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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः ८७

यन्त्र ( बन्दूक आदि ), आग्नेय चूर्ण ( बारूद ), बाण, गोला और तलवार आदि के एवं अनेक प्रकार के युद्धोपयोगी यन्त्र, शस्त्र, अस्त्र, धनुष, तूणीर ( तर्कश ) आदि के बनानेवाले कारीगर, सोना, रत्न आदि के अलङ्कारों को बनानेवाले, रथ बनानेवाले पत्थरों को गढ़ने वाले ( सङ्गतराश ), लुहार, गेरू आदि धातुओं से गृहादि को रंगनेवाले ( रंगसाज ), कुम्हार, शौल्बिक ( ताम्बे के वर्त्तन बनानेवाले ), बढ़ई, सड़क बनानेवाले, नाई, धोबी, वासिक ( लकड़हारा ), मेहतर, संवाद पहुँचानेवाले, दर्जी, राज-चिह्न ( छत्र-चामर—निशान ) लेकर राजा के आगे रहनेवाले, व्यूह-रचना करनेवाले एवं भेरी ( नगारा ), पटह ( ढोल ), गोपुच्छ ( रणसिंघा ), शङ्ख, वंशी आदि को बजाकर यान ( शत्रुओं के ऊपर चढ़ाई करना ) और व्यपयान ( शत्रुओं से पीछे हटना ) आदि ( आक्रमण करना ) समयों में सैनिकों को सूचना देनेवाले, नाविक ( मल्लाह ), खनक ( खननेवाले ), व्याध ( शिकार खेलनेवाले या बहेलिया ), किरात ( कोल-भिल्लादि ), बोझा ढोनेवाले, शस्त्रों को साफ करनेवाले ( सान चढ़ाकर तीक्ष्ण करनेवाले ), जल तथा धान्य को ढोनेवाले, आपणिक ( व्यापार करनेवाले ), परदेशी स्त्री-विहीन कर्मचारियों के काम-शान्त्यर्थं वेश्यायें, बाजा बजाते हुये स्त्रियों के साथ नाच कर जीविका चलानेवाले, जुलाहे, पक्षी बढ़ाकर जीविका रखनेवाले, चित्रकार, चर्मकार ( मोची ), झाडू देनेवाले, वर्त्तन, धान्य, वस्त्र इनको सफा करनेवाले, शय्या, वितान ( चंदोवा ), बिछौना आदि के बनाने और उसको लगाने की कला को करनेवाले, चित्त को प्रसन्न करनेवाले ( सुगन्धित ) एवं पसीना न लाने वाले अच्छे धूपों को बनानेवाले, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) लगानेवाले, तथा अन्यान्य हीन तथा क्षुद्र राजसंबन्धी कार्य करने वाले इन सबों को कार्य के अनुरूप यथायोग्य राजा अपने यहाँ रक्खे ।

प्रोक्तं पुण्यतमं सत्यं परोपकरणं तथा ॥ २०६ ॥ आज्ञायुक्तांश्च भृतकान्सततं धारयेन्नृपः ।

सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इनसे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश— सत्य तथा परोपकार को सब पुण्यों में श्रेष्ठ बताया है अतः इनसे युक्त आज्ञानुसार सच्चाई के साथ राज-कार्य करनेवाले भृत्यों को राजा अपने यहाँ सदा रक्खे ।

हिंसा गरीयसी सर्वपापेभ्योऽनृतभाषणम् ॥ २०७ ॥ गरीयस्तरमेताभ्यां युक्तान्भृत्यान्न धारयेत् ।

संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को

८८ शुक्रनीतिः

न रखने का निर्देश—और सब पापों से बढ़कर हिंसा (हत्या या कष्ट पहुंचाना) और झूठ बोलना है अतः इन दोनों से युक्त भृत्यों को न रखे । यदा यदुचितं कर्तुं वक्तुं वा तत्प्रबोधयन् ॥ २०८ ॥ तद्भक्ति कुरुते द्राक्तु स सद्भृत्यः सुपूज्यते । सद्भृत्य के लक्षण—जिस समय जो कार्य करने के लिये एवं जो बात बोलने के लिये उचित प्रतीत हो उसी को राजा से समझाता हुआ और स्वयं भी शीघ्रता से उसी बात को कहता एवं उसी कार्य को करता भी है वही भृत्य अच्छा कहलाता है और भली भांति पूजित भी होता है । उत्थाय पश्चिमे यामे गृहकृत्यं विचिन्त्य च ॥ २०९ ॥ कृत्वोत्सर्गं तु विष्णुं हि स्मृत्वा स्नायादनन्तरम् । प्रातः कृत्यं तु निर्वर्त्य यावत्सार्धमुहूर्त्तकम् ॥ २१० ॥ गत्वा स्वकार्यशालां वा कार्याकार्यं विचिन्त्य च । अच्छे भृत्यों का यह कृत्य है कि—वह रात्रि को पिछले प्रहर में उठकर गृह के ( उस दिन करने लायक ) कृत्यों का विचार करने के बाद मल-मूत्रादि का परित्याग कर विष्णु ( परमात्मा ) का स्मरण करते हुये स्नान करे । अथवा १।। मुहूर्त ( करीब १॥ घण्टे ) के अन्दर प्रातःकालीन नित्य के सम्पूर्ण कार्यों को समाप्त कर अपने कार्यालय में जाकर वहां के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य कार्यों का निश्चय कर तदुपरान्त स्नान करे । विनाऽऽज्ञया विशन्तं तु द्वास्थः सम्यङ् निरोधयेत् ॥ २११ ॥ निर्देशकार्यं विज्ञाप्य तेनाज्ञप्तः प्रमोचयेत् । द्वारपाल के कर्त्तव्यों का निर्देश—और द्वारपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह द्वार पर रहकर बिना राजाज्ञा के अन्दर प्रवेश करनेवाले को अच्छी तरह से रोके । और उसके बताये हुये कार्य की सूचना राजा को देकर यदि राजा की आज्ञा अन्दर आने देने के लिये हो तो उसे अन्दर जाने के लिये छोड़ दे । दृष्ट्वागतान्सभामध्ये राज्ञे दण्डधरः क्रमात् ॥ २१२ ॥ निवेद्य तन्नतीः पश्चात्तेषां स्थानानि सूचयेत् । राजपार्श्ववर्त्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य—और राजा के पास दण्ड धारण करनेवाले भृत्यों का यह कर्त्तव्य है कि—वह राजसभा में आये हुये लोगों को देखकर क्रम से राजा से उसके प्रणाम करने की सूचना देकर पश्चात् उससे बैठने के लिये स्थान का निर्देश करे । ततो राजगृहं गत्वाऽऽज्ञप्तो गच्छेच्च सन्निधिम् ॥ २१३ ॥ मत्वा नृपं यथान्यायं विष्णुरूपमिवापरम् । प्रविश्य सानुरागस्य चित्तज्ञस्य समन्ततः ॥ २१४ ॥

द्वितीयोऽध्यायः [८१]

भर्तुरर्द्धासने दृष्टिं कृत्वा नान्यत्र निक्षिपेत् ।

**भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य—**उसके (स्थान बताने के) बाद पुनः राजगृह (राजसभा) में जाकर राजा की आज्ञा पाने पर उसके समीप जावे । और जगत् के रक्षार्थ दूसरे विष्णु भगवान के समान स्थित राजा को नियमानुकूल प्रणाम करे और राजसभा में पहुँचकर भृत्यों के प्रति अनुराग रखनेवाले एवं उनके हृदय को पहचाननेवाले राजा के अर्द्धासन की ओर स्थिर-दृष्टि होकर देखता रहे और किसी अन्य तरफ दृष्टि न दौड़ावे ।

अग्निं दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः ॥ २१५ ॥
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
जलती हुई अग्नि के समान एवं क्रुद्ध विषधर सर्प की भांति प्राण तथा धन लेने में समर्थ राजा को समझ कर अत्यन्त विनय के साथ उसके समीप जावे ।

यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति चिन्तयेत् ॥ २१६ ॥
समर्थयंश्च तत्पक्षं साधु भाषेत भाषितम् ।
तन्नियोगेन वा ब्रूयादर्थं सुपरिनिश्चितम् ॥ २१७ ॥
**राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश—**और नित्य यत्न के साथ राजा की सेवा करे और 'राजा के आगे मेरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है' ऐसा सोचे एवं राजा के पक्ष का ही समर्थन करता हुआ सन्तोषजनक बात कहे । अथवा राजा की आज्ञा पाने पर लोक-शास्त्र से सुनिश्चित बात कहे ।

सुखप्रबन्धगोष्ठीषु विवादे वादिनां मतम् ।
विजानन्नपि नो ब्रूयाद्भर्तुः क्षिप्तोत्तरं वचः ॥ २१८ ॥
**राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश—**मनोविनोदार्थ प्रस्तुत राजगोष्ठी में परस्पर तर्क करनेवालों के विवाद उपस्थित होने पर सिद्धान्त बात को जानते हुये भी वादी रूप में बोलनेवाले राजा के उत्तर को काटकर कोई वचन न बोले ।

सदाऽनुद्धतवेषः स्यान्नृपाहूतस्तु प्राञ्जलिः ।
तद्वां कृतनतिः श्रुत्वा वस्त्रान्तरितसम्मुखः ॥ २१९ ॥
तदाज्ञां धारयित्वादौ स्वकर्माणि निवेदयेत् ।
नत्वाऽऽसीतासने प्रह्वो न तत्पार्श्वे न संमुखे ॥ २२० ॥
उच्चैः प्रहसनं कासं ष्ठीवनं कुत्सनं तथा ।
जृम्भणं गात्रभङ्गं च पर्वास्फोटं च वर्जयेत् ॥ २२१ ॥
**राजा से स्वकार्य निवेदन-प्रकार तथा जोर से हँसने आदि का निषेध—**राजा के बुलाने पर सदा विनीत के समान वेष बनाये हुये हाथ जोड़े और

९० : शुक्रनीतिः

नमस्कार करने के बाद शरीर के अगले हिस्से को वस्त्र से ढके हुये स्थित हो और राजा की बात सुनकर तथा सर्वप्रथम उनकी आज्ञा पाकर पश्चात् अपने कार्य का निवेदन करे। और नमस्कार करने के बाद नम्रता के साथ अपने आसन पर बैठे, और राजा के बगल में या सामने जोर से हँसना, खाँसना, थूकना, कुत्सित कार्य या किसी की निन्दा करना, जभाई लेना, शरीर तोड़ना, अंगुलियों के पोरों को चटकाना इन सब कार्यों को न करे।

राज्ञादिष्टन्तु यत्स्थानं तत्र तिष्ठेन्मुदान्वितः ।
प्रवीणोचितमेधावी वर्जयेदभिमानिताम् ॥ २२२ ॥
राजा के बताये हुये स्थान पर प्रसन्न चित्त से बैठे, प्रवीणों की भांति योग्य बुद्धिवाला होकर अभिमान करना छोड़ दे ।

आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च ।
अपृष्टोऽपि हितान्वेषी ब्रूयात्कल्याणभाषितम् ॥ २२३ ॥
राजा के ऊपर जब कोई आपत्ति आ पड़े अथवा वह कुपथ पर चले, या कार्य करने का समय व्यतीत हो रहा तो बिना पूछने पर भी हित चाहने वाला होकर राजा से कल्याणकारक वचन कहे ।

प्रियं तथ्यं च पथ्यं च वदेद्धर्मार्थकं वचः ।
समानवार्तया चापि तद्धितं बोधयेत्सदा ॥ २२४ ॥
हितकारी सेवक का कृत्य—और सुनने में प्रिय, सत्य तथा हितकारक, धर्म तथा अर्थ से युक्त वचन सदा राजा से कहे, और संमानयुक्त बात-चीत से या समान बातों (उदाहरणों) के द्वारा सदा राजा को हित की बात समझावे ।

कीर्तिमन्यनृपाणां वा वदेन्नीतिफलं तथा ।
दाता त्वं धार्मिकः शूरो नीतिमानसि भूपते ॥ २२५ ॥
अनीतिस्ते तु मनसि वर्तते न कदाचन ।
ये ये भ्रष्टा अनीत्या तांस्तदग्रे कीर्तयेत्सदा ॥ २२६ ॥
नृपेभ्यो ह्यधिकोऽसीति सर्वेभ्यो न विशेषयेत् ।
और समझाने के लिये अन्य राजाओं की कीर्ति और नीति का फल राजा से कहे । और यह सदा उसके आगे कहे कि—'हे महाराज ! आप दाता, धार्मिक, शूर तथा नीति के जानने वाले या तदनुसार चलनेवाले हैं । और कभी आपके मन में अनीति नहीं रहती है। एवं जो जो अनीति पर चलने से राज्य से भ्रष्ट हो गये हैं उन सबों का वर्णन सदा राजा के आगे करे। और 'आप सब राजाओं से श्रेष्ठ हैं' ऐसा विशेष रूप से न कहे ।

परार्थदेशकालज्ञो देशे काले च साधयेत् ॥ २२७ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । ६१

परार्थनाशनं न स्यात्तथा ब्रूयात्सदेव हि ।
और देश तथा काल का जाननेवाला होकर उचित देश तथा काल होने पर दूसरे का कार्य राजा से सिद्ध करावे। और राजा से सदा ऐसा वचन कहे जिससे दूसरे का कार्य न नष्ट हो ।

न कर्षयेत्प्रजां कार्यमिषतश्च नृपः सदा ॥ २२८ ॥
अपि स्थाणुवदासीत शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानर्थसम्पन्नां वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ २२६ ॥

राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश—
समझदार राजा किसी निजी कार्य के व्याज से सदा प्रजा को दुःखित न करे । चाहे भूख से पीड़ित होने से सूखकर स्थाणु (खून्थे) की भांति निश्चल हो जाय फिर भी अनर्थ से भरी हुई (बुरी) जीविका को न चाहे ।

यत्कार्ये यो नियुक्तः स भूयात्तत्कार्यतत्परः ।
नान्वाधिकारमन्विच्छेन्नाभ्यसूयेच्च केनचित् ॥ २३० ॥

समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश—
जो जिस कार्य पर नियुक्त किया गया हो वह उस कार्य के करने में तत्पर रहे। और किसी दूसरे के अधिकार छीनने की इच्छा न करे और किसी के साथ असूया (मात्सर्य) न करे ।

न न्यूनं लक्षयेत्कस्य पूरयेत स्वशक्तितः ।
परोपकरणादन्यन्न स्यान्मित्रकरं सदा ॥ २३१ ॥

किसी की त्रुटि पर ध्यान न दे बल्कि अपनी शक्ति से उसकी त्रुटि को पूर्ण करे क्योंकि दूसरे के साथ उपकार करने से बढ़कर दूसरा कोई मित्रता पैदा करनेवाला कार्य नहीं है ।

करिष्यामीति ते कार्यं न कुर्यात्कार्यलम्बनम् ।
द्राक्कुर्यात् समर्थश्चेत्साशं दीर्घं न रक्षयेत् ॥ २३२ ॥

किसी से 'मैं तुम्हारा कार्य करूंगा' ऐसा कहकर उसके कार्य करने में विलम्ब न करे । यदि स्वयं समर्थ हो तो शीघ्र कार्य को पूरा कर दे। दीर्घ काल तक उसे आशा में लटका कर न रखे ।

गुह्यं कर्म च मन्त्रं च न भर्तुः सम्प्रकाशयेत् ।
विद्वेषं च विनाशं च मनसापि न चिन्तयेत् ॥ २३३ ॥

स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध—
स्वामी (राजा) के गुप्त कार्य या विचार को किसी के समक्ष प्रकाशित न करे। और उसके साथ विद्वेष या उसके नाश की कल्पना मन से भी न करे ।

