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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पुष्ट होकर शृङ्गार रस-रूप में प्रतिफलित होता है। नायक-नायिका परस्पर इसके आश्रय एवं आलम्बन होते हैं। उनके परस्पर दर्शन, कटाक्ष, प्रस्वेद, रोमांच, आश्रु, भूविक्षोपादि आङ्गिक व्यापार अनुभाव कहे जाते हैं । इसमे तैंतीस व्यभिचारी भाव होते हैं।

आरम्भ में ही शुकसप्तति मे विप्रलम्भ शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। 'काव्यानुशासन' के अनुसार विप्रल्लभ शृङ्गार की निरूक्ति इस प्रकार है- 'सम्भोगसुखास्वादलोभेन विशेषेण प्रलभ्यते आत्माऽत्रेोति विप्रलम्भः।' तात्पर्य यह है कि नायक-नायिका के परस्परनुराग मे मिलन नैराश्य ही विप्रलम्भ है। इसीलिए नाट्यदर्पणकार कहते है- 'परस्परानुरक्तयोरपि विलासिनोः पारतन्त्र्योदर घटनं चित्तविश्लेषणे वा विप्रलम्भः' । आचार्य विश्वनाथ विप्रलम्भ के स्वरूप का विवेचन करते हुए कहते है- इसमें नायक-नायिका का परस्परानुराग हुआ करता है, किन्तु परस्पर मिलन नहीं होने पाता।¹

वियोग मे रति का भाव लगा रहता है और यही रति भाव विप्रलम्भ शृंग्गार को करूण से भिन्न बनाता है। पुनर्मिलन की आशा वियोग में संयोग का सुख-स्वप्न दिखाती है। संयोग मे जो आनन्द प्रियजन के मिलन से होता है, वह वियोग मे प्रियजन के चिन्तन तथा गुणकथनादि के माध्यम से होता है। इसमें प्रतिक्षण नायक का स्मरण होता रहता है। इस स्मरण जन्य संयोग में जो सुख है, वह उसे प्रत्यय-सयोग से भी अधिक श्रेष्ठता देता है। इसमें गुरूजनों की लज्जा का न भय है, न वियोग की उत्साह-शून्य करने वाली शंङ्का। इसीलिए लोग वियोग को सुखद माना करते है।² यदि वियोग में यह सुख न होता तो दुःख सहकर भी प्राणी वियोग में मग्न क्यो रहते है?

विप्रलम्भ श्रृंगार के चार भेद हैं- पूर्वराग, मान, प्रवास, करूण।³


1 सा०द०, 3/187
2 कबीर
3 सा०द०, 3/187, पृ० 232

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आचार्य मम्मट ने विप्रलम्भशृङ्गार को अभिलाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, तथा, शाप, पाँच, प्रकार का माना है।$^1$ जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि मुख्य कथा शुकसप्तति के अन्तर्गत प्रवास विप्रलम्भ का दिग्दर्शन हुआ है। मदनविनोद और प्रभावती की इस कथा मे आश्रय प्रभावती ओर आलम्बन मदनविनोद है, पत्नी को विदेश छोडकर जाना उद्दीपन विभाव है, प्रभावती का उदास रहना, चिन्ता करना, कुमार्ग पर जाने के लिए उद्यत होना आदि अनुभाव हैं, चिन्ता, दैन्य, चपलता मोह आदि व्यभिचारी भाव हैं।

शुकसप्तति के अधिकांश कथाओं में मुख्य रूप से संयोग शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर अथवा कार्यवश घर से बाहर जाने पर उनकी पत्नियों काम सन्तप्ता होकर व्यभिचार मार्ग का अवलम्ब लेती हैं। इसीलिये अधिकांश कथायें शृङ्गारिक अनुभावों से भरी पडी हैं। इन कथाओं में कही-कहीं आश्रय, नायिका हैं और आलम्बन उपपति है तो कहीं पर पुरूष आश्रय और परकीया नायिका आलम्बन है। जैसे-

द्वितीय कथा: में वीर नामक यशोदेवी का पुत्र आश्रय है और आलम्बन शशिप्रभा है। आश्रय वीर द्वारा भोजन आदि न करना अपनी हृदय पीड़ा को माता से निवेदन करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्याभिचारीभाव है।

तृतीय कथा : में कुटिल नामक धूर्त विमल का रूप धारण करने वाला आश्रय है और आलम्बन विमल की दोनों पत्नियाँ हैं जिसे देखकर कुटिल धूर्त के हृदय में कामभावना जागृत होती है। धूर्त विमल का दोनों पत्नियों के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चतुर्थ कथा : में शूर विष्णु नामक ब्राह्मण आश्रय है और गोविन्द नामक मूर्ख की पत्नी विषकन्या आलम्बन है, जिसे देखकर विष्णु के हृदय में काम भावना जागृत


