श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर विभीषण-सहित भयानक पराक्रमी लक्ष्मणने अपना श्रेष्ठ धनुष हाथमें लिया॥ २४ ॥
वे युद्धकी सब सामग्री लेकर तैयार हो गये। उन्होंने कवच धारण किया, तलवार बाँध ली और उत्तम बाण तथा बायें हाथमें धनुष ले लिये। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीके चरण छूकर हर्षसे भरे हुए सुमित्राकुमारने कहा— ॥ २५ ॥
‘आर्य! आज मेरे धनुषसे छूटे हुए बाण रावणकुमारको विदीर्ण करके उसी तरह लङ्कामें गिरेंगे, जैसे हंस कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें उतरते हैं॥ २६ ॥
‘इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज ही उस भयंकर राक्षसके शरीरको विदीर्ण करके उसे कालके गालमें डाल देंगे’॥ २७ ॥
इन्द्रजित्के वधकी अभिलाषा रखनेवाले तेजस्वी लक्ष्मण अपने भाईके सामने ऐसी बात कहकर तुरंत वहाँसे चल दिये॥ २८ ॥
पहले उन्होंने अपने बड़े भाईके चरणोंमें प्रणाम किया, फिर उनकी परिक्रमा करके रावणकुमारद्वारा पालित निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया॥ २९ ॥
भाई श्रीरामद्वारा स्वस्तिवाचन किये जानेके पश्चात् विभीषणसहित प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण बड़ी उतावलीके साथ चले॥ ३० ॥
कई हजार वानरवीरोंके साथ हनुमान् और मन्त्रियोंसहित विभीषण भी लक्ष्मणके पीछे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए॥ ३१ ॥
विशाल वानर-सेनासहित घिरे हुए लक्ष्मणने वेगपूर्वक आगे बढ़कर मार्गमें खड़ी हुई ऋक्षराज जाम्बवान्की सेनाको देखा॥ ३२ ॥
दूरतकका रास्ता तै कर लेनेपर मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमारने कुछ दूरसे ही देखा, राक्षसराज रावणकी सेना मोर्चा बाँधे खड़ी है॥ ३३ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण हाथमें धनुष ले ब्रह्माजीके निश्चित किये हुए विधानके अनुसार उस मायावी राक्षसको जीतनेके लिये निकुम्भिला नामक स्थानमें पहुँचकर एक जगह खड़े हो गये॥ ३४ ॥
उस समय प्रतापी राजकुमार लक्ष्मणके साथ विभीषण, वीर अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान् भी थे॥
चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे जो प्रकाशित हो रही थी, ध्वजों और महारथियोंके कारण गहन दिखायी देती थी, जिसके वेगका कोई माप नहीं था तथा जो अनेक प्रकारकी वेश-भूषामें दृष्टिगोचर होती थी, अन्धकारके समान काली उस शत्रुसेनामें विभीषण आदिके साथ लक्ष्मणने प्रवेश किया॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५ ॥
छियासीवाँ सर्ग
छियासीवाँ सर्ग
वानरों और राक्षसोंका युद्ध, हनुमान्जीके द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजित्को द्वन्द्वयुद्धके लिये ललकारना तथा लक्ष्मणका उसे देखना
उस अवस्थामें रावणके छोटे भाई विभीषणने लक्ष्मणसे ऐसी बात कही, जो उनके अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाली तथा शत्रुओंके लिये अहितकर थी॥ १ ॥
वे बोले—'लक्ष्मण! यह सामने जो मेघोंकी काली घटाके समान राक्षसोंकी सेना दिखायी देती है, उसके साथ शिलारूपी आयुध धारण करनेवाले वानरवीर शीघ्र ही युद्ध छेड़ दें और आप भी इस विशाल वाहिनीके व्यूहका भेदन करनेका प्रयत्न करें। इसका मोर्चा टूटनेपर राक्षसराजका पुत्र इन्द्रजित् भी हमें यहीं दिखायी देगा॥ २-३ ॥
'अतः आप इस हवन-कर्मकी समाप्तिके पहले ही वज्रतुल्य बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर शीघ्र धावा कीजिये॥ ४ ॥
'वीर! वह दुरात्मा रावणकुमार बड़ा ही मायावी, अधर्मी, क्रूर कर्म करनेवाला और सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर है; अतः इसका वध कीजिये'॥ ५ ॥
विभीषणकी यह बात सुनकर शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणने राक्षसराजके पुत्रको लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६ ॥
साथ ही बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानर और भालू भी वहाँ खड़ी हुई राक्षस-सेनापर एक साथ ही टूट पड़े॥ ७ ॥
उधरसे राक्षस भी वानरसेनाको नष्ट करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें तीखे बाणों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंका प्रहार करते हुए उनका सामना करने लगे॥ ८ ॥
इस प्रकार वानरों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध होने लगा। उसके महान् कोलाहलसे समूची लङ्कापुरी सब ओरसे गूँज उठी॥ ९ ॥
नाना प्रकारके शस्त्रों, पैने बाणों, उठे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत-शिखरोंसे वहाँका आकाश आच्छादित हो गया॥ १० ॥
विकट मुँह और बाँहोंवाले राक्षसोंने वानरयूथ पतियोंपर (नाना प्रकारके) शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उनके लिये महान् भय उपस्थित कर दिया॥ ११ ॥
उसी प्रकार वानर भी समराङ्गणमें सम्पूर्ण वृक्षों और पर्वतशिखरोंद्वारा समस्त राक्षसोंको मारने एवं हताहत करने लगे॥ १२ ॥
