भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

४८७

बैखानस सोइ सोचै जोगू । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥

वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है ॥ १ ॥

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥

सब प्रकारसे उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीरका पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकारसे सोच करनेयोग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता ॥ २ ॥

सोचनीय नहीं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥

कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है ॥ ३ ॥

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते हैं ॥ ४ ॥

दो०—कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तामु ।

राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥ १७३ ॥

हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं? ॥ १७३ ॥

सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥ यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ॥

राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो ॥ १ ॥

रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥

राजाने राजपद तुमको दिया है। पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दी ॥ २ ॥

४८८

  • रामचरितमानस *

नृपहि बचन प्रिय नहीं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥ करहु सीस धरि भूप रजाई । हड़ तुम्ह कहैं सब भाँति भलाई ॥

राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण (सत्य) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है ॥ ३ ॥

परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब सारखी ॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥

परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं। राजा यथातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ ॥ ४ ॥

दो०—अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।

ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥

जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग)–में निवास करते हैं ॥ १७४ ॥

अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषु । तुम्ह कहूँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषु ॥

राजाका वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लेगेगा ॥ १ ॥

बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥ करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ॥

यह वेदमें प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो ॥ २ ॥

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥ कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥

इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी ॥ ३ ॥

परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥ सौँपेहु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४८१

जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेहसे उनकी सेवा करना ॥ ४ ॥

दो०—कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।

रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥ १७५ ॥

मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं—गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा ॥ १७५ ॥

कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥

कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं—हे पुत्र! गुरुजीकी आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। कालकी गतिको जानकर विषादका त्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥

बन रघुपति सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहैं अवलंबा ॥

श्रीरघुनाथजी वनमें हैं, महाराज स्वर्गका राज्य करने चले गये। और हे तात! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओंके—सबके एक तुम ही सहारे हो ॥ २ ॥

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥

विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर कुटुम्बियोंका दुःख हरो ॥ ३ ॥

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥

भरतजीने गुरुके वचनों और मन्त्रियोंके अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदयके लिये मानो चन्दनके समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलताके रसमें सनी हुई माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी ॥ ४ ॥

छं०—सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु व्याकुल भए । लोचन सरोरुह स्वत सौंचत बिरह उर अंकुर नए ॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की । तुलसी सराहत सकल सादर सीवैं सहज सनेह की ॥

४९०

  • रामचरितमानस *

सरलताके रसमें सनी हुई माताकी वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हृदयके विरहरूपी नवीन अंकुरको सींचने लगे। (नेत्रोंके आँसुओंने उनके वियोग-दुःखको बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीरकी सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—स्वाभाविक प्रेमकी सीमा श्रीभरतजीकी सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।

सो०—भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।

बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥ १७६ ॥

धैर्यकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमलके समान हाथोंको जोड़कर, वचनोंको मानो अमृतमें डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे—॥ १७६ ॥

मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव संमत सबही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥

गुरुजीने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। [फिर] प्रजा, मन्त्री आदि सभीको यही सम्मत है। माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूँ ॥ १ ॥

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किऐँ बिचारु । धरमु जाइ सिर पातक भारु ॥

[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मनसे उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचितका विचार करनेसे धर्म जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है ॥ २ ॥

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई ॥ जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें । तदपि होत परितोषु न जी कें ॥

आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करनेमें मेरा भला हो। यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदयको सन्तोष नहीं होता ॥ ३ ॥

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू । मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ॥

अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुखी मनुष्यके दोष-गुणोंको नहीं गिनते ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४११

दो०—पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।

एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ॥ १७७ ॥

पिताजी स्वर्गमें हैं, श्रीसीतारामजी वनमें हैं और मुझे आप राज्य करनेके लिये कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम [होनेकी आशा रखते हैं] ? ॥ १७७ ॥

हित हमार सियपति सेवकाई । सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं । आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥

मेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजीकी चाकरीमें है, सो उसे माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने अपने मनमें अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपायसे मेरा कल्याण नहीं है ॥ १ ॥

सोक समाजु राजु केहि लेखें । लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मविचारू ॥

