भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २१६

राजभागस्तु रजतशतकर्षमितो यतः ।
कर्षकाल्लभ्यते तस्मै विंशांशमुत्सृजेन्नृपः ॥ ११४ ॥

जिस कृषक से राजा को १०० रूपये भर चांदी (चांदी का रुपया) कर रूप में मिलता हो तो उस (कृषक) के लिये राजा अपने कर में से बीसवां भाग (५ रुपये) अपनी ओर से दे देवे ।

स्वर्णार्धं च रजतात्तृतीयांशं च ताम्रतः ।
चतुर्थांशं तु षष्ठांशं लोहाद्वङ्गाच्च सीसकात् ॥ ११५ ॥
रत्नार्धं चैव क्षारार्धं खनिजाद्व्ययशेषतः ।
लाभाधिक्यं कर्षकादेर्यथा दृष्ट्वा हरेत्फलम् ॥ ११६ ॥
त्रिधा वा पञ्चधा कृत्वा सप्तधा दशधाऽपि वा ।

रजतादियुक्त भूमि के लिये राजभाग-नियम— व्यय को काटकर खान से उत्पन्न होनेवाले सोना से आधा अंश, चांदी से तृतीयांश, तामा से चतुर्थांश, लोहा, वंग तथा सीसा से षष्ठांश, रत्नों से तथा क्षार पदार्थ नमक आदि से आधा अंश एवं कृषक आदि के लाभ की अधिकता देखकर तदनुसार तृतीयांश, पञ्चमांश, सप्तमांश या दशमांश कर ग्रहण राजा को करना चाहिये ।

तृणकाष्ठादिहरकाद्विंशांशं हरेत्फलम् ॥ ११७ ॥

तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २० वाँ भाग कर लेने का निर्देश— और तृण-काष्ठ आदि लाकर बेचनेवालों से २० वाँ अंश कर लेना चाहिये ।

अजाविगोमहिष्यश्ववृद्धितोऽष्टांशमाहरेत् ।
महिष्यजाविगोदुग्धात्षोडशांशं हरेन्नृपः ॥ ११८ ॥

बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश— बकरी, भेड़, गौ, भैंस और घोड़ों की वृद्धि में से अष्टमांश कर राजा ग्रहण करे। भैंस, बकरी, भेड़, तथा गाय के दूध में से १६ वां भाग कर ग्रहण करे ।

कारुशिल्पिगणात्पक्षे दैनिकं कर्मकारयेत् ।
तस्य वृद्ध्यै तडागं वा वापिकां कृत्रिमां नदीम् ॥ ११९ ॥
कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा कर्षन्त्यभिनवां भुवम् ।
यद्व्ययद्विगुणं यावन्न तेभ्यो भागमाहरेत् ॥ १२० ॥

कारु आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश— कारु (बढ़ई आदि) तथा शिल्पी (चित्रकार आदि) आदि के वर्गों से हर एक पक्ष (१५ दिन) में एक दिन कर रूप में उनसे मुफ्त में काम करा लेवे । और जो राज्य की उन्नति के लिये तालाब, बावली, या कृत्रिम नदी (नहर) या इसी के समान और किसी दूसरे कार्य का निर्माण करते हैं उन लोगों से तथा जो नवीन भूमि को जोत कर खेती के योग्य बनाते हैं, उन लोगों से जब तक व्यय काटकर दूना

२२०शुक्रनीतिः

लाभ न होने लगे तब तक कर नहीं लेना चाहिये उसके बाद अधिक लाभ होने पर लेना चाहिये ।

भूविभागं भृतिं शुल्कं वृद्धिमुत्कोचकं करम्।
सद्य एव हरेत्सर्वं न तु कालविलम्बनैः ॥ १२१ ॥

भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश— अपनी जमीन का हिस्सा, अलग कराना, वेतन, चुंगी, ब्याज, घूस या दलाली, कर (मालगुजारी), इन सबों को तत्काल ले लेना चाहिये, इनमें विलम्ब करना अनुचित है।

दद्यात्प्रतिकर्षकाय भागपत्रं सचिह्नितम्।
नियम्य ग्रामभूभागमेकस्माद्धनिकाद्धरेत् ॥ १२२ ॥
गृहीत्वा तत्प्रतिमुखं धनं प्राक् तत्समं तु वा।
विभागशो गृहीत्वाऽपि मासि मासि ऋतावृत्तौ ॥ १२३ ॥
षोडशाद्वादशदशाष्टांशतो वाऽधिकारिणः।
स्वांशात् षष्ठांशभागेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ १२४ ॥

किसान को भागपत्र ः लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश— राजा हर एक किसान को मालगुजारी की रसीद लिखकर उसपर अपनी मुहर भी लगाकर दे देवे। अथवा ग्राम की सभी भूमि का कर नियत कर किसी एक धनिक से सभी कर ले लेवे। और उस धनिक को किसानों का जामिनदार मान ले। जो कि राजकर को प्रति-मास या प्रति ऋतु सबसे अलग-अलग २ लेकर राजा को दिया करे। और योग्यतानुसार सोलहवां, बारहवां, दसवां या आठवां अंश जो राजा को मिलनेवाला कर हो उसका छठवां भाग वेतन रूप में देकर राजा ग्रामपाल (मुखिया) या अधिकारी की नियुक्ति करे।

गवादिदुग्धान्नफलं कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः।
उपभोगे धान्यवस्त्रं क्रेतुर्तो नाहरेत् फलम् ॥ १२५ ॥

क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश— राजा कुटुम्बपालनार्थ रखी हुई गो आदि के दुग्ध के ऊपर कर न लेवे, और अपने उपभोग के लिये धान्य तथा वस्त्र खरीदनेवाले से भी कर न ग्रहण करे।

वार्धुषिकाच्च कौसीदाद् द्वात्रिंशांशं हरेन्नृपः।
गृहाद्याधारभूशुल्कं कृष्टभूमिरिवाहरेत् ॥ १२६ ॥

व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वां भाग लेने का निर्देश— व्यापार करनेवालों और। ब्याज पर रुपया देनेवालों से लाभांश का ३२ वां अंश (रुपये में दो पैसा) कर राजा ग्रहण करे। और गृह बनाने के लिये दी हुई भूमि का कर बोने के लिये दी हुई भूमि के समान ही लेवे।

चतुर्थोऽध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२१

तथा चापणिकेभ्यस्तु पण्यभूशुल्कमाहरेत् ।
मार्गसंस्काररक्षार्थं मार्गगेभ्यो हरेत् फलम् ॥ १२७ ॥
दुकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश— राजा दूकानदारों से दूकान की भूमि का कर ग्रहण करे। और यात्रियों से मार्ग की सफाई तथा रक्षा के लिये भी कर ग्रहण करे।

सर्वतः फलभुग् भूत्वा दासवत् स्यात्तु रक्षणे ।
इति कोशप्रकरणं समासात् कथितं किल ॥ १२८ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य कोशनिरूपणं नाम द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

राजा सबों से कर ग्रहण कर नौकर की भांति उनकी रक्षा करे। इस प्रकार से संक्षेप में कोश-प्रकरण का वर्णन किया गया।
इस प्रकार शुक्रनीति भाषा टीका में चतुर्थाध्याय का कोशनिरूपण नाम का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥


अथ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयं राष्ट्रप्रकरणम् ।

अथ मिश्रे तृतीयं तु राष्ट्रं वक्ष्ये समासतः ।
स्थावरं जङ्गमं वापि राष्ट्रशब्देन गीयते ॥ १ ॥
राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश— अब इस मिश्र अध्याय में तीसरा राष्ट्र प्रकरण का संक्षेप में वर्णन करूंगा। यहां पर 'राष्ट्र' शब्द से स्थावर (वृक्ष-पर्वतादि) तथा जङ्गम (गो-मनुष्यादि) का बोध करना चाहिये।

