श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
आच्छादित हो गयीं॥ २३ ॥
युद्धस्थलमें उन सर्पोंको आते देख भगवान् श्रीरामने अत्यन्त भयंकर गरुडास्त्रको प्रकट किया॥ २४ ॥
फिर तो श्रीरघुनाथजीके धनुषसे छूटे हुए सुनहरे पंखवाले अग्नितुल्य तेजस्वी बाण सर्पोंके शत्रुभूत सुवर्णमय गरुड़ बनकर सब ओर विचरने लगे॥ २५ ॥
श्रीरामके इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन गरुड़ाकार बाणोंने रावणके महान् वेगशाली उन समस्त सर्पाकार सायकोंका संहार कर डाला॥ २६ ॥
इस प्रकार अपने अस्त्रके प्रतिहत हो जानेपर राक्षसराज रावण क्रोधसे जल उठा और उस समय श्रीरघुनाथजीपर भयंकर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २७ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामको सहस्रों बाणोंसे पीड़ित करके उसने मातलिको भी अपने बाण-समूहोंसे घायल कर दिया॥ २८ ॥
तत्पश्चात् रावणने इन्द्रके रथकी ध्वजाको लक्ष्य करके एक बाण मारा और उससे उस ध्वजको काट डाला। उस कटे हुए सुवर्णमय ध्वजको रथके ऊपरसे उसके निचले भागमें गिराकर रावणने अपने बाणोंके जालसे इन्द्रके घोड़ोंको भी क्षत-विक्षत कर दिया॥ २९ १/२ ॥
यह देख देवता, गन्धर्व, चारण तथा दानव विषादमें डूब गये। श्रीरामको पीड़ित देख सिद्धों और महर्षियोंके मनमें भी बड़ी व्यथा हुई। विभीषणसहित सारे वानरयूथ पति भी बहुत दुःखी हो गये॥ ३०-३१ ॥
श्रीरामरूपी चन्द्रमाको रावणरूपी राहुसे ग्रस्त हुआ देख बुध नामक ग्रह जिसके देवता प्रजापति हैं, उस चन्द्रप्रिया रोहिणी नामक नक्षत्रपर आक्रमण करके प्रजावर्गके लिये अहितकारक हो गया॥ ३२ १/२ ॥
समुद्र प्रज्वलित-सा होने लगा। उसकी लहरोंसे धुआँ-सा उठने लगा और वह कुपित-सा होकर ऊपरकी ओर इस प्रकार बढ़ने लगा, मानो सूर्यदेवको छू लेना चाहता है॥ ३३ १/२ ॥
सूर्यकी किरणें मन्द हो गयीं। उसकी कान्ति तलवारकी भाँति काली पड़ गयी। वह अत्यन्त प्रखर कबन्धके चिह्नसे युक्त और धूमकेतु नामक उत्पात ग्रहसे संसक्त दिखायी देने लगा॥ ३४ १/२ ॥
आकाशमें इक्ष्वाकुवंशियोंके नक्षत्र विशाखापर, जिसके देवता इन्द्र और अग्नि हैं, आक्रमण करके मंगल जा बैठा॥ ३५ १/२ ॥
उस समय दस मस्तक और बीस भुजाओंसे युक्त दशग्रीव रावण हाथोंमें धनुष लिये मैनाक पर्वतके समान दिखायी देता था॥ ३६ १/२ ॥
राक्षस रावणके बाणोंसे बारम्बार निरस्त (आहत) होनेके कारण भगवान् श्रीराम युद्धके मुहानेपर अपने सायकोंका संधान नहीं कर पाते थे॥ ३७ १/२ ॥
तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने क्रोधका भाव प्रकट किया। उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, नेत्र कुछ-कुछ लाल हो गये और उन्हें ऐसा महान् क्रोध हुआ, जिससे जान पड़ता था कि वे समस्त राक्षसोंको भस्म कर डालेंगे॥ ३८ १/२ ॥
उस समय कुपित हुए बुद्धिमान् श्रीरामके मुखकी ओर देखकर समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे और पृथ्वी काँपने लगी॥ ३९ ॥
सिंहों और व्याघ्रोंसे भरा हुआ पर्वत हिल गया। उसके ऊपरके वृक्ष झूमने लगे और सरिताओंके स्वामी समुद्रमें ज्वार आ गया॥ ४० ॥
आकाशमें सब ओर उत्पातसूचक गर्दभाकार प्रचण्ड गर्जना करनेवाले रूखे बादल गर्जते हुए चक्कर लगाने लगे॥
श्रीरामचन्द्रजीको अत्यन्त कुपित और दारुण उत्पातोंका प्राकट्य देखकर समस्त प्राणी भयभीत हो गये तथा रावणके भीतर भी भय समा गया॥ ४२ ॥
उस समय विमानपर बैठे हुए देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग, ऋषि, दानव, दैत्य तथा गरुड़—ये सब आकाशमें स्थित होकर युद्धपरायण शूरवीर श्रीराम और रावणके समस्त लोकोंके प्रलयकी भाँति उपस्थित हुए नाना प्रकारके भयानक प्रहारोंसे युक्त उस युद्धका दृश्य देखने लगे॥ ४३-४४ ॥
उस अवसरपर युद्ध देखनेके लिये आये हुए समस्त देवता और असुर उस महासमरको देखकर भक्तिभावसे हर्षपूर्वक बातें करने लगे॥ ४५ ॥
वहाँ खड़े हुए असुर दशग्रीवको सम्बोधित करते हुए बोले—'रावण! तुम्हारी जय हो।' उधर देवता श्रीरामको पुकारकर बारम्बार कहने लगे—'रघुनन्दन! आपकी जय हो, जय हो'॥ ४६ ॥
इसी समय दुष्टात्मा रावणने क्रोधमें आकर श्रीरामचन्द्रजीपर प्रहार करनेकी इच्छासे एक बहुत बड़ा हथियार उठाया॥ ४७ ॥
वह वज्रके समान शक्तिशाली, महान् शब्द करनेवाला तथा सम्पूर्ण शत्रुओंका संहारक था। उसकी शिखाएँ शैल-शिखरोंके समान थीं। वह मन और नेत्रोंको भी भयभीत करनेवाला था। उसके अग्रभाग बहुत तीखे थे। वह प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निराशिके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसे पाना या नष्ट करना कालके लिये भी कठिन एवं असम्भव था॥ ४८-४९ ॥