राजा परममित्रोऽस्ति न कामं विचरेदिति ।

६२ : शुक्रनीतिः

स्त्रीभिस्तद्वर्धिभिः पापैर्वैरिभूतैर्निराकृतैः ॥ २३४ ॥
एकार्थचर्यां साहित्यं संसर्गं च विवर्जयेत् ।
राजा को मित्र मानने का एवं उनकी स्त्री आदि के साथ सहवास का निषेध—'राजा मेरा परम मित्र है'—ऐसा समझ कर मनमाना व्यवहार न करे। और स्वामी को चाहनेवाली स्त्रियों एवं स्वामी के साथ पाप (बुरा) व्यवहार या वैरभाव रखनेवाले किंवा स्वामी से तिरस्कृत लोगों के साथ मिलकर किसी कार्य को करना या उनके साथ रहना या किसी प्रकार का संबन्ध रखना त्याग दे।

वेषभाषानुकरणं न कुर्यात्पृथिवीपतेः ॥ २३५ ॥
सम्पन्नोपि च मेधावी न स्पर्धेत च तद्गुणैः ।
**राजवेषभूषा-धारण की नकल करने का निषेध—**राजा के वेष तथा भूषा का नकल न करे। गुणों से संपन्न तथा प्रतिभाशाली होने पर भी राजा के गुणों के साथ स्पर्धा न करे अर्थात् 'मैं राजा से अधिक गुणवान् हूँ' यह न दिखावे।

रागापरागौ जानीयाद्भर्तुः कुशलकर्मवित् ॥ २३६ ॥
इङ्गिताकारचेष्टाभ्यस्तदभिप्रायतां तथा ।
त्यजेद्विरक्तं नृपतिं रक्ते वृत्तिन्तु कारयेत् ॥ २३७ ॥
**राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश—**और निपुण लोगों के कर्म को अथवा राजा के या अपने शुभ कर्म को जाननेवाला होकर स्वामी के अनुराग अथवा विरक्ति को अर्थात् किस कार्य से स्वामी प्रसन्न या अप्रसन्न होते हैं—इस बात को एवं स्वामी के इशारा, आकार (मुखमुद्रा), और चेष्टा से उनके अभिप्राय को जाने। और यदि राजा को विरक्त जाने तो उसे छोड़ दे एवं अनुराग युक्त जाने तो उसके पास रहे।

विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा ।
आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च ॥ २३८ ॥
अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः ।
वाक्यञ्च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति च ॥ २३९ ॥
खद्यते विमुखश्चैव गुणसङ्कीर्त्तने कृते ।
दृष्टिं क्षिपत्यथान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि ॥ २४० ॥
विरक्तलक्षणं ह्येतद्रक्तस्य लक्षणं ब्रुवे ।
**विरक्त राजा के लक्षण—**राजा जिसके ऊपर विरक्त होता है उसका नाश करता है एवं उसके शत्रुओं का अभ्युदय (तरक्की) करता है। यदि स्वामी प्रथम आशा बढ़ाकर अन्त में कार्यफल को नष्ट कर देता है।

द्वितीयोऽध्यायः ६३

और बिना कोप के भी कोपयुक्त सा दिखाई पड़ता है। प्रसन्न होते हुये भी कार्य को सफल नहीं करनेवाला होता है। और अहङ्कारयुक्त बात बोलता है, जीविका का नाश करता है। गुणों की प्रशंसा करने पर भी विमुख दिखाई पड़ता है और अन्यत्र किये जा रहे कार्य की ओर दृष्टि लगाता है किन्तु गुण-कीर्त्तन करनेवाले की ओर नहीं लगाता है तो ये सब लक्षण विरक्त के समझने चाहिये। और आगे अनुरक्त स्वामी के लक्षण कहते हैं।

दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाच्यं गृह्णाति चादरात् ॥ २४१ ॥ कुशलादिपरिप्री श्नी प्रदापयति चासनम्। विविक्तदर्शनं चास्य रहस्येनं न शङ्कते ॥ २४२ ॥ जायेत हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य च तत्कथाम्। अप्रियाण्यपि चान्यानि तद्युक्तान्यभिमन्वते ॥ २४३ ॥ उपायनञ्च गृह्णाति स्तोकं सम्पादनैस्तथा। कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा ॥ २४४ ॥

**अनुरक्त राजा के लक्षण—**जो देखकर प्रसन्न होता है और आदर के साथ वचनों को ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है। कुशलादि पूछता है, बैठने को आसन दिलाता है। और सेवक के लिये एकान्त में दर्शन देता है एवं एकान्त में भेट होने पर उससे शङ्का नहीं रखता है। और उसकी जो बातें हैं उसे सुनकर प्रसन्न-वदन दिखाई पड़ता है और सेवक से संबद्ध अप्रिय बातों एवं कार्यों को उससे अन्य मानता है अर्थात् अभिनन्दन करता है। दिये हुये उपहार को स्वीकार करता है एवं सेवक के थोड़े से कार्यों को कर देने से भी उन्हें दूसरी बातों का प्रसङ्ग होने पर भी प्रहृष्ट-वदन होकर स्मरण करता है। ये सब अनुराग रखनेवाले स्वामी के लक्षण हैं। यदि ऐसा हो तो उस स्वामी का सेवा करनी चाहिये।

तद्दत्तवस्त्रभूषादिचिह्नं सम्धारयेत्सदा। न्यूनाधिक्यं स्वाधिकारकार्ये नित्यं निवेदयेत् ॥ २४५ ॥ तदर्थां तत्कृतां वार्त्तां शृणुयाद्वापि कीर्त्तयेत्।

**राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश—**अनुरक्त स्वामी के दिये हुये वस्त्र-भूषण आदि चिह्न को सदा धारण करना चाहिये। अपने अधिकार के कार्यों में जो न्यूनाधिक्य (कमी-बेश) हो गया हो उसे नित्य स्वामी से निवेदन करना चाहिये। और स्वामी से संबद्ध तथा स्वामी की कही हुई बातों को सुने और उसका कीर्त्तन करे।

चारसूचकदोषेण त्वन्यथा यद्वदेनृपः ॥ २४६ ॥ शृणुयान्मौनमाश्रित्य तद्व्यवञ्चानुमोदयेत्।

६४शुक्रनीतिः

स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य—यदि जासूस अथवा चुगलखोरों के दोष (कहने) से राजा विरुद्ध वचन कहें तो उसे चुपचाप भृत्य को सुन लेना चाहिये किन्तु सत्य की भांति उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये ।

आपद्गतं सुभर्त्तारं कदापि न परित्यजेत् ॥ २४७ ॥ और विपत्ति में पड़े हुये अच्छे स्वामी का कभी परित्याग न करना चाहिये।

एकवारमप्यशितं यस्यानं ह्मादरेण च । तद्विष्टं चिन्तयेन्नित्यं पालकस्याञ्जसा न किम् ॥ २४८ ॥ चाहे जिस किसी का अन्न यदि आदर के साथ एक बार भी खा लिया जाय तो उसका हित नित्य चिन्तन करना उचित होता है फिर पालन करने वाले का वस्तुतः क्या हितचिन्तन नहीं करना चाहिये अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।

अप्रधानः प्रधानः स्यात्काले चात्यन्तसेवनात् । प्रधानोऽप्यप्रधानः स्यात्सेवाल्स्यादिना यतः ॥ २४६ ॥ स्वामी की समय पर अत्यन्त सेवा करने से अप्रधान (गौण) सेवक प्रधान (मुख्य) हो जाता है किन्तु सेवा में आलस्यादि करने से प्रधान भी अप्रधान सेवक हो जाता है ।

नित्यं संसेवनरतो भृत्यो राज्ञः प्रियो भवेत् । स्वस्वाधिकारकार्यं यद्द्वाक्कुर्यात्सुमना यतः ॥ २५० ॥ नित्य भली-भांति सेवा में तत्पर रहनेवाला भृत्य राजा का प्रिय होता है। क्योंकि भृत्य अपने २ अधिकार ( जिम्मेदारी ) का कार्य शीघ्र करता है अतः स्वामी उससे प्रसन्न रहता है ।