1 अभिलाषविरहेर्ष्याप्रवासशापहेतुक इति पञ्चविधः।
काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, पृ० 123 ।

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होती है। विष्णु का विषकन्या के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

दशमकथा : में उपपति आलम्बन है और देवसाख्य की दोनों पत्नियाँ शृङ्गारवती और सुभगा आश्रय हैं। उपपति को देखकर देवसाख्य की पत्नियो के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शृङ्गारवती और सुभगा का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

एकादशी कथा : में रम्भिका आश्रय है और ब्राह्मण पुत्र आलम्बन है, जिसे देखकर परपुरूष मे आसक्त रहने वाली रम्भिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। रम्भिका का परपुरूष से सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

द्वादशी कथा : में कुम्हार की स्त्री शोभिका आश्रय है और उपपति आलम्बन है जिसे देखकर परपुरुष में आसक्त रहने वाली शोभिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शोभिका का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

त्रयोदशी कथा : मे वणिक् पत्नी राजिका आश्रय है और उपपति आलम्बन है। उपपति को देखकर राजिका के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। उपपति के साथ राजिका का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

चतुर्दशी कथा : मे धनश्री आश्रय है और पर पुरुष आलम्बन परपुरूष को देखकर धनश्री के हृदय मे काम भावना जागृत होती है। धनश्री का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

पञ्चदशी कथा : में गुणाकर की पत्नी श्रिया देवी आश्रय है और सुबुद्धि नामक वणिक् आलम्बन है। वाणिक् को देखकर श्रियादेवी के हृदय में कामभावना जागृत होती है और श्रिया देवी का सुबुद्धि के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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षोडशी कथा : में जनवल्लभ वणिक् की पत्नी मुग्धिका आश्रय है और परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर मुग्धिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है और मुग्धिका का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

त्र्योदशी कथा : में वणिक् पत्नी स्वच्छन्दा आश्रय है और सोढाक नामक सेठ आलम्बन है। सोढाक को देखकर स्वच्छन्दा के हृदय में कामभावना जागृत होती है और स्वच्छन्दा का सोढाक के साथ संभोग करना आदि अनुभाव है चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

बीसवीं कथा : मे सूर नामक किसान की पत्नी केलिका आश्रय है और ब्राह्मण आलम्बन। ब्राह्मण को देखकर केलिका के हृदय ने काम भावना जागृत होती है और केलिका का ब्राह्मण के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

इक्कीसवीं कथा : में वणिक् पत्नी मन्दोदरी आश्रय है और राजपुत्र आलम्बन। राजपुत्र को देखकर मन्दोदरी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। राजपुत्र के साथ मन्दोदरी का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

बाईसवीं कथा : में किसान की पत्नी माढुका आश्रय हैं और सूरपाल आलम्बन। सूरपाल को देखकर माढुका के हृदय में काम भावना जागृत होती है। सूरपाल का माढुका के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

तेईसवीं कथा : में बणिक् पुत्र राम आश्रय है। कलावती नामक वेश्या आलम्बन। कलावती को देखकर राम के हृदय में कामभावना जागृत होती है और राम का कलावती के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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चौबीसवीं कथा : मे देवक नामक पुरूष आश्रय है। धनिक की पत्नी सज्जनी आलम्बन। सज्जनी को देखकर देवक के हृदय में कामभावना जागृत होती है। देवक का सज्जनी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष, आदि व्यभिचारीभाव हैं।

छब्बीसवीं कथा : में देवसाख्य ग्रामाध्यक्ष और पुत्र धवल आश्रय है। क्षेमराज की पत्नी रत्नादेवी आलम्बन है। रत्नादेवी को देखकर उन दोनो के हृदय में कामभावना जागृत होती है। उन दोनों का रत्नादेवी के घर जाना और सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सत्ताईसवीं कथा : में वणिक् पत्नी मोहिनी आश्रय है। कुमुख नामक धूर्त आलम्बन है। कुमुख को देखकर मोहिनी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। मोहिनी का कुमुख के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

अट्ठाईसवीं कथा : मे प्रभाकर नामक ब्राह्मण आश्रय है। जरसाख्य की पत्नी देविका पुंश्चली आलम्बन है। देविका को देखकर प्रभाकर के हृदय में कामभावना जागृत होती है। प्रभाकर का देविका के साथ से सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

उन्तीसवीं कथा : में वणिक् पत्नी सुन्दरी आश्रय है। मोहन नामक उपपति आलम्बन है। मोहन को देखकर सुन्दरी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। मोहन का सुन्दरी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव हैं। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

