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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

प्रथमोऽध्यायः १९

अत्यन्त मद्य पीने वाले की बुद्धि का निश्चय लोप हो जाता है। और मात्रा के साथ थोड़ा मद्य पीने वाले की प्रतिभा, बुद्धि में उज्ज्वलता, धीरता, चित्त की स्थिरता बढ़ती है। और इससे भिन्न मात्रा से अधिक पीने से मद्य शरीर को नष्ट कर देता है। और मद्य के समान काम तथा क्रोध भी चित्त को अत्यन्त मतवाला बना देने वाला होता है अतः इन दोनों को भी यथोचित रीति से प्रयोग करना उचित होता है।

कामः प्रजापालने च क्रोधः शत्रुनिबर्हणे।
सेनासंधारणे लोभो योज्यो राज्ञा जयार्थिना ॥ ११७ ॥

कामादि पर जय-प्राप्ति की इच्छा रखने वाले राजा के लिये उचित है कि वह—प्रजा-पालन के लिये काम (कामना) का, शत्रु-नाश के लिये क्रोध का, सैन्य रखने में लोभ का प्रयोग करे।

परस्त्री-संगमे कामो लोभो नान्यधनेषु च ।
स्वप्रजादण्डने क्रोधो नैव धार्यो नृपैः कदा ॥ ११८ ॥

राजा कभी भी पर-स्त्री के साथ सङ्ग करने के लिये काम को, अन्य के धन की प्राप्ति में लोभ को, अपनी प्रजा को दण्ड देने में क्रोध को न करे।

किमुच्येत कुटुम्बीति परस्त्रीसंगमान्नरः ।
स्वप्रजादण्डनाच्छूरो धनिकोऽन्यधनैश्च किम् ॥ ११९ ॥

पर-स्त्री के साथ संग करने वाला मनुष्य क्या कुटुम्बी ? अपनी प्रजा को दण्ड देने से क्या शूर-वीर और दूसरे के धन को लेने से मनुष्य क्या धनी कहला सकता है ? अर्थात् कभी नहीं कहला सकता है।

अरक्षितारं नृपतिं ब्राह्मणं चातपस्विनम् ।
धनिकं चाप्रदातारं देवा घ्नन्ति त्यजन्त्यधः ॥ १२० ॥

प्रजा की रक्षा नहीं करने वाले राजा को, तपस्या नहीं करने वाले ब्राह्मण को और दान नहीं देने वाले धनी को देवता लोग नष्ट कर देते हैं और अन्त में उन्हें नरक में गिरा देते हैं।

स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपः-फलम् ।
एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ १२१ ॥

राजा होना, दानी होना एवं धनी होना ये सब तप के फल हैं। और याचक होना, दास होना एवं दरिद्र होना ये सब पाप के फल हैं।

दृष्ट्वा शास्त्राण्यथात्मानं सन्नियम्य यथोचितम् ।
कुर्यान्नृपः स्ववृत्तं तु परत्रेह सुखाय च ॥ १२२ ॥

इससे राजा शास्त्रों को देखकर तदनुसार अपने मन को विषयों से यथो-

२० | शुक्रनीतिः

चित रोककर पर-लोक और इस लोक में सुख पाने के लिये अपने आचरण को उचित रीति से करे।

दुष्टनिग्रहणं दानं प्रजायाः परिपालनम् ।
यजनं राजसूयादेः कोशानां न्यायतोऽर्जनम् ॥ १२३ ॥
करदीकरणं राज्ञां रिपूणां परिमर्द्दनम् ।
भूमेरुपार्जनं भूयो राजवृत्तं तु चाष्टधा ॥ १२४ ॥

आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश— १ दुष्टों का निग्रह करना, २ दान देना, ३ प्रजा का परिपालन, ४ राजसूयादि यज्ञ करना, ५ न्यायपूर्वक कोश ( खजाना ) बढ़ाना, ६ राजाओं से कर वसूल करना, ७ शत्रुओं का मान मर्द्दन करना, ८ बार बार राज्य को बढ़ाना, ये ८ प्रकार के राजाओं के वृत्त ( आचरण ) हैं।

न वर्धितं बलं यैस्तु न भूपाः करदीकृताः ।
न प्रजाः पालिताः सम्यक्ते वै षण्ढतिला नृपाः ॥ १२५ ॥

राजा के दोष-गुण का निर्देश— जिन राजाओं ने सेना नहीं बढ़ाई, राजाओं को कर देने वाला ( अधीन ) नहीं बनाया, प्रजाओं का भली भांति पालन नहीं किया, वे बांझतिल ( तेल-रहित तिल ) के समान तुच्छ कहलाते हैं।

प्रजा सूद्विजते यस्माद्यत्कर्म परिनिंदति ।
त्यज्यते धनिकैर्यस्तु गुणिभिस्तु नृपाधमः ॥ १२६ ॥

प्रजा जिससे उद्विग्न हो उठती है और जिसके कर्मों की निन्दा करती है और जिसे धनिक तथा गुणी लोग त्याग देते हैं वह राजा नृपाधम कहलाता है।

नटगायकगणिकामल्लषण्ढालपजातिषु ।
योऽतिसक्तो नृपो निन्द्यः स हि शत्रुमुखे स्थितः ॥ १२७ ॥

नट, गवैया, वेश्या, पहलवान, जनखा तथा नीच जाति वालों में अत्यन्त आसक्ति रखने वाला राजा निन्द्य कहलाता है। और वह शत्रु के मुख में पड़ जाता है।

बुद्धिमंतं सदा द्वेष्टि मोदते वंचकैः सह ।
स्वदुर्गुणं न वै वेत्ति स्वात्मनाशाय सो नृपः ॥ १२८ ॥

जो राजा सदा बुद्धिमानों से द्वेष रखता है और वंचकों से खुश रहता है एवं अपने दुर्गुणों को नहीं समझता है वह अपना नाश करने के लिये कारण बन जाता है।

नापराधं हि क्षमते प्रदंडो धनहारकः ।

प्रथमोऽध्यायः २१

स्वदुर्गुणश्रवणतो लोकानां परिपीडकः ॥ १२९ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते यतः ।
गूढचारैः श्रावयित्वा स्ववृत्तं दूषयंति के ॥ १३० ॥
भूषयंति च कैर्भावैरमात्याद्याश्च तद्विदः ।

जब जो राजा अपराध को नहीं सहन करता है तथा उग्र दण्ड देता है। धन को हरण कर लेता है, अपने दुर्गुणों के सुनने पर कहनेवाले को पीड़ा पहुँचाने लगता है तब उससे प्रजा क्षुभित हो उठती है और भेदभाव रखने लगती है अर्थात् राजा से प्रेम हटा लेती है। अतः इनसे बचने के लिये राजा को उचित है कि वह अपने गुप्तचरों (खुफिया पुलिस) को भेजकर उनसे अपने आचरणों को प्रजा पर प्रकट करावे और यह जाने कि—कौन व्यक्ति मेरे आचरण को दोषयुक्त बताते हैं। और उस वृत्त के जानकार मन्त्री आदि किन आचरणों से मेरी प्रशंसा करते हैं।

मयि कीदृक् च संप्रोतिः केषामप्रीतिरेव वा ॥ १३१ ॥
ममागुणैर्गुणैर्वापि गूढं संश्रुत्य चाखिलम् ।
चारैः स्वदुर्गुणं ज्ञात्वा लोकतः सर्वदा नृपः ॥ १३२ ॥
सुकीर्त्यै संत्यजेन्नित्यं नावमन्येत वै प्रजाः ।

मेरे गुणों से किन लोगों की मेरे में कैसी प्रीति है ? और मेरे अवगुणों से किन लोगों की कैसी अप्रीति है ? इसे गूढ पुरुषों ( खुफिया पुलिस ) द्वारा लोगों से कहे हुये अपने दुर्गुणों को सर्वदा जानकर राजा अपनी कीर्ति के लिये उन दुर्गुणों को भली भांति छोड़ देवे और निन्दा करनेवाली प्रजा का कभी तिरस्कार न करै ।