न कुर्यात्सहसा कार्यं नीचं राजापि नो दिशेत् । तत्कार्यकारकाभावे राज्ञा कार्यं सदैव हि ॥ २५१ ॥ भृत्य स्वामी का कार्य अविवेक-पूर्वक न करे अर्थात् सावधानी से करे। और राजा भी भृत्य से नीच कार्य करने के लिये न कहे किन्तु यदि उस नीच (मल-मूत्रादि उठाना रूप) कार्य का करने वाला उस समय कोई राजा के पास न हो तो उस कार्य को सदा स्वयं राजा को कर देना उचित ही है ।

काले यदुचितं कर्तुं नीचमप्युत्तमोऽर्हति । यस्मिन्प्रीतो भवेद्राजा तदनिष्टं न चिन्तयेत् ॥ २५२ ॥ समय पड़ने पर यदि आवश्यकता हो तो मल-मूत्रादि उठाना निकृष्ट कार्य भी उसके अयोग्य उच्च कोटि के भृत्य के लिये करना उचित ही है क्योंकि

द्वितीयोऽध्यायः ६५

द्वितीयोऽध्यायः ६५

जिस के ऊपर राजा प्रसन्न हो उसके अनिष्ट की चिन्ता कदापि नहीं करनी चाहिये।

न दर्शयेत्स्वाधिकारगौरवं तु कदाचन ।

और राजा के सामने कभी अपने अधिकार का गौरव नहीं प्रकाशित करना चाहिये।

परस्परं नाभ्यसूयुर्न भेदं प्राप्नुयुः कदा ॥ २५३ ॥ राज्ञा चाधिकृताः संतः स्वस्वाधिकारगुप्तये ।

आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य—राजा के द्वारा किसी अधिकार पर नियुक्त किये गये उत्तम भृत्य को चाहिये कि—वह कभी भी अपने २ अधिकार की रक्षा के लिये आपस में एक दूसरे के दोष को नहीं दिखाये और न परस्पर भेद रक्खे।

अधिकारिगणो राजा सद्वृत्तौ यत्र तिष्ठतः ॥ २५४ ॥ उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मीर्विपुला सम्मुखी भवेत् ।

राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश—जहां पर राजा तथा अधिकारी गण (भृत्यगण) ये दोनों परस्पर अच्छा व्यवहार रखते हैं वहां पर विपुल तथा स्थिर लक्ष्मी संमुख उपस्थित रहती है।

अन्याधिकारवृतं तु न ब्रूयाच्छ्रुतमप्यृत ॥ २५५ ॥ राजा न शृणुयादन्यमुखतस्तु कदाचन ।

दूसरे भृत्य के अधिकार-विषयक दोष को सुनकर भी भृत्य राजा से न कहे। और राजा भी दूसरे भृत्य के मुख से किसी दूसरे की बात को कभी न सुने।

न बोधयन्ति च हितमऽहितं वाधिकारिणः ॥ २५६ ॥ प्रच्छन्नवैरिणस्ते तु दास्यरूपमुपाश्रिताः ।

जो अधिकारी लोग हित या अहित बात राजा को नहीं समझाते हैं वे नौकर के रूप में छिपे हुये राजा के शत्रु के समान होते हैं।

हिताहितं न शृणोति राजा मन्त्रिमुखाच्च यः ॥ २५७ ॥ स दस्यू राजरूपेण प्रजानां धनहारकः।

डाकू के समान राजा के लक्षण—जो राजा मन्त्री के मुख से कही हुई हित या अहित की बातों पर ध्यान नहीं देता है वह राजा के रूप में डाकू के समान केवल प्रजा का धन हरण करनेवाला है।

सुपुष्टव्यवहारा ये राजपुत्रैश्च मन्त्रिणः ॥ २५८ ॥ विरुध्यन्ति च तैः साकं ते तु प्रच्छन्नतस्कराः ।

प्रच्छन्न चोर के लक्षण—जो मन्त्री लोग राजपुत्रों के द्वारा व्यवहार-

६६ | शुक्रनीतिः

विषयक ( राजकार्य-विषयक ) प्रश्न को अच्छी तरह से पूछे जाने पर; उनके साथ विरुद्ध व्यवहार करने लगते हैं वे छिपे हुये चोर के समान हैं ।

बाला अपि राजपुत्रा नावमान्यास्तु मन्त्रिभिः ॥ २५९ ॥
सदा सुबहुवचनैः सम्बोध्यास्ते प्रयत्नतः ।

बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध— छोटी उम्रवाले भी राजपुत्र लोग मन्त्रियों के द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं हैं बल्कि प्रयत्नपूर्वक वे सदा सुन्दर बहुवचनान्त आदरसूचक शब्दों के साथ संबोधन करने के योग्य ही हैं ।

असदाचरितं तेषां क्वचिद्राज्ञे न दर्शयेत् ॥ २६० ॥
स्त्रीपुत्रमोहो बलवान्न निन्दा श्रेयसे यतः ।

और मन्त्री लोगों को कभी भी उन राजपुत्रों के बुरे आचरणों को राजा से नहीं सूचित करना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र का मोह बलवान् होता है अतः उन दोनों की निन्दा करना कल्याणकारक नहीं होता है ।

राज्ञोऽवश्यतरं कार्यं प्राणसंशयितं च यत् ॥ २६१ ॥
आज्ञापयप्रतञ्चाहं करिष्ये तत्तु निश्चितम् ।
इति विज्ञाप्य द्राक्कर्तुं प्रयतेत स्वशक्तितः ॥ २६२ ॥

भृत्य को उचित है कि—उस राजा का अत्यन्त आवश्यक अथवा उनके प्राणों को संशय ( संकट ) डाल देनेवाला जो कार्य हो रहा हो उसे करने के लिये सबसे आगे बढ़कर “प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं उस कार्य को निश्चित रूप से करूंगा' ऐसा राजा से निवेदन कर अपनी शक्ति के अनुसार उसे शीघ्रता के साथ करने के लिये प्रयत्न करे ।

प्राणानपि च सन्दध्यान्महत्कार्ये नृपाय च ।
भृत्यः कुटुम्बतुष्ट्यर्थं नान्यथा तु कदाचन ॥ २६३ ॥

भृत्य अपने कुटुम्ब के पालनार्थ ही विवश होकर राजा के प्राण-संकट आदि महान् कार्य की उपस्थिति होने पर राजा के लिये अपना प्राण भी दे डाले, अन्यथा ( यदि कुटुम्ब के पालन की चिन्ता न हो तो ) कभी भी प्राणों का त्याग न करे ।

भृत्या धनहराः सर्वे युक्त्या प्राणहरो नृपः ।

सभी भृत्य कारणवश राजा के धन लेनेवाले होते हैं एवं राजा भी कारण-वश ही भृत्य का प्राण लेनेवाला होता है ।

युद्धादौ सुमहत्कार्ये भृत्या प्राणान्हरेन्नृपः ॥ २६४ ॥
नान्यथा भृतिरूपेण भृत्यो राजधनं हरेत् ।

युद्धादि महान् कार्य उपस्थित होने पर वेतन का मूल्य चुकता कराने

द्वितीयोऽध्यायः ६७

के लिये राजा भृत्य के प्राणों को नष्ट करे अन्यथा (युद्धादि के अतिरिक्त साधारण कार्यों में) प्राण न ले अर्थात् वेतन के लालच से स्वामी के युद्धादि में जय आदि की कामना रखनेवाले भृत्य प्राणों का त्याग करते हैं अन्यथा नहीं। और भृत्य वेतन रूप से ही राजा का धन ग्रहण करे अन्यथा (वेतन के अलावा किसी प्रकार से) न ग्रहण करे।

अन्यथा हरतस्तौ तु भवतश्च स्वनाशकौ ॥ २६५ ॥

यदि उक्त प्रकार से अन्यथा (भिन्न) रीति से राजा और भृत्य क्रम से प्राण और धन एक दूसरे का हरण करते हैं तो वे दोनों अपना २ नाश करते हैं।

राजाऽनु युवराजस्तु मान्योऽमात्यादिकैः सदा । तन्न्यूनामात्यनवकं तन्न्यूनाधिकृतो गणः ॥ २६६ ॥ मन्त्रितुल्यश्चायुक्तिको न्यूनः साहस्त्रिको मतः ।