इकतीसवीं कथा : में वीर रस का वर्णन प्राप्त होता है खरगोश आश्रय है ,पिङ्गल नामक सिंह आलम्बन है। खरगोश का सिंह के पास जाना, सिंह को कुयें में उसकी परछाई दिखाना आदि अनुभाव है। श्रय, धृति, चपलता, आवेश आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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बत्तीसर्वीं कथा : में सोहड़ की पत्नी राजिनी आश्रय है। संकेत किया गया उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर राजिनी के हृदय में कामभावना जागृत होती है राजिनी का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चौतीसर्वीं कथा : में शम्भु नामक विप्र आश्रय है। खेती की रखवाली करने वाली सुन्दर बालिका आलम्बन। बालिका को देखकर शम्भु के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शम्भु का बालिका के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

पैंतीसवी कथा : मे शम्बक नामक वणिक् आश्रय है। बर्तन बेचने वाले बनिया की पत्नी आलम्बन । वणिक् पत्नी को देखकर शम्बक के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शम्बक का वणिक् पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सैंतीसर्वीं कथा : में सूरपति की पुत्री सुभगा आश्रय है। पूर्णपाल नामक हलवाला आलम्बन। पूर्णपाल को देखकर सुभगा के हृदय में कामभावना जागृत होती है। सुभगा का हलवाहे के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

अड़तीसर्वीं कथा : मे प्रियंवद नामक विप्र आश्रय है। वणिक् पत्नी पुँश्चली आलम्बन। पुँश्चली को देखकर ब्राह्मण के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। प्रियंवद का वणिक् पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

चालीसर्वीं कथा . मे कुबुद्धि आश्रय है सुबुद्धि की पत्नी आलम्बन। सुबुद्धि की पत्नी को देखकर कुबुद्धि के हृदय में कामभावना जागृत होती है। कुबुद्धि का मित्र की पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारभाव हैं।


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बयालीसवीं कथा : में भय रस का वर्णन प्राप्त होता है। सिंह आश्रय है और व्याघ्रमारी आलम्बन है। डरना, भागना सिंह का व्याघ्रमारी के पास जाना आदि अनुभाव है। त्रास, आवेग आदि व्याभिचारीभाव हैं।

तैंतालीसवीं कथा : में भी भय रस का वर्णन मिलता है। शृंगाल आश्रय है और व्याघ्रमारी आलम्बन है। आलम्बन की चेष्टायें जैसे बाघ खाने के लिये अधिक क्रोधित होना आदि उद्दीपन विभाव है। व्याघ्रमारी द्वारा बाघ खाने के लिये झपटना आदि अनुभाव है। शंका, असूया, मद, आवेग आदि व्याभिचारीभाव हैं।

पैंतालीसवीं कथा : में विष्णु नामक रति लोलुप ब्राह्मण आश्रय है। रति प्रिया नामक गणिका आलम्बन। रतिप्रिया को देखकर ब्राह्मण के हृदय में कामभावना जागृत होती है। रतिप्रिया का ब्राह्मण के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

तिरपनवीं कथा : में दोहड की पत्नी देविका आश्रय है। उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर देविका के हृदय में काम भावना जागृत होती है। देविका का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सत्तावनवीं कथा : में राजा की पत्नी चन्द्रलेखा आश्रय है। शुभंकर नामक राजपण्डित आलम्बन। राजपण्डित को देखकर चन्द्रलेखा के हृदय में कामभावना जागृत होती है। चन्द्रलेखा का राजपण्डित के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

अट्ठावनवीं कथा : में परपुरुषों में आसक्त रहने वाली राजड पत्नी दुःशीला आश्रय है और गणेश जी आलम्बन हैं। दुःशीला द्वारा नृत्य आदि करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष चपलता आदि व्याभिचारीभाव हैं।

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उनसठवीं कथा : में राजपूत की पत्नी रूक्मिणी आश्रय है। परपुरूष आलम्बन। परपुरूष को देखकर रूक्मिणी के हृदय में कामभावना जागृत होती है। परपुरूष के साथ रूक्मिणी का सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

इकसठवीं कथा : में वणिक् पत्नी तेजुका आश्रय है और परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर तेजुका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। परपुरूष के साथ तेजुका का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

बासठवीं कथा : में राजपूत की पत्नियाँ शोभिका और तेजिका आश्रय हैं और पर पुरूष आलम्बन है परपुरूष को देखकर दोनों के हृदय में कामभावना जागृत होती है। परपुरूष के साथ दोनों का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चौसठवीं कथा : में सोमराज की पत्नी मण्डुका आश्रय है। परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर मण्डुका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। मण्डुका का पुरपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष चपलता आदि व्यभिचारीभाव हैं।

अड़सठवीं कथा : में केशव नामक ब्राह्मण आश्रय हैं। वणिक् पुत्री आलम्बन। वणिक्-पुत्री को देखकर केशव के हृदय में कामभावना जागृत होती है। वणिक् पुत्री का केशव के ओंठ चूमना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

