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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • लङ्काकाण्ड *

८७५

छं०—एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है। मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥ सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटों कहा। अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥

[वे यही सोचकर रह जाते हैं कि] इसके हृदयमें जानकीका निवास है, जानकीके हृदयमें मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं। अतः रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा। यह वचन सुनकर, सीताजीके मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुन्दरी! महान् सन्देशका त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा—

दो०—काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान। तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान ॥ ११ ॥

सिरोंके बार-बार काटे जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तब सुजान (अन्तर्यामी) श्रीरामजी रावणके हृदयमें बाण मारेंगे ॥ ११ ॥

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥ राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥

ऐसा कहकर और सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाकर फिर त्रिजटा अपने घर चली गयी। श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण करके जानकीजीको अत्यन्त विरहव्यथा उत्पन्न हुई ॥ १ ॥

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती ॥ करति विलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥

वे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निन्दा कर रही हैं [और कह रही हैं—] रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजीके विरहमें दुःखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं ॥ २ ॥

जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥ सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥

जब विरहेके मारे हृदयमें दारुण दाह हो गया, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहू फड़क उठे। शकुन समझकर उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर अवश्य मिलेंगे ॥ ३ ॥

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा ॥ सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही ॥

८७६

  • रामचरितमानस *

यहाँ आधी रातको रावण [मूच्छीसे] जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा—अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! ॥ ४ ॥ तेहिं पद गहि बहु बिधि समुद्गावा । भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥ सुनि आगवनु दसानन केरा । कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥

सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा। रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी ॥ ५ ॥

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी । धाए कटकटाइ भट भारी ॥

वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर दौड़े ॥ ६ ॥

छं०—धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा । अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥ बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो । चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु व्याकुल कियो ॥

विकट और विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले। बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया।

दो०—देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार । अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥ १०० ॥

वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी ॥ १०० ॥

छं०—जब कीन्ह तेहिं पाषंड । भए प्रगट जंतु प्रचंड । बेताल भूत पिसाच । कर धरें धनु नाराच ॥ १ ॥

जब उसने पाखण्ड (माया) रचा, तब भयङ्कर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए! ॥ १ ॥

जोगिनि गहँ करबाल । एक हाथ मनुज कपाल । करि सद्य सोनित पान । नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २ ॥

जोगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं ॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७७

धरु मारु बोलहिं घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ ओर । मुख बाड़ धावहिं खान । तब लगे कीस परान ॥ ३ ॥

वे 'पकड़ो, मारो' आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर (सब दिशाओंमें) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे ॥ ३ ॥

जहँ जाहिं मर्कट भागि । तहँ बरत देखहिं आगि । भाए बिकल बानर भालु । पुनि लाग बरघै बालु ॥ ४ ॥

वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा ॥ ४ ॥

जहँ तहँ थकित करि कीस । गजेंउ बहुरि दससीस । लछिमन कपीस समेत । भाए सकल बीर अचेत ॥ ५ ॥

वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी बीर अचेत हो गये ॥ ५ ॥

हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिं हाथ । एहि बिधि सकल बल तोरि । तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥ ६ ॥

हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते (पछताते) हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची ॥ ६ ॥

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाए गहे पाषान । तिन्ह रामु घैरे जाड़ । चहुँ दिसि बरुथ बनाड़ ॥ ७ ॥

उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा ॥ ७ ॥

मारहु धरहु जनि जाड़ । कटकटहिं पूँछ उठाड़ । दहँ दिसि लँगूर बिराज । तेहिं मध्य कोसलराज ॥ ८ ॥

वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, 'मारो, पकड़ो, जाने न पावे।' उनके लँगूर (पूँछ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं ॥ ८ ॥

छं०—तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही । जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥ प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी । रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महूँ माया हरी ॥

८७८

  • रामचरितमानस *

उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) बनायी गयी हो। प्रभुको देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदयसे 'जय, जय, जय' ऐसा बोलने लगे। तब श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली॥ १ ॥

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे । सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे ॥ श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं । सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥

माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पड़े। श्रीरामजीने बाणोंके समूह छोड़े, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते॥ २ ॥

दो०—ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।

जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास ॥ १०१ क ॥

उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने पुरुषार्थके अनुसार आकाशमें उड़ती है॥ १०१ (क) ॥

