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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

३४८ | शुक्रनीतिः

लिये चने, उड़द तथा मोठ को दे चाहे वे सूखे हों या हरे (भिगोये हुये) एवं अच्छी तरह पकाये हुये मांस भी दे।

यद्यत्र स्खलितं गात्रं तत्र दण्डं न पातयेत् ॥ १३७ ॥ मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश— यदि कभी घोड़े के किसी अंग में मोच हो जाय तो वहां पर चाबुक नहीं मारना चाहिये।

नावतारितपल्याणं हयं मार्गसमागतम्।
दत्त्वा गुडं सलवणं बलसंरक्षणाय च ॥ १३८ ॥
मार्ग से चलकर आये हुये घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश— मार्ग चलकर आये हुये घोड़ों को बिना जीन उतारे हुये ही बल का संरक्षण करने के लिये लवण (निमक) के साथ गुड़ देना चाहिये।

गतस्वेदस्य शान्तस्य सुरूपमुपतिष्ठतः।
मुक्तपृष्ठादिबन्धस्य खलीनमवतारयेत् ॥ १३९ ॥
पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश— पसीना सूख जाय एवं घोड़ा शान्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो जाय तब उसके पीठ के बन्धन (कसे हुये चारजामे) को खोल कर लगाम निकाल लेवे।

मर्दयित्वा तु गात्राणि पांसुमध्ये विवर्त्तयेत्।
स्नानपानावगाहैश्च ततः सम्यक् प्रपोषयेत् ॥ १४० ॥
घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश— और घोड़े के सारे शरीर का मर्दन (खरहरा) करके धूलि में लोटने की व्यवस्था कर दे। इसके बाद स्नान कराना, पानी पिलाना, नदी आदि में अवगाहन (स्नान) कराना आदि से उसे भलीभांति पुनः परिपुष्ट (ताजा) कर लेवे।

सर्वदोषहरोऽश्वानां मद्यजाङ्गल्यो रसः।
शक्त्या सम्पापयेत् क्षीरं घृतं वा वारिसक्तुकम् ॥ १४१ ॥
घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल— घोड़ों के लिये मद्य तथा जंगली जीवों का मांसरस सर्वदोषनाशक (लाभप्रद) होता है। शक्ति के अनुसार दूध, घी या जल में घुला हुआ सत्तू पिलावे।

अन्नं भुक्त्वा जलं पीत्वा तत्क्षणाद्वाहितो हयः।
उत्पद्यन्ते तदाश्वानां कासश्वासादिका गदाः ॥ १४२ ॥
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष— यदि चारा खिलाने के बाद पानी पिलाकर फौरन घोड़े पर सवारी की जाय तो उससे घोड़े को खांसी तथा दमे की बीमारी हो जाती है।

यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा मध्या माषा मकुष्ठकाः।
नीचा मसूरा मुद्गाश्च भोजनार्थं तु वाजिनः ॥ १४३ ॥

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४६

**घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश—**घोड़ों को भोजन के लिये जौ तथा चना देना उत्तम, उर्द तथा मोठ मध्यम और मसूर तथा मूंग का देना नीच माना जाता है।

गतयः षड्विधा धाराऽऽस्कन्दितं रेचितं प्लुतम् ।
धौरीतकं वल्गितं च तासां लक्ष्म पृथक् पृथक् ॥ १४४ ॥

**घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश—**१. धारा, २. आस्कन्दित, ३. रेचित, ४. प्लुत, ५. धौरीतक, ६. वल्गित इन भेदों से गति ६ प्रकार की होती है। अब उनके लक्षण पृथक् २ कहते हैं।

धारागतिः सा विज्ञेया यातिवेगतरा मता ।
पार्ष्णिस्तोदाविनुदितो यस्यां भ्रान्तो भवेद्धयः ॥ १४५ ॥

**धारा गति के लक्षण—**जो अत्यन्त वेग से युक्त गति हो उसे 'धारा' गति समझनी चाहिये। इसमें सवार की एड़ी या चाबुक की मार से अत्यन्त प्रेरित होकर घोड़ा वेग से चक्कर या दौड़ लगाने लगता है।

आकुञ्चिताग्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्य या गतिः ।
आस्कन्दिता च सा ज्ञेया गतिविद्भिस्तु वाजिनाम् ॥ १४६ ॥

**आस्कन्दित गति के लक्षण—**जिसमें अगले पैरों को सिकोड़े हुये उछल २ कर घोड़े की गति होती है उसे 'आस्कन्दित' गति घोड़ों की गति जाननेवाले विद्वान् मानते हैं ।

ईषदूत्प्लुत्य गमनमखण्डं रेचितं हि तत् ।

**रेचित गति के लक्षण—**और घोड़ा जिसमें थोड़ा उछल २ कर अखण्ड गमन करता है उसे 'रेचित' कहते हैं ।

पादैश्चतुर्भिरुत्प्लुत्य मृगवत् सा प्लुता गतिः ॥ १४७ ॥
असंवलितपद्भ्यां तु सुव्यक्तं गमनं तुरम् ।
धौरीतकं च तज्ज्ञेयं रथसंवाहने वरम् ॥ १४८ ॥

**प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण—**घोड़ा चारो पैरों से मृग के समान चौकड़ी भरकर जिसमें दौड़ता है उसको 'प्लुत' गति कहते हैं। जिसमें दोनों पैर बिना सिकोड़े हुये उठाकर चलाये जांय, और शीघ्र सुन्दर गति हो, जिससे रथ ( गाड़ी ) खींचने में अच्छाई हो, उसे 'धौरीतक' गति कहते हैं।

प्रसंवलितपद्भ्यां यो मयूरोद्धृतकन्धरः ।
दोलायितशरीरार्धकायो गच्छति वल्गितम् ॥ १४९ ॥

**वल्गित गति के लक्षण—**जिसमें घोड़ा सिकोड़े हुये दोनों पैरों से मयूर के समान गर्दन उठाये हुये और आधे शरीर को हिंडोले के समान हिलाता हुआ दौड़ता है उसको 'वल्गित' गति कहते हैं

३५० | शुक्रनीतिः

परिणाहो वृषमुखादुदरे तु चतुर्गुणः।
सककुत् त्रिगुणोच्छ्रन्तु सार्धत्रिगुणदीर्घता ॥ १५० ॥
**बैल के मुखादि का प्रमाण—**वृष के मुख के प्रमाण से चौगुना उदर का विस्तार और ककुद् (बैल के पीठ पर का टिल्ला)-के सहित उदर मुख से तिगुना ऊंचा एवं मुख से उदर की लम्बान साढ़े तीन गुना होना चाहिये।

सप्ततालो वृषः पूज्यो गुणैरेभियुतो यदि।
**पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण—**जो सात ताल प्रमाण ऊंचा होते हुये यदि इन निम्न लिखित गुणों से युक्त हो तो वह बैल पूजनीय (श्रेष्ठ) माना जाता है।

न स्थायी न च वै मन्दः सुवोढा स्वङ्गसुन्दरः ॥ १५१ ॥
नातिक्रूरः सुपृष्ठश्च वृषभः श्रेष्ठ उच्यते।
**श्रेष्ठ बैल के लक्षण—**जो चलते १ रुकनेवाला (अड़ियल) न हो और धीरे २ चलनेवाला भी न हो एवं सुन्दर वहन करनेवाला, सभी अङ्गों से सुन्दर, अत्यन्त क्रूर (बदमाश) न हो और जिसकी पीठ सुन्दर हो, ऐसा बैल श्रेष्ठ कहा जाता है।

त्रिंशद्योजनगन्ता वा प्रत्यहं भारवाहकः ॥ १५२ ॥
नवतालश्च सुदृढः सुमुखोष्ट्रः प्रशस्यते।
**श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण—**जो प्रतिदिन ३० योजन (१२० कोश) तक चल सकनेवाला या भारवहन करनेवाला, नवताल-प्रमाण ऊंचा हो, एवं अत्यन्त मजबूत शरीरवाला तथा सुन्दर मुखवाला हो, ऐसा ऊंट प्रशस्त माना जाता है।

शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परमं स्मृतम् ॥ १५३ ॥
मनुष्यगजयोर्बाल्यं यावद्विंशतिवत्सरम् ।
नृणां हि मध्यमं यावत् षष्टिवर्षे वयः स्मृतम् ॥ १५४ ॥
अशीतिवत्सरं यावद् गजस्य मध्यमं वयः।
**मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण—**मनुष्यों और हाथियों की परम आयु १०० वर्ष तक की और बाल्यावस्था २० वर्ष तक की मानी गई है। और मनुष्यों की मध्यम (जवानी से प्रौढ़ावस्था तक) अवस्था ६० वर्ष तक की मानी जाती है किन्तु हाथियों की मध्यम अवस्था ८० वर्ष तक की मानी गई है।

चतुस्त्रिंशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ १५५ ॥
पञ्चविंशतिवर्षं हि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः ।
बाल्यमश्ववृषोष्ट्राणां पञ्चमं वत्सरं मतम् ॥ १५६ ॥
मध्यं यावत् षोडशाब्दं वार्धक्यं तु ततः परम्।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५१

**घोड़ा, बैल तथा ऊँट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण—**घोड़े की परमायु ३४ वर्ष तक की मानी गई है। और बैल तथा ऊंटों की परमायु २५ वर्ष तक की ही मानी जाती है। घोड़ा, बैल तथा ऊंट की बाल्यावस्था ५ वर्ष तक की और मध्यावस्था १६ वर्ष तक की होती है उसके बाद वृद्धावस्था मानी गई है।

दन्तानामुद्गमैर्वर्णैरायुर्ज्ञेयं वृषाश्वयोः ॥ १५७ ॥
**दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश—**बैल तथा घोड़े की अवस्था का ज्ञान उनके दांत निकलने तथा दांतों के वर्ण के द्वारा किया जाता है।

अश्वस्य षट् सिता दन्ताः प्रथमाब्दे भवन्ति हि ।
कृष्णलोहितवर्णास्तु द्वितीयेऽब्दे ह्यधोगताः ॥ १५८ ॥
**दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथम वर्ष का ज्ञान—**घोड़ों के प्रथम वर्ष में उपरी भाग में सफेद ६ दांत होते हैं। और दूसरे वर्ष में काले तथा लाल मिश्रित वर्ण के ६ दांत नीचे भाग में निकलते हैं।

तृतीयेऽब्दे तु सन्दंशौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ।
तत्पार्श्ववर्त्तिनौ तौ तु चतुर्थे पुनरुद्गतौ ॥ १५९ ॥
तीसरे वर्ष में दो २ दांत ६ वर्ष तक क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं और चौथे वर्ष में पुनः उक्त दाँतों के पार्श्व में दो दांत निकल आते हैं।

अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु संदंशौ पुनरुद्गतौ ।
मध्यपार्श्वान्तगौ द्वौ द्वौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ॥ १६० ॥
पांचवें वर्ष में अन्त में दो दांत फिर निकल आते हैं। मध्य तथा पार्श्व के अन्त भाग में दो २ दांत ६ वर्ष में क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं।

नवमाब्दात् क्रमात् पीतौ तौ सितौ द्वादशाब्दतः ।
दशपञ्चाब्दतस्तौ तु काचाभौ क्रमशः स्मृतौ ॥ १६१ ॥
नवें वर्ष से वे दोनों दांत क्रम से पीत वर्ण के तदनन्तर फिर १२ वें वर्ष तक में सफेद हो जाते हैं। फिर १५ वें वर्ष तक वे दोनों कांच की भांति क्रमशः उज्ज्वल हो जाते हैं।

अष्टादशाब्दतस्तौ हि मध्वाभौ भवतः क्रमात् ।
शङ्खाभौ चैकविंशाब्दाच्चतुर्विंशाब्दतः सदा ॥ १६२ ॥
छिद्रं सञ्चलनं पातो दन्तानां च त्रिके त्रिके ।
फिर १८ वें वर्ष तक वे दोनों मधु के समान वर्ण के क्रम से हो जाते हैं। फिर २१ वें वर्ष तक शङ्ख के समान वर्ण के हो जाते हैं पुनः २४ वें वर्ष तक तीन ३ दांतों में छिद्र, संचलन (हिलना) तथा गिरना जारी हो जाता है।

३५२ | शुक्रनीतिः

प्रोथे सुवलयस्तिस्रः पूर्णायुर्यस्य वाजिनः ॥ १६३ ॥
यथा यथा तु हीनास्ता हीनमायुस्तथा तथा ।

निन्दित घोड़ों के लक्षण—जिस घोड़े के प्रोथ (मुखाग्र) में स्पष्ट ३ बली पड़ी हुई हों उसकी आयु पूर्ण (वृद्धि पूर्ण) हुई समझनी चाहिये। और जैसे २ उक्त बलियों में कमी होती जाती है वैसे २ उसकी आयु क्षीण हुई समझनी चाहिये।

जानूत्पाता त्वोष्ठवायो धूतपृष्ठो जलासनः ॥ १६४ ॥
गतिमध्यासनः पृष्ठपाती पश्चाद्गमोर्ध्वपात् ।
सर्पजिह्वश्शङ्खकान्ति-भीरुरश्वोऽतिनिन्दितः ॥ १६५ ॥
सच्छिद्रभालतिलकी निन्य आश्रयकृत्तथा ।

जो घोड़ा जानुओं को उछालता हो, ओठों को बजाता हो, पीठ हिलाता हो, जल में या चलते २ बैठ जाता हो, पीठ पर से सवार को गिरा देता हो, पीछे की ओर घसकता हो, पैर ऊपर उठाता हो, सांप की तरह जीभ लपलपानेवाला, शंख की भांति कान्तिवाला, और भड़कनेवाला हो वह अत्यन्त निन्द्य होता है। और जिस घोड़े के भाल में छिद्रयुक्त तिलक हो वह निन्दनीय तथा आश्रयदाता स्वामी को नष्ट करनेवाला होता है।

वृषस्याष्टौ सिता दन्ताश्चतुर्थेऽब्देऽखिलाः स्मृताः ॥ १६६ ॥
द्वावन्त्यौ पतितोत्पन्नौ पञ्चमेऽब्दे हि तस्य व ।

दाँतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा—बैल के चौथे वर्ष तक में सम्पूर्ण सफेद ८ दांत निकल आते हैं, और ५ वें वर्ष में अन्त के दो दांत गिर कर पुनः उत्पन्न जाते हैं।

षष्ठे तूपान्त्यौ भवतः सप्तमे तत्समीपगौ ॥ १६७ ॥
अष्टमे पतितोत्पन्नौ मध्यमौ दशनौ खलु ।

६ ठें वर्ष में अन्त के समीप में स्थित दो दांत, ७ वें वर्ष में उसके समीप के दो दांत, और ८ वें वर्ष में मध्य के दो दांत क्रमसे गिरकर पुनः उत्पन्न हो जाते हैं।

कृष्णपीतसितारक्तशङ्खच्छायौ द्विके द्विके ॥ १६८ ॥
क्रमादब्दे च भवतश्चलनं पतनं ततः ।
उष्ट्रस्योक्तप्रकारेण वयोग्ज्ञानं तु वा भवेत् ॥ १६९ ॥

उसके बाद ८ वें वर्ष से दो-दो वर्ष के पश्चात् क्रम से दो-दो दांत काले पीले, श्वेत, रक्त तथा शंख वर्ण के हो जाते हैं। उसके बाद वे हिलने लगते हैं और अन्त में गिर जाते हैं। और इसी प्रकार से ऊंटकी अवस्था का भी ज्ञान किया जाता है।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् | ३५५

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम्३५५

प्रेरकाऽऽकर्षकमुखोऽङ्कुशो गजविनिग्रहे ।
हस्तिपकैर्गजस्तेन विनेयः सुगमाय हि ॥ १७० ॥

