भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

हंस भक्त) (५६ दक्षिण में रंगनाथ नाम अभिराम जाकौ, ताकौ ले बनावैं धाम काम सब टारियै। धन के जतन फिरे भूमि पै न पायो कहूँ, चहुँ दिसि हेर देख्यो भयो सुख भारियै।। २१२।। मन्दिर सराबगी कौं प्रतिमा सौं पारस की, आरस न कियो वेद न्यून हूँ बतायो है। 'पावैं प्रभु सुख हम नर्कहूँ गये तौ कहा?' धरक न आई तब कान लै फुकायो है।। ऐसी करी सेवा जासौँ हरी मति केवरा ज्यौं, सेवरा समाज सबै नीके कैं रिझायो है। दियो सौंपि भार तब लैवे को विचार करैं, हरैं कौन राह? भेद राजनि पैं पायो है।। २१३।। मामा रह्यो भीतर औ ऊपर सो भानजो हो, कलस भँवरकली हाथ सौं फिरायो है। जेबरी लै फाँसि दियो मूरति सो खैंचि लई, और बार बहु आप नीकैं चढ़ि आयो है।। कियो हो जो द्वार तामें फूलि तन फँसि बैठ्यो, अति सुख पाय तब बोलिकै सुनायो है। 'काटि लेवौ सीस ईश भेष की न निन्दा करैं,' भरैं अँकवारि मन कीजियै सवायो है।। २१४।। काटि लियो सीस ईश इच्छा कौ विचार कियो, जियौ नहीं जाय तऊ चाह मति पागी है। जोपै तन त्याग करौं कैसें आस सिन्धु तरौं?, ढरौं वाही और आयो नींव खुदै लागी है।। भयो शोक भारी हमें ह्वै गई अबारी काहू, और नै विचारी देखें वही बड़भागी है। भरि अकँवारि मिले मन्दिर सँवारि झिले, खिले सुख पाइ नैन जानै जोई रागी है।। २१५।। रां हंस भक्त रां कोढ़ी भयो राजा, किये जतन अनेक ऐपैं, एकहूँ न लागै, कह्यो हँसनि मँगाइयै। बधिक बुलाय कही, वेगि ही उपाय करौ, जहाँ-तहाँ ढूँढ़ि अहो, इहाँ लगि ल्याइयै।। कैसे करि ल्यावै? वेतौ रहैं मानसर माँझ, ल्यावोगे छुटौगे तब जनैं चारि जाइयै। देखत ही उड़ि जात, जाति को पिछानि लेत, साधु सौं न डरैं, जानि भेष लै बनाइयै।। २१६।। गये जहाँ हँस, सन्त बानौ सो प्रशंस, देखि, जानिके बँधाये राजा पास लैके आये हैं। मानि मत सार, प्रभु वैद को स्वरूप धारि, पूछिकें बजार लोग, भूप ढिंग ल्याये हैं।। काहे कौ मँगाये पच्छी? आछी हम करैं देह, छोड़ि दीजै इन्हें, कही नीठ करि पाये हैं। औषधि पिसाये, अँग-अंगनि मलाये, किये नीके, सुख पाये, कहि उनको छुटाये हैं।।२१७।। लेवो भूमि गाऊँ, बलि जाऊँ या दयालुता की, भाल भाग ताकैं जाकौं दरसन दीजियै। पायो हम सब, अब करौ हरि साधुसेवा, मानुष जनम ताकी सफलता कीजियै।। करी लै निदेस, देशभक्ति विसतार भयो, हंस हितसार जानि, हिये धरि लीजियै। बधिकनि जानी, जासौँ खगनि प्रतीति कीनी, ऐसो भेष छोड़िये न राख्योँ मति भीजियै।। २१८।।

६०) (श्री भक्तमाल श्रीसदाव्रतीजी महाजन महाजन सुनो सदाव्रती ताको भक्तपन, मन में विचार सेवा कीजै चित लायकै। आवत अनेक साधु, निपट अगाध मति, साधि लेत जैसी आवै सुबुधि मिलायकै।। सन्त सुख मानि, रहि गयो घर माँझ सदा, सुत सौं सनेह नित खेलै संग जायकै। इच्छा भगवान मुख्य, गौन लोभ जानि मारि, डार्यो, धूरि गाड़ि, गृह आयो पछितायकै ।।२१६.।। देखै महतारी, मग बेटा कहाँ पगि रह्यौ? बीते चारि जाम, तऊ धाम में न आयौ है। फेरी पुर दौंड़ी, ताके संग सन्त लौंड़ी आय, कह्यौ यों पुकारि, सुत कौने बिरमायौ है।। वेगि दै बताय दीजै, आभरन दिये लीजै, कही सो संन्यासी, एही मार्यौ मन लायौ है। दई लै दिखाय देह, बोल्यो याको गहि लेहु, याही ने हमारौ पुत्र मार्यो नीके पायौ है ।। २२० ।। बोल्यो अकुलाय, मैं तौ दियो है बताय मोंको, देहु जु छुटाय, नहीं झूठ कछु भाषियै। लेवौ मति नाम साधु, जो उपाधि मेट्यौ चाहौ, जावौ उठि और कहूँ, मानी छोरि नाषियै।। आयकै विचार कियौ, जानी सकुचायो सन्त, बोलि उठी तिया, सुता दै कैं नीके राखियै। पर्यो बधू पाँय, तेरी लीजिये बलाय, पुत्र शोक को मिटाय, और खरी अभिलाषियै ।।२२१।। बोलि लियौ सन्त, सुता कीजियै जू अंगीकार, दुख सो अपार, काहू विमुख कौं दीजियै। बोल्यौ मुरझाय, मैं तौ मार्यौ सुत हाय ! मौपै जियौहू न जाय, मेरो नाम नहीं लीजियै।। देखौ साधुताई, धरी सीस पै बुराई, जहाँ राईहूँ न दोष, कियौ मेरु सम रीझियै। दई बेटी ब्याहि, कहि मेरो उर दाह मिटै, कीजियै निबाह जग माहिं जौलौं जीजियै ।। २२२ ।। आये गुरु घर, सुनि दीजै कौन सर, बड़े सिद्ध सुखदाई, साधुसेवा लै बताई है। कह्यो सुत कहाँ?, आजू ! पायौ कही कैसी भाँति, कैसे कैं बखानै, जग मीचु लपटाई है।। प्रभु ने परीक्ष्या लई, सोई हमें आज्ञा दई, चलियै दिखावौं जहाँ देह कौं जराई है। गये वाही ठौर, सिरमौर हरि ध्यान कियो, जियो चल्यो आयो दास कीरति बढ़ाई है ।। २२३ ।। चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।। दारुमई तरवार, सारमय रची 'भुवन' की। 'देवा' हित सितकेश, प्रतिज्ञा राखी जन की।। कमधुज के कपि चारु, चिता पर काष्ठ जु ल्याये। जैमल के जुधि माँहि, अश्व चढ़ि आपुन धाये।