यस्याधीनं भवेद्यावत्तद्राष्ट्रं तस्य वै भवेत् ।
कुबेरता शतगुणाधिका सर्वगुणात्ततः ॥ २ ॥
ईशता चाधिकतरा सा नाल्पतपसः फलम् ।
स दीव्यति पृथिव्यां तु नान्यो देवो यतः स्मृतः ॥ ३ ॥
राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश— जिस राजा के अधीन जितना राष्ट्र होता है उतना उसका वह 'राज्य' कहलाता है। सर्व-गुण-सम्पन्न होने की अपेक्षा सौ गुना अधिक श्रेष्ठ धन-कुबेर होना है, उसके बाद राजा होना सबसे अधिक श्रेष्ठ है जो कि साधारण तपस्या का फल नहीं है, क्योंकि वह संसार में देवता के समान विहार करता है अतः उसके अतिरिक्त अन्य कोई देवता के समान नहीं माना जाता है।

यस्याश्रितो भवेल्लोकस्तद्वदाचरति प्रजा।

२२२शुक्रनीतिः

भुङ्क्ते राष्ट्रफलं सम्यगतो राष्ट्रकृतं त्वघम् ॥ ४ ॥

**राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश—**जैसे राजा के आश्रय में लोग रहते हैं और वह जैसा आचरण करता है उसकी प्रजावें भी वैसा ही आचरण करती हैं। इसी से वह राजा भी राष्ट्र (राज्यवर्ती प्रजा) के किये हुये पाप-पुण्य का फल दुःख-सुख का भली भांति भोग करता है।

स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते ।
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते ॥ ५ ॥
भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ।

जिस राजा के राज्य में प्रजाजन अपने २ धर्म में तत्पर रहते हैं, धर्म तथा नीति में तत्पर रहनेवाला वह राजा चिरस्थायी कीर्ति को प्राप्त करता है। पृथ्वी पर जिसकी कीर्ति जब तक विद्यमान रहती है, तब तक वह स्वर्ग में रहता है।

अकीर्तिरेव नरको नान्योऽस्ति नरको दिवि ॥ ६ ॥
नरदेहाद्विना त्वन्यो देहो नरक एव सः ।
महत्पापफलं विद्यादाधिव्याधिस्त्र रूपकम् ॥ ७ ॥

**नरक के लक्षण का निर्देश—**अपकीर्ति ही नरक है, परलोक में अन्य कोई नरक नहीं है। मनुष्य देह को छोड़कर अन्य देह नरक ही हैं। और आधि व्याधि का होना बड़े पाप का फल ही समझना चाहिये।

स्वयं धर्मपरो भूत्वा धर्मे संस्थापयेत् प्रजाः ।
प्रमाणभूतं धर्मिष्ठमुपसर्पन्त्यतः प्रजाः ॥ ८ ॥

**राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश—**राजा स्वयं धर्म में तत्पर होकर प्रजाओं को धर्म में स्थापित रक्खे। इससे प्रजायें भी प्रामाणिक तथा धर्मिष्ठ राजा की अनुगामिनी बनी रहती हैं।

देशधर्मा जातिधर्माः कुलधर्माः सनातनाः ।
मुनिप्रोक्ताश्च ये धर्माः प्राचीना नूतनाश्च ये ॥ ९ ॥
ते राष्ट्रगुप्त्यै सन्धार्या ज्ञात्वा यत्नेन सन्नृपैः ।
धर्मसंस्थापनाद्राजा श्रियं कीर्तिं प्रविन्दति ॥ १० ॥

**सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश—**बहुत दिनों से प्रचलित देश-धर्म, जाति-धर्म, तथा कुल-धर्म एवं मुनियों द्वारा कहे हुये धर्म, तथा प्राचीन और नवीन धर्म, इन सबों का ज्ञान प्राप्त कर राष्ट्र की रक्षा के लिये यत्नपूर्वक अच्छे राजाओं को इनकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि धर्म की संस्थापना करने से राजा लक्ष्मी तथा कीर्ति को प्राप्त करता है।

चतुर्धा भेदिता जातिर्ब्राह्मणा कर्मभिः पुरा ।

चतुर्थाध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२३

तत्तत्सांकर्यासांकर्यात् प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ११ ॥
जात्यानन्त्यं तु सम्प्राप्तं तद्वक्तुं नैव शक्यते ।

**मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश—**पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने कर्म के अनुसार मानव की ४ जातियां बनाईं। उनमें प्रत्येक जातियों का सांकर्य (मिलावट) होने पर उन संकीर्ण (मिश्रित) जातियों का भी सांकर्य अनुलोम (पिता उच्च वर्ण-माता नीच वर्ण) और प्रतिलोम (पिता नीच वर्ण-माता उच्च वर्ण) रूप से होने से असंख्य जातियां हो गई जिनका वर्णन करना अशक्य है ।

मन्यन्ते जातिभेदं ये मनुष्याणां तु जन्मना ॥ १२ ॥
त एव हि विजानन्ति पार्थक्यं नामकर्मभिः ।

जो लोग पूर्व कर्मानुसार जिस जाति में मनुष्य जन्म ले उसकी वही जाति मानते हैं, वे ही लोग नाम तथा कर्म से जाति-भेद मानते हैं, अन्य लोग नहीं मानते हैं ।

जरायुजाण्डजाः स्वेदोज्भिज्जा जातिः सुसंग्रहात् ॥ १३ ॥

**जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश—**जरायुज (मनुष्यादि), अण्डज (पक्षी आदि), स्वेदज (जूंआ आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि) ये ४ प्रकार के प्राणियों की जातियां हैं ।

उत्तमो नीचसंसर्गाद्भवेन्नीचस्तु जन्मना ।
नीचो भवेन्नोत्तमस्तु संसर्गाद्वाऽपि जन्मना ॥ १४ ॥

जन्म से उत्तम वर्ण का मनुष्य संसर्गवश नीच हो जाता है किन्तु जन्म से नीच वर्ण का मनुष्य संसर्गवश उत्तम नहीं हो सकता है ।

कर्मणोत्तमनीचत्वं कालतस्तु भवेद् गुणैः ।
विद्याकलाश्रयेणैव तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ १५ ॥

कर्म के द्वारा मनुष्य तत्काल उत्तम तथा नीच कहलाने लगता है । किन्तु गुणों के द्वारा कुछ काल के बाद उत्तम या नीच माना जाता है और विद्या तथा कला के आश्रय से भी उसके नामानुसार अनेक जातियों की कल्पना की गई है ।

इज्याध्ययनदानानि कर्माणि तु द्विजन्मनाम् ।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च याजनं ब्राह्मणेऽधिकम् ॥ १६ ॥

**द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश—**यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना ये ३ कर्म द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) मात्र के हैं किन्तु ब्राह्मणों के लिये यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना, दान लेना ये ३ कर्म जीविका के लिये अधिक हैं ।

२२४शुक्रनीतिः

सद्रक्षणं दुष्टनाशः स्वांशादानं तु क्षत्रिये ।
कृषिगोगुप्तिवाणिज्यमधिकं तु विशां स्मृतम् ॥ १७ ॥

**क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश—**सज्जनों की रक्षा करना, दुष्टों का नाश करना, अपने अंश (कर) को ग्रहण करना ये ३ कर्म क्षत्रियों के जीविका के लिये अधिक हैं। खेती करना, गोपालन तथा वाणिज्य करना ये ३ कर्म जीविकार्थ वैश्यों के लिये अधिक हैं।

