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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी

तृतीय विकास : ५१ सः- (वह) च-निश्चय से ज्ञाहेतुः - ज्ञानशक्ति के हेतु (अर्थात् शिष्यों को परमार्थज्ञान प्रदान करने से अपने शिवस्वरूप की पहचान कराने में (समर्थ) होता है । व्याख्या - बहिर्मुख इन्द्रिय-वृत्तियों को 'अविप' कहते हैं। (अवीन् पशून् पाति इति अविपं) जो पशुओं अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को पालती हैं, बहिर्मुख रहने की ओर सहा- यता देती हैं महेश्वर की उन घोरतरी शक्तियों को 'अविप' कहते हैं। यह शक्तियां योगी के शुद्धविद्या स्वरूप को किञ्चित् ढक लेती हैं। यह बात इसी विकास के १९वें सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी शक्तियां बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित्-मातृकाचक्र में पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृ शक्तियां (इन्द्रिय-वृत्तियां) बनकर योगी को नीचे और नीचे गिराती हैं ।) यह शक्तियां पशुओं (जीवों) को परमार्थ प्राप्त करने से रोकती हैं। अतः योगी इन पर 'यह सब मेरा ही विभव है' इस स्वात्म ऐश्वर्य को पहचान कर प्रभुत्व जमाता है। जब उसका प्रभुत्व इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ़ होता है तब वह निश्चय ही शिष्यों को स्वात्मा का प्रत्यभिज्ञान कराने में समर्थ होता है। दूसरे जो शक्तिचक्र के अधीन रहें पशुभाव को हटा नहीं सकते फिर तो शिष्यों को प्रबोध देने की बात ही क्या ! परन्तु जो योगी अविपस्थ अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को वश में रखने वाला हो, वह अवश्य 'स्वयं तीर्त्वा परान् तारयति' का प्रतीक बनता है। वह दूसरों को भी आत्मज्ञान के प्रबोध कराने का हेतु बन जाता है। इसीलिए पूर्व-सूत्र में कहा है- दानमात्मज्ञानम्-योगी का आत्मज्ञान-निष्ठ रहना ही उसका उत्तम दान है ।।२९।। सम्बन्ध-क्योंकि स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् ॥३०॥ विश्वम् - यह सारा विश्व अस्य - इस शिवयोगी के स्वशक्तिप्रचयः - अपने ही शक्तिचक्र (क्रियाशक्ति) का विकास है । व्याख्या -- यह सारा विश्व शिवयोगी के अपने शक्तिचक्र का समूह है क्योंकि शिव का यह विश्व स्वशक्ति-मय है। कहा है : 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः' ।। अर्थ - यह सारा जगत् उसकी शक्तियों का ही समूह है क्योंकि महेश्वर ही सर्वशक्तिमान् है । इस योगी के लिए जगत् वृत्तिरूप नहीं होता है। इस पद पर इंद्रिय-वृत्तियां योगी की शक्तियां बन जाती हैं क्योंकि यह अन्तर्मुख पद पर ही ठहरती हैं। यह सृष्टि

सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये

५२ : शिवसूत्र विमर्शा दशा में उन्मीलन का विकास है और यही योगी की उन्मीलन-समाधि का विकास कहलाता है। अथवा यूँ कहें कि योगी के लिए विश्व क्रियाशक्ति का स्फुरणरूप विकास है। स्वात्म-साक्षात्कार के बल से योगी के सामने ज्ञान और ज्ञेय पदार्थ भिन्न सत्ता नहीं रखते, वह दोनों में एकरूपता का अनुभव करता है। इसे अक्रमवेदन कहते हैं। यही शिखरस्थ ज्ञान अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह इस कारण कि इस दशा में अन्तर और बाह्य दोनों में एक साथ योगी को स्वशक्ति-विकास ही होता है— शिखरस्थ ज्ञानं युगपद्वेदनमिति । वही जीवन्मुक्त कहलाता है। योगवासिष्ठ में इस दशा का वर्णन यूँ है— यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ (३।९।७)॥ अर्थ—वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है किन्तु वास्तव में जो जाग्रति के धर्मों से रहित है और जिसका बोध सर्वथा वासना रहित है वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। 'वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है'— इसका आशय यह है कि यद्यपि उस योगी का चित्त सम्पूर्ण दृश्य पदार्थों का बाध करके निरन्तर ब्रह्म में लीन रहता है तथापि वह सोये हुए पुरुष के समान संज्ञाशून्य नहीं हो जाता है, वह सब व्यवहार यथावत् करता रहता है किन्तु व्यवहार करते हुए भी उसे स्वप्नवत् समझने के कारण उसकी अन्य पुरुषों के समान दृश्य पदार्थों में आस्था नहीं होती। इसलिए 'वास्तव में वह जाग्रति के धर्मों से रहित है। आगे वहीं कहा है : 'शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चितः स जीवन्मुक्त उच्यते ।। (३।१।१२) अर्थ—जिसकी संसार वासना शान्त हो गई है, जो कलावान् होकर भी कलाहीन है अर्थात् व्यवहार दृष्टि में ऊपर से विकारवान् प्रतीत होता हुआ भी जो निरन्तर अपने निर्विकार स्वरूप में ही स्थित रहता है तथा जिसका चित्त निश्चिन्त है वह पुरुष जीवन- मुक्त कहलाता है ॥३०॥ सम्बन्ध—योगी का विश्व न केवल सृष्टि दशा में ही अपने शक्ति-चक्र का विकास है अपितु सृष्टि के तत्क्षणात् अनन्तर भी— स्थितिलयौ ॥३१॥ स्थिति—बहिर्मुखता का आभास (और) लय—बहिर्मुखता का लय (भी) उसे अपने शक्तिचक्र का विकास है। व्याख्या--पूर्व सूत्र का 'स्वशक्तिप्रचयः' (अपने शक्तिचक्र' का विकास है) इस सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये

तृतीय विकास : ५३ हुए विश्व के अलग-अलग प्रमाता की अपेक्षा से कुछ समय तक बहिर्मुखता में अवभासन रूप स्थिति और चित्स्वरूप परप्रमाता में विश्रान्ति-रूप लय, यह दोनों भी योगी के अपने शक्ति चक्र का विकास है । प्रत्येक वेद्य पदार्थ की सृष्टि और लय योगी को अपना ही संवित्-शक्ति रूप है । संवित्-शक्ति के साथ एकता का अभाव न रहने पर ही योगी को दोनों (स्थिति और लय) में स्वरूप-सत्ता का अनुभव रहता है । कालिका- क्रम में कहा है : ‘सर्वं शुद्धं निरालम्बं ज्ञानं स्वप्रत्ययात्मकम् । यः पश्यति स मुक्तात्मा जीवन्नेव न संशयः ॥’ अर्थ—जो योगी निर्विकल्प तथा नाम-रूप-वर्जित विश्व और स्वाहन्ता रूप ज्ञान का अनुभव करता है वह शरीर में जीवन यापन करते हुए भी मुक्तात्मा ही है । इस विषय में कोई संदेह नहीं करना चाहिए ॥३१॥ सम्बन्ध—अब प्रश्न है कि क्या आपस में भेद का आभास रखने वाली सृष्टि, स्थिति और लय की अवस्थाओं में इस परमयोगी को स्वरूप में भेद का अनुभव तो नहीं होता ? इस शङ्का का समाधान करने में आगे का सूत्र कहा है । तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् ॥३२॥ तत्—उस (सृष्टि आदि परामर्श) के प्रवृत्तौ--प्रकट होने पर अपि—भी संवेत्तृभावात्—परप्रमातृस्वरूप (तुर्य-चमत्कार विमर्शमय) होने के कारण अनिरासः— (योगी) चलायमान नहीं होता व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और लय का भेद प्रकट होने पर भी योगी तुर्य चमत्कार के विमर्श वाला होने से इनमें निष्कम्प ही रहता है । कालिकाक्रम में कहा है : नाशेऽविद्याप्रपञ्चस्य स्वभावो न विनश्यति । उत्पत्तिध्वंसविरहात्तस्मान्नाशो न वास्तवः ॥ अर्थ—बाहर से धन-दारा-पुत्र आदि का मोह और अन्दर से शरीर का मोह ही अविद्या का प्रपञ्च है । उनके नष्ट होने से योगी के आत्मस्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । अतः उत्पत्ति और नाश से रहित होने के कारण स्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । यही बात स्पन्दशास्त्र में भी इस प्रकार वर्णित है : अवस्थायुगलं चात्र कार्यकतृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ (१-१४)