लोको निंदति राजंस्त्वां चारैः संभावितो यदि ॥ १३३ ॥
कोपं करोति दौरात्म्यादात्मदुर्गुणलोपकः ।
सीता साध्व्यपि रामेण त्यक्ता लोकापवादतः ॥ १३४ ॥

यदि जासूस आकर यह सुनावें कि—'हे महाराज ! प्रजा आप की निन्दा करती है' इस पर जो अपने दुर्गुण को छिपानेवाला होता है वही राजा दुष्ट स्वभाववश कोप करता है—अन्य नहीं करता है । जैसे कि समर्थ होते हुये भी रामचन्द्र ने लोकापवाद के भय से पतिव्रता सीता का भी परित्याग किया, और अपवाद लगाने वाले धोबी के लिये कभी थोड़ा भी दण्ड नहीं दिया ।

शक्तेनापि हि न धृतो दण्डोऽल्पो रजके क्वचित् ।
ज्ञानविज्ञानसंपन्न-राजदत्ताभयोऽपि च ॥ १३५ ॥
समक्षं वक्ति न भयाद्राज्ञो गुर्वपि दूषणम् ।
स्तुतिप्रिया हि वै देवा विष्णुमुख्या इति श्रुतिः ॥ १३६ ॥

२२

शुक्रनीतिः

किं पुनर्मनुजां नित्यं निंदाजः क्रोध इत्यतः । राजा सुभागदंडी स्यात्सुक्षमी रंजकः सदा ॥ १३७ ॥

ज्ञान-विज्ञान से संपन्न राजा के द्वारा अभय-दान पाने पर भी कोई भी व्यक्ति राजा के भय से उसके भारी दोष को उसके सामने नहीं कहता है। क्योंकि—ऐसा सुना जाता है कि विष्णु आदि देवताओं को भी स्तुति प्रिय लगती है तब फिर मनुष्यों की क्या बात है। और यह नित्य नियम है कि—क्रोध निन्दा से उत्पन्न होता है, इस कारण से राजा को उचित रीति से दण्ड देनेवाला, भली भांति सहन करनेवाला, सदा प्रजा का मनोरंजन करनेवाला होना चाहिये ।

यौवनं जीवितं वित्तं छाया लक्ष्मीश्च स्वामिता । चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥ १३८ ॥

१. यौवन (जवानी), २. जीवन, ३. धन, ४. छाया, ५. लक्ष्मी, ६. प्रभुत्व, ये ६ चञ्चल होते हैं, अतः यह जानकर राजा को धर्म में रत होना चाहिये ।

अदानेनापमानेन छलाच्च कटुवाक्यतः । राज्ञः प्रबलदण्डेन नृपं मुंचति वै प्रजा ॥ १३६ ॥

राजा के दान न करने से, अपमान से, छल से, कटुवचन से, प्रबल दण्ड से प्रजा उसको छोड़ देती है ।

अतिभीरुमतिदीर्घसूत्रं चातिप्रमादिनम् । व्यसनाद्विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥ १४० ॥

अत्यन्त भीरु ( डरपोक ), अत्यन्त दीर्घसूत्र ( धीरे २ कार्य करनेवाले ), अत्यन्त प्रमादी ( असावधान ) और व्यसन होने से विषयों ( भोगों ) में आसक्त रहनेवाले राजा की प्रजा सेवा नहीं करती है । ( अर्थात् त्याग देती है ) ।

विपरीतगुणैरेभिः सान्वया रज्यते प्रजा ।

इनसे विपरीत गुणवाले राजा से अपने वंश के साथ २ सारी प्रजा प्रसन्न रहती है ।

एकस्तनोति दुष्कीर्त्तिं दुर्गुणः संघशो न किम् ॥ १४१ ॥ मृगयाऽक्षास्तथा पानं गर्हितानि महीभुजाम् । दृष्टास्तेभ्यस्तु विपदः पांडुनैषधवृष्णिषु ॥ १४२ ॥

एक भी दुर्गुण दुष्कीर्त्ति को फैला देती है तो क्या समूह रूप से होने पर न फैलावेंगी अर्थात् फैलावेंगी ही । मृगया ( शिकार खेलना ), अक्ष ( जुआ खेलना ) और मद्यपान करना ये तीनों राजाओं के लिये निन्दित हैं, क्योंकि मृगया से पाण्डु की, जूए से नल की और मद्यपान से वृष्णियों (यदुकुलवालों) की विपत्ति देखी गयी है ।

प्रथमोऽध्यायः २३

कामक्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥ १४३ ॥
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मान, मद, इनकी 'षड्वर्ग' संज्ञा है। इनका परित्याग करना चाहिये। क्योंकि इनके परित्याग से राजा सुखी होता है।

दण्डक्यो नृपतिः कामात्क्रोधाच्च जनमेजयः ।
लोभाद्वैलस्तु राजर्षिर्मोहाद्वातापिरासुरः ॥ १४४ ॥
पौलस्त्यो राक्षसो मानान्मदाद्दम्भोद्भवो नृपः ।
प्रयाता निधनं ह्येते शत्रुषद्वर्गमाश्रिताः ॥ १४५ ॥
काम से दण्डक्य राजा, क्रोध से जनमेजय, लोभ से राजर्षि ऐल ( इळा के पुत्र ), मोह से वातापि नामक असुर, मान से पुलस्त्यवंशी रावण, मद से दम्भोद्भव नामक राजा का विनाश हुआ, क्योंकि इन सबों ने शत्रु के समान षड्वर्ग का आश्रय लिया था।

शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
अंबरीषो महाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥ १४६ ॥
शत्रुतुल्य इस षड्वर्ग को छोड़ देने से जमदग्नि के पुत्र प्रतापी परशुरामजी एवं महाराज अम्बरीष इन दोनों ने बहुत काल तक पृथ्वी का भोग किया ( राज्य किया )।

वर्धयंन्निह धर्मार्थौ सेवितौ सद्भिरादरात् ।
निगृहीतेंद्रियग्रामः कुर्वीत गुरुसेवनम् ॥ १४७ ॥
इस संसार में राजा सज्जनों के द्वारा सादर सेवित धर्म और अर्थ को बढ़ाता हुआ, अपने इन्द्रियों को वश में करता हुआ गुरु ( श्रेष्ठ, उपदेशक, माता-पिता आदि ) जनों का सेवन करै ।

शास्त्राय गुरुसंयोगः शास्त्रं विनयवृद्धये ।
विद्याविनीतो नृपतिः सतां भवति संमतः ॥ १४८ ॥
क्योंकि गुरुओं की सेवा से शास्त्र-ज्ञान होता है और शास्त्र-ज्ञान से विनय की वृद्धि होती है। अतः विद्या से उत्पन्न विनय से युक्त ही राजा सज्जनों द्वारा प्रशंसित होता है।

प्रेर्यमाणोप्यसद्वृत्तैर्नाकार्येषु प्रवर्तते ।
श्रुत्या स्मृत्या लोकतश्च मनसा साधु निश्चितम् ॥ १४९ ॥
यत्कर्मधर्मसंज्ञं तद्व्यवस्यति च पंडितः ।
आददानः प्रतिदिनं कलाः सम्यङ् महीपतिः ॥ १५० ॥
बुरे आचरण करनेवाले लोगों के प्रेरणा करने पर भी अच्छे-बुरे का विचार रखनेवाला समझदार राजा बुरे कार्य करने में प्रवृत्त नहीं होता है क्योंकि वह

२४ | शुक्रनीतिः

वेद, स्मृति तथा लोक-व्यवहार से अच्छा समझकर जो धर्मसंज्ञक सत्कर्म है उसका पालन करता है अतः प्रत्येक कार्य के करने न करने की कला में निपुण होने से अच्छा राजा कहलाता है ।

जितेंद्रियस्य नृपतेर्नीतिशास्त्रानुसारिणः ।
भवंत्युच्छलिता लक्ष्म्यः कीर्तयश्च नभःस्पृशः ॥ १५१ ॥