उसका नाम था शूल। वह समस्त भूतोंको छिन्नभिन्न करके उन्हें भयभीत करनेवाला था। रोषसे उद्दीप्त हुए रावणने उस शूलको हाथमें ले लिया॥ ५० ॥
समरभूमिमें अनेक सेनाओंमें विभक्त शूरवीर राक्षसोंसे घिरे हुए उस पराक्रमी निशाचरने बड़े क्रोधके साथ उस शूलको ग्रहण किया था॥ ५१ ॥
उसे ऊपर उठाकर उस विशालकाय राक्षसने युद्धस्थलमें बड़ी भयानक गर्जना की। उस समय उसके नेत्र रोषसे लाल हो रहे थे और वह अपनी सेनाका हर्ष बढ़ा रहा था॥ ५२ ॥
राक्षसराज रावणके उस भयंकर सिंहनादने उस समय पृथ्वी, आकाश, दिशाओं और विदिशाओंको भी कम्पित कर दिया॥ ५३ ॥
उस महाकाय दुरात्मा निशाचरके भैरवनादसे सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और सागर भी विक्षुब्ध हो उठा॥ ५४ ॥
उस विशाल शूलको हाथमें लेकर महापराक्रमी रावणने बड़े जोरसे गर्जना करके श्रीरामसे कठोर वाणीमें कहा—॥ ५५ ॥
‘राम! यह शूल वज्रके समान शक्तिशाली है। इसे मैंने रोषपूर्वक अपने हाथमें लिया है। यह भाऽईसहित तुम्हारे प्राणोंको तत्काल हर लेगा॥ ५६ ॥
‘युद्धकी इच्छा रखनेवाले राघव! आज तुम्हारा वध करके सेनाके मुहानेपर जो शूरवीर राक्षस मारे गये हैं, उन्हींके समान अवस्थामें तुम्हें भी पहुँचा दूँगा॥ ५७ ॥
‘रघुकुलके राजकुमार! ठहरो, अभी इस शूलके द्वारा तुम्हें मौतके घाट उतारता हूँ।’ ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने श्रीरघुनाथजीके ऊपर उस शूलको चला दिया॥
रावणके हाथसे छूटते ही वह शूल आकाशमें आकर चमक उठा। वह विद्युन्मालाओंसे व्याप्त-सा जान पड़ता था। आठ घंटोंसे युक्त होनेके कारण उससे गम्भीर घोष प्रकट हो रहा था॥ ५९ ॥
परम पराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने उस भयंकर एवं प्रज्वलित शूलको अपनी ओर आते देख धनुष तानकर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६० ॥
श्रीरघुनाथजीने बाणसमूहोंद्वारा अपनी ओर आते हुए शूलको उसी तरह रोकनेका प्रयास किया, जैसे देवराज इन्द्र ऊपरकी ओर उठती हुई प्रलयाग्निको संवर्तक मेघोंके बरसाये हुए जलप्रवाहके द्वारा शान्त करनेकी चेष्टा करते हैं॥ ६१ ॥
परंतु जैसे आग पतंगोंको जला देती है, उसी तरह रावणके उस महान् शूलने श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए समस्त बाणोंको जलाकर भस्म कर दिया॥ ६२ ॥
श्रीरघुनाथजीने जब देखा मेरे सायक अन्तरिक्षमें उस शूलका स्पर्श होते ही चूर-चूर हो राखके ढेर बन गये हैं, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ॥ ६३ ॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रघुकुलनन्दन रघुवीरने मातलिकी लायी हुई देवेन्द्रद्वारा सम्मानित शक्तिको हाथमें ले लिया॥ ६४ ॥
बलवान् श्रीरामके द्वारा उठायी हुई वह शक्ति प्रलयकालमें प्रज्वलित होनेवाली उल्काके समान प्रकाशमान थी। उसने समस्त आकाशको अपनी प्रभासे उद्भासित कर दिया तथा उससे घंटानाद प्रकट होने लगा॥ ६५ ॥
श्रीरामने जब उसे चलाया, तब वह शक्ति राक्षसराजके उस शूलपर ही पड़ी। उसके प्रहारसे टूक-टूक और निस्तेज हो वह महान् शूल पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६६ ॥
इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने सीधे जानेवाले महावेगवान् वज्रतुल्य पैने बाणोंके द्वारा रावणके अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया॥ ६७ ॥
फिर अत्यन्त सावधान होकर उन्होंने तीन तीखे तीरोंसे रावणकी छाती छेद डाली और तीन पंखदार बाणोंसे उसके ललाटमें भी चोट पहुँचायी॥ ६८ ॥
उन बाणोंकी मारसे रावणके सारे अङ्ग क्षतवि क्षत हो गये। उसके सारे शरीरसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय अपने सैन्यसमूहमें खड़ा हुआ राक्षसराज रावण फूलोंसे भरे हुए अशोकवृक्षके समान शोभा पाने लगा॥ ६९ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे जब सारा शरीर अत्यन्त घायल हो लहूलुहान हो गया, तब निशाचरराज रावणको उस रणभूमिमें बड़ा खेद हुआ। साथ ही उस समय उसने बड़ा भारी क्रोध प्रकट किया॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२ ॥
एक सौ तीनवाँ सर्ग
एक सौ तीनवाँ सर्ग
श्रीरामका रावणको फटकारना और उनके द्वारा घायल किये गये रावणको सारथिका रणभूमिसे बाहर ले जाना
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा क्रोधपूर्वक अत्यन्त पीड़ित किये जानेपर युद्धकी इच्छा रखनेवाले रावणको महान् क्रोध हुआ॥ १ ॥