पण्डा देवाजी) (६१ घृत सहित भैंस चौगुनी, श्रीधर संग सायक धरन। चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।। ५२।। श्रीभुवनसिंहजी चौहान सुनौ कलिकाल बात, और है पुरान ख्यात, भुवन चौहान, जहाँ राना की दुहाई है। पट्टा युगलाख खात, सेवा अभिलाष साधु, चल्यो सो सिकार नृप संग भीर धाई है।। मृगी पाछे परे, करे टूक, हुती गाभिन यों आइ गई दया, कही 'काहे को लगाई है'। कहैं मोकौं भक्त, क्रिया करौं मैं अभक्तन की, दारु तरवार धरौं, यहै मनभाई है।। २२४।। और एक भाई, तानै देखी तरवार दारु, सक्यो न सँभार, जाय राना कौं जनाई है। नृप न प्रतीति करै, करै यह सौंह नाना, बानो प्रभु देखि, तेज बात न चलाई है।। ऐसे ही बरस एक, कहत वितीत भयो, कह्यो मोहि मारि डारौ, जोपै मैं बनाई है। करी गोठ कुण्ड जाय, पायकै प्रसाद बैठे, प्रथम निकासि आप सबनि दिखाई है।। २२५।। क्रम सौं निहारि कही, भुवन विचार कहा? कहौ चाहें दार, मुख निकसत सार है। काढ़िकै दिखाई, मानौं बिजुरी चमचमाई, आई मन माँझ, बोल्यौ याकौं मारौ भार है।। भक्त कर जोरिकै बचायौ, अजू ! मारियै क्यो? कही बात झूठ, नहीं करी करतार है। पट्टा दूनादून पावै, आवै मत मुजरा कौं, मैं ही घर आऊ, होय मेरौ निसतार है।। २२६।। श्रीचतुर्भुजजी के पण्डा श्रीदेवीजी दरसन आयो राना, रूप चतुर्भुज जू कैं, रहे प्रभु पौढ़ि हार सीस लपटाये हैं। वेगि दै उतारि कर, लैकैं गरे डारि दियो, देखि धौरौ बार, कही धौरे आये? आये हैं।। कहत तो कही गई, सही नहीं जात अब, महीपति डारै मारि, हरिपद ध्याये हैं। अहो हृषीकेश ! करौ मेरे लिये सेतकेश, लेशहूँ न भक्ति, कही किये देखौ छाये हैं।। २२७।। मानि राजा त्रास, दुखरासि सिन्धु बूड्यो हुतो, सुनिकै मिठास वानी मानौ फेरि जियो है। देखे सेत बार, जानी कृपा मो अपार करी, भरी आँखै नीर, सेवा लेश मैं न कियो है।। बड़ेई दयाल, सदा भक्त प्रतिपाल करें, मैं तो हौं अभक्त, ऐपै सकुचायो हियो है। झूठे समबन्धहू तैं, नाम लाजै मेरोई जु, तातैं सुख साजै, यह दरसाय दियो है।। २२८।। आयो भोर राना, सेत बार सो निहारि रह्यो, कह्यो केश काहू के, लै पण्डा ने लगाये हैं। ऐंचि लियौ एक तामें, खैंचिकै चढ़ाई नाक, रुधिर की धार नृप अंग छिरकाये हैं।। गिर्यो भूमि मुरछा हवै, तन की न सुधि कछू, जाग्यौ जाम बीते अपराध कोटि गाये है। यही अब दण्ड, राज बैठे सो न आवै इहाँ, अबलौंहूँ आनि मानि करै, जो सिखाये हैं।। २२६।।

६२) (श्री भक्तमाल श्रीकामध्वजजी भये चारि भाई, करैं चाकरी वै राना जू की, तामें एक भक्त, करै वन में बसेरो है। आयकै प्रसाद पावै, फेरि उठि जाय तहीं, कहैं नेकु चलौ, तौ महीना लीजै तेरो है।। जाके हम चाकर हैं, रहत हजूर सदा, मरै तौ जरावै कौन?, वही जाको चेरो है। छूट्यो तन वन, राम आज्ञा हनुमान आये, कियो दाह, धुँआ लगे, प्रेत पार नेरो है।।२३०।। नवाह परायण तृतीय विश्राम श्रीजयमलजी मेरतै प्रथम वास, जैमल नृपति ताकौं, सेवा अनुराग, नेकु खटकौ न भावहीं। करै घरी दस, तामें कोऊ जो खबरि देत, लेत नहीं कान, और ठौर मरवावहीं।। हुतो एक भाई बैरी, भेद यह पाइ लियो, कियो आनि घेरौ माता, जाइकैं सुनावहीं। करैं हरि भली, प्रभु घोरा असवार भये, मारी फौज सब, कहैं लोग सचु पावहीं।।२३१।। देखै हाँफै घोरो, अहो ! कौन असवार भयौ? गयो आगे जबै, देख्यो वही बैरी पर्यो है। बोल्यो सुखपाय, 'अजू ! साँवरो सिपाही को हैं?' एकले ही फौज मारी मेरो मन हर्यो है।। तोही को दिखाई दई, मेरे तरसत नैन, ! बैनन सौं जानी वही स्याम प्रभु ढर्यो है। पूछिकै पठाय दियौ, वानै पन यहै लियौ, कियौ इन दुख करै भली बुरो कर्यो है।।२३२।। श्रीग्वाल भक्तजी भयो एक ग्वाल, साधुसेवा सो रँसाल करैं, परै जोई हाथ, लैकै सन्तन खवावहीं। पायो पकवान, वन मध्य गयो खाइवे कौं, आइवे की ढील, चोर भैंस सो चुरावही।। जानिकै छिपाई, बात, माता सौं बनाइ कही, दई विप्र भूखौ घृत संग फेरि आवही। दिन हो दिवारी कौ सु, उन्हि पहिरायौ हाँस, आईं घर दाम लिये राँभ कैं सुनावहीं।।।२३३।। श्रीश्रीधरस्वामीजी भागवत टीका करी श्रीधर सुजानि लेहु, गेह में रहत करैं जगत् व्यवहार हैं। चले जात मग, ठग लगे कहैं कौन संग? संग रघुनाथ मेरो जीवन अधार है।। जानी इन कोऊ, नाहिं मारिवो उपाय करे, धरे चाप बान, आवैं वही सुकुमार है। आये घर ल्याये पूछैं, श्याम सो सरूप कँहा? जाने वे तौ पार किये आपु डार्यो भार है।।२३४।। मास परायण दसवा विश्राम भक्तनि संग भगवान् नित ज्यौं गऊबच्छ गोहन फिरैं।। निहकिंचन इक दास तासु के हरिजन आये। विदित बटोही रूप भये हरि आपु लुटाये।।

श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त) (६३ साषि देन कौ स्याम, खुरदहा प्रभुहिं पधारे। रामदास के सदन, राय रनछोर सिधारे॥ आयुध छत तन अनुग के, बलि बन्धन अपु वपु धरैं। भक्तनि संग भगवान् नित, ज्यौं गऊबच्छ गोहन फिरैं।। ५३ ।। श्रीहरिपालजी भक्तनि के संग, भगवान् ऐसे फिरयो करैं, जैसे बच्छ संग फिरै नेहवती गाइ है। हरिपाल नाम विप्र, धाम में जनम लियो, कियो अनुराग, साधु दई श्री लुटाइ है।। केतिक हजार लै बजार के करज ख्वाये, गरज न सरै कियौ चोरी को उपाइ है। विमुख कौं लेत, हरिदास कौं न दुख देत, आये सन्त द्वार, तिया संग बतराइ है।। २३५।। बैठे कृष्ण रुक्मिनी, महल तहाँ सोच पर्यो, हर्यो मन साधुसेवा साहूरूप कियौ है। पूछी चले कहाँ? कही भक्त है हमारो एक मैं हूँ आऊँ? आओ आये जहाँ पूछि लियौ है।। अजू मग चल्यो जात बड़ो उतपात मधि, कोऊ पहुँचावै देवौ, लै रुपैया दियौ है। करो समाधान, सन्त मैं लिवाइ जाऊँ इन्हें, लाइ वन माँझ देखि, बहु धन जियौ है।। २३६।। देखें जो निहार माला-तिलक न सदाचार, होयँगे भण्डार जोपै, इतो धन लायो है। लीजियै छिनाइ, 'यही वारि' कहै डारि देवौ, दियौ सब डारि दला छिगुनी में छायो है।। अँगुरी मरोरि, कही, 'बड़ो तूँ कठोर अहो', तोकौं कैसे छोड़ौ, सन्त जेवैं मोको भायो है। प्रगट दिखायो रूप, सुन्दर अनूप वह, मेरौ भक्तभूप, लैके छाती सौं लगायो है।। २३७।। श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त गौड़देसवासी उभै विप्र ताकी कथा सुनौ, एक वयस वृद्ध जाति वृद्ध छोटो संग है। और-और ठौरि, फिरि आये फिरि आये वन, तन भयो दुखी कीनी टहल अभंग है।। रीझो बड़ो द्विज निज सुता तोको दई अहो, रहो, नहीं चाह मेरे लई बिनै रंग है। साखी दै गोपाल, अब बात प्रतिपाल करो, ढरो कुल ग्राम भाग पूछ्यो सो प्रसंग है।। २३८ ।। बोल्यो छोटो विप्र, छिप्र दीजियै कही जो बात, तिया सुत कहैं, अहो सुता याके जोग है?। द्विज कहै नाहीं कैसे करौं?, मैं तो दैन कही, कही कहो भूलि भयो, विथा कौ प्रयोग है।। भई सभा भारी, पूछ्यो साखी नर-नारी? श्रीगोपाल वनवारी, और कौन तुच्छ लोग है। लेवौ जू लिखाइ जोपै साखी भरैं आइए तोपै ब्याहि बेटी दीजै लीजै करौ सुख भोग है।। २३६ ।।