इस प्रकार से जितेन्द्रिय होकर नीति शास्त्र का अनुसरण करनेवाले राजा के घर में लक्ष्मी उछलती रहती है तथा उसकी कीर्त्ति स्वर्ग तक फैल जाती है ।

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दंडनीतिश्च शाश्वती ।
विद्याश्चतस्र एवैता अभ्यसेन्नृपतिः सदा ॥ १५२ ॥

आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण— आन्वीक्षिकी (गौतमादि-रचित तर्क-शास्त्रादि), त्रयी (अङ्ग के सहित ऋक्, यजु, साम ये ३ वेद), वार्त्ता (व्यवहार शास्त्र), दण्डनीति (अर्थशास्त्र) ये चारों विद्यायें सनातन हैं । राजा को इनका सदा अभ्यास करना चाहिये ।

आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं वेदांताद्यं प्रतिष्ठितम् ।
त्रय्यां धर्मो ह्यधर्मश्च कामोऽकामः प्रतिष्ठितः ॥ १५३ ॥
अर्थानर्थौ तु वार्तायां दंडनीत्यां नयानयौ ।
वर्णाः सर्वाश्रमाश्चैव विद्यास्वासु प्रतिष्ठिताः ॥ १५४ ॥

यहां पर 'आन्वीक्षिकी' में तर्कशास्त्र-वेदान्तादि की और 'त्रयी' में धर्म, अधर्म, काम, मोक्ष इनकी बातें हैं । 'वार्त्ता' में अर्थ और अनर्थ विषय का एवं 'दण्डनीति' में न्याय, अन्याय, ४ वर्ण, ४ आश्रम के विषयों का ज्ञान है । इस भांति से इन विद्याओं में ये सब बातें भरी हुई हैं ।

अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
धर्मशास्त्रपुराणानि त्रयीदं सर्वमुच्यते ॥ १५५ ॥

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द ये ६ वेद के अङ्ग, ऋग्, यजु, साम, अथर्व ये ४ वेद, मीमांसा, न्याय शास्त्र का विस्तार, धर्मशास्त्र, पुराण इन सबों को 'त्रयी' कहते हैं ।

कुसीदकृषिवाणिज्यं गोरक्षा वार्तयोच्यते ।
संपन्नो वार्तया साधुर्न वृत्तेर्भयमृच्छति ॥ १५६ ॥

कुसीद (सूद लेना), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), गोपालन, इन सबों को वार्त्ता कहते हैं । इस वार्त्ता-शास्त्र का भली-भांति ज्ञान रखने-वाला राजा जीविका-संबन्धी भय को नहीं प्राप्त करता है ।

दम्मो दंड इति ख्यातस्तस्माद्दंडो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्डनीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ १५७ ॥

प्रथमोऽध्यायः २५

प्रथमोऽध्यायः २५

दमको 'दण्ड' कहते हैं। इससे (दण्ड देने से) राजा दण्ड रूप है। उसकी नीति को दण्डनीति कहते हैं। नयन अर्थात् ले जाने से नीति कहते हैं। भावार्थ यह है कि—दण्ड नीति से राजनीति का ग्रहण किया है क्योंकि इसी से वह प्रजाओं को अपने २ धर्म की ओर ले जाता है।

आन्वीक्षिक्यात्मविज्ञानाद्धर्षशोकौ व्युदस्यति ।
उभौ लोकाववाप्नोति त्रय्यां तिष्ठन्यथाविधि ॥ १५८ ॥

आन्वीक्षिकी विद्या आत्मज्ञान कराने से हर्ष तथा शोक को दूर करती है। त्रयी विद्या के अनुसार यथाविधि-कार्य करता हुआ राजा इहलोक तथा परलोक दोनों में सुख प्राप्त करता है।

आनृशंस्यं परो धर्मः सर्वप्राणभृतां यतः ।
तस्माद्राजाऽऽनृशंस्येन पालयेत्कृपणं जनम् ॥ १५९ ॥

सब प्राणियों के संबन्ध में क्रूरता न करना ही परम धर्म है। अतः राजा अक्रूरता से दीन-निःसहाय जन का पालन करे।

नहि स्वसुखमन्विच्छन्पीडयेत्कृपणं जनम् ।
कृपणः पीड्यमानः स्वमृत्युना हंति पार्थिवम् ॥ १६० ॥

और केवल, अपने सुख की इच्छा से दीनजन को पीडा न पहुँचाये, क्योंकि पीडित किया जाता हुआ दीन अपनी मृत्यु से (पीडा पहुँचाने से) राजा को नष्ट कर देता है।

सुजनैः संगमं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ।
सेव्यमानस्तु सुजनैर्महानतिविराजते ॥ १६१ ॥

सुजनों के साथ संगति करने का निर्देश—धर्म और सुख पाने के लिये सुजनों के साथ संगति रखनी चाहिये, क्योंकि सुजनों से सेवित राजा अत्यन्त महत्त्व को प्राप्त कर सुशोभित होता है।

हिमांशुमालीव तथा नवोत्फुल्लोत्पलं सरः ।
आनंदयति चेतांसि यथा सुजनचेष्टितम् ॥ १६२ ॥

जैसे चन्द्रमा तथा नवीन खिले कमलोंवाला तालाब लोगों के चित्त को आनन्दित करता है उसी भांति सुजनों का व्यवहार भी आनन्दित करता है॥

ग्रीष्मसूर्यांशुसंतप्तमुद्वेजनमनाश्रयम् ।
मरुस्थलमिवोद्दण्डं त्यजेद् दुर्जनसंगतम् ॥ १६३ ॥

ग्रीष्मऋतु के सूर्य की किरणों से अत्यन्त संतप्त, उद्वेग पैदा करनेवाला, छाया के लिये वृक्षादि के आश्रय से हीन मरुभूमि की भांति उद्दण्ड दुर्जन की संगति का परित्याग करना चाहिये।

निःश्वासोद्गीर्णहुतभुग्-धूमधूम्रीकृताननैः ।

२६ | शुक्रनीतिः

वरमाशीविषैः संगं कुर्यान्न त्वेव दुर्जनैः ॥ १६४ ॥ निःश्वास से निकले हुये विषाग्नि के धूम से धूमिल मुखवाले सर्पों का साथ रखना अच्छा है किन्तु दुर्जनों का साथ अच्छा नहीं है।

क्रियतेऽभ्यर्हणीयाय सुजनाय यथांऽजलिः ।
ततः साधुतरः कार्यो दुर्जनाय हितार्थिना ॥ १६५ ॥
हित चाहनेवाले व्यक्ति के लिये उचित है कि वह जिस प्रकार आदरणीय सज्जनों के लिये हाथ जोड़ता है उससे अधिक दुर्जन के लिये हाथ जोड़े अर्थात् सुजन से अधिक दुर्जन का संमान उसके प्रसन्नतार्थ करे ।

नित्यं मनोपहारिण्या वाचा प्रह्लादयेज्जगत् ।
उद्वेजयति भूतानि क्रूरवाग्धनदोऽपि सन् ॥ १६६ ॥
**मनोहर वचन बोलने का निर्देश—**नित्य मनोहर वचनों से जगत् को आनन्दित करना चाहिये । क्योंकि यदि धन देनेवाला कुबेर के समान भी हो किन्तु क्रूर वाणी बोलने से वह मनुष्यों को उद्विग्न ही करता है ।

हृदि विद्ध इवात्यर्थं यथा संतप्यते जनः ।
पीडितोऽपि हि मेधावी न तां वाचमुदीरयेत् ॥ १६७ ॥
पीडित होने पर भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी वाणी न बोले जिससे सुनने वाला व्यक्ति हृदय में बाण से विद्ध हुये की भांति अत्यन्त छटपटाने लगे ।

प्रियमेवाभिधातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु वा ।
शिखीव केकां मधुरां वाचं ब्रूते जनप्रियः ॥ १६८ ॥
सज्जन अथवा दुर्जन सभी के साथ सदा मधुर वचन बोलना चाहिये, क्योंकि जो मनुष्य मयूर की भांति प्रिय वचन बोलता है वह जनप्रिय होता है ।

