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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

॥ श्रीहरिः ॥

द्वितीय संस्करणका नम्र निवेदन

श्रीमद्भागवत साक्षात् भगवान्‌का स्वरूप है। इसीसे भक्त-भागवतगण भगवद्भावनासे श्रद्धापूर्वक इसकी पूजा-आराधना किया करते हैं। भगवान् व्यास-सरीखे भगवत्स्वरूप महापुरुषको जिसकी रचनासे ही शान्ति मिली; जिसमें सकाम कर्म, निष्काम कर्म, साधनज्ञान, सिद्धज्ञान, साधनभक्ति, साध्यभक्ति, वैधी भक्ति, प्रेमा भक्ति, मर्यादामार्ग, अनुग्रहमार्ग, द्वैत, अद्वैत और द्वैताद्वैत आदि सभीका परम रहस्य बड़ी ही मधुरताके साथ भरा हुआ है, जो सारे मतभेदोंसे ऊपर उठा हुआ अथवा सभी मतभेदोंका समन्वय करनेवाला महान् ग्रन्थ है—उस भागवतकी महिमा क्या कही जाय। इसके प्रत्येक अंगसे भगवद्भावपूर्ण पारमहंस्य ज्ञान-सुधा-सरिताकी बाढ़ आ रही है—'यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।' भगवान्‌के मधुरतम प्रेम-रसका छलकता हुआ सागर है—श्रीमद्भागवत। इसीसे भावुक भक्तगण इसमें सदा अवगाहन करते हैं। परम मधुर भगवद्रससे भरा हुआ 'स्वादु-स्वादु पदे-पदे' ऐसा ग्रन्थ बस, यह एक ही है। इसकी कहीं तुलना नहीं है। विद्याका तो यह भण्डार ही है। 'विद्या भागवतावधिः' प्रसिद्ध है। इस 'परमहंससंहिता' का यथार्थ आनन्द तो उन्हीं सौभाग्यशाली भक्तोंको किसी सीमातक मिल सकता है, जो हृदयकी सच्ची लगनके साथ श्रद्धा-भक्तिपूर्वक केवल 'भगवत्प्रेमकी प्राप्ति' के लिये ही इसका पारायण करते हैं। यों तो श्रीमद्भागवत आशीर्वादात्मक ग्रन्थ है, इसके पारायणसे लौकिक-पारलौकिक सभी प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसमें कई प्रकारके अमोघ प्रयोगोंके उल्लेख हैं—जैसे 'नारायण-कवच' (स्क० ६ अ० ८)-से समस्त विघ्नोंका नाश तथा विजय, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति; 'पुंसवन-व्रत' (स्क० ६ अ० १९)-से समस्त कामनाओंकी पूर्ति; 'गजेन्द्रस्तवन' (स्क० ८ अ० ३)-से ऋणसे मुक्ति, शत्रुसे छुटकारा और दुर्भाग्यका नाश, 'पयोव्रत' (स्क० ८ अ० १६)-से मनोवांछित संतानकी प्राप्ति; 'सप्ताहश्रवण' या पारायणसे प्रेतत्वसे मुक्ति। इन सब साधनोंका भगवत्प्रेम या भगवत्प्राप्तिके लिये निष्कामभावसे प्रयोग किया जाय तो इनसे भगवत्प्राप्तिके पथमें बड़ी सहायता मिलती है। श्रीमद्भागवतके सेवनका यथार्थ आनन्द तो भगवत्प्रेमी पुरुषोंको ही प्राप्त होता है। जो लोग अपनी विद्या-बुद्धिका अभिमान छोड़कर और केवल भगवत्कृपाका आश्रय लेकर श्रीमद्भागवतका अध्ययन करते हैं, वे ही इसके भावोंको अपने-अपने अधिकारके अनुसार हृदयंगम कर सकते हैं।

गीताप्रेसके द्वारा श्रीमद्भागवतके प्रकाशनका विचार लगभग चौबीस-पचीस वर्ष पहलेसे हो रहा था। परंतु कई कारणोंसे उसमें देर होती गयी। फिर पाठका प्रश्न आया। खोज आरम्भ हुई, टीकाओं और पुरानी प्रतियोंको देखा गया। अन्तमें पूज्यपाद गोलोकवासी श्रीमन्मध्वगौडसम्प्रदायाचार्य गोस्वामी श्रीदामोदरलालजी शास्त्री और गवर्नमेंट संस्कृत

कॉलेजके भूतपूर्व प्रिंसिपल परम श्रद्धेय विद्वद्वर डॉ० श्रीगोपीनाथजी कविराज, एम्० ए० से परामर्श किया गया। श्रीकविराज महोदयके परामर्श, प्रयत्न और परिश्रमसे काशीके सरकारी 'सरस्वती-भवन' पुस्तकालयमें सुरक्षित प्रायः आठ सौ वर्षकी पुरानी प्रति देखी गयी और गीताप्रेसके विद्वान् शास्त्रियोंके द्वारा उससे पाठ मिलाया गया। इसके लिये हम श्रद्धेय श्रीकविराजजीके हृदयसे कृतज्ञ हैं। इसके पाठनिर्णयमें मथुराके प्रसिद्ध वैष्णव विद्वान् श्रद्धेय पं० जवाहरलालजी चतुर्वेदीसे बड़ी सहायता मिली थी, एतदर्थ हम उनके कृतज्ञ हैं।