६४) (श्री भक्तमाल आयौ वृन्दावन, वनवासी श्रीगोपाल जू सौं बोल्यो चलौ साखी देवौ, लई है लिखाइकै। बीते कैयौ याम, तब बोले स्यामसुन्दर जू, प्रतिमा न चलै, तोपै बोले क्यौं जू भायकै॥ लागे जब संग, युग सेर भोग धरौ रंग, आधे-आध पावैं, चलौं नूपुर बजायकै। धुनि तेरे कान परै, पाँछै जिनि दीठि करै, करैं रहौं वाहि ठौर कही मैं सुनायकै॥ २४०॥ गये ढिंग गाँव, कही नेकु तौ चितॉव रहे, चितये तें ठाढ़े, दियो मृदु मुसकायकै। ल्यावौ जू बुलाय कह्यो, आय देखौ, आये आप, सुनतहिं चौंकि सब ग्राम आयो धायकै॥ बोलिकै सुनाई साष, पूजी हिये अभिलाष, लाख लाख भाँति रंग भर्यो उर भायकै। आयो न सरूप फेरि, विनै करि राख्यो घेरि, भूप सुख ढेरि दियो, अबलौं बजायकै॥ २४१॥ श्रीरामदासजी द्वारका के ढिंग ही डाकौर एक गाँव रहे रहै, रामदास भक्त-भक्ति जाकौं प्यारियै। जागरण एकादशी करे रनछोर जू के, भयौ तन वृद्ध, आज्ञा दई नहिं धारियै॥ बोले भरि भाय, तेरौ आयवौ सह्यौ न जाय, चलौं घर धाय तेरे, ल्यावौ गाड़ी भारियै। खिरकी जु मन्दिर के पाछे, तहाँ ठाढ़ी करौ, भरौ अँकवारी मोकौं, वेगि ही पधारिये॥ २४२॥ करी वाही भाँति, आयौ जागरण गाड़ी चढ़ि, जानी सब वृद्ध भयो, थकी पाँव गति है। द्वादशी की आधी रात, लैंके चल्यो मोद गात, भूषण उतारि धरे, जाकी साँची रति है॥ मन्दिर उघारि देखें, परो है उजारि तहाँ, दौरे पाछे जानि, देखि कही कौन मति है। बापी पधराय हाँकि जाय सुख पाय रह्यो, गह्यो चल्यो जात आनि मार्यो घाव अति है॥२४३॥ देखे चहुँदिसि गाड़ी, कहुँ पै न पाये हरि, करि पछतावो कहैं, भक्त कै लगाई है। बोलि उठ्यो एक, एहि ओर यह गयो हुतौ, जाय देखें बावरी कौं, लोहू लपटाई है॥ दास कौं जु डारी चोट, ओट लई अंग में ही, नहीं मै तो जाऊँ, बिजै मूरति बताई है। मेरी सम सोनो लेहु, कही जन तोलि देहु, मेरे कहाँ? बोल्यो बारी तिया कै जताई है॥२४४॥ लगे जब तौलिवे कौं, बारी पाछे डारि दई, नई गति भई, पल उठै नहीं बारी कौ। तबतौ खिसाने भये, सबै उठि घर गये, कैसें सुख पावैं, फिर्यो मत ही मुरारी कौ॥ घर ही विराजे आप, कह्यो भक्ति कौ प्रताप, जाप करैं जोपै, फुरैं रूप लाल प्यारी कौ। बलिबन्ध नाम प्रभु, बाँधे बलि भयो तब आयुध को छत सुनि, आये चोट मारी कौ॥ २४५॥ बच्छ हरन पाछैं विदित, सुनौ सन्त अचरज भयो॥ जसू स्वामि के वृषभ, चोरि ब्रजवासी ल्याये। तैसेई दिये स्याम, वरष दिन खेत जुताये॥

भक्ता बारमुखीजी) (६५ नामा ज्यौं नँददास, मुई इक बच्छि जिवाई। अंब अल्ह कौं नये, प्रसिद्ध जग गाथा गाई॥ बारमुखी के मुकुट कौं, श्रीरंगनाथ को सिर नयो। बच्छ हरन पाछैं विदित सुनौ सन्त अचरज भयो॥५४॥ श्रीजसूसूवामीजी जसू नाम स्वामी, गंगा जमना के मध्य रहें, गहैं साधुसेवा ताको खेती उपजावहीं। चोरी गये बैल, ताकी इनकौं न सुधि कछू, तैसे दिये स्याम, हल जुटै, मन भावहीं॥ आये ब्रजवासी पैंठ, वृषभ निहारि कही, इन्हें कौन ल्यायो? घर जाय देखि आवहीं। ऐसे बार दोय चारि, फिरेउ न ठीक होत, पूछी पुनि ल्याये आये उन्हें पै न पावहीं॥२४६॥ बड़ोई प्रभाव देख्यो, तैसे प्रभु बैल दिये भयो हिये भाय, जाय पाँयनि में परे हैं। निपट अधीन दीन, भाषि अभिलाष जानि, दया के निधान स्वामी, शिष्य लै कै करे हैं॥ चोरी त्यागि दई, अति शुद्ध बुद्धि भई, नई रीति गहि लई, साधु पन्थ अनुसरे है। अन्न पहुँचावैं, दूध दही दै लड़ावैं आवैं, सन्त गुन गावैं, वे अनन्त सुख भरे हैं॥२४७॥ श्रीनन्ददासजी वैष्णवसेवी निकट बरेली गाँव, तामें सो हवेली रहें, नन्ददास विप्र, भक्त, साधुसेवा रागी है। करै द्विज द्वेष, तासौं मुई एक बछिया लै, डारि दई खेत माँझ, गारी जक लागी है॥ हत्या कौं प्रसंग करें, सन्तजन हूँ सौं लरैं, हिन्दू सो न मारै, यह बड़ोई अभागी है। खेत पर जाय वाही लियो है जिवाय, देखि द्वेषी परे पाँय, भक्ति भाय मति पागी है॥२४८॥ श्रीअल्हजी अर्चवतारनैष्ठिक चले जात अल्ह, मग लगि बाग दीठि पर्यो, करि अनुराग हरिसेवा विस्तारियै। वाकि रहे आँव माँगे, माली पास भोग लिये, कह्यो ‘लीजै’ कही, झुकि आई सब डारियै॥ चल्यौ दौरि राजा जहाँ, जायकै सुनाई बात, गात भई प्रीति आप तट पाँय धारियै। आवत ही लोटि गयो, मैं तो जू सनाथ भयो, देवो लै प्रसाद भक्तिभाव ही सँभारियै॥२४६॥ भक्ता वारमुखीजी वेश्या को प्रसंग सुनौ, अति रस संग भर्यो, भर्यो घर धन अहो ऐपै कौन काम कौ। चले मग जात, जन ठौर स्वच्छ आई मन, छाई भूमि आसन सो, लोभ नाहीं दाम कौ॥