**अंकुश के लक्षण—**गज को दमन करने के लिये अंकुश (गजबाग) का स्वरूप प्रेरणा करने के लिये नुकीला तथा उसी के साथ लगा हुआ खींचने के लिये झुका हुआ बनाना चाहिये । और इसी के द्वारा मार कर फीलवान अच्छी तरह से चलने की शिक्षा हाथी को दे ।

खलीनस्योर्ध्वखण्डौ द्वौ पार्श्वगौ द्वादशाङ्गुलौ ।
तत्पार्श्वान्तर्गताभ्यां तु सुदृढाभ्यां तथैव च ॥ १७१ ॥
वारकाकर्षखण्डाभ्यां रज्ज्वर्थवलयैर्युतौ ।
एवंविधखलीनेन वशीकुर्यात्तु वाजिनम् ॥ १७२ ॥

**घोड़ों की लगाम का वर्णन—**लगाम के ऊपर दो खण्ड होते हैं जो लोहे के बने होते हैं और मुख के दोनों पार्श्व तक होते हैं एवं १२ अंगुल के होते हैं। उन्हीं पार्श्वों के अन्तर्गत अत्यन्त दृढ़ निवारण एवं आकर्षण (खींचने) के लिये दो खण्ड होते हैं एवं उनमें रज्जु (डोरी) बांधने के लिये कड़े बने रहते हैं जिन्हें आवश्यकतानुसार सवार हाथ में लिये हुये खींचता रहता है । इस प्रकार के लगाम से घोड़े को अपने वश में करना चाहिये ।

नासिकाकर्षरज्ज्वा तु वृषोष्ट्रं विनयेद् भृशम् ।
तीक्ष्णाग्रियः सप्तफालः स्यादेषां मलशोधने ॥ १७३ ॥

**बैल व ऊँट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-शोधनार्थ दंताली का वर्णन—**और नासिका में खींचने के लिये लगी हुई रस्सी से बैल तथा ऊँट को अपने वश में करना चाहिये । और इन सबों के मल (लीद-गोबर आदि) हटाने के लिये जो कुदारी होती है उसका अग्रभाग तीक्ष्ण होता है तथा सात फाल का होता है ।

सुताडनैर्विनेया हि मनुष्याः पशवः सदा ।
सैनिकास्तु विशेषेण न ते वै धनदण्डतः ॥ १७४ ॥

**मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश—**मनुष्य और पशु इनको सदा भलीभांति ताड़ना देकर ठीक रास्ते पर लाना चाहिये । और सैनिकों को तो विशेष रूप से ताडन का दण्ड देना चाहिये । उन्हें धन-दंड से दण्डित नहीं करना चाहिये ।

अनूपे तु वृषाश्वानां गजोष्ट्राणां तु जाङ्गले ।
साधारणे पदातीनां निवेशाद्रक्षणं भवेत् ॥ १७५ ॥

**बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल—**अनूप (जलप्राय) देश में

२३ शु०

३५४ | शुक्रनीतिः

बैलों तथा घोड़ों को, जाङ्गल देश में हाथियों तथा ऊँटों को एवं साधारण देश (स्थान) में पैदल सैनिकों को रखने से उन्हें विशेष आराम मिलता है।

शतं शतं योजनान्ते सैन्यं राष्ट्रे नियोजयेत् ।

राज्य में सौ-सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश— राष्ट्र के अन्दर एक २ सौ (१००-१००) योजन पर सैनिकों की एक टुकड़ी सेना रखनी चाहिये।

गजोष्ट्रवृषभाश्वाः प्राक् श्रेष्ठाः सम्भारवाहने ॥ १७६ ॥
सर्वेभ्यः शकटाः श्रेष्ठा वर्षाकालं बिना स्मृताः ।

बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य— प्रथम हाथी, बैल तथा घोड़े युद्ध-सामग्री ढोने के लिये श्रेष्ठ होते हैं। और वर्षा काल को छोड़कर शेष समयों में सामग्री ढोने के लिये सबों से श्रेष्ठ बैलगाड़ी ही मानी जाती है।

न चाल्पसाधनो गच्छेदपि जेतुमरिं लघुम् ॥ १७७ ॥
महताऽत्यन्तसाद्यस्कबलेनैव सुबुद्धियुक् ।

राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध— छोटे से शत्रु को भी जीतने के लिये थोड़ी सेना के साथ राजा कभी न जावे। सुन्दर बुद्धि रखनेवाला राजा तो अत्यन्त नवीन भर्ती किये हुये सैनिकों की बड़ी सेना के द्वारा ही उन्हें जीतने के लिये चढ़ाई करता है।

अशिक्षितमसारं च साद्यस्कं तूलवच्च तत् ॥ १७८ ॥
युद्धं विनाऽन्यकार्येषु योजयेन्मतिमान् सदा ।

युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश— बुद्धिमान् राजा अशिक्षित, असार (विशेष श्रेष्ठ नहीं), नवीन भर्ती की हुई सेना रूई की भांति अत्यन्त लघु (तुच्छ) मानी जाती है, अतः उसे युद्ध के अतिरिक्त अन्य कार्यों में आवश्यकता पड़ने पर नियुक्त करना चाहिये।

विकर्तुं यततेऽल्पोऽपि प्राप्ते प्राणात्ययेऽनिशम् ॥ १७९ ॥
न पुनः किन्तु बलवान् विकारकरणक्षमः ।

संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश— प्राण-संकट उपस्थित होने पर क्षुद्र बल-सम्पन्न सेना विपरीत आचरण करने के लिये सदा उद्यत हो जाती है किन्तु बलवानों की सेना विपरीत आचरण करने के लिये नहीं समर्थ होती है।

अपि बहुबलोऽशूरो न स्थातुं क्षमते रणे ॥ १८० ॥
किमल्पसाधनोऽशूरः स्थातुं शक्तोऽरिणा समम् ।

जब कि बहुत बल से सम्पन्न होता हुआ भी पराक्रमहीन राजा या सैन्य लड़ाई के मैदान में नहीं ठहर सकता है तब अल्प बल-सम्पन्न पराक्रमहीन

चतुर्थाऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५५

वह शत्रु के साथ युद्ध में ठहरने के लिये क्या समर्थ हो सकता है अर्थात् कदापि नहीं ।

सुसिद्धाल्पबलः शूरो विजेतुं क्षमते रिपुम् ॥ १८१ ॥
महान् सुसिद्धबलयुक् शूरः किन्न विजेष्यति ।

सन्नद्ध सेना का माहात्म्य — जब सुन्दर शिक्षित थोड़ी भी सेना से युक्त पराक्रमी राजा शत्रु को जीतने में समर्थ होता है, तब सुन्दर शिक्षित बड़ी सेना से युक्त होकर वह क्या नहीं जीत सकेगा अर्थात् अवश्य जीतेगा ।

मौलाशिक्षितसारेण गच्छेद्राजा रणे रिपुम् ॥ १८२ ॥
प्राणात्ययेऽपि मौलं न स्वामिनं त्यक्तुमिच्छति ।

मौल सेना की प्रशंसा — राजा पुरानी शिक्षितों में श्रेष्ठ सेना के साथ युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़ने के लिये जाये, क्योंकि प्राण-संकट उपस्थित होने पर भी पुरानी खास सेना कभी स्वामी का साथ नहीं छोड़ना चाहती है ।

वाग्दण्डपरुषेणैव भृतिह्रासेन भीतितः ॥ १८३ ॥
नित्यं प्रवासायासाभ्यां भेदोऽवश्यं प्रजायते ।

सेना में अवश्य भेद होने के कारण — सदा वाणी या दण्ड की कठोरता करने से, किंवा तनख्वाह कम कर देने से, वा अधिक भय दिखाने से, एवं निरन्तर प्रवास (परदेश) में भेजते रहने से, तथा अधिक परिश्रम का कार्य कराते रहने से शत्रुओं द्वारा सेना में भेद अवश्य डाला जा सकता है अर्थात् फोड़ ली जा सकती है अतः उक्त व्यवहार से बचना चाहिये ।