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।

प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि व्याकुल देखि कलेस ॥ १०१ ख ॥

सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं। फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो खेल कर रहे हैं; परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेशको देखकर (प्रभुको क्लेश पाते समझकर) व्याकुल हैं॥ १०१ (ख) ॥

काटत बढ़हिं सीस समुदाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकार्ई ॥

मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥

काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा॥ १ ॥

उमा काल मर जाकीं ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥

सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। [विभीषणजीने कहा—] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये—॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७९

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जितत रावनु बल ताकें ॥ सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥

इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ॥ ३ ॥

असुभ होन लागे तब नाना । रोवहिं खर सूकाल बहु स्वाना ॥ बोलहिं खग जग आरति हेतू । प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥

उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत्के दुःख (असुभ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये ॥ ४ ॥

दस दिसि दाह होन अति लागा । भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥ मन्दोदरि उर कंपति भारी । प्रतिमा स्वर्वाहिं नयन मग बारी ॥

दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्गसे जल बहाने लगीं ॥ ५ ॥

छं०—प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही । बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥ उतपात अमित बिलोकि नभ सुरबिकल बोलहिं जय जए । सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे।

दो०—खैँचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस । रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥

कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों ॥ १०२ ॥

सायक एक नाभि सर सोषा । अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥ तै सिर बाहु चले नाराचा । सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥

८८०

  • रामचरितमानस *

एक बाणने नाभिके अमृतकुण्डको सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओंमें लगे। बाण सिरों और भुजाओंको लेकर चले। सिरों और भुजाओंसे रहित रुण्ड (धड़) पृथ्वीपर नाचने लगा ॥ १ ॥

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ॥ गर्जैउ मरत घोर रव भारी । कहाँ रामु रन हतौँ पचारी ॥

धड़ प्रचण्ड वेगसे दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी। तब प्रभुने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते समय रावण बड़े घोर शब्दसे गरजकर बोला—राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्धमें मारूँ!! ॥ २ ॥

डोली भूमि गिरत दसकंधर । छुभित सिंधु सरि दिगज भूधर ॥ धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई । चापि भालु मर्कट समुदाई ॥

रावणके गिरते ही पृथ्वी हिल गयी। समुद्र, नदियाँ, दिशाओंके हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण धड़के दोनों टुकड़ोंको फैलाकर भालू और वानरोंके समुदायको दबाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३ ॥

मंदोदरि आगें भुज सीसा । धरि सर चले जहाँ जगदीसा ॥ प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई । देखि सुरन्ह दुंदुभी बजाई ॥

रावणकी भुजाओं और सिरोंको मन्दोदरीके सामने रखकर राम-बाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्रीरामजी थे। सब बाण जाकर तरकसमें प्रवेश कर गये। यह देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये ॥ ४ ॥

तासु तेज समान प्रभु आनन । हरषे देखि संभु चतुरानन ॥ जय जय धुनि पूरी ब्रहंडा । जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा ॥

रावणका तेज प्रभुके मुखमें समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। ब्रह्माण्डभरमें जय-जयकी ध्वनि भर गयी। प्रबल भुजदण्डोंवाले श्रीरघुवीरकी जय हो ॥ ५ ॥

बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा । जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥

देवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं—कृपालुकी जय हो, मुकुन्दकी जय हो, जय हो!! ॥ ६ ॥

छं०— जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो । खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो ॥ सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही । संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८८१

हे कृपाके कन्द! हे मोक्षदाता मुकुन्द! हे [राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्वोंके हरनेवाले! हे शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दलको विदीर्ण करनेवाले! हे कारणोंके भी परम कारण! हे सदा करुणा करनेवाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्षमें भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं। रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके अङ्गोंने बहुत-से कामदेवोंकी शोभा प्राप्त की ॥ १ ॥

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तडित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं॥ भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥

सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच-बीचमें अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वतपर बिजलीके समूहसहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी अपने भुजदण्डोंसे बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीरपर रुधिरके कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं। मानो तमालके वृक्षपर बहुत-सी ललमुनियाँ चिड़ियाँ अपने महान् सुखमें मग्न हुई निश्चल बैठी हों ॥ २ ॥