६६) (श्री भक्तमाल निकसी झमकि द्वार, हंस, निहारि सब, कौन भाग जागे, भेद नहीं मेरे नाम कौ। मुहरनि पात्र भरि, लै महन्त आगे धर्यो, ढर्यो दृग नीर कही भोग करौ स्याम कौ।।२५०।। पूछी तुम कौन? काके भौन में जनम लियो? कियो सुनि मौन महाचिन्ता चित्त धरी है। खोलिकै निशंक कहौ, शंका जनि आनो मन, कहि बारमुखी, ऐपै पाँय आय परी है।। भरो है भण्डार धन, करो अंगीकार अजू ! करिये विचार जोपे, तोपैं यह मरी है। एक है उपाय, हाथ रंगनाथ जू को अहो, कीजिये मुकुट जामें, जाति गति हरी है।।२५१।। विप्रहू न छुवें जाको, रंगनाथ कैसे लेत? देत हम हाथ तोकौं, रहें इहाँ कीजिये। कियोई बनाय सब, घर कौ लगाय धन, बनि ठनि चली, थार मधि धरि लीजिये।। ऐसें आज्ञा पाइकै, निशंक गई मन्दिर में, फिरी यों सशंक, धिक् तियाधर्म भीजिये। बोले आप याको ल्याय, आप पहिराय जाय, दियो पहिराय, नयो सीस मति रीझियै।।२५२।। ब्राह्मण-दम्पत्ति और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।। बीच दिये रघुनाथ, भक्त संग ठगिया लागे। निर्जन वन में जाय, दुष्ट कर्म कियो अभागे।। बीच दियो सो कहाँ? राम ! कहि नारि पुकारी। आये सारंगपाणि, शोकसागर ते तारी।। दुष्ट किये निर्जीव सब, दास प्राण संज्ञा धरी। और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।।५५।। विप्र हरिभक्त करि गौनो चल्यो तिया संग, जाके दूनौ रंग, ताकी बात लै जनाइयै। मग ठग मिले, द्विज पूछैं अहो ! कहाँ जात? जहाँ तुम जात, यामें मन न पत्याइयै।। पन्थ को छुटाय चाहैं, वन में लिवाय जायँ, कहैं अति सूधो पैंड़ो, उर में न आइयै। बोले बीच राम, तऊ हिये नेकु धकधकी, कहै वह भाम, श्याम नाम कहाँ पाइयै।।२५३।। चले लागि संग, अब रंग कै कुरंग करौ, तिया पर रीझे, भक्ति साँची इन जानी है। गये वन मध्य, ठग लोभ लगि मार्यो विप्र, छिप्र लै कै चले, बधू अति बिलखानी है।। देखै फिरि-फिरि पाछैं, कहैं कहा देखै? मार्यो तबतौ उचार्यौ देखौं वाही बीच प्रानी है। आये राम प्यारे, सब दुष्ट मारि डारे, साधु प्रान दै उवारे, हित रीति यों बखानी है।।२५४।। मास परायण ग्यारहवाँ विश्राम

अन्तर्निष्ठ राजा) (६७ भेषनिष्ठ एक राजा एक भूप भागौत की, कथा सुनत हरि होय रति।। तिलक दाम धरि कोइ, ताहि गुरु गोविन्द जानै। षट्दर्शनी अभाव, सर्वथा घट करि मानै॥ भाँड़ भक्त कौ भेष, हाँसि हित, भँड़कुट ल्याये। नरपति कै दृढ़ नेम, ताहि ये पाँव धुवाये॥ भाँड़ भेष गाढ़ो गह्यो, दरस परस उपजी भगति। एक भूप भागौत की कथा सुनत हरि होय रति।। ५६।। राजा भक्तराज, डोम, भाँड़ कौ न काज होय भोय गई, याके धन हरी कौ न दीजियै। आये भेष धारि, लै पुजाये, नाचैं दैकेँ तारि, नृपति निहारि कही यों निहाल कीजियै।। भोजन कराये, भरि मुहरनि थार ल्याये, आगे धरि विनय करी, अजू यह लीजियै। भई भक्तिरासि बोले, आवै बास भावै नाहिं, बाहिं गहि रहे, कैसैं चले मति भीजियै।। २५५।। अन्तर्निष्ठ राजा अन्तरनिष्ठ नृपाल इक, परम धरम, नाहिन धुजी।। हरि सुमिरण हरि ध्यान, आन काहू न जनावै। अलग न इहि विधि रहै, अँगना मरम न पावै।। निद्रावश सो भूप, वदन ते नाम उच्चार्यो। रानी पति पर रीझि, बहुत वसु ता पर वार्यो।। ऋषिराज सोचि कह्यो नारि सौं, आज भक्ति मेरी कुजी। अन्तरनिष्ठ नृपाल इक परम धरम नाहिन धुजी।। ५७।। तिया हरिभक्त कहै, पति पै न भक्त पायौँ ! रहै मुरझायो मन, सोच बढ़यो भारी है। मरम न जान्यो, निसि सोवत पिछान्यो भाव,-विरह प्रभाव नाम निकस्यौ, विहारी है।। सुनत ही रानी, प्रेमसागर सभानी, भोर सम्पत्ति लुटाई मानो, नृपति जियारी है। देखि उत्साह भूप पूछ्यो सो निवाह कह्यो रह्यो तन ठौर नाम जीव यों विचारी है।। २५६।।

६८) (श्री भक्तमाल देखि तन त्याग पति, भई और गति याकी, ऐसो रतिवान् मैं न भेद कछू पायो है। भयो दुख भारी, सुधि-बुधि सब तब टारी, नेकु न विचारी, भावरासि हियो छायो है।। निसिदिन ध्यान तजे, विरह प्रबल प्रान, भक्ति रस खान, रूप कापै जात गायो है। जाके यह होय, सोई जानै रस भोय सब, डारै मति खोय, यामें प्रगट दिखायो है।। २५७ ।। श्री गुरुनिष्ठ भक्त गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। अनुचर आज्ञा माँगि, कह्यो कारज कौं जैहों। आचारज इक बात, तोहिं आये तें कहिहौं ।। स्वामी रह्यो समाय, दास दरसन कौं आयो। गुरु की गिरा विश्वास, फेरि शव घर में ल्यायो ।। शिषपन साँचो करन कौं, विभु सबै सुनत सोई कह्यो। गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। ५८ ।। बड़ो गुरुनिष्ठ, कछु घटी साधु, इष्ट जानै, स्वामी, सन्त पूज्य मानैं कैसैं समझाइयै। नित्यहिं विचारे, पुनि टारे, पै उचारे नाहिं, चल्यो जब रामत कौं, कही फिरि आइयै ।। सपथ दिवाई न जराइवे कौं दियो तन, ल्यायो यों फिराइ वही बात जू जनाइयै। साँचो भाव जानि, प्रान आये सो बखान कियो, करो भक्त सेवा, करी वर्ष लौं दिखाइये ।। २५८ ।। श्रीरैदासजी सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। सदाचार श्रुति शास्त्र, वचन अविरुद्ध उचार्यौ। नीर खीर विवरण, परम हंसनि उर धार्यौ ।। भगवत् कृपा प्रसाद, परमगति इहि तन पाई। राजसिंहासन बैठि, ज्ञाति परतीति दिखाई ।। वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज वन्दहिं जासु की। सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। ५६ ।।