उनहत्तरवीं कथा : में वणिक् पत्नी वेजिका आश्रय है उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर वेजिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। उपपति के साथ वेजिका का सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सत्तरवीं कथा : में गन्धर्व रूप धारण करने वाला विद्याधर आश्रय है। गन्धर्व पत्नी मदनमञ्जरी आलम्बन। मदनमञ्जरी को देखकर विद्याधर के हृदय में कामभावना जागृत होती है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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अन्ततोगत्वा हम यही कह सकते है कि शुकसप्तति में वर्णित 70 कहानियों में प्राय अधिकांश कहानियाँ श्रृंगार रस, विशेष रूप से संयोग श्रृंगार से परिपूर्ण हैं। सिर्फ कुछ ही कथाओं में भय,वीर आदि रसों के अल्प रस का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं। जिनमे स्पष्ट रूप से रस का चित्रण नहीं है इसलिए उन कहानियो का वर्णन नही किया गया है।

(द) अलंकार :

'अलंङ्कारोति इति अलङ्कार.' अथवा 'अलंङ्क्रियते अनेन इति अलंकारः' अर्थात् अलङ्कार वह है, जो किसी वस्तु की शोभा बढ़ाये अथवा जिसके द्वारा किसी वस्तु की शोबाबढाई जाये।

जिस प्रकार लोक व्यवहार में कटक, कुण्डल आदि आभूषण पुरूष या रमणी के शारीरिक शोभा को बढाकर उसके भीतरी सौन्दर्य को भी निखार देते हैं, उसी प्रकार काव्य में वर्णित अलंकार कविता-कामिनी के शरीर स्थानी शब्द और अर्थ की शोभा बढाकर उसके माध्यम से काव्यात्मा रस के भी उपस्कारक होते हैं।

वस्तुत. काव्य में वर्णित अलङ्कार सम्पूर्ण काव्य के शोभावर्धक न होकर, काव्य में वर्णित, काव्य मे निहित किसी तत्व विशेष की शोभा बढ़ाते हैं। अतः आचार्य मम्मट अलङ्कार को परिभाषित करते हुए कहते हैं-

उपकुर्वन्ति त सन्त येऽङ्द्वारेण जातुचित्।

हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः।¹

शुकसप्तति में काव्यात्मा रस के उपस्कारक रूप में अलंङ्कारों का वर्णन हुआ है। कहीं भी अलङ्कारों के अत्यधिक प्रयोग के कारण बोझिल कविता दृष्टिगोचर नहीं होती। सरल प्रवृत्ति के अलङ्कारों का प्रयोग कर कवि ने भाषा को सहज गति प्रदान


1 काव्य प्रकाश, अष्टम उल्लास, सूत्र स० 87, पृष्ठ सं०, 381

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की है। शुकसप्तति में कहीं भी कठिन प्रकार के अलंङ्कारों का प्रयोग नहीं हुआ है। उपमा, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास, मालादीपक, निर्दशना, प्रतिवस्तूपमा आदि सरल प्रवृत्ति के अलंङ्कारों का वर्णन मिलता हैं।

उपमा का लक्षण -

साधर्म्यमुपमा भेदे ।¹

उपमान तथा उपमेय का भेद होने पर उनके साधर्म्यका वर्णन उपमा कहलाता है।

शुकसप्तति में उपमा :

शुकसप्तति में यूँ तो उपमा का प्रयोग पग-पग पर हुआ है। सामान्य से सामान्य बात को भी व्यक्त करने के लिए कवि ने उपमा का आश्रय लिया है किन्तु उन कथनो में उपमा का कोई विशेष सौन्दर्य लक्षित नही होता है। अतएव कुछ विशेष उदाहरण दिये जा रहे हैं जिनमें यत्किंच्यत् उपमा का सौन्दर्य दर्शनीय है–

भोगिनः कञ्चुकासक्ताः क्रूराः कुटिलगामिनः ।
दुःखोसर्पणीयाश्च राजानो भुजगा इव ।²

भोगी (1. भोग भोगने वाले, 2- फणवाले), कञ्चुक (1. कवच 2. केचुल) से आवृत्त, क्रूर, कुटिलगामी (1. कुटिलतापूर्वक व्यवहार करने वाले 2. टेढ़े चलने वाले) राजा, सर्पों के समान बडी कठिनाई से प्रापणीय (अनुकूल) होते हैं।

गच्छ देवि न ते दोषो गच्छन्त्याः परवेश्मनि ।
यदि काचिच्छरीरे ते बुद्धिः सर्षपचौरवत् ।³

देवि जाओ। पराये घर जाने में तुम्हें दोष नहीं लगेगा किन्तु यदि तुममें उस सरसों चुराने वाले के समान बुद्धि हो।