मुख्य-मुख्य महाकाय महाबली रीछों और वानरोंसे जूझते हुए राक्षसोंको महान् भय लगने लगा॥ १३ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित् बड़ा दुर्धर्ष वीर था। उसने जब सुना कि मेरी सेना शत्रुओंद्वारा पीड़ित होकर बड़े दुःखमें पड़ गयी है, तब अनुष्ठान समाप्त होनेके पहले ही वह युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ॥ १४ ॥
उस समय उसके मनमें बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ था। वह वृक्षोंके अन्धकारसे निकलकर एक सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ, जो पहलेसे ही जोतकर तैयार रखा गया था। वह रथ बहुत ही सुदृढ़ था॥ १५ ॥
इन्द्रजित्के हाथमें भयंकर धनुष और बाण थे। वह काले कोयलेके ढेर-सा जान पड़ता था। उसके मुँह और नेत्र लाल थे। वह भयंकर राक्षस विनाशकारी मृत्युके समान प्रतीत होता था॥ १६ ॥
इन्द्रजित् रथपर बैठ गया, यह देखते ही लक्ष्मणके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाले भयंकर वेगशाली राक्षसोंकी वह सेना उसके आसपास सब ओर खड़ी हो गयी॥ १७ ॥
उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीने एक बहुत बड़े वृक्षको, जिसे तोड़ना या उखाड़ना कठिन था, उखाड़ लिया॥ १८ ॥
फिर तो वे वानरवीर प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे और युद्धस्थलमें राक्षसोंकी उस सेनाको दग्ध करते हुए बहुसंख्यक वृक्षोंकी मारसे अचेत करने लगे॥
पवनकुमार हनुमान्जी बड़े वेगसे राक्षस-सेनाका विध्वंस कर रहे हैं, यह देखते ही सहस्रों राक्षस उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे॥ २० ॥
चमकीले शूल धारण करनेवाले राक्षस शूलोंसे, जिनके हाथोंमें तलवारें थीं वे तलवारोंसे, शक्तिधारी शक्तियोंसे और पट्टिशधारी राक्षस पट्टिशोंसे उनपर प्रहार करने लगे॥ २१ ॥
बहुत-से परिघों, गदाओं, सुन्दर भालों, सैकड़ों शतघ्नियों, लोहेके बने हुए मुद्गरों, भयानक फरसों, भिन्दिपालों, वज्रके समान मुक्कों और अशनितुल्य थप्पड़ोंसे वे समस्त राक्षस पास
आकर सब ओरसे पर्वताकार हनुमान्जीपर प्रहार करने लगे। हनुमान्जीने कुपित होकर उनका भी महान् संहार किया॥ २२—२४ ॥
इन्द्रजित्ने देखा, कपिवर पवनकुमार हनुमान् पर्वतके समान अचल हो निःशङ्कभावसे अपने शत्रुओंका संहार कर रहे हैं॥ २५ ॥
यह देखकर उसने अपने सारथिसे कहा— ‘जहाँ यह वानर युद्ध करता है, वहीं चलो। यदि उसकी उपेक्षा की गयी तो यह हम सब राक्षसोंका विनाश ही कर डालेगा’॥ २६ ॥
उसके ऐसा कहनेपर सारथि रथपर बैठे हुए अत्यन्त दुर्जय वीर इन्द्रजित्को ढोता हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्जी विराजमान थे॥ २७ ॥
वहाँ पहुँचकर उस दुर्जय राक्षसने हनुमान्जीके मस्तकपर बाणों, तलवारों, पट्टिशों और फरसोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ २८ ॥
उन भयानक शस्त्रोंको अपने शरीरपर झेलकर पवनपुत्र हनुमान्जी महान् रोषसे भर गये और इस प्रकार बोले— ॥ २९ ॥
‘दुर्बुद्धि रावणकुमार! यदि बड़े शूरवीर हो तो आओ, मेरे साथ मल्लयुद्ध करो। इस वायुपुत्रसे भिड़कर जीवित नहीं लौट सकोगे॥ ३० ॥
‘दुर्मते! अपनी भुजाओंद्वारा मेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध करो। इस बाहुयुद्धमें यदि मेरा वेग सह लो तो तुम राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर समझे जाओगे’॥ ३१ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित् धनुष उठाकर हनुमान्जीका वध करना चाहता था। इसी अवस्थामें विभीषणने लक्ष्मणको उसका परिचय दिया— ॥ ३२ ॥
‘सुमित्रानन्दन! रावणका जो पुत्र इन्द्रको भी जीत चुका है, वही यह रथपर बैठकर हनुमान्जीका वध करना चाहता है। अतः आप शत्रुओंका विदारण करनेवाले, अनुपम आकार-प्रकारसे युक्त एवं प्राणान्तकारी भयंकर बाणोंद्वारा उस रावणकुमारको मार डालिये’॥ ३३-३४ ॥
शत्रुओंको भयभीत करनेवाले विभीषणके ऐसा कहनेपर उस समय महात्मा लक्ष्मणने रथपर बैठे हुए उस भयंकर बलशाली पर्वताकार दुर्जय राक्षसको देखा॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८६ ॥
सतासीवाँ सर्ग
सतासीवाँ सर्ग
इन्द्रजित् और विभीषणकी रोषपूर्ण बातचीत
पूर्वोक्त बात कहकर हर्षसे भरे हुए विभीषण धनुर्धर सुमित्राकुमारको साथ लेकर बड़े वेगसे आगे बढ़े॥ १ ॥
थोड़ी ही दूर जानेपर विभीषणने एक महान् वनमें प्रवेश करके लक्ष्मणको इन्द्रजित्के कर्मानुष्ठानका स्थान दिखाया॥ २ ॥
वहाँ एक बरगदका वृक्ष था, जो श्याममेघके समान सघन और देखनेमें भयंकर था। रावणके तेजस्वी भ्राता विभीषणने लक्ष्मणको वहाँकी सब वस्तुएँ दिखाकर कहा—॥ ३ ॥
‘सुमित्रानन्दन! यह बलवान् रावणकुमार प्रतिदिन यहीं आकर पहले भूतोंको बलि देता, उसके बाद युद्धमें प्रवृत्त होता है॥ ४ ॥
‘इसीसे संग्रामभूमिमें यह राक्षस सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य हो जाता है और उत्तम बाणोंसे शत्रुओंको मारता तथा बाँध लेता है॥ ५ ॥