श्रीरैदासजी) (६६ रामानन्द जू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक, गहे वृत्ति छूटकी की कहे तासौं बानिये। करो अंगीकार सीधो कहि दस बीस बार, बरषे प्रबल धार तामें वापै आनिये।। भोग कौं लगावैं प्रभु ध्यान नहिं आवैं, अरे कैसें करि ल्यावैं जाइ पूछि नीच मानिये। दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि, कुल में उतारी देह सोई याकों जानिये।।२५९।। माता दूध प्यावे याकों छुयोऊ न भावे सुधि, आवे सब पाछिलि सो सेवा को प्रताप है। भई नभ वानी रामानन्द मन जानी बड़ो, दण्ड दियो मानी वेगि आये चले आप है।। दुखी माता-पिता देखि धाय लपटाय पाँय, कीजिये उपाय कियो शिष्य गयो पाप है। स्तनपान कियो जियो लियो उन्हें ईश जानि, निपट अजानि फेरि भूले भयो ताप है।।२६०।। बड़ेई रैदास हरिदासनि सौं प्रीति बढ़ी, पिता न सुहाई दई ठौर पिछवारहीं। हुतो धन माल कन दियो हू न हाल तिया, पति सुख जाल अहो! किये जब न्यारहीं।। गाँठैं पगदासी क हूँ बात न प्रकासी ल्यावैं, खाल करें जूती साधु-सन्त कौं सँभारही। डारी एक छानि कियो सेवा को अस्थान रहे, चौड़े आप जानि बाँटि पावै यहि धारहीं।।२६१।। सहे अति कष्ट अंग हिये सुखसील रंग, आये हरिप्यारे लियो भक्त भेष धारिकैं। कियो बहु मान खान-पान सो प्रसन्न ह्वै कै दीनों कह्यो पारस हैं राखियो सँभारिकै।। मेरे धन राम कछु पाथर न सरै काम, दाम मैं न चाहौं, चाहौं डारौं तन वारिकैं। राँपी एक सोनों कियो दियो करि कृपा राखो, राखो यहु छानि माँझ लैहौं जु निकारिकैं।।२६२।। आये फिरि श्याम मास तेरह वितीत भये प्रीति करि बोले 'कहो पारस की रीति कौं'। वाही ठौर लीजै मेरो मन न पतीजै अब, चाहौ सोई कीजै मैं तो पावत हौं भीति कौं।। लैंके उठि गये नये कौतुक सो सुनो पावैं सेवत मुहर पाँच नित ही प्रतीति कौं। सेवा हू करत डर लाग्यो निसि कह्यो हरि, छोड़ो अर आपनी ओ राखो मेरी जीतिकौं।।२६३।। मानि लई बात नई ठौर लै बनाय चाय, सन्तनि बसाय हरि मन्दिर चिनायो है। विविध वितान तान गनौँ जो प्रमान होइ, भोय गई भक्तिपुरी जग जस गायो है।। दरसन आवैं लोग नाना विधि रागभोग, रोग भयो विप्रनि कौं तन सब छायो है। बड़ेई खिलारी वे रहे हैं छान डारि करी, घर पै अँटारी फेरि द्विजन सिखायो है।। २६४।। प्रीति रसरासि सौं रैदास हरि सेवत हैं, घर में दुराय लोक रंजनादि टारी है। प्रेरि दिये ह्रदै जाय द्विजानि पुकारि करी, भरी सभा नृप आगे कह्यो मुख गारी है।। जन कौं बुलाय समझाय न्याय प्रभु सौंपि, कीनौ जग जस साधु लीला मनुहारी है। जिते प्रतिकूल मैं तो माने अनुकूल, 'यातें सन्तनि प्रभाव मनि कोठरी की तारी है'।।२६५।।

७०) (श्री भक्तमाल बसत चित्तौर माँझ रानी एक झाली नाम, नाम बिन कान खाली आनि शिष्य भई है। संगहु तैं विप्र सुनि छिप्र तन आँच लागी, भागी मति नृप आगे भीर सब गई है।। वैसेहिं सिंहासन पै आयकै विराजे प्रभु, पढ़े वेद वानी पै न आये यह नई है। पतितपावन नाम कीजिये प्रगट आजु, गायो पद गोद आय बैठे भक्ति लई है।। २६६।। गई घर झाली पुनि बोलिकै पठाये 'अहो! जैसे प्रतिपाली अब तैसें प्रतिपारिये'। आपुहू पधारे उन बहु धन पट वारे विप्र सुनि पाँव धारे सीधौ दै निवारिये।। करिकै रसोई द्विज भोजन करन बैठे द्वै-द्वै मधि एक यों रैदास कौं निहारिये। देखि भई आँखै दीन भाषैं शिष्य भये लाखैं स्वर्ण को जनेऊ काढ़्यो त्वचा कीनी न्यारिये।।२६७।। श्रीकबीरजी कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम करि गायो। जोग जग्य व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखायो।। हिन्दू तुरक प्रमान रमैनी शबदी साखी। पक्षपात नहिं वचन सबही के हित की भाखी।। आरूढ़ दसा ह्वै जगत् पर मुखदेखी नाहिन भनी। कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। ६०।। अति ही गम्भीर मति सरस कबीर हियो, लियो भक्तिभाव जाति-पाँति सब टारियै। भई नभ वानी देह तिलक रमानी करौ, करौ गुरु रामानन्द गरैं माल धारियै।। देखें नहिं मुख मेरो मानिकैं मलेछ मोकौं जात न्हान गंगा कही मग तन डारियै। रजनी के शेष में आवेस सौं चलत आप परै पग राम कहै मन्त्र सो विचारिये।। २६८।। कीनी वही बात माला-तिलक बनाय गात मानि उतपात मात शोर कियो भारियै। पहुँची पुकार रामानन्द जू कैं पास आनि कही कोऊ पूछे तुम नाम लै उचारिये। ल्यावौ जू पकरि वाको कब हम शिष्य कियो? ल्याये करि परदा में पूछी कहि डारिये। राम-नाम मन्त्र यही लिख्यो सब तन्त्रनि में खोलि पट मिले साँचौ मत उर धारियै।। २६६।। बुनैनं तानों-बानों हिये राम मँडरानौं कहि कैसे कै बखानौं वह रीति कछु न्यारिये। उतरनोई करैं जामें तन निरवाह होय भोय गई औरै बात भक्ति लागी प्यारियै।।

३. कृष्ण-भक्त एवं अष्टछाप संत (सूरदास, मीराबाई, रसखान, हित हरिवंश)

श्रीकबीरजी) (७१ ठाढ़े मण्डी माँझ पट बेचन लै जन कोऊ, आयो मोकों देहु देह मेरी है उघारियै। लग्यौ देन आधौ फारि आधे सौं न काम होत, दियो सब लियौ जोपै यहै उर धारियै॥२७०॥ तिया सुत मात मग देखें भूखे आवैं कब? दबि रहे हाटनि में ल्यावैं कहा धाम कौं। साँचो भक्तिभाव जानि निपट सुजान वे तौ, कृपा के निधान गृह सोच पर्यो श्याम कौं॥ बालद लै धाये दिन तीनि यों बिताये जब, आये घर डारि दई, दई हौ आराम कौं। माता करै शोर कोऊ हाकिम मरोरि बाँधै, डारौ बिन जानें सुत लेत नहीं दाम कौं॥२७१॥ गये जन दोय चार ढूँढ़िकै लिवाय ल्याये, आये घर सुनी बात जानी प्रभु पीर कौं। रहे सुख पाय कृपा करी रघुराय दई, छिन में लुटाय सब बोलि भक्त भीर कौं॥ दियौ छोड़ि तानौं-बानौ सुख सरसानौं हिये, किये रोष धाये सुनि विप्र तजि धीर कौं। क्यों रे तूं जुलाहे ! धन पाये न बुलाये हमें? शूद्रनि कौं दियो जावौ कहैं यों कबीर कौं॥२७२॥ क्यों जू उठि जाऊँ? कछु चोरी धन ल्याऊँ नित, हरिगुन गाऊँ कोऊ राह मैं न मारी है। उनकौं लै मान कियो याही में अमान भयौ, दयो जोपै जाय हमें तौही तो जियारी है॥ ‘घर में तौ नाहीं मण्डी जाहिं तुम रहौ बैठें’, नीठिकै छुटायौ पैडौ छिपे ब्याधि टारी है। आये प्रभु आप द्रव्य ल्याये समाधान कियो, लियो सुख होय भक्त कीरति उजारी है॥२७३॥ ब्राह्मन कौ रूप धरि आये छिपि बैठे जहाँ, ‘काहे कौं मरत भौन जावौ जू कबीर के। कोऊ जाय द्वार ताहि देत है अढ़ाई सेर, बेर जिनि लावो चले जावौ यों बहीर के’॥ आये घर माँझ देखि निपट मगन भये, नये-नये कौतुक ये कैसें रहै धीर के। वारमुखी लई संग मानौ वाही रंग रँगे, जानौ यह बात करी डर अति भीर के॥२७४॥ सन्त देखि डरे सुख भयौई असन्तनि कें, तब तौ विचार मन माँझ और आयो है। बैठी नृप सभा जहाँ गये पै न मान कियौ, कियौ एक चोज उठि जल ढरकायो है॥ राजा जिय सोच पर्यो कर्यो कहा? कह्यो तब, जगन्नाथ पण्डा पाँव जरत बचायो है। सुनि अचरज भरे नृप ने पठाये नर ल्याये सुधि कही ‘अजू साँच ही सुनायो है’॥२७५॥ कही राजा रानी सौं ‘जु बात वह साँची भई, आँच लागी हिये अब कहो कहा कीजियै?’। ‘चले ही बनत चले’ सीस तृण बोझ भारी, गरे सो कुल्हारी बाँधि तिया संग भीजियै॥ निकसे बजार ह्वैकै डारि दई लोकलाज, कियौ मैं अकाज छिन-छिन तन छीजियै। दूर ते कबीर देखि ह्वै गये अधीर महा, आये उठि आगे कह्यौ डारि मति रीझियै॥२७६॥ देखिकै प्रभाव फेरि उपज्यूँ अभाव द्विज, आयौ पादसाह सो सिकन्दर सुनावै है। विमुख समूह संग माता हूँ मिलाय लई, जायकै पुकारे ‘जू दुखायौ सब गाँव है’॥

