शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २९३
प्राङ्न्याय के लक्षण— इस तरह का इनका हमारा विवाद, पहले हो चुका है जिसमें हमारी जीत हो चुकी है ऐसा यदि प्रतिवादी कहे तो उस उत्तर का नाम 'पूर्वन्यायविधि' अथवा 'प्राङ्न्याय' कहलाता है ।
जयपत्रेण सभ्यैर्वा साक्षिभिर्भावयाम्यहम् ।
मया जितः पूर्वमिति प्राङ्न्यायस्त्रिविधः स्मृतः ॥ १५० ॥
प्राङ्न्याय के ३ प्रकार— १. जयपत्र (डिक्री), २. जूरियों ३. या साक्षियों के द्वारा 'मेरी डिक्री हो चुकी है' इस बात को सिद्ध कर रहा हूँ' ऐसे उत्तर वाले 'प्राङ्न्याय' के उक्त प्रकार से तीन भेद होते हैं ।
अन्योऽन्ययोः समक्षं तु वादिनोः पक्षमुत्तरम् ।
न हि गृह्णन्ति ये सभ्या दण्ड्यास्ते चौरवत् सदा ॥ १५१ ॥
परस्पर एक दूसरे के समक्ष ही वादी प्रतिवादी के क्रमशः पक्ष और उत्तर को जो सुनकर तदनुरूप नहीं लिख लेते हैं या नहीं स्वीकार करते हैं वे चोर की भांति सदा दण्ड पाने योग्य होते हैं ।
लिखिते शोधिते सम्यक् सति निर्दोष उत्तरे ।
अर्थिप्रत्यर्थिनोर्वापि क्रिया कारणमिष्यते ॥ १५२ ॥
लिखे हुये उत्तर के भलीभांति शोधित हो जाने पर जब दोषरहित हो जाय तब वादी-प्रतिवादी की क्रिया अर्थात् साक्षी का लेखपत्र, आदि का प्रमाण दिखाना आदि ही जयपत्र (डिग्री) का कारण होता है ।
पूर्वपक्षः स्मृतः पादो द्वितीयश्चोत्तरात्मकः ।
क्रियापादस्तृतीयस्तु चतुर्थो, निर्णयाभिधः ॥ १५३ ॥
व्यवहार के ४ पाद— इस प्रकार से व्यवहार (मुकदमे) के ४ पाद होते हैं जिसमें १- पूर्व पक्ष, २- उत्तर ३- क्रिया ४- निर्णय ये क्रमसे हैं ।
कार्यं हि साध्यमित्युक्तं साधनं तु क्रियोच्यते ।
अर्थी तृतीयपादे तु क्रियया प्रतिपादयेत् ॥ १५४ ॥
कार्य को 'साध्य' और साधन को 'क्रिया' कहते हैं, अतः अर्थी (वादी) व्यवहार के तृतीय पाद क्रिया (तहकीकात) होने पर प्रमाणों (साधनों) को जज के समक्ष उपस्थित करे ।
चतुष्पाद् व्यवहारः स्यात् प्रतिपत्त्युत्तरं विना ।
प्रतिपत्त-संज्ञक (सत्य) उत्तर में अर्थात् जहां पर प्रतिवादी वादी के पक्ष को स्वीकार कर लेता है वहां पर व्यवहार (मुकदमा) दो ही पाद का माना जाता है शेष में ४ पाद का होता ही है ।
क्रमागतान् विवादांस्तु पश्येद्वा कार्यगौरवात् ॥ १५५ ॥
प्रथम निर्णय के योग्य न्याय या विवाद का निर्देश— राजा विवादों
२६४ | शुक्रनीतिः
( मुकदमों ) को क्रमानुसार अथवा कार्यं की गुरुता के अनुसार क्रम को त्याग कर सर्वप्रथम देखें ।
यस्य वाऽभ्यधिका पीडा कार्यं वाऽभ्यधिकं भवेत् ।
वर्णानुक्रमतो वापि नयेत् पूर्वं विवादयेत् ॥ १५६ ॥
जिसको अधिक पीड़ा हो या अधिक कार्य हो इसका विचार कर ब्राह्मणादि वर्णों के अनुसार मुकदमों को प्रथम पेशी में लेवे और उसका निर्णय करे ।
कल्पयित्वोत्तरं सभ्यैर्दातव्यैकस्य भावना ।
सभ्यों ( जूरियों ) को उचित है कि वह प्रतिवादी के पास से उत्तर लेकर वादी को साध्य का साधन जुटाने के लिये अवसर दें ।
साध्यस्य साधनार्थं हि निर्दिष्टा यस्य भावना ॥ १५७ ॥
विभावयेत् प्रतिज्ञातं सोऽखिलं लिखितादिना ।
साध्य को सिद्ध करने वाले साधनों को उपस्थित करने के लिये जिस वादी को अवसर दिया गया, वह लिखित आदि साधनों के द्वारा समस्त प्रतिज्ञात अर्थ प्रमाणित करे ।
न चैकस्मिन् विवादे तु क्रिया स्याद्वादिनोर्द्वयोः ॥ १५८ ॥
एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश—एक ही विवाद में दोनों वादी-प्रतिवादी के लिये प्रमाण देने का प्रयास करना उचित नहीं होता है अर्थात् एक ही को प्रमाण देने के लिये कहना चाहिये ।
मिथ्या क्रिया पूर्ववादे कारणे प्रतिवादिनि ।
प्राङ्न्यायकारणोक्तौ तु प्रत्यर्थी निर्दिशेत् क्रियाम् ॥ १५६ ॥
यह प्रतिवादी का उत्तर मिथ्या हो तो उसे सिद्ध करने के लिये पूर्ववादी को प्रमाण देने के लिये कहना चाहिये । और यदि प्रतिवादी का प्रमाण झूठा हो तो उसे सिद्ध करने के लिये प्रतिवादी से प्रमाण मांगना चाहिये । और यदि प्रतिवादी यह कहे कि मेरा इन के साथ पूर्व में विवाद होकर उसमें मेरी जीत हो चुकी है तो उसका प्रमाण देने के लिये उससे कहना चाहिये ।
कारणात् पूर्वपक्षोऽपि उत्तरत्वं प्रपद्यते ।
पूर्व पक्ष भी कभी २ कारणवश उत्तर पक्ष का आश्रय लेता है ।
ततोऽर्थी लेखयेत् सद्यः प्रतिज्ञातार्थसाधनम् ॥ १६० ॥
तत्साधनं तु द्विविधं मानुषं दैविकं तथा ।
साधन के भेद—पूर्व पक्षी के द्वारा उत्तर दे चुकने के बाद वादी तत्काल प्रतिज्ञात विषय को सिद्ध करने के लिये प्रमाण को लिखावे । वह प्रमाण मानुष तथा दैविक भेद से २ प्रकार का होता है ।
क्रिया स्याल्लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति मानुषम् ॥ १६१ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् । २९५
दैवं घटादि तद्भव्यं भूतालाभाभियोजयेत् ।
उसमें लिखित, भोगयुक्त (कब्जे में रहना), और साक्षी, ये तीन प्रकार के मानुष प्रमाण होते हैं । तुला-दण्डादि रूप प्रमाण को 'दैव' कहते हैं । इसी को 'भव्य' भी कहते हैं । इसका प्रयोग यथार्थ का निश्चय न होने पर किया जाता है ।
तत्त्वच्छलानुसारित्वाद् भूतं भव्यं द्विधा स्मृतम् ॥ १६२ ॥
तत्त्वं सत्यार्थाभिधायि कूटायमभिहितं छलम् ।
तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण— तत्त्व तथा छल के अनुसार से साधन-क्रम से भूत तथा भव्य रूप से २ प्रकार का कहा गया है । उसमें सत्य अर्थ का प्रतिपादक साधन 'तत्त्व' कपट आदि से युक्त साधन 'छल' कहा जाता है ।
छलं निरस्यं भूतेन व्यवहारान् नयेन्नृपः ॥ १६३ ॥
युक्त्याऽनुमानतो नित्यं सामादिभिरुपक्रमैः ।
राजा युक्ति, अनुमान तथा सामादि उपायों से छल को दूर कर यथार्थ साधनों से व्यवहारों (मुकदमों) को सदा देखे ।
न कालहरणं कार्यं राज्ञा साधनदर्शने ॥ १६४ ॥
महान् दोषो भवेत् कालाद्धर्मव्यापत्तिलक्षणः ।