बलं यस्य तु सम्भिन्नं मनागपि जयः कुतः ॥ १८४ ॥
शत्रोः स्वस्यापि सेनाया अतो भेदं विचिन्तयेत् ।

सेना का भेद होने से अनिष्ट फल — जिसकी सेना में यदि थोड़ा भी भेद हो जाय तो उसे कहां से जय मिल सकता है । इससे अपनी तथा शत्रु की सेना के सम्बन्ध में भेद का विशेष ख्याल रक्खें, अर्थात् जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद हो सके किन्तु अपनी सेना में न हो वैसा व्यवहार खूब विचार कर करना चाहिये ।

यथा हि शत्रुसेनायाः भेदोऽवश्यं भवेत्तथा ॥ १८५ ॥
कौटिल्येन प्रदानेन द्राक् कुर्यान्नृपतिः सदा ।

राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश — जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद अवश्य पड़ जाय, वैसा कूटनीति से तथा धनादि देकर राजा को शीघ्र भेद का प्रबन्ध सदा करते रहना चाहिये ।

सेवयाऽत्यन्तप्रबलं नत्या ऽचारिं प्रसाधयेत् ॥ १८६ ॥

३५६ | शुक्रनीतिः

प्रबलं मानदानाभ्यां युद्धैर्हीनबलं तथा।
मैत्र्या जयेत् समबलं भेदैः सर्वान् वशे नयेत् ॥ १८७ ॥

शत्रुओं को साधने का प्रकार — अत्यन्त प्रबल शत्रु को सेवा तथा नम्रता-प्रदर्शन के द्वारा, साधारण प्रबल को दान (द्रव्य देकर) तथा सम्मान-प्रदर्शन द्वारा और हीन बलवाले शत्रु को युद्ध के द्वारा, समान बलवाले को मित्रता के द्वारा एवं भेद के द्वारा सभी प्रकार के शत्रुओं को अपने अनुकूल बनाना चाहिये।

शत्रुसंसाधनोपायो नान्यः सुबलभेदतः।
तावत् परो नीतिमान् स्याद्यावत् सुबलवान् स्वयम् ॥ १८८ ॥
मित्रं तावच्च भवति पुष्टाग्नेः पवनो यथा।

शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश — सुशिक्षित सेना में भेद डालने से बढ़ कर कोई दूसरा साधन शत्रु को अनुकूल बनाने (जीतने) का नहीं है। जब तक स्वयं राजा शिक्षित सेना से बलवान बना रहता है तब तक वह श्रेष्ठ नीतिमान माना जाता है। और तभी तक उसके सभी मित्र बने रहते हैं। जैसे लोक में जब तक अग्नि ईंधन से परिपुष्ट रहती है तभी तक वायु उसका मित्र बनकर बढ़ानेवाला बना रहता है। ईंधन से हीन होने पर बुझानेवाला हो जाता है।

त्यक्तं रिपुबलं धार्यं न समूहसमीपतः ॥ १८९ ॥
पृथङ्नियोजयेत् प्राग्वा युद्धार्थं कल्पयेच्च तत्।

शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश — शत्रु के द्वारा निकाली हुई या फोड़ ली गई शत्रु-सेना को अपनी सामूहिक सेना के समीप न रखकर पृथक् रखनी चाहिये। और युद्ध के समय अपनी सेना के अग्रभाग पर लड़ने के लिये नियुक्त करना चाहिये।

मैक्यमारात् पृष्ठभागे पार्श्वयोर्वा बलं न्यसेत् ॥ १९० ॥

मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश — और मित्रता रखनेवाली सेना को अपने समीप, पृष्ठ या पार्श्व भाग में युद्धार्थ रखनी चाहिये।

अस्यते क्षिप्यते यत्तु मन्त्रयन्त्राग्निभिश्च तत्।
अस्त्रं तदन्यतः शस्त्रमसिकुन्तादिकं च यत् ॥ १९१ ॥
अस्त्रं तु द्विविधं ज्ञेयं नालिकं मान्त्रिकं तथा।

अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद — मन्त्र एवं यन्त्र तथा अग्नि के द्वारा जो फेंका जाता है। उसे 'अस्त्र' कहते हैं। और इनसे अन्य तलवार और

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५७

भाला आदि को 'शस्त्र' कहते हैं । और अस्त्र दो प्रकार के होते हैं । उनमें से पहला नालिक ( बन्दूक तोप ), दूसरा मान्त्रिक ।

यदा तु मान्त्रिकं नास्ति नालिकं तत्र धारयेत् ॥ १९२ ॥
सह शस्त्रेण नृपतिर्विजयार्थं तु सर्वदा ।

मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का प्रयोग करने का निर्देश—
राजा विजय-प्राप्ति के लिये सदा अस्त्र के साथ २ जहां पर मान्त्रिक अस्त्र न हों वहां पर नालिक अस्त्र सेना में रक्खे ।

लघुदीर्घाकारधाराभेदैः शस्त्रास्त्रनामकम् ॥ १९३ ॥
प्रथयन्ति नवं भिन्नं व्यवहाराय तद्विदः ।

शस्त्रास्त्र के विद्वान लोग व्यवहार के लिये लघु तथा दीर्घ आकारों के धारा ( प्रयोग करने की रीति विशेष ) भेद से शस्त्र तथा अस्त्रों के नामों में नये २ भेद प्रकाशित करते हैं ।

नालिकं द्विविधं ज्ञेयं बृहत्क्षुद्रविभेदतः ॥ १९४ ॥

नालिक के २ प्रकारों का निर्देश— नालिक ( बन्दूक आदि ) अस्त्र-बृहत् ( तोप ) तथा क्षुद्र ( बन्दूक ) भेद से २ प्रकार का होता है ।

तिर्यगूर्ध्वच्छिद्रमूलं नालं पञ्चवितस्तिकम् ।
मूलाग्रयोर्लक्ष्यभेदि तिलबिन्दुयुतं सदा ॥ १९५ ॥
यन्त्राघाताग्निकृद् ग्रावचूर्णधृक्कर्णमूलकम् ।
सुकाष्ठोपाङ्गबुध्नं च मध्याङ्गुलबिलान्तरम् ॥ १९६ ॥
स्वान्तेऽग्निचूर्णसंघातृशलाकासंयुतं दृढम् ।
लघुनालिकमप्येतत् प्रधार्यं पत्तिसादिभिः ॥ १९७ ॥

लघुनालिका ( बन्दूक ) के लक्षण— जिसमें नाल ऐसी हो जिसमें मूल की तरफ से तिरछा ऊपर की ओर तक छिद्र हो और वह ५ बालिश्त लम्बी हो, और जिसके मूल तथा अग्रभाग में लक्ष्य को भेद करने में सहायक तिल-बिन्दु सदा लगे हों । यन्त्र द्वारा आघात होने पर अग्नि पैदा करनेवाले ग्राव-चूर्ण ( बारूद ) जिसके मूल के कर्ण भाग में भरे हुये हों । और जिसका पृष्ठ भाग, जो पकड़ने के लिये होता है, उसके अङ्गो-पाङ्ग सुन्दर काष्ठ के बने हुये हों । एवं नाल का छिद्र एक अंगुल चौड़ा हो । और जिसके भीतर अग्निचूर्ण ( बारूद ) भरा जाता हो और उसे भरने की शलाका भी जिसके साथ लगी हुई हो और जो दृढ़ हो, इसे लघु नालिक ( बन्दूक ) कहते हैं । इसे पैदल तथा घुड़सवार सैनिकों को रखना चाहिये ।

यथा यथा तु त्वक्सारं यथा स्थूलबिलान्तरम् ।
यथा दीर्घं बृहद्गोलं दूरभेदि तथा तथा ॥ १९८ ॥