¹ काव्य प्रकाश दशम् उल्लास, सूत्र स० 124, पृष्ठ स० 443
² शुकसप्तति, श्लोक सं० 35, पृष्ठ सं० 33
³ शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 115 पृष्ठ स० 97

[ 155 ]

शशिना हरिणा चैव बलिना कुशभूभुजा।
कुशशक्तिच्छलत्यागसम्पद्यस्य न खण्डयते।¹

चन्द्रमा, विष्णु, बलि और राजा कुश क्रमश. जिसकी शीतलता, छल,त्याग और सम्पत्ति को खण्डित नहीं करते अर्थात् शीतलता में वह चन्द्रमा के समान, छल में विष्णु के समान, त्याग में बलि के समान और सम्पत्ति में राजा कुश के समान था।

प्राचीमुखे विभातीन्दुरुदयाद्रिशिरः स्थितः।
द्वीपस्त्रिभुवनस्येव प्रच्छन्नस्य तमिस्त्रया।²

पूर्व दिशा मे उदयाचल के अग्रभाग पर स्थित चन्द्रमा अन्धकाराच्छन्न त्रिभुवन का दीप सा शोभित हो रहा है।

कहीं-कहीं पात्रों के गुणों का वर्णन करने के लिए कावे ने उपमा का सहारा लिया है जैसे-

किं तस्य वर्ण्यते राज्ञः प्रजापालनशालिनः।
यस्मिंल्लोके न दृष्टा हि दोषा रविकरैरिव।³

उस प्रजापालक राजा का क्या वर्णन करें? जिसके लोक में शासन करते समय दोष नही दिखाये देते, जैसे सूर्य-किरणो से रात लुप्त हो जाती है।

व्रज देवि न तेऽयुक्तं ब्रजनं गजगामिनी।
व्याघ्रमारीव बुद्धिस्ते द्वितीयापि यदि स्थिरा।।⁴

गजगामिनी! यदि व्याघ्रमारी की द्वितीय बुद्धि की भाँति तुम्हारी भी बुद्धि स्थिर हो तो जाओ, तुम्हारा जाना अनुचित नहीं है।


1 शुकसप्तति, श्लोक सं० 138 पृष्ठ स० 116
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 146 पृष्ठ सं० 119
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 139 पृष्ठ स० 116
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 212 पृष्ठ स० 182

[ 156 ]

उत्पन्ना युक्तिकार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते।
स एव तरते दुर्ग जलान्ते वानरो यथा।।¹

संकट के समय युक्ति की अपेक्षा रखने वाले कार्यों में जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वही विपत्ति को पार कर जाता है, जैसे जल के भीतर वानर ने किया था।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः।²

जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नही करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।

उत्प्रेक्षा का लक्षण :

'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् ।³

किसी प्रकृत अर्थात प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) की अप्रस्तुत (उपमान) के रूप में सम्भावना करना ही उत्प्रेक्षा है। जैसे-शुकसप्तति में प्रयुक्त उपमा के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

मणिकुट्टिममार्गेषु शोभते रविविस्तरः।
शेषफणमणिरागो वसुधामिवोपागतः।⁴

मणिमय भूमितल वाले मार्गों पर पड़ी सूर्य की किरणें ऐसी शोभित होती हैं मानो शेषनाग के सिरो की मणियों की चमक और रंग सर्वत्र भूमि पर फैला हुआ है।

उदयाचलमारूढो भाति चन्द्रो निशामुखे।
यामिनीवनितोत्सङ्गः शुल्क. कृष्णशिरःस्थितः।।⁵


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 319, पृष्ठ स० 268
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 123, पृष्ठ स० 106
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 139, पृष्ठ स० 460
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 137, पृष्ठ स० 115
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 147, पृष्ठ सं० 119

[ 157 ]

सायंकाल उदयाचल पर आरूढ़ चन्द्रमा शोभित हो रहा है, मानों रात्रिरूप नायिका के उत्संग में रजत मुद्रा है जिसका शिरोभाग काला है।

अर्थान्तरन्यास का लक्षण :

सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा।।¹

जहाँ विशेष द्वारा सामान्य का अथवा सामान्य द्वारा विशेष का, कारण द्वारा कार्य का अथवा कार्य द्वारा कारण का—साधर्म्य अथवा वैधर्म्य के माध्यम से समर्थन किया जाता है वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। जैसे—

रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्रायः सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।²

राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीड़ा में चारों भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते हैं।

अप्रधानः प्रधानः स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।³

यदि राजा की सेवा करें तो साधारण व्यक्ति भी असाधारण तथा मुख्य हो जाय। यदि राजा की सेवा करने से वञ्चित रहा तो असाधारण तथा मुख्य व्यक्ति भी साधारण एव नगण्य हो जाता है।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 164, पृष्ठ स० 500
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 38, पृष्ठ स० 34-35