मदरक्तस्य हंसस्य कोकिलस्य शिखंडिनः ।
हरंति न तथा वाचो यथा वाचो विपश्चिताम् ॥ १६९ ॥
मद से युक्त हंस, कोकिल या मयूर की वाणी वैसा मनको नहीं हरण करती है जैसा अच्छे विद्वानों की वाणी ।

ये प्रियाणि प्रभाषंते प्रियमिच्छंति सत्कृतम् ।
श्रीमन्तो वंद्यचरिता देवास्ते नरविग्रहाः ॥ १७० ॥
जो लोग प्रिय वचन बोलते हैं और अपने प्रिय का सत्कार करना चाहते हैं, ऐसे प्रशंसनीय चरितवाले श्रीमान लोग मनुष्य रूप में देवता ही हैं ॥

नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १७१ ॥
तीनों लोकों में ऐसा दूसरा कोई वशीकरण नहीं है जैसा कि—प्राणियों

प्रथमोऽध्यायः २७

पर दया तथा मैत्री का भाव रखना एवं उन्हें अभीष्ट दान देना तथा प्रिय वचन बोलना है, इनसे मनुष्य वशीभूत हो जाता है।

श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवतां सदा।
देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम् ॥ १७२ ॥
आस्तिकता से पवित्र चित्त होकर सदा देवता की पूजा करै और देवता की भांति गुरुजनों की एवं अपने समान सुहृज्जनों का संमान करै ॥

प्रणिपातेन हि गुरून् सतोऽनूचानचेष्टितैः।
कुर्वीताभिमुखान्देवान् भृत्यै सुकृतकर्मणाम् ॥ १७३ ॥
साङ्ग-वेदज्ञ ब्राह्मणों से युक्त होकर राजा प्रणाम के द्वारा गुरुजनों तथा सज्जनों एवं देवताओं को अपने अनुकूल करै। इससे पुण्य की वृद्धि होती है और उससे वह सुखी होता है।

सद्भावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन च बांधवान्।
स्त्रीभृत्यो प्रेममानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम् ॥ १७४ ॥
सद्भाव से मित्र तथा बान्धवों के, प्रेम तथा मान (सत्कार) से स्त्री और भृत्य के एवं मनके अनुकूल कार्य करने से मूर्ख के चित्त को अपने वशीभूत करे।

बलवान्बुद्धिमाञ्शूरो यो हि युक्तपराक्रमो।
वित्तपूर्णां महीं भुंक्ते स भूयो भूपतिर्भवेत् ॥ १७५ ॥
जो राजा बलवान, बुद्धिमान, शूर तथा उचित समय पर पराक्रम करने-वाला होता है, वह धन से पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता है और वही राजा वस्तुतः राजा है।

पराक्रमो बलं बुद्धिः शौर्यमेते वरा गुणाः।
एभिर्हीनोऽन्यगुणयुग्महीभुक् सधनोऽपि च ॥ १७६ ॥
महीं स्वल्पां नैव भुंक्ते द्रुतं राज्याद्विनश्यति।
महाधनाच्च नृपतेर्विमात्यल्पोऽपि पार्थिवः ॥ १७७ ॥
अव्याहताज्ञस्तेजस्वी एभिरेव गुणैर्भवेत्।
राज्ञः साधारणास्त्वन्ये न शक्ता भूप्रसाधने ॥ १७८ ॥
पराक्रम, बल, बुद्धि, शूरता ये श्रेष्ठ गुण कहलाते हैं। इन गुणों से हीन होकर यदि इनसे भिन्न गुणों से युक्त भी हो और धनवान भी हो तो वह राजा थोड़ी भी भूमि का स्वामी नहीं होता है और यदि हो तो उसका राज्य शीघ्र नष्ट हो जाता है। महाधनवान् राजा की अपेक्षा छोटा राजा भी सुशोभित होता है क्योंकि पराक्रमादि इन्हीं गुणों से उसकी आज्ञा नहीं टाली जाती है और वह तेजस्वी होता है। राजा के इससे भिन्न सभी गुण साधारण माने जाते हैं उनसे पृथ्वी-पालन या राज्य का विस्तार नहीं हो सकता है।

२८ | शुक्रनीतिः

खनिः सर्वधनस्येयं देवदैत्यविमर्दिनी । भूम्यर्थे भूमिपतयः स्वात्मानं नाशयन्त्यपि ॥ १७९ ॥

यह पृथ्वी सब धनों की खान तथा देवता और दैत्यों का नाश कराने वाली है क्योंकि राजा लोग पृथ्वी के लिये अपने को भी नष्ट कर देते हैं ।

उपभोगाय च धनं जीवितं येन रक्षितम् । न रक्षिता तु भूर्येन किं तस्य धनजीवितैः ॥ १८० ॥

जिसने उपभोग करने के लिये अपने धन तथा जीवन की रक्षा की, किन्तु पृथ्वी की रक्षा नहीं की, उसके धन तथा जीवन से क्या है अर्थात् कुछ लाभ नहीं है।

न यथेष्टव्ययायालं संचिते नु धनं भवेत् । सदागमाद्विना कस्य कुबेरस्यापि नाञ्जसा ॥ १८१ ॥

चाहे वह कुबेर ही क्यों न हो किसी का भी संचित धन नित्य धनागम के बिना इच्छानुसार व्यय करने के लिये योग्य नहीं होता है अर्थात् एक दिन समाप्त हो जाता है । इसलिये पृथ्वी धन से बढ़कर अन्य कोई धन नहीं है ।

पूज्यस्त्वेभिर्गुणैर्भूषो न भूपः कुलसंभवः । न कुले पूज्यते यादृग्बलशौर्यपराक्रमैः ॥ १८२ ॥

इन पूर्वोक्त गुणों से ही राजा वस्तुतः पूज्य होता है, राजकुल में केवल उत्पन्न होने से नहीं, क्योंकि जैसी प्रतिष्ठा बल, शूरता और पराक्रम से होती है वैसी केवल कुल से राजा की प्रतिष्ठा नहीं होती ।

लक्षकर्षमितो भागो राजतो यस्य जायते । वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ १८३ ॥ सामंतः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि । तदूर्ध्वं दशलक्षांतो नृपो मांडलिकः स्मृतः ॥ १८४ ॥ तदूर्ध्वं तु भवेद्राजा यावद्विंशतिलक्ष्षकः । पंचाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः ॥ १८५ ॥

**राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश—**जिसके राज्य से प्रतिवर्ष बिना प्रजा को पीडित किये ही एक लक्ष (१०००००) रजत (चांदी का) कर्ष (रूपया) से लेकर ३ लक्ष तक वार्षिक कर (मालगुजारी) मिलता है वह राजा 'सामन्त' कहलाता है । उसके बाद १० लक्ष पर्यन्त वार्षिक कर मिलने से 'माण्डलिक' राजा और उसके बाद २० लक्षतक वार्षिक कर मिलने से 'राजा' कहलाता है एवं ५० लक्ष तक वार्षिक कर मिलने से 'महाराज' कहलाता है ।

ततस्तु कोटिपर्यतः स्वराट् सम्राट् ततः परम् ।

प्रथमोऽध्यायः २६

प्रथमोऽध्यायः २६

दशकोटिमितो यावद्विराट् तु तदनन्तरम् ॥ १८६ ॥ उसके बाद १ कोटि ( करोड़ ) पर्यन्त वार्षिक आय होने से राजा 'स्वराट्' कहलाता है और उसके बाद १० कोटि पर्यन्त आय होने से 'सम्राट्' कहलाता है । उसके बाद ५० कोटि पर्यन्त 'विराट्' कहलाता है ।

पञ्चाशत्कोटिपर्यतं सार्वभौमस्ततः परम् । सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत्सदा ॥ १८७ ॥ इससे अधिक वार्षिक आय होने से राजा 'सार्वभौम' कहलाता है और इसके सदा अधीन सातो द्वीपों से युक्त संपूर्ण पृथ्वी रहती है ।

