे रे दुष्ट! तूने कहा था कि मैं शंकरको जानता हूँ, परंतु निश्चय ही तूने उन सनातन शिवको नहीं
* रुद्रसंहिता * २९५
जाना है। भगवान् रुद्रको तू जैसा कहता है, वे वैसे ही क्यों न हों, उनके-जैसे भी बहुसंख्यक रूप क्यों न हों, सत्पुरुषोंके प्रियतम नित्य-निर्विकार वे भगवान् शिव ही मेरे अभीष्टतम देव हैं। ब्रह्मा और विष्णु भी कभी उन महात्मा हरके समान नहीं हो सकते। फिर दूसरे देवताओंकी तो बात ही क्या है? क्योंकि वे सदैव कालके अधीन हैं। इस प्रकार अपनी शुद्धबुद्धिसे तत्त्वतः विचारकर मैं शिवके लिये वनमें आकर बड़ी भारी तपस्या कर रही हूँ। वे भक्तवत्सल सर्वेश्वर शिव ही हम सबके परमेश्वर हैं। दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले उन महादेवको ही प्राप्त करनेकी मेरी इच्छा है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर गिरिराजनन्दिनी गिरिजा चुप हो गयीं और निर्विकार चित्तसे भगवान् शिवका ध्यान करने लगीं। देवीकी बात सुनकर वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण ज्यों ही कुछ फिर कहनेके लिये उद्यत हुआ, त्यों ही शिवमें आसक्तचित्त होनेके कारण उनकी निन्दा सुननेसे विमुख हुई पार्वती अपनी सखी विजयासे शीघ्र बोलीं।
पार्वतीने कहा—सखी! इस अधम ब्राह्मणको यत्नपूर्वक रोको, यह फिर कुछ कहना चाहता है। यह केवल शिवकी निन्दा ही करेगा, जो शिवकी निन्दा करता है, केवल उसीको पाप नहीं लगता, जो उस निन्दाको सुनता है, वह भी यहाँ पापका भागी होता है।* भगवान् शिवके उपासकोंको चाहिये कि वे शिवकी निन्दा करनेवालेका सर्वथा वध करें। यदि वह ब्राह्मण हो तो उसे अवश्य ही त्याग दें और स्वयं उस निन्दाके स्थानसे शीघ्र दूर चले जायँ। यह दुष्ट ब्राह्मण फिर शिवकी निन्दा करेगा। ब्राह्मण होनेके कारण यह वध्य तो है नहीं, अतः त्याग देनेयोग्य है। किसी तरह भी इसका मुँह नहीं देखना चाहिये। इस स्थानको छोड़कर हमलोग आज ही किसी दूसरे स्थानमें शीघ्र चली चलें, जिससे फिर इस अज्ञानीके साथ बात करनेका अवसर न मिले।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर उमाने ज्यों ही अन्यत्र जानेके लिये पैर उठाया, त्यों ही भगवान् शिवने अपने साक्षात् स्वरूपसे प्रकट हो प्रिया पार्वतीका हाथ पकड़ लिया। शिवा जैसे स्वरूपका ध्यान करती थीं, वैसा ही सुन्दर रूप धारण करके शिवने उन्हें दर्शन दिया। पार्वतीने लज्जावश अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया।
तब भगवान् शिव उनसे बोले—प्रिये! मुझे छोड़कर कहाँ जाओगी ? अब मैं फिर कभी तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा। मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो। मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है। देवि! आजसे मैं तपस्याके मोल खरीदा हुआ तुम्हारा दास हूँ। तुम्हारे सौन्दर्यने भी मुझे मोह लिया है। अब तुम्हारे बिना मुझे एक क्षण भी युगके समान जान पड़ता है। लज्जा छोड़ो। तुम तो मेरी सनातन पत्नी हो। गिरिराजनन्दिनि! महेश्वरि! मैंने जो कुछ कहा है, उसपर श्रेष्ठ बुद्धिसे विचार
* न केवलं भवेत् पापं निन्दाकर्तुः शिवस्य हि। यो वै शृणोति तन्निन्दां पापभाक् स भवेदिह॥
(शि० पु० रू० सं० पा० खं० २८। ३७)
२९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
करो। सुस्थिर चित्तवाली पार्वती! मैंने नाना प्रकारसे तुम्हारी बारंबार परीक्षा ली है। लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले मुझ स्वजनके अपराधको क्षमा कर दो। शिवे! तीनों लोकोंमें तुम्हारी-जैसी अनुरागिणी मुझे दूसरी कोई नहीं दिखायी देती। मैं सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ। तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। प्रिये! मेरे पास आओ। तुम मेरी पत्नी हो और मैं तुम्हारा वर हूँ। तुम्हारे साथ मैं शीघ्र ही अपने निवासस्थान उत्तम पर्वत कैलासको चलूँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर पार्वतीदेवी आनन्दमग्न हो उठीं। उनका तपस्याजनित पहलेका सारा कष्ट मिट गया। मुनिश्रेष्ठ! सती-साध्वी पार्वतीकी सारी थकावट दूर हो गयी; क्योंकि परिश्रम-फल प्राप्त हो जानेपर प्राणीका पहलेवाला सारा श्रम नष्ट हो जाता है।
(अध्याय २८)
शिव और पार्वतीकी बातचीत, शिवका पार्वतीके अनुरोधको स्वीकार करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! परमात्मा हरकी यह बात सुनकर और उनके आनन्ददायी रूपका दर्शन पाकर पार्वतीको बड़ा हर्ष हुआ। उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वे बहुत सुखका अनुभव करने लगीं। फिर उन महासाध्वी शिवाने अपने पास ही खड़े हुए भगवान् शिवसे कहा।