सबसे अधिक राजा अमात्यादि के द्वारा सदा पूजनीय होता है, उसके बाद राजा से कम युवराज माननीय होता है, युवराज से कम अमात्यादि ९ प्रकृति (प्रधान राजपुरुष) वर्ग माननीय होता है। अमात्यादि से कम अधिकारी वर्ग (अफसर लोग) माननीय होता है। और मन्त्री के तुल्य आयुक्तिक (१००० सैनिकों का स्वामी) माननीय होता है। उससे न्यून साहस्त्रिक (१००० सैनिकों का स्वामी) माननीय होता है।

न क्रीडयेद्राजसमं क्रीडिते तं विशेषयेत् ॥ २६७ ॥ नाभमान्या राजपत्नी कन्या वापि च मन्त्रिभिः । राजसम्बन्धिनः पूज्याः सुहृदश्च यथार्हतः ॥ २६८ ॥

राजा के साथ प्रथम किसी प्रकार का खेल ही न खेले, यदि खेले तो खेल में राजा को जितावे अर्थात् उसे कभी न हराये। और मन्त्रियों को कभी राजा की पत्नी या कन्या का तिरस्कार नहीं करना चाहिये। और राजा के सम्बन्धी तथा मित्रों का यथायोग्य आदर-सत्कार करना चाहिये।

नृपाहूतस्तुरं गच्छेद्व्यक्त्वा कार्यशतं महत् ।

भृत्यों को सैकड़ों महान से महान् कार्यों को छोड़कर भी राजा के बुलाने पर तुरन्त उनके पास जाना चाहिये।

मित्रायापि न वक्तव्यं राजकार्यं सुमन्त्रितम् ॥ २६९ ॥ वृत्तिं बिना राजद्रव्यमदत्तं नाभिलाषयेत् ।

गुप्त रूप से विचार किये हुये किसी राजकार्य को अपने मित्र से भी नहीं कहना चाहिये। वेतन को छोड़कर राजा के किसी धन को बिना उनके दिये लेने की इच्छा भी नहीं करनी चाहिये।

* शु०

६८ | शुक्रनीतिः

राजाज्ञया विना नेच्छेत्कार्यमध्यस्थिकीं भृतिम् ॥ २७० ॥
न निहन्याद् द्रव्यलोभात्सत्कार्यं यस्य कस्यचित् ।

राजाज्ञा के बिना कार्य के मध्य में अर्थात् बिना कार्य समाप्त किये वेतन लेने की इच्छा न करे। और द्रव्य के लोभ से किसी के अच्छे कार्य को नष्ट न करे।

स्वस्त्रीपुत्रधनप्राणैः काले संरक्षयेन्नृपम् ॥ २७१ ॥
उत्कोचं नैव गृह्णीयान्नान्यथा बोधयेन्नृपम् ।

संकट-काल पड़ने पर अपनी स्त्री, पुत्र, धन तथा प्राण देकर भी राजा की रक्षा करे। घूस न ले और राजा को वस्तुस्थिति से विपरीत न समझावे।

अन्यथा दण्डकं भूपं नित्यं प्रबलदण्डकम् ॥ २७२ ॥
निगृह्य बोधयेत्सम्यगेकांते राज्यगुप्तये ।

यथार्थ दण्ड न देनेवाले या नित्य प्रबल दण्ड देनेवाले राजा को राज्य की रक्षा के लिये रोककर एकान्त में भली-भाँति समझाना भृत्य के लिये उचित है।

हितं राज्ञश्चाहितं यल्लोकानां तन्न कारयेत् ॥ २७३ ॥
नवीनकरशुल्काद्यैर्लोक उद्विजते ततः ।

जिससे केवल राजा का हित है किन्तु प्रजा का अहित है ऐसे कार्य को राजा से न करावे। क्योंकि नवीन कर तथा चुंगी आदि लगाने से प्रजा उद्विग्न हो उठती है।

गुणनीतिबलद्वेषी कुलभूतोऽप्यधार्मिकः ॥ २७४ ॥
नृपो यदि भवेत्तं तु त्यजेद्राष्ट्रविनाशकम् ।

अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ भी राजा यदि गुण, नीति तथा बल (सेना) के साथ द्वेष करनेवाला एवं अधार्मिक हो तो उसे राज्य को नष्ट करनेवाला समझकर त्याग कर देना चाहिये अर्थात् उसे गद्दी से उतार देना चाहिये।

तत्पदे तस्य कुलजं गुणयुक्त पुरोहितः ॥ २७५ ॥
प्रकृत्यनुमतिं कृत्वा स्थापयेद्राज्यगुप्तये ।

और पुरोहित उस राजा के स्थान पर उस राजा के वंश में उत्पन्न राजगुणों से युक्त किसी को प्रकृतियों (अमात्यादिकों) की संमति लेकर राज्य की रक्षा के लिये स्थापित करे।

सास्त्रो दूरं नृपात्तिष्ठेदस्त्रपाताद्बहिः सदा ॥ २७६ ॥
सशस्त्रो दशहस्तं तु यथादिष्टं नृपप्रियाः ।
पञ्चहस्तं वरेयुर्वै मन्त्रिणो लेखकाः सदा ॥ २७७ ॥
सेनपैस्तु बिना नैव सशस्त्रास्त्रो विशेत्सभाम् ।

अस्त्र (बन्दूक या धनुष-बाण आदि) लिये हुये व्यक्ति को अस्त्र की मार

द्वितीयोऽध्यायः [६६]

से बाहर दूरी पर राजा से दूर रहना चाहिये । शस्त्र (तलवार आदि) लिये हुये को १० हाथ दूर रहना चाहिये । एवं राजा के प्रिय को राजा के आदेशानुसार दूरी पर रहना चाहिये । तथा मन्त्री और लेखक को सदा राजा से ५ हाथ की दूरी पर बैठना चाहिये या जैसा जब राजा की आज्ञा हो तदनुसार दूरी पर बैठना चाहिये । और शस्त्र तथा अस्त्र को लिये हुये भी राजा को बिना सेनापतियों के अकेले राजसभा में नहीं बैठना चाहिये ।

पुरोहितः श्रेष्ठतरः श्रेष्ठः सेनापतिः स्मृतः ॥ २७८ ॥
समः सुहृच्च सम्बन्धी ह्युत्तमा मन्त्रिणः स्मृताः ।
अधिकारिगणो मध्योऽधमौ दर्शकलेखकौ ॥ २७६ ॥
ज्ञेयोऽधमतमो भृत्यः परिचारगणः सदा ।
परिचारगणान्न्यूनो विज्ञेयो नीचसाधकः ॥ २८० ॥

पुरोहित का पद सबसे श्रेष्ठ, सेनापति का श्रेष्ठ, राजा के मित्र तथा संबन्धी का पद सम कोटि का कहा हुआ है । एवं मन्त्रियों का उत्तम, अधिकारी गण का मध्यम, दर्शक तथा लेखक का अधम, भृत्य तथा परिचारक (गुलाम) गण का अधमतम और नीच (मल-मूत्रादि फेंकना आदि) कर्म करनेवालों का पद परिचारकगण से न्यून सदा जानना चाहिये ।

पुरोगमनमुत्थानं स्वासने सन्निवेशनम् ।
कुर्यात्सकुशलप्रश्नं क्रमात्सुस्मितदर्शनम् ॥ २८१ ॥
राजा पुरोहितादीनां त्वन्येषां स्नेहदर्शनम् ।
अधिकारिगणादीनां सभास्यश्च निरालसः ॥ २८२ ॥

और वह राजा पुरोहितादि पूज्यों के लिये क्रम से आगे जाकर ले आना, अपने आसन से शरीर उठाना और अपने आसन पर बैठाना, कुशल-प्रश्न पूछना तथा मुस्कुराते हुये देखना ये सब सम्मानार्थ करे । और उनसे अन्य अधिकारी गणों के लिये सभा में ही यथास्थान स्थित रह कर आलस्य छोड़कर केवल स्नेहपूर्वक देखना भर करे ।

विद्यावत्सु शरच्चन्द्रो निदाघार्को द्विषत्सु च ।
प्रजासु च वसन्तार्क इव स्यात्त्रिबिधो नृपः ॥ २८३ ॥