दानं सेवैव शूद्रादेर्नीचकर्म प्रकीर्तितम् ।
क्रियाभेदैस्तु सर्वेषां भृतिवृत्तिरनिन्दिता ॥ १८ ॥

**शूद्रादि के कर्मों का निर्देश—**दान देना, जीविकार्थ नौकरी करना तथा नीच कर्म (चौका-बर्त्तन आदि) करना शूद्रादि के ये कर्म हैं। क्रियाओं में भेद द्वारा सभी वर्णों की भरण-पोषणार्थ वृत्ति अनिन्दित मानी गई है।

सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता मन्वाद्यैर्ब्राह्मणादिषु ।
ब्राह्मणैः षोडशगवं चतुरूनं यथा परैः ॥ १६ ॥
द्विगवं वाऽन्त्यजैः सीरं दृष्ट्वा भूमार्दवं तथा ।

**ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश—**जैसे मनु आदि स्मृतिकारों ने हलसम्बन्धी भेदों के द्वारा ब्राह्मणादि के लिये भी कृषि करने का विधान बताया है। उसमें ब्राह्मणों को १६ बैल १ हल पर रख कर खेत जुतवाना चाहिये, और उत्तरोत्तर ४-४ कम बैलों से अर्थात् क्षत्रियों को १२ बैल, वैश्यों को ८ बैल तथा शूद्रों को ४ बैल १ हल पर रखते हुये खेत जुतवाना चाहिये। और अन्त्यजों (अस्पृश्य जातियों) को २ बैल १ हल पर रखना चाहिये। यह नियम भूमि की मृदुता को देखकर किया गया है अतः यदि कठिन भूमि हो तो बैलों की संख्या २ से ४ भी हो सकती है।

ब्राह्मणेन विनाऽन्येषां भिक्षावृत्तिर्विगर्हिता ॥ २० ॥

**ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश—**ब्राह्मणों को छोड़ कर अन्य वर्णों के लिये भिक्षा मांग कर जीविका चलाना विशेष रूप से निन्दित है।

तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ २१ ॥

**द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश—**द्विजों को वेद-विहित नाना प्रकार की तपस्यायें तथा व्रत करते हुये उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् ।
न च जात्याऽनधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति ॥ २२ ॥

चतुर्थाऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२५

गुरु का लक्षण—जिस द्विज ने संपूर्ण विद्याओं तथा कलाओं का अध्ययन किया है वही सबों का गुरु (श्रेष्ठ या उपदेष्टा) होने योग्य होता है, बिना इसके केवल जातिमात्र से वह गुरु नहीं हो सकता है।

विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः संख्यातुं नैव शक्यते ।
विद्यामुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिकलाः स्मृताः ॥ २३ ॥

मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश—यद्यपि विद्यायें तथा कलायें अनन्त हैं अतः उनकी गणना नहीं की जा सकती है, तथापि उनमें से मुख्य रूप से ३२ विद्यायें तथा ६४ कलायें मानी गई हैं।

यद्यत्स्याद्वाचिकं सम्यक्कर्मविद्याभिसंज्ञकम् ।
शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ २४ ॥

विद्या और कला के लक्षण—जो २ कर्म वाणी द्वारा भलीभांति संपन्न किया जा सकता है वह 'विद्या' नाम से प्रसिद्ध है और जिसे गूंगा भी हाथ से कर सकता है उसे 'कला' कहते हैं ।

उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म विशिष्टं पृथगुच्यते ।
विद्यानां च कलानां च नामानि तु पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥

इस प्रकार से संक्षेप में लक्षण कहा गया, अब विशेष रूप से पृथक् २ लक्षण कहते हैं । उनमें विद्याओं तथा कलाओं के नाम पृथक् २ ये सब हैं।

ऋग्यजुः साम चाथर्वं वेदा आयुर्धनुः क्रमात् ।
गान्धर्व्वंश्चैव तन्त्राणि उपवेदाः प्रकीर्तिताः ॥ २६ ॥

विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश—जैसे विद्यायें १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्ववेद ये ४ वेद हैं और क्रम से ५. आयुर्वेद, ६. धनुर्वेद, ७. गान्धर्ववेद, ८. तन्त्र ये ४ उपवेद हैं ।

शिक्षा व्याकरणं कल्पो निरुक्तं ज्यौतिषं तथा ।
छन्दः षडङ्गानीमानि वेदानां कीर्तितानि हि ॥ २७ ॥

वेदों के ६ अंगों का निर्देश—९. शिक्षा, १०. व्याकरण, ११. कल्प, १२. निरुक्त, १३. ज्योतिष, १४. छन्द ये वेदों के ६ अङ्ग माने गये हैं ।

मीमांसातर्कसांख्यानि वेदान्तो योग एव च ।
इतिहासाः पुराणानि स्मृतयो नास्तिकं मतम् ॥ २८ ॥
अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं तथा शिल्पंमलङ्कृतिः ।
काव्यानि देशभाषाऽव-सरोक्त्योर्ब्वनं मतम् ॥ २९ ॥
देशादिधर्मा द्वात्रिंशदेता विद्याभिसंज्ञिताः ।

मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश—१५. मीमांसा, १६. तर्क (न्याय वैशेषिक), १७. सांख्य, १८. वेदान्त, १९. योग, २०. इतिहास,

३२६ | शुक्रनीतिः

२१. पुराण, २२. स्मृति, २३. नास्तिकमत, २४. अर्थशास्त्र, २५. कामशास्त्र, २६. शिल्पशास्त्र, २७. अलङ्कारशास्त्र, २८. काव्य, २९. देशभाषा, ३०. अवसरोचित उक्ति, ३१. यवनों का मत, ३२. देशादि के प्रचलित धर्म, ये ३२ विद्या नाम से प्रसिद्ध हैं।

मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद-नाम प्रोक्तमृगादिषु ॥ ३० ॥

**वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश—**ऋग्वेदादि ४ वेदों में मन्त्र और ब्राह्मण भागों की वेद संज्ञा कही हुई है। अर्थात् वेदों में मन्त्र और ब्राह्मण ये दो भाग होते हैं।

जपहोमार्चनं यस्य देवताप्रीतिदं भवेत् । उच्चारान्मन्त्रसंज्ञं तद्विनियोगि च ब्राह्मणम् ॥ ३१ ॥

**मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण—**जिस वेद के भाग का उच्चारण करके जप, होम और देवपूजन करना देवता की प्रीति के लिये होता है, उसे 'मन्त्र' कहते हैं। और उन मन्त्रों के विनियोग (प्रयोगविधि) जिसमें हो उस वेद के भाग को 'ब्राह्मण' कहते हैं।

ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः पादशोऽर्धर्चशोऽपि वा । येषां होत्रं स ऋग्भागः समाख्यानं च यत्र वा ॥ ३२ ॥

**ऋग्वेद के लक्षण—**जिसमें ऋग्रूप स्तुतिपरक मन्त्र हों जो कि पाद १ अथवा ऋचाओं का आधा २ अंश करके पढ़े जाते हों तथा जिन मन्त्रों के द्वारा होम किया जाता हो, जिसमें अच्छी तरह से आख्यान हो, उसे 'ऋग्वेद' कहते हैं।

प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा वृत्तगीतिविवर्जिताः । आध्वर्यवं यत्र कर्म त्रिगुणं यत्र पाठनम् ॥ ३३ ॥ मन्त्रब्राह्मणयोरेव यजुर्वेदः स उच्यते ।

**यजुर्वेद के लक्षण—**जिसमें अलग २ करके मन्त्र पढ़े जाते हों, जो कि छन्द तथा गान से रहित हों, तथा जिसमें अध्वर्युसंबन्धी कर्म कहे गये हों, एवं जिसमें मन्त्र तथा ब्राह्मण भाग का तीन बार आवृत्ति करके पाठ होता हो उसे 'यजुर्वेद' कहते हैं।