पार्वती बोलीं—देवेश्वर! आप मेरे स्वामी हैं। प्रभो! पूर्वकालमें आपने जिसके लिये हर्षपूर्वक दक्षके यज्ञका विनाश किया था, उसे क्यों भुला दिया था! वे ही आप हैं और वही मैं हूँ। देवदेवेश्वर! इस समय मैं तारकासुरसे दुःख पानेवाले देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये रानी मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई हूँ। देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझपर कृपा करते हैं तो मेरे पति हो जाइये। ईशान! प्रभो! मेरी यह बात मान लीजिये, आपकी आज्ञा लेकर मैं पिताके घर जाती हूँ। अब आप अपने विवाहरूप परम उत्तम विशुद्ध यशको सर्वत्र विख्यात कीजिये। नाथ! प्रभो! आप तो लीला करनेमें कुशल हैं। अतः मेरे पिता हिमवान्के पास चलिये और याचक बनकर उनसे मेरी याचना कीजिये। लोकमें मेरे पिताके यशको फैलाते हुए आपको ऐसा ही करना चाहिये। इस तरह आप मेरे सम्पूर्ण गृहस्थाश्रमको सफल बनाइये। जब आप प्रसन्नतापूर्वक ऋषियोंसे मेरे पिताको सब बातोंकी जानकारी करायेंगे, तब मेरे पिता अपने भाई-बन्धुओंके साथ आपकी आज्ञाका पालन करेंगे—इसमें संदेह नहीं है। जब मैं पहले प्रजापति दक्षकी कन्या थी और मेरे पिताने आपके हाथमें मेरा हाथ दिया, उस समय आपने शास्त्रोक्त विधिसे विवाहका कार्य पूरा नहीं किया। मेरे पिता दक्षने ग्रहोंकी पूजा नहीं की। अतः उस विवाहमें ग्रहपूजनविषयक बड़ी भारी त्रुटि रह गयी। इसलिये प्रभो! महादेव! अबकी बार देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये आप शास्त्रोक्त विधिसे विवाहकार्यका सम्पादन करें। विवाहकी जैसी रीति है, उसका पालन आपको अवश्य करना
* रुद्रसंहिता * २९७
चाहिये। मेरे पिता हिमवान्को यह अच्छी तरह ज्ञात हो जाना चाहिये कि मेरी पुत्रीने शुभकारक तपस्या की है।
पार्वतीकी ऐसी बात सुनकर भगवान् सदाशिव बड़े प्रसन्न हुए और उनसे हँसते हुए-से प्रेमपूर्वक बोले।
शिवने कहा—देवि! महेश्वरि! मेरी यह उत्तम बात सुनो, यह उचित, मंगलकारक और निर्दोष है। इसे सुनकर वैसा ही करो। वरानने! ब्रह्मा आदि जितने भी प्राणी हैं, वे सब अनित्य हैं। भामिनि! यह सब जो कुछ दिखायी देता है, इसे नश्वर समझो। मैं निर्गुण परमात्मा ही गुणोंसे युक्त हो एकसे अनेक हो गया हूँ। जो अपने प्रकाशसे प्रकाशित होता है, वही परमात्मा मैं दूसरेके प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला हो गया। देवि! मैं स्वतन्त्र हूँ, परंतु तुमने मुझे परतन्त्र बना दिया। समस्त कर्मोंको करनेवाली प्रकृति एवं महामाया तुम्हीं हो। यह सम्पूर्ण जगत् मायामय ही रचा गया है। मुझ सर्वात्मा परमात्माने अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा इसे धारणमात्र कर रखा है। सर्वत्र परमात्मभाव रखनेवाले सर्वात्मा पुण्यवानोंने इसे अपने भीतर सींचा है तथा यह तीनों गुणोंसे आवेष्टित है। देवि! वरवर्णिनि! कौन मुख्य ग्रह हैं? कौन-से ऋतुसमूह हैं? अथवा कौन दूसरे-दूसरे उपग्रह हैं? इस समय तुमने शिवके लिये क्या कहा है—किस कर्तव्यका विधान किया है? गुण और कार्यके भेदसे हम दोनोंने इस जगत्में भक्तवत्सलताके कारण भक्तोंको सुख देनेके हेतु अवतार ग्रहण किया है। तुम्हीं रजःसत्त्व-तमोमयी (त्रिगुणात्मिका) सूक्ष्म प्रकृति हो, सदा व्यापारकुशल सगुणा और निर्गुणा भी हो। सुमध्यमे! मैं यहाँ सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा, निर्विकार एवं निरीह हूँ। भक्तकी इच्छासे मैंने शरीर धारण किया है। शैलजे! मैं तुम्हारे पिता हिमालयके पास नहीं जा सकता तथा भिक्षुक होकर किसी तरह तुम्हारी उनसे याचना भी नहीं कर सकता। गिरिराजनन्दिनि! महान् गुणोंसे अत्यन्त गौरवशाली महात्मा पुरुष भी अपने मुँहसे 'देहि' (दो) यह बात निकालनेपर तत्काल लघुताको प्राप्त हो जाता है। कल्याणि! ऐसा जानकर हमारे लिये क्या कहती हो? भद्रे! तुम्हारी आज्ञासे मुझे सब कुछ करना है। अतः जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो।
महादेवजीके ऐसा कहनेपर भी सती-साध्वी कमलोचना महादेवी शिवाने उन भगवान् शंकरको बारंबार भक्ति-भावसे प्रणाम करके कहा।
पार्वती बोलीं—नाथ! आप आत्मा हैं और मैं प्रकृति। इस विषयमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है। हम दोनों स्वतन्त्र और निर्गुण होते हुए भी भक्तोंके अधीन होनेके कारण सगुण हो जाते हैं। शम्भो! प्रभो! आपको प्रयत्नपूर्वक मेरी प्रार्थनाके अनुसार कार्य करना चाहिये। शंकर! आप मेरे लिये याचना करें और हिमवान्को दाता बननेका सौभाग्य प्रदान करें। महेश्वर! मैं सदा आपकी भक्ता हूँ, अतः मुझपर कृपा कीजिये। नाथ! सदा जन्म-जन्ममें मैं ही आपकी पत्नी होती रही हूँ। आप परब्रह्म परमात्मा हैं, निर्गुण हैं, प्रकृतिसे परे हैं, निर्विकार, निरीह एवं स्वतन्त्र परमेश्वर हैं; तथापि भक्तोंके उद्धारमें संलग्न होकर यहाँ सगुण भी हो जाते हैं, स्वात्माराम होकर भी
२९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
लीलाविहारी बन जाते हैं; क्योंकि आप नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेमें कुशल हैं। महादेव! महेश्वर! मैं सब प्रकारसे आपको जानती हूँ। सर्वज्ञ! अब बहुत कहनेसे क्या लाभ? मुझपर दया कीजिये। नाथ! महान् अद्भुत लीला करके लोकमें अपने सुयशका विस्तार कीजिये, जिसे गा-गाकर लोग अनायास ही भवसागरसे पार हो जायँ।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर गिरिजाने महेश्वरको बारंबार प्रणाम किया और मस्तक झुकाकर हाथ जोड़ वे चुप हो गयीं। उनके ऐसा कहनेपर महात्मा महेश्वरने लोकलीलाका अनुसरण करनेके लिये वैसा करना स्वीकार कर लिया। पार्वतीने जो कुछ कहा था, उसीको प्रसन्नतापूर्वक करनेके लिये उद्यत होकर वे हँसने लगे। तदनन्तर हर्षसे भरे हुए शम्भु अन्तर्धान हो कैलासको चले गये। उस समय कालीके विरहसे उनका चित्त उन्हींकी ओर खिंच गया था। कैलासपर जाकर परमानन्दमें निमग्न हुए महेश्वरने अपने नन्दी आदि गणोंसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वे भैरव आदि सभी गण भी वह सब समाचार सुनकर अत्यन्त सुखी हो गये और महान् उत्सव करने लगे। नारद! उस समय वहाँ महान् मंगल होने लगा। सबके दुःख नष्ट हो गये तथा रुद्रदेवको भी पूर्ण आनन्द प्राप्त हुआ। (अध्याय २९)