राजा वादी-प्रतिवादियों के साधनों (प्रमाणों) को देखने में समय न बितावे बल्कि तत्काल ही देखे । अन्यथा विलम्ब करने से धर्मनाश रूपी महान दोष उपस्थित हो जाता है ।
अर्थिप्रत्यर्थिप्रत्यक्षं साधनानि प्रदर्शयेत् ॥ १६५ ॥
अप्रत्यक्षं तयोर्नैव गृह्णीयात् साधनं नृपः ।
विवादी को अपने २ साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश— राजा अर्थी-प्रत्यर्थी (वादी-प्रतिवादी) दोनों के सामने साधनों को दिखाये और दोनों के परोक्ष में साधन न देखे ।
साधनानां च ये दोषा वक्तव्यास्ते विवादिना ॥ १६६ ॥
गूढास्तु प्रकटाः सभ्यैः काले शास्त्रप्रदर्शनात् ।
जो दोष गुप्त हों उनको सभासद् प्रकट करें, इसका निर्देश— विवाद करने वाला (वादी या प्रतिवादी) एक दूसरे के साधनों के दोषों को कहे और छिपे हुये साधन के दोषों को विचार के लिये नियुक्त पुरुषों के द्वारा विचार करने के समय शास्त्रों के आधार पर प्रकट रूप से कहना चाहिये ।
अन्यथा दूषयन् दण्ड्यः साध्यार्थादेव हीयते ॥ १६७ ॥
विमृश्य साधनं सम्यक् कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ।
२९६ | शुक्रनीतिः
यदि वादी अन्यथा अर्थात् शास्त्र (कानून) के विरुद्ध किसी साधन में व्यर्थ दोष दिखाता है तो वह दण्डनीय होता है और वह जिसे सिद्ध करना चाहता है उससे च्युतं हो जाता है (उसका मुकद्दमा खारिज कर दिया जाता है)। अतः राजा साधनों (प्रमाणों) पर पूर्ण विचार कर विवाद का निर्णय करे।
कूटसाधनकारी तु दण्ड्यः कार्यानुरूपतः ॥ १६८ ॥
द्विगुणं कूटसाक्षी तु साक्ष्यलोपी तथैव च ।
कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश— झूठा प्रमाण उपस्थित करने वाला (वादी या प्रतिवादी) कार्य (मुकदमा) के अनुसार थोड़ा या अधिक दण्ड (जुर्माना) का अधिकारी होता है। झूठी गवाही देने वाला या गवाह की सही बात को न मानने वाला पुरुष द्विगुण दण्ड का भागी होता है।
अधुना लिखितं वच्मि यथावदनुपूर्वशः ॥ १६९ ॥
अनुभूतस्मारकं तु लिखितं ब्रह्मणा कृतम् ।
इस समय मैं आनुपूर्वी क्रम से यथावत् लिखित साधन के विषय में कहता हूँ। ब्रह्मा ने अनुभूत विषय को स्मरण कराने के लिये 'लिखित' का निर्माण किया है।
राजकीयं लौकिकं च द्विविधं लिखितं स्मृतम् ॥ १७० ॥
स्वहस्तलिखितं वाऽन्यहस्तेनापि विलेखितम् ।
असाक्षिमत् साक्षिमच्च सिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः ॥ १७१ ॥
लिखित के दो प्रकारों के निर्देश— राजकीय और लौकिक भेद से लिखित दो प्रकार का होता है। और इनमें से प्रत्येक लिखित पुनः अपने हाथ से और दूसरे के हाथ से लिखा होने से दो प्रकार का होता है। और सभी प्रकार के लेख साक्षी से युक्त या बिना साक्षी के भी होते हैं। उनकी सिद्धि देश की स्थिति के अनुसार होती है।
भाग-दान-क्रयाऽऽधान-संविद्-दास-ऋणादिभिः ।
सप्तधा लौकिकं चैतत्—
लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश— १. भाग (बटवारा), २. दान, ३. क्रय, ४. आधान (धरोहर), ५. संवित् (इकरार), ६. दास, ७. ऋण आदि भेद से लौकिक लिखित ७ प्रकार का होता है।
—त्रिविधं राजशासनम् ॥ १७२ ॥
शासनार्थं ज्ञापनार्थं निर्णयार्थं तृतीयकम् ।
राजशासन के ३ प्रकार— और राजकीय लिखित तीन प्रकार का है
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २९७
जिसमें प्रथम शासन के लिये, द्वितीय सूचना के लिये, तृतीय निर्णय के लिये है ।
साक्षिमद्रिक्थ्यभिमतं भागपत्रं सुभक्तियुक् ॥ १७३ ॥
सिद्धिकृच्चान्यथा पित्रा कृतमप्यकृतं स्मृतम् ।
जो भाग पत्र (बटवारे का लेख पत्र) साक्षी से हो और जिसमें धनवाले, दायादों (पट्टीदारों) से स्वीकृत, भलीभांति से विभाग का विषय निश्चित किया हुआ हो वह माननीय होता है । अन्यथा पिता से किया हुआ भी भागपत्र अमाननीय होता है ।
दायादाभिमतं दान-क्रय-विक्रय-पत्रकम् ॥ १७४ ॥
स्थावरस्य ग्रामपादिसाक्षिकं सिद्धिकृत् स्मृतम् ।
और दानपत्र, क्रय (खरीदना) पत्र, विक्रय (बेचना) पत्र यदि स्थावर संपत्तिविषयक हो तो पट्टीदारों द्वारा स्वीकृत, ग्रामाधिपति आदि की साक्षी से युक्त, हो तो माननीय होता है अन्यथा अमाननीय होता है ।
राज्ञा स्वहस्तसंयुक्तं स्वमुद्राचिह्नितं तथा ॥ १७५ ॥
राजकीयं स्मृतं लेख्यं प्रकृतिभिश्च मुद्रितम् ।
**साधनक्षम लेख्य के लक्षण—**राजा के द्वारा अपने हाथ से लिखा हुआ या अपनी मुद्रा (मुहर) से या मन्त्री आदि के द्वारा मुद्रा से मुद्रित लिखित को राजकीय लिखित कहते हैं ।
निवेश्य कालं वर्षं च मासं पक्षं तिथिं तथा ॥ १७६ ॥
वेलां प्रदेशं विषयं स्थानं जात्याकृती वयः ।
साध्यं प्रमाणं द्रव्यं च संख्यां नाम तथात्मनः ॥ १७७ ॥
राज्ञां च क्रमशो नाम निवासं साध्यनाम च ।
क्रमात् पितॄणां नामानि पीडामाहर्तृदायकौ ॥ १७८ ॥
क्षमालिङ्गानि चान्यानि पक्षे सङ्कीर्त्य लेखयेत् ।
पक्ष (दावा) में काल, वर्ष मास, पक्ष, तिथि, समय, प्रदेश, विषय (जिला), स्थान (ग्राम), जाति, आकार, अवस्था, साध्य, प्रमाण, द्रव्य, संख्या और अपना नाम लिखकर क्रमशः राजा का नाम तथा निवास और साध्य का नाम, पिता-पितामहादि का नाम, अपना कष्ट, उपार्जन करने वाला और दान देने वाला इन दोनों का नाम, क्षमा के चिह्न इसके अतिरिक्त अन्यान्य भी जो आवश्यक हों उन्हें कह कर लिखवाये ।
यत्रैतानि न लिख्यन्ते हीनं लेख्यं तदुच्यते ॥ १७९ ॥
भिन्नक्रमं व्युत्क्रमार्थं प्रकीर्णार्थं निरर्थकम् ।
२९८ | शुक्रनीतिः
अतीतकाललिखितं न स्यात्तत् साधनक्षमम् ॥ १८० ॥
अप्रगल्भेन च स्त्रिया बलात्कारेण यत् कृतम् ।
साधनायोग्य लेख्य के लक्षण—जिसमें ये सब बातें न लिखी हों वे पत्र ‘हीनलेख्य’ कहलाते हैं अर्थात् अप्रामाणिक होते हैं। और जो सिलसिलेवार न लिखा गया हो, या विपरीत अर्थ को प्रकट करने वाला, बिखरे हुये अर्थ को प्रकट करने वाला, निरर्थक, समय बीत जाने पर लिखा हुआ हो वह प्रमाण के योग्य नहीं होता है। और जो नासमझी से लिखा हुआ या स्त्री द्वारा किया हुआ या जबरदस्ती से लिखाया हुआ हो वह भी अप्रामाणिक होता है।