३५८ | शुक्रनीतिः

मूलकीलभ्रमाल्लक्ष्यसमसंधानभाजि यत् ।
बृहन्नालिकसंज्ञं तत् काष्ठबुध्नविनिर्मितम् ॥ १९६॥
प्रवाह्यं शकटाद्यैस्तु सुयुक्तं विजयप्रदम् ।

**बृहन्नालिक (तोप) के लक्षण—**जैसे २ नाल की चद्दर मोटी हो और जैसे २ छिद्र की चौड़ाई अधिक हो, जैसे २ नाल की लम्बाई अधिक हो एवं जैसे २ गोले का आकार बड़ा हो, वैसे २ बृहद् नालिक (तोप) दूर तक लक्ष्य भेदन करनेवाली होती है। और जिसके मूल भाग में लगी हुई कील को घुमाने से वह लक्ष्य के अनुरूप गोले को फेंकनेवाली होती है। उसका मूल भाग काठ का बना हुआ होता है। और बैलगाड़ी आदि से ही उसे ढोया जा सकता है। यदि इसका उचित रीति से प्रयोग किया जाय तो विजय देनेवाला होता है।

सुवर्चिलवणात्पञ्चपलानि गन्धकात् पलम् ॥ २००॥
अन्तर्धूमविपकार्कस्नुह्याद्यङ्गारतः पलम् ।
शुद्धात् संग्राहा संचूर्ण्य संमील्य प्रपुटेद्रसैः ॥ २०१॥
स्नुह्यर्काणां रसोनस्य शोषयेदातपेन च ।
पिष्ट्वा शर्करवच्चैतदग्निचूर्णं भवेत् खलु ॥ २०२॥

**अग्निचूर्ण (बारूद) बनाने का प्रकार—**सोरा ५ पल (२० तो०), गन्धक १ पल (४ तो०), आक तथा सेहुंड आदि के अन्तर्धूम द्वारा बने हुये विशुद्ध कोयले १ पल लेकर सबों का चूर्ण एकत्र कर पुनः आक, सेहुंड तथा लहसुन के रस का पुट देकर धूप में सुखाकर चूर्ण करके रख ले। यही शर्करा (बालू) की भांति तैयार हुई वस्तु 'अग्निचूर्ण' (बारूद) कहलाती है।

सुवर्चिलवणाद्भागाः षड् वा चत्वार एव वा ।
नालास्त्रार्थाग्निचूर्णे तु गन्धाङ्गारौ तु पूर्ववत् ॥ २०३॥

अथवा नालास्त्र (बन्दूक आदि) के लिये जो बारूद बनाई जाती है उसमें सोरा ६ या ४ पल दे सकते हैं शेष गन्धक और अङ्गार (कोयला) पूर्ववत् डाल सकते हैं।

गोलो लोहमयो गर्भगुटिकः केवलोऽपि वा ।
सीसस्य लघुनालायें ह्यन्यधातुभवोऽपि वा ॥ २०४ ॥

**गोला बनाने का प्रकार—**तोप का गोला लोहे का या उसके अन्दर छोटी २ गोलियाँ भरी रहती हैं, दोनों प्रकार का होता है। और बन्दूक के लिये सीसे की या अन्य धातु की बनी हुई बड़ी गोलियां या छर्रे होते हैं।

लोहसारमयं वापि नालास्त्रं त्वन्यधातुजम् ।
नित्यसम्मार्जनस्वच्छमस्त्रपातिमिराधृतम् ॥ २०५॥

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५६

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५६

नालिक की व्यवस्था का निर्देश—तोप या बन्दूक फौलाद् (उत्तम लौह) वा अन्य धातु के बनाये जाते हैं। और उन्हें नित्य झाड़-पोंछकर स्वच्छ किया जाता है तथा उसके पास चलानेवाले रहा करते हैं।

अङ्गारस्यैव गन्धस्य सुवर्चिलवणस्य च।
शिलाया हरितालस्य तथा सीसमलस्य च॥ २०६॥
हिङ्गुलस्य तथा कान्तरजसः कर्पूरस्य च।
जतोर्नील्याश्च सरलनिर्यासस्य तथैव च॥ २०७॥
समन्यूनाधिकैरंशैरग्निचूर्णान्यनेकंशः।
कल्पयन्ति च तद्विद्याश्चन्द्रिकाभादिमन्ति च॥ २०८॥

बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश—कोयला, गन्धक, सोरा, मैनसिल, हरताल, सीसा का किट्ट, हिङ्गुल, कान्तसार लौह, कपूर, लाख, नीली (राल), देवदारु का गोंद इन सबों के सम, न्यून और अधिक भाग मिलाकर बनाने से नाना प्रकार की बारूद बनानेवाले बनाते हैं जिसमें से जलने पर चाँदनी की भांति प्रकाश निकलता है।

क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद् गोलं लक्षे सुनालगम्।

तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति—चलानेवाले बन्दूक आदि में गोली-बारूद भरने के बाद आग लगाकर लक्ष्य 'पर छोड़ते हैं जिसकी विधि आगे बताई जा रही है।

नालाग्रं शोधयेदादौ दद्यात्तत्राग्निचूर्णकम्॥ २०९॥
निवेशयेत्तद्दण्डेन नालमूले यथा दृढम्।
ततः सुगोलकं दद्यात् ततः कर्णेऽग्निचूर्णकम्॥ २१०॥
कर्णचूर्णाग्निदानेन गोलं लक्ष्ये निपातयेत्।

पहले बन्दूक या तोप को साफ करके उसमें बारूद डालकर लौह आदि के दण्ड से खूब ठूंस २ कर भर देवे उसके बाद दृढ़ गोला या गोली नाल के मूल में रख देवे तदनन्तर उसके पार्श्व के छिद्र में बारूद भरकर उसमें आग लगा देने के बाद उसके सहारे से गोला या गोली को लक्ष्य साध कर चला देवे।

लक्ष्यभेदी यथा बाणो धनुर्ज्याविनियोजितः॥ २११॥
भवेत् तथा तु संघाय द्विहस्तश्च शिलीमुखः।

बाण का लक्षण—धनुष की डोरी पर ऐसा निशाना साध कर बाण रक्खे कि वह चलाने पर लक्ष्य को भेद सके। और बाण दो हाथ प्रमाण का बनाये।

अष्टास्रा पृथुबुध्ना तु गदा हृदयसम्मिता॥ २१२॥

३६० | शुक्रनीतिः

पट्टिशः स्वसमो हस्तबुध्नश्चोभयतोमुखः ।

**गदा व पट्टिश के लक्षण—**आठ पहलूवाली, मूल में मोटी और हृदय के बराबर ऊंची, दृढ़ दण्डोंवाली 'गदा' बनानी चाहिये । और अपने बराबर लम्बा तथा दोनों तरफ जिसके मुख हों एवं जो बीच में से हाथ से पकड़ा जाय ऐसा 'पट्टिश' शस्त्र होता है ।

ईषद्वक्रश्चैकधारो विस्तारे चतुरङ्गुलः ॥ २१३ ॥
क्षुरप्रान्तो नाभिसमो दृढमुष्टिः सुचन्द्ररुक् ।
खङ्गः प्रासश्चतुर्हस्तदण्डबुध्नः क्षुराननः ॥ २१४ ॥
दशहस्तमितः कुन्तः फालाग्रः शङ्कुबुध्नकः ।

**खड्ग-प्रास और कुन्त (भाला) के लक्षण—**कुछ टेढ़ा, एक तरफ धारवाला, ४ अंगुल चौड़ा, छुरा के समान तीक्ष्ण प्रान्त भागवाला, नाभि तक ऊंचा, दृढ़ मूंठवाला एवं चन्द्रमा के समान स्वच्छ चमकनेवाला ऐसा 'खड्ग' होता है । ४ हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में छुरे के समान तीक्ष्ण मुख-वाला 'प्रास' नामक शस्त्र होता है । और जो १० हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में तीक्ष्ण फल से युक्त होता है और उस फल के मूल में कील लगी हुई होती है, ऐसा 'कुन्त' (भाला) होता है ।