पार्वतीका पिताके घरमें सत्कार, महादेवजीकी नटलीलाका चमत्कार, उनका मेना आदिसे पार्वतीको माँगना और माता-पिताके इनकार करनेपर अन्तर्धान हो जाना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् शंकरके अपने स्थानको चले जानेपर सखियोंसहित पार्वती भी अपने रूपको सफल करके महादेवजीका नाम लेती हुई पिताजीके घर चली गयीं। पार्वतीका आगमन सुनकर मेना और हिमाचल दिव्य रथपर आरूढ़ हो हर्षसे विह्वल होकर उनकी अगवानीके लिये चले। पुरोहित, पुरवासी, अनेकानेक सखियाँ तथा अन्य सब सम्बन्धी भी आ पहुँचे। पार्वतीके सारे भाई मैनाक आदि बड़े हर्षके साथ जय-जयकार करते हुए उन्हें घर ले आनेके लिये गये।
इसी बीचमें पार्वती अपने नगरके निकट आ गयीं। नगरमें प्रवेश करते समय शिवा देवीने माता-पिताको देखा, जो अत्यन्त प्रसन्न और हर्षसे विह्वलचित्त होकर दौड़े चले आ रहे थे। उन्हें देखकर हर्षसे भरी हुई कालीने सखियोंसहित प्रणाम किया। माता-पिताने पूर्णरूपसे आशीर्वाद दे पुत्रीको छातीसे लगा लिया और ‘ओ, मेरी बच्ची!’ ऐसा कहकर प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। तत्पश्चात् अपने घरकी दूसरी-दूसरी स्त्रियों तथा भाभियोंने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रेमपूर्वक उन्हें भुजाओंमें भरकर भेंटा। ‘देवि! तुमने अपने कुलका उद्धार करनेवाले उत्तम कार्यको अच्छी तरह सिद्ध किया है। तुम्हारे सदाचरणसे हम सब लोग पवित्र हो गये’ ऐसा कहकर सब लोग हर्षके साथ पार्वतीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रणाम करने लगे। लोगोंने चन्दन और
* रुद्रसंहिता * २९९
सुन्दर फूलोंसे शिवादेवीका सानन्द पूजन किया। उस अवसरपर विमानपर बैठे हुए देवताओंने पार्वतीको नमस्कार करके उनपर फूलोंकी वर्षा करते हुए स्तुति की। नारद! उस समय तुम्हें भी एक सुन्दर रथपर बिठाकर ब्राह्मण आदि सब लोग नगरमें ले गये। फिर ब्राह्मणों, सखियों तथा दूसरी स्त्रियोंने बड़े आदरके साथ शिवाका घरके भीतर प्रवेश कराया। स्त्रियोंने उनके ऊपर बहुत-सी वस्तुएँ निछावर कीं। ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिये। मुनीश्वर! पिता हिमवान् और माता मेनकाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने गृहस्थ-आश्रमको सफल माना और यह अनुभव किया कि कुपुत्रकी अपेक्षा सुपुत्री ही श्रेष्ठ है। गिरिराजने ब्राह्मणों और वन्दीजनोंको धन दिया और ब्राह्मणोंसे मंगलपाठ करवाया। मुने! इस प्रकार पार्वतीके साथ हर्षभरे माता-पिता, भाई तथा भौजाइयाँ भी घरके आँगनमें प्रसन्नतापूर्वक बैठीं।
तदनन्तर हिमवान् प्रसन्नचित्तसे सबका आदर-सत्कार करके गंगा-स्नानके लिये गये। इसी बीचमें सुन्दर लीला करनेवाले भक्तवत्सल भगवान् शम्भु एक अच्छा नाचनेवाला नट बनकर मेनकाके पास गये। उन्होंने बायें हाथमें सींग और दाहिने हाथमें डमरू ले रखा था। पीठपर कथरी रख छोड़ी थी। लाल वस्त्र पहने वे भगवान् रुद्र नाच और गानमें अपनी निपुणताका परिचय दे रहे थे। सुन्दर नटका रूप धारण किये हुए भगवान् शिवने मेनकाके पास बैठी हुई स्त्रियोंकी टोलीके समीप सुन्दर नृत्य किया और अत्यन्त मनोहर नाना प्रकारके गीत गाये। उन्होंने वहाँ सुन्दर ध्वनि करनेवाले शृंग और डमरूको भी बजाया तथा नाना प्रकारकी बड़ी मनोहारिणी लीला की। नटराजकी उस लीलाको देखनेके लिये नगरके सभी स्त्री-पुरुष एवं बालक और वृद्ध भी सहसा वहाँ आ पहुँचे। मुने! उस सुमधुर गीतको सुनकर और उस मनोहर उत्तम नृत्यको देखकर वहाँ आये हुए सब लोग तत्काल मोहित हो गये। मेना भी मोही गयीं। उधर पार्वतीने अपने हृदयमें भगवान् शंकरका साक्षात् दर्शन किया। वे त्रिशूल आदि चिह्न धारण किये अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते थे। उनका सारा अंग विभूतिसे विभूषित था। वे हड्डियोंकी मालासे अलंकृत थे। उनका मुख सूर्य, चन्द्र एवं अग्निरूप तीन नेत्रोंसे उद्भासित था। उन्होंने नागका यज्ञोपवीत धारण किया था। उनके उस सुरम्य रूपको देखकर दुर्गा प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गयीं। गौरवर्णविभूषित दीन-बन्धु दयासिन्धु और सर्वथा मनोहर महेश्वर
३०० * संक्षिप्त शिवपुराण *
पार्वतीसे कह रहे थे कि 'वर माँगो।' अपने हृदयमें विराजमान महादेवजीको इस रूपमें देखकर पार्वतीदेवीने उन्हें प्रणाम किया और मन-ही-मन यह वर माँगा कि 'आप मेरे पति हो जाइये।' प्रीतियुक्त हृदयसे शिवाको वैसा कल्याणकारी वर देकर वे पुनः अन्तर्धान हो गये और वहाँ पूर्ववत् भिक्षा माँगनेवाला नट बनकर उत्तम नृत्य करने लगे।
उस समय मेना सोनेकी थालीमें रखे हुए बहुत-से सुन्दर रत्न ले उन्हें प्रसन्नतापूर्वक देनेके लिये गयीं। उनका वह ऐश्वर्य देखकर भगवान् शंकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। परंतु उन्होंने उन रत्नोंको स्वीकार नहीं किया। वे भिक्षामें उनकी पुत्री शिवाको ही माँगने लगे और पुनः कौतुकवश सुन्दर नृत्य एवं गान करनेको उद्यत हुए। मेना उस भिक्षुक नटकी बात सुनकर अत्यन्त कुपित हो उठीं और उसे डाँटने-फटकारने लगीं। उनके मनमें उसे बाहर निकाल देनेकी इच्छा हुई। इसी बीचमें गिरिराज हिमवान् गंगाजीसे नहाकर लौट आये। उन्होंने अपने सामने उस नराकार भिक्षुकको आँगनमें खड़ा देखा। मेनाके मुखसे सारी बातें सुनकर उनको भी बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि इस नटको बाहर निकाल दो। मुनिश्रेष्ठ! वे नटराज विशालकाय अग्निकी भाँति अपने उत्तम तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें छूना