सद्भिर्लेख्यैः साक्षिभिश्च भोगैर्दिव्यैः प्रमाणताम् ॥ १८१ ॥
व्यवहारे नरो याति चेहामुत्राश्नुते सुखम् ।
अच्छे लेख से फल का निर्देश—मनुष्य निर्दोष लिखित प्रमाणों से, साक्षी के द्वारा, कब्जा होने से, दिव्य परीक्षादि प्रमाणों से व्यवहार में प्रामाणिकता को प्राप्त करता है। और इसलोक में तथा परलोक में सुख भोग करता है।
स्वेतरः कार्यविज्ञानी यः स साक्षी त्वनेकधा ॥ १८२ ॥
दृष्टार्थश्च श्रुतार्थश्च कृतश्चैवाऽकृतो द्विधा ।
साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश—जो अपना सम्बन्धी न हो एवं कार्य (विवाद विषय) को जाननेवाला हो, वह साक्षी (गवाह) मानने योग्य होता है। साक्षी अनेक प्रकार का होता है। कोई आँखों से प्रत्यक्ष देखने वाला और कोई केवल सुनने वाला होता है। कृत और अकृत भेद से साक्षी दो प्रकार के होते हैं अर्थात् वादी द्वारा उपस्थित किया हुआ ‘कृत’ और राजा द्वारा उपस्थित किया हुआ ‘अकृत’ होता है।
अर्थिप्रत्यर्थिसान्निध्यादनुभूतं तु प्राग् यथा ॥ १८३ ॥
दर्शनैः श्रवणैर्यैन स साक्षी तुल्यवाग् यदि ।
वादी या प्रतिवादी के समीप रहने से जैसा पहले देखने या सुनने से मुकद्दमे के विषय का अनुभव हुआ हो उसी के अनुरूप यदि कहने वाला हो तो वह साक्षी कहलाने योग्य होता है।
यस्य नोपहता बुद्धिः स्मृतिः श्रोत्रं च नित्यशः ॥ १८४ ॥
सुदीर्घेणापि कालेन स वै साक्षित्वमर्हति ।
बहुत समय बीत जाने पर भी जिसकी बुद्धि स्मरण शक्ति, और श्रवण शक्ति न क्षीण हो वही सचमुच साक्षी देने योग्य होता है
अनुभूतः सत्यवाग् यः सैकः साक्षित्वमर्हति ॥ १८५ ॥
उभयानुमतः साक्षी भवत्येकोऽपि धर्मवित् ।
जिसने अनुभव किया हो और सत्य बोलने वाला हो वही साक्षी के योग्य
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६६
होता है। और कोई धर्मज्ञ साक्षी अकेले वादी-प्रतिवादी दोनों के लिये मान्य होता है।
यथाजाति यथावर्णं सर्वे सर्वेषु साक्षिणः ॥ १८६ ॥ गृहिणो न पराधीनाः सूरयश्चाप्रवासिनः । युवानः साक्षिणः कार्याः स्त्रियः स्त्रीषु च कीर्त्तिताः ॥ १८७ ॥
जाति और वर्ण के अनुसार सभी वर्णों में सभी वर्ण के लोग साक्षी हो सकते हैं। और गृहस्थ, किसी के अधीन न रहनेवाले, विद्वान, परदेश में नहीं रहनेवाले, युवावस्थावाले जो हों वे साक्षी बनाने योग्य होते हैं। और स्त्रियों के विवाद में स्त्रियों की साक्षी लेनी चाहिये।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च । वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ १८८ ॥
**साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय—**सभी डांका, चोरी और बलात्कार या अपहरण, कठोर भाषण और कठोर दण्ड इन सबों में साक्षी की विशेष परीक्षा नहीं की जाती है। इनमें चाहे जो भी साक्षी दे सकता है।
बालोऽज्ञानादसत्यात् स्त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत् । विब्रूयाद् बान्धवः स्नेहाद् बैरनिर्या॑तनादरिः ॥ १८६ ॥ अभिमानाच्च लोभाच्च विजातिश्च शठस्तथा । उपजीवनसङ्कोचाद् भृत्यश्चैते ह्यसाक्षिणः ॥ १९० ॥ नार्थसम्बन्धिनो विद्यायौनसम्बन्धिनोऽपि न ।
**बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश—**बालक अज्ञान से, स्त्री झूठ बोलने का अभ्यास होने से, जालसाज निरन्तर जालसाजी करने से, बान्धव स्नेह से, शत्रु शत्रुता साधने से, हीन जातिवाला अपनी संमान-वृद्धि की आशा से, शठ लोभ से, नौकर जीविका चले जाने के भय से विरुद्ध बोल सकते हैं अतः ये सब साक्षी मानने के योग्य नहीं होते हैं। और किसी प्रकार का अर्थ (धन) सम्बन्ध रखनेवाले, साथ पड़नेवाले और जमाई आदि सम्बन्धी ये सब भी साक्षी बनाने योग्य नहीं होते हैं।
श्रेण्यादिषु च वर्गेषु कश्चिच्चेद् द्वेष्यतामियात् ॥ १९१ ॥ तस्य तेभ्यो न साक्ष्यं स्याद् द्वेष्टारः सर्व एव ते ।
श्रेणी (एक जाति के कारीगरों के समूह) आदि वर्गों में से यदि किसी एक व्यक्ति के प्रति उक्त वर्ग द्वेषी हो जाय तो उस वर्ग के किसी भी व्यक्ति की साक्षी नहीं माननी चाहिये, क्योंकि एकता होने से उस वर्ग के सभी द्वेष करनेवाले हो जाते हैं।
न कालहरणं कार्यं राज्ञा साक्षिप्रभाषणे ॥ १९२ ॥
| ३०० | शुक्रनीतिः |
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अर्थिप्रत्यर्थिसांनिध्ये साध्यार्थेऽपि च सन्निधौ ।
**साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश—**साक्षी की साक्षी लेने में राजा समय न बितावे जब कि वादी-प्रतिवादी समीप में उपस्थित हों, और उन दोनों के समक्ष व्यवहार देखने में भी देरी न करे।
प्रत्यक्षं वाद्येत् साक्ष्यं न परोक्षं कथंचन ॥ १६३ ॥
नाङ्गीकरोति यः साक्ष्यं दण्ड्यः स्याद् देशितो यदि ।
**प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश—**और वादी-प्रतिवादी के समक्ष में ही साक्षी की साक्षी सदा लेनी चाहिये, परोक्ष में कभी भी नहीं। और यदि आज्ञा देने पर भी साक्षी देने को साक्षी न तैयार होता है तो वह दण्डनीय होता है।
यः साक्षान्नैव निर्दिष्टो नाहूतो नैव देशितः ॥ १६४ ॥
ब्रूयान्मिथ्येति तथ्यं वा दण्ड्यः सोऽपि नराधमः ।
**दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण—**जो विचारपति के समक्ष साक्षी देने के लिये उपस्थित न किया गया हो या बुलाया न गया हो अथवा आदेश न प्राप्त किया हो वह नराधम चाहे झूठ या सच ही कहे फिर भी दण्डनीय ही होता है।
द्वैधे बहूनां वचनं समेषु गुणिनां वचः ॥ १६५ ॥
तत्राधिकगुणानां च गृह्णीयाद्वचनं सदा ।