दो०— कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।

भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३ ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्दकी जय हो, ऐसा पुकारने लगे ॥ १०३ ॥

पति सिर देखत मन्दोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥ जुबति बृंद रोवत उठि धाई। तेहि उठाइ रावन पहिं आई॥

पतिके सिर देखते ही मन्दोदरी व्याकुल और मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई उठ दौड़ीं और उस (मन्दोदरी) को उठाकर रावणके पास आयीं ॥ १ ॥

पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा॥ उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना॥

पतिकी दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं। उनके बाल खुल गये, देहकी सँभाल नहीं रही। वे अनेकों प्रकारसे छाती पीटती हैं और रोती हुई रावणके प्रतापका बखान करती हैं ॥ २ ॥

तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥ सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥

[वे कहती हैं—] हे नाथ! तुम्हारे बलसे पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूलमें भरा हुआ पृथ्वीपर पड़ा है! ॥ ३ ॥

८८२

  • रामचरितमानस *

बरुन कुबेर सुरेस समीरा । रन सन्मुख धरि काहूँ न धीरा ॥ भुजबल जितेहु काल जम साईं । आजु परेहु अनाथ की नाईं ॥

वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमेंसे किसीने भी रणमें तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबलसे काल और यमराजको भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथकी तरह पड़े हो ॥४॥

जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताईं । सुत परिजन बल बरनि न जाईं ॥ राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥

तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियोंके बलका हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामचन्द्रजीके विमुख होनेसे ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी न रह गया ॥५॥

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा । सभय दिसिप नित नावहिं माथा ॥ अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥

हे नाथ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे वशमें थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं। रामविमुखके लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है) ॥६॥

काल बिबस पति कहा न माना । अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥

हे पति! कालके पूर्ण वशमें होनेसे तुमने [किसीका] कहना नहीं माना और चराचरके नाथ परमात्माको मनुष्य करके जाना ॥७॥

छं०—जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं । जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥ आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं । तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥

दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा! इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ।

दो०—अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन । जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८८३

अहह! नाथ! श्रीरघुनाथजीके समान कृपाका समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान्ने तुमको वह गति दी जो योगिसमाजको भी दुर्लभ है ॥ १०४ ॥

मन्दोदरी बचन सुनि काना । सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥ अज मेहस नारद सनकादी । जे मुनिबर परमारथबादी ॥

मन्दोदरीके वचन कानोंसे सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीने सुख माना। ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी (परमात्माके तत्त्वको जानने और कहनेवाले) श्रेष्ठ मुनि थे ॥ १ ॥

भरि लोचन रघुपतिहि निहारी । प्रेम मगन सब भए सुखारी ॥ रुदन करत देखीं सब नारी । गयउ बिभीषनु मन दुख भारी ॥

वे सभी श्रीरघुनाथजीको नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गये और अत्यन्त सुखी हुए। अपने घरकी सब स्त्रियोंको रोती हुई देखकर विभीषणजीके मनमें बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये ॥ २ ॥

बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥ लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो । बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो ॥

उन्होंने भाईकी दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्रीरामजीने छोटे भाईको आज्ञा दी [कि जाकर विभीषणको धैर्य बँधाओ]। लक्ष्मणजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया तब विभीषण प्रभुके पास लौट आये ॥ ३ ॥

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका । करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥ कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी । बिधिवत देस काल जियँ जानी ॥

प्रभुने उनको कृपापूर्ण दृष्टिसे देखा [और कहा—] सब शोक त्यागकर रावणकी अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभुकी आज्ञा मानकर और हृदयमें देश और कालका विचार करके विभीषणजीने विधिपूर्वक सब क्रिया की ॥ ४ ॥

दो०—मन्दोदरी आदि सब देड़ तिलांजलि ताहि।

भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥ १०५ ॥

मन्दोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे (रावणको) तिलाञ्जलि देकर मनमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन करती हुई महलको गयीं ॥ १०५ ॥

आड़ बिभीषन पुनि सिरु नायो । कृपासिंधु तब अनुज बोलायो ॥ तुम्ह कपीस अंगद नल नीला । जामवंत मारुति नयसीला ॥ सब मिलि जाहु बिभीषन साथा । सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ॥ पिता बचन मैं नगर न आवउँ । आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥

८८४

  • रामचरितमानस *

सब क्रिया-कर्म करनेके बाद विभीषणने आकर पुनः सिर नवाया। तब कृपाके समुद्र श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको बुलाया। श्रीरघुनाथजीने कहा कि तुम, वानरराज सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान् और मारुति सब नीतिनिपुण लोग मिलकर विभीषणके साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजीके वचनोंके कारण मैं नगरमें नहीं आ सकता। पर अपने ही समान वानर और छोटे भाईको भेजता हूँ ॥ १-२ ॥

तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना । कीन्ही जाड़ तिलक की रचना ॥ सादर सिंहासन बैठारी । तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥

प्रभुके वचन सुनकर वानर तुरंत चले और उन्होंने जाकर राजतिलककी सारी व्यवस्था की। आदरके साथ विभीषणको सिंहासनपर बैठाकर राजतिलक किया और स्तुति की ॥ ३ ॥

जोरि पानि सबहीं सिर नाए । सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए ॥ तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे । कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे ॥

सभीने हाथ जोड़कर उनको सिर नवाये। तदनन्तर विभीषणजीसहित सब प्रभुके पास आये। तब श्रीरघुवीरने वानरोंको बुला लिया और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी किया ॥ ४ ॥

छं०—किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो । पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥ मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाड़हैं । संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाड़हैं ॥

भगवान्ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया। इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा। जो लोग मेरेसहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायेंगे।

दो०—प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज । बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज ॥ १०६ ॥

प्रभुके वचन कानोंसे सुनकर वानर-समूह तृप्त नहीं होते। वे सब बार-बार सिर नवाते हैं और चरणकमलोंको पकड़ते हैं ॥ १०६ ॥

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना । लंका जाहु कहेउ भगवाना ॥ समाचार जानकिहि सुनावहु । तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु ॥

फिर प्रभुने हनुमान्जीको बुला लिया। भगवान्ने कहा—तुम लङ्का जाओ। जानकीको सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल-समाचार लेकर तुम चले आओ ॥ १ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८८५

तब हनुमंत नगर महुँ आए । सुनि निसिचरी निसाचर धाए ॥ बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही । जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही ॥

तब हनुमान्जी नगरमें आये । यह सुनकर राक्षस-राक्षसी [उनके सत्कारके लिये] दौड़े । उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमान्जीकी पूजा की और फिर श्रीजानकीजीको दिखला दिया ॥ २ ॥

दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा । रघुपति दूत जानकी चीन्हा ॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता । कुसल अनुज कपि सेन समेता ॥

हनुमान्जीने [सीताजीको] दूरसे ही प्रणाम किया । जानकीजीने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजीका दूत है [और पूछा—] हे तात! कहो, कृपाके धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरोंकी सेनासहित कुशलसे तो हैं ? ॥ ३ ॥

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा । मातु समर जीत्यो दससीसा ॥ अबिचल राजु बिभीषण पायो । सुनि कपि बचन हरष उर छायो ॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकारसे सकुशल हैं । उन्होंने संग्राममें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अचल राज्य प्राप्त किया है । हनुमान्जीके वचन सुनकर सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया ॥ ४ ॥

छं०—अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा । का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा ॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं । रन जीति रिपुदल बंधु जूत पस्यामि राममनामयं ॥

श्रीजानकीजीके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हुआ । उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [आनन्दाश्रुओंका] जल छा गया । वे बार-बार कहती हैं—हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं है! [हनुमान्जीने कहा—] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत्का राज्य पा लिया, जो मैं रणमें शत्रुसेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामजीको देख रहा हूँ ।

दो०—सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत । सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ॥ १०७ ॥

[जानकीजीने कहा—] हे पुत्र! सुन, समस्त सदगुण तेरे हृदयमें बसें और हे हनुमान्! शेष (लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें ॥ १०७ ॥

अब सोड़ जतन करहु तुम्ह ताता । देखौँ नयन स्याम मृदु गाता ॥ तब हनुमान राम पहिं जाई । जनकसुता कै कुसल सुनाई ॥

८८६

  • रामचरितमानस *

हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन करूँ। तब श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर हनुमान्जीने जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया ॥ १ ॥

सुनि संदेसु भानुकुलभूषण । बोलि लिए जुबराज बिभीषण ॥ मारुतसुत के संग सिधावहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु ॥