[ 158 ]

दीपक का लक्षण :

सकृद्वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्।
सैव क्रियासु वह्वीषु कारकस्येति दीपकम्।¹

जहाँ अप्रस्तुत (अप्रकृत अथवा उपमान) तथा प्रस्तुत (प्रकृत अथवा उपमेय) पदार्थों मे एक ही धर्म का सम्बन्ध हो अथवा (जहाँ) अनेक क्रियाओं का एक ही कारक हो, वही दीपक अलङ्कार होता है। जैसे–

हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन्नपि दुर्जनः।
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः।²

हँसता हुआ भी राजा, सम्मान करता हुआ भी दुष्ट, स्पर्श करता हुआ भी गज, सूँघता हुआ भी सर्प, प्राणों को हरता है।


मालदीपक का लक्षण :

मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।³

यदि पूर्व–पूर्व (वस्तु) उत्तर–उत्तर की उपकारक (गुणाधायक) हो तो मालादीपक अलङ्कार होता है। जैसे–

उत्तमाः स्वगुणैः ख्याता माध्यमाश्च पितुर्गुणैः।
अधमा मातुलैः ख्याता श्वशुरैश्चाधमाधमाः।⁴

उत्तम व्यक्ति अपने गुणो से, मध्यम व्यक्ति पिता के गुणों से, अधम व्यक्ति मामा के गुणो से तथा अधमों में अधम–महा अधम व्यक्ति ससुर के गुणों से प्रसिद्धि प्राप्त करते है।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र सं० 155, पृष्ठ स० 487
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 36, पृष्ठ स० 33-34
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 156, पृष्ठ स० 489
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 66, पृष्ठ स० 52

[ 159 ]

निदर्शना का लक्षण :

अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमापरिकल्पकः निदर्शना।¹

जहाँ वस्तुओ का परस्पर सम्बन्ध सम्भव (अबाधित) अथवा असम्भव (बाधित) होता हुआ उनके बिम्ब-प्रतिविम्बभाव का बोधन करे वहाँ निदर्शना अलङ्कार होता है।

जैसे-

विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हन्तुं किं नाम पौरुषम्।।²

विश्वास करने वाले व्यक्ति को धोखा देना कौन सा पाण्डित्य है? अंक में स्थित सोये व्यक्ति को मारना कौन सी पौरुष की बात है?

रूपक का लक्षण :

तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।³

उपमान और उपमेय का (जिनका भेद प्रसिद्ध है उनका सादृश्यातिशयवश) जो अभेद (वर्णन) है वह रूपक अलंकार है। जैसे-

धूर्तोऽसौ मत्सुतालुब्धो धनहीनो भवत्यसौ।
मनोभवग्रहग्रस्तो असमञ्जसमीदृशम।⁴

यह धनहीन धूर्त कामदेव रूप ग्रह से ग्रस्त हो मेरी पुत्री पर लुब्ध होता है- उसके साथ रमण करना चाहता है। इस प्रकार यह युक्ति युक्त बात नहीं है (जो हमें चोरी लगा रहा है)।

सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां
लज्जां तावद्विधत्ते विनयमति समालम्बते तावदेव।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 148 पृष्ठ स० 474
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 71 पृष्ठ स० 55-56
3 काव्यप्रकाश, सूत्र स० 138 पृष्ठ स० 463
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 72 पृष्ठ स० 56

[ 160 ]

भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते।
यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति।¹

पुरूष तभी तक सन्मार्ग पर ठहरा रहता है, तभी तक इन्द्रियों के निरोध में समर्थ होता है, तभी तक लज्जा करता है, तभी तक विनय अपनाये रहता है, जब तक (कर्णपर्यन्त) खिंचे भ्रूरूप चाप से छोडे गये, लोचनपर्यन्त विस्तृत, नील बरौनीरूप पक्षवाले, धैर्य को विनष्ट करने वाले, सुन्दरियों के ये नेत्ररूप बाण हृदय में नहीं चुभते है।

अत्रान्तरे विशालाक्षि चन्द्रो हन्तुं तमोरिपुम्।
उदयाद्रिशिरः स्थातुमुद्यतोंऽशुभटैर्वृतः।।²

हे आयत लोचने! इस बीच में अन्धकार रूप शत्रु का विनाश करने के लिए चन्द्रमा किरण रूप योद्धाओं समेत उदयाचल के शिखर पर स्थित होने के लिये उद्यत हुआ।

प्रतिवस्तूपमा का लक्षण :

प्रतिवस्तूपमा तु सा।
सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थितिः।³

जहा एक ही साधारणधर्म को दो वाक्यों में दो बार (भिन्न शब्दों से) कहा जाय वह प्रतिवस्तूमा (अलंङ्कार) होती है। जैसे-