५४ : शिवसूत्र विमर्शं अर्थ—इस जगत् में कार्यता और कर्तृता नाम के दो भेद भोग्य और भोक्ता हैं । उन में जो भोग्य रूप भेद है वह पैदा भी होता है और नष्ट भी । परन्तु भोक्ता रूप भेद चिद्रूप होने से न कभी पैदा होता है और न कभी नष्ट ही । अतः वह नित्य है । और भी कहा है : भोक्तैव भोग्यरूपेण सदा सर्वत्र संस्थितः अर्थ—भोक्ता ही भोग्य के रूप में सदा और सब जगह ठहरा है । तत्सृष्ट्वा तस्मिन्नेव प्रविशत् अर्थ—जगत् में नाना प्रकार की सृष्टि को रच कर स्वयं उस में प्रविष्ट हुआ । आगे स्पन्द शास्त्र में कार्यता के बारे में लिखा है— कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ (१-१५, १६) अर्थ—वेद्य वर्ग में कार्य संपादन करने का सामर्थ्य जो बाह्य इन्द्रियों के व्यापार से ही होता है, समाधि दशा में उसका लोप हो जाता है । परन्तु अबुद्ध को इस प्रकार इन्द्रियों के व्यापार का लोप होने पर यह मान्यता होती है कि 'मैं नहीं हूँ' । वह यह नहीं जानता कि यह अभाव परामर्श ही साक्षी होने से स्वात्मा का स्थिरीभाव बता देता है । परन्तु जो परप्रमातृपद सर्वज्ञत्व गुण का स्थान है उसका कभी लोप नहीं होता है क्योंकि वहाँ भिन्न वेद्यवर्ग का ज्ञान नहीं होता ॥३२॥ सम्बन्ध—विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय में निष्कम्प योगी को— सुखासुखयोर्बहिर्मननम् ॥३३॥ सुखासुखयोः--(अन्य पुस्तकों में पाठान्तर 'सुखदुःखयो') वेद्य पदार्थों के स्पर्श से हुए सुख और दुःख मननम्—का जानना बहिः--(नीले पीले आदि की तरह इदन्ता का आभास रूप होने से) बहि- र्भाव में ही होता है । व्याख्या—देहप्रमातृता, प्राणप्रमातृता और पुर्यष्टक-प्रमातृता से उत्तीर्ण हुए इस योगिराज को वेद्यवर्ग के स्पर्श पर जय प्राप्त होती है । वह वेद्य-स्पर्श से हुए सुख और दुःखों को इदन्ता का आभास रूप ही जानता है जैसे नीला, पीला आदि बहिर्भाव में ही होते हैं । साधारण जन की अहन्ता वेद्य-पदार्थों में ही होती है इस कारण वह इनके स्पर्श से मान बैठता है कि 'मैं सुखी हूँ' या 'दुःखी हूँ' । परन्तु इस धीमान् के लिए

तृतीय विकास : ५५ विश्व ही स्वशक्ति-चक्र का विकास होता है (स्व-शक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम्—सूत्र ३-३०) । उसने देहादि अहंकार के महामोह को अतिक्रमण किया होता है। अतः उसे दूसरे लोगों की तरह सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते । इसके विषय में स्पन्दशास्त्र में कहा है : न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (१-५) अर्थ—उसका स्वभाव ही होता है कि उसे सुख, दुःख, मूढता आदि भावों का स्पर्श ही नहीं होता है क्योंकि उसका परप्रमातृभाव सदा उदय में होता है । सुख दुःख तो केवल संकल्प से पैदा होते हैं और क्षणभङ्गुर हैं । अतः वे शब्दादि विषयों के समान आत्मस्वरूप से बाहर होते हैं । यहाँ प्रश्न किया जा सकता है : यदि इस योगी को सुख और दुःख स्पर्श नहीं करते तो क्या वह पत्थर के समान संज्ञाहीन होता है ? इसका उत्तर अष्टावक्र जी ने जनक के प्रति इस प्रकार दिया है : निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छो वै मुक्तबन्धनः । क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।। (अष्टावक्रगीता—१२।२९) अर्थ—ज्ञानी वासना रहित होता है। उसको किसी का आधार नहीं लेना पड़ता है । इस लिए परप्रमातृ स्वभाव में स्वाधीन होता है। ज्ञानी में सुख दुःख के मूल राग-द्वेष नहीं होते हैं। परन्तु प्रारब्धानुसार जो प्राप्त होते हैं उनको अङ्गीकार करता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए सूखे पत्तों में कहीं जाने की अथवा स्थित होने की वासना (सामर्थ्य) नहीं होती है परन्तु जिस दिशा की ओर वायु चलता है उसी दिशा की ओर वे पत्ते उड़ने लगते हैं ठीक उसी प्रकार यह योगिविराट् प्रारब्ध के अनुसार भोग- चेष्टा करता है । इस योगि-देह के इन्द्रिय-वर्ग इसे विषयों की ओर नहीं ले जाते हैं अपितु करणेश्वरियाँ बनकर इसकी सेवा करते हैं। अष्टावक्र जी राजर्षि जनक को दृष्टान्तपूर्वक समझाते हैं— निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ —(अष्टावक्रगीता : १८।४६) अर्थ—वासना रहित पुरुषरूप सिंह को देखकर विषयरूपी हाथी असमर्थ होकर चुपचाप भाग जाते हैं। फिर इस वासनारहित पुरुष की ओर आकर्षित होकर स्वयं सेवा करते हैं ॥३३॥