उद्गीथं यस्य शस्त्रादेर्यज्ञे तत्सामसंज्ञकम् ॥ ३४ ॥

**सामवेद के लक्षण—**जिसमें यज्ञ के समय शस्त्रादि की स्तुति उच्चस्वर से गाकर मन्त्रों द्वारा की जाती हो उसे 'सामवेद' कहते हैं।

अथर्वाङ्गिरसो नाम ह्युपास्योपासनात्मकः । इति वेदचतुष्कं तु ह्यद्दिष्टं च समासतः ॥ ३५ ॥

**अथर्ववेद के लक्षण—**जिसमें उपास्य (आराध्य) देवताओं का तथा

चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२७

उनकी उपासना का वर्णन हो उसे 'अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद)' कहते हैं। इस प्रकार से चारो वेदों का संक्षेप में वर्णन किया गया है।

विन्दत्यायुर्वेत्ति सम्यग्वाकृत्योषधिहेतुतः।
यस्मिन्नृग्वेदोपवेदः स चायुर्वेदसंज्ञकः ॥ ३६ ॥

आयुर्वेद के लक्षण— जिसमें कही हुई विधि का पालन करने से मनुष्य दीर्घ आयु लाभ करता है। और जिसके द्वारा रोगों का लक्षण, औषधि तथा निदान का ज्ञान प्राप्त कर रोगियों की आयु का ज्ञान प्राप्त करता है। उसे ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद' कहते हैं।

युद्धशास्त्रास्त्रकुशलो रचनाकुशलो भवेत् ।
यजुर्वेदॊपवेदोऽयं धनुर्वेदस्तु येन सः ॥ ३७ ॥

धनुर्वेद के लक्षण— जिसके ज्ञान से मनुष्य युद्ध, शस्त्र, व्यूहरचना आदि में निपुणता प्राप्त करता है उसे यजुर्वेद का उपवेद 'धनुर्वेद' कहते हैं।

स्वरैरुदात्तादिधमैस्तन्त्रीकण्ठोत्थितैः सदा ।
सतालैर्गानविज्ञानं गान्धर्वो वेद एव सः ॥ ३८ ॥

गान्धर्ववेद के लक्षण— जिसके द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वर तथा वीणा और कण्ठ से निकले हुये निषादादि स, रि, ग, म, प, ध, नि इन ७ स्वरों में ताल के साथ गाने का ज्ञान होता है, उसे सामवेद का उपवेद 'गान्धर्ववेद' कहते हैं।

विविधोपास्यमन्त्राणां प्रयोगाः सुविभेदतः ।
कथिताः सोपसंहारास्तद्धर्मनियमैश्च षट् ॥ ३६ ॥
अथर्वणां चोपवेदस्तन्त्ररूपः स एव हि।

तन्त्र या आगम के लक्षण— जिसमें नाना प्रकार के उपास्य देवों के मन्त्रों के प्रयोग एवं मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, आकर्षण, स्तम्भन इन ६ प्रयोगों का भेद, प्रयोग तथा उपसंहार, धर्म तथा नियम के साथ वर्णन हो, उसे अथर्ववेद का उपवेद 'तन्त्र' या 'आगम' कहते हैं।

स्वरतः कालतः स्थानात्प्रयत्नानुप्रदानतः ॥ ४० ॥
सवनाद्यैश्च सा शिक्षा वर्णानां पाठशिक्षणात् ।

शिक्षा के लक्षण— जिसमें उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वर से, कालक्रम से, तालवादि स्थान से, प्रयत्न के साथ से, उच्चारण आदि से वर्णों के पड़ने की शिक्षा हो उसे 'शिक्षा' कहते हैं।

प्रयोगो यत्र यज्ञानामुक्तो ब्राह्मणशेषतः ॥ ४१ ॥
श्रौतकल्पः स विज्ञेयः स्मार्तकल्पस्तथेतरः ।

कल्प के लक्षण व भेद— जिसमें ब्राह्मण भाग के शेष अंश से यज्ञों का

२२८शुक्रनीतिः

प्रयोग कहा है उसे 'श्रौतकल्प' कहते हैं। इससे भिन्न को 'स्मार्तकल्प' कहते हैं।

व्याकृताः प्रत्ययाद्यैश्च धातुसन्धिसमासतः ॥ ४२ ॥
शब्दा यत्र व्याकरणमेतद्धि बहुलिङ्गतः।

**व्याकरण के लक्षण—**जिसमें प्रत्यय आदि के द्वारा तथा धातु, सन्धि, समास और पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग इनके द्वारा शब्द सिद्ध किये गये हों उसे 'व्याकरण' कहते हैं।

शब्दनिर्वचनं यत्र वाक्यार्थैकार्थसंग्रहः ॥ ४३ ॥
निरुक्तं तत्समाख्यानाद्वेदाङ्गं श्रोत्रसंज्ञकम्।

**निरुक्त के लक्षण—**जिसमें शब्दों का निष्कर्ष के साथ कथन तथा वाक्यार्थों का एक अर्थ में संग्रह किया गया हो उसे 'निरुक्त' कहते हैं। वह शब्दों का अर्थ भलीभांति कहने से वेद का श्रोत्र (कान) अङ्ग माना जाता है।

नक्षत्रग्रहगमनैः कालो येन विधीयते ॥ ४४ ॥
संहिताभिश्च होराभिर्गणितं ज्यौतिषं हि तत्।

**ज्यौतिष लक्षण—**जिससे नक्षत्रों तथा ग्रहों की गति द्वारा काल का पृथक् २ निर्देश किया जाता है। और जिसके संहिता, होरा तथा गणित ये तीन स्कन्ध हैं उसे 'ज्यौतिष' कहते हैं।

म्यरस्तजभ्नगैर्लन्तैः पद्यं यत्र प्रमाणतः ॥ ४५ ॥
कल्प्यते छन्दःशास्त्रं तद्वेदानां पादरूपधृक्।

**छन्द लक्षण—**जिसमें मगण (त्रिगुरु ऽऽऽ), यगण (आदिलघु ।ऽऽ), रगण (लघुमध्य ऽ।ऽ), सगण (अन्तगुरु ।।ऽ), तगण (अन्तलघु ऽऽ।), जगण (गुरुमध्य ।ऽ।), भगण (आदिगुरु ऽ।।), नगण (त्रिलघु ।।।), गुरु (ऽ), तथा लघु (।) इनके प्रमाण से पद्यों (छन्दों) की कल्पना की गई हो उसे वेदों के चरण की व्यवस्था करनेवाला 'छन्द' शास्त्र कहते हैं।

यत्र व्यवस्थिता चार्थकल्पना विधिभेदतः ॥ ४६ ॥
मीमांसा वेदवाक्यानां सैव न्यायश्च कीर्तितः।

**मीमांसा लक्षण—**जिसमें वेद के वाक्यों की अनुष्ठान-भेद से अर्थ-कल्पना व्यवस्थित की गई है अर्थात् वाक्यार्थ-विचार किया गया है उसे 'मीमांसा' कहते हैं और 'न्याय' भी कहा जाता है।

भावाभावपदार्थानां प्रत्यक्षादिप्रमाणतः ॥ ४७ ॥
सविवेको यत्र तर्कः कणादादि मतं च यत्।

**तर्क लक्षण—**जिसमें भाव (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) तथा अभाव पदार्थों का प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द प्रमाणों के द्वारा

चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२९

विचार पूर्ण तर्क होता है तथा जो काणादादि वैशेषिक दार्शनिकों का मत है उसे 'तर्क' वा 'न्याय' कहते हैं।