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्राम जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवी त्यजेत्।।⁴

कुल की रक्षाके लिये एक को त्याग देना चाहिये। गाँव की रक्षा के लिये कुल को त्याग देना चाहिए। जनपद (देश) की रक्षा के लिये गाँव को तथा अपनी रक्षा के लिये पृथिवी (देश) को त्याग देना चाहिये।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 118, पृष्ठ स० 99-100
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 145, पृष्ठ स० 119
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 153, पृष्ठ स० 484
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 37, पृष्ठ स० 34

[ 161 ]

अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार का लक्षण·

अप्रस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुतताश्रया।¹

प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति कराने वाली (प्रस्तुताश्रया) जो अप्रस्तुत (अर्थ) की प्रशंसा (वर्णन) है वह ही अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है। जैसे—

द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः।।²

अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात शीघ्र लाकर मिला देता है।

(य) “छन्द” :

संस्कृत साहित्य में काव्य की मुख्यतया दो विधायें मानी गई हैं— (1) पद्य काव्य (2) गद्य काव्य और इन्हीं दोनों काव्यों के मिश्रण से चम्पूकाव्य की रचना हुई है।

काव्य के अपेक्षित उपादान—सगुण, दोष–रहित तथा अलङ्कृत शब्दार्थ माने गये हैं, परन्तु पद्य काव्य के लिये जिस उपादान की आवश्यकता पड़ती है वह है 'छन्द' अर्थात् पद्यकाव्य मे गुणो के अतिरिक्त मात्रा, वर्ण, संख्या, यति, विराम, लय आदि की भी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति छन्दोनियम द्वारा होती है। पद्य का ही दूसरा नाम छन्द है।

छन्द दो प्रकार के माने गये गये हैं—

(1) वैदिक छन्द (2) लौकिक छन्द।

लौकिक छन्दों की उत्पत्ति वैदिक छन्दों से हुई है तथापि लौकिक छन्द वैदिक छन्दो से अधिक भिन्न होते हैं। वैदिक छन्दों में पादों की रचना अक्षर संख्या पर निर्भर है, उनमे लघु, गुरू, वर्ण तथा गण आदि का विचार नहीं किया जाता है। इसके विपरीत लौकिक छन्दों में ये सभी नियम अनिवार्य हैं, साथ ही प्रत्येक लौकिक छन्द में


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 150, पृष्ठ सं० 476
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 61, पृष्ठ स० 47

[ 162 ]

चार पाद होते हैं जबकि वैदिक छन्दो में त्रिपाद वाले और पंचपाद वाले भी छन्द हैं। वैदिक छन्दो में अक्षरो की संख्या सन्धि तोडकर पूरी कर ली जाती है, जहाँ कहीं भी अक्षर नियमित संख्या से कम पाये जाते हैं जैसे-‘वरेण्यम’ में वरेणि+यम’ मान लिया जाता है किन्तु लौकिक छन्दों में वर्ण के लिये ऐसा नहीं माना जा सकता। वैदिक छन्दो के अन्तर्गत अनुष्टुप और त्रिष्टुप छन्द आते हैं। शेष लौकिक छन्दों के अंतर्गत हैं। जैसे- बसन्ततिलका, मालिनी, इन्द्रवज्रा आदि।

संस्कृत छन्दों की रचना मात्राओं से की जाती है स्वरों से नहीं। प्रत्येक लौकिक-छन्द में चार पाद होते हैं और प्रत्येक पाद में यदि वह समवृत है तो नियमित वर्ण ही होगे और वर्णों में भी लघु गुरू नियमानुसार ही होते हैं। लघु का चिन्ह (I) और गुरू का चिन्ह (s) है।

मात्रिक छन्दों में मात्राओं की गणना की जाती है वर्णों की नहीं जबकि वर्णवृत्तों में लघु गुरू वर्णों की गणना की जाती है।

छन्द योजना काव्य-शिल्प का महत्वपूर्ण अंङ्ग हैं काव्य की आत्मा रस का महत्वपूर्ण सम्बन्ध मानव अन्तस की भाव तरंङ्ग से है। मनोवेग काव्य में प्रयुक्त शब्दों की स्वर लहरी से उद्धवेलित होते हैं। यह स्वर लहरी मधुर, ललित एवं पुरूषलय की व्यञ्जक होती है और यही लय ही छन्द की आत्मा है। इस प्रकार छन्द-योजना का रस व्यञ्जना से घनिष्ठ सम्बन्ध है। संस्कृत काव्यशास्त्रों में छन्दों की प्रकृति पर गहराई से विचार किया गया है। आचार्य क्षेमेन्द्र ने छन्दों के विषय में विशेष रूप से विचार किया और इस शाश्वत सत्य का उद्घाटन किया कि अमुक छन्द अमुक भाव अथवा रस या वस्तु वर्णन के लिये विशेष उपयुक्त है।

