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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

( १३०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बारह वर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ मूलम्-समबुद्धिः क्षमायुक्तः पुण्यकांक्षी प्रियंवदः॥ मध्यस्थः सर्वकार्येषु सामा- न्यः स्यान्न संशयः ॥ २० ॥ एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः ॥ २१ ॥ टीका-अब मध्यसाधकलक्षण कहतेहैं-सामान्य बुद्धि हो क्षमावानहो पुण्यकर्म करनेमें इच्छा रखताहो प्रिय बोलताहो सर्वकार्यमें मध्यस्थ रहताहो अर्थात् न हर्ष न विषाद इसको मध्यसाधक कहतेहैं यह निश्च- य है गुरु इसको विचारके मुक्तिमार्ग जो लययोग है उसका उपदेश करे ॥ २० ॥२१ ॥ अथ अधिमात्रसाधकलक्षणम् । मूलम्-स्थिरबुद्धिर्लये युक्तः स्वाधीनो वी- र्यवानपि ॥ महाशयो दयायुक्तः क्षमावा- न् सत्यवानपि ॥२२॥ शूरो वयःस्थः श्र- द्धावान् गुरुपादाब्जपूजकः ॥ योगाभ्या- सरतश्चैव ज्ञातव्यश्चाधिमात्रकः ॥ २३ ॥ एतस्य सिद्धिः षड्वर्षेर्भवेदभ्यासयोग- तः ॥ एतस्मै दीयते धीरो हठयोगश्च साङ्गतः ॥ २४ ॥ टीका-अब अधिमात्र साधक लक्षण कहतेहैं स्थिर

पञ्चमपटलः । ( १३१ ) बुद्धि हो लययोगमें समर्थहो स्वतन्त्र हो अर्थात् किसीके आधीन न हो वीर्य्यवान् हो महाशय हो दयावान् हो क्षमा- वान् हो सत्यवादी हो शूर हो समाधियोगमें श्रद्धा हो गुरुपादपद्मपूजक हो योगाभ्यासरत हो ऐसे गुणवाले पुरुषको अधिमात्र कहतेहैं योगाभ्याससे ऐसे पुरुष- को छः वर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी. गुरुको उचित है कि, ऐसे धीर पुरुषको अङ्गसहित हठयोगका उपदेश करे ॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ ॥ अथ अधिमात्रतमसाधकलक्षणम् । मूलम्-महावीर्य्यान्वितोत्साही मनोज्ञः शौ- र्य्यवानपि॥ शास्त्रज्ञोऽभ्यासशीलश्च निर्मो- हश्च निराकुलः ॥ २५॥ नवयौवनसम्पन्नो मिताहारी जितेंद्रियः ॥ निर्भयश्च शुचि- र्दक्षो दाता सर्वजनाश्रयः ॥२६॥ अधि- कारी स्थिरो धीमान् यथेच्छावस्थितः क्षमी॥ सुशीलो धर्मचारी च गुप्तचेष्टः प्रि- यंवदः ॥ २७ ॥ शास्त्रविश्वाससम्पन्नो देवतागुरुपूजकः ॥ जनसंगविरक्तश्च म- हाव्याधिविवर्जितः ॥ २८ ॥ अधिमात्र- तमो ज्ञेयः सर्वयोगस्य साधकः ॥ त्रिभिः

( १३२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । संवत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः ॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा- रणा ॥ २९ ॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान् शूर- तासम्पन्न शास्त्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिधर मो- हसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन यौवनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्राचार सर्वकर्ममें निपुण दानशील शरणागतपालक स्थिरचित्त बुद्धिमान् सन्तोषयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक कर्मोंको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गरहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमात्रतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुषको गुरु समस्त योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ अथ प्रतीकोपासनम् । मूलम्-प्रतीकोपासना कार्या दृष्टादृष्टफल- प्रदा ॥ पुनाति दर्शनादत्र नात्र कार्या विचारणा ॥ ३० ॥