उसके नेत्र अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे। उस पराक्रमी वीरने अमर्षपूर्वक धनुष उठाया और अत्यन्त कुपित हो उस महासमरमें श्रीरघुनाथजीको पीड़ित करना आरम्भ किया॥ २ ॥
जैसे बादल आकाशसे जलकी धारा बरसाकर तालाबको भर देता है, उसी प्रकार रावणने सहस्रों बाणधाराओंकी वृष्टि करके श्रीरामचन्द्रजीको आच्छादित कर दिया॥ ३ ॥
युद्धस्थलमें रावणके धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंसे व्याप्त हो जानेपर भी श्रीरघुनाथजी विचलित नहीं हुए; क्योंकि वे महान् पर्वतकी भाँति अचल थे॥ ४ ॥
वे समराङ्गणमें अपने बाणोंसे रावणके बाणोंका निवारण करते हुए स्थिरभावसे खड़े रहे। उन पराक्रमी रघुवीरने सूर्यके किरणोंकी भाँति शत्रुके बाणोंको ग्रहण किया॥ ५ ॥
तदनन्तर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले निशाचर रावणने कुपित हो महामना राघवेन्द्रकी छातीमें सहस्रों बाण मारे॥ ६ ॥
समरभूमिमें उन बाणोंसे घायल हुए लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम रक्तसे नहा उठे और जंगलमें खिले हुए पलाशके महान् वृक्षकी भाँति दिखायी देने लगे॥ ७ ॥
उन बाणोंके आघातसे कुपित हो महातेजस्वी श्रीरामने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी सायकोंको हाथमें लिया॥ ८ ॥
फिर तो वे दोनों परस्पर रोषावेशसे युक्त हो बाण चलाने लगे। समराङ्गणमें बाणोंसे अन्धकार-सा छा गया। उस समय श्रीराम और रावण दोनों एक-दूसरेको देख नहीं पाते थे॥ ९ ॥
इसी समय क्रोधसे भरे हुए वीर दशरथकुमार श्रीरामने रावणसे हँसते हुए कठोर वाणीमें कहा— ॥ १० ॥
‘नीच राक्षस! तू मेरे अनजानमें जनस्थानसे मेरी असहाय स्त्रीको हर लाया है, इसलिये तू बलवान् या पराक्रमी तो कदापि नहीं है॥ ११ ॥
‘विशाल वनमें मुझसे विलग हुई दीन अवस्थामें विद्यमान विदेहराजकुमारीका बलपूर्वक अपहरण करके तू अपनेको शूरवीर समझता है?॥ १२ ॥
‘असहाय अबलाओंपर वीरता दिखानेवाले निशाचर! परस्त्रीके अपहरण-जैसे कापुरुषोचित कर्म करके तू अपनेको शूरवीर मानता है?॥ १३ ॥
‘धर्मकी मर्यादा भङ्ग करनेवाले पापी, निर्लज्ज और सदाचारशून्य निशाचर! तूने बलके घमंडसे वैदेहीके रूपमें अपनी मौत बुलायी है। क्या अब भी तू अपनेको शूरवीर समझता है?॥ १४ ॥
‘तू बड़ा शूरवीर, बलसम्पन्न और साक्षात् कुबेरका भाई जो है! इसीलिये तूने यह परम प्रशंसनीय और महान् यशोवर्धक कर्म किया है॥ १५ ॥
‘अभिमानपूर्वक किये गये उन निन्दित और अहितकर पाप-कर्मका जो महान् फल है, उसे तू आज अभी प्राप्त कर ले॥ १६ ॥
‘खोटी बुद्धिवाले निशाचर! तू अपनेको शूरतासे सम्पन्न समझता है; किंतु सीताको चोरकी तरह चुराते समय तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आयी?॥ १७ ॥
‘यदि मेरे समीप तू सीताका बलपूर्वक अपहरण करता तो अबतक मेरे सायकोंसे मारा जाकर अपने भाई खरका दर्शन करता होता॥ १८ ॥
‘मन्दबुद्धे! सौभाग्यकी बात है कि आज तू मेरी आँखोंके सामने आ गया है। मैं अभी तुझे अपने तीखे बाणोंसे यमलोक पहुँचाता हूँ॥ १९ ॥
‘आज मेरे बाणोंसे कटकर रणभूमिकी धूलमें पड़े हुए जगमगाते कुण्डलोंसे युक्त तेरे मस्तकको मांसभक्षी जीव-जन्तु घसीटें॥ २० ॥
‘रावण! तेरी लाश पृथ्वीपर फेंकी पड़ी हो, उसकी छातीपर बहुत-से गृध्र टूट पड़ें और बाणोंकी नोकसे किये गये छेदके द्वारा प्रवाहित होनेवाले तेरे खूनको बड़ी प्यासके साथ पियें॥ २१ ॥
‘आज मेरे बाणोंसे विदीर्ण और प्राणशून्य होकर पड़े हुए तेरे शरीरकी आँतोंको पक्षी उसी तरह खींचें, जैसे गरुड़ सर्पोंको खींचते हैं’॥ २२ ॥
ऐसा कहते हुए शत्रुओंका नाश करनेवाले वीर श्रीरामने पास ही खड़े हुए राक्षसराज रावणपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ २३ ॥
उस समय युद्धस्थलमें शत्रुवधकी इच्छा रखनेवाले श्रीरामका बल, पराक्रम, उत्साह और अस्त्र-बल बढ़कर दूना हो गया॥ २४ ॥
आत्मज्ञानी रघुनाथजीके सामने सभी अस्त्र अपने-आप प्रकट होने लगे। हर्ष और उत्साहके कारण महातेजस्वी भगवान् श्रीरामका हाथ बड़ी तेजीसे चलने लगा॥ २५ ॥
अपनेमें ये शुभ लक्षण प्रकट हुए जान राक्षसोंका अन्त करनेवाले भगवान् श्रीराम पुनः रावणको पीड़ित करने लगे॥ २६ ॥
वानरोंके चलाये हुए प्रस्तरसमूहों और श्रीरामचन्द्रजीके छोड़े हुए बाणोंकी वर्षासे आहत होकर रावणका हृदय व्याकुल एवं विभ्रान्त हो उठा॥ २७ ॥
जब हृदयकी व्याकुलताके कारण उसमें शस्त्र उठाने, धनुषको खींचने और श्रीरामके पराक्रमका सामना करनेकी क्षमता नहीं रह गयी तथा जब श्रीरामके शीघ्रतापूर्वक चलाये हुए बाण एवं भाँति-भाँतिके शस्त्र उसकी मृत्युके साधक बनने लगे और उसका मृत्युकाल समीप आ पहुँचा, तब उसकी ऐसी अवस्था देख उसका रथचालक सारथि बिना किसी घबराहटके उसके रथको रणभूमिसे दूर हटा ले गया॥ २८—३० ॥