५६ : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—क्योंकि जीवभाव से उत्तीर्ण इस योगी के अन्तःकरण को सुख दुःख स्पर्श नहीं करते, इसलिए वह— तद्विमुक्तस्तु केवली ॥३४॥ तत्—संस्कार शेष रहने तक तु—विशेष कर विमुक्तः—सुख-दुःख से मुक्त (होकर) केवली--केवल अद्वैतनिष्ठ रहता है। व्याख्या—स्वरूपनिष्ठ होने से योगी को संस्कार मात्र में भी सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते। वह विशेष रूप से इनसे मुक्त होता है। वह चिन्मात्र स्वरूप सदा अद्वैत- निष्ठ ही रहता है। यह श्रीकालिकाक्रम में इस प्रकार वर्णित है : सुखदुःखादिविज्ञानविकल्पानल्पकल्पितम् । भित्त्वा द्वैतमहामोहं योगी योगफलं लभेत् ॥ अर्थ—सुख, दुःख और मोहज्ञान के विकल्पों से घनीभूत द्वैत के महामोह को चीर कर योगी योग के फल स्वरूप लाभ में ही सदा रहता है । यहाँ 'तु' शब्द से आगे कहे जाने वाले अज्ञानी की अपेक्षा ज्ञानी में विशेषता कही गई है ॥३४॥ सम्बन्ध—अतः इस के विपरीत जीवदशा में पुरुष शुभ तथा अशुभ के कलंक से कर्मात्मा कहा गया है। इस का वर्णन करते हैं। मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा॥३५॥ तु--इसके विपरीत मोहप्रतिसंहतः--अज्ञान से पूरी तरह घनीभूत होकर कर्मात्मा—(वह) साधारण जीव अर्थात् कर्म-पिण्ड ही होता है। व्याख्या—परन्तु अज्ञान के आवरण से पुरुष जीव ही होता है योगी नहीं। वह सुख दुःख के ही आश्रित रहता है और सदा कर्म में लगा हुआ शुभ फल और अशुभ फल से कलंकित होता है। वह अविद्या के प्रभाव से विकल्पों के ही अनुसार चलता है और स्वरूप में सुख-दुःख का साक्षात्कार नहीं करता है ! कहा भी है— 'अज्ञानैकघनो नित्यं शुभाशुभकलंकितः' अर्थ—केवल अज्ञान में घनीभूत होकर (साधारण जीव) सदा शुभ तथा अशुभ वासनाओं (मायीयमल) से कलंकित रहता है ॥३५॥

तृतीय विकास : ५७ सम्बन्ध—परन्तु इस प्रकार के कर्म रूप जीव को जब कभी महेश्वर का अनर्गल शक्तिपात होता है तो उसको सहज ही ज्ञानक्रिया का लाभ होता है और उसे स्वातन्त्र्य योग का उदय होता है। फिर उसे— भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् ॥३६॥ भेदतिरस्कारे—संसार-दशारूप भेद के तिरस्कार होने (हटने) पर सर्गान्तरकर्मत्वम्--विश्व की सृष्टि तथा संहार करने की क्षमता होती है। व्याख्या—ऐसे योगिवर का देह, प्राण और पुर्यष्टक में अभिमान रूप भेद, चिद्धन में डुबकी लगाने से हट जाता है। वह कला, विद्या, राग, काल और नियति, माया के इन पांच कञ्चुकों से आवृत सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल प्रमाताओं को स्वरूप के उन्मेष द्वारा हटा कर मन्त्र (शुद्धविद्या), मन्त्रेश्वर (ईश्वर) और मन्त्रमहेश्वर (सदाशिव) रूप अपने माहात्म्य को क्रम से प्राप्त करता है। इस प्रकार वह अपनी इच्छा से प्रमाता तथा प्रमेय से ऊपर उठता है । अतः उसे कोई दूसरी ही वस्तु (शिवरूपता) की क्षमता प्राप्त होती है । शिव का शक्तिपात किसी समय भी किसी पर होता है। इसके होने में अधिकारी अनधिकारी का कोई विचार नहीं। यह व्यक्ति, समय और स्थान की विशेषता से बाहर है क्योंकि शिव कर्म-निरपेक्ष है। उसमें कर्म का कोई विचार नहीं होता। अतः शक्तिपात निरर्गल है। जिस किसी पर शिव का शक्तिपात हो उसे संसारदशा का स्वयमेव तिरस्कार होता है। उसमें विश्व की सृष्टि तथा लय करने की क्षमता आती है शक्ति संसार है और वह कर्म-सापेक्ष है। जीव फलभोगी है। अतः संसार में कर्म करने से उनके फल अवश्यम्भावी होते हैं। परन्तु शक्ति-पात हुए योगी को कर्मों के करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि देह-निर्वाहिनार्थ कर्म करने भी पड़ें तो भी उसे उनका कोई लेप नहीं होता। वह साधारण प्रमातृभाव और प्रमेयभाव से ऊपर उठ कर शिवरूपता को प्राप्त करता है। श्री स्वच्छन्द में कहा है : 'त्रिगुणेन तु जप्तेन स्वच्छन्दसदृशो भवेत् ।' अर्थ—त्रैगुण्य से यहाँ अनेक गुणता उपलक्षण कहा है। अतः महामन्त्ररूप परिपूर्ण अहंता भाव से अपने स्वभाव-परामर्श में रहने से योगी स्वच्छन्दनाथ शिव के समान होता है। अतः कर्मात्मा जीव भी कभी अनर्गल शक्तिपात से स्वच्छन्द-सादृश्य प्राप्त करता है ॥३६॥ सम्बन्ध—प्रमेय-प्रमाण भाव से उठकर रहना इस योगी के लिए असम्भव नहीं है, क्योंकि इसे—

५८ : शिवसूत्र विमर्शं करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् ॥३७॥ करणशक्तिः—विश्व की स्थिति और लय करने की शक्ति स्वतोऽनुभवात्—अपने ही अनुभव के अन्तर्गत होती है । व्याख्या—जिस प्रकार साधारण जन को संकल्पों और स्वप्न आदि में सृष्टि और लय करने की शक्ति अपने ही अनुभव से होती है, वैसे ही योग-युक्त सम्पन्न आत्मा को विश्ववैचित्र्य के सम्पादन करने की शक्ति अपनी ही ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के अनुभव से सिद्ध है । इस शिवयोगी को असाधारण पदार्थों के निर्माण करने की शक्ति अपने संपादन-सामर्थ्य से होती है, साधारण जन की तरह इन्द्रिय-सामर्थ्य से नहीं । वैसे तो ब्रह्मा से लेकर कीटाणु तक किसी भी प्राणी की उल्लेखनरूप क्रियाशक्ति और अवभासनरूप ज्ञानशक्ति स्वाभाविक१ हैं। ऐसा सम्भव होने पर किसी विषय पर पूर्ण एकाग्रता से विमर्श किया जाय तो सर्वसाधारण इच्छित पदार्थ निर्माण भी हो सकता है। इस विषय में विश्वामित्र आदि मुनियों की नूतन स्वर्ग सृष्टि२ की गाथाएँ प्रसिद्ध हैं । ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ में इसी विचार के स्पष्ट अर्थ की कारिका इस प्रकार है : अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखावभासनात् । ज्ञानक्रिये स्फुटे एव सिद्धे सर्वस्य जीवतः ॥ (१-६-१०) अर्थ—अतः योग-सिद्ध इस असाधारण आत्मा को विश्व में विचित्रता (सृष्टि और संहार संपादन करने की शक्ति) स्वानुभव-सिद्ध होती है। यह संपादन-सामर्थ्य शिवयोगी की तुर्यरूप स्वातन्त्र्य-शक्ति है जो उसे अपने ही अनुभव के अन्तर्गत होती है ॥३७॥ सम्बन्ध—क्योंकि यही तुर्यरूप स्वातन्त्र्यशक्ति इस बोधरूप प्रमाता (शिव-योगी अथवा योगसिद्ध पुरुष) की स्वरूप-स्थिति का सार है, अतः जाग्रदादि अवस्थाओं में इस पद के, मायाशक्ति से आच्छादित होने पर भी, इसी तुर्य से स्वरूप को उत्तेजित करने की आवश्यकता साधक के लिए अभीष्ट है । इस विषय में अगले दो सूत्र हैं— १. यैव चित् गगनाभोगे भूषणे भाति भास्करे । धराविवरकोशस्थे सैव चित् कीटकोदरे ॥ अर्थ—‘जो चिति आकाश-भूषण भगवान् सूर्य में भासती है वही चिति पृथ्वी के बीच में बिल-कोश में ठहरे हुए कीड़े में विद्यमान है ।’ २. नूतन स्वर्ग सृष्टि—त्रिशंकु के लिए स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के मध्य में विश्वामित्र ने नूतन सृष्टि अपने योगबल से रची थी । यह बात पुराण-प्रसिद्ध है ।