पंचमपटलः। ( १०३ ) टीका-अब प्रतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दृष्टादृष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होताहै इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥ मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिबिम्बितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्वयम् ॥ यदा नभः पश्यति स्वप्रतीकं नभोऽङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति ॥ ३१ ॥ टीका-गाढआतपमें अर्थात् गहरेधूपमें स्वईश्वरका प्रतिबिम्ब नेत्रास्थिरकरके देखे जब अपने छायाका प्रतिबिम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना प्रतिबिम्ब अवश्य देखेगा ॥ ३१ ॥ मूलम्-प्रत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नभो- ऽङ्गणे॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्युः स्या- त्कदाचन ॥ ३२ ॥ टीका-जो नित्य आकाशमें स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिबिम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा ॥ ३२ ॥ मूलम्-यदापश्यतिसम्पूर्णंस्वप्रतीकंनभो-

( १३४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ङ्गणे ॥ तदा जयं सभायाञ्च युद्धे निर्जित्य सञ्चरेत् ॥ ३३ ॥ टीका-जब सम्पूर्ण अपना प्रतिबिम्ब आकाशमें देखे तब सभामें उसकी जय होय और युद्धमें शत्रुको जीतलेगा ॥ ३३ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं वन्दते परम् ॥ पूर्णानन्दैकपुरुषं स्वप्रती- कप्रसादतः ॥ ३४ ॥ टीका-जो सर्वदा स्वप्रतीक उपासनाका अभ्यास करे तो उसको आत्माकी प्राप्ति होगी और उसी स्वप्र- तीकके प्रसादसे पूर्णानन्द स्वरूप अर्थात् आत्माका दर्शन होगा. तात्पर्य यह है कि जब हृदयाकाशमें अपने स्वरूपका अनुभव होगा तब आत्माकी परम ज्योतिका प्रकाश होगा ॥ ३४ ॥ मूलम्-यात्राकाले विवाहे च शुभे कर्मणि सङ्कटे ॥ पापक्षये पुण्यवृद्धौ प्रतीकोपा- सनञ्चरेत् ॥ ३५ ॥ टीका-यात्राकालमें और विवाहके समयमें और शुभकर्ममें और पापक्षयमें और पुण्यवृद्धिके अर्थ स्वप्र- तीक अर्थात् अपने प्रतिबिम्बका दर्शन करे तो सर्वदा कल्याण होगा ॥ ३५ ॥

पंचमपटलः । ( ३३५ ) मूलम्--निरन्तरकृताभ्यासादन्तरे पश्यति ध्रुवम् ॥ तदा मुक्तिमवाप्नोति योगी नि- यतमानसः ॥ ३६ ॥ टीका-सर्वदा प्रतीकोपासनाके अभ्यास करनेसे निश्चय हृदयाकाशमें अपना प्रतिबिंब भान होगा तब निश्चयआत्मा योगीको मुक्ति प्राप्त होगी ॥ ३६ ॥ मूलम्--अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां द्विलोचने ॥ नासारन्ध्रे च मध्याभ्याम- नामाभ्यां मुखं दृढम् ॥ ३७ ॥ निरुध्य मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम् ॥ तदा तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति ३८ टीका-दोनों अंगुष्ठसे दोनों कर्ण बंद करे और दो- नों तर्जनीसे दोनों नेत्रोंको बंद करे और दोनों मध्य- मा अंगुलीसे दोनों नासारंध्रको बंद करे और दोनों अनामिका अंगुली और कनिष्ठासे मुखको बंद करे यदि इसप्रकार योगी वायुको निरोध करके इसका वारंवार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योतिस्वरूपका हृदयाकाशमें भान होगा ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मूलम्--तत्तेजो दृश्यते येन क्षणमात्रं निरा- कुलम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ३९ ॥