अपने राजाको शक्तिहीन होकर रथपर पड़ा देख रावणका सारथि मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले उसके भयानक रथको लौटाकर उसके साथ ही भयके मारे समरभूमिसे बाहर निकल गया॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३ ॥
एक सौ चारवाँ सर्ग
एक सौ चारवाँ सर्ग
रावणका सारथिको फटकारना और सारथिका अपने उत्तरसे रावणको संतुष्ट करके उसके रथको रणभूमिमें पहुँचाना
रावण कालकी शक्तिसे प्रेरित हो रहा था, अतः मोहवश अत्यन्त कुपित हो क्रोधसे लाल आँखें करके अपने सारथिसे बोला— ॥ १ ॥
‘दुर्बुद्धे! क्या तूने मुझे पराक्रमशून्य, असमर्थ, पुरुषार्थशून्य, डरपोक, ओछा, धैर्यहीन, निस्तेज, मायारहित और अस्त्रोंके ज्ञानसे वञ्चित समझ रखा है, जो मेरी अवहेलना करके तू अपनी बुद्धिसे मनमाना काम कर रहा है (तूने मुझसे पूछा क्यों नहीं?)॥ २-३ ॥
‘मेरा अभिप्राय क्या है, यह जाने बिना ही मेरी अवहेलना करके तू किसलिये शत्रुके सामनेसे मेरा यह रथ हटा लाया?॥ ४ ॥
‘अनार्य! आज तूने मेरे चिरकालसे उपार्जित यश, पराक्रम, तेज और विश्वासपर पानी फेर दिया॥ ५ ॥
‘मेरे शत्रुका बल-पराक्रम विख्यात है। उसे अपने बल-विक्रमद्वारा संतुष्ट करना मेरे लिये उचित है और मैं युद्धका लोभी हूँ, तो भी तूने रथ हटाकर शत्रुके दृष्टिमें मुझे कायर सिद्ध कर दिया॥ ६ ॥
‘दुर्मते! यदि तू इस रथको मोहवश किसी तरह भी शत्रुके सामने नहीं ले जाता है तो मेरा यह अनुमान सत्य है कि शत्रुने तुझे घूस देकर फोड़ लिया है॥ ७ ॥
‘हित चाहनेवाले मित्रका यह काम नहीं है। तूने जो कार्य किया है, वह शत्रुओंके करने योग्य है॥ ८ ॥
‘यदि तू मेरे साथ बहुत दिनोंसे रहा है और यदि मेरे गुणोंका तुझे स्मरण है तो मेरे इस रथको शीघ्र लौटा ले चल। कहीं ऐसा न हो कि मेरा शत्रु भाग जाय’॥ ९ ॥
यद्यपि सारथिकी बुद्धिमें रावणके लिये हितकी ही भावना थी तथापि उस मूर्खने जब उससे ऐसी कठोर बात कही, तब सारथिने बड़ी विनयके साथ यह हितकर वचन कहा—॥ १० ॥
‘महाराज! मैं डरा नहीं हूँ। मेरा विवेक भी नष्ट नहीं हुआ है और न मुझे शत्रुओंने ही बहकाया है। मैं असावधान भी नहीं हूँ। आपके प्रति मेरा स्नेह भी कम नहीं हुआ है तथा आपने जो मेरा सत्कार किया है, उसे भी मैं नहीं भूला हूँ॥ ११ ॥
‘मैं सदा आपका हित चाहता हूँ और आपके यशकी रक्षाके लिये ही यत्नशील रहता हूँ। मेरा हृदय आपके प्रति स्नेहसे आर्द्र है। इस कार्यसे आपका हित होगा—यह सोचकर ही मैंने इसे किया है। भले ही यह आपको अप्रिय लगा हो॥ १२ ॥
‘महाराज! मैं आपके प्रिय और हितमें तत्पर रहनेवाला हूँ; अतः इस कार्यके लिये आप किसी ओछे और अनार्य पुरुषकी भाँति मुझपर दोषारोपण न करें॥
‘जैसे चन्द्रोदयके कारण बढ़ा हुआ समुद्रका जल नदीके वेगको पीछे लौटा देता है, उसी प्रकार मैंने जिस कारणसे आपके रथको युद्धभूमिसे पीछे हटाया है, उसे बता रहा हूँ, सुनिये॥ १४ ॥
‘उस समय मैंने यह समझा था कि आप महान् युद्धके कारण थक गये हैं। शत्रुके अपेक्षा मैंने आपकी प्रबलता नहीं देखी, आपमें अधिक पराक्रम नहीं पाया॥ १५ ॥
‘मेरे घोड़े भी रथको खींचते-खींचते थक गये थे। इनके पाँव लड़खड़ा रहे थे। ये धूपसे पीड़ित हो वर्षाकी मारी हुईं गौओंके समान दुःखी हो गये थे॥ १६ ॥
‘साथ ही इस समय मेरे सामने जो-जो लक्षण प्रकट हो रहे हैं, यदि वे सफल हुए तो हमें उसमें अपना अमङ्गल ही दिखायी देता है॥ १७ ॥
‘सारथिको देश-कालका, शुभाशुभ लक्षणोंका, रथीकी चेष्टाओंका, उत्साह, अनुत्साह और खेदका तथा बलाबलका भी ज्ञान रखना चाहिये॥ १८ ॥
‘धरतीके जो ऊँचे-नीचे, सम-विषम स्थान हों, उनकी भी जानकारी रखनी चाहिये। युद्धका उपयुक्त अवसर कब होगा, इसे जानना और शत्रुके दुर्बलतापर भी दृष्टि रखनी चाहिये॥ १९ ॥
‘शत्रुके पास जाने, दूर हटने, युद्धमें स्थिर रहने तथा युद्धभूमिसे अलग हो जानेका उपयुक्त अवसर कब आता है’ इन सब बातोंको समझना रथपर बैठे हुए सारथिका कर्तव्य है॥ २० ॥
‘आपको तथा इन रथके घोड़ोंको थोड़ी देरतक विश्राम देने और खेद दूर करनेके लिये मैंने जो यह कार्य किया है, सर्वथा उचित है॥ २१ ॥
‘वीर! प्रभो! मैंने मनमानी करनेके लिये नहीं, स्वामीके स्नेहवश उनकी रक्षाके लिये इस रथको दूर हटाया है॥ २२ ॥
‘शत्रुसूदन वीर! अब आज्ञा दीजिये। आप ठीक समझकर जो कुछ भी कहेंगे, उसे मैं मनमें आपके ऋणसे उऋण होनेकी भावना रखकर करूँगा’॥ २३ ॥
सारथिके इस कथनसे रावण बहुत संतुष्ट हुआ और नाना प्रकारसे उसकी सराहना करके युद्धके लिये लोलुप होकर बोला— ॥ २४ ॥