स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृपः कृतः । ब्रह्मणा स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ १८८ ॥ प्रजाओं से अपना वार्षिक कर रूप वेतन स्वीकार करने से स्वामी रूप में स्थित राजा को ब्रह्मा जी ने प्रजाओं के पालनार्थ सदा दास बनाया है।

सामन्तादिसमा ये तु भृत्या अधिकृता भुवि । तेन सामन्तसंज्ञाः स्यु राजभागहराः क्रमात् ॥ १८६ ॥ राजा के द्वारा भूमि का कर संग्रह करने के लिये रखे हुये जो नौकर सामन्त आदि के तुल्य हैं अर्थात् १ लाख कर संग्रह करते हैं वे 'अनुसामन्त' कहलाते हैं।

सामन्तादिपदभ्रष्टास्तत्तुल्यं भृतिपोषिताः । महाराजादिभिस्ते तु हीनसामन्तसंज्ञकाः ॥ १९० ॥ जो महाराज आदि के द्वारा सामन्त आदि पद से हटाकर उसके तुल्य वेतन देकर पालित होते हैं वे 'हीनसामन्त' कहलाते हैं ।

शतग्रामाधिपो यस्तु सोऽपि सामन्तसंज्ञकः । शतग्रामे चाधिकृतोऽनुसामन्तो नृपेण सः ॥ १९१ ॥ और १०० ग्रामों का जो अधिपति होता है वह भी 'सामन्त' कहलाता है । और जो राजा द्वारा १०० ग्रामों का कर-संग्रहार्थ वेतन देकर नियुक्त किया जाता है वह भी 'अनुसामन्त' कहलाता है ।

अधिकृतो दशग्रामे नायकः स च कीर्तितः । आशापालोऽयुतग्रामभागभाक् च स्वराडपि ॥ १९२ ॥ दश ग्रामों का कर-संग्रहार्थ जो अधिकारी (वेतन देकर) नियुक्त किया जाता है वह 'नायक' कहलाता है। और १०००० दश हजार ग्रामों से कर ग्रहण करने वाला 'आज्ञापाल' अथवा 'स्वराट्' कहलाता है ।

भवेत्क्रोशात्मको ग्रामो रूप्यकर्षसहस्रकः । ग्रामार्धकं पल्लिसंज्ञं पल्ल्यर्धं कुंभसंज्ञकम् ॥ १६३ ॥

३०शुक्रनीतिः

भूमि के मानभेदों का निर्देश—ग्राम १ क्रोश वर्ग का होता है । और उसकी मालगुजारी १००० रजत मुद्रा (रुपये) की होती है । ग्राम का आधा प्रमाण 'पल्ली' का होता है और पल्ली का आधा प्रमाण 'कुम्भ' का होता है ।

करैः पंचसहस्रैर्वा क्रोशः प्रोक्तः प्रजापतेः ।
हस्तैश्चतुःसहस्रैर्वा मनोः क्रोशस्य बिस्तरः ॥ १६४ ॥

पांच हजार ५००० हाथों का प्रजापति-संबन्धी 'क्रोश' होता है । और चार हजार ४००० हाथों का विस्तार मनु-सम्बन्धी क्रोश का होता है ।

सार्ध द्विकोटिहस्तैश्च क्षेत्रं क्रोशस्य ब्रह्मणः ।
पंचविंशशतैः प्रोक्तं क्षेत्रं तद्विनिवर्तनैः ॥ १६५ ॥

ढाई २॥ करोड़ हाथों का ब्रह्मा के क्रोश का क्षेत्र होता है । और उसके २५०० विनिवर्तनों से क्षेत्र कहलाता है ।

मध्यमामध्यमपर्वदैर्घ्यं यच्चतुरंगुलम् ।
यवोदरैरष्टभिस्तु दैर्घ्यं स्थौल्यं तु पंचभिः ॥ १६६ ॥

मध्यमा अंगुलि के मध्यम पर्व की भांति लम्बाई १ अंगुल की होती है । और ८ जौ के उदर के समान लम्बाई तथा पांच जौ के उदर की भांति मुटाई १ अंगुल की होती है ।

चतुर्विंशत्यंगुलैस्तैः प्राजापत्यः करः स्मृतः ।
स श्रेष्ठो भूमिमाने तु तदन्यास्त्वधमा मताः ॥ १६७ ॥

वैसी २४ अंगुलियों का १ प्राजापत्य कर (हाथ) होता है । और भूमि के नापने में यही श्रेष्ठ होता है, इससे अन्य सभी अधम कहलाते हैं ।

चतुःकरात्मको दंडो लघुः पंचकरात्मकः ।
तदङ्गुलं पंचयवैर्मानवं मानमेव तत् ॥ १६८ ॥

४ हाथ का जो 'दण्ड' होता है वह 'लघु' कहलाता है । और ५ हाथ का दण्ड 'दीर्घ' कहलाता है । और जो ५ जौ का अंगुल होता है वह मानव-मान से होता है ।

वसुषण्मुनिसंख्याकैर्यवैर्दण्डः प्रजापतेः ।
यवोदरैः षट्शतैस्तु मानवो दण्ड उच्यते ॥ १६९ ॥

७६८ यव-प्रमाण 'प्रजापति' का दण्ड होता है । ६०० यव-प्रमाण 'मानव दण्ड' होता है ।

पंचविंशतिभिर्दण्डैरुभयोस्तु निवर्तनम् ।
त्रिंशच्छतैरङ्गुलैर्यवैश्चापि पञ्चसहस्रकैः ॥ २०० ॥

२५ पचीस दण्डों का दोनों का निवर्तन होता है । अथवा ३००० अंगुल या १५००० यवों का उक्त निवर्तन होता है ।

प्रथमोऽध्यायः ३१

सपादशतहस्तैश्च मानवं तु निवर्त्तनम् ।
ऊनविंशतिसाहस्रैर्द्विशतैश्च यवोदरैः ॥ २०१ ॥
१२५ हाथों का मानव निवर्त्तन होता है या १९२०० यवों का होता है ।

चतुर्विंशशतैरेव ह्यंगुलैश्च निवर्त्तनम् ।
प्राजापत्यं तु कथितं शतैश्चैव करैः सदा ॥ २०२ ॥
२४०० अंगुलों का निवर्त्तन होता है, १०० हाथों का प्राजापत्य निवर्त्तन होता है ।

सपादषट्शतं दंडा उभयोश्च निवर्त्तने ।
निवर्त्तनान्यपि सदोभयोर्वै पंचविंशतिः ॥ २०३ ॥
दोनों के निवर्त्तन में ६२५ दण्ड होते हैं । उन दोनों के निवर्त्तन सदा २५ होते हैं ।

पंचसप्ततिसाहस्रैरंगुलैः परिवर्त्तनम् ।
मानवं षष्टिसाहस्रैः प्राजापत्यं तथांगुलैः ॥ २०४ ॥
७५००० अङ्गुलों का 'मानव'-संज्ञक परिवर्त्तन और ६०००० अङ्गुलों का 'प्राजापत्य' परिवर्त्तन होता है ।

पञ्चविंशाधिकैर्हस्तैरेकत्रिंशशतैर्मनोः ।
परिवर्त्तनमाख्यातं पञ्चविंशशतैः करैः ॥ २०५ ॥
प्राजापत्यं पादहीनचतुर्लक्षयवोन्मनोः ।
अशीत्यधिकसाहस्रचतुर्लक्षयवैः परम् ॥ २०६ ॥
३१२५ हाथों का 'मानव' परिवर्त्तन और २५०० हाथों का 'प्राजापत्य' परिवर्त्तन होता है । और ३००००० यवों का 'मानव परिवर्त्तन' होता है । ३८०००० यवों का 'प्राजापत्य परिवर्त्तन' होता है ।

निवर्त्तनानि द्वात्रिंशन्मनुमानेन तस्य वै ।
चतुःसहस्रहस्ताः स्युर्दंडाश्चाष्टशतानि हि ॥ २०७ ॥
मनु के मान से ३२ निवर्त्तनों का ४००० हाथ, और ८०० दण्ड होते हैं ।