पुरुषोऽष्टौ प्रकृतयो विकाराः षोडशेति च ॥ ४८ ॥
तत्त्वादिसंख्यावैशिष्ट्यात्सांख्यमित्यभिधीयते ।

सांख्य लक्षण — जिसमें एक पुरुष, आठ-प्रकृति, सोलह विकार अर्थात् १ कूटस्थ पुरुष, १ प्रकृति, २ महत्तत्त्व, ३ अहङ्कार, ५ तन्मात्राएं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये आठ प्रकृतियाँ, तथा १ आकाश, २ वायु, ३ अग्नि, ४ जल, ५ पृथ्वी ये ५ महाभूत, १ हस्त, २ पाद, ३ जिह्वा, ४ लिङ्ग, ५ गुदा ये ५ कर्मेन्द्रियाँ, १ श्रवण, २ त्वक्, ३ चक्षु, ४ रसना, ५ घ्राण ये ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और १ उभयेन्द्रिय मन ये १६ विकार। इस प्रकार से २५ तत्त्वादि की संख्या (गणना) की विशेषता है अतः उसे 'सांख्य' शास्त्र कहते हैं।

ब्रह्मैकमद्वितीयं स्यान्नाना नेहास्ति किञ्चन ॥ ४९ ॥
मायिकं सर्वमज्ञानाद्भाति वेदान्तिनां मतम् ।

वेदान्त लक्षण — एक, अद्वितीय, अनिर्वचनीय ब्रह्म ही इस संसार में है, नाना प्रकार की जो वस्तुयें दिखाई पड़ रही हैं वे सत्य नहीं हैं वस्तुतः माया से उत्पन्न हुई अज्ञान से सत्यवत् प्रतीत होती हैं। यह वेदान्तियों का मत है।

चित्तवृत्तिनिरोधस्तु प्राणसंयमनादिभिः ॥ ५० ॥
तद्योगशास्त्रं विज्ञेयं यस्मिन्ध्यानसमाधितः ।

योग लक्षण — जिसमें एकाग्रता के साथ ध्यान एवं कुम्भकादि प्राणायाम द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध करना बताया गया हो उसे 'योग' शास्त्र कहते हैं।

प्राग्वृत्तकथनं चैक-राजकृत्यमिषादितः ॥ ५१ ॥
यस्मिन्स इतिहासः स्यात्पुरावृत्तः स एव हि ।

इतिहास लक्षण — जिसमें किसी मुख्य राजा के चरित्र-वर्णन के छल आदि के द्वारा प्राचीन व्यवहारों का वर्णन हो उसे 'इतिहास' और 'पुरावृत्त' भी कहते हैं।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ॥ ५२ ॥
वंशानुचरितं यस्मिन् पुराणं तद्धि कीर्तितम् ।

पुराण लक्षण — जिसमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशों का चरित ये सब वर्णित हों उसे 'पुराण' कहते हैं।

वर्णादिधर्मस्मरणं यत्र वेदाबिरोधकम् ॥ ५३ ॥
कीर्तनं चार्थशास्त्राणां स्मृतिः सा च प्रकीर्तिता ।

स्मृति लक्षण — जिसमें वेद से अविरुद्ध (वेदसंमित) चारो वर्णों एवं

२३० शुक्रनीतिः

आश्रमों के धर्मों का स्मरण (वर्णन) तथा अर्थशास्त्र का भलीभांति प्रतिपादन किया गया हो, उसे 'स्मृति' कहते हैं।

युक्तिर्बलीयसी यत्र सर्वं स्वाभाविकं मतम् ॥ ५४ ॥
कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता न वेदो नास्तिकं हि तत् ।

नास्तिक मत लक्षण— जिसमें युक्ति (तर्क) को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना गया हो एवं प्रत्येक वस्तु की सृष्टि स्वभावतः उत्पन्न हुई मानी जाय। और ईश्वर को जगत् का कर्त्ता तथा वेद दोनों को भी न माना जाय। उसे 'नास्तिकमत' कहते हैं।

श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादि-शासनम् ॥ ५५ ॥
सुयुक्त्याऽर्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते ।

अर्थशास्त्र लक्षण— जिसमें श्रुति तथा स्मृति के अविरुद्ध (संभव) राजाओं के लिये आचरण के विषय में उपदेश किया गया हो तथा अच्छे कौशल से धन अर्जन करने की विधि कही गई हो, उसे 'अर्थशास्त्र' कहते हैं।

शशादिभेदतः पुंसामनुकूलादिभेदतः ॥ ५६ ॥
पद्मिन्यादिप्रभेदेन स्त्रीणां स्वीयादिभेदतः ।
तत्कामशास्त्रं सत्त्वादेर्लग्नं यत्रास्ति चोभयोः ॥ ५७ ॥

कामशास्त्र लक्षण— जिसमें पुरुषों के शश, मृग, अश्व, हस्ती रूप से जातिभेद तथा अनुकूल, धृष्ट, शठ आदि नायक-भेद एवं स्त्रियों के पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी तथा हस्तिनी रूप से जातिभेद तथा स्वीया, परकीया, वेश्या आदि-नायिकाभेद एवं दोनों (स्त्री तथा पुरुष) के अनुरागादि के लक्षण विशेष रूप से वर्णित हों उसे 'कामशास्त्र' कहते हैं।

प्रासादप्रतिमाराम-गृहवाप्यादिसंस्कृतिः ।
कथिता यत्र तच्छिल्पशास्त्रमुक्तं महर्षिभिः ॥ ५८ ॥

शिल्पशास्त्र लक्षण— जिसमें प्रासाद (राजभवन-देवमन्दिर), प्रतिमा (मूर्ति), उद्यान गृह, बावली आदि का सुन्दर रीति से निर्माण तथा संस्कार करने की विधि वर्णित हो उसे महर्षियों ने 'शिल्पशास्त्र' कहा है।

समन्यूनाधिकत्वेन सारूप्यादिप्रभेदतः ।
अन्योन्यगुणभूषा तु वर्ण्यतेऽलङ्कृतिश्च सा ॥ ५९ ॥

अलङ्कार शास्त्र लक्षण— जिसमें समता, न्यूनता तथा अधिकता और सादृश्य आदि भेद से परस्पर शब्द तथा अर्थ के गुणों के वैचित्र्य रूप 'अलङ्कृति' (अलङ्कार) का वर्णन हो उसे 'अलङ्कारशास्त्र' कहते हैं।

सरसालङ्कृतादुष्ट-शब्दार्थं काव्यमेव तत् ।
विलक्षणचमत्कारबीजं पद्यादिभेदतः ॥ ६० ॥

चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् १३१

**काव्य लक्षण—**रस तथा अलङ्कार से युक्त, दोषरहित शब्द और अर्थ युक्त कवि की रचना को 'काव्य' कहते हैं। और वह पद्य-गद्यादि भेद से युक्त होकर विचक्षण चमत्कारजनक होता है।

लोकसंकेततोऽर्थानां सुग्रहा वाक् तु देशिकी ।

**देशभाषा लक्षण—**लोगों के संकेत से अर्थों को जल्दी से बोध करानेवाली वाणी को 'देशभाषा' कहते हैं।

बिना कौशिकशास्त्रीयसंकेतैः कार्यसाधिका ॥ ६१ ॥
यथा कालोचिता वाग्बाऽवसरौक्तिस्तु सा स्मृता ।

**अवसरोक्ति लक्षण—**कोश तथा शास्त्र-संबन्धी संकेत के बिना ही अर्थ का बोध करानेवाली समयानुसार उचित कही हुई वाणी को 'अवसरोक्ति' कहते हैं।