‘सूत! अब तुम इस रथको शीघ्र रामके सामने ले चलो। रावण समरमें अपने शत्रुओंको मारे बिना घर नहीं लौटेगा’॥ २५ ॥
ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने सारथिको पुरस्कारके रूपमें अपने हाथका एक सुन्दर आभूषण उतारकर दे दिया। रावणका आदेश सुनकर सारथिने पुनः रथको लौटाया॥ २६ ॥
रावणकी आज्ञासे प्रेरित हो सारथिने तुरंत ही अपने घोड़े हाँके। फिर तो राक्षसराजका वह विशाल रथ क्षणभरमें युद्धके मुहानेपर श्रीरामचन्द्रजीके समीप जा पहुँचा॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०४ ॥
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
अगस्त्य मुनिका श्रीरामको विजयके लिये ‘आदित्यहृदय’* के पाठकी सम्मति देना
उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्धसे थककर चिन्ता करते हुए रणभूमिमें खड़े थे। इतनेमें रावण भी युद्धके लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओंके साथ युद्ध देखनेके लिये आये थे, श्रीरामके पास जाकर बोले— ॥ १-२ ॥
‘सबके हृदयमें रमण करनेवाले महाबाहो राम! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स! इसके जपसे तुम युद्धमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय पा जाओगे॥
‘इस गोपनीय स्तोत्रका नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओंका नाश करनेवाला है। इसके जपसे सदा विजयकी प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मङ्गलोंका भी मङ्गल है। इससे सब पापोंका नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोकको मिटाने तथा आयुको बढ़ानेवाला उत्तम साधन है॥ ४-५ ॥
‘भगवान् सूर्य अपनी अनन्त किरणोंसे सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होनेवाले (समुद्यन्), देवता और असुरोंसे नमस्कृत, विवस्वान् नामसे प्रसिद्ध, प्रभाका विस्तार करनेवाले (भास्कर) और संसारके स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका [रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः—इन नाम-मन्त्रोंके द्वारा] पूजन करो॥ ६ ॥
‘सम्पूर्ण देवता इन्हींके स्वरूप हैं। ये तेजकी राशि तथा अपनी किरणोंसे जगत्को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही अपनी रश्मियोंका प्रसार करके देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं॥ ७ ॥
‘ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओंको प्रकट करनेवाले तथा प्रभाके पुञ्ज हैं॥
‘इन्हींके नाम—आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाशमें विचरनेवाले), पूषा (पोषण करनेवाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके बीज), दिवाकर
(रात्रिका अन्धकार दूर करके दिनका प्रकाश फैलानेवाले), हरिदश्व (दिशाओंमें व्यापक अथवा हरे रंगके घोड़ेवाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणोंसे सुशोभित), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), मरीचिमान् (किरणोंसे सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकारका नाश करनेवाले), शम्भु (कल्याणके उद्गमस्थान), त्वष्टा (भक्तोंका दुःख दूर करने अथवा जगत्का संहार करनेवाले), मार्तण्डक (ब्रह्माण्डको जीवन प्रदान करनेवाले), अंशुमान् (किरण धारण करनेवाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभावसे ही सुख देनेवाले), तपन (गर्मी पैदा करनेवाले), अहस्कर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुतिके पात्र), अग्निगर्भ (अग्निको गर्भमें धारण करनेवाले), अदितिपुत्र, शङ्ख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीतका नाश करनेवाले), व्योमनाथ (आकाशके स्वामी), तमोभेदी (अन्धकारको नष्ट करनेवाले), ऋग्, यजुः और सामवेदके पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टिके कारण), अपां मित्र (जलको उत्पन्न करनेवाले), विन्ध्यवीथीप्लवङ्गम (आकाशमें तीव्रवेगसे चलनेवाले), आतपी (घाम उत्पन्न करनेवाले), मण्डली (किरणसमूहको धारण करनेवाले), मृत्यु (मौतके कारण), पिङ्गल (भूरे रंगवाले), सर्वतापन (सबको ताप देनेवाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्तिके कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारोंके स्वामी, विश्वभावन (जगत्की रक्षा करनेवाले), तेजस्वियोंमें भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त) हैं। [इन सभी नामोंसे प्रसिद्ध सूर्यदेव!] आपको नमस्कार है॥ १०—१५ ॥