तृतीय विकास : ५९ त्रिपदाद्यनुप्राणनम् ॥३८॥ त्रिपद—(सृष्टि, स्थिति और संहार रूप इस) जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में आदि—प्रधान (जो चौथा तुर्य है, उस) से अनुप्राणनम्—(आत्मस्वरूप की) सावधानता रखनी चाहिए । व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और संहार शब्दों के कहने से यहाँ योगी की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति भाव वाली अवस्थाओं से अभिप्राय है । जाग्रत् से निद्रा में जाते समय अतीत जाग्रत् और अनागत निद्रा की दशा आती है । इसे मध्य-दशा कहते हैं । योगी इस मध्य-दशा में आनन्दघन तुर्यरस का आस्वादन करता है । इसी प्रकार तीसरी अवस्था (स्वप्न) के उन्मेष और दूसरी अवस्था की उपशान्ति दशा में आदि और अन्त कोटि की मध्य-दशा को ग्रहण कर वह चिद्घनता का अनुभव करता है । साधक अवस्था से उसे इस चिद्घनता-रूप तुर्य को दृढ़ता से वर्तमान जाग्रत् आदि अवस्थाओं में व्याप्त करने का अभ्यास करना चाहिए । इस विषय में वासिष्ठ-दर्शन में कहा है : निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते । तं भावं भावयन्साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥ अर्थ—निद्रा की अवस्था में जाने से पहले और जाग्रत् अवस्थां के अन्त में (अर्थात् मध्यदशा में) जिस निर्विकल्पभाव का अनुभव होता है उसी भाव (तुर्य) में सावधान रहने से अक्षयसुख अर्थात् चिद्घनता की व्याप्ति रहती है । और भी आद्यशङ्कराचार्य रचित ‘प्रबोध-सुधाकर’ में कहा है : यद्भावाद्भावः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते । अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदद्वयानन्दः ॥१६०॥ अर्थ—निद्रा के आरम्भ में और जाग्रत् के अन्त में जिस शुद्ध ओर निर्विषय भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्द की ही प्राप्ति होती है । योगी को इसी शाम्भवी भूमिका में स्थिरता प्राप्त करने की ओर इस सूत्र में संकेत है । जब तक योगी-साधक तुर्यानन्द के रस को तेल की तरह अधिक और अधिक फैलाने में (त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेव्यम्-सू० ३-२०) समर्थ न हो तब तक उद्यमशील रहना आवश्यक है । यह आणवोपाय की रीति है । मध्य-दशा के तुर्यानन्द से वर्तमान जाग्रदादि दशाओं में आने पर विषयों के उपभोग के अवसर आते हैं । उन अवसरों पर योगी को तुर्य का अवभासन विद्युत् की तरह होता है (तुर्यरसं क्षणमात्रसंभवम्) । इस क्षणमात्र के तुर्यरस से उन मायाशक्ति से आच्छादित अवसरों को अनुप्राणन करना चाहिए । आशय यह है कि जो सावधानता

६० : शिवसूत्र विमर्श योगी को मध्य-दशा के क्षणमात्र के तुर्य चमत्कार में होती है वही सावधानता उसे विषयों के उपभोग के अवसरों पर अभ्यास में ठहरानी चाहिए। यह अभ्यास उसे अन्तर्मुख भाव से स्वरूप-विमर्श की स्थिति के तारतम्य से बढ़ाना चाहिए। यह अभ्यास शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि भिन्न-भिन्न विषयों के उपभोग के अवसरों पर किये जाते हैं। कुछ उदाहरण 'रुद्रयामलतन्त्र' के 'विज्ञान भैरव' भाग से सुगम बोध के लिए यहाँ उद्धृत किये जाते हैं : (क) शब्द (श्रवण) का अभ्यास— गीतादिविषयास्वादास मसौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ।।७३।। अर्थ—वंशी-वीणा के गायन-विषय के श्रवणेन्द्रिय द्वारा चमत्कार-पूर्ण आस्वादन करने से अनुपम सुख का अनुभव होता है । जो योगी उस असाधारण सुख के साथ आत्मा को तद्रूप करता है उसका मन उसी शब्द-चमत्कार-सुख पर आरूढ़ होने से तन्मय हो जाता है । इसे शाक्त-स्पर्शविश कहते हैं । योगी को इस समावेश से ब्रह्म-भाव की प्राप्ति होती है । यह शब्द-ब्रह्म-रूपता का अनुभव है । 'आदि' शब्द से स्पर्श, रूप, रसादि के भाव इसी प्रकार ग्रहण करने चाहिए । (ख) स्पर्श-विषय का अभ्यास (साक्षात्)— शक्तिसंगमसंक्षुब्धशक्त्यावेशावसानिकम् । यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥ अर्थ—स्त्रीसंभोग के अवसर पर (जब इन्द्रियों में पत्तों की सरसराहट की तरह स्खलन होता है) आनन्द शक्ति का समावेश होता है । उसके अवसान पर घण्टे की अनुरणन ध्वनि की तरह, जो ब्रह्म-तत्त्व का सुख होता है वह अपना ही अर्थात् आत्म-सम्बन्धी होता है, दूसरे अर्थात् स्त्री से नहीं । स्त्रीसंभोग केवल उस सुख की अभिव्यक्ति का ही कारण है क्योंकि आनन्द अपना ही है । अतः स्त्रीसंग के अन्तः-बाह्य-शून्य जो आनन्द की अनुभूति होती है उसके चमत्कार पूर्ण ध्यान से योगी परब्रह्मानन्दमय बन जाता है । मूर्खजन की तरह संभोग का ही विधि नहीं मानता । (ग) स्पर्श विषय का अभ्यास (स्मरण से)— लेहनामन्थनाकोटौ स्त्रीसुखस्य भरात्स्मृतेः । शक्ताभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसंप्लवः ।।६९।। अर्थ—(भगवान् शिव इस विषय में पार्वती से कहते हैं) हे देवि ! स्त्री के सम्मुख न होने पर भी चुम्बन आदि उद्दीपन विभावों से उद्दीप्त आनन्द के अतिशय स्मरण से अपनी ही उल्लसित आनन्दमयता की भावना करनी चाहिए ।