७२) (श्री भक्तमाल ल्यावौ रे ! पकरि वाको देखौं ये मकर कैसो, अकर मिटाऊँ गाढ़े जकर तनाव है। आनि ठाढ़े किये काजी कहत 'सलाम करौ', जानै न सलाम जानै राम गाढ़े पाँव है।। २७७ ।। बाँधिकै जंजीर गंगा नीर माँझ वोरि दिये, जिये तीर ठाढ़े कहै 'जन्त्र-मन्त्र आवंही'। लकरीन माँझ डारि अगिनि प्रजारि दई, नई मानो भई देह कंचन लजावही।। विफल उपाय भये तऊ नहीं आय नये, तब मतवारो हाथी आनिकै झुकावही। आवत न ढिंग औ चिघारि हारि भाजि जाय, आप आगे सिंह रूप बैठे सो भगावहीँ।। २७८ ।। देख्यो बादसाह भाव कूदि परे गहे पाँव, देखि करामात मात भये सब लोग हैं। 'प्रभु पै बचाय लीजै हमें न गजब कीजै, दीजै जोई चाहो गाँव देश नाना भोग हैं'। 'चाहैं एक राम जाकौं जपैं आठो याम और, दाम सौं न काम जामें भरे कोटि रोग हैं'। आये घर जीति साधु मिले करि प्रीति जिन्हें, हरि की प्रतीति वेई गायवे के जोग है।। २७९ ।। होय के खिसाने द्विज निज चारि विप्रन के, मूँडनि मुड़ायो भेष सुन्दर बनाये है। दूर-दूर गाँवनि में नावनि को पूँछि-पूँछि, नाम लै कबीर जू कौ झूठैं न्योति आये है। आये सब साधु सुनि एतो दुरि गये कहूँ, चहुँ दिसि सन्तनि के फिरैं हरि धाये हैं। उनहीं को रूप धरि न्यारी-न्यारी ठौर बैठे, एकु मिलि गये नीके पोषिकै रिझाये हैं।। २८० ।। आई अपछरा छारिवे के लिये भेष किये, हिये देखि गाढ़ो फिरि गई नहीं लागी है। चतुर्भुजरूप प्रभु आनिकैं प्रगट कियो, लियो फल नैननि कौ बड़ौ बड़भागी है।। सीस धरै हाथ तन साथ मेरे धाम आवौ, गावौ गुन रहौ जौलौं तेरी मति पागी हैं। मगह में जाय भक्तिभाव को दिखाय बहु, फूलनि मँगाय पौढ़ि मिल्यौ हरि रागी है।। २८१।। मास परायण बाहरवाँ विश्राम श्रीपीपाजी की कथा पीपा प्रताप जग वासना, नाहर कौं उपदेश दियौ ।। प्रथम भवानी भक्त, मुक्ति माँगन कौं धायौ। सत्य कह्यो तिहिं शक्ति, सुदृढ़ हरिशरण बतायौ ।। श्रीरामानन्द पद पाइ, भयौ अति भक्ति की सीवाँ । गुण असंख्य निर्मोल, सन्त धरि राखत ग्रीवाँ ।। परसि प्रणाली सरस भई, सकल विश्व मंगल कियौ । पीपा प्रताप जग वासना नाहर कौं उपदेश दियौ ।। ६१ ।।

गागरौनगढ़ बढ़ पीपा नाम राजा भयो, लयो पन देवी सेवा रंग चढ़्यो भारियै। आये पुर साधु सीधौ दियौ जोई सोई लियो, कियो मन माँझ प्रभु ! बुद्धि फेरि डारियै ।। सोयो निसि रोयो देखि सपनो बेहाल अति, प्रेत विकराल देह धरिकै पछारियै। अब न सुहाय कछू वहू पाँय परि गई, नई रीति भई वाहि भक्ति लागी प्यारियै ।। २८२ ।। पूछ्यो हरि पाइवे कौ मग जब देवी कही, 'सही रामानन्द गुरु करि प्रभु पाइयै'। लोग जानै बौरौ भयौ गयौ यह काशीपुरी, फुरी मति अति आये जहाँ हरि गाइयै ।। द्वार में न जान देत आज्ञा ईश लेत कही, राजा सौं न हेत सुनि सबही लुटाइयै। कह्यो 'कुँवा गिरौ' चले गिरन प्रसन्न हिये, जिये सुख पायौ ल्याये दरस दिखाइयै ।। २८३ ।। किये शिष्य कृपा करी धरी हरिभक्ति हृदै, कही 'अब जावौ गृह सेवा साधु कीजियै। बितये बरष जब सरस टहल जानि, सन्त सुख मानि आवैं घर मधि लीजियै' ।। आये आज्ञा पाय धाम कीन्हीं अभिराम रीति, प्रीति कौ न पारावार चीठी लिखि दीजियै। 'हूजिये कृपाल वही बात प्रतिपाल करौं', चले जुग बीस जन संग मति रीझियै ।। २८४ ।। कबीर रैदास आदि दास सब संग लिये आये पुर पास पीपा पालकी लै आयो है। करी साष्टांग न्यारी-न्यारी बिनै साधुन को, धन को लुटाय सो समाज पधरायौ है ।। जैसी कीन्हीं सेवा बहु मेवा नाना राग भोग, वानी के न जोग भाग कापै जात गायौ है। जानी भक्ति रीति 'घर रहौ कै अतीत होहु', करिकै प्रतीति गुरु पग लगि धायौ है ।। २८५ ।। लागी संग रानी दस दोय कही मानी नहीं, कष्ट को बतावैं डरपावैं मन लावहीं। कामरीन फारि मधि मेखला पहिरि लेवो, देवो डारि आभरन जोपै नहीं भावहीं ।। काहू पै न होय दियो रोय भोय भक्ति आई छोटी नाम सीता गरैं डारी न लजावहीं। 'यहू दूर डारौ करौ तन को उघारौ' कियो, द्रव्यौ रामानन्द हियौ पीपा न सुहावहीं ।। २८६ ।। जोपै यापै कृपा करी दीजै काहू संग करि, मेरे नहीं रंग यामें कही बार-बार है। सौंह को दिवाय दई लई तब कर धरि, चले ढरि विप्र एक छोड़ै न विचार है ।। खायौ विष ज्यायौ पुनि फेरिकैं पठायौ सब, आयौ यों समाज द्वारावती सुखसार है। रहे कोऊ दिन आज्ञा माँगी इन रहिवे की, कूदे सिन्धु माँझ चाह उपजी अपार है ।। २८७ ।। आये आगे लैन आप दिये हैं पठाय जन, देखि द्वारावती कृष्ण मिले बहु भायकै। महल-महल माँझ चहल-पहल लखी, रहे दिन सात सुख सकै कौन गायकै ।। आज्ञा दई जाइवे की जाइवौ न चाहें हिये, पिये वह रूप 'देखौ मोहीं कौं जु जायकै'। भक्त बूड़ि गयो यह बड़ोई कलंक भयौ, मेटौ तम अंक शंक गही अकुलायकै ।। २८८ ।।