ईश्वरः कारणं यत्रादृश्योऽस्ति जगतः सदा ॥ ६२ ॥
श्रुतिस्मती बिना धर्माधर्मौस्तस्ततश्च यावनम् ।
श्रुत्यादिभिन्नधर्मोऽस्ति यत्र तद्यावनं मतम् ॥ ६३ ॥

**यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण—**जिसमें सदा अदृश्य रहनेवाला ईश्वर जगत् का कारण माना गया है और श्रुति-स्मृति के बिना धर्म तथा अधर्म की व्यवस्था की गई है, उसे 'यावन (यवनों का) ग्रन्थ' कहते हैं। जिसमें श्रुति आदि से भिन्न धर्म का प्रतिपादन किया गया है उसे 'यावन (यवनों का) मत' कहते हैं।

कल्पितश्रुतिमूलो वाऽमूलो लोकैर्धृतः सदा ।
देशादिधर्मः स ज्ञेयो देशे देशे कुले कुले ॥ ६४ ॥

**देशादि धर्म लक्षण—**हर एक देश तथा कुल में जो लोगों के द्वारा कल्पित वेदमूलक या वेदमूलक से भिन्न (मूलरहित) आचार सदा धारण किया गया है उसे 'देशादिधर्म' कहते हैं।

पृथक्पृथक्तु विद्यानां लक्षणं संप्रकाशितम् ।
कलानां न पृथङ्नाम लक्ष्म चास्तीह केवलम् ॥ ६५ ॥

इस प्रकार से पृथक् २ विद्याओं के लक्षणों का तो वर्णन भलीभांति किया गया, किन्तु केवल कलाओं का नाम तथा लक्षण पृथक् रूप से नहीं यहाँ कहा जा सका।

पृथक्पृथक् क्रियाभिर्हि कलाभेदस्तु जायते ।
यां यां कलां समाश्रित्य तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ ६६ ॥

क्योंकि कलाओं का क्रिया द्वारा ही पृथक् २ भेद होता है। और जिस २ कला का आश्रय लेकर लोग जीविका चलाते हैं उन कलाओं के नाम से उनकी जातियां कही जाती हैं।

२३२शुक्रनीतिः

हावभावादिसंयुक्तं नर्तनं तु कला स्मृता ।
अनेकवाद्यविकृतौ ज्ञानं तद्वादनं कला ॥ ६७ ॥

गान्धर्व वेदोक्त ७ कलाओं के लक्षण— १—हाव-भाव के साथ नाचने को 'नृत्यकला' कहते हैं । २—अनेक प्रकार के वाद्य यन्त्रों (बाजों) के बनाने तथा बजाने के ज्ञान को 'वाद्य' तथा 'वादन' कला कहते हैं ।

वस्त्रालङ्कारसंधानं स्त्रीपुंसोश्च कला स्मृता ।
अनेकरूपाविर्भावकृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ६८ ॥

३. स्त्री तथा पुरुष को वस्त्र तथा आभूषण को सुन्दर रीति से पहनाने को 'वस्त्रालङ्कार संधान' कला कहते हैं । ४. अनेक प्रकार के रूप-प्रगट करने की विधि का जानना 'रूप प्रकाशन कला' कहते हैं ।

शय्यास्तरणसंयोग-पुष्पादिग्रथनं कला ।
द्यूताद्यनेकक्रीडाभी रञ्जनं तु कला स्मृता ॥ ६९ ॥

५. शय्या तथा बिछोने को भलीभांति लगाकर उस पर पुष्प आदि को सुन्दर गूंथ या सजा कर रखने को भी कला कहते हैं । ६. द्यूत (जूआ) आदि अनेक क्रीडाओं (खेलों) द्वारा मनोरंजन करने को भी कला कहते हैं।

अनेकासनसन्धाने रतेर्ज्ञानं कला स्मृता ।
कलासप्तकमेतद्धि गान्धर्वे समुदाहृतम् ॥ ७० ॥

७. अनेक प्रकार का आसन करके रति (मैथुन) करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं । इन ७ कलाओं का वर्णन 'गान्धर्ववेद' में किया गया है ।

मकरन्दासवादीनां मद्यादीनां कृतिः कला ।
शल्यगूढाहृतौ ज्ञानं शिराव्रणव्यधे कला ॥ ७१ ॥

आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण— ८. मकरन्द (पुष्परस) से आसवादि मादक द्रव्य तथा मद्यादि बनाने को भी कला कहते हैं । ९. गिरे हुये शल्य (विंधे हुये कांटा आदि) को सुखपूर्वक निकालने तथा सिराओं पर उत्पन्न हुये व्रण को शस्त्र से चीरने के ज्ञान को भी कला कहते हैं ।

हीङ्गादिरससंयोगा-न्नादिसंपाचनं कला ।
वृक्षादिप्रसवारोपपालनादिकृतिः कला ॥ ७२ ॥

१०. हींग आदि द्रव्यों तथा लवणादि रसों के संयोग से अन्नादि के पकाने को भी कला कहते हैं । ११. वृक्षादि के फलने, लगाने तथा रक्षा करके बड़ा करने की क्रिया को जानना भी कला कहते हैं ।

पाषाणधात्वादिद्रुतिस्तद्भस्मकरणं कला ।
यावदिक्षुविकाराणां कृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ७३ ॥

१२. पत्थरों का तोड़ना तथा स्वर्णादि धातुओं को गलाना और उनको

चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २३३

असर करना भी कला कही जाती है। १३. जितने गुडादि हैं उनके बनाने की विधि जानना कला है।

धात्वौषधीनां संयोग-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ।
धातुसांकर्यपार्थक्य-करणं तु कला स्मृता ॥ ७४ ॥

१४. स्वर्णादि धातुओं तथा औषधियों के मिलाने तथा प्रयोग करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। १५. स्वर्णादि धातुओं को एकत्र मिल जाने के बाद पुनः पृथक् करने को भी कला कहते हैं।

संयोगापूर्वविज्ञानं धात्वादीनां कला स्मृता ।
क्षारनिष्कासनज्ञानं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ ७५ ॥
कलादशकमेतद्धि ह्यायुर्वेदागमेषु च ।

१६. धात्वादिकों के अपूर्व रीति से संयोग करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। १७. क्षार निकालने को भी कला कहते हैं। ये १० कलायें आयुर्वेद-शास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित हैं।

शस्त्रसन्धानविक्षेपः पदाद्विन्यासतः कला ॥ ७६ ॥
संध्याघाताकृष्टिमैदैर्मल्लयुद्धं कला स्मृता ।

धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण— १८. पैर आदि को पैतरे के साथ रखते हुये निशाना साध कर शस्त्रों के चलाने को भी कला कहते हैं। १९. सन्धि स्थानों पर प्रहार करना तथा पकड़ कर खींचना आदि भेदों के साथ मल्लयुद्ध (कुश्ती लड़ना) करने को भी कला कहते हैं।

बाहुयुद्धन्तु मल्लाना-मशास्त्रं मुष्टिभिः स्मृतम् ॥ ७७ ॥
मृतस्य तस्य न स्वर्गो यशो नेहापि विद्यते ।

बिना शस्त्र के केवल मुष्टियों (मुक्कों) द्वारा प्रहार करते हुये मल्लों का युद्ध होता है उसे 'बाहुयुद्ध' कहते हैं। इसमें जो मरता है उसको न तो स्वर्ग और न इस लोक में यश ही प्राप्त होता है।

बलदर्पविनाशान्तं नियुद्धं यशसे रिपोः ॥ ७८ ॥
न कस्यासीत कुर्याद् वा प्राणान्तं बाहुयुद्धकम् ।