शुकसप्तति यद्यपि कथा-प्रधान (गद्य) ग्रन्थ है तथापि कवि ने इसमें छन्दों का यत्र-तत्र प्रयोग किया है। इस ग्रन्थ में प्रयुक्त छन्द वर्णनीय वस्तु के अनुसार प्रयुक्त हुये हैं। इनमें से कुछ वैदिक हैं कुछ लौकिक हैं, जिनका विवेचन इस प्रकार है-

[ 163 ]

अनुष्टुप (प्रत्येक चरण में आठ अक्षर) :

पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः।
षष्ठ गुरू विजानीयादेतत्पद्यस्य लक्षणम्।।
पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तम द्विचतुर्थयोः
गुरू षष्ठ च जानीयात् शेषेष्वनियमो मतः।¹

अर्थात् अनुष्टुप छन्द के चारों चरणों मे पञ्चम वर्ण लघु होता है, द्वितीय और चतुर्थ चरणों का सत्तम वर्ण भी लघु होता है एव चारो चरणों में षष्ठ वर्ण गुरू होता है।

विषय वस्तु के अनुसार अनुष्टुप का वर्णन सुवृत्त तिलक में इस प्रकार किया गया है-

आरम्भे सर्गबन्धस्य कथाविस्तारसङ्ग्रहे।
समोपदेशवृत्तान्ते सन्तः शसन्त्यनुष्टुभम्।।

किसी सर्ग के प्रारम्भ में कथा के विस्तार संग्रह करने तथा उपदेश या वृतान्त कथन मे अनुष्टुप छन्द के प्रयोग की प्रशंसा विद्वानगण करते हैं। अनुष्टुप का स्वभाव इतिवृत्त वर्णन करने में बड़ा सुविधा पूर्ण होता है।

शुकसप्तति मे कथाओं के मध्य में किसी तथ्य या बात के समर्थन के प्रसङ्ग में अथवा आदर्श सम्बन्धित, कथनो में प्रसङ्ग में अथवा किसी तथ्य को प्रमाणिक सिद्ध करने के प्रसग मे अनुष्टुप का प्रयोग किया गया है। जैसे-

पित्रोस्ते दुःखिनोर्दुःखात्पतत्यश्रुचयो भुवि।
तेन पापेन ते वत्स पतनं देवशर्मवत् ।²

अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि पुत्र के द्यूतादि व्यसनों में आसक्त रहने से माता-पिता को असहय दुःख उत्पन्न होता है।


1 छन्दोमजरी 4/7
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 2, पृष्ठ स० 3

[ 164 ]

निजान्वयप्रणीतं यः सम्यग्धर्मं निषेवते।
उत्तमाधममध्येषु विकारेषु पराङ्मुखः।¹
स गृही स मुनिः साधु स च योगी स धार्मिक ः।
पितृशुश्रूषको नित्यं जन्तुः साधारणश्च यः।²

अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह आदर्श दर्शाया गया है कि सभी प्रकार के विकारो से रहित होकर जो मनुष्य अपने कुल का धर्मपूर्वक पालन करता है वही सच्चा गृहस्थ है, साधु है।

व्याघेन बोधितस्तेन स ययौ गृहमात्मसमः
अभवत्कीर्तिमॉल्लोके परतः कीर्तिभाजनम् ।³

अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि पूज्य का सम्मान न करने से मनुष्य को सम्मान की प्राप्ति नहीं होती।

तावत्पिता तथा बन्धुर्यावज्जीवति मानवः।
मृतो मृत इति ज्ञात्वा क्षणात्स्नेहो निवर्तते ।।⁴

इस छन्द के द्वारा प्रस्तुत श्लोक मे समझाया गया है कि जीवित रहने पर ही अपनो का स्नेह रहता है, मरने पर नहीं।

कौतुकान्वेषिणो नित्यं दुर्जना व्यसनागमे।
मासोपवासिनी यद्वद्वणिक्पुत्रकचग्रहे ।।⁵

उपरोक्त अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि विपत्ति आ पड़ने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं, कोई सहायता नहीं करता है।

प्रपच्छ सा तदा सार्धं पुश्चलीभिः कृतादरा।
ससम्भ्रमा जगादेदं किमिदं भाषितं शुकः।⁶


1 शुकसप्तति., श्लोक सं० 3, पृष्ठ सं० 5
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 4, पृष्ठ सं० 5
3 शुकसप्तति, श्लोक सं० 6, पृष्ठ सं० 6
4 शुकसप्तति, श्लोक सं० 7, पृष्ठ स० 7
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 8, पृष्ठ सं० 9
6 शुकसप्तति., श्लोक सं० 9, पृष्ठ सं० 9

[ 165 ]