इसी समय श्रीमद्भागवतके अनुवादकी बात भी चली और मेरे अनुरोधसे प्रिय श्रीमुनिलालजी (वर्तमानमें श्रद्धेय स्वामी सनातनदेवजी)-ने अनुवाद करना स्वीकार किया और भगवत्कृपासे उन्होंने सं० १९८९ के आषाढ़में उसे पूरा कर दिया। उक्त अनुवादका संशोधन श्रीवल्लभसम्प्रदायके महान् विद्वान् गोलोकवासी श्रद्धेय देवर्षि पं० श्रीरमानाथजी भट्ट, अपने ही साथी पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री और भाई हरिकृष्णदासजी गोयन्दकाके द्वारा करवाया गया। तदनन्तर संवत् १९९७ में श्रीमद्भागवतका अनुवादसहित पाठभेदकी पाद-टिप्पणियोंसे युक्त संस्करण दो खण्डोंमें प्रकाशित किया गया, जिसको भावुक पाठकोंने बहुत ही अपनाया। इसीके साथ-साथ मूल पाठका गुटका-संस्करण भी निकाला गया, जिसकी अबतक १,०८,२५० प्रतियाँ छप चुकी हैं।

इसके अनन्तर संवत् १९९८ में 'कल्याण' का 'भागवताङ्क' प्रकाशित किया गया। इसमें अनुवादकी शैली कुछ बदल दी गयी। इस अनुवादका अधिकांश हमारे अपने ही पं० श्रीशान्तनुविहारीजी द्विवेदी (वर्तमानमें श्रद्धेय स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज)- ने किया। कुछ श्रीमुनिलालजी तथा पं श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने भी किया। फिर द्वितीय महायुद्धके कारण कई तरहकी अड़चनें आ गयीं। श्रीमद्भागवतके ये दोनों खण्ड और 'श्रीभागवताङ्क' दोनों ही अप्राप्य हो गये। पुनः प्रकाशनकी बात बराबर चलती रही, पर कुछ-न-कुछ अड़चनें आती ही रहीं। 'भागवताङ्क' वाली नयी शैलीके अनुसार अनुवादमें संशोधन करना हमारे पं० श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामी, एम्० ए०, शास्त्रीने आरम्भ भी किया। परंतु अन्यान्य कार्योंमें अत्यधिक व्यस्त रहनेके कारण उनसे वह कार्य आगे नहीं बढ़ सका। गत फाल्गुनमें श्रद्धेय स्वामीजी श्रीअखण्डानन्दजी महाराज गोरखपुर पधारे, यों ही प्रसंगवश बात चल गयी और उन्होंने कृपापूर्वक इस कामको करना स्वीकार कर लिया। तदनुसार कार्य आरम्भ हो गया और भगवत्कृपासे अब यह छपकर पाठकोंके सामने प्रस्तुत है। श्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराज महीनोंतक लगातार अथक परिश्रम करके यह कार्य नहीं करते तो आज इस रूपमें इसका प्रकाशित होना सम्भव नहीं था। इसलिये हमलोग तो स्वामीजी महाराजके कृतज्ञ हैं ही, भागवतके प्रेमी पाठकोंको भी उनका कृतज्ञ होना चाहिये।

इस संस्करणमें अधिकांश अनुवाद 'भागवताङ्क' (मुख्यतया पं० श्रीशान्तनुविहारीजीके द्वारा अनुवादित)-के अनुसार ही है। कुछ अनुवाद तथा बहुत-सी अन्य सामग्री पूर्वप्रकाशित श्रीमद्भागवतके दोनों खण्डों (श्रीमुनिलालजीके द्वारा अनुवादित)-के अनुसार भी है। 'भागवताङ्क' के भावानुवादमें भी पं० श्रीशान्तनुविहारीजीके साथ-साथ श्रीमुनिलालजी और पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीका कुछ हाथ था। उसी प्रकार इसमें भी

है। इसीसे अनुवादकके रूपमें किन्हीं एक महानुभावका नाम नहीं दिया गया है। नाम-रूपके परित्यागी पूज्यद्वय संन्यासी महोदय (श्रद्धेय श्रीअखण्डानन्दजी महाराज और श्रद्धेय श्रीसनातनदेवजी महाराज) तो नाम न देनेसे प्रसन्न ही होंगे। हम तो इसको इन दोनों ही महानुभावोंका कृपाप्रसाद मानते हैं और दोनोंके ही कृतज्ञ हैं। पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री सम्पादकीय विभागके सदस्य हैं। अतः उनके नामकी पृथक् आवश्यकता भी नहीं। पाठकोंकी जानकारीके लिये यह परिचय दिया गया है। वस्तुतः अनुवादक महोदयोंके लिये इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने जो कुछ किया है, कृपापूर्वक ही किया है और उनकी कृपा तथा सद्भावना हमें सदा सहज ही प्राप्त है।