( १३६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-आत्माका यह परमतेज जो पुरुष स्थिर- चित्त होके क्षणमात्रभी देखेगा वह सर्वपापसे मुक्त होके परमगतिको प्राप्तहोगा ॥ ३९ ॥ मूलम्-निरन्तरकृताभ्यासाद्योगीविगतक- ल्मषः ॥ सर्वदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नः स्वयं गतः ॥ ४० ॥ टीका-निरंतर जो योगी शुद्धचित्त होके यह प्र- तीकोपासनाका अभ्यास करेगा वह सर्व देहादिक- मेंसे रहित होके आत्मासे अभिन्न होजायगा अर्थात् आत्मास्वरूप होजायगा ॥ ४० ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मानवः॥ स वै ब्रह्मविलीनः स्यात्पापकर्म- रतो यदि ॥ ४१ ॥ टीका-जो मनुष्य गुप्ताचारसे इसका सर्वदा अभ्या- स करताहै सो यदि पापकर्मरतभी हो तथापि उसका मोक्ष होगा ॥ ४१ ॥ मूलम्-गोपनीयः प्रयत्नेन सद्यः प्रत्यय- कारकः ॥ निर्वाणदायको लोके योगोयं मम वल्लभः ॥ नादः संजायते तस्य क्रमे- णाभ्यासतःश्च यः॥ ४२ ॥

पंचमपटलः । (१३७) टीका-जो इसका अभ्यास करेगा उसको क्रमसे नाद उत्पन्न होगा. हेदेवि ! यह प्रतीकोपासना निर्वाण योगका दाता है इसहेतुसे हमको अतिप्रिय है यह शीघ्र फलदाता है इसको यत्नसे गोप्य रखना उचि- त है ॥ ४२ ॥ मूलम्--मत्तभृङ्गवेणुवीणासदृशः प्रथमोध्व- निः ॥ ४३ ॥ एवमभ्यासतः पश्चात् संसा- रध्वान्तनाशनम् ॥ घण्टानादसमः पश्चात् ध्वनिर्मेघरवोपमः ॥ ४४ ॥ ध्वनौ तस्मि- न्मनो दत्त्वा यदा तिष्ठति निर्भरः ॥ तदा संजायते तस्य लयस्य मम वल्लभे ॥ ४५॥ टीका-योगअभ्यासद्वारा प्रथम मत्त भ्रमरकी नाई शब्द और वेणु और वीणाके समान शब्द उत्पन्न होगा इसी तरह संसारतम नाशक योगअभ्याससे फिर घंटानाद समान शब्द होगा. फिर मेघ गर्जनके समान ध्वनि होगी. हे प्रिये पार्वती ! उस ध्वनिमें यदि मन निश्चल स्थित हो जाय तब मोक्षका दाता लय उत्पन्न होगा ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ मूलम्--तत्र नादे यदा चित्तं रमते योगिनो भृशम् ॥ विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादेन सह शाम्यति ॥ ४६ ॥

( १३८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जब योगीका चित्त उस नादमें निरंतर रम- णकरेगा तब सकल विषयसे स्मरणरहित होके चित्त समाधिमें लय होजायगा ॥ ४६ ॥ मूलम्-एतदभ्यासयोगेन जित्वा सम्य- ग्गुणान्बहून् ॥सर्वारम्भपरित्यागी चिदा- काशे विलीयते ॥ ४७ ॥ टीका-इसीप्रकार योगअभ्यासद्वारा सर्व गुणोंको जीतके और सब कार्योंके आरंभको त्यागके योगी आनंदपूर्वक चैतन्यस्वरूप हृदयाकाशमें लय होजायगा ॥ ४७ ॥ मूलम्-नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं बलम् ॥ न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृ- शो लयः ॥ ४८ ॥ टीका-हेदेवी ! सिद्धासनके समान कोई और आस- न नहीं है और न कुम्भकके समान कोई बल है और न खेचरीके समान कोई मुद्रा है और न नादके समान कोई दूसरा लय है ॥ ४८ ॥ अथ मूलाधारपद्मविवरणम् । मूलम्-इदानीं कथयिष्यामि मुक्तस्यानुभवं