‘पूर्वगिरि—उदयाचल तथा पश्चिमगिरि—अस्ताचलके रूपमें आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिनके अधिपति आपको प्रणाम है॥
‘आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याणके दाता हैं। आपके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदितिके पुत्र होनेके कारण आदित्यनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है॥ १७ ॥
‘उग्र (अभक्तोंके लिये भयंकर), वीर (शक्ति-सम्पन्न) और सारंग (शीघ्रगामी) सूर्यदेवको नमस्कार है। कमलोंको विकसित करनेवाले प्रचण्ड तेजधारी मार्तण्डको प्रणाम है॥ १८ ॥
‘(परात्पर-रूपमें) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णुके भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाशसे परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देनेवाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है॥ १९ ॥
‘आप अज्ञान और अन्धकारके नाशक, जडता एवं शीतके निवारक तथा शत्रु का नाश करनेवाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नोंका नाश करनेवाले, सम्पूर्ण ज्योतियोंके स्वामी और देवस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है॥ २० ॥
‘आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्णके समान है, आप हरि (अज्ञानका हरण करनेवाले) और विश्वकर्मा (संसारकी सृष्टि करनेवाले) हैं; तमके नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत्के साक्षी हैं; आपको नमस्कार है॥ २१ ॥
‘रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण भूतोंका संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणोंसे गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं॥ २२ ॥
‘ये सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर उनके सो जानेपर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषोंको मिलनेवाले फल हैं॥ २३ ॥
‘(यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले) देवता, यज्ञ और यज्ञोंके फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देनेमें ये ही पूर्ण समर्थ हैं॥
‘राघव! विपत्तिमें, कष्टमें, दुर्गम मार्गमें तथा और किसी भयके अवसरपर जो कोऽइ पुरुष इन सूर्यदेवका कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता॥ २५ ॥
‘इसलिये तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वरकी पूजा करो। इस आदित्यहृदयका तीन बार जप करनेसे तुम युद्धमें विजय पाओगे॥ २६ ॥
महाबाहो! ‘तुम इसी क्षण रावणका वध कर सकोगे।’ यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये॥ २७ ॥
उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीका शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्तसे आदित्यहृदयको धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्यकी ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजीने धनुष उठाकर रावणकी ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पानेके लिये वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावणके वधका निश्चय किया॥ २८—३० ॥
उस समय देवताओंके मध्यमें खड़े हुए भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखा और निशाचरराज रावणके विनाशका समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा—‘रघुनन्दन! अब जल्दी करो’॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५ ॥
* इस ‘आदित्यहृदय’ नामक स्तोत्रका विनियोग एवं न्यासविधि इस प्रकार है—
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यहृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुप्छन्दः, आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्च्छन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः, हृदि। ॐ बीजाय नमः, गुह्ये। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयोः। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः, नाभौ।
करन्यास
इस स्तोत्रके अङ्गन्यास और करन्यास तीन प्रकारसे किये जाते हैं। केवल प्रणवसे, गायत्रीमन्त्रसे अथवा ‘रश्मिमते नमः’ इत्यादि छः नाम-मन्त्रोंसे। यहाँ नाम-मन्त्रोंसे किये जानेवाले न्यासका प्रकार बताया जाता है—
ॐ रश्मिमते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः। ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवस्वते अनामिकाभ्यां नमः। ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि अङ्गन्यास
ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्। ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्। इस प्रकार न्यास करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे भगवान् सूर्यका ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिये—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
तत्पश्चात् ‘आदित्यहृदय’ स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। ९८१
एक सौ छठाँ सर्ग
एक सौ छठाँ सर्ग
रावणके रथको देख श्रीरामका मातलिको सावधान करना, रावणकी पराजयके सूचक उत्पातों तथा रामकी विजय सूचित करनेवाले शुभ शकुनोंका वर्णन
रावणके सारथिने हर्ष और उत्साहसे युक्त होकर उसके रथको शीघ्रतापूर्वक हाँका। वह रथ शत्रुसेनाको कुचल डालनेवाला था और गन्धर्वनगरके समान आश्चर्यजनक दिखायी देता था। उसपर बहुत ऊँची पताका फहरा रही थी। उस रथमें उत्तम गुणोंसे सम्पन्न और सोनेके हारोंसे अलंकृत घोड़े जुते हुए थे। रथके भीतर युद्धकी आवश्यक सामग्री भरी पड़ी थी। उस रथने ध्वजा-पताकाओंकी तो माला-सी पहन रखी थी। वह आकाशको अपना ग्रास बनाता हुआ-सा जान पड़ता था। वसुन्धराको अपनी घर्घर-ध्वनिसे निनादित कर रहा था। वह शत्रु की सेनाओंका नाशक और अपनी सेनाके योद्धाओंका हर्ष बढ़ानेवाला था॥ १—३ १/२ ॥
नरराज श्रीरामचन्द्रजीने सहसा वहाँ आते हुए, विशाल ध्वजसे अलंकृत और घोर घर्घर-ध्वनिसे युक्त राक्षसराज रावणके उस रथको देखा॥ ४ १/२ ॥
उसमें काले रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसकी कान्ति बड़ी भयंकर थी। वह आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानके समान दृष्टिगोचर होता था॥
उसपर फहराती हुईंऽ पताकाएँ विद्युत्के समान जान पड़ती थीं। वहाँ जो रावणका धनुष था, उसके द्वारा वह रथ इन्द्रधनुषकी छटा छिटकाता था और बाणोंकी धारावाहिक वृष्टि करता था। इससे वह जलधारावर्षी मेघके समान प्रतीत होता था॥ ६ १/२ ॥
उसकी आवाज ऐसी मालूम होती थी, मानो वज्रके आघातसे किसी पर्वतके फटनेका शब्द हो रहा हो। मेघके समान प्रतीत होनेवाले शत्रुके उस रथको आता देख श्रीरामचन्द्रजीने बड़े वेगसे अपने धनुषपर टंकार दी। उस समय उनका वह धनुष द्वितीयाके चन्द्रमा-जैसा दिखायी देता था। श्रीरामने इन्द्रसारथि मातलिसे कहा— ॥ ७-८ १/२ ॥
‘मातले! देखो, मेरे शत्रु रावणका रथ बड़े वेगसे आ रहा है। रावण जिस प्रकार प्रदक्षिणभावसे महान् वेगके साथ पुनः आ रहा है, उससे जान पड़ता है, इसने समरभूमिमें अपने वधका निश्चय कर लिया है॥ ९-१० ॥
‘अतः अब तुम सावधान हो जाओ और शत्रुके रथकी ओर आगे बढ़ो। जैसे हवा उमड़े हुए बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालती है, उसी प्रकार आज मैं शत्रुके रथका विध्वंस करना चाहता हूँ॥ ११ ॥
‘भय तथा घबराहट छोड़कर मन और नेत्रोंको स्थिर रखते हुए घोड़ोंकी बागडोर काबूमें रखो और रथको तेज चलाओ॥ १२ ॥
‘तुम्हें देवराज इन्द्रका रथ हाँकनेका अभ्यास है; अतः तुमको कुछ सिखानेकी आवश्यकता नहीं है। मैं एकाग्रचित्त होकर युद्ध करना चाहता हूँ। इसलिये तुम्हारे कर्तव्यका स्मरणमात्र करा रहा हूँ। तुम्हें शिक्षा नहीं देता हूँ’॥ १३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनसे देवताओंके श्रेष्ठ सारथि मातलिको बड़ा संतोष हुआ और उन्होंने रावणके विशाल रथको दाहिने रखते हुए अपने रथको आगे बढ़ाया। उसके पहियेसे इतनी धूल उड़ी कि रावण उसे देखकर काँप उठा॥ १४-१५ ॥
इससे दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ। वह अपनी लाल-लाल आँखें फाड़कर देखता हुआ रथके सामने हुए श्रीरामपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ १६ ॥
उसके इस आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा क्रोध हुआ। फिर रोषके साथ ही धैर्य धारण करके युद्धस्थलमें उन्होंने इन्द्रका धनुष हाथमें लिया, जो बड़ा ही वेगशाली था॥ १७ ॥
साथ ही सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित होनेवाले महान् वेगशाली बाण भी ग्रहण किये। तत्पश्चात् एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर श्रीराम और रावण दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों दर्पसे भरे हुए दो सिंहोंके समान आमने-सामने डटे हुए थे॥ १८ ॥
उस समय रावणके विनाशकी इच्छा रखनेवाले देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि उन दोनोंके द्वैरथ युद्धको देखनेके लिये वहाँ एकत्र हो गये॥ १९ ॥
उस युद्धके समय ऐसे भयंकर उत्पात होने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे। उनसे रावणके विनाश और श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयकी सूचना मिलती थी॥