तृतीय विकास : ६१ (च) रूप-विषय का अभ्यास— आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे चिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तन्मयस्तल्लयीभवेत् ॥ अर्थ—स्त्री आदि शक्ति के सम्मुख होने पर, दरिद्रता से पीड़ित किसी व्यक्ति को अकस्मात् धन की बड़ी राशि मिलने पर अथवा बहुत समय के प्रवास से आए हुए बन्धु, पुत्र, मित्र आदि से मिलने पर जो आनन्द का उदय होता है उसके उदयस्थान मात्र का ग्रहण कर उसका अन्तर्मुख भाव में ध्यान करने से (योगी) आनन्द में विश्राम पाये। (छ) रसना-विषय का अभ्यास— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद्भरितावस्थां१ महानन्दस्ततो भवेत् ॥ अर्थ—क्षुधा के समय भक्ष्य (खाने के योग्य, अभक्ष्य नहीं) खाने पर और प्यास के समय पेय (जल नींबू या मीठा क्षीर आदि, मद्य आदि नहीं) पीने पर प्रत्येक लुकमे और प्रत्येक बूँद से जो तुष्टि, पुष्टि और क्षुधा-निवृत्ति के आनन्द का अनुभव होता है, उस आनन्द दशा का विमर्शन करने से (योगी) स्वरूप-समावेशमय आनन्द से भर जाता है । शब्द, स्पर्श आदि विषयों के उपभोग में वेद्यपदार्थ का विगलन होकर क्षणमात्र संभव तुर्यपद के उदय होने पर भी साधारण जन असावधानी के कारण प्रत्यक्ष शब्दन, स्पर्शन आदि विषय में ही सुख मानता है । परन्तु योगीजन मायाशक्ति से आच्छादित होने पर भी उन विषयभोगों के अवसरों पर सावधान रहने से उस विद्युत् के समान तुर्यरस से सींचता हुआ स्वरूप-विमर्श की स्थिति को दृढ़ करता है और तदनन्तर ब्रह्मानन्द भाव का अनुभव निरन्तर करता है । श्रीमदाद्यशङ्कराचार्य इस विषय में कहते हैं : 'आदौ ब्रह्माहमस्मीत्यनुभव उदिते खल्विदं ब्रह्म पश्चात् ।' —(शतश्लोकी—३) अर्थ—पहले जब 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अनुभव उदित होता है उसके बाद यह बोध स्वयं होता है कि यह जगत् आदि सब कुछ ब्रह्म है । अतः योगी प्रधान तुर्यामृत रस से जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं को सींचता है और पूर्णहंता के स्वानुभव से आनन्दित होता है । यह अकिञ्चित्-चिन्तनमयी दशा विश्व-अभेद-चमत्कार-मय होती है जहाँ अणुमात्र भी आणवमल नहीं रहता है। इस विषय में भैरव देवी से कहता है : १, पाठान्तर : 'भावयेद्भैरवम् भावम्' इति

६२ : शिवसूत्र विमर्श अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा । याऽवस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥१५॥ तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । —(विज्ञान भैरव) अर्थ—विकल्प-वासना से रहित पूर्णाहन्ता का स्वप्रकाशरूप आनन्द जो भैरवरूप शिव की भैरव-सम्बन्धी परिपूर्ण स्वरूपा अवस्था है उस निर्मल विश्वपूरण स्वरूप को सावधान होकर हृदयंगम करना चाहिये । उस अवस्था में सम्पूर्ण जगत् स्वभित्ति पर ही निरावरण आभासित होता है । इस प्रकार तीनों अवस्थाओं को चौथी तुर्यरूप मध्य-दशा से अनुप्राणन कर योगी निरन्तर अभ्यास से पूर्णाहन्ता की सावधानी दृढ़ करता है । यह दशा योगी को भगवान् शिव के शक्तिपात से ही होती है । तत्त्वान्तर्गत विज्ञानाकल प्रमाता से पार होकर ही यह अवस्था होती है जब विश्व से अभेद ब्रह्मभाव के अनुभव में योगी का मन लीन होता है । उत्पलदेव, जिसने जीवभाव के पहले दो मल-स्थूलतर मायीय मल और स्थूल कार्ममल—हटाये थे, उस आन्तरिक अभिन्न से आणवमल के अशेषरूप से हटाने के लिए अर्थात् विज्ञानाकल प्रमाता (जहाँ अनुसंधान करने से अनुसन्धान और न करने से बहिर्मुखता होती है) से बाहर निकलने के लिए भगवान् शिव से प्रार्थना करते हैं : अन्तरप्यतितरामणीयसी या त्वदप्रथनकालिकास्ति मे । तामपीश परिमृज्य सर्वतः स्वं स्वरूपममलं प्रकाशय ॥ —(शिवस्तोत्रावली १३-२) अर्थ—आप हे प्रभु ! चित्स्वरूप को छिपा रखने वाली मलिनता-चाहे वह जरा भी क्यों न हो-जो मेरे चित्त में आपके स्वरूप-साक्षात्कार के समय होती है उसको भी पूर्णरूप से दूर करके अपने चिदानन्दमय निर्मल स्वरूप को (जहाँ व्युत्थान और समाधि का कोई भेद न रहे) प्रकट कीजिए । ईश्वर स्वरूप स्वामी श्री लक्ष्मण जू इसी प्रकार सदा सावधान रहने के लिए अपने शिष्यगण को यह उपदेश दिया करते हैं : (१) भोजन करते समय प्रत्येक लुकमे का स्वाद लेते हुए अनुसन्धान करना चाहिये कि कौन खाने का स्वाद लेता है । इसी प्रकार दूध, जल आदि पीते हुए भी पीनेवाले को ध्यान में लाना चाहिए । (२) चलते-चलते एक कदम उठाने के पश्चात् दूसरा कदम डालने के पूर्व मध्य- दशा में अनुसन्धान करना चाहिए ।

तृतीय विकास : ६३ (३) छींकते समय छींक आने से पहले और छींकने के अनन्तर ही सावधान रहना चाहिए। (४) अपने किसी दूरस्थ प्रियजन की याद आते समय पूर्वापर ज्ञानरहित जो आनन्द-दशा है उसमें ठहरना चाहिए। (५) सोते समय निद्रा लगने से पूर्व और जाग्रत् के अन्त में मध्य-दशा पर ठहरने का प्रयत्न करना चाहिए १ ॥३८॥ सम्बन्ध—अतः योगी साधक को चाहिए कि वह इस प्रकार तीनों अवस्थाओं में अन्तर्मुख भाव से मध्य-दशा का अनुप्राणन करने की स्थिरता प्राप्त कर ही संतुष्ट न रहे, अपितु उसे बाह्यरूपता में भी यह अभ्यास दृढ़ करना चाहिए। इस विषय में अगला सूत्र है। चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु ॥३९॥ चित्तस्थिति—(जिस तरह) चित्त की अन्तर्मुख निरुद्ध अवस्था (स्वाभाविक हुई है) वत्—(उस) की तरह शरीर—(व्यक्तिगत शरीर में) जाग्रत्, (और) करण—(व्यक्तिगत शरीर में) स्वप्न (अवस्थाओं) के बाह्येषु—बाह्य जगत् रूप सुषुप्ति को भी (तुर्य रस से अनुप्राणित करना चाहिए)। १. स्वामी जी महाराज ने इस विषय में अपने अनुभव को भी प्रकट किया है— There is a point be-twixt sleep and waking, where thou shalt be alert without shaking; Enter into the new world where forms so hidepus pass, They are passing, endure, do not be taken by the dross. Then the pulls and pushes about the tolerate. Close all ingress and egress; Yawnings there may be; Shed tears-crave-implore, But thou wilt not prostrate, A ‘THRILL’ passes, and that goes down to the bottom, It riseth, may it bloom forth, that is BLISS : Blessed Being, Blessed Being— O ! greetings be to THEE. By Swami Lakshaman Joo.