पंचमपटलः । ( १३९ ) प्रिये ॥ यज्ज्ञात्वा लभते मुक्तिं पापयुक्तो- पि साधकः ॥ ४९ ॥ टीका-हेप्रिये पार्वती ! अब मुक्तिका अनुभव तुमसे कहतेहैं जिसके ज्ञानसे पापयुक्त साधकभी मुक्तिलाभ करताहै ॥ ४९ ॥ मूलम्-समभ्यर्च्येश्वरं सम्यक्कृत्वा च योगमुत्तमम् ॥ गृह्णीयात्सुस्थितो भूत्वा गुरुं सन्तोष्य बुद्धिमान् ॥ ५० ॥ टीका-योगाकांक्षी साधक सम्यकप्रकारसे ईश्वरकी पूजा करके स्वस्थचित्तसे योगासनपर बैठके बुद्धिमान् गुरुको सर्वप्रकारसे प्रसन्न करके यह उत्तम योग ग्रह- णकरे ॥ ५० ॥ मूलम्-जीवादि सकलं वस्तु दत्त्वा योग- विदं गुरुम्॥ सन्तोष्यादिप्रयत्नेन योगोयं गृह्यते बुधैः ॥ ५१ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जीवादि सकल पदार्थ योगविद् गुरुके अर्पण करके उनके प्रसन्नतापूर्वक यत्न करके यह योग ग्रहण करते हैं ॥ ५१ ॥ मूलम्--विप्रान्सन्तोष्य मेधावी नानामं- गलसंयुतः ॥ ममालये शुचिर्भूत्वा गृह्णी- याच्छुभमात्मनः ॥ ५२ ॥

( १४० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-योगग्रहणके समय बुद्धिमान् साधक ब्राह्म- णको सन्तोष करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक प्रसन्न करके अनेक आशीर्वाद श्रवण करके पवित्रता से शिवमन्दिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग है इसको ग्रहणकरे ॥ ५२ ॥ मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं विग्रहादिकम् ॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगी गृह्णीयाद्वक्ष्यमाणकम् ॥ ५३ ॥ टीका-साधक इस विधानसे पूर्व शरीर गुरुकी कृ- पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जो आगे कहेंगे वह योग ग्रहण करे. तात्पर्य यह है कि, योगग्रहणके समयसे साधकका शरीर दिव्य होजाताहै व्याधि और अज्ञान- का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय साधक यह चिंतनकरे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके दिव्यशरीर धारण किया ॥ ५३ ॥ मूलम्-पद्मासनस्थितो योगी जनसंगविव- र्जितः ॥ विज्ञाननाडीद्वितयमङ्गुलीभ्यां निरोधयेत् ॥ ५४ ॥ टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो- नों विज्ञाननाडी अर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु- लीसे निरोध करे ॥ ५४ ॥

पंचमपटलः । ( १४१ ) मूलम्-सिद्धेस्तदाविर्भवति सुखरूपी निर- ञ्जनः ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यो येन सि- द्धो भवेत्खलु ॥ ५५ ॥ टीका-यह योग सिद्ध होनेसे साधकके हृदयमें सुखरूपी निरंजन परब्रह्म चैतन्यस्वरूपका प्रकाशहोगा इस हेतुसे यह योगमें साधकको परिश्रम कर्तव्य है, इससे निश्चय यह योग सिद्ध होजायगा ॥ ५५ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं तस्य सिद्धि- र्न दूरतः ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमादेव न संशयः ॥ ५६ ॥ टीका-जो मनुष्य इस योगका सर्वदा अभ्यास करे- गा उसको सर्वसिद्धि प्राप्त होगी और निश्चय आपही क्रमसे वायु सिद्ध होजायगा ॥ ५६ ॥ मूलम्-सकृद्यः कुरुते योगी पापौघं नाशये- द्ध्रुवम् ॥ तस्य स्यान्मध्यमे वायोः प्रवेशो नात्र संशयः ॥ ५७ ॥ टीका-जो योगी प्रतिदिन एकवार यह अभ्यास करे तो उसके सर्व पापोंका नाश होजायगा और उसका प्राणवायु निश्चय सुषुम्णामें प्रवेश करेगा ॥ ५७ ॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलो यः स योगी देव-