भी कठिन था। इसलिये कोई भी उन्हें बाहर न निकाल सका। तात! फिर तो नाना प्रकारकी लीलाओंमें विशारद उन भिक्षुशिरोमणिने शैलराजको अपना अनन्त प्रभाव दिखाना आरम्भ किया। हिमवान्ने देखा, भिक्षुने वहाँ तत्काल ही भगवान् विष्णुका रूप धारण कर लिया है। उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और शरीरपर पीतवस्त्र शोभा पाते हैं। उनके चार भुजाएँ हैं। हिमवान्ने पूजाके समय गदाधारी श्रीहरिको जो-जो पुष्प आदि चढ़ाये थे, वे सब उन्होंने भिक्षुके शरीर और मस्तकपर देखे। तत्पश्चात् गिरिराजने उन भिक्षुशिरोमणिको जगत्स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें देखा। उनके शरीरका वर्ण लाल था और वे वैदिक सूक्तका पाठ कर रहे थे। तदनन्तर शैलराजने उन कौतुककारी नटराजको एक क्षणमें जगत्के नेत्ररूप सूर्यके आकारमें देखा। तात! इसके बाद वे महान् अद्भुत रुद्रके रूपमें दिखायी दिये। उनके साथ देवी पार्वती भी थीं। वे उत्तम तेजसे सम्पन्न रमणीय रुद्र धीरे-धीरे हँस रहे थे। फिर वे केवल तेजोमय रूपमें दृष्टिगोचर हुए। उनका वह स्वरूप निराकार, निरंजन, उपाधिशून्य, निरीह एवं अत्यन्त अद्भुत था। इस प्रकार हिमवान्ने उनके बहुत-से रूप देखे। इससे उन्हें बड़ा विस्मय हुआ और वे तुरंत ही परमानन्दमें निमग्न हो गये। तदनन्तर सुन्दर लीला करनेवाले उन भिक्षुशिरोमणिने हिमवान् और मेनासे दुर्गाको ही भिक्षाके रूपमें माँगा। दूसरी कोई वस्तु ग्रहण नहीं की। परंतु शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण शैलराजने उनकी उस प्रार्थनाको स्वीकार नहीं किया। फिर भिक्षुने कोई वस्तु नहीं ली और वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब मेना और शैलराजको उत्तम ज्ञान हुआ और वे सोचने लगे—'भगवान् शिव हमें
* रुद्रसंहिता * ३०१
अपनी मायासे छलकर अपने स्थानको चले गये।' यह विचारकर उन दोनोंकी भगवान् शिवमें पराभक्ति हुई, जो महान् मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली, दिव्य तथा सम्पूर्ण आनन्द प्रदान करनेवाली है। (अध्याय ३०)
देवताओंके अनुरोधसे वैष्णव ब्राह्मणके वेषमें शिवजीका हिमवान्के घर जाना और शिवकी निन्दा करके पार्वतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेना और हिमवान्की भगवान् शिवके प्रति उच्च-कोटिकी अनन्यभक्ति देख इन्द्र आदि सब देवता परस्पर विचार करने लगे। तदनन्तर गुरु बृहस्पति और ब्रह्माजीकी सम्मतिके अनुसार सभी मुख्य देवताओंने शिवजीके पास जाकर उनको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—देवदेव! महादेव! करुणाकर! शंकर! हम आपकी शरणमें आये हैं, कृपा कीजिये। आपको नमस्कार है। स्वामिन्! आप भक्तवत्सल होनेके कारण सदा भक्तोंके कार्य सिद्ध करते हैं। दीनोंका उद्धार करनेवाले और दयाके सिन्धु हैं तथा भक्तोंको विपत्तियोंसे छुड़ानेवाले हैं।
इस प्रकार महेश्वरकी स्तुति करके इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने मेना और हिमवान्की अनन्य शिवभक्तिके विषयमें सारी बातें आदरपूर्वक बतायीं। देवताओंकी वह बात सुनकर महेश्वरने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और हँसते हुए उन्हें आश्वासन देकर विदा किया। तब सब देवता अपना कार्य सिद्ध हुआ मानकर भगवान् सदाशिवकी प्रशंसा करते हुए शीघ्र अपने घरको लौटकर प्रसन्नताका अनुभव करने लगे। तदनन्तर भक्तवत्सल महेश्वर भगवान् शम्भु, जो मायाके स्वामी हैं, निर्विकार चित्तसे शैलराजके यहाँ गये। उस समय गिरिराज हिमवान् सभा-भवनमें बन्धुवर्गसे घिरे हुए पार्वतीसहित प्रसन्नतापूर्वक बैठे थे। इसी अवसरपर वहाँ सदाशिवने पदार्पण किया। वे हाथमें दण्ड, छत्र, शरीरपर दिव्य वस्त्र, ललाटमें उज्ज्वल तिलक, एक हाथमें स्फटिककी माला और गलेमें शालग्राम धारण किये भक्तिपूर्वक हरिनामका जप कर रहे थे और देखनेमें साधुवेषधारी ब्राह्मण जान पड़ते थे। उन्हें आया देख सपरिवार हिमवान् उठकर खड़े हो गये। उन्होंने उन अपूर्व अतिथि-देवताको भूतलपर दण्डके समान पड़कर भक्तिभावसे साष्टांग प्रणाम किया। देवी पार्वती ब्राह्मणरूपधारी प्राणेश्वर शिवको पहचान गयी थीं। अतः उन्होंने भी उनको मस्तक झुकाया और मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताके साथ उनकी स्तुति की। ब्राह्मणरूपधारी शिवने उन सबको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद दिया। किंतु शिवाको सबसे अधिक मनोवांछित शुभाशीर्वाद प्रदान किया। शैलाधिराज हिमवान्ने बड़े आदरसे उन्हें मधुपर्क आदि पूजन-सामग्री भेंट की और ब्राह्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ वह सब ग्रहण किया।
३०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तत्पश्चात् गिरिश्रेष्ठ हिमाचलने उनका कुशल-समाचार पूछा। मुने! अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उन द्विजराजकी विधिवत् पूजा करके शैलराजने
पूछा—‘आप कौन हैं?’ तब उन ब्राह्मण-शिरोमणिने गिरिराजसे शीघ्र ही आदर-पूर्वक कहा।
वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बोले—गिरिश्रेष्ठ! मैं उत्तम विद्वान् वैष्णव ब्राह्मण हूँ और ज्योतिषकी वृत्तिका आश्रय लेकर भूतलपर भ्रमण करता रहता हूँ। मनके समान मेरी गति है। मैं सर्वत्र जानेमें समर्थ और गुरुकी दी हुई शक्तिसे सर्वज्ञ, परोपकारी, शुद्धात्मा, दयासिन्धु और विकारनाशक हूँ। मुझे ज्ञात हुआ है कि तुम अपनी इस लक्ष्मी-सरीखी सुन्दर रूपवाली दिव्य सुलक्षणा अपनी पुत्रीको एक आश्रयरहित, असंग, कुरूप और गुणहीन वर—महादेवजीके हाथमें देना चाहते हो। वे रुद्र देवता मरघटमें वास करते, शरीरमें साँप लपेटे रहते और योग साधते फिरते हैं। उनके पास पहननेके लिये एक वस्त्र भी नहीं है। वैसे ही नंग-धड़ंग घूमते हैं। आभूषणकी जगह सर्प धारण करते हैं। उनके कुलका नाम आजतक किसीको ज्ञात नहीं हुआ। वे कुपात्र और कुशील हैं। स्वभावतः विहारसे दूर रहते हैं। सारे शरीरमें भस्म रमाते हैं। क्रोधी और अविवेकी हैं। उनकी अवस्था कितनी है, यह किसीको ज्ञात नहीं। वे अत्यन्त कुत्सित जटाका बोझ सदा सिरपर धारण किये रहते हैं। वे भले-बुरे सबको आश्रय देनेवाले, भ्रमणशील, नागहारधारी, भिक्षुक, कुमार्ग-परायण तथा हठपूर्वक वैदिकमार्गका त्याग करनेवाले हैं। ऐसे अयोग्य वरको आप अपनी बेटी ब्याहना चाहते हैं? अचलराज! अवश्य ही आपका यह विचार मंगलदायक नहीं है। नारायणकुलमें उत्पन्न! ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ गिरिराज! मेरे कथनका मर्म समझो। तुमने जिस पात्रको ढूँढ़ रखा है, वह इस योग्य नहीं है कि उसके हाथमें पार्वतीका हाथ दिया जाय। शैलराज! तुम्हीं देखो, उनके एक भी भाई-बन्धु नहीं हैं। तुम तो बड़े-बड़े रत्नोंकी खान हो। किंतु उनके घरमें भुजी भाँग भी नहीं है—वे सर्वथा निर्धन हैं। गिरिराज! तुम शीघ्र ही अपने भाई-बन्धुओंसे, मेनादेवीसे, सभी बेटोंसे और पण्डितोंसे भी प्रयत्नपूर्वक पूछ लो। किंतु पार्वतीसे न पूछना; क्योंकि उन्हें शिवके गुण-दोषकी परख नहीं है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर वे ब्राह्मण देवता, जो नाना प्रकारकी लीला करनेवाले शान्तस्वरूप शिव ही थे, शीघ्र खा-पीकर आनन्दपूर्वक वहाँसे अपने घरको चल दिये।
(अध्याय ३१)
- रुद्रसंहिता * ३०३
मेनाका कोपभवनमें प्रवेश, भगवान् शिवका हिमवान्के पास सप्तर्षियोंको भेजना तथा हिमवान्द्वारा उनका सत्कार, सप्तर्षियों तथा अरुन्धतीका और महर्षि वसिष्ठका मेना और हिमवान्को समझाकर पार्वतीका विवाह भगवान् शिवके साथ करनेके लिये कहना
ब्रह्माजी कहते हैं—ब्राह्मणरूपधारी शिवजीके वचनोंका मेनाके ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने दुःखी होकर पतिसे कहा—'गिरिराज! इन वैष्णव ब्राह्मणने शिवजीकी जो निन्दा की है, उसे सुनकर मेरा मन उनकी ओरसे बहुत खिन्न एवं विरक्त हो गया है। शैलेश्वर! रुद्रके रूप, शील और नाम सभी कुत्सित हैं। मैं उन्हें अपनी सुलक्षणा पुत्री कदापि नहीं दूँगी। यदि आप मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं निस्संदेह मर जाऊँगी, अभी इस घरको छोड़ दूँगी अथवा विष खा लूँगी, पार्वतीके गलेमें फाँसी लगाकर गहन वनमें चली जाऊँगी अथवा उसे महासागरमें डुबो दूँगी; परंतु अपनी बेटीको रुद्रके गले नहीं मढूँगी।' ऐसा कहकर मेना तुरंत कोपभवनमें चली गयीं और अपने हारको फेंककर रोती हुई धरतीपर लोट गयीं।
इधर भगवान् शिवको इस बातका पता लगा, तब उन्होंने अरुन्धतीसहित सप्तर्षियोंको बुलाया तथा मेनाके पास जाकर उन्हें समझानेकी आज्ञा दी।
शिवजीका आदेश प्राप्तकर भगवान् शिवको नमस्कार करके वे दिव्य ऋषि आकाशमार्गसे उस स्थानको चल दिये, जहाँ हिमवान्की नगरी थी। उस दिव्य पुरीको देखकर उन सप्तर्षियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे हिमाचलपुरीकी परस्पर प्रशंसा करते हुए सब ऐश्वर्योंसे भरे-पूरे हिमवान्के घर जा पहुँचे। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी सातों ऋषियोंको दूरसे आकाशके रास्ते आते देख हिमवान्को बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले—'ये सात सूर्यतुल्य तेजस्वी मुनि मेरे पास आ रहे हैं। मुझे प्रयत्नपूर्वक इस समय इनकी पूजा करनी चाहिये। सबको सुख देनेवाले हम गृहस्थ लोग धन्य हैं, जिनके घरपर ऐसे महात्मा पदार्पण किया करते हैं।'
ब्रह्माजी कहते हैं—इसी समय वे मुनि आकाशसे उतरकर पृथ्वीपर खड़े हो गये। उन्हें सामने देख हिमवान् बड़े आदरके साथ आगे बढ़े और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उन सप्तर्षियोंको प्रणाम करनेके पश्चात् उन्होंने बड़े सम्मानके साथ उन सबकी पूजा की तथा उन्हें आगे करके कहा—'मेरा गृहाश्रम आज धन्य हो गया।' यों कहकर उन्हें बैठनेके लिये भक्तिपूर्वक आसन लाकर दिया। जब वे आसनोंपर बैठ गये, तब उनकी आज्ञा लेकर हिमवान् भी बैठे और वहाँ उन ज्योतिर्मय महर्षियोंसे इस प्रकार बोले।
हिमवान्ने कहा—आज मैं धन्य हूँ, कृत-कृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया। मैं लोकमें बहुत-से तीर्थोंकी भाँति दर्शनीय बन गया; क्योंकि आप-जैसे विष्णुरूपी महात्मा
३०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मेरे घर पधारे हैं। आपलोग पूर्णकाम हैं। हम दीनोंके घरोंमें आपका क्या काम हो सकता है। तथापि मुझ सेवकके योग्य यदि कोई कार्य है तो कृपापूर्वक उसे अवश्य कहें। उसे पूर्ण करनेसे मेरा जीवन सफल हो जायगा।
ऋषि बोले—शैलराज! भगवान् शिवको जगत्का पिता कहा गया है और शिवा जगन्माता मानी गयी हैं। अतः तुम्हें महात्मा शंकरको अपनी कन्या देनी चाहिये। हिमालय! ऐसा करके तुम्हारा जन्म सफल हो जायगा तथा तुम जगद्गुरुके भी गुरु हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है।
मुनीश्वर! सप्तर्षियोंका यह वचन सुनकर हिमवान्ने दोनों हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा।