७४) (श्री भक्तमाल चले पहुँचायवे को प्रीति के अधीन आप, बिन जल मीन जैसे ऐसे फिरि आये है। देखि नई बात गात सूखे पट भीजे हिये, लिये पहिचानि आनि पग लपटाये है।। दई लैके छाप पाप जगत् के दूरि करौ, 'ढरौ कहूँ और' कहि सीता समझाये हैं। छूटेई मिलान वन में पठान भेंट भई, लई छिनि तिया कियौ चैन प्रभु धाये हैं।। २८६।। अभूँ लगि जाओ घर कैसे-कैसे आवै डर, बोली 'हरि ! जानियै न भाव पै न आयो है'। लेत हौं परीक्ष्छा मैं तो जानौं तेरी सिच्छा ऐपै, सुनि दृढ़ बात कान अति सुख पायो है।। चले मग दूसरे सु तामें एक सिंह रहै, आयौ बास लेत शिष्य कियो समझायो है। आये और गाँव शेषसाई प्रभु नांव रहै, करे बाँस हरे ढरे चीधर सुहायो है।। २९०।। दोऊ तिया पति देखें आये भागवत ऐपै, घर की कुगति रति साँची लै दिखाई है। लहँगा उतारि बेचि दियौ ताकौ सीधौ लियौ, 'करौ अजू! पाक' बधू कोठी में दुराई है।। करी लै रसोई सोई भोग लगि बैठे कह्यौ आवौ मिलि दोई कही पाछे सीथ भाई है। वाहू कौ बुलावौ ल्यावौ आनिकै जिमावौ, तब सीता गई ठौर जाइ नगन लखाई है।। २६१।। पूछैं 'कहो बात ये उघारे क्यों है गात', कही 'ऐसे ही बिहात साधुसेवा मन भाई है'। 'आवैं जब सन्त सुख होत है अनन्त तन, ढक्यौं कै उघारौ ? कहा चरचा चलाई है'। जानि गई रीति प्रीति देखी एक इनहीं में 'हमहूँ कहावैं ऐपै छटाहूँ न पाई है'। दियौ पट आधौ फारि गहि कै निकारि लई, भई सुख सैल पाछैं पीपा सौं सुनाई है।। २६२।। 'करैं वेश्याकर्म अब धर्म है हमारौ यही', कही जाय बैठी जहाँ नाजनि की ढेरी है। घिरि आये लोग जिन्हें नैननि कौ रोग, लखि दूर भयो शोक नेकु नीके हूँ न हेरी है।। कहैं तुम कौन ? 'बारमुखी नहीं भौना संग भरुवा सु गहैं मौन सुनि परी बेरी है। करी अन्नरासि आगे मुहर रुपैया पागे, पठै दई चीधर के तबही निबेरी है।। २६३।। आज्ञा माँँगि तोड़े आये कभूूँ भूखे कभूूँ घाये, औचक ही दाम पाये गयो हो स्नान को। मुहरनि भाँड़ो भूमि गाड़ो देखि छाँडि आयौं, कही निसि तिया बोली 'जावौ सर आन को'।। चोर चाहैं चोरी करैं ढरे सुनि वाही ओर, देखें जो उघारि साँप डारैं हतै प्रान को। ऐसे आय परीं गनी सात सत बीस भईं, तौ लै पाँच बाँट करै एक के प्रमान को।। २६४।। जोई आवै द्वार ताहि देत हैं अहार और, बोलिकै अनन्त सन्त भोजन करायो है। बीत दिन तीन धन खवाय प्याय छीन कियौ, लियो सुनि नाम नृप देखिवे को आयो है।। देखिकै प्रसन्न भयौ नयौ 'देवौ दीच्छा मोहि', दीच्छा है अतीत करैं आप सो सुहायो है। 'चाहो सोई करौं ह्वै कृपाल मोकौं ढरौ', 'अजू! आनि सम्पति औ रानी जाइ ल्यायो है'।।२६५।।

करिकै परीच्छा दई दीच्छा संग रानी दई, भई हमारी करौ परदा न सन्त सौं। दीयौ धन घोरा कछू राख्यो दै निहोरा भूप, मान तन छोरा बड़ौ मान्यौ जीव जन्त सौं।। सुनि जरि बरि गये भाई सेनसूरज के, ऊरज प्रताप कहा कहैं सीताकन्त सौं। आयौ बनिजारौ मोल लियौ चाहैं खेलनि कौं, दियौ बहकाय कहौ पीपा जू अनन्त सौं।।२६६।। बोल्यौ बनिजारौ 'दाम खोलि खैला दीजिये जू!' 'लीजिये जू!' आय गाँव चरन पठाये हैं। गये उठि पाछे बोलि सन्तनि महोच्छौ कियौ, आयौ वाही समैं कही लेहु मन भाये है।। दरसन करि हिये भक्तिभाव भर्यौ आनि, आनिकै वसन सब साधु पहिराये हैं। और दिन न्हान गये घोड़ा चढ़ि छोड़ि दियौ, लियौ बाँध्यौ दुष्टन ने आयौ मानौ ल्याये है।।२६७।। गये हे बुलाये आप पाछे घर सन्त आये, अन्न कछू नाहिं कहूँ जाय करि ल्याइयै। विषई बनिक एक देखिकै बुलाइ लई, दई सब सौज कही 'सही निसि आइयै'। भोजन करत माँझ पीपा जू पधारे, पूछी वारे तन प्रान जब कहिकै सुनाइयै। करिकै सिंगार सीता चली झुकि मेह आयौ, काँधे पै चढ़ायौ वपु बनिया रिझाइयै।।२६८।। हाट पै उतार दई द्वार आप बैठे रहे, चहे सूके पग माता! कैसे करि आई हौ?। स्वामी जू लिवाय ल्याये कहाँ हैं? निहारौ जाय, आय पाँय पर्यो डर्यो राखौ सुखदाई हौ।। मानौ जिन शंक काज कीजियै निशंक धन, दियौ बिन अंक जौपै लरैं मरैं भाई हौ। मर्यो लाज भार चाहै धसौं भूमि फार दृग, बहै नीर धार देखि दई दीच्छा पाई हौ।।२६९।। चलत-चलत बात नृपति श्रवन परी, भरी सभा विप्र कहैं बड़ी विपरीत है। भूप मन आई यह निपट घटाई होत, भक्ति सरसाई नहीं जानै घटी प्रीति है।। चले पीपा बोध दैन द्वार ही तैं सुधि दई, लई सुनि कही आवौं करौं सेवा रीति है। 'बड़ौ मूढ़ राजा मोजा गाँठै बैठ्यौ मोची घर', सुनि दौरि आयो रहे ठाढ़े कौन नीति है।।३००।। हुती घर माँझ बाँझ रानी एक रूपवती, माँगी 'वही ल्यावौ वेगि' चल्यौ सोच भारी है। डगमग पाँव धरै पीपा सिंह रूप करै, ठाढ़ौ देखि डरै इत आवै आप ख्वारी है।। जाय तौ विलाय गयौ तिया ढिंग सुत नयौ, नयो भूमि पर 'कला जानी न तिहारी है'। प्रगट्यौ सरूप निज खीजिकै प्रसंग कह्यौ, 'कहाँ वह रंग?' शिष्य भयो लाज टारी है।।३०१।। कियौ उपदेस नृप हृदै में प्रवेस कियौ, लियौ वही पन आप आये निज धाम है। बोल्यौ एक नाम साधु 'एक निसि देहु तिया', 'लेहु' कही भागौ संग भागी सीता बाम है।। प्रात भये चलैं नाहिं 'रैन ही की आज्ञा प्रभु', चल्यौ हारि आगे घर-घर देखो ग्राम है। आयौ वाही ठौर 'चलो माता! पहुँचाय आवौं', आय गहे पाँव भाव भयौ गयौ काम है।।३०२।।