‘अतः जबतक यह इस बरगदके नीचे आये, उसके पहले ही आप अपने तेजस्वी बाणोंद्वारा इस बलवान् रावण-कुमारको रथ, घोड़े और सारथिसहित नष्ट कर दीजिये’॥
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी सुमित्राकुमार अपने विचित्र धनुषकी टंकार करते हुए वहाँ खड़े हो गये॥ ७ ॥
इतनेमें ही बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित् अग्निके समान तेजस्वी रथपर बैठा हुआ कवच, खड्ग और ध्वजाके साथ दिखायी पड़ा॥ ८ ॥
तब महातेजस्वी लक्ष्मणने पराजित न होनेवाले पुलस्त्यकुलनन्दन इन्द्रजित्से कहा—‘राक्षसकुमार! मैं तुम्हें युद्धके लिये ललकारता हूँ। तुम अच्छी तरह सँभलकर मेरे साथ युद्ध करो’॥ ९ ॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी और मनस्वी रावणकुमारने वहाँ विभीषणको उपस्थित देख कठोर शब्दोंमें कहा—॥ १० ॥
‘राक्षस! यहीं तुम्हारा जन्म हुआ और यहीं बढ़कर तुम इतने बड़े हुए। तुम मेरे पिताके सगे भाई और मेरे चाचा हो। फिर तुम अपने पुत्रसे—मुझसे क्यों द्रोह करते हो?॥ ११ ॥
‘दुर्मते! तुममें न तो कुटुम्बीजनोंके प्रति अपनापनका भाव है, न आत्मीयजनोंके प्रति स्नेह है और न अपनी जातिका अभिमान ही है। तुममें कर्तव्य-अकर्तव्यकी मर्यादा, भ्रातृप्रेम और धर्म कुछ भी नहीं है। तुम राक्षस-धर्मको कलंकित करनेवाले हो॥ १२ ॥
‘दुर्बुद्धे! तुमने स्वजनोंका परित्याग करके दूसरोंकी गुलामी स्वीकार की है। अतः तुम सत्पुरुषोंद्वारा निन्दनीय और शोकके योग्य हो॥ १३ ॥
‘नीच निशाचर! तुम अपनी शिथिल बुद्धिके द्वारा इस महान् अन्तरको नहीं समझ पा रहे हो कि कहाँ तो स्वजनोंके साथ रहकर स्वच्छन्दताका आनन्द लेना और कहाँ दूसरोंकी गुलामी करके जीना है॥ १४ ॥
‘दूसरे लोग कितने ही गुणवान् क्यों न हों और स्वजन गुणहीन ही क्यों न हो? वह गुणहीन स्वजन भी दूसरोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ ही है; क्योंकि दूसरा दूसरा ही होता है (वह कभी अपना नहीं हो सकता)॥ १५ ॥
‘जो अपने पक्षको छोड़कर दूसरे पक्षके लोगोंका सेवन करता है, वह अपने पक्षके नष्ट हो जानेपर फिर उन्हींके द्वारा मार डाला जाता है॥ १६ ॥
‘रावणके छोटे भाई निशाचर! तुमने लक्ष्मणको इस स्थानतक ले आकर मेरा वध करानेके लिये प्रयत्न करके यह जैसी निर्दयता दिखायी है, ऐसा पुरुषार्थ तुम्हारे-जैसा स्वजन ही कर सकता है—तुम्हारे सिवा दूसरे किसी स्वजनके लिये ऐसा करना सम्भव नहीं है’॥ १७ ॥
अपने भतीजेके ऐसा कहनेपर विभीषणने उत्तर दिया—‘राक्षस! तू आज ऐसी शेखी क्यों बघारता है? जान पड़ता है तुझे मेरे स्वभावका पता ही नहीं है॥ १८ ॥
‘अधम! राक्षसराजकुमार! बड़ोंके बड़प्पनका ख्याल करके तू इस कठोरताका परित्याग कर दे। यद्यपि मेरा जन्म क्रूरकर्मा राक्षसोंके कुलमें ही हुआ है, तथापि मेरा शील-स्वभाव राक्षसोंका-सा नहीं है। सत्पुरुषोंका जो प्रधान गुण सत्त्व है, मैंने उसीका आश्रय ले रखा है॥
‘क्रूरतापूर्ण कर्ममें मेरा मन नहीं लगता। अधर्ममें मेरी रुचि नहीं होती। यदि अपने भाईका शील-स्वभाव अपनेसे न मिलता हो तो भी बड़ा भाई छोटे भाईको कैसे घरसे निकाल सकता है? (परंतु मुझे घरसे निकाल दिया गया, फिर मैं दूसरे सत्पुरुषका आश्रय क्यों न लूँ?)॥ २० ॥
‘जिसका शील-स्वभाव धर्मसे भ्रष्ट हो गया हो, जिसने पाप करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया हो, ऐसे पुरुषका त्याग करके प्रत्येक प्राणी उसी प्रकार सुखी होता है, जैसे हाथपर बैठे हुए
जहरीले सर्पको त्याग देनेसे मनुष्य निर्भय हो जाता है॥ २१ ॥
‘जो दूसरोंका धन लूटता हो और परायी स्त्रीपर हाथ लगाता हो, उस दुरात्माको जलते हुए घरकी भाँति त्याग देने योग्य बताया गया है॥ २२ ॥
‘पराये धनका अपहरण, परस्त्रीके साथ संसर्ग और अपने हितैषी सुहृदोंपर अधिक शङ्का—अविश्वास— ये तीन दोष विनाशकारी बताये गये हैं॥ २३ ॥
‘महर्षियोंका भयंकर वध, सम्पूर्ण देवताओंके साथ विरोध, अभिमान, रोष, वैर और धर्मके प्रतिकूल चलना—ये दोष मेरे भाईमें मौजूद हैं, जो उसके प्राण और ऐश्वर्य दोनोंका नाश करनेवाले हैं। जैसे बादल पर्वतोंको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार इन दोषोंने मेरे भाईके सारे गुणोंको ढक दिया है॥ २४-२५ ॥
‘इन्हीं दोषोंके कारण मैंने अपने भाई एवं तेरे पिताका त्याग किया है। अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तू रहेगा और न तेरे पिता ही रह जायँगे॥ २६ ॥
‘राक्षस! तू अत्यन्त अभिमानी, उद्दण्ड और बालक (मूर्ख) है, कालके पाशमें बँधा हुआ है; इसलिये तेरी जो-जो इच्छा हो, मुझे कह ले॥ २७ ॥
‘नीच राक्षस! तूने मुझसे जो कठोर बात कही है, उसीका यह फल है कि आज तुझपर यहाँ घोर संकट आया है। अब तू बरगदके नीचेतक नहीं जा सकता॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण लक्ष्मणका तिरस्कार करके तू जीवित नहीं रह सकता; अतः इन नरदेव लक्ष्मणके साथ रणभूमिमें युद्ध कर। यहाँ मारा जाकर तू यमलोकमें पहुँचेगा और देवताओंका कार्य करेगा (उन्हें संतुष्ट करेगा)॥