मेघ रावणके रथपर रक्तकी वर्षा करने लगे। बड़े वेगसे उठे हुए बवंडर उसकी वामावर्त परिक्रमा करने लगे॥ २१ ॥
जिस-जिस मार्गसे रावणका रथ जाता था, उसी-उसी ओर आकाशमें मँडराता हुआ गीधोंका महान् समुदाय दौड़ा जाता था॥ २२ ॥
असमयमें ही जपा (अड़हुल)-के फूलकी-सी लाल रंगवाली संध्यासे आवृत हुई लङ्कापुरीकी भूमि दिनमें भी जलती हुई-सी दिखायी देती थी॥ २३ ॥
रावणके सामने वज्रपातकी-सी गड़गड़ाहट और बड़ी भारी आवाजके साथ बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं, जो उसके अहितकी सूचना दे रही थीं। उन उत्पातोंने राक्षसोंको विषादमें डाल दिया॥ २४ ॥
रावण जहाँ-जहाँ जाता, वहाँ-वहाँकी भूमि डोलने लगती थी। प्रहार करते हुए राक्षसोंकी भुजाएँ ऐसी निकम्मी हो गयी थीं, मानो उन्हें किन्हींने पकड़ लिया हो॥ २५ ॥
रावणके आगे पड़ी हुई सूर्यदेवकी किरणें पर्वतीय धातुओंके समान लाल, पीले, सफेद और काले रंगकी दिखायी देती थीं॥ २६ ॥
रावणके रोषावेशसे पूर्ण मुखकी ओर देखती और अपने-अपने मुखोंसे आग उगलती हुई गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलती थीं और उनके पीछे झुंड-के-झुंड गीध मँडराते चलते थे॥ २७ ॥
रणभूमिमें धूल उड़ाती वायु राक्षसराज रावणकी आँखें बंद करती हुई प्रतिकूल दिशाकी ओर बह रही थी॥ २८ ॥
उसकी सेनापर सब ओरसे बिना बादलके ही दुःसह एवं कठोर आवाजके साथ भयानक बिजलियाँ गिरीं॥ २९ ॥
समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं। धूलकी बड़ी भारी वर्षाके कारण आकाशका दिखायी देना कठिन हो गया॥ ३० ॥
भयानक आवाज करनेवाली सैकड़ों दारुण सारिकाएँ आपसमें घोर कलह करती हुई रावणके रथपर गिर पड़ती थीं॥ ३१ ॥
उसके घोड़े अपने जघनस्थलसे आगकी चिनगारियाँ और नेत्रोंसे आँसू बरसा रहे थे। इस प्रकार वे एक ही साथ आग और पानी दोनों प्रकट करते थे॥ ३२ ॥
इस तरह बहुत-से दारुण एवं भयंकर उत्पात प्रकट हुए, जो रावणके विनाशकी सूचना दे रहे थे॥ ३३ ॥
श्रीरामके सामने भी अनेक शकुन प्रकट हुए, जो सब प्रकारसे शुभ, मङ्गलमय तथा विजयके सूचक थे॥
श्रीरघुनाथजी अपनी विजयकी सूचना देनेवाले इन शुभ शकुनोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रावणको मरा हुआ ही समझा॥ ३५ ॥
शकुनोंके ज्ञाता भगवान् श्रीराम रणभूमिमें अपनेको प्राप्त होनेवाले शुभ शकुनोंका अवलोकन करके बड़े हर्ष और परम सन्तोषका अनुभव करने लगे तथा उन्होंने युद्धमें अधिक पराक्रम प्रकट किया॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ छठाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०६ ॥
एक सौ सातवाँ सर्ग
एक सौ सातवाँ सर्ग
श्रीराम और रावणका घोर युद्ध
तदनन्तर श्रीराम और रावणमें अत्यन्त क्रूरतापूर्वक महान् द्वैरथ युद्ध आरम्भ हुआ, जो समस्त लोकोंके लिये भयंकर था॥ १ ॥
उस समय राक्षसों और वानरोंकी विशाल सेनाएँ हाथमें हथियार लिये रहनेपर भी निश्चेष्ट खड़ी रहीं— कोई किसीपर प्रहार नहीं करता था॥ २ ॥
मनुष्य और निशाचर दोनों वीरोंको बलपूर्वक युद्ध करते देख सबके हृदय उन्हींकी ओर खिंच गये; अतः सभी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ३ ॥
दोनों ओरके सैनिकोंके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे और उनके हाथ युद्धके लिये व्यग्र थे, तथापि उस अद्भुत संग्रामको देखकर उनकी बुद्धि आश्चर्यचकित हो उठी थी; इसलिये वे चुपचाप खड़े थे। एक-दूसरेपर प्रहार नहीं करते थे॥ ४ ॥
राक्षस रावणकी ओर देख रहे थे और वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर। उन सबके नेत्र विस्मित थे; अतः निस्तब्ध खड़ी रहनेके कारण उभय पक्षकी सेनाएँ चित्रलिखित-सी जान पड़ती थीं॥ ५ ॥
श्रीराम और रावण दोनोंने वहाँ प्रकट होनेवाले निमित्तोंको देखकर उनके भावी फलका विचार करके युद्धविषयक विचारको स्थिर कर लिया था। उन दोनोंमेंसे एक-दूसरेके प्रति अमर्षका भाव दृढ़ हो गया था; इसलिये वे निर्भय-से होकर युद्ध करने लगे॥ ६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास था कि मेरी ही जीत होगी और रावणको भी यह निश्चय हो गया था कि मुझे अवश्य ही मरना होगा; अतः वे दोनों युद्धमें अपना सारा पराक्रम प्रकट करके दिखाने लगे॥ ७ ॥
उस समय पराक्रमी दशाननने क्रोधपूर्वक बाणोंका संधान करके श्रीरघुनाथजीके रथपर फहराती हुई ध्वजाको निशाना बनाया और उन बाणोंको छोड़ दिया॥ ८ ॥
परंतु उसके चलाये हुए वे बाण इन्द्रके रथकी ध्वजातक न पहुँच सके, केवल रथशक्तिको* छूते हुए धरतीपर गिर पड़े॥ ९ ॥