यह शोकका समुदाय राज्य लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके चरणोंको देखे बिना किस गिनतीमें है (इसका क्या मूल्य है) ? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ व्यर्थ है। वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है ॥ २ ॥

सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥

रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं। जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है। वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है ॥ ३ ॥

जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आँक मोर हित एहू ॥ मोहि नूप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥

मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजीके पास जाऊँ! एक ही आँक (निश्चयपूर्वक) मेरा हित इसीमें है। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेहकी जड़ता (मोह) के वश होकर ही कह रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।

तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥ १७८ ॥

कैकेयीके पुत्र, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-से अधमके राज्यसे आप मोहके वश होकर ही सुख चाहते हैं ॥ १७८ ॥

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू । चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥ मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥

४९२

  • रामचरितमानस *

मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशीलको ही राजा होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे त्यों ही पृथ्वी पातालमें धँस जायगी॥ १ ॥

मोहि समान को पापनिवासू । जेहि लगि सीय राम बनबासू॥ रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा । बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥

मेरे समान पापोंका घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजीका वनवास हुआ? राजाने श्रीरामजीको वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्गको गमन किया॥ २ ॥

मैं सटु सब अनर्थ कर हेतू । बैठ बात सब सुनऊँ सचेतू॥ बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू । रहे प्रान सहि जग उपहासू॥

और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थोंका कारण हूँ, होश-हवासमें बैठा सब बातें सुन रहा हूँ! श्रीरघुनाथजीसे रहित घरको देखकर और जगत्का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥ ३ ॥

राम पुनीत विषय रस स्खे । लोलुप भूमि भोग के भूखे॥ कहँ लगि कहौँ हृदय कठिनाई । निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥

[इसका यही कारण है कि ये प्राण] श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं। ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ? जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है॥ ४ ॥

दो०— कारण तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।

कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥ १७९ ॥

कारणसे कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा भयानक और कठोर होता है॥ १७९ ॥

कैकेई भव तनु अनुरागे । पावँर प्रान अघाइ अभागे॥ जौँ प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे । देखब सुनब बहुत अब आगे॥

कैकेयीसे उत्पन्न देहमें प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरहसे) अभागे हैं। जब प्रियके वियोगमें भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा॥ १ ॥

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा । पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥ लीन्ह विधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥

लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजीको तो वन दिया; स्वर्ग भेजकर पतिका कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजाको शोक और सन्ताप दिया;॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९३

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकई सब कर काजू॥ एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥

और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया! कैकेयीने सभीका काम बना दिया! इससे अच्छा अब मेरे लिये और क्या होगा? उसपर भी आप लोग मुझे राजतिलक देनेको कहते हैं॥३॥

कैकड़ जठर जनमि जग माहीं । यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥

कैकेयीके पेटसे जगत्में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाताने ही बना दी है। [फिर] उसमें प्रजा और पंच (आप लोग) क्यों सहायता कर रहे हैं?॥४॥

दो०—ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥१८०॥

जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हों], फिर जो वायुयोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है!॥१८०॥

कैकड़ सुअन जोगु जग जोई । चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥ दसरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥

कैकेयीके लड़केके लिये संसारमें जो कुछ योग्य था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया। पर 'दशरथजीका पुत्र' और 'रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे विधाताने व्यर्थ ही दी॥१॥

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका । राय रजायसु सब कहँ नीका॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही । कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥

आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ानेके लिये कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सभीके लिये अच्छी है। मैं किस-किसको किस-किस प्रकारसे उत्तर दूँ? जिसकी जैसी रुचि हो, आपलोग सुखपूर्वक वही कहें॥२॥

मोहि कुमातु समेत बिहाई । कहहु कहहि के कीन्ह भलाई॥ मो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥

मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया? जड़-चेतन जगत्में मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणोंके समान प्यारे न हों॥३॥

४९४

  • रामचरितमानस *

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू । अदिनु मोर नहिं दूषन काहू ॥ संसय सील प्रेम बस अहहू । सबुड़ उचित सब जो कछु कहहू ॥

जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसीका दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आप लोग संशय, शील और प्रेमके वश हैं ॥ ४ ॥

दो०—राम मातु सुठि सरलचित्त मो पर प्रेमु बिसेषि।

कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥ १८१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी माता बहुत ही सरलहृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं ॥ १८१ ॥