४. चतुर्थ पटल: महामुद्रा, जालन्धर, मूलबन्ध व शक्ति-चालन

( १४२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पूजितः ॥ अणिमादिगुणाँल्लब्ध्वा विचरे- द्भुवनत्रये ॥ ५८ ॥ टीका-यह अभ्यासशील योगी देवतोंसे पूजित है और अणिमादिक सिद्धि लाभ करके तीनों लोकमें इच्छापूर्वक विचरेगा ॥ ५८ ॥ मूलम्-यो यथास्यानिलाभ्यासात्तद्वेत्त- स्य विग्रहः ॥ तिष्ठेदात्मनि मेधावी संयतः क्रीडते भृशम् ॥ ५९ ॥ टीका-जिस प्रकार वायुका अभ्यास करेगा उसी तरह साधकका शरीर सिद्ध हो जायगा और बुद्धिमान पुरुष आत्मामें स्थितहोके सर्वदा क्रीडा करेगा ॥ ५९ ॥ मूलम्-एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ यःप्रमाणैः समायुक्तस्तमेव कथ्यते ध्रुवम् ॥ ६० ॥ टीका--यह योग परमगोपनीयहै अनधिकारीको कदापि देनेके योग्य नहीं है परन्तु प्रमाणयुक्त अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणयुक्त साधकको अवश्य देना उचितहै॥६०॥ मूलम्-योगी पद्मासने तिष्ठेत्कण्ठकूपे य- दा स्मरन्॥जिह्वां कृत्वा तालुमूले क्षुत्पि- पासा निवर्तते ॥ ६१ ॥

पंचमपटलः । (१४३) टीका-पद्मासनस्थित योगी जब कण्ठकूपका स्मरण अर्थात् उस स्थानमें मनको लय करके जिह्वा- को तालुमूलमें स्थित करेगा तब क्षुधा और पिपासा- से रहित हो जायगा ॥ ६१ ॥ मूलम्-कण्ठकूपादधः स्थाने कूर्मनाड्य- स्ति शोभना॥ तस्मिन् योगी मनो दत्त्वा चित्तस्थैर्यं लभेदृशम् ॥ ६२ ॥ टीका-कंठकूपके नीचे कूर्मनाडी शोभित है उस नाडीमें योगी मनको स्थिर करके अत्यंत चित्तकी स्थिरता पावेगा ॥ ६२ ॥ मूलम्-शिरःकपाले रुद्राक्षं विवरं चिन्तये- द्यदा ॥ तदा ज्योतिःप्रकाशः स्याद्विद्युत्पु- ञ्जसमप्रभः ॥६३॥ एतच्चिन्तनमात्रेण पा- पानां संक्षयो भवेत् ॥ दुराचारोऽपि पुरुषो लभते परमं पदम् ॥ ६४ ॥ टीका--शिर कपालमें जो रुद्राक्ष विवर है उसमें यदि चिंतना करे तो विद्युत्पुञ्जके समान आत्मज्यो- तिका प्रकाश होगा और इसके चिन्तनमात्रसे योगीका सर्व पाप् नष्ट होजायगा. यदि दुराचारमेंभी जो पुरुष आसक्त है वहभी परमगतिको प्राप्त होगा ॥६३॥ ६४॥