६४ : शिवसूत्र विमर्श व्याख्या—जब तक चित्त की गुणों से भिन्न सत्ता रहती है तब तक वह अपने कारण में विलीन नहीं हो जाता, उसमें परिणाम होना अनिवार्य है । निरोधकाल में चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकार के संस्कारों में व्याप्त रहता है। संस्कारों में व्याप्त चित्त के व्युत्थान धर्म से निरोध-धर्म में परिणत होने को महर्षि पतञ्जलि ने 'निरोध-परिणाम' (अथवा समाधि-परिणाम) का नाम दिया. है। यह अवस्था व्युत्थान-संस्कारों के अन्तर्गत ही मानी गई है। जब चित्त भलीभांति अन्तर्मुखरूप से समाहित होता है उसके बाद चित्त में जो परिणाम होता है उसे 'एकाग्रता-समाधि' कहा है । उस अवस्था में शान्त होने वाली वृत्ति एक सी ही रहती है। योगी को इसी की ओर प्रयत्नशील रहने का संकेत पतञ्जलि मुनि के इस सूत्र में है । 'ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता परिणामः' —(योगसूत्र ३–१२) अतः अन्तर्मुख भाव में जब चित्त विद्युत्-प्रकाश की तरह क्षणमात्र के तुर्य- चमत्कार से अनुप्राणित होता है तब आनन्द से भरा होने के कारण योगी को संतोष होता है। फिर उसे इसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्न से बाह्य आभास रूप बहिर्मुखता में भी अन्तः-विमर्श के बल द्वारा ही क्रमपूर्वक तुर्य रस से अनुप्राणित करना चाहिए (देखिये : त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्-२०) । इससे योगी विश्व-अभेद-चमत्कार-मय दशा मे स्थिति प्राप्त करता है । यह विमर्शानन्द का विकास है। श्री विज्ञानभैरव में कहा है : सर्वं जगत्स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् । युगपत्स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥६५॥ अर्थ—बाह्य के अभिमत वस्तुजात में सर्वत्र चिदानन्दघनरस से भरी हुई परिपूर्ण शिवता की अपने दिव्यदेह में विभावना (चिन्तन) करने से योगी को अनुत्तर आनन्दमय स्वरूपसमावेश होता है । यही भाव वाजसनेय श्रुति में कहा है : पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ अर्थ—वह परब्रह्म पूर्ण है और यह कार्यब्रह्म भी पूर्ण है क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है । तथा प्रलयकाल में पूर्ण कार्यब्रह्म का पूर्णत्व लेकर अपने में लीन करके पूर्ण परब्रह्म ही बचा रहता है । इस प्रकार आनन्दरूपता की स्वातन्त्र्य-शक्ति सब दशाओं में स्फुट होती है जिससे सम्पादन-सामर्थ्य (विश्व की स्थिति और लय करने की शक्ति) योगी के अपने अनुभव

तृतीय विकास : ६५ के अन्तर्गत होती है । अतः अन्तर्मुख वृत्ति को तुर्य-रस से आप्लावित कर बहिर्मुख जगत्रूप सुषुप्ति को भी इससे आप्लावित करने का दृढ़ अभ्यास करना योगी के लिए आवश्यक है । इससे उदय और अस्त एक-सा बना रहता है । ऐसे सिद्ध योगी को अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता में कोई भेद नहीं रहता है । उसे विमर्शानन्द का सदा विकास रहता है ॥३९॥ सम्बन्ध—परन्तु, जब योगी इस अनुत्तर आनन्दमय अवस्था का सर्वात्मभाव से इस प्रकार विमर्श न करता रहे, तब उसे देह, प्राण, पुर्यष्टक (जाग्रत्, सुषुप्ति और स्वप्न) के प्रमातृता भाव में ही रहने से अपूर्णता-रूप आणवमल के कारण संसार के सीमित विषयों की ओर हो गति रहती है । इस विषय में आगे का सूत्र है । अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य ॥४०॥ संवाह्यस्य—(सर्वात्मभाव से विमर्श न करने के कारण) कर्म का बोझ ढोने वाले पशु को अभिलाषाद्—(व्यक्तिगत) अभिलाषा से बहिः—विषयों की ओर गतिः—प्रसार होता है । व्याख्या—स्वरूप का अनुसंधान न करते रहने के कारण वह व्यक्ति देह, प्राण और पुर्यष्टक की प्रमातृता में ही फँसा रहता है । उसका व्यवहार जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में ही रहता है । वह शक्ति-चक्र के आधार-भूत माया सहित कला विद्या आदि षट्-कञ्चुकों से आगे शुद्धविद्या में प्रवेश नहीं पाता है । उसे लौकिक रूप अभिलाषाएँ सताती हैं । अपूर्णता की मान्यता के कारण आणवमल उससे नहीं छूटता । यह सूक्ष्म मल फिर स्थूल बनने लगता है । भिन्न-वेद्य-प्रथा से फिर मायीय मल बढ़ता है और उसका मन विक्षेपमय बनकर विषयों की ओर ही जाता है । फलतः शुभ और अशुभ वासनाओं से स्थूल कार्म मल की वृद्धि होती है जिससे वह संचित आगामी आदि कर्मों का बोझ ढोते हुए (अन्तःकरण, बहिष्करण, शब्दादि तन्मात्र और पृथ्वी पर्यन्त भूतजाल में फँस कर) नाना योनियों के चक्कर में पड़ जाता है । अन्तर्मुख स्वरूप की ओर फिर कभी नहीं जाता है । जैसे 'कालिकाक्रम' में कहा है : अतथ्यां कल्पनां कृत्वा पच्यन्ते नरकादिषु । स्वोत्थैर्दोषैश्च दह्यन्ते वेणवो वह्निना यथा ॥ अर्थ—असत्य वस्तुओं में सत्य भावना करके अपने ही दोषों से (ऐसे मूढ़ व्यक्ति) नरकों में दुःखों से पीड़ित रहते हैं जैसे जैसे जंगल में बाँस (वायुवेग से) आपस में ही टकराने के कारण अग्नि से भस्म हो जाते हैं । और भी (वह) मायामयैः सदा भावैरविद्यां परिभुञ्जते । मायामयीं तनुं यान्ति ते जनाः क्लेशभाजनम् ॥ ५