हिमालय बोले—महाभाग सप्तर्षियो! आपलोगोंने जो बात कही है, उसे शिवकी इच्छासे मैंने पहलेसे ही मान रखा था; किंतु प्रभो! इन दिनों एक वैष्णवधर्मी ब्राह्मणने आकर भगवान् शिवके प्रति प्रसन्नतापूर्वक बहुत-सी उलटी बातें बतायी हैं। तभीसे शिवाकी माताका ज्ञान भ्रष्ट हो गया है। वे अपनी बेटीका विवाह उस योगी रुद्रके साथ नहीं करना चाहतीं। ब्राह्मणो! वे बड़ा भारी हठ करके मैले कपड़े पहन कोपभवनमें चली गयी हैं और समझानेपर भी समझ नहीं रही हैं। मैं भी उस वैष्णव ब्राह्मणकी बात सुनकर ज्ञानभ्रष्ट हो गया हूँ। आपसे सच कहता हूँ, भिक्षुकरूपधारी महेश्वरको बेटी देनेकी मेरी भी अब इच्छा नहीं है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मुनियोंके बीचमें बैठे हुए शैलराज शिवकी मायासे मोहित हो उपर्युक्त बात कहकर चुप हो रहे। तब उन सभी सप्तर्षियोंने शिवकी मायाकी प्रशंसा करके मेनकाके पास अरुन्धतीको भेजा। पतिकी आज्ञा पाकर ज्ञानदायिनी अरुन्धतीदेवी तुरंत उस घरमें गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं। जाकर उन्होंने देखा, मेना शोकसे आकुल होकर पृथ्वीपर पड़ी हैं। तब उन साध्वी देवीने बड़ी सावधानीके साथ मधुर एवं हितकर बात कही।
अरुन्धती बोलीं—साध्वी रानी मेनके! उठो, मैं अरुन्धती तुम्हारे घरमें आयी हूँ तथा दयालु सप्तर्षि भी पधारे हैं। अरुन्धतीका स्वर सुनकर मेनका शीघ्र उठ गयीं और लक्ष्मी-जैसी तेजस्विनी उन पतिव्रता देवीके चरणोंमें मस्तक रखकर बोलीं।
मेनाने कहा—अहो! हम पुण्यजन्मा जीवोंको आज यह किस पुण्यका फल प्राप्त हुआ है कि हमारे इस घरमें जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीकी पुत्रवधू और महर्षि वसिष्ठकी पत्नी पधारी हैं। देवि! आप किसलिये आयी हैं? यह मुझे बताइये। मैं और मेरी पुत्री आपकी दासीके समान हैं। आप हमपर कृपा कीजिये।
मेनकाके ऐसा कहनेपर साध्वी अरुन्धतीने उनको बहुत अच्छी तरह समझाया-बुझाया और उन्हें साथ ले वे प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर आयीं, जहाँ वे सप्तर्षि विद्यमान थे। सप्तर्षिगण बातचीतमें बड़े निपुण थे। उन सबने भगवान् शिवके युगल चरणारविन्दोंका स्मरण करके शैलराजको समझाना आरम्भ किया।
ऋषि बोले—शैलेन्द्र! हमारा शुभकारक वचन सुनो। तुम पार्वतीका विवाह शिवके साथ कर दो और संहारकर्ता रुद्रके श्वशुर हो जाओ। शम्भु सर्वेश्वर हैं। वे किसीसे याचना नहीं करते। स्वयं ब्रह्माजीने
* रुद्रसंहिता * ३०५
तारकासुरके विनाशके लिये एक वीरपुत्र उत्पन्न करनेके उद्देश्यको लेकर भगवान् शिवसे यह प्रार्थना की है कि वे विवाह कर लें। भगवान् शंकर तो योगियोंके शिरोमणि हैं। वे विवाहके लिये उत्सुक नहीं हैं। केवल ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही वे महादेव तुम्हारी कन्याका पाणिग्रहण करेंगे। तुम्हारी पुत्रीने जब तपस्या की थी, उस समय उसके सामने उन्होंने उससे विवाहकी प्रतिज्ञा कर ली थी। इन्हीं दो कारणोंसे वे योगिराज शिव विवाह करेंगे।
ऋषियोंकी यह बात सुनकर हिमालय हँस पड़े और कुछ भयभीत हो विनय-पूर्वक बोले।
हिमालयने कहा—मैं शिवके पास कोई राजोचित सामग्री नहीं देखता हूँ। उनका न कोई घर है, न ऐश्वर्य है और न कोई स्वजन या बन्धु-बान्धव ही है। मैं अत्यन्त निर्लिप्त योगीको अपनी बेटी देना नहीं चाहता। आपलोग वेदविधाता ब्रह्माजीके पुत्र हैं; अतः अपना निश्चित विचार कहिये। जो पिता कामसे, मोहसे, भयसे अथवा लोभसे किसी अयोग्य वरके हाथमें अपनी कन्या दे देता है, वह मरनेके बाद नरकमें जाता है*। अतः मैं स्वेच्छासे भगवान् शूलपाणिको अपनी कन्या नहीं दूँगा। इसलिये महर्षियो! जो उचित विधान हो, उसे आपलोग कीजिये।
मुनीश्वर नारद! हिमाचलके इस वचनको सुनकर बातचीत करनेमें निपुण महर्षि वसिष्ठने उनसे यों कहा।
वसिष्ठ बोले—शैलेश्वर! मेरी बात सुनो। यह सर्वथा तुम्हारे लिये हितकारक, धर्मके अनुकूल, सत्य तथा इहलोक और परलोकमें सुखदायक है। शैलराज! लोक तथा वेदमें तीन प्रकारके वचन उपलब्ध होते हैं। शास्त्रज्ञ पुरुष अपनी निर्मल ज्ञानदृष्टिसे उन सब प्रकारके वचनोंको जानता है। एक तो वह वचन है, जो तत्काल सुननेमें बड़ा सुन्दर (प्रिय) लगता है, परंतु पीछे वह असत्य एवं अहितकारक सिद्ध होता है। ऐसा वचन बुद्धिमान् शत्रु ही कहता है, उससे कभी हित नहीं होता। दूसरा वह है, जो आरम्भमें अच्छा नहीं लगता; उसे सुनकर अप्रसन्नता ही होती है। परंतु परिणाममें वह सुख देनेवाला होता है। इस तरहका वचन कहकर दयालु धर्मशील बान्धवजन ही कर्तव्यका बोध कराता है। तीसरी श्रेणीका वचन वह है जो सुनते ही अमृतके समान मीठा लगता है और सब कालमें सुख देनेवाला होता है। सत्य ही उसका सार होता है। इसलिये वह हितकारक हुआ करता है। ऐसा वचन सबसे श्रेष्ठ और सबके लिये अभीष्ट है। शैलराज! इस तरह नीतिशास्त्रमें तीन प्रकारके वचन कहे गये हैं। इन तीनोंमेंसे तुम्हें कौन-सा वचन अभीष्ट है? बताओ, मैं तुम्हारे लिये वैसा ही वचन कहूँगा। भगवान् शंकर सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। उनके पास बाह्य सम्पत्ति नहीं है, इसका कारण यह है कि उनका चित्त एकमात्र ज्ञानके महासागरमें मग्न रहता है। जो ज्ञानानन्दस्वरूप और सबके ईश्वर हैं, उन्हें
* वरायाननुरूपाय पिता कन्यां ददाति चेत्। कामान्मोहाद्भयाल्लोभात् स नष्टो नरकं व्रजेत्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ३३। २६)
३०६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