( १४४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्--अहर्निशं यदा चिन्तां तत्करोति वि- चक्षणः ॥ सिद्धानां दर्शनं तस्य भाषणञ्च भवेद्ध्रुवम् ॥ ६५ ॥ टीका--जो बुद्धिमान् साधक रात्रि दिवस यह चि- न्तवन करते हैं उनको सिद्धलोगोंका अवश्य दर्शन और उनसे भाषण होताहै ॥ ६५ ॥ मूलम्--तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् भुञ्जन् ध्या- येच्छून्यमहर्निशम् ॥ तदाकाशमयो यो- गी चिदाकाशे विलीयते ॥ ६६ ॥ टीका--जो पुरुष चलते बैठते सोते भोजन करते रा- त्रिदिवस यह ध्यान करते हैं सो आकाशस्वरूप योगी चिदाकाश अर्थात् परमात्मामें लय होजाते हैं ॥ ६६ ॥ मूलम्--एतज्ज्ञानं सदा कार्यं योगिना सि- द्धिमिच्छता ॥ निरन्तरकृताभ्यासान्मम तुल्यो भवेद्ध्रुवम् ॥ एतज्ज्ञानबलाद्योगी सर्वेषां वल्लभो भवेत् ॥ ६७ ॥ टीका--सिद्धिकांक्षी योगीको इस ध्यानका सर्वदा अभ्यास करना उचित है सर्वदा अभ्यास करनेसे हेपा- र्वती ! हमारे तुल्य होजायगा निश्चय, इस ज्ञानबलसे योगी सबको अर्थात् त्रैलोक्यको प्रिय होजाताहै ॥ ६७ ॥

पंचमपटलः । ( १४५ ) मूलम्-सर्वान् भूतान् जयं कृत्वा निराशी- रपरिग्रहः ॥ ६८ ॥ नासाग्रे दृश्यते येन पद्मासनगतेन वै ॥ मनसो मरणं तस्य खेचरत्वं प्रसिद्ध्यति ॥ ६९ ॥ टीका-योगी सर्व भूतोंको जय करके और क्षुधा और इच्छाको जीतके पद्मासनसे स्थितहोके जो ना- साग्रमें देखता है उसका मन स्थिर होजाताहै तब खे- चरत्व सिद्धहोताहै ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ मूलम्-ज्योतिः पश्यति योगीन्द्रः शुद्धं शुद्धाचलोपमम् ॥ तत्राभ्यासबलेनैव स्वयं तद्रक्षको भवेत् ॥ ७० ॥ टीका-शुद्ध अचलके समान परमज्योति योगी दे- खताहै तब अभ्यासबलसे आपही उसका रक्षक होताहै अर्थात् ज्योतिर्मय होता है ॥ ७० ॥ मूलम्-उत्तानशयने भूमौ सुप्त्वा ध्यायन्नि- रन्तरम् ॥सद्यः श्रमविनाशाय स्वयं योगी विचक्षणः ॥७१॥ शिरः पश्चात्तु भागस्य ध्याने मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ भ्रूमध्ये दृष्टि- मात्रेण ह्यपरः परिकीर्तितः ॥ ७२ ॥

( १४६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-बुद्धिमान् योगी भूमिमें उत्तानशयन करके निरन्तर ध्यान करे तो तत्काल आपही श्रमका नाश होजायगा और शिरके पृष्ठभागका ध्यान करनेसे योगी मृत्युका जीतनेवाला होजायगा और भ्रूके मध्यमें जो दृष्टिमात्रसे फल होताहै सो हेदेवि ! हम पहले कह- चुके हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ मूलम्-चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्त्रेधा वि- भज्यते ॥ तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परि- पोषकः ॥ ७३ ॥ सप्तधातुमयं पिण्डमे- ति पुष्णाति मध्यगः ॥ याति विण्मूत्र- रूपेण तृतीयः सप्ततो बहिः ॥७४॥ आ- द्यभागद्वयं नाड्यः प्रोक्तास्ताः सकला अपि ॥ पोषयन्ति वपुर्वायुमापादतल- मस्तकम् ॥ ७५ ॥ टीका-चार विधि अन्नभोजन करनेसे तीनप्रकार- का रस उत्पन्नहोताहै उसमें जो प्रथम सारभूत रस है वह लिङ्गशरीरको पोषण करता है और जो दूसरा रस है वह सप्तधातुमय पिण्डको पोषण करताहै और तीसरा रस सप्तधातुके बाहर मल मूत्ररूप है पहिले जो दोभाग रस कहाहै वही सकल नाडीरूप है और