गुर बिबेक सागर जगु जाना । जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ । भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥

गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं ॥ १ ॥

परिहरि रामु सीय जग माहीं । कोउ न कहहि मोर मत नाहीं ॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी । अंतहूँ कीच तहाँ जहाँ पानी ॥

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है ॥ २ ॥

डरु न मोहि जग कहहि कि पोचू । परलोकहु कर नाहिन सोचू ॥ एकड़ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥

मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोकका ही सोच है। मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए ॥ ३ ॥

जीवन लाहु लखन भल पावा । सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥ मोर जनम रघुबर बन लागी । झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥

जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताता हूँ? ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९५

दो०—आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।

देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥ १८२॥

सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ। श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शन किये बिना मेरे जीकी जलन न जायगी॥ १८२॥

आन उपाउ मोहि नहीं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥

एकहिँ आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥

मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजीके बिना मेरे हृदयकी बात कौन जान सकता है? मनमें एक ही आँक (निश्चयपूर्वक) यही है कि प्रातःकाल प्रभु श्रीरामजीके पास चल दूँगा॥ १॥

जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥

तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिँ कृपा बिसेषी॥

यद्यपि मैं बुरा हूँ और अपराधी हूँ, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरणमें सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे॥ २॥

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥

अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥

श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेहके घर हैं। श्रीरामजीने कभी शत्रुका भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ पर हूँ तो उनका बच्चा और गुलाम ही॥ ३॥

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥

जेहिँ सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिँ बहुरि रामु रजधानी॥

आप पंच (सब) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें॥ ४॥

दो०—जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।

आपन जानि न त्यागिहहिँ मोहि रघुबीर भरोस॥ १८३॥

यद्यपि मेरा जन्म कुमातासे हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजीका भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं॥ १८३॥

भरत बचन सब कहैं प्रिय लागे। राम सनेह सुधौँ जनु पागे॥

लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥

४१६

  • रामचरितमानस *

भरतजीके वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजीके प्रेमरूपी अमृतमें पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे ॥ १ ॥

मातु सचिव गुर पुर नर नारी । सकल सनेहैं बिकल भए भारी ॥ भरतहि कहहिं सराहि सराही । राम प्रेम मूरति तनु आही ॥

माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमकी साक्षात् मूर्ति ही है ॥ २ ॥

तात भरत अस काहे न कहहू । प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥ जो पावँरु अपनी जड़ताई । तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥

हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खतासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा, ॥ ३ ॥

सो सठु कोटिक पुरुष समेता । बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥ अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई । हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥

वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है ॥ ४ ॥

दो०— अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह । सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥ १८४ ॥

हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [बड़ा] सहारा दे दिया ॥ १८४ ॥

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥ चलत प्रात लिखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥

सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रातःकाल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये ॥ १ ॥

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई । चले सकल घर बिदा कराई ॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं । सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९७

मुनि वसिष्ठजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घरको चले। जगत्में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेहकी सराहना करते जाते हैं ॥ २ ॥

कहहिं परसपर भा बड़ काजू । सकल चलै कर साजहिं साजू ॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥

आपसमें कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी ॥ ३ ॥

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू । को न चहइ जग जीवन लाहू ॥

कोई-कोई कहते हैं—रहनेके लिये किसीको भी मत कहो, जगत्में जीवनका लाभ कौन नहीं चाहता ? ॥ ४ ॥

दो०— जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ ।

सनमुखु होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ॥ १८५ ॥

वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता न करे ॥ १८५ ॥

घर घर साजहिं बाहन नाना । हरषु हृदयँ परभात पयाना ॥ भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू । नगरु बाजि गज भवन भँडारू ॥

घर-घर लोग अनेकों प्रकारकी सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदयमें [बड़ा] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजीने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि— ॥ १ ॥

संपति सब रघुपति कै आही । जौँ बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥ तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साई दोहाई ॥

सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है। यदि उसकी [रक्षाकी] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि (श्रेष्ठ) है ॥ २ ॥

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ॥ अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहूँ निज धरम न डोले ॥