१. विद्वानों के लिये शरत्कालीन चन्द्रमा की भांति आह्लादजनक, २. शत्रुओं के लिये ग्रीष्मकालीन सूर्य की भांति असह्य और ३. प्रजाओं के लिये वसन्तकालीन सूर्य की भांति न मृदु, न तीक्ष्ण होने से राजा तीन प्रकार का कहा जाता है ।

यदि ब्राह्मणभिन्नेषु मृदुत्वं धारयेन्नृपः ।
परिभवन्ति तं नीचा यथा हस्तिपका गजम् ॥ २८४ ॥

१०० | शुक्रनीतिः

यदि ब्राह्मणों से भिन्न लोगों के लिये राजा मृदुता धारण करता है तो नीच लोग महावत की भांति होकर हाथी के समान उस राजा का तिरस्कार करने लगते हैं ।

भृत्याद्यैर्न कर्तव्याः परिहासाश्च क्रीडनम् ।
अपमानास्पदे ते तु राज्ञो नित्यं भयावहे ॥ २८५ ॥

भृत्यादियों के साथ राजा को परिहास (हंसी-मजाक) करना तथा खेल नहीं खेलना चाहिये, क्योंकि राजा के लिये ये दोनों सदा अपमानजनक तथा भय देनेवाले हैं ।

पृथक् पृथक् ख्यापयन्ति स्वार्थसिद्धयै नृपाय ते ।
स्वकार्यं गुणवत् कृत्वा सर्वे स्वार्थपरा यतः ॥ २८६ ॥

क्योंकि साथ में खेल खेलनेवाले या परिहास करनेवाले सभी भृत्य लोग (वेतनभोगी जन) पृथक् २ अपनी स्वार्थ-सिद्धि करने में लीन होने से अपने ही कार्य को अन्य की अपेक्षा अधिक गुणयुक्त (सुन्दर) सिद्ध करते हुये राजा को विदित करने का प्रयत्न किया करते हैं ।

विकल्पन्तेऽवमन्यन्ते लंघयन्ति च तद्वचः ।
राजभोज्यानि भुञ्जन्ति न तिष्ठन्ति स्वके पदे ॥ २८७ ॥
विशंसयन्ति तन्मन्त्रं विध्रुवन्ति च दुष्कृतम् ।
भवन्ति नृपवेषा हि वञ्चयन्ति नृपं सदा ॥ २८८ ॥
तत्स्त्रियं सञ्जयन्ति स्म राज्ञि क्रुद्धे हसन्ति च ।
व्याहरन्ति च निर्लज्जा हेलयन्ति नृपं क्षणात् ॥ २८९ ॥
आज्ञामुल्लङ्घयन्ति स्म न भयं यान्त्यकर्मणि ।
एते दोषाः परीहासक्षमाक्रीडोद्भवा नृपे ॥ २९० ॥

राजा के लिये भृत्यों के साथ खेल खेलने या परिहास या क्षमा (अपराध सहन) करने से निम्नलिखित ये दोष उत्पन्न होते हैं—जिससे वे सब (भृत्य लोग) उस राजा के वचनों को कभी तर्क उपस्थित करके अपने मनसे छोड़ देते हैं (नहीं करते हैं), कभी उसका तिरस्कार और कभी उल्लंघन कर देते हैं। और बिना राजाज्ञा के राजा के लिये रखे हुये भोज्य पदार्थों को खा लेते हैं। एवं अपने अधिकारोचित पद के अनुरूप व्यवहार नहीं करते हैं अर्थात् लापरवाही दिखाते हैं। और कभी राजा के गुप्त विचार एवं दुष्कर्मों को अन्यत्र प्रकट कर देते हैं और राजा के समान वेष-भूषादि धारण करते हैं तथा राजा को सदा ही ठगा करते हैं। और राजा की पटरानी को भी अपनी स्वार्थ-सिद्धि के विषय में राजा से कहने के लिये अथवा स्वयं करने के लिये बाध्य करते हैं। राजा के क्रुद्ध होने पर हँसते हैं। निर्लज्ज होकर बात-चीत

द्वितीयोऽध्यायः १०१

करते हैं। क्षण भर में ही राजा को झुका लेते हैं। और अन्त में राजाज्ञा (कानून) का भी उल्लंघन करते हैं। नीच कर्म करने पर भी राजा से नहीं डरते हैं।

न कार्यं भृतकः कुर्यान्नृपलेखाद्विना क्वचित् ।
नाज्ञापयेल्लेखनेन ऽविनाऽल्पं वा महन्नृपः ॥ २६१ ॥
भ्रान्तेः पुरुषधर्मत्वाल्लेख्यं निर्णायकं परम् ।

भृत्य को बिना लिखित राजाज्ञा के कभी कोई कार्य नहीं करना चाहिये । और राजा को भी बिना लिखे छोटी या बड़ी कोई भी आज्ञा नहीं देनी चाहिये । अर्थात् सदा लिखित आज्ञा देनी चाहिये। 'भ्रम हो जाना' यह मनुष्य का स्वभाव है, इससे भ्रम-निवारणार्थ निर्णय करने में लेख बहुत बड़ा प्रमाण सिद्ध होता है ।

अलेख्यमाज्ञापयति ह्यलेख्यं यत्करोति यः ॥ २६२ ॥
राजकृत्यमुभौ चोरौ तौ भृत्यनृपती सदा ।

जो राजा बिना लिखे आज्ञा देता है और जो भृत्य बिना लिखित राजाज्ञा के अनुसार राजकार्य करता है, वे दोनों (राजा तथा भृत्य) चोर हैं अर्थात् अनुचित करनेवाले निन्दनीय हैं ।

नृपसंविहितं लेख्यं नृपस्तन्न नृपो नृपः ॥ २६३ ॥

जो राजमुद्रा से अङ्कित (मोहर किया हुआ) राजाज्ञा है वही वस्तुतः राजा है किन्तु राजा-राजा नहीं है ।

समुद्रं लिखितं राज्ञा लेख्यं तच्चोत्तमोत्तमम् ।
उत्तमं राजलिखितं मध्यं मन्त्र्यादिभिः कृतम् ॥ २६४ ॥
पौरलेख्यं कनिष्ठं स्यात्सर्वं संसाधनक्षमम् ।

लेख्यों के भेदों का निर्देश— जो राजा से लिखित आज्ञा मोहरयुक्त होती है वह उत्तमोत्तम है, जो केवल राजा से स्वयं लिखित है अर्थात् हस्ताक्षर मात्र है वह साधारण उत्तम है, मन्त्रियों द्वारा लिखित (आज्ञा) मध्यम, तथा पुरवासियों के द्वारा लिखित कनिष्ठ माना गया है । उक्त सभी लेख कार्य को सिद्ध करने में समर्थ हैं ।

यस्मिन्यस्मिन्हि कृत्ये तु राज्ञा योऽधिकृतो नरः ॥ २६५ ॥
सामात्ययुवराजादिर्यथानुक्रमतश्च सः ।
दैनिकं मासिकं वृत्तं वार्षिकं बहुवार्षिकम् ॥ २६६ ॥
तत्कार्यजातलेख्यं तु राज्ञे सम्यङ् निवेदयेत् ।

जिन-जिन कार्यों के लिये अमात्य-युवराजादि अधिकारी बनाये गये हैं वे सब अनुक्रम से अपने २ कार्यों का विवरण दैनिक, मासिक, वार्षिक (पृक

१०२ | शुक्रनीतिः

वर्ष भर का ), बहुवार्षिक ( बहुत वर्षों का ) रूप में अच्छी तरह से लिखें। और उसे राजा के समक्ष उपस्थित कर दिखावें।

राजाद्यंकितलेख्यस्य धारयेत्स्मृतिपत्रकम् ॥ २९७ ॥
कालेऽतीते विस्मृतिर्वा भ्रान्तिः संजायते नृणाम् ।

राजादि के द्वारा लिखित लेखपत्र का स्मरण दिखानेवाला एक 'स्मृतिपत्र'-फाइल और रसीद रखे। क्योंकि बहुत समय बीतने पर विस्मृति या भ्रम हो जाना मनुष्यों के लिये स्वाभाविक है।