जहां पर बहुत से साक्षियों के वचनों में विभिन्नता होने से सत्यासत्य निर्णय में संशय हो जाय वहाँ पर अधिक संख्यावालों की बात माने। यदि समान संख्यावालों में विभिन्नता हो तो उनमें से जिधर गुणी पुरुष हों उनके वचन माने एवं यदि गुणियों के वचनों में विभिन्नता जिस विषय में हो तो जो अधिक गुणी हों उनकी ही बात माने।
यत्रानियुक्तोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन ॥ १६६ ॥
पृष्टस्तत्रापि स ब्रूयाद् यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।
कोई व्यक्ति बिना नियुक्त किये हुये भी यदि कुछ देखें या सुनें तो उस विषय में पूछे जाने पर वह जैसा देखा या सुना हो कहें।
विभिन्नकाले यज्ज्ञातं साक्षिभिश्वांशतः पृथक् ॥ १६७ ॥
एकैकं वाद्येत्तत्र विधिरेष सनातनः ।
**एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश—**जहां पर विभिन्न २ समयों में विभिन्न २ साक्षियों ने विवाद के विभिन्न २ विषयों की जो कुछ जानकारी प्राप्त की हो, तो उसे जानने के लिये वहां पर प्रत्येक साक्षियों की साक्षी लेना चाहिये। यह सनातन कर्त्तव्य है।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३९१
स्वभावोक्तं वचस्तेषां गृह्णीयान्न बलात् क्वचित् ॥ १९८ ॥
साक्षी लेने के प्रकारों का निर्देश— स्वाभाविक रीति से कहे हुये उन (साक्षियों) के वचनों को ग्रहण करे। किसी के दबाव से उनकी कही हुई बातों को कभी न माने।
उक्ते तु साक्षिणा साध्ये न प्रष्टव्यं पुनः पुनः ।
साक्षी द्वारा साक्षी दे चुकने के बाद पुनः बुलाकर बारम्बार न पूछे।
आहूय साक्षिणः पृच्छेन्नियम्य शपथैर्भृशम् ॥ १९९ ॥
पौराणैः सत्यवचन-धर्ममाहात्म्यकीर्तनैः ।
साक्षियों को बुलाकर विशेष रूप से ईश्वर का शपथ (सौगन्द) खिलाकर एवं पुराणोक्त सत्य बोलने के धर्म का माहात्म्य वर्णन कर उनसे पूछे।
अनृतस्यातिदोषैश्च भृशमुत्त्रासयेच्छनैः ॥ २०० ॥
और पुराणोक्त झूठ बोलने में अत्यन्त दोषों को दिखाकर धीरे २ अत्यन्त भय दिखावे।
देशे काले कथं कस्मात् क्व दृष्टं वा श्रुतं त्वया ।
तुमने किस देश में और किस समय में कैसे, किस कारण से क्या देखा वा सुना है। इसे पूछे।
लिखितं लेखितं यत्तद् वद सत्यं तदेव हि ॥ २०१ ॥
जो लिखा गया या लिखाया हुआ हो वही सत्य २ कहो।
सत्यं साक्ष्यं ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् ।
इह चानुत्तमां कीर्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ २०२ ॥
जो साक्षी साक्षी देते समय सत्य बोलता है वह उत्तम लोकों को प्राप्त करता है। और लोक में सर्वोत्तम कीर्त्ति को प्राप्त करता है। यह वाक्य वेद में भी प्रशंसित है।
सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात् सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ २०३ ॥
सत्य से साक्षी पूजित हो जाता है। सत्य से धर्म बढ़ता है। इससे सभी वर्णों में साक्षी को सत्य ही बोलना चाहिये।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मैव ह्यात्मनः ।
मावमंस्थास्त्वमात्मानं नृणां साक्षित्वमुत्तमम् ॥ २०४ ॥
आत्मा ही अपना साक्षी है, और आत्मा ही अपनी गति है। इसलिये मनुष्यों का उत्तम साक्षी इस अपनी आत्मा का तुम तिरस्कार मत करो।
मन्यते वै पापकारी न कश्चित् पश्यतीति माम् ।
तांश्च देवाः प्रपश्यन्ति तथा ह्यान्तरपूरुषः ॥ २०५ ॥
३०२ | शुक्रनीतिः
पाप करनेवाला व्यक्ति यह समझता है कि कोई पाप करते हुये मुझको नहीं देख रहा है किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि उसे देवता लोग एवं उसके अन्तर्रात्मा देखते रहते हैं।
सुकृतं यत्त्वया किञ्चिज्जन्मान्तरशतैः कृतम् ।
तत्सर्वं तस्य जानीहि यं पराजयसे । मृषा ॥ २०६ ॥
समाप्नोषि च तत्पापं शतजन्मकृतं सदा ।
सैकड़ों जन्मों में तपस्या करके तुमने जिन पुण्यों का उपार्जन किया है वे उस व्यक्ति को प्राप्त हो जावेंगे, जिसको तुम झूठ बोलकर पराजित कर दोगे और उस पराजित पुरुष के सैकड़ों जन्मों के सभी पापों को प्राप्त करोगे इसे जान लो।
साक्षिणं श्रावयेदेवं सभायामरहोगतम् ॥ २०७ ॥
दद्याद्देशानुरूपं तु कालं साधनदर्शने ।
उपाधिं वा समीक्ष्यैव दैवराजकृतं सदा ॥ २०८ ॥
इस प्रकार से सभा में सबके समक्ष साक्षी को अवश्य सुना देवे। और साधन (प्रमाण) दिखाने के लिये जो समय दे वह देश के अनुरूप होना चाहिये। अथवा दैव तथा राजा के द्वारा की हुई दुर्घटना का भी सदा विचार रखकर समय दे।
विनष्टे लिखिते राजा साक्षिभोगैर्विचारयेत् ।
लिखित के नष्ट हो जाने पर साक्षी एवं भोग (कब्जा) के आधार पर विचार करे।
लेखसाक्षिबिनाशे तु सद्भोगादेव चिन्तयेत् ॥ २०९ ॥
लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश—
और जहां पर लेख तथा साक्षी दोनों नष्ट हो गये हों वहां पर सज्जनकृत भोग (कब्जा) देखकर ही विचार करे।
सद्भोगाभावतः साक्षिलेखतो विमृशेत् सदा ।
और जहां पर सज्जनकृत कब्जा नहीं है वहां पर साक्षी तथा लेख के द्वारा सदा विचार करना चाहिये।
केवलेन च भोगेन लेखेनापि च साक्षिभिः ॥ २१० ॥
कार्यं न चिन्तयेद्राजा लोकदेशादिधर्मतः ।
राजा लोक तथा देश आदि के धर्म का विचार कर केवल भोग (कब्जा), लेख या साक्षी के आधार पर ही मुकदमे का फैसला न कर देवे। बल्कि यथासंभव सभी के आधार पर विचार करे।
कुशला लेख्यबिम्बानि कुर्वन्ति कुटिलाः सदा ॥ २११ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३
तस्मान्न लेख्यसामर्थ्यात् सिद्धिरैकान्तिकी मता ।
**ठगों और कुटिलोँ द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश—**निपुण जालसाज लोग सदा किसी लिखावट का तदनुरूप नकल कर लेते हैं। इसलिये केवल लेख के आधार पर फैसला करना पूर्णरूप से उचित नहीं माना गया है।
स्नेहलोभभयक्रोधैः कूटसाक्षित्वशङ्कया ॥ २१२ ॥
केवलैः साक्षिभिर्नैव कार्यं सिध्यति सर्वदा ।
**केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश—**स्नेह, लोभ, भय, अथवा क्रोधवश होकर भी मनुष्य झूठी साक्षी दे सकता है, इस शंका से केवल साक्षी के आधार पर भी सदा अभियोग का उचित निर्णय नहीं हो सकता है।
अस्वामिकं स्वामिकं वा भुङ्क्ते यद् बलदर्पतः ॥ २१३ ॥
इति शङ्कितभोगेन कार्यं सिध्यति केवलैः ।
**केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश—**अपने बल के घमण्ड में आकर भी मनुष्य चाहे अपनी वस्तु हो या दूसरे की किन्तु उसपर जबर-दस्ती कब्जा कर सकता है। इस लिये भोग (कब्जा) के विषय में भी सन्देह होने से केवल उसी के आधार पर ही फैसला नहीं किया जा सकता है।
शङ्कितव्यवहारेषु शङ्क्येदन्यथा नहि ॥ २१४ ॥
अन्यथा शङ्कितान् सभ्यान् दण्डयेच्चौरवन्नृपः ।
**अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जिन व्यवहारों (मुकदमों) में उचित शंका हो चुकी है उनमें पुनः विपरीत शङ्का नहीं उपस्थित करनी चाहिये। यदि कोई सभा (जूरी आदि) विपरीत शङ्का उपस्थित करे तो राजा उसे चोर के समान दण्ड दे।
अन्यथा शङ्कनान्नित्यमनवस्था प्रजायते ॥ २१५ ॥
लोको विभिद्यते धर्मो ह्यव्यवहारश्च हीयते ।
**विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश—**विपरीत शङ्का करने से व्यवहार में अनवस्था उत्पन्न होने से जल्दी निर्णय न हो सकेगा। और लोकधर्म बिगड़ जावेगा तथा व्यवहार का क्रम भी टूट जायगा।
सागमो दीर्घकालश्च निराक्रोशो निरन्तरः ॥ २१६ ॥
प्रत्यर्थिसन्निधानश्च भुक्तो भोगः प्रमाणवत् ।
**प्रामाणिक भोग के लक्षण—**आगम (लेख) के सहित, और दीर्घकाल का भोग (कब्जा) प्रामाणिक होता है और यदि स्वामी का अपनी वस्तु से विच्छेद हो गया हो या उसने एकदम से उसे छोड़ दिया हो और प्रतिवादी उसके समीप ही रहता हो तो वहां पर कब्जा प्रामाणिक माना जाता है।
३०४ | शुक्रनीतिः
सम्भोगं कीर्तयेद्यस्तु केवलं नागमं क्वचित् ॥ २१७ ॥ भोगच्छलापदेशेन विज्ञेयः स तु तस्करः ।
केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश— जो केवल अपना भलीभांति कब्ज़ा ही दिखाता है किन्तु लेख नहीं दिखाता है । वह छलपूर्वक कब्ज़ा कहलाता है अत एव उसे चोर समझना चाहिये अर्थात् वह दण्डनीय है ।
आगमेऽपि बलं नैव भुक्तिः स्तोकाऽपि यत्र नो ॥ २१८॥
केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश— जहाँ पर थोड़ा भी कब्ज़ा नहीं है वहाँ पर लेख का केवल प्रमाण माननीय नहीं होता है ।
यं कञ्चिद्दश वर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी । भुज्यमानं परैरर्थं न स तं लब्धुमर्हति ॥ २१९॥
जो किसी अपनी वस्तु को समीप में स्वयं रहता हुआ दूसरे के द्वारा भोग करते हुये देखकर भी नहीं आपत्ति करता है और इस भांति से यदि १० वर्ष व्यतीत हो जाय तो स्वामी उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं होता है ।
वर्षाणि विंशतियेस्य भूर्मुक्ता तु परैरिह । सति राज्ञि समर्थस्य तस्य सेह न सिध्यति ॥ २२० ॥
जिसकी जमीन को कोई दूसरा बीस वर्ष से भोग रहा हो किन्तु समर्थ रहने पर भी वह आपत्ति नहीं करता है तो राजा के रहते हुये भी वह व्यक्ति इस लोक में पुनः उक्त भूमि को नहीं प्राप्त कर सकता है ।
अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि । चौरदण्डेन तं पापं दण्डयेत् पृथिवीपतिः ॥ २२१ ॥
जिस भूमि को बिना लिखित प्रमाण के कोई कई सौ वर्षों से भोग रहा हो किन्तु जब उसके वस्तुतः स्वामी का पता लग जाय तो राजा कब्ज़ा करने-वाले उस पापी को चोर की भाँति दण्ड दे ।
अन्नागमादपि याभुक्तिर्विच्छेदोपरमोज्झिता । षष्टिवर्षात्मिका साऽपहर्तुं शक्या न केनचित् ॥ २२२ ॥
६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश— किसी वस्तु पर बिना लेख के जो किसी का कब्ज़ा हो, और स्वामी का उस वस्तु से विच्छेद हो या उसने एकदम से छोड़ दिया हो तो ६० वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसे पुनः उस कब्ज़ा करनेवाले से कोई दूसरा नहीं छुड़ा सकता ।
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिस्तथा । राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ॥ २२३ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् | ३०५
आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश—आधि (धरोहर), ग्राम की सीमा, बालक का धन, गिरवी रखी हुई वस्तु, स्त्री का धन, राजधन, वेदपाठी का धन इनपर कब्जा होने से ही कोई नहीं प्राप्त कर सकता है।
उपेक्षां कुर्वतस्तस्य तूष्णीम्भूतस्य तिष्ठतः।
काले विपन्ने पूर्वोक्ते तत्फलं नाप्नुते धनी ॥ २२४ ॥
उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश—और यदि कोई स्वामी अपनी वस्तु पर किसी के कब्जे को देखकर भी उपेक्षा कर दे और कोई आपत्ति न करे इस भाँति से यदि ऊपर लिखित समय भी व्यतीत हो जाय तो वह पुनः उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
भोगः संक्षेपतश्चोक्तस्तथा दिव्यमथोच्यते।
अब दिव्य कहने का निर्देश—यहां तक ‘भोग’ (कब्जा) के विषय में संक्षेपतः कहा गया है और अब ‘दिव्य’ का वर्णन करते हैं।
प्रमादाद्धनिनो यत्र त्रिविधं साधनं न चेत् ॥ २२५ ॥
अर्थञ्चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः।
त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश—यदि किसी वस्तु के स्वामी के प्रमाद से जिस मुकद्दमे में पूर्वोक्त तीन प्रकार के (लेख, कब्जा, साक्षी) साधन न हो सकें और वादी उसकी वस्तु को ले लेना चाहता हो तो वहां पर तीन प्रकार की विधि कही हुई है।
चोदनाप्रतिकालश्च युक्तिलेशस्तथैव च ॥ २२६ ॥
तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात्।
प्रथम—चोदनाप्रतिकाल (बारम्बार प्रेरणा करने पर भी वादी के वचन का उत्तर न देना), द्वितीय—युक्तिलेश (युक्तियों का प्रयोग), तृतीय—शपथ ये क्रम से तीन प्रकार के कहे हुये साधनों से कार्य-सिद्धि करे।