सेवक वही है जो स्वामीका हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजीने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकोंको बुलाया जो कभी स्वप्नमें भी अपने धर्मसे नहीं डिगे थे ॥ ३ ॥

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा । जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ॥ करि सबु जतनु राखि रखवारे । राम मातु पहिं भरतु सिधारे ॥

४१८

  • रामचरितमानस *

भरतजीने उनको सब भेद समझाकर फिर उत्तम धर्म बतलाया; और जो जिस योग्य था, उसे उसी कामपर नियुक्त कर दिया। सब व्यवस्था करके, रक्षकोंको रखकर भरतजी राममाता कौसल्याजीके पास गये ॥ ४ ॥

दो०—आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।

कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ॥ १८६ ॥

स्नेहके सुजान (प्रेमके तत्त्वको जाननेवाले) भरतजीने सब माताओंको आर्त (दुखी) जानकर उनके लिये पालकियाँ तैयार करने तथा सुखासन यान (सुखपाल) सजानेके लिये कहा ॥ १८६ ॥

चक्क चक्क जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी ॥ जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना ॥

नगरके नर-नारी चक्के-चक्कीकी भाँति हृदयमें अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकालका होना चाहते हैं। सारी रात जागते-जागते सबेरा हो गया। तब भरतजीने चतुर मन्त्रियोंको बुलवाया— ॥ १ ॥

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनिहिं देब मुनि रामहि राजू ॥ बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे ॥

और कहा—तिलकका सब सामान ले चलो। वनमें ही मुनि वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीको राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मन्त्रियोंने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये ॥ २ ॥

अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ ॥ बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना ॥

सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठजी अरुन्धती और अगिनिहोत्रकी सब सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणोंके समूह, जो सब-के-सब तपस्या और तेजके भण्डार थे, अनेकों सवारियोंपर चढ़कर चले ॥ ३ ॥

नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहैं कीन्ह पयाना ॥ सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी ॥

नगरके सब लोग रथोंको सजा-सजाकर चित्रकूटको चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियोंपर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं ॥ ४ ॥

दो०—सौँपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।

सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दौड भाइ ॥ १८७ ॥

विश्वासपात्र सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजीके चरणोंको स्मरण करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले ॥ १८७ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९९

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं । सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ॥

श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके वशमें हुए (दर्शनकी अनन्य लालसासे) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जलको तककर [बड़ी तेजीसे बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखोंको छोड़कर] वनमें हैं, मनमें ऐसा विचार करके छोटे भाई शत्रुघ्नीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं ॥ १ ॥

देखि सनेहु लोग अनुरागे । उतरि चले हय गय रथ त्यागे ॥ जाइ समीप राखि निज डोली । राम मातु मृदु बानी बोली ॥

उनका स्नेह देखकर लोग प्रेममें मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथोंको छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजी भरतजीके पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणीसे बोलीं— ॥ २ ॥

तात चढ़हु रथ बलि महतारी । होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ॥ तुम्हरे चलत चलिहि सबु लोगू । सकल सोक कूस नहिं मग जोगू ॥

हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथपर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलनेसे सभी लोग पैदल चलेंगे। शोकके मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल रास्तेके (पैदल चलनेके) योग्य नहीं हैं ॥ ३ ॥

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई । रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ॥ तमसा प्रथम दिवस करि बासू । दूसर गोमति तीर निवासू ॥

माताकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसापर वास (मुकाम) करके दूसरा मुकाम गोमतीके तीरपर किया ॥ ४ ॥

दो०—पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग ।

करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥ १८८ ॥

कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रातको एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग-विलासको छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके लिये नियम और व्रत करते हैं ॥ १८८ ॥

सई तीर बसि चले बिहाने । सुंगबेरपुर सब निअराने ॥ समाचार सब सुने निषादा । हृदयँ विचार करइ सबिषादा ॥

रातभर सई नदीके तीरपर निवास करके सबेरे वहाँसे चल दिये और सब शृङ्गवेरपुरके समीप जा पहुँचे। निषादराजने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदयमें विचार करने लगा— ॥ १ ॥

५००

  • रामचरितमानस *

कारन कवन भरतु बन जाहीं । है कछु कपट भाउ मन माहीं ॥ जों पै जियँ न होती कुटिलाई । तौ कत लीन्ह संग कटकाई ॥