चक्रं षड्ढस्तपरिधि क्षुरप्रान्तं सुनाभियुक् ॥ २१५ ॥
त्रिहस्तदण्डस्त्रिशिखो लौहरज्जुः सुपाशकः ।

**चक्र और पाश के लक्षण—**जिसके घेरे की लम्बाई ६ हाथ की हो और चक्र की भांति गोलाकार होते हुये प्रान्त भाग छुरे के समान तीक्ष्ण हो एवं बीच में जिसकी नाभि सुन्दर दृढ़ बनी हुई हो उसे 'चक्र' कहते हैं । जिसमें ३ हाथ लम्बा दण्ड लगा हो और उसमें ३ शिखायें (छोर) हों जो लोह के तारों से बनी हों ऐसा 'पाश' नामक शस्त्र होता है ।

गोधूमसम्मितस्थूलपत्रं लोहमयं दृढम् ॥ २१६ ॥
कवचं सशिरस्त्राणमूर्ध्वकायविशोभनम् ।

**कवच और टोप के लक्षण—**गेहूँ बराबर मोटे लोह के दृढ़ पत्तरों द्वारा बने हुये शरीर के रक्षार्थ आवरण-विशेष को 'कवच' कहते हैं और इसके साथ शिर को सुशोभित एवं सुरक्षित रखने का एक टोप भी लौह-पत्रों का होता है ।

तीक्ष्णाग्रं करजं श्रेष्ठं लौहसारमयं दृढम् ॥ २१७ ॥

**करज के लक्षण—**पक्के उत्तम लोह के बने हुये, दृढ़ एवं नख के समान तीक्ष्ण नुकीले शस्त्र को 'करज' (बघनख) कहते हैं ।

यो वै सुपुष्टसम्भारस्तथा षड्गुणमन्त्रवित् ।
बह्वक्षसंयुतो राजा योद्धुमिच्छेत् स एव हि ॥ २१८ ॥

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१

अन्यथा दुःखमाप्नोति स्वराज्याद् भ्रश्यतेऽपि च ।

युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण— जो राजा युद्ध के लिये उपयुक्त सामग्रियों से परिपूर्ण और समयानुसार सन्धि, विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई करना), आसन (अपने स्थान पर रहकर युद्ध के लिये तयार रहना), द्वैध (शत्रु के गोल में फूट डाल देना) इन षः गुणों एवं मन्त्रणा करना इनका जानकार, एवं बहुत से अस्त्र-शस्त्रादिकों से युक्त हो वही युद्ध करने की इच्छा रखे अन्यथा युद्ध करने पर वह दुःख पाता है और अपने राज्य को भी खो बैठता है।

आबिभ्रतोः शत्रुभावमुभयोः संयतात्मनोः ॥ २१६ ॥
अस्त्राद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं व्यापारो युद्धमुच्यते ।

युद्ध का सामान्य लक्षण— परस्पर शत्रुभाव रखते हुये निश्चल चित्त होकर दो व्यक्तियों का अस्त्रादिकों के द्वारा जो व्यापार होता है, उसे 'युद्ध' कहते हैं।

मन्त्रास्त्रैर्देविकं युद्धं नालाद्यस्त्रैस्तथाऽऽसुरम् ॥ २२० ॥
शस्त्रबाहुसमुत्थं तु मानवं युद्धमीरितम् ।

युद्ध के भेद और लक्षण— मन्त्र के द्वारा अस्त्रों का प्रयोग जिसमें हो उसे 'दैविक' युद्ध तथा तोप-बन्दूक आदि अस्त्रों के द्वारा प्रवृत्त युद्ध को 'आसुर' एवं शस्त्र (खड्गादि) तथा बाहु द्वारा प्रवृत्त युद्ध को 'मानव' कहते हैं।

एकस्य बहुभिः सार्धं बहूनां बहुभिश्च वा ॥ २२१ ॥
एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां द्वयोर्वा तद्भवेत् खलु ।

और वह युद्ध एक का बहुतों के साथ, बहुतों का बहुतों के साथ, एक का एक के साथ अथवा दो का दो के साथ होता है।

कालं देशं शत्रुबलं दृष्ट्वा स्वीयबलं ततः ॥ २२२ ॥
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं भवेच्च युद्धकामुकः ।

काल, देश, शत्रु का तथा अपना बल, उपाय (साम, दान, भेद, दण्ड), षड्गुण (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध, आश्रय) और मन्त्र इन सबों का विचार करके ही युद्ध में प्रवृत्त होना चाहिये।

शरद्धेमन्तशिशिरकालो युद्धेषु चोत्तमः ॥ २२३ ॥
बसन्तो मध्यमो ज्ञेयोऽधमो ग्रीष्मः स्मृतः सदा ।

युद्ध के लिये काल-विचार— युद्ध के लिये शरद्, हेमन्त तथा शिशिर ऋतु का समय उत्तम होता है। बसन्त का मध्यम और ग्रीष्म का सदा अधम समय होता है।

वर्षासु न प्रशंसन्ति युद्धं साम स्मृतं तदा ॥ २२४ ॥

३६२ | शुक्रनीतिः

वर्षाकाल में युद्ध करना उचित नहीं होता है, उस समय शत्रु के साथ साम ( किसी प्रकार की सन्धि ) रखना ही उचित होता है ।

युद्धसम्भारसम्पन्नो यदाधिकबलो नृपः।
मनोत्साही सुशकुनोत्पाती कालस्तदा शुभः॥ २२५॥

जिस समय राजा युद्ध की सामग्री से पूर्ण संपन्न होने से अधिक बलशाली हो और मनमें युद्ध का उत्साह हो तथा अच्छे शकुन दिखाई पड़ते हों उस समय युद्ध करना शुभ फल देनेवाला होता है ।

कार्येऽत्यावश्यके प्राप्ते कालो नो चेत्तदा शुभः।
निधाय हृदि विश्वेशं गेहे भक्त्याऽभियात्तदा॥ २२६॥

यदि आवश्यक कार्यवश युद्ध करना अनिवार्य हो जाय और उस समय शुभ फलप्रद समय उपस्थित न हो तो गृह में भक्तिपूर्वक भगवान का हृदय में ध्यान धरकर युद्ध के लिये सन्नद्ध हो जाय ।

न कालनियमस्तत्र गोस्त्रीविप्रविनाशने ।

गौ, स्त्री और ब्राह्मण का विनाश यदि उपस्थित हो जाय तो उनके रक्षार्थ युद्ध करने में किसी प्रकार के काल का नियम नहीं । अर्थात् उपरि लिखित नियमानुसार तत्काल युद्ध में प्रवृत्त हो जाय ।

यस्मिन् देशे यथाकालं सैन्यव्यायामभूमयः॥ २२७॥
परस्य विपरीताश्च स्मृतो देशः स उत्तमः।

युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण—जिस स्थान पर समयानुसार सैनिकों को कवायद् कराने के लिये योग्य भूमि हो और शत्रु के लिये विपरीत पड़े तो वही स्थान युद्ध करने के लिये चुनना उत्तम होता है ।

आत्मनश्च परेषां च तुल्यव्यायामभूमयः॥ २२८॥
यत्र मध्यम उद्दिष्टो देशः शास्त्रविचिन्तकैः।

मध्यम युद्ध-देश के लक्षण—और जहां पर अपनी तथा शत्रु दोनों की सेनाओं के लिये कवायद करने योग्य भूमि हो उसे युद्ध शास्त्र के पण्डितों ने मध्यम भूमि कही है ।

अरातिसैन्यव्यायामसुपर्याप्तमहीतलः ॥ २२९॥
आत्मनो विपरीतश्च स वै देशोऽधमः स्मृतः।

अधम युद्ध-देश के लक्षण—जहां पर शत्रु की सेना के लिये कवायद करने योग्य पर्याप्त भूमि हो पर अपनी सेना के लिये विपरीत हो तो वह देश युद्ध के लिये 'अधम' कही गई है ।