‘अब तू अपना बढ़ा हुआ सारा बल दिखा’ समस्त आयुधों और सायकोंका व्यय कर ले; परंतु लक्ष्मणके बाणोंका निशाना बनकर आज तू सेनासहित जीवित नहीं लौट सकेगा’॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८७ ॥
अट्ठासीवाँ सर्ग
अट्ठासीवाँ सर्ग
लक्ष्मण और इन्द्रजित्की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध
विभीषणकी यह बात सुनकर रावणकुमार इन्द्रजित् क्रोधसे मूर्च्छित-सा हो उठा। वह रोषपूर्वक कठोर बातें कहने लगा और उछलकर सामने आ गया॥ १ ॥
उसने खड्ग तथा दूसरे आयुध भी उठा रखे थे। काले घोड़ोंसे युक्त, सजे-सजाये विशाल रथपर बैठा हुआ इन्द्रजित् विनाशकारी कालके समान जान पड़ता था॥ २ ॥
वह भयंकर बलशाली निशाचर बहुत बड़े आकारवाले, लंबे, मजबूत, वेगशाली और भयानक धनुषको तथा शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ बाणोंको भी लेकर युद्धके लिये उद्यत था॥ ३ ॥
वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत होकर रथपर बैठे हुए उस महाधनुर्धर, शत्रुनाशक बलवान् रावणकुमारने देखा, लक्ष्मण अपने तेजसे ही विभूषित हो हनुमान्जीकी पीठपर आरूढ़ होकर उदयाचलपर विराजमान सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे हैं॥ ४ ½ ॥
देखते ही वह अत्यन्त रोषसे भर गया और विभीषणसहित सुमित्राकुमार तथा अन्य वानरसिंहोंसे कहा—‘शत्रुओ! आज मेरा पराक्रम देखना। तुम सब लोग युद्धस्थलमें मेरे धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी दुःसह वर्षाको अपने अङ्गोंपर उसी तरह धारण करोगे, जैसे आकाशमें होनेवाली उन्मुक्त वर्षाको भूतलके प्राणी अपने ऊपर धारण करते हैं॥ ५-६ ½ ॥
‘जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज तुम्हारे शरीरोंकी धज्जियाँ उड़ा देंगे॥ ७ ॥
‘आज अपने शूल, शक्ति, ऋष्टि और तोमरोंद्वारा तथा तीखे सायकोंसे छिन्न-भिन्न करके तुम सब लोगोंको यमलोक पहुँचा दूँगा॥ ८ ॥
‘युद्धस्थलमें हाथोंको बड़ी फुर्तीसे चलाकर जब मैं मेघके समान गर्जता हुआ बाणोंकी वर्षा आरम्भ करूँगा, उस समय कौन मेरे सामने ठहर सकेगा?॥ ९ ॥
‘लक्ष्मण! उस दिन रात्रियुद्धमें मैंने वज्र और अशनिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा जो पहले तुम दोनों भाइयोंको रणभूमिमें सुला दिया था और तुमलोग अपने अग्रगामी सैनिकोंसहित मूर्च्छित होकर पड़े थे, मैं समझता हूँ, उसका इस समय तुम्हें स्मरण नहीं हो रहा है। विषधर
सर्पके समान रोषसे भरे हुए मुझ इन्द्रजित्के साथ जो तुम युद्ध करनेके लिये उपस्थित हो गये, उससे स्पष्ट जान पड़ता है कि यमलोकमें जानेके लिये उद्यत हो'॥ १०-११ ॥
राक्षसराजके बेटेकी वह गर्जना सुनकर रघुकुलनन्दन लक्ष्मण कुपित हो उठे। उनके मुखपर भयका कोई चिह्न नहीं था। वे उस रावणकुमारसे बोले—॥ १२ ॥
‘निशाचर! तुमने केवल वाणीद्वारा अपने शत्रुवध आदि कार्योंकी पूर्तिके लिये घोषणा कर दी; परंतु उन कार्योंको पूरा करना तुम्हारे लिये बहुत ही कठिन है। जो क्रियाद्वारा कर्तव्यकर्मोंके पार पहुँचता है अर्थात् जो कहता नहीं, काम पूरा करके दिखा देता है, वही पुरुष बुद्धिमान् है॥ १३ ॥
‘दुर्मते! तुम अपने अभीष्ट कार्यको सिद्ध करनेमें असमर्थ हो। जो कार्य किसीके द्वारा भी सिद्ध होना कठिन है, उसे केवल वाणीके द्वारा कहकर तुम अपनेको कृतार्थ मान रहे हो!॥ १४ ॥
‘उस दिन संग्राममें अपनेको छिपाकर तुमने जिसका आश्रय लिया था, वह चोरोंका मार्ग है। वीर पुरुष उसका सेवन नहीं करते॥ १५ ॥
‘राक्षस! इस समय मैं तुम्हारे बाणोंके मार्गमें आकर खड़ा हूँ। आज तुम अपना वह तेज दिखाओ। केवल बढ़-बढ़कर बातें क्यों बना रहे हो?’॥ १६ ॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर संग्रामविजयी महाबली इन्द्रजित्ने अपने भयंकर धनुषको दृढ़तापूर्वक पकड़कर पैने बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी॥ १७ ॥
उसके छोड़े हुए महान् वेगशाली बाण साँपके विषकी तरह जहरीले थे। वे फुफकारते हुए सर्पके समान लक्ष्मणके शरीरपर पड़ने लगे॥ १८ ॥
वेगवान् रावणकुमार इन्द्रजित्ने उन अत्यन्त वेगशाली बाणोंद्वारा युद्धमें शुभलक्षण लक्ष्मणको घायल कर दिया॥ १९ ॥
बाणोंसे उनका शरीर अत्यन्त क्षत-विक्षत हो गया। वे रक्तसे नहा उठे। उस अवस्थामें श्रीमान् लक्ष्मण धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान शोभा पा रहे थे॥
इन्द्रजित् अपना यह पराक्रम देख लक्ष्मणके पास जा बड़े जोरसे गर्जना करके यों बोला—॥ २१ ॥
‘सुमित्राकुमार! मेरे धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले पंखधारी बाण शत्रुके जीवनका अन्त कर देनेवाले हैं। ये आज तुम्हारे प्राण लेकर ही रहेंगे॥ २२ ॥
‘लक्ष्मण! आज मेरे द्वारा मारे जाकर जब तुम्हारे प्राण निकल जायँगे, तब तुम्हारी लाशपर झुंड-के-झुंड गीदड़, बाज और गीध टूट पड़ेंगे॥ २३ ॥
‘परम दुर्बुद्धि राम तुम-जैसे अनार्य, क्षत्रियाधम एवं अपने भक्त भाईको आज ही मेरे द्वारा मारा गया देखेंगे॥