६६ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—परमार्थ अभ्यास आदि क्रमों को त्याग कर (ऐसे) लोग अविद्या में ही रहते हैं। इस प्रकार अपने से ही उत्पन्न कामादि दोषों के कारण एक योनि से दूसरी योनि में जाकर नरक-क्लेशों के भागी बनते हैं। अनुत्तर शिव-दशा तो कोसों दूर रहती है ॥४०॥ सम्बन्ध—जब योगी परमेश्वर के शक्तिपात से उदित स्वरूप का ही विमर्श करता है तब किसी व्यक्तिगत अभिलाषा के अभाव से बहिर्मुख नहीं होता है अपितु आत्मा में ही नित्य रमणशील रहता है। अब यह कहते हैं। तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः ॥४१॥ तत्—तुर्यानन्द दशा में आरूढप्रमितेः—संवित्-विमर्श में लगे योगी की तत्—(व्यक्तिगत) अभिलाषा के क्षयात्—नष्ट होने से जीव—पुर्यष्टक प्रमातृभाव का संक्षयः—शमन होता है। व्याख्या—तुर्य-दशा में संवित्-धाम पर आरूढ़ योगी की अभिलाषाएँ क्षीण होती चली जाती हैं। उसके पुर्यष्टक प्रमातृभाव अर्थात् कर्मों का बोझ ढोने वाले पशुभाव का शमन होता है। उसका स्फुरण वित्प्रमातृभाव में ही सदा रहता है क्योंकि वह कालग्रास—समाधि में तत्पर होता है और संसार-भाव से छूट जाता है। जैसे 'कालिका- क्रम' में कहा है : यथा स्वप्नानुभूतार्थान् प्रबुद्धो नैव पश्यति । तथा भावनया योगी संसारं नैव पश्यति ॥ अर्थ—जैसे अत्यन्त अल्प प्रदेश हृदय में, स्वप्नकाल के ही प्रकाश में आये हुए; विचित्र उपवन, नदी, पर्वत, नगर आदि को मनुष्य जाग जाने पर नहीं देख पाता, वैसे ही योगी चिद्रूपता की स्वतन्त्र भावना में चिन्मयता के अतिरिक्त संसार भाव को नहीं पहचानता है। चिद्रूपभाव में स्थित होते ही संसारभाव नष्ट होता है। इस तरह कालग्रास-समाधि में तत्पर योगी कैवल्य पद का भोगी बनता है। उसे इन्द्रिय और तन्मात्राओं के बोझ से पीड़ित नहीं होना पड़ता। उसके विकल्प ही विमर्श होते हैं। वह प्राणापानरूपी जीवकला से ऊपर उठता है ॥४१॥ सम्बन्ध—अब प्रश्न उठता है कि जीवभाव के नष्ट होने पर देहपात होना चाहिये, परन्तु इस सुप्रबुद्ध योगी का देह तो वर्तमान ही रहता है, ऐसी दशा में वह संवित्-धाम में आरूढ़ कैसे रह सकता है ? इसके उत्तर में कहते हैं।

तृतीय विकास : ६७ भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः ॥४२॥ तदा—तब (अभिलाषा के क्षय होने पर) भूतकञ्चुकी—शरीर को ठहराने वाले पंच-भूतों के बने कञ्चुक (आवरण रूप पोशाक) को धारण करने वाला (अयं)—(यह योगी) विमुक्तः- -मुक्ति का अधिकारी (बन जाता है) (यतः)--(क्योंकि यह) भूयः—(अभ्यास की) बहुलता से पतिसमः—शिव के समान परः--पूर्ण (होता है) । व्याख्या—अभिलाषा का क्षय होने पर अर्थात् जीवभाव के लय होने से पुर्यष्टक (पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार) प्रमातृ‌ता गल जाती है। तब योगी शरीर को ऐसे बनाये रखता है जैसे एक साधारण मनुष्य अपने शरीर पर चादर ओढ़ता है। उसे फिर 'भूतकञ्चुकी' कहते हैं। वह पंच-महाभूतों से बने शरीर को आवरण (पोशाक) की तरह धारण करता है। वह शरीर के साथ अहंता को नहीं जोड़ता है। उसका कल्पित पुर्यष्टक आदि शरीर पर पशुजन की तरह किया परिमित अहंभाव गल जाता है। ऐसा योगी मुक्ति का भाजन बन जाता है क्योंकि उसे चिद्धनरूप परमेश्वर के स्वरूप का आवेश होता है। उसी से वह पूर्ण-स्वरूप होता है। शिवभाव में ठहरे हुए इस जीवन्मुक्त की शरीर में, जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही स्थिति होती है। जैसे इसी विकास के २६वें सूत्र में कहा है : 'शरीरवृत्तिर्वृतम्' । जैसे साँप को अपनी छोड़ी हुई पुरानी केंचुल (त्वचा) पर अहंता का अभिमान नहीं रहता वैसे ही इस शिवयोगी को शिव-स्वरूप में गहन अभ्यास के फलस्वरूप पृथक् देहादि पर प्रमातृता के अभिमान का अभाव रहता है। अथवा यों कहें कि जैसे खड्ग के म्यान में होते हुए भी म्यान खड्ग से अलग है वैसे ही देह-भाव के गलने से योगी को उसका प्रमातृभाव (अभिमानत्व) स्पर्श नहीं करता । वह विश्वात्मा शिव के साथ एक होता है। एक अद्वैतशास्त्र भैरवतन्त्र (श्री कुलरत्नमाला) में कहा है : यदा गुरुवरः सम्यक् कथयेत्तन्न संशयः । मुक्तस्तेनैव कालेन यन्त्रस्तिष्ठति केवलम् ॥ किं पुनश्चैकतानस्तु परे ब्रह्मणि यः सुधी । क्षणमात्रस्थितो योगी स मुक्तो मोचयेत्प्रजाः ॥ अर्थ—जब शक्तिपात के अवसर पर सद्गुण एक सत्-शिष्य को आवेश-पर्यन्त शिवभाव की प्राप्ति कराता है तब निःसंदेह वह उसी समय मुक्त होता है और शरीर

६८ : शिवसूत्र विमर्श को केवल यन्त्रवत् धारण करता है। फिर तो ऐसे सुबुद्धि का कहना ही क्या है जो परब्रह्म स्वरूप में अनन्यवृत्ति हो ! ऐसा योगी क्षणमात्र के लिए ही स्वरूप में ठहरे तो वह मुक्त होता है और सारी प्रजा को मुक्त करता है १ ॥४२॥ सम्बन्ध — अब प्रश्न है कि इस परमयोगी का 'भूतकञ्चुक' (शरीररूपी आवरण) भी स्वरूपलाभ के अवसर पर ही क्यों नहीं हट जाता है ? इसके उत्तर में कहते हैं। नैसर्गिकः प्राणसम्बन्धः ॥४३॥ (अस्य) — (इस महायोगी जीवन्मुक्त के शरीर में) प्राणसम्बन्धः — प्राणों का सम्बन्ध (श्वास और उच्छ्वास का प्रवहन) नैसर्गिकः — परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का स्वभाव ही है। व्याख्या — 'संवित् भगवती ने विश्ववैचित्र्य का अवभासन करने की इच्छा से पहले प्राण को निमित्त बनाया' — श्री भट्टकल्लट ने 'तत्त्वार्थ चिन्तामणि' ग्रन्थ में यह बात युक्तियुक्त कही है (प्राक् संवित् प्राणे परिणता) । अपने सहज स्वातन्त्र्य से संवित् देवी ने प्रपंच की विचित्रता को प्रकट करने की इच्छा से संकोच ग्रहण किया। शिव- दशा से विसर्ग रूप में आकर सृष्टि, स्थिति तथा संहार रूप इस जीव दशा का ग्रहण किया। इस प्रकार सारे विश्व में प्राणन-शक्ति को ग्रहण कर ग्राह्यरूप जगत् में यह भासमान होने लगी। अपनी स्वतन्त्रता में यह प्रथम अवभासन संवित्-देवी का प्राण- स्पन्द है। जैसे 'वाजसनेया' ग्रन्थ में कहा है : या सा शक्तिः परा सूक्ष्मा व्यापिनी निर्मला शिवा । शक्तिचक्रस्य जननी परानन्दामृतात्मिका ॥ महाघोरेश्वरी चण्डा सृष्टिसंहारकारिका । त्रिवहं त्रिविधं त्रिस्थं बलात्कालं प्रकर्षति ॥ १. वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावली में कुछ यही विचार मिलते हैं : स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिले दत्ता च सर्वावनि- र्यज्ञानां च .कृतं सहस्रमखिलाः देवाश्च संतर्पिताः । संसाराच्च समुद्धृताः स्वपितरः त्रैलोक्यपूज्योऽप्यसौ यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ॥ अर्थ — जिस किसी साधक का मन एक क्षणमात्र भी परब्रह्म के विमर्श में स्थिरता प्राप्त करे उसने (वस्तुतः) समस्त पुण्य तीर्थों का स्नान किया, सब पृथ्वी को दान में दिया, हज़ारों यज्ञों के कर्म का फल प्राप्त किया, सब देवताओं को तृप्त किया और अपने पितरों को भवपाश से उद्धार किया। ऐसा साधक सब जगत् का पूजनीय है।