पंचविंशतिभिर्दण्डैर्भुजः स्यात्परिवर्त्तने ।
करैरयुतसंख्याकैः क्षेत्रं तस्य प्रकीर्त्तितम् ॥ २०८ ॥
परिवर्त्तन में २५ दण्डों का भुज होता है १०००० दश हजार हाथों का परिवर्त्तन का क्षेत्र होता है ।

चतुर्भुजैः समं प्रोक्तं कृष्टभूपरिवर्त्तनम् ।
प्राजापत्येन मानेन भूभागहरणं नृपः ॥ २०९ ॥
सदा कुर्याच्च स्वायत्तैर्मनुमानेन नान्यथा ।
लोभात् सङ्कर्षयेद्यस्तु हीयते सप्रजो नृपः ॥ २१० ॥

३२ शुक्रनीतिः

जोती हुई भूमि का परिवर्तन ४ भुजों के समान कहा गया है। राजा सदा 'प्राजापत्य' मान से पृथ्वी के भाग का ग्रहण करे। और आपत्ति-काल में 'मानव' मान से ग्रहण करे। इससे अन्यथा रीति से भूभाग न ग्रहण करे। यदि लोभवश प्रजा से उक्त नियम से अधिक भूभाग ग्रहण करता है तो वह प्रजा-सहित हीन हो जाता है।

न दद्याद् द्व्यंगुलमपि भूमेः स्वत्वनिवर्तकम्।
वृत्त्यर्थं कल्पयेद्वापि यावद्ब्रूयात्स्तु जीवति ॥ २११ ॥

और दो अङ्गुल भी भूमि बिना कर की न छोड़े अर्थात् सब पर कर लगाकर देवे। अथवा जितने से वह अपनी जीविका चला सके उतनी भूमि उसे दे देवे। ऐसा राजा का कर्त्तव्य है।

गुणी तावद् देवतार्थं विसृजेच्च सदैव हि।
आरामार्थं गृहार्थं वा दद्याद् दृष्ट्वा कुटुम्बिनम् ॥ २१२ ॥

गुणवान राजा देवता के मन्दिर या बगीचा-निर्माणार्थ सदा भूमि का बिना कर के दान करे और कुटुम्बी को देखकर उसे गृह-निर्माणार्थ भूमि देवे।

नानावृक्षलताकीर्णे पशुपक्षिगणावृते।
सुबहूदकधान्ये च तृणकाष्ठसुखे सदा ॥ २१३ ॥
आसिंधुनौगमाकूले नातिदूरमहीधरे।
सुरम्यसमभूदेशे राजधानीं प्रकल्पयेत् ॥ २१४ ॥

राजधानी बनाने योग्य प्रदेश के लक्षण—नाना प्रकार के वृक्ष तथा लता से व्याप्त, पशु तथा पक्षिगणों से युक्त, बहुत जल तथा धान्य से पूर्ण, सदा तृण तथा काष्ठ मिलने की सुविधा से युक्त, समुद्र पर्यन्त नौका से गमन करने लायक नदी के तट एवं सुरम्य सम भूमिवाले ऐसे भूप्रदेश में राजा राजधानी का निर्माण करे।

अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा चतुरस्रां सुशोभनाम्।
सप्राकारां सपरिखां ग्रामादीनां निवेशिनीम् ॥ २१५ ॥
सभामध्यां कूपवापीतडागादियुतां सदा।
चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारां सुमार्गारामवीथिकाम् ॥ २१६ ॥
दृढसुरालयमठपान्थशालाभिरजिताम् ।
कल्पयित्वा वसेत्तत्र सुगुप्तः सप्रजो नृपः ॥ २१७ ॥

देखने में अर्धचन्द्र या गोल या चौकोर आकारवाली, अत्यन्त शोभायमान, प्राकार (चहारदीवारी) और परिखा (खाई) से युक्त, ग्रामादि बसाने लायक हो और जिसके मध्य में सभा-मण्डप हो, एवं सदा, कूप, बावली, तड़ाग आदि से युक्त, चारों दिशाओं में ४ द्वार बने हुये, सुन्दर मार्ग, बगीचा,

प्रथमोऽध्यायः ३३

प्रथमोऽध्यायः ३३

गढी से युक्त, मजबूत मन्दिर, मठ, धर्मशाला से सुशोभित ऐसी राजधानी बनाकर राजा उसमें प्रजासहित सुरक्षित रह कर निवास करे ।

राजगृहं सभामध्यं गवाश्वगजशालिकम् । प्रशस्तवापीकूपादिजलयन्त्रैः सुशोभितम् ॥ २१८ ॥

सर्वतः स्यात्समभुजं दक्षिणोच्चमुदङ्नतम् । शालां विना नैकभुजं तथा विषमबाहुकम् ॥ २१९ ॥

प्रायः शाला नैकभुजा चतुःशालं बिना शुभा । शस्त्रास्त्रधारिसंयुक्तप्राकारं सुष्ठु यन्त्रकम् ॥ २२० ॥

सत्रिकक्षचतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु सुशोभनम् । दिवा रात्रौ सशस्त्रास्त्रैः प्रतिकक्षासु गोपितम् ॥ २२१ ॥

चतुर्भिः पंचभिः षड्भिर्यामिकैः परिवर्तकैः । नानागृहोपकार्यादृ्ट्रिसंयुतं कल्पयेत्सदा ॥ २२२ ॥

राजधानी में राजोचित विविध शालायें बनाने का निर्देश—और राज- धानी में राजा का गृह ऐसा हो कि जिसके मध्य में सभामवन हो, और उसके अन्दर गोशाला, अश्वशाला तथा गजशाला बनी हो, अच्छी बावड़ी, कूप आदि एवं फुआरों से भलीभांति सुशोभित हो । और जिसके चारों भुज सम हों एवं जो दक्षिण की तरफ ऊँचा और उत्तर की तरफ नीचा हो, जिसमें शाला के बिना एक भुज तथा विषम भुज न हो । क्योंकि चतुःशाल ( जिसके चारो तरफ गृह हों ) के बिना अन्य शाला एक भुज होने से शुभदायिका नहीं होती है । शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले सैनिकों से युक्त, और अच्छे-अच्छे यन्त्रों से युक्त परिखा तथा चहारदीवारी से घिरा, तीन कक्षायों एवं चारों दिशाओं में ४ द्वारों से युक्त, सुन्दर हो और जिसमें दिन-रात शस्त्रास्त्र-धारी प्रहर २ पर बदलते हुये घूम २ कर पहरा देनेवाले ४, ५ या ६ चौकीदारों से प्रत्येक कक्षायें सुरक्षित हों, सदा नाना प्रकार के गृह, तम्बू, शामियाना, अटारो से युक्त ऐसा राजभवन सदा बनावें ।

वस्त्रादिमार्जनार्थं च स्नानार्थं यजनार्थकम् । भोजनार्थं च पाकार्थं पूर्वस्यां कल्पयेद् गृहम् ॥ २२३ ॥

और उसमें वस्त्र धोने के लिये और स्नान तथा यज्ञ करने के लिये एवं भोजन खाने-पकाने के लिये पूर्व दिशा में गृहों का निर्माण करे ।

निद्रार्थं च विहारार्थं पानार्थं रोदनार्थकम् । धान्यार्थं घरटार्थं दासीदासार्थमेव च ॥ २२४ ॥

उत्सर्गार्थं गृहान्कुर्याद्दक्षिणस्यामनुक्रमात् । गोमृगोष्ट्रगजाद्यार्थे गृहान्प्रत्यक् प्रकल्पयेत् ॥ २२५ ॥

३ शु०

३४ · शुक्रनीतिः

और सोने के लिये, विहार, जलपान तथा रोदन करने के लिये, धान्य आदि तथा जांत रखने के लिये, दासी-दासों के रहने के लिये एवं मल-मूत्रादि त्याग करने के लिये क्रम से ( सिलसिलेवार ) गृह दक्षिण दिशा में बनवावे । और गो, मृग, ऊंट, हाथी आदि के लिये पश्चिम दिशा में गृह बनवावे ।