लौकिक—बाह्य वस्तुओंकी क्या इच्छा होगी? गृहस्थ पुरुष राज्य और सम्पत्तिसे सुशोभित होनेवाले वरको अपनी पुत्री देता है; क्योंकि किसी दीन-दुःखीको कन्या देनेसे पिता कन्याघाती होता है—उसे कन्याके वधका पाप लगता है*। कौन जानता है कि भगवान् शंकर दुःखी हैं? कुबेर जिनके किंकर हैं, जो अपनी भ्रूभंगकी लीलामात्रसे संसारकी सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं, जिन्हें गुणातीत, परमात्मा और प्रकृतिसे परे परमेश्वर कहा गया है, सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली जिनकी त्रिविध मूर्ति ही ब्रह्मा, विष्णु और हर नाम धारण करती है, उन्हें कौन निर्धन अथवा दुःखी कह सकता है ? ब्रह्मलोकमें निवास करनेवाले ब्रह्मा, क्षीरसागरमें रहनेवाले विष्णु तथा कैलासवासी हर—ये सब शिवकी ही विभूतियाँ हैं। शिवसे प्रकट हुई प्रकृति भी अपने अंशसे तीन प्रकारकी मूर्तियोंको धारण करती है। जगत्में लीलाशक्तिसे प्रेरित हो वह अपनी कलासे बहुत-सा रूप धारण करती है। समस्त वाङ्मयकी अधिष्ठात्री देवी वाणी उनके मुखसे प्रकट हुई हैं और सर्वसम्पत्स्वरूपिणी लक्ष्मी वक्षःस्थलसे आविर्भूत हुई हैं तथा शिवाने देवताओंके एकत्र हुए तेजसे अपनेको प्रकट किया था और सम्पूर्ण दानवोंका वध करके देवताओंको स्वर्गकी लक्ष्मी प्रदान की थी।
देवी शिवा कल्पान्तरमें दक्षपत्नीके उदरसे जन्म ले सती नामसे प्रसिद्ध हुईं और हरको उन्होंने पतिके रूपमें प्राप्त किया। दक्षने स्वयं ही भगवान् शिवको अपनी पुत्री दी थी। सतीने पतिकी निन्दा सुनकर योगबलसे अपने शरीरको त्याग दिया था। वे ही कल्याणमयी सती अब तुम्हारे वीर्य और मेनाके गर्भसे प्रकट हुई हैं। शैलराज! ये शिवा जन्म-जन्ममें शिवकी ही पत्नी होती हैं। प्रत्येक कल्पमें बुद्धिरूपा दुर्गा ज्ञानियोंकी श्रेष्ठ माता होती हैं। ये सदा सिद्ध, सिद्धिदायिनी और सिद्धिरूपिणी हैं। भगवान् हर चिताभस्मके रूपमें सतीके अस्थिचूर्णको ही स्वयं प्रेमपूर्वक अपने अंगोंमें धारण करते हैं। अतः गिरिराज! तुम स्वेच्छासे ही अपनी मंगलमयी कन्याको भगवान् हरके हाथमें दे दो। तुम यदि नहीं दोगे तो वह स्वयं प्रियतमके स्थानमें चली जायगी। देवेश्वर शिव तुम्हारी पुत्रीका अनन्त क्लेश देखकर ब्राह्मणके रूपमें इसकी तपस्याके स्थानपर आये थे और इसके साथ विवाहकी प्रतिज्ञा करके इसे आश्वासन एवं वर देकर अपने आवासस्थानको लौट गये थे। गिरे! पार्वतीकी प्रार्थनासे ही शम्भुने तुम्हारे पास आकर इसके लिये याचना की और तुम दोनोंने शिवभक्तिमें मन लगाकर उनकी उस याचनाको स्वीकार कर लिया था। गिरीश्वर! बताओ, फिर किस कारणसे तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गयी? भगवान् शिवने देवताओंकी प्रार्थनासे प्रभावित होकर हम सब ऋषियोंको और अरुन्धतीदेवीको भी तुम्हारे पास भेजा है। हम तुम्हें यही शिक्षा देते हैं कि तुम पार्वती-को रुद्रके हाथमें दे दो। गिरे! ऐसा करनेपर
* गृही ददाति स्वसुतां राज्यसम्पत्तिशालिने। कन्यकां दुःखिने दत्त्वा कन्याघाती भवेत्पिता॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ३३। ३६)
| * रुद्रसंहिता * | ३०७ |
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तुम्हें महान् आनन्द प्राप्त होगा। शैलेन्द्र! यदि तुम स्वेच्छासे अपनी बेटी शिवाको शिवके हाथमें नहीं दोगे तो भावीके बलसे ही इन दोनोंका विवाह हो जायगा। तात! भगवान् शंकरने तपस्यामें लगी हुई पार्वतीको ऐसा ही वर दिया है। ईश्वरकी की हुई प्रतिज्ञा कभी पलट नहीं सकती। गिरिराज! ईश्वरके वशमें रहनेवाले समस्त साधु पुरुषोंकी भी प्रतिज्ञाका संसारमें किसीके द्वारा उल्लंघन होना कठिन है। फिर साक्षात् ईश्वरकी प्रतिज्ञाके लिये तो कहना ही क्या है? (अध्याय ३२-३३)
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सप्तर्षियोंके समझाने तथा मेरु आदिके कहनेसे पत्नीसहित हिमवान्का शिवके साथ अपनी पुत्रीके विवाहका निश्चय करना तथा सप्तर्षियोंका शिवके पास जा उन्हें सब बात बताकर अपने धामको जाना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर वसिष्ठने प्राचीनकालमें राजा अनरण्यके द्वारा अपनी कन्या पद्माका पिप्पलादके साथ विवाह करनेकी तथा धर्मके वरदानसे पिप्पलादके तरुण अवस्था, रूप, गुण, सदा स्थिर रहनेवाले यौवन, कुबेर और इन्द्रसे भी बढ़कर धन-ऐश्वर्य, भक्ति, सिद्धि एवं समता प्राप्त करनेकी तथा पद्माके स्थिर यौवन, सौभाग्य, सम्पत्ति एवं भर्ताके द्वारा परम गुणवान् दस पुत्रोंके प्राप्त करनेकी कथा सुनाकर कहा—'शैलेन्द्र! तुम मेरे कथनके सारतत्त्वको समझकर अपनी पुत्री पार्वतीका हाथ महादेवजीके हाथमें दे दो और मेनासहित तुम्हारे मनमें जो कुरोष है, उसे त्याग दो। आजसे एक सप्ताह व्यतीत होनेपर अत्यन्त शुभ और दुर्लभ मुहूर्त आनेवाला है। उस समय चन्द्रमा लग्नके स्वामी होकर अपने पुत्र बुधके साथ लग्नमें ही स्थित होंगे। उनका रोहिणी नक्षत्रके साथ योग होगा। चन्द्रमा और तारे शुद्ध होंगे। मार्गशीर्षमासके अन्तर्गत सम्पूर्ण दोषोंसे रहित सोमवारको, जब कि लग्नपर सम्पूर्ण शुभग्रहोंकी दृष्टि होगी, पापग्रहोंकी दृष्टि नहीं होगी तथा बृहस्पति ऐसे स्थानपर स्थित होंगे, जहाँसे वे उत्तम संतान और पतिका सौभाग्य देनेमें समर्थ होंगे। ऐसे मुहूर्तमें तुम अपनी कन्या मूलप्रकृति ईश्वरी जगदम्बा पार्वतीको जगत्पिता भगवान् शिवके हाथमें देकर कृतार्थ हो जाओ।'
ऐसा कहकर ज्ञानशिरोमणि मुनिवर वसिष्ठ नाना प्रकारकी लीला करनेवाले
३०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