अनुभूतस्य स्मृत्यर्थे लिखितं निर्मितं पुरा ॥ २९८ ॥
यत्नाच्च ब्रह्मणा वाचां वर्ण-स्वर-विचिह्नितम् ।

क्योंकि पुराकाल में ब्रह्माजी ने अनुभव के स्मरणार्थ तथा स्वरों का चिह्न ( अक्षर ) स्वरूप लेख की परिपाटी बनाई थी अर्थात् इसका प्रारम्भ ब्रह्मा जी से हुआ है।

वृत्तलेख्यं तथा चायव्ययलेख्यमिति द्विधा ॥ २९६ ॥
व्यवहारक्रियाभेदादुभयं बहुतां गतम् ।

लेख के दो भेदों का निर्देश—इस लेख के दो भेद हैं—प्रथम—वृत्त ( समाचार ) संबन्धी, द्वितीय—आय-व्यय संबन्धी इनमें प्रत्येक के व्यवहार-संबन्धी क्रियाओं में भेद होने से बहुत से भेद होते हैं।

यथोपन्यस्तसाध्यार्थसंयुक्तं सोत्तरक्रियम् ॥ ३०० ॥
सावधारणकं चैव जयपत्रकमुच्यते ।

जयपत्रक के लक्षण—जिसमें यथायोग्य कहे हुये अभियोग के विषयों का एवं उसके उत्तर में कही हुई बातों का तथा अन्तिम निर्णय का लेख लिखा हो उसे 'जयपत्रक' कहते हैं।

सामन्तेष्वथ भृत्येषु राष्ट्रपालादिकेषु यत् ॥ ३०१ ॥
कार्यमादिश्यते येन तदाज्ञापत्रमुच्यते ।

आज्ञापत्र के लक्षण—जिस लेख द्वारा, सामन्तों ( अधीनवर्त्ती राजाओं ) अथवा राष्ट्रपालादि ( गवर्नर आदि ) भृत्यों को राजा आदेश देता है उसे 'आज्ञापत्र' कहते हैं।

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमन्येष्वभ्यर्चितेषु च ॥ ३०२ ॥
कार्यं निवेद्यते येन पत्रं प्रज्ञापनाय तत् ।

प्रज्ञापनपत्र के लक्षण—ऋत्विक्, पुरोहित तथा आचार्य एवं अन्य भी पूज्य लोगों के लिये जिस लेख के द्वारा राजा कार्य सूचित करता है, उसे 'प्रज्ञापनपत्र' कहते हैं।

सर्वे शृणुत कर्तव्यमाज्ञया मम निश्चितम् ॥ ३०३ ॥

द्वितीयोऽध्यायः [१०३]

स्वहस्तकालसम्पन्नं शासनं पत्रमेव तत्।
शासनपत्र के लक्षण— जिसमें यह लिखा रहता है कि—'हे भृत्यो या प्रजा लोगो ! तुम मेरी बात सुनो और मेरी आज्ञा से निश्चित किये हुये कर्त्तव्य कर्म को करो'—ऐसा अपने हस्ताक्षर से सही किया हुआ एवं समय के उल्लेख से युक्त पत्र 'शासनपत्र' कहलाता है।

देशादिकं यस्य राजा लिखितेन प्रयच्छति ॥ ३०४ ॥
सेवाशौर्यादिभिस्तुष्टः प्रसादलिखितं हि तत् ।
प्रसादलिखित के लक्षण— राजा सेवा और शूरता आदि से प्रसन्न होकर जिस लेख के द्वारा किसी के लिये देश आदि को पुरस्कार रूप में देता है उसे 'प्रसादलिखित' कहते हैं।

भोगपत्रं तु करदीकृतं चोपायनीकृतम् ॥ ३०५ ॥
पुरुषावधिकं तत्त कालावधिकमेव वा ।
भोग-कर-उपायन-पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण— और 'तुम इसका उपभोग करो' यह जिसमें लिख कर दिया जाता है, उसे 'भोगपत्र' कहते हैं। 'इसका यह राजस्व (कर = मालगुजारी) है' यह जिसमें लिखकर दिया जाता है उसे 'करपत्र' एवं उपहार रूप में जो द्रव्य दिया जाता है उसके विषय में जो लेख है उसे 'उपायनपत्र' कहते हैं। 'इस वस्तु का एक, दो या तीन पुरुषों को उपभोग करना चाहिये' यह लिखकर जो दिया जाता है, उसे 'पुरुषावधिक' एवं 'इस वस्तु का इतने समय तक उपभोग करना चाहिये' इस भांति से काल का उल्लेख करके जो दिया जाता है उसे 'कालावधिक' पत्र कहते हैं।

विभक्ता ये च भ्रात्राद्याः स्वरुच्या तु परस्परम् ॥ ३०६ ॥
विभागपत्रं कुर्वन्ति भागलेख्यं तदुच्यते ।
विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण— अपनी इच्छा से परस्पर अलग हुये भाई लोग जो विभाग-सम्बन्धी लेख जिसमें लिखते हैं उसे 'विभागपत्र' अथवा 'भागलेख्य' कहते हैं।

गृहभूम्यादिकं दत्त्वा पत्रं कुर्यात्प्रकाशकम् ॥ ३०७ ॥
अनुच्छेद्यमनाहार्यं दानलेख्यं तदुच्यते।
दानपत्र के लक्षण— किसी को दानरूप में गृहादिक देकर उसके सम्बन्ध में यह लिखे कि 'इसका कोई खण्डन या अपहरण न करे' इस विषय को जनता के समक्ष घोषित करने वालापत्र 'दान पत्र' कहलाता है।

गृहक्षेत्रादिकं क्रीत्वा तुल्यमूल्यप्रमाणयुक् ॥ ३०८ ॥
पत्रं कारयते यत्तु क्रयलेख्यं तदुच्यते।

१०४शुक्रनीतिः

**क्रयपत्र के लक्षण—**गृह, क्षेत्र ( खेत ) आदि को योग्य मूल्य और परिमाण के साथ खरीद कर उसके विषय में जो लेख लिखा जाता है उसे 'क्रयपत्र' कहते हैं ।

जङ्गमस्थावरं बन्धं कृत्वा लेख्यं करोति यत् ॥ ३०६ ॥
गोप्यभोग्यक्रियायुक्तं साधिलेख्यं तदुच्यते ।

**साधिलेख्य के लक्षण—**जिसमें जङ्गम ( सोना-चांदी आदि ) और स्थावर ( गृह-भूमि आदि ) को बन्धक रूप में रखकर उसके संबन्ध में यह लिखता है कि—'यह रक्षणीय तथा उपभोग करने योग्य है' उसे 'साधिलेख्य' कहते हैं ।

ग्रामो देशश्च यत्कुर्यात्सत्यलेख्यं परस्परम् ॥ ३१० ॥
राजाविरोधिधर्मार्थं संवित्पत्रं तदुच्यते ।

**संवित्पत्र के लक्षण—**ग्राम तथा नगर के लोग जो परस्पर राजा का अवि-रोधी धर्मरक्षा के लिये प्रतिज्ञाबद्ध होकर लिखते हैं उसे 'संवित्पत्र' कहते हैं ।

वृद्ध्यर्थं धनं गृहीत्वा तु कृतं वा कारितं च यत् ॥ ३११ ॥
ससाक्षिमच्च तत्प्रोक्तमृणलेख्यं मनीषिभिः ।

**ऋणलेख्य के लक्षण—**सूद पर रुपया लेकर साक्षियों के साथ भली-भाँति स्वयं लिखे हुये या लिखाये हुये लेख को पण्डित लोग 'ऋणलेख्य' कहते हैं ।

अभिशापे समुत्तीर्णे प्रायश्चित्ते कृते बुधैः ॥ ३१२ ॥
दत्तं लेख्यं साक्षिमयच्छुद्धिपत्रं तदुच्यते ।