रथवाज्यस्त्रशस्त्रार्थं व्यायामायामिकार्थकम् ।
वस्त्रार्थकं तु द्रव्यार्थं विद्याभ्यासार्थमेव च ॥ २२६ ॥
उदग्गृहान् प्रकुर्वीत सुगुप्तान् सुमनोहरान् ।
यथासुखानि वा कुर्याद् गृहाण्येतानि वै नृपः ॥ २२७ ॥

रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र के लिये, कसरत का विस्तार करने के लिये, वस्त्र तथा द्रव्य रखने एवं विद्याभ्यास करने के लिये सुरक्षित तथा सुन्दर गृह उत्तर दिशा में बनवाये । अथवा राजा अपनी सुविधा के अनुसार इन सब गृहों को बनवावे ।

धर्माधिकरणं शिल्पशालां कुर्यादुदग्गृहात् ।
पंचमांशाधिकोच्छ्राया भित्तिर्विस्तारतो गृहे ॥ २२८ ॥

राजा भवन से उत्तर दिशा की ओर कचहरी और शिल्पशाला ( चित्रादि-गृह ) बनवावे । गृह की लम्बाई से पांचवें भाग के बराबर ऊंची भीत बनवावे ।

कोष्ठविस्तारषष्ठांशस्थूला सा च प्रकीर्तिता ।
एकभूमेरिदं मानमूर्ध्वमूर्ध्वं समं ततः ॥ २२९ ॥

कोठरी के लम्बान से छठवां भाग के समान मोटी भीत उठानी चाहिये । यह एक मञ्जिले मकान के लिये मान कहा है । इसके बाद ऊपर-ऊपर के अन्य मंजिलों का भी इसी भांति समझना चाहिये ।

स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि पृथक्कोष्ठानि संन्यसेत् ।
त्रिकोष्ठं पञ्चकोष्ठं वा सप्तकोष्ठं गृहं स्मृतम् ॥ २३० ॥

स्तम्भों अथवा भित्तियों से पृथक् कोठरियों को बनवावे । और एक गृह में ३-५ अथवा ७ कोठरियां बनवावे ।

द्वारार्थमष्टधा भक्तं द्वारस्यांशौ तु मध्यमौ ।
द्वौ द्वौ ज्ञेयौ चतुर्दिक्षु धनपुत्रप्रदौ नृणाम् ॥ २३१ ॥

द्वार बनाने के लिये गृह के आठ भाग करके उसमें से बीच के दो भागों में द्वार बनाना चाहिये । इसी भांति से चारो दिशाओं में मध्यम के दो २ भागों में द्वार बनाना चाहिये । ऐसे द्वार मनुष्यों के धन तथा पुत्र देनेवाले होते हैं ।

प्रथमोऽध्यायः ३५

तत्रैव कल्पयेद् द्वारं नान्यथा तु कदाचन ।
वातायनं पृथक्कोष्ठे कुर्याद्वाह्यत्सुखावहम् ॥ २३२ ॥
उन्हीं भागों में द्वार बनाना चाहिये इससे अन्य भागों में कभी नहीं द्वार बनाना चाहिये । और प्रत्येक कोठरियों में सुविधानुसार हवा आने के लिये जंगले बनवावे ।

अन्यगृहद्वारविद्धं गृहद्वारं न चिन्तयेत् ।
वृक्षकोणस्तम्भमार्गपीठकूपैश्च वेधितम् ॥ २३३ ॥
अन्य किसी गृह के द्वार से विद्ध (वेध खाता हुआ) गृह का द्वार नहीं बनाना चाहिये। एवं वृक्ष, कोण, स्तम्भ, मार्ग बैठने का चबूतरा तथा कूप से भी विद्ध गृहद्वार नहीं होना चाहिये ।

प्रासादमण्डपद्वारे मार्गवेधो न विद्यते ।
गृहपीठं चतुर्थांशमुद्रा यस्य प्रकल्पयेत् ॥ २३४ ॥
प्रासाद (राजा या देवता का मन्दिर) और मण्डप के द्वार में मार्ग के वेध का विचार नहीं करना चाहिये । गृहपीठ का प्रमाण प्रासाद या मण्डप के चतुर्थांश तुल्य होना चाहिये ।

प्रासादानां मण्डपानामर्धांशं वाऽपरे जगुः ।
परवातायनैर्विद्धं नापि वातायनं स्मृतम् ॥ २३५ ॥
कोई २ ऋषि प्रासाद या मण्डप के अर्द्धांश तुल्य गृहपीठ का प्रमाण बताते हैं। दूसरे जंगलों से जंगला विंधा हुआ नहीं होना चाहिये ।

विस्ताराधार्शामण्डोच्चाच्छर्द्दिः खर्परसम्भवा ।
पतितं तु जलं तस्यां सुखं गच्छति वाप्यधः ॥ २३६ ॥
हीना निम्ना छदिर्न स्याद्याष्टकोष्ठस्य विस्तरः ।
गृह के विस्तार के अर्द्धांश के तुल्य खपड़े की छाजन की मूल ऊंचाई होनी चाहिये। जिससे उसके ऊपर गिरी हुई जल की धारा सुखपूर्वक नीचे गिर जाय । जैसा कोठरी का विस्तार हो उससे हीन या निम्न उसका छाजन नहीं होना चाहिये ।

स्वोच्छ्रायस्यार्धमूलो वा प्राकारः सममूलकः ॥ २३७ ॥
तृतीयांशकमूलो वा ह्युच्छ्रायार्धप्रविस्तरः ।
उच्छ्रितस्तु तथा कार्यो दस्युभिर्न विलंघ्यते ॥ २३८ ॥
और अपनी ऊँचाई से आधा या समान मूल भाग जिसका है ऐसा प्राकार (चाहारदीवारी) होना चाहिये । अथवा ऊंचाई के तृतीयांश के बराबर मूलभाग एवं ऊंचाई की आधी चौड़ाई प्राकार की होनी चाहिये । और उसकी ऊंचाई उतनी होनी चाहिये, जिससे डाकू लोग उसे नाघ न सकें ।

३६ | शुक्रनीतिः

यामिकै रक्षितो नित्यं नाळिकास्त्रैश्च संयुतः ।
सुबहुदृढगुल्मश्च सुगवाक्षप्रणालिकः ॥ २३९ ॥
स्वहीनप्रतिप्राकारो ह्यसमीपमहीधरः ।
परिखा च ततः कार्या खाताद् द्विगुणविस्तरा ॥ २४० ॥
नातिसमीपप्राकारा ह्यगाधसलिला शुभा ।

राजा के योग्य दुर्ग बनाने का निर्देश— चौकीदारों से नित्य सुरक्षित तथा नालिकास्त्रों (तोपों) से युक्त भलीभांति से बहुत से कुशादि के गुच्छे जिस पर उगे हुये हों और जिसमें सुन्दर रीति से खिड़कियों की नालियां बनी हों, एवं जिसके बाद में उससे छोटा दूसरा प्राकार बना हो और जिसके समीप में पर्वत न हो ऐसा प्राकार (परकोटा) बनाना चाहिये। और उसके बाद ऐसी परिखा (खाई) बनानी चाहिये। जिसकी चौड़ाई उसकी गहराई से दुगुनी हो। और जिसके अत्यन्त समीप में प्राकार (परकोटा) न खिंचा हो, एवं जिसमें अगाध जल भरा हो।

युद्धसाधनसम्भारैः सुयुद्धकुशलैर्विना ॥ २४१ ॥
न श्रेयसे दुर्गवासो राज्ञः स्याद् बन्धनाय सः ।

युद्ध करने के योग्य साधन-सामग्रियों (शस्त्रास्त्र, गोला, बारूद) एवं युद्ध में निपुण योद्धाओं के बिना दुर्ग में केवल निवास करना राजा के लिये कल्याणकारक नहीं होता है प्रत्युत उससे उसका बन्धन हो जाता है।