तृतीय विकास : ६९ अर्थ—कल्याणस्वरूपा, निर्मल, व्यापक अत्यन्तसूक्ष्म पराशक्ति रूप संवित्-देवी शक्तिचक्र¹ को जन्म देती है । यह देवी प्राणों में परिणत जीवन-शक्ति है और तीन छायाओं में सर्वत्र ईशन करती है— [क] १. अघोरा—परानन्द अमृत स्वरूपा २. घोरा—अन्तर्मुख आनन्द स्वरूपा ३. घोरतरी—बहिर्मुख संसार रूपा —महाघोरेश्वरी [ख] अपने स्वरूप को छिपाने की चातुर्य-शक्ति —चण्डा [ग] त्रुटि आदि शक्तिरूप काल का परिमाण करने वाली कालकर्षिणी, जो सृष्टि, स्थिति और संहार रूप से काल का कर्षण करती है । —सृष्टिसंहारकारिणी परा-शक्ति इडा, पिगला और सुषुम्णा मार्गों में वहन करने से 'त्रिवह', सोम, सूर्य और अग्नि रूप होने से 'त्रिविध' तथा अतीत, वर्तमान और अनागत में स्थित होने से 'त्रिस्थ' कहलाती है । प्राण सम्बन्ध की अवधि तक ही शरीर रूप कञ्चुक भी ठहरता है, परन्तु संवित्- स्वरूप में ठहरे परमयोगी के श्वास-उच्छ्वास स्वभाव से ही इस ज्ञान-क्रिया रूप विश्व में संविन्मय होते हैं । प्राणों के साहचर्य से मितप्रमाता (जीव) कर्मों का पाश बनाता है और फिर उसके अधीन होता है। पहले किये हुए संचित और मिश्र कर्मों से प्रारब्ध-कर्म और उनके भोगने के लिए घर अर्थात् शरीर उत्पन्न होता है । प्रारब्ध कर्मों का उनके भोगने से ही क्षय होता है अन्यथा नहीं । इसलिए इस तत्त्ववित् योगी का शरीर प्रारब्ध के अनुसार ही ऐसे ठहरता है जैसे चक्र को घुमा कर उसके अन्तिम कुछ घुमाव स्वयं ही कुछ देर तक देखने में आते हैं । स्वयं तो वह कर्म-पाश से मुक्त स्वरूपसंविन्मय ही रहता है । वह देह पर दृष्टि कभी नहीं डालता है । श्रीमद् भागवत में इस सिद्धयोगी की अवस्था का वर्णन इस श्लोक में है : देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥ (एकादशस्कन्द-१३-३६) १. शक्तिचक्र में संवित्-देवी की शक्तियों के विकास का क्रम यों है :— (क) खेचरी—अन्तःकरण के शक्तिचक्र का विकास (ख) गोचरी—ज्ञानेन्द्रियों के शक्तिचक्र का विकास (ग) दिग्धरी—कर्मेन्द्रियों के शक्तिचक्र का विकास (घ) भूचरी—पंचमहाभूतों के शक्तिचक्र का विकास

७० : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जैसे मदिरा पीकर उन्मत्त पुरुष यह नहीं देखता कि मेरे द्वारा पहना वस्त्र शरीर पर है या गिर गया वैसे ही सिद्ध पुरुष जिस शरोर से उसने अपने स्वरूप का साक्षात्कार किया है वह प्रारब्ध-वश खड़ा है, बैठा है या दैववश कहीं गया है या आया है—नश्वर शरीर सम्बन्धी इन बातों पर दृष्टि नहीं डालता। अतः स्वरूप लाभ बनकर योगी का प्राणों से जो सम्बन्ध रहता है वह नैसर्गिक अर्थात् संवित्-स्वभाव वाला ही होता है ॥४३॥ सम्बन्ध—प्राणन-रूप ग्राहक भूमिका में स्थित यह स्वरूपविमर्श वाला योगी अलौकिक होता है—अब यह कहते हैं। नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्य सौषुम्नेषु ॥४४॥ नासिका—कुटिल रूप से वहन करने वाली प्राणशक्ति (की) अन्तः—आन्तरी संवित् (के) मध्य—(अन्तरतम) मध्यधाम में संयमात्—विमर्श (बार-बार अनुसन्धान) करने की अपेक्षा किमत्र—और अधिक क्या है (जो) सव्य—इड़ा नाड़ी अपसव्य—पिंगला नाड़ी सौषुम्नेषु—(और) सुषुम्ना नाड़ी में (अभ्यास करने से प्राप्त हो सकता है।) व्याख्या—नेत्र आदि के रोमरन्ध्रों के अन्त तक सब नाड़ीचक्र¹ में प्रधान इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना में जो कुटिलवाहिनी प्राणशक्ति है उसकी आन्तरी संवित् के अन्त- र्गत मध्यधाम में बार-बार अनुसन्धान करने से परमयोगी स्वात्म-संविन्मय बन जाता है। ऐसे महायोगी के विषय में 'श्रीकालिकाक्रम' में कहा है : तस्य देवादिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः । विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञानशालिनी ॥ अर्थ—परबोधमय उस देवों के देव की विमर्शमयता, सर्वज्ञता के ज्ञान से शोभायमान परमशक्ति है। ऐसी विमर्शमय दशा में इड़ा (प्राण), पिंगला (अपान) और सुषुम्ना (मध्यनाड़ी) में अभ्यास करने से ऐसे योगी को क्या लाभ हो सकता है। उसे आन्तर और बाह्य अभ्यास फिर नहीं करने पड़ते। वह अन्तर्मुख और बहिर्मुख भावों की सब दशाओं में १. नाडीचक्र में नाडियों की संख्या ७२००० बताई गई है।