इसमें श्लोकोंका केवल अक्षरानुवाद नहीं है, पाठकोंको श्लोकोंका भाव भलीभाँति समझानेके लिये श्लोकोंमें आये हुए प्रत्येक शब्दके भावकी पूर्ण रक्षा करते हुए छोटे-छोटे वाक्योंमें उनकी व्याख्या की गयी है, साथ ही बहुत विस्तार न हो, इसका भी ध्यान रखा गया है। इसे अनुवाद न कहकर 'सरल संक्षिप्त व्याख्या' कहना अधिक उपयुक्त होगा। स्थान- स्थानपर, विशेष करके दशम स्कन्धमें कई जगह श्रीभगवान्‌की मधुर लीलाओंके रसास्वादनके लिये और लीलारहस्यको समझनेके लिये नयी-नयी टिप्पणियाँ भी दे दी गयी हैं, जिससे इसकी उपादेयता और सुन्दरता विशेष बढ़ गयी है। साथ ही आरम्भमें स्कन्दपुराणोक्त एक छोटा माहात्म्य, श्रीमद्भागवतकी पूजनविधि आदि सप्ताहपारायणकी विधि तथा आवश्यक सामग्रीकी सूची एवं अन्तमें स्कन्दपुराणोक्त भागवतमाहात्म्य और विस्तृत प्रयोगविधि दे दी गयी है, इसलिये पहले संस्करणकी अपेक्षा इसमें पृष्ठ भी बहुत बढ़ गये हैं। चित्र भी अधिक दिये गये हैं। ये कुछ इस संस्करणकी विशेषताएँ हैं।

इसके पाठ-संशोधन, अनुवाद, प्रूफ-संशोधन आदिमें गोस्वामी श्रीचिम्मनलालजी और पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने बड़ा काम किया है। सभी बातोंमें सावधानी रखी गयी है, तथापि इतने बड़े ग्रन्थकी छपाईमें जहाँ-तहाँ भूलें अवश्य रही होंगी। कृपालु पाठकोंसे प्रार्थना है कि उन्हें पाठ, अनुवाद या छपाईमें जहाँ भूल दिखलायी दे, कृपया वे व्योरेवार लिख दें, जिससे आगामी संस्करणमें यथायोग्य संशोधन कर दिया जाय। सहृदय पाठकोंसे प्रार्थना है कि असावधानतावश होनेवाली भूलोंके लिये वे क्षमा करें।

अन्तमें निवेदन है कि यह सब जो कुछ हुआ है, इसमें भगवत्कृपा ही कारण है और सब तो निमित्तमात्र है। मैं अपना बड़ा सौभाग्य समझता हूँ और अपने प्रति श्रीभगवान्‌की बड़ी कृपा मानता हूँ, जिससे इधर कई महीने प्रायः श्रीमद्भागवतके ही पठन-चिन्तन आदिमें लगे।

—हनुमानप्रसाद पोद्दार

॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

प्रथम खण्ड

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य

१-देवर्षि नारदकी भक्तिसे भेंट
२-भक्तिका दुःख दूर करनेके लिये नारदजीका उद्योग
३-भक्तिके कष्टकी निवृत्ति
४-गोकर्णोपाख्यान प्रारम्भ
५-धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार
६-सप्ताहयज्ञकी विधि

प्रथम स्कन्ध

१-श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियोंका प्रश्न
२-भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य
३-भगवान्के अवतारोंका वर्णन
४-महर्षि व्यासका असंतोष
५-भगवान्के यश-कीर्तनकी महिमा और देवर्षि नारदजीका पूर्वचरित्र
६-नारदजीके पूर्वचरित्रका शेष भाग
७-अश्वत्थामाद्वारा द्रौपदीके पुत्रोंका मारा जाना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाका मानमर्दन
८-गर्भमें परीक्षित्‌की रक्षा, कुन्तीके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और युधिष्ठिरका शोक
९-युधिष्ठिरादिका भीष्मजीके पास जाना और भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए भीष्मजीका प्राणत्याग करना
१०-श्रीकृष्णका द्वारका-गमन
११-द्वारकामें श्रीकृष्णका राजोचित स्वागत
१२-परीक्षित्‌का जन्म
१३-विदुरजीके उपदेशसे धृतराष्ट्र और गान्धारीका वनमें जाना

१४-अपशकुन देखकर महाराज युधिष्ठिरका शंका करना और अर्जुनका द्वारकासे लौटना १५-कृष्णविरहव्यथित पाण्डवोंका परीक्षित्को राज्य देकर स्वर्ग सिधारना १६-परीक्षित्की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वीका संवाद १७-महाराज परीक्षित्द्वारा कलियुगका दमन १८-राजा परीक्षित्को शृंगी ऋषिका शाप १९-परीक्षित्का अनशनव्रत और शुकदेवजीका आगमन

द्वितीय स्कन्ध

१-ध्यान-विधि और भगवान्‌के विराट्स्वरूपका वर्णन २-भगवान्‌के स्थूल और सूक्ष्मरूपोंकी धारणा तथा क्रममुक्ति और सद्योमुक्तिका वर्णन ३-कामनाओंके अनुसार विभिन्न देवताओंकी उपासना तथा भगवद्भक्तिके प्राधान्यका निरूपण ४-राजाका सृष्टिविषयक प्रश्न और शुकदेवजीका कथारम्भ ५-सृष्टि-वर्णन ६-विराट्स्वरूपकी विभूतियोंका वर्णन ७-भगवान्‌के लीलावतारोंकी कथा ८-राजा परीक्षित्के विविध प्रश्न ९-ब्रह्माजीका भगवद्धामदर्शन और भगवान्‌के द्वारा उन्हें चतुःश्लोकी भागवतका उपदेश १०-भागवतके दस लक्षण