राज्ञा राजसभा कार्या सुगुप्ता सुमनोरमा ॥ २४२ ॥
त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा सप्तकोष्ठैः सुविस्तृता ।
दक्षिणोदक्तयादीर्घा प्राक्प्रत्यग्द्विगुणाथवा ॥ २४३ ॥
त्रिगुणा वा यथाकाममेकभूमिर्द्विभूमिका ।
त्रिभूमिका वा कर्तव्या सोपकार्याशिरोगृहा ॥ २४४ ॥
परितः प्रतिकोष्ठे तु वातायनविराजिता ।

राजसभा कैसी बनानी चाहिये इसका निर्देश— राजा ऐसी राजसभा बनवावे, जो भलीभांति सुरक्षित, अत्यन्त सुन्दर दक्षिण से उत्तर की तरफ लम्बी अथवा पूर्व से पश्चिम की तरफ दुगुनी किंवा तिगुनी लम्बी हो। एवं अपनी इच्छानुसार एकमंजिल, दुमंजिल या तीन मंजिल की हो, और जिसमें ऊपर के गृह में शामियाना तना हो और जिसके प्रत्येक गृहों में खिड़कियां हों।

पार्श्वकोष्ठात्तु द्विगुणो मध्यकोष्ठस्य विस्तरः ॥ २४५ ॥
पञ्चमांशधिकं त्वौच्चं मध्यकोष्ठस्य विस्तरात् ।
वस्तारेण समं त्वौच्चं पञ्चमांशाधिकं तु वा ॥ २४६ ॥

प्रथमोऽध्यायः ३७

बगल के कमरे की अपेक्षा मध्य के कमरे का विस्तार दूना होना चाहिये। और उसकी ऊंचाई कमरे के विस्तार से पञ्चमांश अधिक अथवा विस्तार के समान होना चाहिये।

कोष्ठकानां च भूमिर्वा छदिर्वा तत्र कारयेत् ।
द्विभूमिके पार्श्वकोष्ठे मध्यं त्वेकभूमिकम् ॥ २४७ ॥
पृथक्स्तम्भान्तसत्कोष्ठा चतुर्मार्गागमा शुभा ।
जलोर्ध्वपातियन्त्रैश्च युता सुस्वरयन्त्रकैः ॥ २४८ ॥
वातप्रेरकयन्त्रैश्च यन्त्रैः कालप्रबोधकैः ।
प्रतिष्ठिता च स्वादर्शैस्तथा च प्रतिरूपकैः ॥ २४६ ॥
एवंविधा राजसभा मन्त्रार्था कार्यदर्शने ।

कमरों के ऊपर छत या खपड़ों का छाजन बनाना चाहिये। दुमञ्जिले यदि बगल के कमरे हों तो मध्य का कमरा एक-मञ्जिला होना चाहिये। पृथक् २ स्तम्भों के अन्त में अच्छे कमरों से युक्त, चारों दिशाओं में बने हुए द्वारों से सुशोभित जलयन्त्रों (फव्वारों) तथा सुन्दर स्वरवाले बाजों से हवा पहुंचानेवाले यन्त्रों (यन्त्र-चालित, पङ्खों) से, तथा समयसूचक यन्त्रों (घड़ी) एवं सुन्दर शीशों तथा चित्रों से सुसज्जित इस प्रकार की राजसभा विचार करने एवं कार्य देखने के लिये होनी चाहिये।

तथाविधामात्यलेख्यसभ्याधिकृतशालिकाः ॥ २५० ॥
कर्तव्याः प्रागुदक्वेतास्तदर्थाश्च पृथक्पृथक् ।
शतहस्तमितां भूमिं त्यक्त्वा राजगृहात्सदा ॥ २५१ ॥

**मन्त्री आदि के लिये भवन बनाने का निर्देश—**इसी प्रकार से मन्त्री, लेख तथा सभा के सदस्य (कौंसिल के मेम्बर) तथा अधिकारी पुरुषों के कमरे होने चाहिये। इन सब कमरों को पूर्वोक्त प्रत्येक कार्यों के लिये पृथक् पृथक् सदा राजभवन से १०० हाथ की दूरी पर बनवाना चाहिये।

तद्वद्द्विशतहस्तां प्राक्सेनासंवेशनार्थिकाम् ।
आराद्राजगृहस्यैव प्रजानां निलयानि च ॥ २५२ ॥
सधनश्रेष्ठजात्यानुक्रमतश्च सदा बुधः ।
समन्ताद्धि चतुर्दिक्षु विन्यसेच्च ततः परम् ॥ २५३ ॥

**सेनानिवेश-स्थान तथा प्रजावर्गों के स्थानों का क्रम—**राजभवन से उत्तर अथवा पूर्व सेनाओं के रहने के लिये गृह होना चाहिये। उसके बाद प्रजाओं का गृह राजभवन से दूर होना चाहिये। धनिक और उत्तम वंशवालों का क्रमानुसार राजभवन के चारो दिशाओं में गृह होना चाहिये।

प्रकृत्यनुप्रकृतयो ह्यधिकारिगणस्ततः ।

३८शुक्रनीतिः

सेनाधिपाः पदातीनां गणः सादिगणस्ततः ॥ २५४ ॥
साश्वश्च सगजश्चापि गजपालगणस्ततः ।
बृहन्नालिकयन्त्राणि ततः स्वतुरंगोगणः ॥ २५५ ॥
ततः स्वगौल्मिकगणो ह्यारण्यकगणस्ततः ।
क्रमादेषां गृहाणि स्युः शोभनानि पुरे सदा ॥ २५६ ॥

और नगर में प्रकृति (मन्त्री), अनुप्रकृति (मन्त्री के नीचे काम करने वाले), अधिकारियों (अफसरों) के गण, सेनापति, पैदल सिपाहियों का गण, घुड़ सवारों का गण, हयशाला, गजशाला और गजपालों (हस्तिरक्षकों) का गण, बड़ी २ तोपें, धोबियों का गण, गोपालों का गण, आरण्यकों (जंगली भिल्लादिकों) का गण इन सबों के लिये क्रम से गृह होने चाहिये।

पान्थशाला ततः कार्या सुगुप्ता सुजलाशया ।
सजातीयगृहाणां हि समुदायेन पंक्तितः ॥ २५७ ॥
निवेशनपुरे ग्रामे प्रागुदङ्मुखमेव वा ।
सजातिपण्यनिवहैरापणे पण्यवेशनम् ॥ २५८ ॥
धनिकादिक्रमेणैव राजमागंस्य पार्श्वयोः ।
एवं हि पत्तनं कुर्याद् ग्रामं चैव नराधिपः ॥ २५९ ॥

**धर्मशाला के निर्माण का निर्देश—**और यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला होनी चाहिये जो कि सुरक्षित हो तथा सुन्दर जलाशय (कूप आदि) से युक्त हो और जिसमें समान आकारवाले गृहों का समुदाय कतार से हों ऐसे गृह पुर अथवा ग्राम में पूर्व अथवा उत्तर मुख का बनवाने चाहिये। और आपण (बाजार) में एक जाति के पण्यों (बिकनेवाली वस्तुओं) के समूह से युक्त दुकानें बनवानी चाहिये। धनिक आदियों के क्रम से राजमार्ग के दोनों तरफ दुकानें बनवानी चाहिये। इस प्रकार से राजा नगर या ग्राम का निर्माण करावे।

राजमार्गास्तु कर्तव्याश्चतुर्दिक्षु नृपगृहात् ।
उत्तमो राजमार्गस्तु त्रिंशद्धस्तमितो भवेत् ॥ २६० ॥
मध्यमो विंशतिकरो दशपञ्चकरोऽधमः ।
पण्यमार्गास्तथा चैते पुरग्रामादिषु स्थिताः ॥ २६१ ॥

**राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश—**राजभवन के चारों दिशाओं में राजमार्ग (प्रधान सड़क) बनवाना चाहिये। उत्तम राजमार्ग ३० हाथ चौड़ी होती है। मध्यम २० हाथ चौड़ी, अधम राजमार्ग १५ हाथ चौड़ा होता है। पुर तथा ग्रामादिकों में इन्हीं ३ प्रकार के पण्यमार्ग (बाजार की सड़कें) बनाये जाते हैं।