स्वसैन्यात्तु तृतीयांशहीनं शत्रुबलं यदि ॥ २३०॥
अशिक्षितमसारं वा साद्यस्कं स्वजयाय वै।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६३

युद्ध के लिये सेना का विचार— यदि अपनी सेना से संख्या में तृतीय अंश हीन शत्रु की सेना हो सो भी वह अशिक्षित, असार वा तत्काल में भर्ती की हुई हो तो वहां पर युद्ध करने से अपना जय निश्चित होता है।

पुत्रवत् पालितं यत्तु दानमानविवर्द्धितम् ॥ २३१ ॥
युद्धसम्भारसम्पन्नं स्वसैन्यं विजयप्रदम् ।

और यदि अपनी सेना पुत्र की भांति पाली हुई हो, तथा दान-मान से संतुष्ट की हुई हो एवं युद्धोपयोगी सभी सामग्रियों से भरपूर हो तो उसे लेकर युद्ध करने से विजय निश्चित होता है।

सन्धिं च विग्रहं यानमासनं च समाश्रयम् ॥ २३२ ॥
द्वैधीभावं च संविद्यान्मन्त्रस्यैतांस्तु षड्गुणान् ।

मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश— १. युद्धादिकाल उपस्थित होने पर परस्पर हाथी-घोड़े आदि देकर सहायता आदि करने के नियम में बंध जाने को 'सन्धि', २. विरुद्ध आचरण द्वारा बैर भाव रखने को विग्रह, ३. शत्रु पर चढ़ाई करने को 'यान', ४. शत्रु की उपेक्षा करके अपने स्थान पर युद्ध-सामग्री के साथ स्थित रहने को 'आसन', ५. किसी से पीड़ित होने पर किसी प्रबल का आश्रय लेने को 'समाश्रय' ६. स्वार्थ-सिद्धि के लिये सेना को टुकड़ी-टुकड़ी में रखने को 'द्वैधीभाव' कहते हैं। और ये ही ६ मन्त्र के 'षड्गुण' कहलाते हैं।

याभिः क्रियाभिर्बलवान् मित्रतां याति वैरिषु ॥ २३३ ॥
सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता विमृशेत् तां तु यत्नतः ।

सन्धि के लक्षण— जिस क्रिया के द्वारा बलवान् शत्रु निश्चित मित्रता भाव को प्राप्त करे उसे 'सन्धि' कहते हैं, इसका यत्नपूर्वक ख्याल रक्खे।

विकर्षितः सन् वाऽधीनो भवेच्छत्रुस्तु येन वै ॥ २३४ ॥
कर्मणा विग्रहस्तं तु चिन्तयेन्मन्त्रिभिर्नृपः ।

विग्रह के लक्षण— जिस क्रिया से शत्रु पीड़ित किया जाय या अधीन बनाया जाय उसे 'विग्रह' कहते हैं। राजा इसे मन्त्रियों के साथ खूब विचार कर करे।

शत्रुनाशार्थगमनं यानं स्वाभीष्टसिद्धये ॥ २३५ ॥
स्वरक्षणं शत्रुनाशो भवेत् स्थानात्तदासनम् ।

यान तथा आसन के लक्षण— अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिये किसी शत्रु के नाशार्थ चढ़ाई करने को 'यान' कहते हैं। जहां पर पड़े रहने से अपनी रक्षा तथा शत्रु का नाश हो सके वहां पड़े रहने को 'आसन' कहते हैं।

यैर्गुणैर्तो बलवान् भूयाद् दुर्बलोऽपि स आश्रयः ॥ २३६ ॥

३६४ | शुक्रनीतिः

द्वैधीभावः स्वसैन्यानां स्थापनं गुल्मगुल्मयोः।
**आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण—**जिसके द्वारा रक्षित होकर दुर्बल भी सबल हो जाय, ऐसे प्रवल किसी राजा का आश्रय लेने को 'आश्रय' कहते हैं। गुल्म-गुल्म (टुकडी २) रूप में विभाजित करके अपनी सेना को रखने को 'द्वैधीभाव' कहते हैं।

बलीयसाभियुक्तस्तु नृपोऽनन्यप्रतिक्रियः ॥ २३७॥
आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम्।
**सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश—**अत्यन्त बलवान द्वारा आक्रमण किये जाने पर कोई प्रतीकार का उपाय न होने से आपत्ति में पड़ा हुआ राजा अच्छे समय की प्रतीक्षा करता हुआ उससे सन्धि कर ले।

एक एवोपहारस्तु सन्धिरेष मतो हितः ॥ २३८॥
उपहारस्य भेदास्तु सर्वे ये मैत्रवर्जिताः।
**उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश—**उस समय केवल उपहार (भेंट) देकर 'सन्धि' करना ही हितकर होता है। मित्रता को छोड़कर जितने भी सन्धि के प्रकार हैं वे सभी इस उपहार के ही भेद माने जाते हैं। अर्थात् इससे बढ़कर सन्धि के दूसरे प्रकार श्रेष्ठ नहीं हैं।

अभियोक्ता बलीयस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते ॥ २३९॥
उपहारादृते यस्मात् सन्धिरन्यो न विद्यते।
आक्रमणकारी अत्यन्त बलवान होने से बिना भेंट पाये युद्ध से निवृत्त नहीं होता है। अतः उपहार को छोड़कर अन्य कोई दूसरा सन्धि का उपाय नहीं है।

शत्रोर्बलानुसारेण उपहारं प्रकल्पयेत् ॥ २४०॥
सेवां बाऽपि च स्वीकुर्याद्दद्यात् कन्यां भुवं धनम्।
**शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद—**शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना की जाती है। जिसमें उसकी सेवा स्वीकार करनी पड़ती है किंवा अपनी कन्या, पृथ्वी (राज्य का कुछ अंश) या धन उपहार में देना पड़ता है।

स्वसामन्तांश्च सन्धियान् मन्त्रेणान्यजयाय वै ॥ २४१॥
सन्धिः कार्योऽप्यनार्येण सम्प्राप्योत्सादयेद्धि सः।
**पार्श्ववर्ती अनार्य राजा से भी सन्धि करने का निर्देश—**शत्रु को जीतने के लिये मन्त्रणा के द्वारा अपने पास के सामन्तों के साथ सन्धि कर ले। और सन्धि तो अनार्य (म्लेच्छ आदि) के साथ भी कर लेनी चाहिये, क्योंकि सन्धि न करने पर समय पाकर नुकसान पहुँचा सकता है।

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६५

सङ्घातवान् यथा वेणुर्निबिडैः कण्टकैर्वृतः ॥ २४२ ॥
न शक्यते समुच्छेत्तुं वेणुः सङ्घातवांस्तथा।

**सन्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश—**जिस प्रकार से घने कांटा से घिरा हुआ बांस के समूह को कोई काट या उखाड़ नहीं सकता है, उसी प्रकार से म्लेच्छों से सन्धि किये हुये सहायवान राजा को भी कोई नहीं पछाड़ सकता है। अर्थात् राजा को अपने पास के भले-बुरे सभी राजाओं से मेल रखना चाहिये ऐसा करने से कोई शत्रु उसको परास्त नहीं कर सकता है।

सन्धिञ्चातिबले युद्धं साम्ये यानं तु दुर्बले ॥ २४३ ॥
सुहृद्भिराश्रयः स्थानं दुर्गादिभजनं द्विधा।

अति प्रबल शत्रु के साथ सन्धि, समान बलवाले के साथ युद्ध, दुर्बल शत्रु पर या न (युद्ध के लिये आक्रमण) व मित्र राजाओं के साथ आश्रय और दुर्गादि में दो जगह स्थान-सेना की स्थापना करना उचित होता है।

बलिना सह सन्धाय भये साधारणे यदि ॥ २४४ ॥
आत्मानं गोपयेत् काले बहुमित्रेषु बुद्धिमान्।