विशिष्टतर्किता या च शास्त्रशिष्टाविरोधिनी ॥ २२७ ॥
योजना स्वार्थसंस्सिद्धयै सा युक्तिस्तु न चान्यथा।
युक्ति के लक्षण—उत्तम प्रकार से जिस पर तर्क किया गया हो और जो शास्त्र और शिष्ट पुरुषों के अविरुद्ध हो ऐसी स्वार्थसिद्धि के लिये बनाई गई योजना को ‘युक्ति’ कहते हैं। अन्य रीति से बनी हुई हो तो नहीं।
दानं प्रज्ञापनं भेदः सम्प्रलापः क्रिया च या ॥ २२८ ॥
चित्तापन्वयनं चैव हेतवो हि विभावकाः।
कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण—देना, समझाना, फोड़ना, उत्तम प्रकार का क्षोभ दिखाना, मनको अपनी ओर आकर्षित करना इन सबों से रहस्य का पता लगने से ये सब ‘विभावक’ हेतु कहलाते हैं।
२० शु०
३०६ | शुक्रनीतिः
अभीक्ष्णं चोद्यमानोपि प्रतिहन्यान्न तद्वचः ॥ २२९ ॥
त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं स दाप्यते ।
धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण— बार-बार प्रेरणा करने पर भी जो प्रतिवादी के वचन को न काटे अर्थात् कोई उत्तर न दे ऐसा तीन, चार या पांच बार करने पर भी उत्तर न देना उस प्रतिवादी से वादी को धन दिलानेवाला हो जाता है अर्थात् वादी का अभियोग सत्य होने से उसका विजय हो जाता है ।
युक्तिष्वप्यसमर्थासु दिव्यैरेनं विमर्दयेत् ॥ २३० ॥
यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि दुष्करार्थे महात्मभिः ।
जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश— जहां पर युक्तियों से काम न चल सकता हो वहां पर दिव्य शपथों का प्रयोग करना उचित होता है क्योंकि साधन-विहीन व्यवहार में, कठिनाई आने पर महात्मा देवताओं ने दिव्य शपथों का प्रयोग किया था ।
परस्परविशुद्ध्यर्थं तस्माद्दिव्यानि नामतः ॥ २३१ ॥
सप्तर्षिभिश्च भित्सार्थे स्वीकृतान्यात्मशुद्धये ।
इससे वादी-प्रतिवादी की परस्पर विशुद्धि के लिये ही ये 'दिव्यशपथ' हैं, जिसे अन्न-हरण रूप दोष उपस्थित होने पर आत्मशुद्धि के लिये सप्तर्षियों ने भी स्वीकार किया था ।
स्वमहत्त्वाच्च यो दिव्यं न कुर्याज्ज्ञानदर्पतः ॥ २३२ ॥
वसिष्ठाद्याश्रितं नित्यं स नरो धर्मतस्करः ।
दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश— जो अपने बड़प्पन और ज्ञान के घमण्ड से दिव्य शपथों को नहीं ग्रहण करता है, जिसे कि वशिष्ठादि महर्षियों ने भी सदा ग्रहण किया था । वह मनुष्य 'धर्मतस्कर' ( धर्म का चोर ) है ।
प्राप्ते दिव्येऽपि न शपेद् ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ॥ २३३ ॥
संहरन्ति च धर्मार्थं तस्य देवा न संशयः ।
जो ज्ञान-दुर्बल ( मूर्ख ) ब्राह्मण समय आने पर दिव्यशपथ ग्रहण नहीं करता है । उसके धर्म और अर्थ को देवता लोग निःसन्देह हरण कर लेते हैं ।
यस्तु स्वशुद्धिमन्विच्छन् दिव्यं कुर्यादतन्द्रितः ॥ २३४ ॥
विशुद्धो लभते कीर्तिं स्वर्गं चैवान्यथा नहि ।
दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश— अपनी विशुद्धि की इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य आलस्य छोड़कर दिव्यशपथ ग्रहण करता है
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०७
वह विशुद्ध होकर लोक में कीर्ति तथा परलोक में स्वर्ग निश्चय प्राप्त करता है। अन्यथा नहीं प्राप्त करता है।
अग्निर्विषं घटस्तोयं धर्माधर्मौ च तण्डुलाः ॥ २३५ ॥
शपथाश्चैव निर्दिष्टा मुनिभिर्दिव्यनिर्णये।
दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश— दिव्य परीक्षा द्वारा निर्णय करने में अग्नि, विष, तुला, जल, धर्म-अधर्म, चावल और शपथ इन सबों का निर्देश किया है।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं कार्यं दृष्ट्वा ऽनियोजयेत् ॥ २३६ ॥
लोकप्रत्ययतः प्रोक्तं सर्वं दिव्यं गुरु स्मृतम् ।
इनमें उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व के दिव्य चावल आदि अधिक महत्त्व-शाली हैं। इनका प्रयोग यथायोग्य कार्य की गुरुता देखकर ही किया जाता है। साधारणतया लोगों का विश्वास होने से सभी दिव्य शपथ गौरवपूर्ण माने जाते हैं।
तप्तायोगोलकं धृत्वा गच्छेन्नव पदं करे ॥ २३७ ॥
तप्ताङ्गारेषु वा गच्छेत् पद्भ्यां सप्त पदानि हि ।
तप्ततैलगतं लोहमाषं हस्तेन निर्हरेत् ॥ २३८ ॥
सुतप्तलोहपत्रं वा जिह्वया संलिहेदपि ।
अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश— तपाने से लाल हुये लोहे के गोले को हाथ में लेकर कुछ दूर चले यदि हाथ में जलने का न चिह्न हो या जलते हुये अंगारों पर ७ पग नंगे पैरों से चले किन्तु पैर न जले किंवा खौलते हुये तेल में से लोहे के उरदों को हाथ से निकाले किन्तु हाथ न जले अथवा अत्यन्त तपाने से लाल हुये लोह के पत्थरों को जीभ से चाटे पर जीभ न जले।
गरं प्रभक्षयेद्धस्तैः कृष्णसर्पं समुद्धरेत् ॥ २३९ ॥
कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं हीनाधिक्यं विशोधयेत् ।
गर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश— विष का भक्षण करे या हाथ से काले सर्प को बांबी आदि में से निकालते समय डँसे जाने पर विष का असर न हो तो निर्दोष जानना चाहिये। और तुला (तराजू) पर एक तरफ बैठ कर दूसरी तरफ बांट रखकर तौलने पर हीन या अधिक होने के द्वारा विशुद्धि की परीक्षा करे।
स्वेष्टदेवस्नपनजमद्यादुदकमुत्तमम् ॥ २४० ॥
यावन्नियमितः कालस्तावदप्सु निमज्जयेत् ।
जल दिव्य के प्रकार का निर्देश— अपने इष्टदेव को स्नान कराये गये
३०८ | शुक्रनीतिः
उत्तम जल (चरणामृत) का पान करके शपथ ग्रहण करे कि मैने अमुक अपराध नहीं किया है यदि किया हो तो वह नाश कर दें। जितने समय तक का नियम किया गया हो उतने समय तक जल में डूबकर पडे रहेगा। इससे वह निर्दोष समझा जाता है।
अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणं तथा ॥ २४१ ॥
कर्षमात्रांस्तण्डुलांश्च चर्वयेच्च विशङ्कितः ।
धर्माधर्म मूर्त्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश—अधर्म और धर्म की मूर्त्तियों में से किसी एक को आंखों में पट्टी बाँधकर उठाना, यदि धर्म की मूर्त्ति उठाता है तो निर्दोष अन्यथा दोषी समझा जाता है। एक रुपये भर चावलों को निःशङ्क होकर चबावे। यदि दोषी होता है तो मुख से रक्त निकलने लगता है, यह लोकप्रसिद्ध है।
स्पर्शयेत् पूज्यपादांश्च पुत्रादीनां शिरांसि च ॥ २४२ ॥
धनानि संस्पृशेदू द्राक् तु सत्येनापि शपेत्तथा।
दुष्कृतं प्राप्नुयां यद्यत् सर्वं नश्येत्तु सत्कृतम् ॥ २४३ ॥
शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश—पूज्य गुरुजनों के चरणों या पुत्रादिकों के मस्तकों किंवा अपने धनों का शीघ्र स्पर्श करे। यह भी दिव्यशपथ है इससे अपराधी का नाश एवं उसके पुत्र और धन का नाश हो जाता है। और सत्य का भी शपथ खाये जो इस प्रकार से है कि—यदि मैं अपराधी होऊं तो मुझे आज पाप लगे और सारा सुकृत (पुण्य) मेरा नष्ट हो जाय।
सहस्रेऽपहृते चाग्निः पादोने च विषं स्मृतम्।
त्रिभागोने घटः प्रोक्तो ह्यर्धे च सलिलं तथा ॥ २४४ ॥
धर्माधमौ तदर्धे च ह्यष्टमांशे च तण्डुलाः ।
षोडशांशे च शपथा एवं दिव्यविधिः स्मृतः ॥ २४५ ॥
अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश—एक सहस्र मुद्रा का यदि अपहरण हुआ हो तो अग्निपरीक्षा, चौथाई भाग से न्यून सहस्र अपहृत हो तो विषपरीक्षा, तृतीयांश-हीन सहस्र हो तो तुलापरीक्षा, आधा सहस्र हो तो जलपरीक्षा, सहस्र का चतुर्थांश हो तो धर्माधर्मपरीक्षा, सहस्र का अष्ट-मांश हो तो तण्डुलपरीक्षा, सहस्र का षोडशांश अपहृत हो तो शपथ (सौगन्ध) खाना, इस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये।
एषां संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता।
चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ २४६ ॥
यह संख्या निकृष्ट दिव्य परीक्षाओं की है, मध्यर्मों की इससे दुगुनी और उत्तमों की चौगुनी संख्या की कल्पना परीक्षकों द्वारा करनी चाहिये।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०६
शिरोवर्त्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।
अभियोक्ता शिरःस्थाने दिव्येषु परिकीर्त्यते ॥ २४७ ॥
दिव्य के निषेध का निर्देश— जब तक दिव्य शपथ खानेवाला शिर हिला कर अपनी स्वीकृति न दे तब तक दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये। अथवा जब तक शिरःस्थानी अभियोक्ता (वादी) न उपस्थित हो तब तक (परोक्ष में) अभियुक्त (प्रतिवादी) को दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । 'दिव्य परीक्षाओं में वादी को उपस्थित रहना चाहिये' ऐसा विद्वान लोग कहते हैं।
अभियुक्ताय दातव्यं दिव्यं श्रुतिनिदर्शनात् ।
न कश्चिदभियोक्तारं दिव्येषु विनियोजयेत् ॥ २४८ ॥
वेद की आज्ञा होने से प्रतिवादी को ही दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, अतः कोई वादी को दिव्य शपथ न दिलावे ।
इच्छया त्वितरः कुर्यादितरो वर्त्तयेच्छिरः ।
यदि प्रतिवादी की इच्छा से वादी दिव्य शपथ ग्रहण करे तो दूसरा (प्रतिवादी) ही वादी के सम्मुख उपस्थित रहे अथवा शिर हिला कर अनुमति दे ।
पार्थिवैः शङ्कितानां च निर्दिष्टानां च दस्युभिः ॥ २४६ ।'
आत्मशुद्धिपराणां च दिव्यं देयं शिरो विना ।
शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश— राजा को जिन पर अपराधी होने का सन्देह हो गया हो किंवा डांकू आदि ने अपराध करने में जिनका नाम-निर्देश किया हो अथवा जो स्वयम् अपनी शुद्धि (निर्दोषिता) को दिखाना चाहते हों, उनको दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, उस में विरोधी पक्ष की उपस्थिति या शिर हिलाकर अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।
परदाराभिशापे च ह्यगम्यागमनेषु च ॥ २५० ॥
महापातकशस्ते च दिव्यमेव न चान्यथा ।
पर-स्त्री गमन का अभियोग लगने पर या अगम्या स्त्री के साथ गमन का किंवा ब्रह्महत्यादि का अभियोग लगने पर ही दिव्य शपथ का विधान है अन्यथा साधारण अभियोगों में दिव्य शपथ नहीं दिलाना चाहिये ।
चौर्याभिशङ्कायुक्तानां तप्तमाषो विधीयते ॥ २५१ ॥
तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश— जिनके ऊपर चोरी के अभियोग की आशङ्का हो उनके लिये उपरि लिखित 'तप्तमाष' (खौलते हुये तेल में पके तप्त लौह के उरदों का हाथ से निकालना) संज्ञक दिव्य शपथ का विधान है।
प्राणान्तिकविवादे तु विद्यमानेऽपि साधने ।
दिव्यमालम्बते वादी न पृच्छेत्तत्र साधनम् ॥ २५२ ॥
३१० | शुक्रनीतिः
वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश— जहां पर प्राण का संकट उपस्थित हो ऐसे विवाद में भले ही साधन (प्रमाण) विद्यमान हो किन्तु अभियुक्त दिव्य शपथ का आश्रय ले सकता है वहां पर वादी साधन के विषय में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं कर सकता है।
सोपधं साधनं यत्र तद्राज्ञे श्रावितं यदि ।
शोधयेत्तत्तु .दिव्येन राजा धर्मासनस्थितः ॥ २५३ ॥
यदि किसी विवाद में (प्रमाण) जाली हो और उसकी सूचना राजा को मिल जावे तो धर्मासन पर बैठा हुआ राजा दिव्य शपथ द्वारा उसकी परीक्षा करे।
यन्नामगोत्रैर्यल्लेख्यतुल्यं लेख्यं यदा भवेत् ।
अगृहीतधने तत्र कार्यो दिव्येन निर्णयः ॥ २५४ ॥
भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश— रुपया न लेने पर भी यदि उसके नाम-गोत्र के साथ ऋणपत्र का सचमुच कोई जाली लेख तैयार करके रूपये की नालिश कर दे तो वहां पर राजा सत्यासत्य का निर्णय दिव्य शपथ द्वारा करे।
मानुषं साधनं न स्यात्तत्र दिव्यं प्रदापयेत् ।