सूर्यकुलभूषण श्रीरामजीने सन्देश सुनकर युवराज अंगद और विभीषणको बुला लिया [और कहा—] पवनपुत्र हनुमान्के साथ जाओ और जानकीको आदरके साथ ले आओ ॥ २ ॥

तुरतहिं सकल गए जहाँ सीता । सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता ॥ बेगि बिभीषण तिन्हहि सिखायो । तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो ॥

वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं। सब-की-सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजीने शीघ्र ही उन लोगोंको समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकारसे सीताजीको स्नान कराया, ॥ ३ ॥

बहु प्रकार भूषण पहिराए । सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए ॥ ता पर हरषि चढ़ी बैदेही । सुमिरि राम सुखधाम सनेही ॥

बहुत प्रकारके गहने पहनाने और फिर वे एक सुन्दर पालकी सजाकर ले आये। सीताजी प्रसन्न होकर सुखके धाम प्रियतम श्रीरामजीका स्मरण करके उसपर हर्षके साथ चढ़ीं ॥ ४ ॥

बेतपानि रच्छक चहु पासा । चले सकल मन परम हुलासा ॥ देखन भालु कीस सब आए । रच्छक कोपि निवारन धाए ॥

चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले। सबके मनोंमें परम उल्लास (उमंग) है। रीछ-वानर सब दर्शन करनेके लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े ॥ ५ ॥

कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु ॥ देखहुँ कपि जननी की नाई । बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई ॥

श्रीरघुवीरने कहा—हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीताको पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माताकी तरह देखें। गोसाई श्रीरामजीने हँसकर ऐसा कहा ॥ ६ ॥

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे । नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे ॥ सीता प्रथम अनल महुँ राखी । प्रगट कीन्हि चह अंतर सारखी ॥

प्रभुके वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गये। आकाशसे देवताओंने बहुत-से फूल बरसाये। सीताजी [के असली स्वरूप] को पहले अग्निमें रखा था। अब भीतरके साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं ॥ ७ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८८७

दो०—तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।

सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥ १०८॥

इसी कारण करुणाके भण्डार श्रीरामजीने लीलासे कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं॥ १०८॥

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥ लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥

प्रभुके वचनोंको सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्मसे पवित्र श्रीसीताजी बोलीं—हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्मके नेगी (धर्माचरणमें सहायक) बनो और तुरंत आग तैयार करो॥ १॥

सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥ लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥

श्रीसीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजीके नेत्रोंमें [विषादके आँसुओंका] जल भर आया। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभुसे कुछ कह नहीं सकते॥ २॥

देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥ पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥

फिर श्रीरामजीका रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत-सी लकड़ी ले आये। अग्निको खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजीके हृदयमें हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ॥ ३॥

जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥ तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥

[सीताजीने लीलासे कहा—] यदि मन, वचन और कर्मसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीरको छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसीका आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मनकी गति जानते हैं, [मेरे भी मनकी गति जानकर] मेरे लिये चन्दनके समान शीतल हो जायँ॥ ४॥

छं०— श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥ प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥

८८८

  • रामचरितमानस *

प्रभु श्रीरामजीका स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजीके द्वारा बन्दित हैं तथा जिनमें सीताजीकी अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजीने चन्दनके समान शीतल हुई अग्रिमें प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजीकी छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्रिमें जल गये। प्रभुके इन चरित्रोंको किसीने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े देखते हैं ॥ १ ॥

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो । जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो ॥ सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली । नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥

तब अग्रिने शरीर धारण करके वेदोंमें और जगत्में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजीको वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागरने विष्णुभगवान्को लक्ष्मी समर्पित की थी। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके वाम भागमें विराजित हुई। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है। मानो नये खिले हुए नीले कमलके पास सोनेके कमलकी कली सुशोभित हो ॥ २ ॥

दो०— बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान ।

गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान ॥ १०९ ( क ) ॥

देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाशमें डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानोंपर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ १०९ ( क ) ॥

जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार ।

देखि भालु कपिहरषे जयरघुपति सुखसार ॥ १०९ ( ख ) ॥

श्रीजानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गये और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय बोलने लगे ॥ १०९ ( ख ) ॥