तृतीय स्कन्ध

१-उद्धव और विदुरकी भेंट २-उद्धवजीद्वारा भगवान्‌की बाललीलाओंका वर्णन ३-भगवान्‌के अन्य लीलाचरित्रोंका वर्णन ४-उद्धवजीसे विदा होकर विदुरजीका मैत्रेय ऋषिके पास जाना ५-विदुरजीका प्रश्न और मैत्रेयजीका सृष्टिक्रम वर्णन ६-विराट् शरीरकी उत्पत्ति ७-विदुरजीके प्रश्न ८-ब्रह्माजीकी उत्पत्ति ९-ब्रह्माजीद्वारा भगवान्‌की स्तुति ebook converter DEMO Watermarks*

१०-दस प्रकारकी सृष्टिका वर्णन ११-मन्वन्तरादि कालविभागका वर्णन १२-सृष्टिका विस्तार १३-वाराह-अवतारकी कथा १४-दितिका गर्भधारण १५-जय-विजयको सनकादिका शाप १६-जय-विजयका वैकुण्ठसे पतन १७-हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षका जन्म तथा हिरण्याक्षकी दिग्विजय १८-हिरण्याक्षके साथ वराहभगवान्का युद्ध १९-हिरण्याक्ष-वध २०-ब्रह्माजीकी रची हुई अनेक प्रकारकी सृष्टिका वर्णन २१-कर्दमजीकी तपस्या और भगवान्का वरदान २२-देवहूतिके साथ कर्दम प्रजापतिका विवाह २३-कर्दम और देवहूतिका विहार २४-श्रीकपिलदेवजीका जन्म २५-देवहूतिका प्रश्न तथा भगवान् कपिलद्वारा भक्तियोगकी महिमाका वर्णन २६-महदादि भिन्न-भिन्न तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन २७-प्रकृति-पुरुषके विवेकसे मोक्ष-प्राप्तिका वर्णन २८-अष्टांगयोगकी विधि २९-भक्तिका मर्म और कालकी महिमा ३०-देह-गेहमें आसक्त पुरुषोंकी अधोगतिका वर्णन ३१-मनुष्ययोनिको प्राप्त हुए जीवकी गतिका वर्णन ३२-धूममार्ग और अर्चिरादि मार्गसे जानेवालोंकी गतिका और भक्तियोगकी उत्कृष्टताका वर्णन ३३-देवहूतिको तत्त्वज्ञान एवं मोक्षपदकी प्राप्ति

चतुर्थ स्कन्ध १-स्वायम्भुव-मनुकी कन्याओंके वंशका वर्णन २-भगवान् शिव और दक्ष प्रजापतिका मनोमालिन्य ३-सतीका पिताके यहाँ यज्ञोत्सवमें जानेके लिये आग्रह करना ebook converter DEMO Watermarks*

४-सतीका अग्निप्रवेश ५-वीरभद्रकृत दक्षयज्ञविध्वंस और दक्षवध ६-ब्रह्मादि देवताओंका कैलास जाकर श्रीमहादेवजीको मनाना ७-दक्षयज्ञकी पूर्ति ८-ध्रुवका वन-गमन ९-ध्रुवका वर पाकर घर लौटना १०-उत्तमका मारा जाना, ध्रुवका यक्षोंके साथ युद्ध ११-स्वायम्भुव-मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना १२-ध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति १३-ध्रुववंशका वर्णन, राजा अंगका चरित्र १४-राजा वेनकी कथा १५-महाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक १६-वंदीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति १७-महाराज पृथुका पृथ्वीपर कुपित होना और पृथ्वीके द्वारा उनकी स्तुति करना १८-पृथ्वी-दोहन १९-महाराज पृथुके सौ अश्वमेध यज्ञ २०-महाराज पृथुकी यज्ञशालामें श्रीविष्णुभगवान्‌का प्रादुर्भाव २१-महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश २२-महाराज पृथुको सनकादिका उपदेश २३-राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन २४-पृथुकी वंशपरम्परा और प्रचेताओँको भगवान् रुद्रका उपदेश २५-पुरंजनोपाख्यानका प्रारम्भ २६-राजा पुरंजनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना २७-पुरंजनपुरीपर चण्डवेगकी चढ़ाई तथा कालकन्याका चरित्र २८-पुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना २९-पुरंजनोपाख्यानका तात्पर्य ३०-प्रचेताओँको श्रीविष्णुभगवान्‌का वरदान ३१-प्रचेताओँको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ

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पञ्चम स्कन्ध

१-प्रियव्रत-चरित्र
२-आग्नीध्र-चरित्र
३-राजा नाभिका चरित्र
४-ऋषभदेवजीका राज्यशासन
५-ऋषभजीका अपने पुत्रोंको उपदेश देना और स्वयं अवधूतवृत्ति ग्रहण करना
६-ऋषभदेवजीका देहत्याग
७-भरत-चरित्र
८-भरतजीका मृगके मोहमें फँसकर मृगयोनिमें जन्म लेना
९-भरतजीका ब्राह्मणकुलमें जन्म
१०-जडभरत और राजा रहूगणकी भेंट
११-राजा रहूगणको भरतजीका उपदेश
१२-रहूगणका प्रश्न और भरतजीका समाधान
१३-भवाटवीका वर्णन और रहूगणका संशयनाश
१४-भवाटवीका स्पष्टीकरण
१५-भरतके वंशका वर्णन
१६-भुवनकोशका वर्णन
१७-गंगाजीका विवरण और भगवान् शंकरकृत संकर्षणदेवकी स्तुति
१८-भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन
१९-किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन
२०-अन्य छः द्वीपों तथा लोकालोक-पर्वतका वर्णन
२१-सूर्यके रथ और उसकी गतिका वर्णन
२२-भिन्न-भिन्न ग्रहोंकी स्थिति और गतिका वर्णन
२३-शिशुमारचक्रका वर्णन
२४-राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन
२५-श्रीसङ्कर्षणदेवका विवरण और स्तुति
२६-नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन

षष्ठ स्कन्ध

१-अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ २-विष्णुदूतोंद्वारा भागवतधर्म-निरूपण और अजामिलका परमधामगमन ३-यम और यमदूतोंका संवाद ४-दक्षके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और भगवान्‌का प्रादुर्भाव ५-श्रीनारदजीके उपदेशसे दक्षपुत्रोंकी विरक्ति तथा नारदजीको दक्षका शाप ६-दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओंके वंशका विवरण ७-बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण ८-नारायणकवचका उपदेश ९-विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌की प्रेरणासे देवताओंका दधीचि ऋषिके पास जाना १०-देवताओंद्वारा दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे वज्रनिर्माण और वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण ११-वृत्रासुरकी वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति १२-वृत्रासुरका वध १३-इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण १४-वृत्रासुरका पूर्वचरित्र १५-चित्रकेतुको अंगिरा और नारदजीका उपदेश १६-चित्रकेतुका वैराग्य तथा संकर्षणदेवके दर्शन १७-चित्रकेतुको पार्वतीजीका शाप १८-अदिति और दितिकी सन्तानोंकी तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका वर्णन १९-पुंसवन-व्रतकी विधि

सप्तम स्कन्ध

१-नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजयकी कथा २-हिरण्याक्षका वध होनेपर हिरण्यकशिपुका अपनी माता और कुटुम्बियोंको समझाना ३-हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति ४-हिरण्यकशिपुके अत्याचार और प्रह्लादके गुणोंका वर्णन ५-हिरण्यकशिपुके द्वारा प्रह्लादजीके वधका प्रयत्न ६-प्रह्लादजीका असुर-बालकोंको उपदेश ७-प्रह्लादजीद्वारा माताके गर्भमें प्राप्त हुए नारदजीके उपदेशका वर्णन ८-नृसिंहभगवान्‌का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपुका वध एवं ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान्‌की ebook converter DEMO Watermarks*

स्तुति ९-प्रह्लादजीके द्वारा नृसिंहभगवान्‌की स्तुति १०-प्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा ११-मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्मका निरूपण १२-ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थआश्रमोंके नियम १३-यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद १४-गृहस्थसम्बन्धी सदाचार १५-गृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन

अष्टम स्कन्ध

१-मन्वन्तरोंका वर्णन २-ग्राहके द्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ३-गजेन्द्रके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना ४-गज और ग्राहका पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार ५-देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और ब्रह्माकृत भगवान्‌की स्तुति ६-देवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना ७-समुद्रमन्थनका आरम्भ और भगवान् शंकरका विषपान ८-समुद्रसे अमृतका प्रकट होना और भगवान्‌का मोहिनी-अवतार ग्रहण करना ९-मोहिनी-रूपसे भगवान्‌के द्वारा अमृत बाँटा जाना १०-देवासुर-संग्राम ११-देवासुर-संग्रामकी समाप्ति १२-मोहिनीरूपको देखकर महादेवजीका मोहित होना १३-आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन १४-मनु आदिके पृथक्-पृथक् कर्मोंका निरूपण १५-राजा बलिकी स्वर्गपर विजय १६-कश्यपजीके द्वारा अदितिको पयोव्रतका उपदेश १७-भगवान्‌का प्रकट होकर अदितिको वर देना १८-वामनभगवान्‌का प्रकट होकर राजा बलिकी यज्ञशालामें पधारना १९-भगवान् वामनका बलिसे तीन पग पृथ्वी माँगना, बलिका वचन देना और शुक्राचार्यजीका उन्हें रोकना

२०-भगवान् वामनजीका विराट्रूप होकर दो ही पगसे पृथ्वी और स्वर्गको नाप लेना २१-बलिका बाँधा जाना २२-बलिके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और भगवान्‌का उसपर प्रसन्न होना २३-बलिका बन्धनसे छूटकर सुतललोकको जाना २४-भगवान्‌के मत्स्यावतारकी कथा

चतुःश्लोकी भागवत

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।१।।
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।२।।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।।३।।
एतावदेव जिज्ञास्यंतत्त्व जिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ।।४।।

सृष्टिके पूर्व केवल मैं-ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनोंका कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं-ही-मैं हूँ और इस सृष्टिके रूपमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूँ; और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ ।।१।। वास्तवमें न होनेपर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मामें दो चन्द्रमाओंकी तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होनेपर भी आकाश-मण्डलके नक्षत्रोंमें राहुकी भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिये ।।२।। जैसे प्राणियोंके पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरोंमें आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरोंके कार्यरूपसे निर्मित होनेके कारण प्रवेश करते भी हैं और पहलेसे ही उन स्थानों और रूपोंमें कारणरूपसे विद्यमान रहनेके कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियोंके शरीरकी दृष्टिसे मैं उनमें आत्माके रूपसे प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ।।३।। यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं—इस प्रकार निषेधकी पद्धतिसे और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है—इस अन्वयकी पद्धतिसे यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं, वे ही वास्तविक तत्त्व हैं। जो आत्मा अथवा परमात्माका तत्त्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जाननेकी आवश्यकता है ।।४।।