पंचमपटलः । ( १४७ ) पादसे लेकर मस्तकपर्य्यन्त शरीरके वायुका पोषणक- रते हैं ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ मूलम्-नाडीभिराभिः सर्वाभिर्वायुः सञ्चर- ते यदा ॥ तदैवान्नरसो देहे साम्येनेह प्रव- र्त्तते ॥ ७६ ॥ टीका-जब सब नाडीके साथ वायु चलताहै तब अन्नका रस शरीरमें समभावसे प्रवृत्त होता है ॥ ७६ ॥ मूलम्-चतुर्दशानां तत्रेह व्यापारे मुख्य- भागतः ॥ ता अनुग्रत्वहीनाश्च प्राणस- ञ्चारनाडिकाः ॥ ७७ ॥ टीका-सर्व नाडियोंमें पूर्वोक्त चौदह नाडी शरीर- के मुख्य व्यापारको करतीहैं यह प्राण सञ्चार करने- वाली चौदह नाडीमें परस्पर कोई किसीसे न्यून अधिक नहीं है ॥ ७७ ॥ मूलम्-गुदाद्द्व्यंगुलतश्चोर्ध्वं मेढ्रैकांगुलत- स्त्वधः ॥ एवञ्चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगुलम् ॥ ७८ ॥ टीका-गुदासे दो अङ्गुल ऊपर और मेढ्र अर्थात् लिङ्गमूलसे एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तारक- न्दका प्रमाण है॥ ७८ ॥

( १४८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेढ्रान्त- रालगा ॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा ॥ ७९ ॥ संवेष्ट्य सकला नाडीः सार्द्धत्रिकुटिलाकृतिः॥ मुखे निवे- श्य सा पुच्छं सुषुम्णाविवरे स्थिता॥८०॥ टीका-गुदा और मेढ्रके मध्यमें जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको मुख है उसी स्थानमें कन्दहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलिनीकी स्थिति है यह कुण्डलिनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुषुम्णा विवरमें स्थित है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्येषा स्फुरन्ती प्रभया स्वया ॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना वाग्देवी बीजसंज्ञिका ॥ ८१ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्रिता अपनी प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदृश संधि- में स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे वाक्य उच्चारण होताहै और बीज संज्ञक है अर्थात् सं- सारकी बीज है ॥ ८१ ॥ मूलम्-ज्ञेया शक्तिरियं विष्णोर्निर्मला स्वर्ण

पंचमपटलः । ( १४९ ) भास्वरा॥सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयप्र- सूतिका ॥ ८२ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी देवी ईश्वरकी शक्तिमें तप्त स्वर्णके समान निर्मल तेजप्रभा है और सत्व, रज, तम, यह तीनों गुणकी माता है ॥ ८२ ॥ मूलम्-तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकी- र्तितम् ॥ कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररू- पिणम् ॥ ८३ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी है उसी स्थानमें बन्धूकपुष्पके समान रक्तवर्ण कामबीजकी स्थिति कहीगई है वह कामबीज तप्तस्वर्णके समान स्वरूप- योगयुक्तद्वारा चिंतनीय है ॥ ८३ ॥ मूलम्--सुषुम्णापि च संश्लिष्टा बीजं तत्र वरं स्थितम्॥शरच्चंद्रनिभं तेजस्स्वयमेतत्स्फु- रत्स्थितम्॥८४ ॥सूर्यकोटिप्रतीकाशं च- न्द्रकोटिसुशीतलम् ॥ एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ॥बीजसंज्ञं परं तेजस्तदे- व परिकीर्तितम् ॥ ८५ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्णा उसी स्थानमें कामबीजके साथ स्थित है और वह बीज