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश— जहाँ पर कोई लौकिक प्रमाण न मिले वहां पर दिव्य शपथ दिलाना चाहिये।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे ॥ २५५ ॥
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु सर्वार्थापह्नवेषु च ।
प्रदुष्टेषु प्रमाणेषु दिव्यैः कार्यं विशोधनम् ॥ २५६ ॥
जङ्गल, निर्जन स्थान, रात्रि, घर के भीतरी भाग, डाँका पड़ना आदि साहस कर्म, और स्त्रियों के आचरण इन सबों के विषय से सम्बद्ध अभियोग में और जहां पर सम्पूर्ण अर्थ का रहस्य न ज्ञात होता हो एवं प्रमाण दूषित होने से माननीय न होने पर दिव्य शपथ द्वारा अपराधी की परीक्षा करनी चाहिये।
महापापामिशापेषु निक्षेपहरणेपु च ।
दिव्यैः कार्यं परीक्षेत राजा सत्स्वपि साक्षिषु ॥ २५७ ॥
यद्यपि साक्षी भले ही हों तो भी राजा बड़े २ अपराधों एवं धरोहर के हड़प कर जाने इत्यादि अभियोगों में दिव्य शपथ द्वारा परीक्षा लेकर ही निर्णय करे।
प्रथमा यत्र भिद्यन्ते साक्षिणश्च तथा परे ।
परेभ्यश्च तथा चान्ये तं वादं शपथैर्नयेत् ॥ २५८ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११
साक्षी के भेदन को प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश—
जहाँ पर प्रथम, मध्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के सभी साक्षी दूसरों के द्वारा फोड़ लिये गये हों वहाँ पर दिव्य शपथ के द्वारा अभियोग का निर्णय करना चाहिये।
स्थावरेषु विवादेषु पूगश्रेणिगणेषु च।
दत्तादत्तेषु भृत्यानां स्वामिनां निर्णये सति ॥ २५६ ॥
विक्रयादानसम्बन्धे क्रीत्वा धनमनिच्छति।
साक्षिभिर्लिखितेनाथ भुक्त्या चैतान् प्रसाधयेत् ॥ २६० ॥
स्थावर (अचल) संपत्ति-विषयक विवाद और पूग (जाति-विशेष का सङ्घ), श्रेणि (विभिन्न जातियों का सङ्घ) और गण (एक ही प्रकार की जाति का सङ्घ)—विषयक विवाद एवं भृत्यों को वेतन (तनखाह) दिया गया या नहीं तथा किसी वस्तु का स्वामी कौन है इसके निर्णय में (अथवा दी हुई वस्तु के दिये जाने पर किंवा भृत्य और स्वामी परस्पर किसी किये हुये निर्णयविषयक विवाद में) एवं बेची हुई वस्तु के न देने के सम्बन्ध में, खरीदने के बाद पुनः उसे न लेने की इच्छा करने पर साक्षी, लेखपत्र एवं कब्जा के आधार पर इन सबों का निर्णय करे।
विवाहोत्सवद्यूतेषु विवादे समुपस्थिते।
साक्षिणः साधनं तत्र न दिव्यं न च लेख्यकम् ॥ २६१ ॥
**विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश—**विवाह, उत्सव तथा द्यूत (जुआ) विषयक विवाद उपस्थित होने पर साक्षी ही मुख्य प्रमाण माना जाता है। वहां पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है एवं लिखित भी प्रमाण नहीं माँगा जाता है।
द्वारमार्गक्रियाभोग्यजलवाहादिषु तथा।
भुक्तिरेव तु गुर्वी स्यान्न दिव्यं न च साक्षिणः ॥ २६२ ॥
**द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोग को ही प्रमाण मानने का निर्देश—**द्वार और मार्ग का बनाना, भोग में आने वाली वस्तु एवं जल के प्रवाह आदि के अभियोग में (भुक्ति = कब्जा) ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना जाता है वहाँ पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है और साक्षी को भी प्रमाण नहीं माना जाता है।
यद्येके मानुषीं ब्रूयादन्यो ब्रूयात्तु दैविकीम्।
मानुषीं तत्र गृह्णीयान्न तु दैवीं क्रियां नृपः ॥ २६३ ॥
**मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश—**यदि वादी-प्रतिवादी में एक मानुषी क्रिया (प्रमाण) के विषय में कहे और दूसरा
| ३१२ | शुक्रनीतिः |
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दैविकी क्रिया (दिव्य शपथ) के विषय में कहे तो वहाँ पर राजा मानुषी क्रिया को ग्रहण करे किन्तु दैवी क्रिया को कदापि नहीं ग्रहण करे।
यद्येकदेशप्राप्ताऽपि क्रिया विद्येत मानुषी ।
सा ग्राह्या न तु पूर्णापि दैविकी वदतां नृणाम् ॥ २६४ ॥
भले ही मानुषी क्रिया अभियोग के एक ही अंश की पुष्टि करती हो किन्तु उसी को ही ग्रहण करे। पूर्ण अंश की पुष्टि करने वाली दैवी क्रिया के कहने वालों की बात को न माने।
प्रमाणैर्हेतुचरितैः शपथेन नृपाज्ञया ।
वादिसंप्रतिपत्त्या वा निर्णयः षड्विधः स्मृतः ॥ २६५ ॥
६ प्रकार के निर्णय का निर्देश— १ प्रमाण (साक्षी, लेख आदि), २ हेतु, ३ आचरण, ४ शपथ, ५ राजा की आज्ञा, ६ वादी की सम्मति इन ६ प्रकारों के द्वारा सम्पन्न किये जाने से निर्णय ६ प्रकार का होता है।
लेख्यं यत्र न विद्येत न भुक्तिर्न च साक्षिणः ।
न च दिव्यावतारोऽस्ति प्रमाणं तत्र पार्थिवः ॥ २६६ ॥
सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश— जहाँ पर लेख, भुक्ति (कब्जा), साक्षी एवं दिव्य शपथ का भी अवसर इनमें से कोई भी प्रमाण न उपस्थित किया गया हो वहाँ पर राजा ही का निर्णय प्रमाण माना जाता है।
निश्चेतुं ये न शक्याः स्युर्वादाः संदिग्धरूपिणः ।
सीमाद्यास्तत्र नृपतिः प्रमाणं स्यात् प्रभुर्यतः ॥ २६७ ॥
जो सीमा आदि के विवाद सन्दिग्ध रूप होने से निश्चय रूप से निर्णय नहीं किये जा सकते हैं वहाँ पर राजा ही प्रमाण होता है क्योंकि वह प्रभु है।
स्वतन्त्रः साधयन्नर्थान् राजाऽपि स्याच्च किल्बिषी ।
धर्मशास्त्राऽविरोधेन ह्यर्थशास्त्रं विचारयेत् ॥ २६८ ॥
धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश— स्वतन्त्र रूप से (बिना प्रमाण के) विवादों का निर्णय करता हुआ राजा पापी होता है अतः धर्मशास्त्र के विरोध से बचता हुआ राजा अर्थशास्त्र का विचार करे अर्थात् धर्मशास्त्रानुसार निर्णय करे।
राजामात्यप्रलोभेन व्यवहारस्तु दुष्यति ।
लोकोऽपि च्यवते धर्मात्कूटार्थे संप्रवर्तते ॥ २६९ ॥
विवाद होने के कारणों का निर्देश— राजा तथा अमात्य (मन्त्री) के लोभाधिक्य से व्यवहार (मुकदमा) का निर्णय दोषयुक्त होता है। और