(श्रीमद्भा० २।९।३२-३५)

श्रीमद्भागवत-माहात्म्य

(स्वयं श्रीभगवान्‌के श्रीमुखसे ब्रह्माजीके प्रति कथित)

श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं लोकविश्रुतम्।
शृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो मम सन्तोषकारणम् ।।१।।
लोकविख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराणका प्रतिदिन श्रद्धायुक्त होकर श्रवण करना चाहिये। यही मेरे संतोषका कारण है।

नित्यं भागवतं यस्तु पुराणं पठते नरः।
प्रत्यक्षरं भवेत्तस्य कपिलादानजं फलम् ।।२।।
जो मनुष्य प्रतिदिन भागवतपुराणका पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षरके उच्चारणके साथ कपिला गौ दान देनेका पुण्य होता है।

श्लोकार्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम्।
पठते शृणुयाद् यस्तु गोसहस्रफलं लभेत् ।।३।।
जो प्रतिदिन भागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकका पाठ अथवा श्रवण करता है, उसे एक हजार गोदानका फल मिलता है।

यः पठेत् प्रयतो नित्यं श्लोकं भागवतं सुत।
अष्टादशपुराणानां फलमाप्नोति मानवः ।।४।।
पुत्र! जो प्रतिदिन पवित्रचित्त होकर भागवतके एक श्लोकका पाठ करता है, वह मनुष्य अठारह पुराणोंके पाठका फल पा लेता है।

नित्यं मम कथा यत्र तत्र तिष्ठन्ति वैष्णवाः।
कलिबाह्या नरास्ते वै येऽर्चयन्ति सदा मम ।।५।।
जहाँ नित्य मेरी कथा होती है, वहाँ विष्णुपार्षद प्रह्लाद आदि विद्यमान रहते हैं। जो मनुष्य सदा मेरे भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, वे कलिके अधिकारसे अलग हैं, उनपर कलिका वश नहीं चलता।

वैष्णवानां तु शास्त्राणि येऽर्चयन्ति गृहे नराः।
सर्वपापविनिर्मुक्ता भवन्ति सुरवन्दिताः ।।६।।
जो मानव अपने घरमें वैष्णवशास्त्रोंकी पूजा करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होकर देवताओंद्धारा वन्दित होते हैं।

येऽर्चयन्ति गृहे नित्यं शास्त्रं भागवतं कलौ।
आस्फोटयन्ति वल्गन्ति तेषां प्रीतो भवाम्यहम् ।।७।।

जो लोग कलियुगमें अपने घरके भीतर प्रतिदिन भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, वे [कलिसे निडर होकर] ताल ठोंकते और उछलते-कूदते हैं, मैं उनपर बहुत प्रसन्न रहता हूँ।

यावद्दिनानि हे पुत्र शास्त्रं भागवतं गृहे ।
तावत् पिबन्ति पितरः क्षीरं सर्पिर्मधूदकम् ॥८८॥

पुत्र! मनुष्य जितने दिनोंतक अपने घरमें भागवतशास्त्र रखता है, उतने समयतक उसके पितर दूध, घी, मधु और मीठा जल पीते हैं।

यच्छन्ति वैष्णवे भक्त्या शास्त्रं भागवतं हि ये ।
कल्पकोटिसहस्राणि मम लोके वसन्ति ते ॥८९॥

जो लोग विष्णुभक्त पुरुषको भक्तिपूर्वक भागवतशास्त्र समर्पण करते हैं, वे हजारों करोड़ कल्पोंतक (अनन्तकालतक) मेरे वैकुण्ठधाममें वास करते हैं।

येऽर्चयन्ति सदा गेहे शास्त्रं भागवतं नराः ।
प्रीणितास्तैश्च विबुधा यावदाभूतसंप्लवम् ॥९०॥

जो लोग सदा अपने घरमें भागवतशास्त्रका पूजन करते हैं, वे मानो एक कल्पतकके लिये सम्पूर्ण देवताओंको तृप्त कर देते हैं।

श्लोकार्धं श्लोकपादं वा वरं भागवतं गृहे ।
शतशोऽथ सहस्रैश्च किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः ॥९१॥

यदि अपने घरपर भागवतका आधा श्लोक या चौथाई श्लोक भी रहे, तो यह बहुत उत्तम बात है, उसे छोड़कर सैकड़ों और हजारों तरहके अन्य ग्रन्थोंके संग्रहसे भी क्या लाभ है?

न यस्य तिष्ठते शास्त्रं गृहे भागवतं कलौ ।
न तस्य पुनरावृत्तिर्यमपाशात् कदाचन ॥९२॥

कलियुगमें जिस मनुष्यके घरमें भागवतशास्त्र मौजूद नहीं है, उसको यमराजके पाशसे कभी छुटकारा नहीं मिलता।

कथं स वैष्णवो ज्ञेयः शास्त्रं भागवतं कलौ ।
गृहे न तिष्ठते यस्य श्वपचादधिको हि सः ॥९३॥

इस कलियुगमें जिसके घर भागवतशास्त्र मौजूद नहीं है, उसे कैसे वैष्णव समझा जाय? वह तो चाण्डालसे भी बढ़कर नीच है!