शत्रु के बल के दर्पका नाश होने तक होनेवाला युद्ध किसके यश के लिये नहीं होता है ? अर्थात् सबके लिये होता है। अतः जब तक प्राण न निकल जाय तब तक बाहुयुद्ध करना ही चाहिये।

कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः ॥ ७९ ॥
सन्निपातावघातैश्च प्रमादोन्मथनैस्तथा ।
कृतं निपीडनं ज्ञेयं तन्मुक्तिस्तु प्रतिक्रिया ॥ ८० ॥

बाहु का प्रहार करना, बाहुप्रहार को रोकना, नाना प्रकार से बाहुप्रहार

२३४ | शुक्रनीतिः

करना, अत्यन्त भीषण बाहु प्रहार करना, शत्रु के ऊपर लगातार बाहुप्रहार करना, और बाहुप्रहार से चोट पहुँचाना तथा असावधान होने पर शत्रु को बाहुओं से मसल डालना इत्यादि रीतियों से किये हुये बाहुयुद्ध को 'निपीड़न' कहते हैं। इससे अपने को बचा लेने को 'प्रतिक्रिया' कहते हैं। ये सब बाहुयुद्ध की कला के अन्दर ही माने जाते हैं।

कलाऽभिलक्षिते देशे यन्त्राद्यस्त्रनिपातनम्।
वाद्यसङ्केततो व्यूहरचनादि कला स्मृता ॥८१॥

२०. लक्ष्य के स्थान पर युद्ध-यन्त्रादि तथा अस्त्रों को फेंकना (निशाना लगाकर अस्त्र चलाना) भी कला है। २१. युद्ध के बाजों के संकेत से व्यूहरचना आदि करना भी कला है।

गजाश्वरथगत्या तु युद्धसंयोजनं कला।
कलापञ्चकमेतद्धि धनुर्वेदागमे स्थितम् ॥८२॥

२२. हाथियों, घोड़ों तथा रथों को विशेष रूप से चलाने के द्वारा युद्ध का आयोजन करना भी कला है। ये पांच कलायें धनुर्वेद शास्त्र में कही हुई हैं।

विविधासनमुद्राभिर्देवतातोषणं कला।
सारथ्यं च गजाश्वादेर्गतिशिक्षा कला•स्मृता ॥८३॥

पृथक् ४ कलाओं के लक्षण—२३. अनेक प्रकार के पद्मासनादि आसनों तथा मत्स्य-कूर्मादि मुद्राओं द्वारा देवता को संतुष्ट करना भी कला है। २४. रथ हांकने को एवं २५. हाथी तथा घोड़े को चाल सिखाने को भी कला कहते हैं।

मृत्तिकाकाष्ठपाषाणधातुभाण्डादिसत्क्रिया ।
पृथक्कलाचतुष्कन्तु चित्राद्यालेखनं कला ॥८४॥

२६-२९. मिट्टी, काष्ठ, पत्थर तथा धातु के वर्त्तन आदि को सुन्दर रीति से बनाना ये भी पृथक् २ चार कलायें हैं। ३०. चित्र आदि का सुन्दर लिखना भी कला है।

तडागवापीप्रासादसमभूमिक्रिया कला ।
घट्याद्यनेकयन्त्राणां वाद्यानां तु कृतिः कला ॥८५॥

तडागकूपादि कलाओं के लक्षण—३१. तालाब, बावड़ी, राजभवन तथा भूमि को समतल बनाने की क्रिया भी कला है। ३२. घड़ी आदि अनेक यन्त्रों को बनाना भी कला है। ३३. और अनेक प्रकार के बाजों को बनाना भी कला है।

हीनमध्यादिसंयोग-वर्णाद्यै रञ्जनं कला।
जलवाय्वग्निसंयोगनिरोधैश्च क्रिया कला ॥८६॥

चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम्२३५

३४. हीन, मध्यम तथा उत्तम रूप से मिलाये हुये रङ्ग आदि के द्वारा वस्त्रादि रंगना भी कला है। ३५. जल, वायु और अग्नि के संयोग और निरोध के द्वारा बाष्प (भाफ) यन्त्र बनाकर उससे कार्य करना भी कला है।

नौकारथादियानानां कृतिज्ञानं कला स्मृता ।
सूत्रादिरज्जुकरणं विज्ञानं तु कला स्मृता ॥ ८७ ॥

३६. नौका, रथ आदि सवारियों के निर्माण करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। ३७. सूत्र आदि से रस्सी तैयार करना भी कला है।

अनेकतन्तुसंयोगैः पटबन्धः कला स्मृता ।
वेधादिसदसज्ज्ञानं रत्नानां च कला स्मृता ॥ ८८ ॥

३८. अनेक सूत्रों के संयोग से कपड़ा बुनना भी कला है। ३९. रत्नों में छिद्र करना तथा उसके अच्छे-बुरे का जानना भी कला है।

स्वर्णादीनां तु याथात्म्य-विज्ञानं च कला स्मृता ।
कृत्रिमस्वर्णरत्नादि-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ॥ ८९ ॥

४०. स्वर्णादि धातुओं को भलीभांति परखना भी कला है। ४१. कृत्रिम सोना तथा रत्नादि बनाना भी कला है।

स्वर्णाद्यलङ्कारकृतिः कला लेपादिसत्कृतिः ।
मार्दवादिक्रियाज्ञानं चर्मणां तु कला स्मृता ॥ ९० ॥

४२. स्वर्णादि का आभूषण बनाना तथा स्वर्णादि का पानी चढ़ाना भी कला है। ४३. चमड़ों को मृदु बनाना (सिझाना) भी कला है।

पशुचर्माङ्गनिर्हार-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ।
दुग्धदोहादिविज्ञानं घृतान्तन्तु कला स्मृता ॥ ९१ ॥

४४. पशुओं के चमड़ों को उनके शरीर से अलग करने की रीति जानना भी कला है। ४५. दूध दुहना आदि से लेकर घी बनाने पर्यन्त क्रियाओं का जानना भी कला है।

सीवने कञ्चुकादीनां विज्ञानं तु कलात्मकम् ।
बाह्वादिभिश्च तरणं कलासंज्ञं जले स्मृतम् ॥ ९२ ॥

४६. कञ्चुक (पहिनने के वस्त्र) आदि वस्त्रों को सीने की क्रिया जानना भी कला है। ४७. जल में बाहु आदि से तैरना भी कला है।

मार्जने गृहभाण्डादेर्विज्ञानं तु कला स्मृता ।
वस्त्रसंमार्जनं चैव क्षुरकर्म कले ह्युभे ॥ ९३ ॥

४८. गृह के धातु के बर्तनों को सफा करना भी कला है। ४९. वस्त्र भलीभांति सफा करना, ५०. और बाल बनाना ये दोनों भी कलाये हैं।

तिलमांसादिस्नेहानां कला निष्कासने कृतिः ।

२३६ | शुक्रनीतिः

सीराद्याकर्षणे ज्ञानं वृक्षाद्यारोहणे कला ॥ ९४ ॥

५१. तिल और मांस आदि से तेल निकालने की क्रिया भी कला है। ५२. हल चलाने की और वृक्ष आदि पर चढ़ने की क्रिया जानना भी कला है ।

मनोऽनुकूलसेवायांः कृतिज्ञानं कला स्मृता ।
वेणुतृणादिपात्राणां कृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ९५ ॥

५३. मनोऽनुकूल सेवा करने की क्रिया जानना भी कला है । ५४. बांस तथा तृण आदि का पात्र बनाने की क्रिया भी कला है ।

काचपात्रादिकरणविज्ञानं तु कला स्मृता ।
संसेचनं संहरणं जलानां तु कला स्मृता ॥ ९६ ॥