तब रघुपति अनुसासन पाई । मातलि चलेउ चरण सिरु नाई ॥

आए देव सदा स्वार्थी । बचन कहहिं जनु परमारथी ॥

तब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रका सारथि मातलि चरणोंमें सिर नवाकर [रथ लेकर] चला गया। तदनन्तर सदाके स्वार्थी देवता आये। वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों ॥ १ ॥

दीन बंधु दयाल रघुराया । देव कीन्हि देवन्ह पर दाया ॥

बिस्व द्रोह रत यह खल कामी । निज अध गयउ कुमारगगामी ॥

हे दीनबन्धु! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव! आपने देवताओंपर बड़ी दया की। विश्वके द्रोहमें तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्गपर चलनेवाला रावण अपने ही पापसे नष्ट हो गया ॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८८१

तुम्ह समरूप ब्रह्म अविनासी । सदा एकरस सहज उदासी ॥ अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघशक्ति करुनामय ॥

आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभावसे ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणोंसे रहित), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं ॥ ३ ॥

मीन कमठ सूकर नरहरी । बामन परसुराम बपु धरी ॥ जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो । नाना तनु धरि तुम्हई नसायो ॥

आपने ही मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन और परशुरामके शरीर धारण किये । हे नाथ ! जब-जब देवताओंने दुःख पाया, तब-तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया ॥ ४ ॥

यह खल मलिन सदा सुरद्वोही । काम लोभ मद रत अति कोही ॥ अधम सिरोमनि तव पद पावा । यह हमरें मन बिसमय आवा ॥

यह दुष्ट मलिनहृदय, देवताओंका नित्य शत्रु, काम, लोभ और मदके परायण तथा अत्यन्त क्रोधी था । ऐसे अधमोंके शिरोंमणिने भी आपका परमपद पा लिया । इस बातका हमारे मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ५ ॥

हम देवता परम अधिकारी । स्वार्थ रत प्रभु भगति बिसारी ॥ भव प्रबाहँ संतत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥

हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्तिको भुलाकर निरन्तर भवसागरके प्रवाह (जन्म-मृत्युके चक्र) में पड़े हैं । अब हे प्रभो ! हम आपकी शरणमें आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये ॥ ६ ॥

दो०— करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहाँ तहाँ कर जोरि ।

अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि ॥ ११० ॥

विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे । तब अत्यन्त प्रेमसे पुलकितशरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे— ॥ ११० ॥

छं०— जय राम सदा सुखधाम हरे । रघुनायक सायक चाप धरे ॥

भव बारन दारन सिंह प्रभो । गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥

हे नित्य सुखधाम और [दुःखोंको हरनेवाले] हरि ! हे धनुष-बाण धारण किये हुए रघुनाथजी ! आपकी जय हो । हे प्रभो ! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथीको विदीर्ण करनेके लिये सिंहके समान हैं । हे नाथ ! हे सर्वव्यापक ! आप गुणोंके समुद्र और परम चतुर हैं ॥ १ ॥

तन काम अनेक अनूप छबी । गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी ॥

जसु पावन रावन नाग महा । खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥

८९०

  • रामचरितमानस *

आपके शरीरकी अनेकों कामदेवोंके समान, परन्तु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्पको गरुड़की तरह क्रोध करके पकड़ लिया ॥ २ ॥

जन रंजन भंजन सोक भयं । गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं ॥

अवतार उदार अपार गुनं । महि भार बिभंजन ग्यानघनं ॥ ३ ॥

हे प्रभो! आप सेवकोंको आनन्द देनेवाले, शोक और भयका नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वीका भार उतारनेवाला और ज्ञानका समूह है ॥ ३ ॥

अज व्यापकमेकमनादि सदा । करुनाकर राम नमामि मुदा ॥

रघुवंस बिभूषन दूषन हा । कृत भूप बिभीषन दीन रहा ॥ ४ ॥

[किन्तु अवतार लेनेपर भी] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणाकी खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्षके साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुलके आभूषण! हे दूषण राक्षसको मारनेवाले तथा समस्त दोषोंको हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [लंकाका] राजा बना दिया ॥ ४ ॥

गुनग्याननिधानअमानअजं । नित राम नमामि बिभुं बिरजं ॥

भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं । खल बृंद निकंद महा कुसलं ॥ ५ ॥

हे गुण और ज्ञानके भण्डार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारोंसे रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदण्डोंका प्रताप और बल प्रचण्ड है। दुष्टसमूहके नाश करनेमें आप परम निपुण हैं ॥ ५ ॥