७६) (श्री भक्तमाल विषई कुटिल चारि साधुभेष लियौ धारि, कीनी मनोहारि कही 'तिया निज दीजिये'। करिकै सिंगार सीता कोठे माँझ बैठीं जाय, चाहें मग आतुर ह्वै अजू! जाहु लीजिये॥ गये जब द्वार उठी नाहरी सुपारिवे कौं, फारैं नहीं वानौ जानि आय अति खीजियै। अपनौ विचारो हियो कियो भोग भावना कौ, मानि साँच भये शिष्य प्रभु मति धीजिये॥३०३॥ (१) गूजरी कौं धन दियौ (२) पियौ दही सन्तनि नैं, (३) ब्राह्मन को भक्त कियौ (४) देवी दी निकारिकै। (५) तेली कौं जिवायौ (६) भैंसि चोरनि पै फेरि ल्यायौ (७) गाड़ी भरि गेहूँ (८) तन पाँच ठौर जारिकै।। (६) कागद लै कोरो कर्यौ (१०) बनियाँ को शोक हर्यौ, (११) भर्यो घर त्यागि (१२) डारी हत्या हूँ उतारिकै। (१३) राजा कौं औसेर भई (१४) सन्त कौं जु विभौ दई, (१५) लई चीठी मानि गये श्रीरंग उदारिकै॥३०४॥ सप्ताह परायण तीसरा विश्राम (१) श्रीरंग के चेत धर्यौ (२) तिया हिय भाव भर्यौ, (३) ब्राह्मन को शोक हर्यो राजा पै पुजायकै। (४) चँदवा बुझाय लियौ (५) तेली को लै बैल दियौ, (६) दियौ पुनि घर माँझ भयौ सुख आयकै।। (७) बड़ोई अकाल पर्यौ जीव दुख दूर कर्यौ, पर्यौ भूमि गर्भ धन पायौ दै लुटायकै। (८) अति विस्तार लियौ कियौ है विचार, (६) यह सुनै एक बार फेरि भूलै नहीं गायकै॥३०४॥ मास परायण तेहरंवा विश्राम श्रीधनाजी धन्य धना के भजन को, बिनहीं बीज अंकुर भयौ॥ घर आये हरिदास, तिनहिं गोधूम खवाये। तात मात डर खेत, थोथ लांगूल चलाये॥ आस-पास कृषिकार, खेत की करत बड़ाई। भक्त भजे की रीति, प्रगट परतीति जु पाई॥ अचरज मानत जगत में, कहुँ निपुज्यौ कहुँवौ बयौ। धन्य धना के भजन को, बिनहिं बीज अंकुर भयौ॥ ६२॥ खेत की तौ बात कही प्रगट कवित्त माँझ, और एक सुनौ भई प्रथम जु रीति है। आयौ साधु विप्र धाम सेवा अभिराम करै, ठर्यौ ढिंग आय कही 'मोहूँ दीजैं प्रीति है'॥ पाथर लै दियौ अति सावधान कियौ छाती, माँझ लाय जियौ सेवै जैसी नेह नीति है। रोटी धरि आगे आँखि मूँदि लियौ परदा कै, छियौ नहीं टूक देखि भई बड़ी भीति है॥३०६॥

श्रीसेनजी) (७७ बार-बार पाँव परै अरै भूख-प्यास तजी, धरै हिये साँचौ भाव पाई प्रभु प्यारियै। छाक नित आवै नीके भोग कौ लगावै जोई, छोड़ैं सोई पावैं प्रीति रीति कछु न्यारियै।। जाकौ कोऊ खाय ताकी टहल बनाय, करै ल्यावत चराय गाय हरि उर धारियै। आयौ फिरि विप्र नेह खोजहूँ न पायौ कहूँ, सरसायौ बातै लै दिखायौ श्याम ज्यारियै।।३०७।। द्विज लखि गायनि में चायनि समाज नाहिं, भायनि की चोट दृग लागी नीर झरी है। जायकै भवन सीतारवन प्रसन्न करैं, बड़े भाग मानि प्रीति देखी जैसी करी है।। धना को दयाल ह्वै कै आज्ञा प्रभु दई ठरौ, करौ गुरु रामानन्द भक्ति मति हरी है। भये शिष्य जाय आप छाती सौं लगाय लिये, किये गृह काम सबै सुनी जैसी धरी है।।३०८।। श्रीसेनजी विदित बात जग जानियै हरि भये सहायक सेन के।। प्रभू दास के काज रूप नापित कौ कीनौ। छिप्र छुड़हरी गही, पानि दर्पन तँह लीनौ।। तादृश ह्वै तिहिं काल, भूप के तेल लगायौ। उलटि राव भयो शिष्य, प्रगट परचौ जब पायौ।। श्याम रहत सनमुख सदा ज्यौं बच्चा हित धेन के। विदित बात जग जानियै हरि भये सहायक सेन के।।६३।। बाँधौगढ़ वास हरि साधु सेवा आस लगी, पगी मति अति प्रभु परचौ दिखायौ है। करि नित्त नेम चल्यौ भूप कौ लगाऊँ तेल, भयौ मग मेल सन्त फिरि घर आयौ है।। टहल बनाय करी नृप की न शंक धरी, धरि उर श्याम जाय भूपति रिझायौ है। पाछे सेन गयौ पन्थ पूछै हिये रंग छायौ, भयौ अचरज राजा वचन सुनायौ है।।३०६।। फेरि कैसे आये? सुनि अति ही लजाये कही, 'सदन पधारे सन्त भई यों अबार है। आवन न पायौँ वाही सेवा अरुझायौं', राजा दौरि सिर नायौ देखि महिमा अपार है।। भीजि गयौ हियौ दास भाव दृढ़ लियौ पियौ, भक्तिरस शिष्य ह्वै कै जान्यौ सोई सार है। अबलौं हूँ प्रीति सुत नाती वही रीति चलैं, होय जौ प्रतीति प्रभु पावै निरधार है।।३१०।।

७८) (श्री भक्तमाल) श्रीसुखानन्दजी भक्ति दान भय हरन भुज, सुखानन्द पारस परस।। सुखसागर की छाप, राग गौरी रुचि न्यारी। पद रचना गुरु मन्त्र, मनौं आगम अनुहारी।। निसिदिन प्रेम प्रवाह, द्रवत भूधर ज्यौं निर्झर। हरिगुन कथा अगाध, भाल राजत लीला भर।। संत कंज पोषन विमल, अति पीयूष सरसी सरस। भक्ति दान भय हरन भुज, सुखानन्द पारस परस।। ६४ ।। श्रीसुरसुरानन्दजी महिमा महा प्रसाद की, सुरसुरानन्द साँची करी।। एक समै अध्वा चलत, बरा वाक् छल पाये। देखा-देखी शिष्य, तिनहुँ पाछैं ते खाये।। तिन पर स्वामी खिजे, वमन करि बिन विश्वासी। तिन तैसें परतच्छ, भूमि पर कीनी रासी।। सुरसुरी सुवर पुनि उद्गले, पुहुप रेनु तुलसी हरी। महिमा महा प्रसाद की सुरसुरानन्द साँची करी।। ६५।। श्रीसुरसुरीजी महासती सत ऊपमा, त्यौं सत्त सुरसुरी कौ रह्यौ।। अति उदार दम्पति, त्यागि गृह वन को गमने। अचरज भयो तँह एक, सन्त सुनि जिन हो बिमने।। बैठे हुते एकान्त, आय असुरनि दुख दीयौ। सुमिरे सारँगपाणि, रूप नरहरि कौ कीयौ।। सुरसुरानन्द की घरनि कौ सत राख्यो नरसिंह जह्यौ। महासती सत ऊपमा त्यौं सत्त सुरसुरी कौ रह्यौ।। ६६।। नवाह परायण चतुर्थ विश्राम