५५. काच ( सीसे ) के पात्रादि बनाने की क्रिया भी कला है । ५६. जलों के द्वारा सींचना और जल का आवश्यकतानुसार लाना और निकालना भी कला है ।

लोहाभिसारशस्त्रास्त्रकृतिज्ञानं कला स्मृता ।
गजाश्ववृषभोष्ट्राणां पल्याणादिक्रिया कला ॥ ९७ ॥

५७. लोह के अस्त्र-शस्त्रादि बनाने की क्रिया भी कला है । ५८. हाथी, घोड़े तथा ऊंटों के पीठ पर रखने योग्य गद्दी-जीन आदि बनाने की क्रिया भी कला है ।

शिशोः संरक्षणे ज्ञानं धारणे क्रीडने कला ।
सुयुक्तताडनज्ञान-मपराधिजने कला ॥ ९८ ॥

५९. शिशु की रक्षा करने, गोदी में धारण करने तथा क्रीड़ा कराने की क्रिया जानना भी कला है । ६०. अपराधी लोगों को उचित मारने-पीटने की क्रिया जानना भी कला है ।

नानादेशीयवर्णानां सुसम्यग्लेखनं कला ।
ताम्बूलरक्षादिकृति-विज्ञानं तु कला स्मृता ॥ ९९ ॥

६१. अनेक देशों की वर्ण-मालाओं को सुन्दर रीति से लिख लेना भी कला है । ६२. ताम्बूल ( पान ) की रक्षा ( रखने ) आदि की क्रिया जानना भी कला है ।

आदानमाशुकारित्वं प्रतिदानं चिरक्रिया ।
कलासु द्वौ गुणौ ज्ञेयौ द्वे कले परिकीर्तिते ॥ १०० ॥

६३-६४. कलाओं के करने में शीघ्रता के साथ उसे करना 'आदान' और देर तक करते रहना 'प्रतिदान' कहलाता है अथवा किसी के ग्रहण करने

चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३७

चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३७

में शीघ्रता करना और देने में विलम्ब करना ये दोनों यद्यपि गुण हैं तथापि पृथक् २ ही कलायें मानी गई हैं ।

चतुःषष्टिकला ह्येताः संक्षेपेण निदर्शिताः ।
यां यां कलां समाश्रित्य तां तां कुर्यात्स एव हि ॥ १०१ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य राष्ट्रे आद्यं विद्याकलानिरूपणं नाम तृतीयं प्रकरणम् ।

संक्षेप से ये ६४ कलायें कही गईं । इनमें से जिस २ कला का जो मनुष्य आश्रय लेकर उसमें निपुण बनता है । सर्वथा निपुणता के साथ करने के लिये उसी २ कला को सदा उसे करते रहना चाहिये ।

इस प्रकार शुक्रनीति की भाषाटीका के चतुर्थाध्याय में आद्य विद्याकला-निरूपण-नाम तृतीय प्रकरण समाप्त ।


चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्म-निरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणम् ।

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिः क्रमात् ।
चत्वार आश्रमाश्चैते ब्राह्मणस्य सदैव हि ॥ १ ॥
अन्येषामन्त्यहीनाश्च क्षत्रविट्शूद्रकर्मणाम् ।

४ आश्रमों का नाम निर्देश— ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी इन चारों के क्रम से ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास ये ४ आश्रम सदा ब्राह्मणों के ही होते हैं । इनमें से आखिरी संन्यास को छोड़कर शेष ३ आश्रम ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के होते हैं ।

विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात् सर्वेषां पालने गृही ॥ २ ॥
वानप्रस्थः सन्दमने संन्यासी मोक्षसाधने ।

४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश— विद्या पढ़ने के लिये ब्रह्मचारी, सभी आश्रमों के पालनार्थ गृही ( गृहस्थ ), इन्द्रियों के दमनार्थ वानप्रस्थ, मोक्ष-साधनार्थ संन्यासी बनना उचित होता है ।

वर्तयन्त्यन्यथा दण्ड्या या वर्णाश्रमजातयः ॥ ३ ॥

जो वर्ण आश्रम तथा जाति के लोग अपने २ धर्म के विरुद्ध आचरण करते हैं वे राजा के द्वारा दण्डनीय होते हैं ।

यदि राज्ञोपेक्षितानि दण्डतोऽशिक्षितानि च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ह्यकुलानि कुलीनताम् ॥ ४ ॥

यदि राजा उपेक्षा कर देवे और दण्ड द्वारा शिक्षा न देवे तो उच्च कुलवालेः

२३८शुक्रनीतिः

नीच कुल के भाव को एवं नीच कुलवाले उच्च कुल के भाव को धारण करने लगते हैं अर्थात् सब स्वेच्छाचारी हो जाते हैं ।

देवपूजां नैव कुर्यात् स्त्री शूद्रस्तु पतिं विना ।
जपस्तपस्तीर्थसेवा-प्रव्रज्या-मन्त्रसाधनम् ॥ ५ ॥

स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश— स्त्री तथा शूद्र को क्रम से पति तथा स्वामी की सेवा छोड़ कर जप, तप, तीर्थ-सेवन, संन्यास, मन्त्र की साधना और देवता की पूजा नहीं ही करनी चाहिये ।

न विद्यते पृथक् स्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम् ।

स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध— स्त्रियों के लिये पति की सेवा को छोड़कर अन्य कोई धर्म, अर्थ तथा काम की सिद्धि के लिये साधन नहीं है ।

पत्युः पूर्वं समुत्थाय देहशुद्धिं विधाय च ॥ ६ ॥
उत्थाप्य शयनीयानि कृत्वा वेश्मविशोधनम् ।
मार्जनैर्लेपनैः प्राप्य सानलं यवसाङ्गणम् ॥ ७ ।
शोधयेद्यज्ञपात्राणि स्निग्धान्युष्णेन वारिणा ।
प्रोक्षणीयानि तान्येव यथास्थानं प्रकल्पयेत् ॥ ८ ॥
शोधयित्वा तु पात्राणि पूरयित्वा तु धारयेत् ।

स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश— स्त्री प्रतिदिन पति से पूर्व शय्या से उठकर शरीर-शुद्धि ( मुख-प्रक्षालनादि ) करके और बिछी हुई शय्या को उठाकर रखने के बाद झाडू से बुहार कर तथा लीपकर गृह की सफाई करे। उसके बाद अग्नियुक्त तथा घास पड़े हुये आंगन में पहुँच कर वहां की सफाई करे। और घृत से चिकने यज्ञपात्रों को गर्म जल से धोकर पोछकर पुनः उन्हें अपने २ स्थानों पर रख दे। और उन्हें रखने के पूर्व खूब सुखाकर ( जिससे जल का अंश न रहने पावे ) पुनः घृतादि से पूर्ण करके यथास्थान रख देवे ।

महानसस्थ-पात्राणि बहिः प्रक्षाल्य सर्वशः ॥ ९ ॥
मृद्भिस्तु शोधयेच्चुल्लीं तत्राग्निं सेन्धनं न्यसेत् ।
स्मृत्वा नियोगपात्राणि रसान्नान्नद्रविणानि च ॥ १० ॥
कृतपूर्वाह्णकार्य्यं श्वशुरावभिवादयेत् ।

उसके बाद रसोईगृह के पात्रों को बाहर निकालकर चारो तरफ से खूब मांज-धोकर मिट्टी से चुल्ली तथा रसोई घर लीपकर वहां पर अग्नि तथा लकड़ी रख देवे और उस दिन कार्य में आनेवाले पात्रों एवं लवणादि रस, अन्न तथा धन का ख्याल करके उसकी व्यवस्था करती रहे। पश्चात् पूर्वाह्ण