सर्वस्वेनापि लोकेश कर्तव्यः शास्त्रसंग्रहः ।
वैष्णवस्तु सदा भक्त्या तुष्ट्यर्थं मम पुत्रक ॥९४॥

लोकेश ब्रह्मा! पुत्र! मनुष्यको सदा मुझे भक्ति-पूर्वक संतुष्ट करनेके लिये अपना सर्वस्व देकर भी वैष्णवशास्त्रोंका संग्रह करना चाहिये।

यत्र यत्र भवेत् पुण्यं शास्त्रं भागवतं कलौ ।

तत्र तत्र सदैवाहं भवामि त्रिदशैः सह ॥१५॥ कलियुगमें जहाँ-जहाँ पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ-वहाँ सदा ही मैं देवताओंके साथ उपस्थित रहता हूँ । तत्र सर्वाणि तीर्थानि नदीनदसरांसि च । यज्ञाः सप्तपुरी नित्यं पुण्याः सर्वे शिलोच्चयाः ॥१६॥ यही नहीं—वहाँ नदी, नद और सरोवररूपमें प्रसिद्ध सभी तीर्थ वास करते हैं; सम्पूर्ण यज्ञ, सात पुरियाँ और सभी पावन पर्वत वहाँ नित्य निवास करते हैं । श्रोतव्यं मम शास्त्रं हि यशोधर्मजयार्थिना । पापक्षयार्थं लोकेश मोक्षार्थं धर्मबुद्धिना ॥१७॥ लोकेश! यश, धर्म और विजयके लिये तथा पापक्षय एवं मोक्षकी प्राप्तिके लिये धर्मात्मा मनुष्यको सदा ही मेरे भागवतशास्त्रका श्रवण करना चाहिये । श्रीमद्भागवतं पुण्यमायुरारोग्यपुष्टिदम् । पठनाच्छ्रवणाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१८॥ यह पावन पुराण श्रीमद्भागवत आयु, आरोग्य और पुष्टिको देनेवाला है; इसका पाठ अथवा श्रवण करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । न शृण्वन्ति न हृष्यन्ति श्रीमद्भागवतं परम् । सत्यं सत्यं हि लोकेश तेषां स्वामी सदा यमः ॥१९॥ लोकेश! जो इस परम उत्तम भागवतको न तो सुनते हैं और न सुनकर प्रसन्न ही होते हैं, उनके स्वामी सदा यमराज ही हैं—वे सदा यमराजके ही वशमें रहते हैं—यह मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ । न गच्छति यदा मर्त्यः श्रोतुं भागवतं सुत । एकादश्यां विशेषेण नास्ति पापरतस्ततः ॥२०॥ पुत्र! जो मनुष्य सदा ही—विशेषतः एकादशीको भागवत सुनने नहीं जाता, उससे बढ़कर पापी कोई नहीं है । श्लोकं भागवतं चापि श्लोकार्धं पादमेव वा । लिखितं तिष्ठते यस्य गृहे तस्य वसाम्यहम् ॥२१॥ जिसके घरमें एक श्लोक, आधा श्लोक अथवा श्लोकका एक ही चरण लिखा रहता है, उसके घरमें मैं निवास करता हूँ । सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा पावनं नृणां श्रीमद्भागवतं यथा ॥२२॥ मनुष्यके लिये सम्पूर्ण पुण्य-आश्रमोंकी यात्रा या सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा पवित्रकारक नहीं है, जैसा श्रीमद्भागवत है ।

यत्र यत्र चतुर्वक्त्र श्रीमद्भागवतं भवेत् । गच्छामि तत्र तत्राहं गौर्यथा सुतवत्सला ॥२३॥ चतुर्मुख! जहाँ-जहाँ भागवतकी कथा होती है, वहाँ-वहाँ मैं उसी प्रकार जाता हूँ, जैसे पुत्रवत्सला गौ अपने बछड़ेके पीछे-पीछे जाती है ।

मत्कथावाचकं नित्यं मत्कथाश्रवणे रतम् । मत्कथाप्रीतमनसं नाहं त्यक्ष्यामि तं नरम् ॥२४॥ जो मेरी कथा कहता है, जो सदा उसे सुननेमें लगा रहता है तथा जो मेरी कथासे मन-ही-मन प्रसन्न होता है, उस मनुष्यका मैं कभी त्याग नहीं करता ।

श्रीमद्भागवतं पुण्यं दृष्ट्वा नोत्तिष्ठते हि यः । सांवत्सरं तस्य पुण्यं विलयं याति पुत्रक ॥२५॥ पुत्र! जो परम पुण्यमय श्रीमद्भागवतशास्त्रको देखकर अपने आसनसे उठकर खड़ा नहीं हो जाता, उसका एक वर्षका पुण्य नष्ट हो जाता है ।

श्रीमद्भागवतं दृष्ट्वा प्रत्युत्थानाभिवादनैः । सम्मानयेत तं दृष्ट्वा भवेत् प्रीतिर्ममातुला ॥२६॥ जो श्रीमद्भागवतपुराणको देखकर खड़ा होने और प्रणाम करने आदिके द्वारा उसका सम्मान करता है, उस मनुष्यको देखकर मुझे अनुपम आनन्द मिलता है ।

दृष्ट्वा भागवतं दूरात् प्रक्रमेत् सम्मुखं हि यः । पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥२७॥ जो श्रीमद्भागवतको दूरसे ही देखकर उसके सम्मुख जाता है, वह एक-एक पगपर अश्वमेध यज्ञके पुण्यको प्राप्त करता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।