बिनु कारन दीन दयाल हितं । छबि धाम नमामि रमा सहितं ॥

भव तारन कारन काज परं । मन संभव दारुन दोष हरं ॥ ६ ॥

हे बिना ही कारण दीनोंपर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभाके धाम! मैं श्रीजानकीजीसहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागरसे तारनेवाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनोंसे परे हैं और मनसे उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषोंको हरनेवाले हैं ॥ ६ ॥

सर चाप मनोहर त्रोन धरं । जलजारुन लोचन भूपवरं ॥

सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं । मद मार मुधा ममता समनं ॥ ७ ॥

आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले हैं। [लाल] कमलके समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओंमें श्रेष्ठ, सुखके मन्दिर, सुन्दर, श्री (लक्ष्मीजी) के वल्लभ तथा मद (अहङ्कार), काम और झूठी ममताके नाश करनेवाले हैं ॥ ७ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८११

अनवद्य अखंड न गोचर गो । सब रूप सदा सब होइ न गो ॥

इति बेद बर्दति न दंतकथा । रवि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥ ८ ॥

आप अनिच्छ या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [कोई] दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्यका प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसारसे भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं ॥ ८ ॥

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए । निरखंति तवानन सादर ए ॥

धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥ ९ ॥

हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। [और] हे हरे! हमारे [अमर] जीवन और देव (दिव्य) शरीरको धिक्कार है, जो हम आपकी भक्तिसे रहित हुए संसारमें (सांसारिक विषयोंमें) भूले पड़े हैं ॥ ९ ॥

अब दीनदयाल दया करिए । मति मोरि बिभेदकरी हरिए ॥

जेहि ते बिपरीत क्रिया करिए । दुख सो सुख मानि सुखी चरिए ॥ १० ॥

हे दीनदयाल! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेद उत्पन्न करनेवाली बुद्धिको हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्दसे विचरता हूँ ॥ १० ॥

खल खंडन मंडन रम्य छमा । पद पंकज सेवित संभु उमा ॥

नृप नायक दे बरदानमिंदं । चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं ॥ ११ ॥

आप दुष्टोंका खण्डन करनेवाले और पृथ्वीके रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्रीशिव-पार्वतीद्वारा सेवित हैं। हे राजाओंके महाराज! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें सदा मेरा कल्याणदायक [अनन्य] प्रेम हो ॥ ११ ॥

दो०—बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।

सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥ १११ ॥

इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीरसे विनती की। शोभाके समुद्र श्रीरामजीके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तूस ही नहीं होते थे ॥ १११ ॥

तेहि अवसर दसरथ तहाँ आए । तनय बिलोकि नयन जल छाए ॥

अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा । आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा ॥

उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभुने उनकी वन्दना की और तब पिताने उनको आशीर्वाद दिया ॥ १ ॥

८१२

  • रामचरितमानस *

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ । जीत्यों अजय निसाचर राऊ ॥ सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी । नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥

[श्रीरामजीने कहा—] हे तात! यह सब आपके पुण्योंका प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी। नेत्रोंमें जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी ॥ २ ॥

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ दूढ़ ग्याना ॥ ताते उमा मोच्छ नहीं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥

श्रीरघुनाथजीने पहलेके (जीवित कालके) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दूढ़ ज्ञान करा दिया। हे उमा! दशरथजीने भेद-भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया ॥ ३ ॥

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं । तिन्ह कहूं राम भगति निज देहीं ॥ बार बार करि प्रभुहि प्रनामा । दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥

[मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त] सगुणस्वरूपकी उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकारका मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभुको [इष्टबुद्धिसे] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये ॥ ४ ॥

दो०—अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।

सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥ ११२ ॥

छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज इन्द्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे— ॥ ११२ ॥

छं०—जय राम सोभा धाम । दायक प्रनत बिश्राम ॥

धृत त्रोन बर सर चाप । भुजदंड प्रबल प्रताप ॥ १ ॥

शोभाके धाम, शरणागतको विश्राम देनेवाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किये हुए, प्रबल प्रतापी भुजदण्डोंवाले श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो! ॥ १ ॥