‘सुमित्राकुमार! तुम्हारा कवच खिसककर पृथ्वीपर गिर जायगा, धनुष भी दूर जा पड़ेगा और तुम्हारा मस्तक भी धड़से अलग कर दिया जायगा। इस अवस्थामें राम आज मेरे हाथसे मारे गये तुमको देखेंगे’॥ २५ ॥
इस तरह कठोर बातें कहते हुए रावणकुमार इन्द्रजित्से अपने प्रयोजनको जाननेवाले लक्ष्मणने कुपित होकर यह युक्तियुक्त उत्तर दिया—॥ २६ ॥
‘क्रूरकर्म करनेवाले दुर्बुद्धि राक्षस! बकवासका बल छोड़ दे। तू ये सब बातें कहता क्यों है? करके दिखा॥
‘निशाचर! जो काम अभी किया नहीं, उसके लिये यहाँ व्यर्थ डींग क्यों हाँकता है ? तू जिसे कहता है, उस कार्यको पूरा कर, जिससे मुझे तेरी इस बढ़ाचढ़ाकर कही हुई बातपर विश्वास हो॥ २८ ॥
‘नरभक्षी राक्षस! तू देख लेना, मैं कोई कठोर बात न कहकर तेरे ऊपर किसी तरहका आक्षेप न करके आत्मप्रशंसा किये बिना ही तेरा वध करूँगा’॥
ऐसा कहकर लक्ष्मणने उस राक्षसकी छातीमें बड़े वेगसे पाँच नाराच मारे, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये थे॥ ३० ॥
सुन्दर पंखोंके कारण अत्यन्त वेगसे जानेवाले और प्रज्वलित सर्पके समान दिखायी देनेवाले वे बाण उस राक्षसकी छातीपर सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ ३१ ॥
लक्ष्मणके बाणोंसे आहत होकर रावणकुमार रोषसे आगबबूला हो उठा। उसने अच्छी तरह चलाये हुए तीन बाणोंसे लक्ष्मणको भी घायल करके बदला चुकाया॥ ३२ ॥
एक ओर पुरुषसिंह लक्ष्मण थे तो दूसरी ओर राक्षससिंह इन्द्रजित्। दोनों युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर विजय पाना चाहते थे। उन दोनोंका वह तुमुल संग्राम महाभयंकर था॥ ३३ ॥
वे दोनों वीर पराक्रमी, बलसम्पन्न, विक्रमशाली, परम दुर्जय तथा अनुपम बल और तेजसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त दुर्जय थे॥ ३४ ॥
जैसे आकाशमें दो ग्रह टकरा गये हों, उसी तरह वे दोनों वीर परस्पर जूझ रहे थे। उस युद्धस्थलमें वे इन्द्र और वृत्रासुरके समान दुर्धर्ष जान पड़ते थे॥ ३५ ॥
वे महामनस्वी नरश्रेष्ठ तथा राक्षसप्रवर वीर जैसे दो सिंह आपसमें लड़ रहे हों उसी प्रकार युद्ध करते थे और बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए युद्धभूमिमें डटे हुए थे। दोनों ही बड़े हर्ष और उत्साहके साथ एक-दूसरेका सामना करते थे॥ ३६ ॥
तदनन्तर दशरथनन्दन शत्रुसूदन लक्ष्मणने कुपित हुए सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचते हुए अपने धनुषपर अनेक बाण रखे और उन सबको राक्षसराज इन्द्रजित्पर चलाया॥ ३७ ॥
उनके धनुषकी डोरीसे प्रकट होनेवाली टंकारध्वनि सुनकर राक्षसराज इन्द्रजित्का मुँह उदास हो गया और वह चुपचाप लक्ष्मणकी ओर देखने लगा॥ ३८ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित्का मुँह उदास देखकर विभीषणने युद्धमें लगे हुए सुमित्राकुमारसे कहा— ॥ ३९ ॥
‘महाबाहो! इस समय रावणपुत्र इन्द्रजित्में मुझे जो लक्षण दिखायी दे रहे हैं, उनसे जान पड़ता है कि निःसंदेह इसका उत्साह भंग हो गया है; अतः आप इसके वधके लिये शीघ्रता करें’॥ ४० ॥
तब सुमित्राकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंको धनुषपर चढ़ाया और उन्हें इन्द्रजित्को लक्ष्य करके चला दिया। वे बाण क्या थे महाविषैले सर्प थे॥
उन बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह था। लक्ष्मणके चलाये हुए उन बाणोंकी चोट खाकर इन्द्रजित् दो घड़ीके लिये मूर्च्छित हो गया। उसकी सारी इन्द्रियाँ विक्षुब्ध हो उठीं॥ ४२ ॥
थोड़ी देरमें जब होश हुआ और इन्द्रियाँ सुस्थिर हुईं, तब उसने रणभूमिमें दशरथकुमार वीर लक्ष्मणको खड़ा देखा। देखते ही उसके नेत्र रोषसे लाल हो गये और वह सुमित्राकुमारके सामने गया॥ ४३ ॥
वहाँ पहुँचकर वह उनसे कठोर वाणीमें बोला— ‘सुमित्राकुमार! पहले युद्धमें मैंने जो पराक्रम दिखाया था, उसे क्या तुम भूल गये? उस दिन तुमको और तुम्हारे भाईको भी मैंने बाँध लिया था। उस समय तुम युद्धभूमिमें पड़े-पड़े छटपटा रहे थे॥ ४४ ॥
‘उस महायुद्धमें वज्र एवं अशनिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा मैंने तुम दोनों भाइयोंको पहले धरतीपर सुला दिया था। तुम दोनों अपने अग्रगामी सैनिकोंके साथ मूर्च्छित होकर पड़े थे॥ ४५ ॥
‘अथवा मालूम होता है कि तुम्हें उन सब बातोंकी याद नहीं आ रही है। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि तुम यमलोकमें जाना चाहते हो। इसीलिये तुम मुझे पराजित करनेकी इच्छा रखते हो॥ ४६ ॥
‘यदि पहले युद्धमें तुमने मेरा पराक्रम नहीं देखा है तो आज तुम्हें दिखा दूँगा। इस समय सुस्थिरभावसे खड़े रहो’॥ ४७ ॥
ऐसा कहकर तीखी धारवाले सात बाणोंसे उसने लक्ष्मणको घायल कर दिया और दस उत्तम सायकोंद्वारा हनुमान्जीपर प्रहार किया॥ ४८ ॥
तत्पश्चात् दूने रोषसे भरे हुए उस पराक्रमी निशाचरने अच्छी तरहसे छोड़े गये सौ बाणोंद्वारा विभीषणको क्रोधपूर्वक क्षत-विक्षत कर दिया॥ ४९ ॥
इन्द्रजित्द्वारा किये गये इस पराक्रमको देखकर श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने उसकी कोई परवा नहीं की और हँसते-हँसते कहा— ‘यह तो कुछ नहीं है’॥ ५० ॥