क्या कारण है जो भरत बनको जा रहे हैं, मनमें कुछ कपट-भाव अवश्य है। यदि मनमें कुटिलता न होती, तो साथमें सेना क्यों ले चले हैं ॥ २ ॥

जानहिं सानुज रामहि मारी । करउँ अकंटक राजु सुखारी ॥ भरत न राजनीति उर आनी । तब कलंकु अब जीवन हानी ॥

समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामको मारकर सुखसे निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरतने हृदयमें राजनीतिको स्थान नहीं दिया (राजनीतिका विचार नहीं किया)। तब (पहले) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवनसे ही हाथ धोना पड़ेगा ॥ ३ ॥

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा । रामहि समर न जीतनिहारा ॥ का आचरजु भरतु अस करहीं । नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ॥

सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायँ, तो भी श्रीरामजीको रणमें जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विषकी बेलें अमृतफल कभी नहीं फलतीं! ॥ ४ ॥

दो०—अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।

हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ॥ १८९ ॥

ऐसा विचारकर गुह (निष्ठादराज) ने अपनी जातिवालोंसे कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। नावोंको हाथमें (कब्जेमें) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटोंको रोक दो ॥ १८९ ॥

होहु संजोइल रोकहु घाटा । ठाटहु सकल मरै के ठाटा ॥ सनमुख लोह भरत सन लेऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ॥

सुसज्जित होकर घाटोंको रोक लो और सब लोग मरनेके साज सजा लो (अर्थात् भरतसे युद्धमें लड़कर मरनेके लिये तैयार हो जाओ)। मैं भरतसे सामने (मैदानमें) लोहा लूँगा (मुटभेड़ करूँगा) और जीते-जी उन्हें गङ्गापार न उतरने दूँगा ॥ १ ॥

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा । राम काजु छनभंगु सरीरा ॥ भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू । बड़ें भाग असि पाइअ मीचू ॥

युद्धमें मरण, फिर गङ्गाजीका तट, श्रीरामजीका काम और क्षणभङ्गुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाय); भरत श्रीरामजीके भाई और राजा (उनके हाथसे मरना) और मैं नीच सेवक—बड़े भाग्यसे ऐसी मृत्यु मिलती है ॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५०१

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥ तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहुँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥

मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड़दू हैं (अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा) ॥ ३ ॥

साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥ जायँ जितत जग सो महिभारु । जननी जौबन बिटप कुठारु ॥

साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्में पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है ॥ ४ ॥

दो०—बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढाइ उछाहु।

सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ॥ १९० ॥

[इस प्रकार श्रीरामजीके लिये प्राणसमर्पणका निश्चय करके] निषादराज विषादसे रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा ॥ १९० ॥

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ । सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ॥ भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढावइ करषा ॥

[उसने कहा—] हे भाइयो! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मनमें कायरता न लावे। सब हर्षके साथ बोल उठे—हे नाथ! बहुत अच्छा; और आपसमें एक-दूसरेका जोश बढ़ाने लगे ॥ १ ॥

चले निषाद जोहारि जोहारी । सूर सकल रन रूचइ रारी ॥ सुमिरि राम पद पंकज पनहीं । भार्थी बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ॥

निषादराजको जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राममें लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी जूतियोंका स्मरण करके उन्होंने भार्थीयों (छोटे-छोटे तरकस) बाँधकर धनुहियों (छोटे-छोटे धनुषों)-पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं ॥ २ ॥

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं ॥ एक कुसल अति ओड़न खाँड़े । कूदहिं गगन मनहुँ छिति छोँड़े ॥

५०२

  • रामचरितमानस *

कवच पहनकर सिरपर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछोंको सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवारके बार रोकनेमें अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंगमें भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद (उछल) रहे हों॥३॥

निज निज साजु समाजु बनाई । गुह राउतहि जोहारे जाई॥ देखि सुभट सब लायक जाने । लै लै नाम सकल सनमाने॥

अपना-अपना साज-समाज (लड़ाईका सामान और दल) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुहको जोहार की। निषादराजने सुन्दर योद्धाओंको देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया॥४॥