जय दूषनारि खरारि । मर्दन निसाचर धारि ॥

यह दुष्ट मारेउ नाथ । भए देव सकल सनाथ ॥ २ ॥

हे खर और दूषणके शत्रु और राक्षसोंकी सेनाके मर्दन करनेवाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्टको मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गये ॥ २ ॥

जय हरन धरनी भार । महिमा उदार अपार ॥

जय रावनारि कृपाल । किए जातुधान बिहाल ॥ ३ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८१३

हे भूमिका भार हरनेवाले! हे अपार श्रेष्ठ महिमावाले! आपकी जय हो। हे रावणके शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो। आपने राक्षसोंको बेहाल (तहस-नहस) कर दिया ॥ ३ ॥

लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब ॥

मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग ॥ ४ ॥

लंकापति रावणको अपने बलका बहुत घमंड था। उसने देवता और गन्धर्व सभीको अपने वशमें कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभीके हठपूर्वक (हाथ धोकर) पीछे पड़ गया था ॥ ४ ॥

परद्व्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट ॥

अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल ॥ ५ ॥

वह दूसरोंसे द्व्रोह करनेमें तत्पर और अत्यन्त दुष्ट था। उस पापीने वैसा ही फल पाया। अब हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले! सुनिये ॥ ५ ॥

मोहि रहा अति अभिमान। नहीं कोउ मोहि समान ॥

अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज ॥ ६ ॥

मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु (आप) के चरणकमलोंके दर्शन करनेसे दुःख-समूहका देनेवाला मेरा वह अभिमान जाता रहा ॥ ६ ॥

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव ॥

मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप ॥ ७ ॥

कोई उन निर्गुन ब्रह्मका ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त (निराकार) कहते हैं। परन्तु हे रामजी! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है ॥ ७ ॥

बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयै करहु निकेत ॥

मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास ॥ ८ ॥

श्रीजानकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मेरे हृदयमें अपना घर बनाइये। हे रमानिवास! मुझे अपना दास समझिये और अपनी भक्ति दीजिये ॥ ८ ॥

छं०—दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।

सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं ॥

सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं।

ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं ॥

८१४

  • रामचरितमानस *

हे रमान्वास! हे शरणागतके भयको हरनेवाले और उसे सब प्रकारका सुख देनेवाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिये। हे सुखके धाम! हे अनेकों कामदेवोंकी छबिवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देवसमूहको आनन्द देनेवाले, [जन्म-मृत्यु, हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि] इन्द्रोंके नाश करनेवाले, मनुष्यशरीरधारी, अतुलनीय बलवाले, ब्रह्मा और शिव आदिसे सेवनीय, करुणासे कोमल श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

दो०—अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।

काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल ॥ ११३ ॥

हे कृपालु! अब मेरी ओर कृपा करके (कृपादृष्टिसे) देखकर आज्ञा दीजिये कि मैं क्या [सेवा] करूँ! इन्द्रके ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीरामजी बोले—॥ ११३ ॥

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे । परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे ॥

मम हित लागि तजे इन्ह प्राना । सकल जिआउ सुरेस सुजाना ॥

हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरोंने मार डाला है, पृथ्वीपर पड़े हैं। इन्होंने मेरे हितके लिये अपने प्राण त्याग दिये। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो ॥ १ ॥

सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी । अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी ॥

प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई । केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, प्रभुके ये वचन अत्यन्त गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकीको मारकर जिला सकते हैं। यहाँ तो उन्हींने केवल इन्द्रको बड़ाई दी है ॥ २ ॥

सुधा बरषि कपि भालु जिआए । हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए ॥

सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर । जिए भालु कपि नहिं रजनीचर ॥

इन्द्रने अमृत बरसाकर वानर-भालुओंको जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आये। अमृतकी वर्षा दोनों ही दलोंपर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं ॥ ३ ॥

रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छूटे भव बंधन ॥

सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा । जिए सकल रघुपति की ईछा ॥

क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे। अतः वे मुक्त हो गये, उनके भव-बन्धन छूट गये। किन्तु वानर और भालू तो सब देवांश (भगवान्की लीलाके परिकर) थे। इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजीकी इच्छासे जीवित हो गये ॥ ४ ॥

राम सरिस को दीन हितकारी । कीन्हे मुकृत निसाचर झारी ॥

खल मल धाम कामरत रावन । गति पाई जो मुनिबर पाव न ॥