साथ ही उन नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने मुखपर भयकी छायातक नहीं आने दी। उन्होंने युद्धस्थलमें कुपित हो भयंकर बाण हाथमें लिये और उन्हें रावणकुमारको लक्ष्य करके चला दिया॥ ५१ ॥
फिर वे बोले— ‘निशाचर! रणभूमिमें आये हुए शूरवीर इस तरह प्रहार नहीं करते। तुम्हारे ये बाण बहुत हल्के और कमजोर हैं। इनसे कष्ट नहीं होता— सुख ही मिलता है॥ ५२ ॥
‘युद्धकी इच्छा रखनेवाले शूरवीर समराङ्गणमें इस तरह युद्ध नहीं करते हैं।’ ऐसा कहते हुए धनुर्धर वीर लक्ष्मणने उस राक्षसपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥
लक्ष्मणके बाणोंसे इन्द्रजित्का महान् कवच, जो सोनेका बना हुआ था, टूटकर रथकी बैठकमें बिखर गया, मानो आकाशसे ताराओंका समूह टूटकर गिर पड़ा हो॥ ५४ ॥
कवच कट जानेपर नाराचोंके प्रहारसे वीर इन्द्रजित्के सारे अङ्गोंमें घाव हो गये। वह समराङ्गणमें रक्तसे रञ्जित हो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति दिखायी देने लगा॥ ५५ ॥
तब भयानक पराक्रमी वीर रावणकुमारने अत्यन्त कुपित हो समरभूमिमें लक्ष्मणको सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया॥ ५६ ॥
इससे लक्ष्मणका भी दिव्य एवं विशाल कवच छिन्न-भिन्न हो गया। वे दोनों शत्रुदमन वीर एक-दूसरेके प्रहारका जवाब देने लगे॥ ५७ ॥
वे बारंबार हाँफते हुए भयानक युद्ध करने लगे। युद्धस्थलमें बाणोंके आघातसे दोनोंके सारे अङ्ग क्षतवि क्षत हो गये थे। अतः वे दोनों सब ओरसे लहूलुहान हो गये॥ ५८ ॥
दोनों वीर दीर्घकालतक एक-दूसरेपर पैने बाणोंका प्रहार करते रहे। दोनों ही महामनस्वी तथा युद्धकी कलामें निपुण थे। दोनों भयंकर पराक्रम प्रकट करते थे और अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे॥ ५९ ॥
दोनोंके शरीर बाण-समूहोंसे व्याप्त थे। दोनोंके ही कवच और ध्वज कट गये थे। जैसे दो झरने जल बहा रहे हों, उसी तरह वे दोनों अपने शरीरसे गरम-गरम रक्त बहा रहे थे॥ ६० ॥
दोनों ही भयंकर गर्जनाके साथ बाणोंकी घोर वर्षा कर रहे थे, मानो प्रलयकालके दो नील मेघ आकाशमें जलकी धारा बरसा रहे हों॥ ६१ ॥
वहाँ जूझते हुए उन दोनों वीरोंका बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया; परंतु वे दोनों न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई॥ ६२ ॥
दोनों ही अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे और बारंबार अपने अस्त्रोंका प्रदर्शन करते थे। उन्होंने आकाशमें छोटे-बड़े बाणोंका जाल-सा बाँध दिया॥ ६३ ॥
वे मनुष्य और राक्षस—दोनों वीर बड़ी फुर्तीके साथ अद्भुत और सुन्दर ढंगसे बाणोंका प्रहार करते थे। उनके बाण चलानेकी कलामें कोई दोष नहीं दिखायी देता था। वे दोनों घोर घमासान युद्ध कर रहे थे॥ ६४ ॥
बाण चलाते समय उन दोनोंकी हथेली और प्रत्यञ्चाका भयंकर एवं तुमुल नाद पृथक्-पृथक् सुनायी देता था, जो भयंकर वज्रपातकी आवाजके समान श्रोताओंके हृदयमें कम्प उत्पन्न कर देता था॥ ६५ ॥
उन दोनों रणोन्मत्त वीरोंका वह शब्द आकाशमें परस्पर टकराते हुए दो महाभयंकर मेघोंकी गड़गड़ाहटके समान सुशोभित होता था॥ ६६ ॥
वे दोनों बलवान् योद्धा सोनेके पंखवाले नाराचोंसे घायल हो शरीरसे खून बहा रहे थे। दोनों ही यशस्वी थे और अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्न कर रहे थे॥ ६७ ॥
युद्धमें उन दोनोंके चलाये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाण एक-दूसरेके शरीरपर पड़ते, रक्तसे भीगकर निकलते और धरतीमें समा जाते थे॥ ६८ ॥
उनके हजारों बाण आकाशमें तीखे शस्त्रोंसे टकराते और उन्हें तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे॥ ६९ ॥
वह बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा था। उसमें उन दोनोंके बाणोंका समूह यज्ञमें गाहर्पत्य और आहवनीय नामक दो प्रज्वलित अग्नियोंके साथ बिछे हुए कुशोंके ढेरकी भाँति जान पड़ता था॥ ७० ॥
उन दोनों महामनस्वी वीरोंके क्षत-विक्षत शरीर वनमें पत्रहीन एवं लाल पुष्पोंसे भरे हुए पलाश और सेमलके वृक्षोंके समान सुशोभित होते थे॥ ७१ ॥
एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले इन्द्रजित् और लक्ष्मण रह-रहकर बारंबार भयंकर मार-काट मचाते थे॥ ७२ ॥
लक्ष्मण रणभूमिमें रावणकुमारपर चोट करते थे और रावणकुमार लक्ष्मणपर। इस तरह एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए वे वीर थकते नहीं थे॥ ७३ ॥
उन दोनों वेगशाली वीरोंके शरीरमें बाणोंके समूह धँस गये थे, इसलिये वे दोनों महापराक्रमी योद्धा जिनपर बहुत-से वृक्ष उग आये हों, उन दो पर्वतोंके समान शोभा पाते थे॥ ७४ ॥
बाणोंसे ढके और खूनसे भीगे हुए उन दोनोंके सारे अङ्ग जलती हुई आगके समान उद्दीप्त हो रहे थे॥ ७५ ॥
इस तरह युद्ध करते-करते उन दोनोंका बहुत समय व्यतीत हो गया; परंतु वे दोनों न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई॥ ७६ ॥