दो०—भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि॥ १९१॥

[उसने कहा—] हे भाइयो! धोखा न लाना (अर्थात् मरनेसे न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोशके साथ बोल उठे—हे बीर! अधीर मत हो॥१९१॥

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥ जीवत पाउ न पाछें धरहीं । रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥

हे नाथ! श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे और आपके बलसे हमलोग भरतकी सेनाको बिना वीर और बिना घोड़ेकी कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़ेको मार डालेंगे)। जीते-जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वीको रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ोंसे छा देंगे)॥१॥

दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥ एतना कहत छींक भड़ बाँए । कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए॥

निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर कहा—जुझाऊ (लड़ाईका) ढोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारनेवालोंने कहा कि खेत सुन्दर हैं (जीत होगी)॥२॥

बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥ रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥

एक बूढ़ेने शकुन विचारकर कहा—भरतसे मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजीको मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है॥३॥

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा॥ भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें । बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५०३

यह सुनकर निषादराज गुहने कहा—बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दीमें (बिना विचारे) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजीका शील-स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करनेमें हितकी बहुत बड़ी हानि है ॥ ४ ॥

दो०—गहहू घाट भट समिति सब लेउँ मरम मिलि जाइ।

बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ॥ ११२ ॥

अतएव हे वीरो! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटोंको रोक लो, मैं जाकर भरतजीसे मिलकर उनका भेद लेता हूँ। उनका भाव मित्रका है या शत्रुका या उदासीनका, यह जानकर तब आकर वैसा (उसीके अनुसार) प्रबन्ध करूँगा ॥ ११२ ॥

लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरईं दुराएँ॥ अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥

उनके सुन्दर स्वभावसे मैं उनके स्नेहको पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपानेसे नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंटका सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये ॥ १ ॥

मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने॥ मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए॥

कहार लोग पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियोंके भार भर-भरकर लाये। भेंटका सामान सजाकर मिलनेके लिये चले तो मङ्गलदायक शुभ शकुन मिले ॥ २ ॥

देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥ जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥

निषादराजने मुनिराज वसिष्ठजीको देखकर अपना नाम बतलाकर दूरहीसे दण्डवत्-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजीने उसको रामका प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजीको समझाकर कहा [कि यह श्रीरामजीका मित्र है] ॥ ३ ॥

राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उत्तरि उमगत अनुरागा॥ गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥

यह श्रीरामका मित्र है, इतना सुनते ही भरतजीने रथ त्याग दिया। वे रथसे उतरकर प्रेममें उमँगते हुए चले। निषादराज गुहने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वीपर माथा टेककर जोहार की ॥ ४ ॥

दो०—करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।

मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ ॥ ११३ ॥

५०४

  • रामचरितमानस *

दण्डवत् करते देखकर भरतजीने उठाकर उसको छातीसे लगा लिया। हृदयमें प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजीसे भेंट हो गयी हो ॥ १९३ ॥

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ॥ धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ॥

भरतजी गुहको अत्यन्त प्रेमसे गले लगा रहे हैं। प्रेमकी रीतिको सब लोग सिहा रहे हैं (ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं), मङ्गलकी मूल 'धन्य-धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं ॥ १ ॥

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुड़ लेइअ सींचा ॥ तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता ॥

[वे कहते हैं—] जो लोक और वेद दोनोंमें सब प्रकारसे नीचा माना जाता है, जिसकी छायाके छू जानेसे भी स्नान करना होता है, उसी निषादसे अँकवार भरकर (हृदयसे चिपटाकर) श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरतजी [आनन्द और प्रेमवश] शरीरमें पुलकावलीसे परिपूर्ण हो मिल रहे हैं ॥ २ ॥

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥ यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा ॥

जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं (अर्थात् आलस्यसे भी जिनके मुँहसे रामनामका उच्चारण हो जाता है), पापोंके समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुहको तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने हृदयसे लगा लिया और कुलसमेत इसे जगत्पावन (जगत्को पवित्र करनेवाला) बना दिया ॥ ३ ॥

करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ॥ उलटा नामु जपत जगु जाना। बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना ॥