भगवान् शिवका स्मरण करके चुप हो गये। वसिष्ठजीकी बात सुनकर सेवकों और पत्नीसहित गिरिराज हिमालय बड़े विस्मित हुए और दूसरे-दूसरे पर्वतोंसे बोले।
हिमालयने कहा—गिरिराज मेरु, सह्य, गन्धमादन, मन्दराचल, मैनाक और विन्ध्याचल आदि पर्वतेश्वरो! आप सब लोग मेरी बात सुनें। वसिष्ठजी ऐसी बात कह रहे हैं। अब मुझे क्या करना चाहिये, इस बातका विचार करना है। आपलोग अपने मनसे सब बातोंका निर्णय करके जैसा ठीक समझें, वैसा करें।
हिमाचलकी यह बात सुनकर सुमेरु आदि पर्वत भलीभाँति निर्णय करके उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।
पर्वतोंने कहा—महाभाग! इस समय विचार करनेसे क्या लाभ? जैसा ऋषिलोग कहते हैं, उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिये। वास्तवमें यह कन्या देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही उत्पन्न हुई है। इसने शिवके लिये ही अवतार लिया है, इसलिये यह शिवको ही दी जानी चाहिये। यदि इसने रुद्रदेवकी आराधना की है और रुद्रने आकर इसके साथ वार्तालाप किया है तो इसका विवाह उन्हींके साथ होना चाहिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उन मेरु आदि पर्वतोंकी यह बात सुनकर हिमाचल बड़े प्रसन्न हुए और गिरिजा भी मन-ही-मन हँसने लगीं। अरुन्धतीने भी अनेक कारण बताकर, नाना प्रकारकी बातें सुनाकर और विविध प्रकारके इतिहासोंका वर्णन करके मेनादेवीको समझाया। तब शैलपत्नी मेनका सब कुछ समझ गयीं और प्रसन्नचित्त हो उन्होंने मुनियोंको, अरुन्धतीजीको और हिमाचलको भी भोजन कराकर स्वयं भोजन किया। तदनन्तर ज्ञानी गिरिश्रेष्ठ हिमाचलने उन मुनियोंकी भलीभाँति सेवा की। उनका मन प्रसन्न और सारा भ्रम दूर हो गया था। उन्होंने हाथ जोड़ प्रसन्नतापूर्वक उन महर्षियोंसे कहा।
हिमालय बोले—महाभाग सप्तर्षियो! आपलोग मेरी बात सुनें। मेरा सारा संदेह दूर हो गया। मैंने शिव-पार्वतीके चरित्र सुन लिये; अब मेरा शरीर, मेरी पत्नी मेना, मेरे पुत्र-पुत्री, ऋद्धि-सिद्धि तथा अन्य सारी वस्तुएँ भगवान् शिवकी ही हैं, दूसरे किसीकी नहीं!
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर हिमाचलने अपनी पुत्रीकी ओर आदरपूर्वक देखा और उसे वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके ऋषियोंकी गोदमें बिठा दिया। तत्पश्चात् वे शैलराज पुनः प्रसन्न हो उन ऋषियोंसे बोले—'यह भगवान् रुद्रका भाग है। इसे मैं उन्हींको दूँगा, ऐसा निश्चय कर लिया है।'
ऋषि बोले—गिरिराज! भगवान् शंकर तुम्हारे याचक हैं, तुम स्वयं उनके दाता हो और पार्वतीदेवी भिक्षा हैं। इससे उत्तम और क्या हो सकता है? हिमाचल! तुम समस्त पर्वतोंके राजा, सबसे श्रेष्ठ और धन्य हो। अतः तुम्हारे शिखरोंकी सामान्य गति है—तुम्हारे सभी शिखर सामान्यरूपसे पवित्र एवं श्रेष्ठ हैं।
* रुद्रसंहिता * ३०१
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर निर्मल अन्तःकरणवाले उन मुनियोंने गिरिराजकुमारी पार्वतीको हाथसे छूकर आशीर्वाद देते हुए कहा—'शिवे! तुम भगवान् शिवके लिये सुखदायिनी होओ। तुम्हारा कल्याण होगा। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे गुणोंकी वृद्धि हो।' ऐसा कहकर सब मुनियोंने गिरिराजको प्रसन्नतापूर्वक फल-फूल दे विवाहके पक्के होनेका दृढ़ विश्वास कर लिया। उस समय परम सती सुमुखी अरुन्धतीने प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवके गुणोंका बखान करके मेनाको लुभा लिया। तदनन्तर गिरिराज हिमवान्ने परम उत्तम मांगलिक लोकाचारका आश्रय ले हल्दी और कुंकुमसे अपनी दाढ़ी-मूंछका मार्जन किया। तत्पश्चात् चौथे दिन उत्तम लग्नका निश्चय करके परस्पर संतोष दे, वे सप्तर्षि भगवान् शिवके पास चले गये। वहाँ जाकर शिवको नमस्कार और विविध सूक्तियोंसे उनका स्तवन करके वे वसिष्ठ आदि सब मुनि परमेश्वर शिवसे बोले।
ऋषियोंने कहा—देवदेव! महादेव! परमेश्वर! महाप्रभो! आप प्रेमपूर्वक हमारी बात सुनें। आपके इन सेवकोंने जो कार्य किया है, उसे जान लें। महेश्वर! हमने नाना प्रकारके सुन्दर वचन और इतिहास सुनाकर गिरिराज और मेनाको समझा दिया है। गिरिराजने आपके लिये पार्वतीका वाग्दान कर दिया है। अब इसमें कोई ननु-नच नहीं है। अब आप अपने पार्षदों तथा देवताओंके साथ उनके यहाँ विवाहके लिये जाइये। महादेव! प्रभो! अब शीघ्र हिमाचलके घर पधारिये और वेदोक्त रीतिके अनुसार पार्वतीका अपने लिये पाणिग्रहण कीजिये।
सप्तर्षियोंका यह वचन सुनकर लोकाचारपरायण महेश्वर प्रसन्नचित्त हो हँसते हुए इस प्रकार बोले।
महेश्वरने कहा—महाभाग सप्तर्षियो! विवाहको तो मैंने न कभी देखा है और न सुना ही है। तुमलोगोंने पहले जैसा देखा हो, उसके अनुसार विवाहकी विशेष विधिका वर्णन करो।
महेश्वरके उस लौकिक शुभ वचनको सुनकर वे ऋषि हँसते हुए देवाधिदेव भगवान् सदाशिवसे बोले।
ऋषियोंने कहा—प्रभो! आप पहले तो भगवान् विष्णुको, विशेषतः उनके पार्षदोंसहित शीघ्र बुला लें। फिर पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको, देवराज इन्द्रको, समस्त ऋषियोंको, यक्ष, गन्धर्व, किंनर, सिद्ध, विद्याधर और अप्सराओंको प्रसन्नतापूर्वक आमन्त्रित करें। इनको तथा अन्य सब लोगोंको यहाँ सादर बुलवा लें। वे सब मिलकर आपके कार्यका साधन कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर वे सातों ऋषि उनकी आज्ञा ले भगवान् शंकरकी स्थितिका वर्णन करते हुए वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक अपने धामको चले गये।
(अध्याय ३४—३६)
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