यदि राजा को बहुत से शत्रुओं से समानभाव से भय उपस्थित हो जाय तो उनमें जो अधिक बलशाली हो उसके साथ बुद्धिमानी के साथ समयानुसार सुलह करके अपनी रक्षा करनी चाहिये।

बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् ॥ २४५ ॥
प्रतिवातं हि न घनः कदाचिदपि सर्पति।

बलवान के साथ युद्ध करना उचित होता है, इसका उदाहरण कहीं भी नहीं मिलता है। क्योंकि देखा जाता है कि मामूली बादल कभी भी हवा के विपरीत नहीं ठहर सकता है।

बलीयसि प्रणमतां काले विक्रमतामपि ॥ २४६ ॥
सम्पदो न विसर्पन्ति प्रतीपमिव निम्नगाः।

जो बलवान शत्रु के समक्ष सिर झुकाते हैं और समय अच्छा आने पर फिर उसी से युद्ध करने लगते हैं। ऐसे राजाओं की संपत्ति उससे कभी विपरीत नहीं होती है अर्थात् कभी चलायमान नहीं होती है। जैसे नदियां कभी विपरीत नहीं बहती हैं।

राजा न गच्छेद्दु विश्वासं सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान् ॥ २४७ ॥
अद्रोहसमयं कृत्वा वृत्रमिन्द्रः पुराऽवधीत्।

**विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण—**बुद्धिमान राजा सन्धि किये हुये भी शत्रु का विश्वास न करे। क्योंकि प्राचीनकाल में द्रोह न करने की प्रतिज्ञा-

३६६ | शुक्रनीतिः

के साथ सन्धि करके भी इन्द्र ने वृत्रासुर को सन्धि की उपेक्षा करके मार डाला ।

आपन्नोऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण वा ॥ २४८ ॥
देशकालबलोपेतः प्रारभेत च विग्रहम् ।

जो राजा विपत्ति में पड़कर या दूसरे के द्वारा पीडित होकर भी यदि पुनः अपना अभ्युदय चाहता हो तो वह देश, काल तथा बल उचित होने पर युद्ध प्रारम्भ कर दे ।

प्रहीनबलमित्रं तु दुर्गस्थं शत्रुमागतम् ॥ २४९ ॥
अत्यन्तविषयासक्तं प्रजाद्रव्यापहारकम् ।
भिन्नमन्त्रिबलं राजा पीडयेत् परिवेष्टयन् ॥ २५० ॥
विग्रहः स च विज्ञेयो ह्यन्यश्च कलहः स्मृतः ।

विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश—
जो शत्रु सेना तथा मित्र से हीन हो गया हो, और अपने दुर्ग में घिर जाने से पड़ा हुआ हो, या दुर्गति में पड़ा हो या अत्यन्त विषयासक्त हो गया हो, किंवा प्रजाओं के द्रव्य को लूट लेता हो अथवा जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं में फूट पड़ गया हो तो ऐसे उपस्थित शत्रु को चारो तरफ से घेरकर राजा द्वारा पीडित करने को वस्तुतः 'विग्रह' कहते हैं और इससे भिन्न को केवल 'कलह' कहते हैं ।

बलीयसाऽल्पबलः शूरेण न च विग्रहम् ॥ २५१ ॥
कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां सर्वनाशः प्रजायते ।

बलवान शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध—
अल्प सेनावाले दुर्बल राजा को शूर-वीर तथा अत्यन्त बलवान शत्रु से विग्रह नहीं करना चाहिये । क्योंकि ऐसे के साथ विग्रह करनेवालों का सर्वनाश हो जाता है ।

एकार्थाभिनिवेशित्वं कारणं कलहस्य वा ॥ २५२ ॥
उपायान्तरनाशे तु ततो विग्रहमाचरेत् ।

निरुपाय दशा में विग्रह करने का निर्देश—
किसी वस्तु के पाने का आग्रह जब दो व्यक्तियों में हो जाता है तब उसके कारण से उन दोनों में कलह उत्पन्न हो जाता है । दूसरा कोई उपाय न रहने पर अन्त में विग्रह करना उचित होता है ।

विगृह्यसंधाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः ॥ २५३ ॥
उपेक्षया च निपुणैर्यानं पञ्चविधं स्मृतम् ।

यान के पांच भेद—
विगृह्ययान, संधाययान, संभूययान, प्रसङ्गयान, उपेक्षायान, इस भाँति से विद्वानों ने ५ प्रकार का यान कहा है । इनके लक्षण आगे कहेंगे ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् । ३६७

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् । ३६७

विगृह्य याति हि यदा सर्वाञ्छत्रुगणान् बलात् ॥ २५४ ॥ विगृह्य यानं यानज्ञैस्तदाचार्यैः प्रचक्ष्यते ।

**विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण—**जब कोई राजा किसी प्रकार का विग्रह का कारण दिखाकर जबरदस्ती शत्रुगणों पर चढ़ाई कर देता है तो उसे यान के जानने वाले राजनीति के आचार्य गण ‘विगृह्ययान’ कहते हैं।

अरिमित्राणि सर्वाणि स्वमित्रैः सर्वतो बलात् ॥ २५५ ॥ विगृह्य चारिभिर्गन्तुं विगृह्य गमनं तु वा ।

अथवा किसी २ के मत से शत्रु के साथ बलपूर्वक चारो तरह से लड़वा-कर जो शत्रु पर चढ़ाई करना है वह ‘विगृह्ययान’ कहलाता है।

सन्धायान्यत्र यात्रायां पाष्णिग्राहेण शत्रुना ॥ २५६ ॥ सन्धाय गमनं प्रोक्तं तज्जिगीषोः फलार्थिनः ।

**सन्धायान के लक्षण—**विजय को चाहनेवाले राजा को विशेष फल की इच्छा रखनेवाले विद्वान-अन्यत्र किसी शत्रु पर चढ़ाई करने के समय उसके पूर्व अपने पृष्ठ भाग-स्थित पड़ोसी शत्रु राजा के साथ सन्धि करके चढ़ाई करने को 'सन्धायागमन (यान)' कहते हैं।

एको भूपो यदैकत्र सामन्तैः सांपरायिकैः ॥ २५७ ॥ शक्तिशौर्ययुतैर्यानं सम्भूय गमनं हि तत् ।

**संभूययान के लक्षण—**अकेला कोई राजा यदि शक्ति तथा शूरता से युक्त और युद्ध करने में कुशल सामन्तों के साथ एकत्र होकर किसी पर चढ़ाई करे तो 'संभूयगमन (यान)' कहते हैं।

अन्यत्र प्रस्थितः सङ्गादन्यत्रैव च गच्छति ॥ २५८ ॥ प्रसङ्गयानं तत् प्रोक्तं यानविद्भिश्च मन्त्रिभिः ।

**प्रसङ्गयानं के लक्षण—**अन्यत्र किसी पर चढ़ाई करने के लिये चल चुकने पर मार्ग में यदि प्रसङ्गवश उससे अन्यत्र चढ़ाई करने के लिये चल देवें तो उसे यानवेत्ता मन्त्रिगण 'प्रसङ्गयान' कहते हैं।

रिपुं यातस्य बलिनः सम्प्राप्य विकृतं फलम् ॥ २५९ ॥ उपेक्ष्य तस्मिन् तद्यानमुपेक्षायानमुच्यते ।

**उपेक्षायान के लक्षण—**जो शत्रु बुरे फल को पाकर स्वयं विपन्न अवस्था में पड़ गया हो उसकी यदि उपेक्षा करके उसके ऊपर चढ़ाई कर दी जाय तो उसे 'उपेक्षायान' कहते हैं।

दुर्वृत्तेऽप्यकुलीने तु बलं दातरि रज्यते ॥ २६० ॥ हृष्टं कृत्वा स्वयम्बलं पारितोष्यप्रदानतः । नायकः पुरतो यायात् प्रवीरपुरुषावृतः ॥ २६१ ॥