कर्मनाशा नदीका जल गङ्गाजीमें पड़ जाता है (मिल जाता है), तब कहिये, उसे कौन सिरपर धारण नहीं करता? जगत् जानता है कि उलटा नाम (मरा-मरा) जपते-जपते बाल्मीकिजी ब्रह्मके समान हो गये ॥ ४ ॥

दो०—स्वपत्र सबर खस जमन जड़ पावैर कोल किरात।

रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ॥ १९४ ॥

मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवनमें विख्यात हो जाते हैं ॥ १९४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५०५

नहि अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥ राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं॥

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तरसे यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजीने किसको बड़ाई नहीं दी? इस प्रकार देवता रामनामकी महिमा कह रहे हैं और उसे सुन-सुनकर अयोध्याके लोग सुख पा रहे हैं ॥ १ ॥

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा॥ देखि भरत कर सीलु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥

रामसखा निषादराजसे प्रेमके साथ मिलकर भरतजीने कुशल, मङ्गल और क्षेम पूछी। भरतजीका शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया (प्रेममुग्ध होकर देहकी सुध भूल गया) ॥ २ ॥

सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥ धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥

उसके मनमें संकोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजीको देखता रहा। फिर धीरज धरकर भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रेमके साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा— ॥ ३ ॥

कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥ अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥

हे प्रभो! कुशलके मूल आपके चरणकमलोंके दर्शन कर मैंने तीनों कालोंमें अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रहसे करोड़ों कुलों (पीढ़ियों)—सहित मेरा मङ्गल (कल्याण) हो गया ॥ ४ ॥

दो०—समुद्धि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोड़।

जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोड़॥ १९५ ॥

मेरी करतूत और कुलको समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको मनमें देख (विचार)कर (अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ—जैसे नीचको भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया—यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामजीके चरणोंका भजन नहीं करता, वह जगत्में विधाताके द्वारा ठगा गया है ॥ १९५ ॥

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥ राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥

५०६

  • रामचरितमानस *

मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनोंसे सब प्रकारसे बाहर हूँ। पर जबसे श्रीरामचन्द्रजीने मुझे अपनाया है, तभीसे मैं विश्वका भूषण हो गया ॥ १ ॥

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई । मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ॥ कहि निषाद निज नाम सुबानीं । सादर सकल जोहारीं रानीं ॥

निषादराजकी प्रीतिको देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजीके छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले। फिर निषादने अपना नाम ले-लेकर सुन्दर (नम्र और मधुर) वाणीसे सब रानियोंको आदरपूर्वक जोहार की ॥ २ ॥

जानि लखन सम देहिं असीसा । जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ॥ निरखि निषादु नगर नर नारी । भए सुखी जनु लखनु निहारी ॥

रानियाँ उसे लक्ष्मणजीके समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षांतक सुखपूर्वक जिओ। नगरके स्त्री-पुरुष निषादको देखकर ऐसे सुखी हुए, मानो लक्ष्मणजीको देख रहे हों ॥ ३ ॥

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू । भँटेउ रामभद्र भरि बाहू ॥ सुनि निषादु निज भाग बड़ाई । प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ॥

सब कहते हैं कि जीवनका लाभ तो इसीने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीने भुजाओंमें बाँधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्यकी बड़ाई सुनकर मनमें परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला ॥ ४ ॥

दो०—सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाड़।

घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाड़ ॥ १९६ ॥

उसने अपने सब सेवकोंको इशारेसे कह दिया। वे स्वामीका रुख पाकर चले और उन्होंने घरोंमें, वृक्षोंके नीचे, तालाबोंपर तथा बगीचों और जंगलोंमें ठहरनेके लिये स्थान बना दिये ॥ १९६ ॥

सृंगबेरपुर भरत दीख जब । भे सनेहैं सब अंग सिथिल तब ॥ सोहत दिऐं निषादहि लागू । जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ॥

भरतजीने जब शृङ्गवेरपुरको देखा, तब उनके सब अङ्ग प्रेमके कारण शिथिल हो गये। वे निषादको लाग दिये (अर्थात् उसके कंधेपर हाथ रखे चलते हुए) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों ॥ १ ॥

एहि बिधि भरत सेनु सबु संग। दीखि जाड़ जग पावनि गंगा ॥ रामघाट कहैं कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ॥