**शुद्धिपत्र के लक्षण—**लगाये हुये अपवाद के प्रमाणित न होने से दूर होने पर, एवं प्रायश्चित्त कर चुकने.पर साक्षी ( गवाही ) लोगों के हस्ताक्षरयुक्त विद्वानों के द्वारा जो लेख लिखकर प्रमाण रूप में दिया जाता है, उसे 'शुद्धिपत्र' कहते हैं ।

मेलयित्वा स्वधनांशान् व्यवहाराय साधकाः ॥ ३१३ ॥
कुर्वन्ति लेखपत्रं यत्तच्च सामयिकं स्मृतम् ।

**सामयिक लेख्यपत्र लक्षण—**मिलकर के ( कम्पनी के रूप में ) व्यवसाय करनेवाले जो लोग हैं वे लोग अपने-अपने हिस्सों के अनुसार धन को उस (व्यवसाय) में लगा कर जो लेखपत्र लिखते हैं, उसको 'सामयिक' लेखपत्र कहते हैं ।

सभ्याधिकारिप्रकृतिसभासद्भिर्न यः कृतः ॥ ३१४ ॥
तत्पत्रं वादिमान्यं चेज्ज्ञेयं संमतिसंज्ञकम् ।

**संमतिसंज्ञक पत्र के लक्षण—**श्रेष्ठ अधिकारी गण या अमात्यादि प्रधान पुरुष अथवा सभासद् ( जूरी ) लोगों ने जो अपने निर्णयों को नहीं प्रदर्शित

द्वितीयोऽध्यायः १०५

द्वितीयोऽध्यायः १०५

किया है वे यदि वादी को मान्य हों तो उसके विषय में लिखे हुये पत्र को 'संमतिसंज्ञक पत्र' कहते हैं।

स्वकीयवृत्त-ज्ञानार्थं लिख्यते यत्परस्परम् ॥ ३१५ ॥
श्रीमंगलपदाढ्यं वा सपूर्वोत्तरपक्षकम् ।
असंदिग्धमगूढार्थं स्पष्टाक्षरपदं सदा ॥ ३१६ ॥
अन्यव्यावर्त्तकस्वात्म-परपित्रादिनामयुक् ।
एक-द्वि-बहुवचनै-र्यथार्ह-स्तुतिसंयुतम् ॥ ३१७ ॥
समामासतदर्द्धार्हनामजात्यादिचिह्नितम् ।
कार्यबोधि सुसम्बन्धं नत्याशीर्वादपूर्वकम् ॥ ३१८ ॥
स्वाम्यसेवकसेव्यार्थं क्षेमपत्रं तु तत्स्मृतम् ।

**क्षेमपत्र के लक्षण—**अपने समाचारों को सूचित करने के लिये सदा श्री तथा मङ्गलसूचकशब्दों से प्रारम्भ करके प्रश्न तथा उत्तरों से युक्त, सन्देहरहित, स्पष्ट अर्थ तथा वांचने योग्य अक्षरों से युक्त शब्दों से भरा हुआ, दूसरे का ग्रहण न हो इसलिये अपने तथा दूसरे के पिता आदि के नामों से युक्त, एक, दो या बहुवचनों से यथायोग्य प्रशंसा से भरे हुये, वर्ष, मास, पक्ष तथा दिन नाम तथा जातिबोधक शब्दों से युक्त, कार्य को सूचित करनेवाला, सुसंगत, नमस्कार ( बड़ों के लिये ) एवं आशीर्वाद ( छोटों के लिये ) पूर्वक, स्वामी तथा सेवक का परस्पर सेवा-संबन्ध को लेकर जो पत्र लिखा जाता है उसे 'क्षेमपत्र' कहते हैं।

एभिरेव गुणैर्युक्तं स्वार्थाधर्षकविबोधकम् ॥ ३१९ ॥
भाषापत्रं तु तज्ज्ञेयमथवा वेदनार्थकम् ।

**वेदनार्थक पत्र के लक्षण—**उपर्युक्त इन्हीं सभी गुणों से युक्त, अपनी पीड़ाओं को व्यक्त करनेवाला जो पत्र होता है उसे 'भाषापत्र' अथवा 'वेदनार्थक पत्र' कहते हैं।

प्रदर्शितं वृत्तलेख्यं-समासाल्लक्षणान्वितम् ॥ ३२० ॥
समासात्कथ्यते चान्यच्छ्रेष्ठायव्ययबोधकम् ।

**आय-व्यय लेख्य के लक्षण—**इस तरह से संक्षेप में अपने-अपने लक्षणों से युक्त प्रथम 'वृत्त लेख्य' के भेदों को प्रदर्शित किया अब द्वितीय 'आय-व्यय-लेख्य' का संक्षेप से वर्णन कर रहे हैं।

व्याप्यव्यापकभेदैश्च मूल्यमानादिभिः पृथक् ॥ ३२१ ॥
विशिष्टसंज्ञितैस्तद्धि यथार्थैर्बहुभेदयुक् ।

**राजाओं के आय-व्ययादिक के लक्षण—**आय-व्यय-लेख्य या पत्र व्याप्य (अल्पविषयक) और व्यापक (बहुविषयक) भेदों से, बहुत या थोड़ा होने से,

१०६ शुक्रनीतिः

पृथक्-पृथक् यथार्थ मूल्य और मान (तौल) आदि से अनेक भेदों से युक्त अनेक प्रकार का) होता है।

वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३२२ ॥
हिरण्यपशुधान्यादि स्वाधीनं त्वायसंज्ञकम् ।
पराधीनं कृतं यत्त व्ययसंज्ञं धनं च तत् ॥ ३२३ ॥

प्रतिवर्ष, प्रतिमास और प्रतिदिन जो सोना, पशु तथा धान्य आदि जो अपने अधीन हो जाता है अर्थात् अपने पास आता है। वह 'आय' कहलाता है। और जो सोना आदि धन दूसरे के आधीन कर दिया (दे दिया) जाता है वह 'व्यय' कहलाता है।

सद्यस्कश्चैव प्राचीन आयः सञ्चितसंज्ञकः ।
व्ययो द्विधा चोपभुक्तस्तथा विनिमयात्मकः ॥ ३२४ ॥

आय के भेद— और आय दो प्रकार का होता है, एक तात्कालिक दूसरा प्राचीन, जिसे 'संचित' भी कहते हैं। एवं व्यय भी दो प्रकार का होता है, एक उपभुक्त (उपभोग किया हुआ), दूसरा विनिमयात्मक (किसी वस्तु के बदले के रूप में दिया हुआ)।

निश्चितअन्यस्वामिकञ्चानिश्चितस्वामिकन्तथा ।
स्वस्वत्वनिश्चितं चेति त्रिविधं सञ्चितं मतम् ॥ ३२५ ॥

संचित आय के भेद— सञ्चित आय तीन प्रकार का होता है। एक निश्चितअन्यस्वामिक (जिसका दूसरा कोई स्वामी निश्चित है), दूसरा-अनिश्चितस्वामिक (जिसके स्वामी का निश्चय नहीं है), तीसरा स्व-स्वत्वनिश्चित (अपना स्वत्व जिस पर निश्चित है अर्थात् निजी) संज्ञक सञ्चित आय है।

निश्चितअन्यस्वामिकं यद्धनं तु त्रिविधं हि तत् ।
औपनिध्यं याचितकमौत्तमर्णिकमेव च ॥ ३२६ ॥

निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन के भेद— इसमें प्रथम जो निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन है, वह तीन प्रकार का है उसमें पहला औपनिध्य, दूसरा याचितक तीसरा औत्तमर्णिक है।

विस्रम्भान्निहितं सद्भिर्र्यदौपनिधिकं हि तत् ।
अवृद्धिकं गृहीतान्यालङ्कारादि च याचितम् ॥ ३२७ ॥
सवृद्धिकं गृहीतं यदृण तच्चौत्तमर्णिकम् ।

औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण— जो धन किसी सज्जन द्वारा विश्वास मानकर किसी के पास रखा जाता है वह 'औपनिधिक' (औपनिध्य) कहलाता है। जो बिना सूद का दूसरे से अलङ्कार आदि (रुपया आदि) लिया जाता है वह 'याचित' कहलाता है। और जो सूद पर ऋण लिया जाता है वह 'औत्तमर्णिक' कहलाता है।