युद्धके मुहानेपर पराजित न होनेवाले लक्ष्मणके युद्धजनित श्रमका निवारण तथा उनके प्रिय एवं हितका सम्पादन करनेके लिये महात्मा विभीषण युद्धभूमिमें आकर खड़े हो गये॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८८ ॥
नवासीवाँ सर्ग
नवासीवाँ सर्ग
विभीषणका राक्षसोंपर प्रहार, उनका वानर-यूथपतियोंको प्रोत्साहन देना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित्के सारथिका और वानरोंद्वारा उसके घोड़ोंका वध
लक्ष्मण और इन्द्रजित्को दो मदमत्त हाथियोंकी भाँति परस्पर विजय पानेकी इच्छासे युद्धासक्त होकर जूझते देख उन दोनोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे रावणके बलवान् भाई शूरवीर विभीषण सुन्दर धनुष धारण किये उस युद्धके मुहानेपर आकर खड़े हो गये॥ १-२ ॥
वहाँ खड़े होकर उन्होंने अपने विशाल धनुषको खींचा और राक्षसोंपर तेज धारवाले बड़े-बड़े बाणोंको बरसाना आरम्भ किया॥ ३ ॥
जैसे वज्र नामक अस्त्र बड़े-बड़े पर्वतोंको विदीर्ण कर देते हैं, उसी प्रकार विभीषणके चलाये हुए वे बाण, जिनका स्पर्श आगके समान जलानेवाला था, राक्षसोंपर गिरकर उनके अङ्गोंको चीरने लगे॥ ४ ॥
विभीषणके अनुचर भी राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर थे; अतः वे भी समराङ्गणमें शूल, खड्ग और पट्टिशोंद्वारा वीर राक्षसोंका संहार करने लगे॥ ५ ॥
उन चारों राक्षसोंसे घिरे हुए विभीषण धृष्ट गजशावकोंके बीचमें खड़े हुए गजराजकी भाँति शोभा पाते थे॥ ६ ॥
राक्षसोंमें श्रेष्ठ विभीषण समयोचित कर्तव्यको जानते थे, इसलिये उन्होंने वानरोंको, जिन्हें राक्षसोंका वध करना प्रिय था, युद्धके लिये प्रेरित करते हुए यह समयके अनुरूप बात कही—॥ ७ ॥
‘वानरेश्वरो! अब खड़े-खड़े क्या देखते हो? राक्षसराज रावणका यह एकमात्र सहारा है, जो तुम्हारे सामने खड़ा है। रावणकी सेनाका इतना ही भाग अब शेष रह गया है॥ ८ ॥
‘इस युद्धके मुहानेपर इस पापी राक्षस इन्द्रजित्के मारे जानेपर रावणको छोड़कर उसकी सारी सेनाको मरी हुई ही समझो॥ ९ ॥
‘वीर प्रहस्त मारा गया, महाबली निकुम्भ, कुम्भकर्ण, कुम्भ तथा निशाचर धूम्राक्ष भी कालके गालमें चले गये॥
‘जम्बुमाली, महामाली, तीक्ष्णवेग, अशनिप्रभ, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, राक्षस वज्रदंष्ट्र, संह्रादी, विकट, अरिघ्न, तपन, मन्द, प्रघास, प्रघस, प्रजङ्घ, जङ्घ, दुर्जय अग्निकेतु, पराक्रमी रश्मिकेतु, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, राक्षस सूर्यशत्रु, अकम्पन, सुपार्श्व, निशाचर चक्रमाली, कम्पन तथा वे दोनों शक्तिशाली वीर देवान्तक और नरान्तक—ये सभी मारे जा चुके हैं॥ ११–१४ ॥
‘इन अत्यन्त बलशाली बहुसंख्यक राक्षस-शिरोमणियोंका वध करके तुमलोगोंने हाथोंसे तैरकर समुद्र पार कर लिया है। अब गायकी खुरीके बराबर यह छोटा-सा राक्षस बचा हुआ है। अतः इसे भी शीघ्र ही लाँघ जाओ॥ १५ ॥
‘वानरो! इतनी ही राक्षससेना और शेष रह गयी है, जिसे तुम्हें जीतना है। अपने बलपर घमंड करनेवाले प्रायः सभी राक्षस तुमसे भिड़कर मारे जा चुके हैं॥ १६ ॥
‘मैं इसके बापका भाँई हूँ। इस नाते यह मेरा पुत्र है। अतः मेरे लिये इसका वध करना अनुचित है, तथापि श्रीरामचन्द्रजीके लिये दयाको तिलाञ्जलि दे मैं अपने इस भतीजेको मारनेके लिये उद्यत हूँ॥ १७ ॥
‘जब मैं स्वयं मारनेके लिये इसपर हथियार चलाना चाहता हूँ, उस समय आँसू मेरी दृष्टि बंद कर देते हैं; अतः ये महाबाहु लक्ष्मण ही इसका विनाश करेंगे॥ १८ ॥
‘वानरो! तुमलोग झुंड बनाकर इसके समीपवर्ती सेवकोंपर टूट पड़ो और उन्हें मार डालो।’ इस प्रकार अत्यन्त यशस्वी राक्षस विभीषणके प्रेरित करनेपर वानरयूथपति हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा अपनी पूँछ पटकने लगे॥ १९ १/२ ॥
फिर वे सिंहके समान पराक्रमी वानर बारंबार गर्जते हुए उसी तरह नाना प्रकारके शब्द करने लगे, जैसे बादलोंको देखकर मोर अपनी बोली बोलने लगते हैं॥ २० ॥
अपने यूथवाले समस्त भालुओंसे घिरे हुए जाम्बवान् तथा वे वानर पत्थरों, नखों और दाँतोंसे वहाँ राक्षसोंको पीटने लगे॥ २१ ॥
अपने ऊपर प्रहार करते हुए ऋक्षराज जाम्बवान्को उन महाबली राक्षसोंने भय छोड़कर चारों ओरसे घेर लिया। उनके हाथमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे॥
वे राक्षस सेनाका संहार करनेवाले जाम्बवान्पर युद्धस्थलमें बाणों, तीखे फरसों, पट्टिशों, दंडों और तोमरोंद्वारा प्रहार करने लगे॥ २३ ॥
वानरों और राक्षसोंका वह महायुद्ध क्रोधसे भरे हुए देवताओं और असुरोंके संग्रामकी भाँति बड़ा भयंकर हो चला। उसमें बड़े जोर-जोरसे भयानक कोलाहल होने लगा॥ २४ ॥
उस समय महामनस्वी हनुमान्जीने लक्ष्मणको अपनी पीठसे उतार दिया और स्वयं भी अत्यन्त कुपित हो पर्वत-शिखरसे एक सालवृक्ष उखाड़कर सहस्रों राक्षसोंका संहार करने लगे। शत्रुओंके लिये उन्हें परास्त करना बहुत ही कठिन था॥ २५ १/२ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले बलवान् इन्द्रजित्ने अपने चाचाको भी घोर युद्धका अवसर देकर पुनः लक्ष्मणपर धावा किया॥ २६ १/२ ॥
लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनों वीर उस समय रणभूमिमें बड़े वेगसे जूझने लगे। वे दोनों बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे॥ २७ १/२ ॥
वे महाबली वीर बाणोंका जाल-सा बिछाकर बारंबार एक-दूसरेको ढक देते थे। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाकालमें वेगशाली चन्द्रमा और सूर्य बादलोंसे आच्छादित हो जाया करते हैं॥ २८ १/२ ॥
युद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंके हाथोंमें इतनी फुर्ती थी कि तरकससे बाणोंका निकालना, उनको धनुषपर रखना, धनुषको इस हाथसे उस हाथमें लेना, उसे मुट्ठीमें दृढ़तापूर्वक पकड़ना, कानतक खींचना, बाणोंका विभाग करना, उन्हें छोड़ना और लक्ष्य वेधना आदि कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था॥ २९-३० १/२ ॥
धनुषके वेगसे छोड़े गये बाणसमूहोंद्वारा आकाश सब ओरसे ढक गया। अतः उसमें साकार वस्तुओंका दीखना बंद हो गया॥ ३१ १/२ ॥
लक्ष्मण रावणकुमारके पास पहुँचकर और रावणकुमार लक्ष्मणके निकट जाकर दोनों परस्पर जूझने लगे। इस प्रकार युद्ध करते हुए जब वे एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते, तब भयंकर अव्यवस्था पैदा हो जाती थी। क्षण-क्षणमें यह निश्चय करना कठिन हो जाता था कि अमुककी विजय या पराजय होगी॥ ३२ १/२ ॥
उन दोनोंके द्वारा वेगपूर्वक छोड़े गये तीखे बाणोंसे आकाश ठसाठस भर गया और वहाँ अँधेरा छा गया॥
वहाँ गिरते हुए बहुसंख्यक अस्त्रों और सैकड़ों तीखे सायकोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ भी व्याप्त हो गयीं॥ ३४ १/२ ॥
अतः सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और बड़ा भयानक दृश्य दिखायी देने लगा। सूर्य अस्त हो गये, सब ओर अँधेरा फैल गया और रक्तके प्रवाहसे पूर्ण सहस्रों बड़ी-बड़ी नदियाँ बह चलीं॥ ३५-३६ ॥
मांसभक्षी भयंकर जन्तु अपनी वाणीद्वारा भयानक शब्द प्रकट करने लगे। उस समय न तो वायु चलती थी और न आग ही प्रज्वलित होती थी॥ ३७ ॥
महर्षिगण बोल उठे— 'संसारका कल्याण हो।' उस समय गन्धर्वोंको बड़ा संताप हुआ। वे चारणोंके साथ वहाँसे भाग चले॥ ३८ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणने चार बाण मारकर उस राक्षससिंहके सोनेके आभूषणोंसे सजे हुए काले रंगके चारों घोड़ोंको बींध दिया॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् रघुकुलनन्दन श्रीमान् लक्ष्मणने दूसरे तीखे, पानीदार सुन्दर पंखवाले और चमकीले भल्लसे जो इन्द्रके वज्रकी समानता करता था तथा जिसे कानतक खींचकर छोड़ा गया था, रणभूमिमें विचरते हुए इन्द्रजित्के सारथिका मस्तक शीघ्रतापूर्वक धड़से अलग कर दिया। वह वज्रोपम बाण छूटनेके साथ ही हथेलीके शब्दसे अनुनादित हो सनसनाता हुआ आगे बढ़ा था॥
सारथिके मारे जानेपर महातेजस्वी मन्दोदरीकुमार इन्द्रजित् स्वयं ही सारथिका भी काम सँभालता— घोड़ोंको भी काबूमें रखता और फिर धनुषको भी चलाता था। युद्धस्थलमें उसके द्वारा वहाँ सारथिके कार्यका भी सम्पादन होना दर्शकोंकी दृष्टिमें बड़ी अद्भुत बात थी॥
इन्द्रजित् जब घोड़ोंको रोकनेके लिये हाथ बढ़ाता, तब लक्ष्मण उसे तीखे बाणोंसे बेधने लगते और जब वह युद्धके लिये धनुष उठाता, तब उसके घोड़ोंपर बाणोंका प्रहार करते थे॥ ४४ ॥
उन छिद्रों (बाण-प्रहारके अवसरों)-में शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने समराङ्गणमें निर्भयसे विचरते हुए इन्द्रजित्को अपने बाण-समूहोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित कर दिया॥ ४५ ॥
समरभूमिमें सारथिको मारा गया देख रावणकुमारने युद्धविषयक उत्साह त्याग दिया। वह विषादमें डूब गया॥
उस राक्षसके मुखपर विषाद छाया हुआ देख वे वानर-यूथपति बड़े प्रसन्न हुए और लक्ष्मणकी भूरिभूरि प्रशंसा करने लगे॥ ४७ ॥
तत्पश्चात् प्रमाथी, रभस, शरभ और गन्धमादन— इन चार वानरेश्वरोंने अमर्षसे भरकर अपना महान् वेग प्रकट किया॥ ४८ ॥
वे चारों वानर महान् बलशाली और भयंकर पराक्रमी थे। वे सहसा उछलकर इन्द्रजित्के चारों घोड़ोंपर कूद पड़े॥ ४९ ॥
उन पर्वताकार वानरोंके भारसे दब जानेके कारण उन घोड़ोंके मुखोंसे खून निकलने लगा॥ ५० ॥
उनसे रौंदे जानेके कारण घोड़ोंके अङ्ग-भङ्ग हो गये और वे प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार घोड़ोंकी जान ले इन्द्रजित्के विशाल रथको भी तोड़-फोड़कर वे चारों वानर पुनः वेगसे उछले और लक्ष्मणके पास आकर खड़े हो गये॥ ५१ ॥
सारथि तो पहले ही मारा गया था। जब घोड़े भी मार डाले गये, तब रावणकुमार रथसे कूद पड़ा और बाणोंकी वर्षा करता हुआ सुमित्राकुमारकी ओर बढ़ा॥
उस समय इन्द्रके समान पराक्रमी लक्ष्मणने श्रेष्ठ घोड़ोंके मारे जानेसे पैदल चलकर युद्धमें तीखे उत्तम बाणोंकी वर्षा करते हुए इन्द्रजित्को अपने बाणसमूहोंकी मारसे अत्यन्त घायल कर दिया॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८९ ॥