उत्थाय प्रणमेद् यो वै श्रीमद्भागवतं नरः । धनपुत्रांस्तथा दारान् भक्तिं च प्रददाम्यहम् ॥२८॥ जो मानव खड़ा होकर श्रीमद्भागवतको प्रणाम करता है, उसे मैं धन, स्त्री, पुत्र और अपनी भक्ति प्रदान करता हूँ ।

महाराजोपचारैस्तु श्रीमद्भागवतं सुत । शृण्वन्ति ये नरा भक्त्या तेषां वश्यो भवाम्यहम् ॥२९॥ हे पुत्र! जो लोग महाराजोचित सामग्रियोंसे युक्त होकर भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा सुनते हैं, मैं उनके वशीभूत हो जाता हूँ ।

ममोत्सवेषु सर्वेषु श्रीमद्भागवतं परम् । शृण्वन्ति ये नरा भक्त्या मम प्रीत्यै च सुव्रत ॥३०॥ वस्त्रालङ्करणैः पुष्पैर्धूपदीपोपहारकैः ।

वशीकृतो ह्यहं तैश्च सत्स्त्रिया सत्पतिर्यथा ।।३१।। सुव्रत! जो लोग मेरे पर्वोंसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी उत्सवोंमें मेरी प्रसन्नताके लिये वस्त्र, आभूषण, पुष्प, धूप और दीप आदि उपहार अर्पण करते हुए परम उत्तम श्रीमद्भागवतपुराणका भक्तिपूर्वक श्रवण करते हैं, वे मुझे उसी प्रकार अपने वशमें कर लेते हैं, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने साधुस्वभाववाले पतिको वशमें कर लेती है । (स्कन्दपुराण, विष्णुखण्ड, मार्गशीर्षमाहात्म्य अ० १६)

श्रीशुकदेवजीको नमस्कार

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
  द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-
  स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ।।
$$\text{(१।२।२)}$$

जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे—‘बेटा! बेटा!’ उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया। ऐसे, सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ।

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-
  मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् ।
संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं
  तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ।।
$$\text{(१।२।३)}$$

यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय-रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करनेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ।

स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो-
  ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् ।
व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं
  तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ।।
$$\text{(१२।१२।६८)}$$

श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न थे। इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी। फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मंगलमयी मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया। मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार

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करता हूँ।

श्रीमद्भागवतकी महिमा

श्रीमद्भागवतकी महिमा मैं क्या लिखूँ? उसके आदिके तीन श्लोकोंमें जो महिमा कह दी गयी है, उसके बराबर कौन कह सकता है? उन तीनों श्लोकोंको कितनी ही बार पढ़ चुकनेपर भी जब उनका स्मरण होता है, मनमें अद्भुत भाव उदित होते हैं। कोई अनुवाद उन श्लोकोंकी गम्भीरता और मधुरताको पा नहीं सकता। उन तीनों श्लोकोंसे मनको निर्मल करके फिर इस प्रकार भगवान्का ध्यान कीजिये—

ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।
औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ।।
प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ।।
रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम् ।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद् दुर्मना इव ।।

मुझको श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रेम है। मेरा विश्वास और अनुभव है कि इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्यको ईश्वरका सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और उनके चरणकमलोंमें अचल भक्ति होती है। इसके पढ़नेसे मनुष्यको दृढ़ निश्चय हो जाता है कि इस संसारको रचने और पालन करनेवाली कोई सर्वव्यापक शक्ति है—

एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात ।
सिरजत, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात ।।

इसी एक शक्तिको लोग ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा इत्यादि अनेक नामोंसे पुकारते हैं। भागवतके पहले ही श्लोकमें वेदव्यासजीने ईश्वरके स्वरूपका वर्णन किया है कि जिससे इस संसारकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, जो त्रिकालमें सत्य है—अर्थात् जो सदा रहा भी, है भी और रहेगा भी—और जो अपने प्रकाशसे अन्धकारको सदा दूर रखता है, उस परम सत्यका हम ध्यान करते हैं। उसी स्थानमें श्रीमद्भागवतका स्वरूप भी इस प्रकारसे संक्षेपमें वर्णित है कि इस भागवतमें—जो दूसरोंकी बढ़ती देखकर डाह नहीं करते, ऐसे साधुजनोंका सब प्रकारके स्वार्थसे रहित परम धर्म और वह जाननेके योग्य ज्ञान वर्णित है जो वास्तवमें सब कल्याणका देनेवाला और आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—इन तीनों प्रकारके तापोंको मिटानेवाला है। और ग्रन्थोंसे क्या, जिन सुकृतियोंने पुण्यके कर्म कर रखे हैं और जो श्रद्धासे भागवतको पढ़ते या सुनते हैं, वे इसका सेवन करनेके समयसे ही अपनी भक्तिसे ईश्वरको अपने हृदयमें अविचलरूपसे स्थापित कर लेते हैं। ईश्वरका ज्ञान और उनमें भक्तिका परम साधन—ये दो पदार्थ जब किसी प्राणीको प्राप्त हो गये तो कौन-सा पदार्थ रह गया, जिसके लिये मनुष्य कामना करे और ये दोनों पदार्थ श्रीमद्भागवतसे पूरी मात्रामें प्राप्त होते हैं। इसीलिये यह पवित्र ग्रन्थ मनुष्यमात्रका उपकारी है। जबतक मनुष्य भागवतको पढ़े

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