शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
कथयन्ति न याचन्ते भिक्षाहारा गृहे गृहे।
अर्थिभ्यो दीयता नित्यमदातु. फलमीदृशम्।।¹
उपरोक्त छन्द के माध्यम से बतलाया गया है कि याचक को दान न देने वाला भीयाचक बनकर भटकता है।
बुद्धिरस्ति यदैषा ते व्रज सुभ्रु परान्तिकम्।
भज निद्रां विशालक्षि मान्यथा स्वं विडम्बय।|²
गच्छ देवि किमाश्चर्य यत्र ते रमते मन.।
नृपवद्यदि जानासि परित्राणं त्वमात्मन.।³
इस अनुष्टुप छन्द में यही दर्शाया गया है कि जिसका मन जहाँ रमता है वह वहीं जाता है कही और नही।
कृतावज्ञः पुरा देवि वृद्धवाक्यपराङ्मुखः।⁴
पतितो ब्राह्मणोऽनर्थे विषकन्याविवाहने।।
इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि बड़े बुजुर्गों के वचनों का तिरस्कार करने वाला घोर सङ्कट में पडता है।
अविदग्धः पति स्त्रीणां प्रौढानां नायकोऽगुणी।
गुणिनां त्यागिना स्तोको विभवश्चेति दुःखकृत्।।⁵
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि कामकलानिपुण पत्नी का मूर्ख पति, प्रौढ स्त्री का मूर्ख नायक, दानशील गुणीजन का अल्पधन-ये तीनों दुःखदायी होते है।
तथापि कामिनीलुब्धो धिक्कृतः साधुभिस्तदा।।
तामेवादाय चलितस्तत्कृते निहतः पथि।।⁶
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 17, पृष्ठ स० 16
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 19 पृष्ठ स० 18
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 20 पृष्ठ स० 18
4 शु० स०, श्लोक स० 22, पृष्ठ स० 23
5 शु० स०, श्लोक स० 23, पृष्ठ सं० 24
6 शु० स०, श्लोक स० 28, पृष्ठ स० 29
[ 166 ]
नदीनां नखिनाञ्चैव शृङ्गिणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ।।¹
इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि नदियों, नखधारी, सिंहादि, शृंगधारी, भेडा आदि पशुओं, शस्त्रधारी पुरूषो, स्त्रियों एवं राजाओ का विश्वास नहीं करना चाहिए।
भोगिनः कञ्चुकासक्ताः क्रूराः कुटिलगामिनः।
दुःखोपसर्पणीयाश्च राजानो भुजगा इव।।²
इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि भोगी, कञ्चुकावृत, क्रूर, कुटिलगामी, राजा, सर्पों के समान बडी कठिनाई से प्रापणीय होते हैं।
आरोहन्ति शनैर्भृत्या धुन्वन्तमपि पार्थिवम्।
कोपप्रसादवस्तूनां विचिन्वन्ति समीपपगाः।।³
इन अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह आदर्श दर्शाया गया है कि जिस प्रकार से वृक्ष पर चढ़ने वाला व्यक्ति गिरने का भय त्यागकर धीरे-धीरे उस पर चढ़ जाता है और यथाभाग्य मधुर फलो का चयन करता है उसी प्रकार अप्रसन्न राजा के पास अपनी पहुँच बनाने वाले व्यक्ति यथाभाग्य प्रसादफल प्राप्त करते हैं।
रोगैर्ग्रहैर्नृपर्यस्तो या न वेत्ति जडक्रियः।
मध्यमन्त्रमुपायं च सोऽवश्यं तात न स्थिरः ।।⁴
उपरोक्त अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि जो व्यक्ति आलसी एवं दीर्घसूत्री रोगग्रस्त होने पर युक्ताहार-विहार, ग्रहग्रस्त होने पर मन्त्र, और नृपग्रस्त होने पर साम-दानादि उपाय नही करता वह नष्ट हो जाता है।
1 शु० स०, श्लोक स० 34, पृष्ठ स० 33
2 शु० स०, श्लोक स० 35, पृष्ठ स० 33
3 शु० स०, श्लोक स० 39, पृष्ठ स० 35
4 शु० स०, श्लोक स० 43, पृष्ठ स० 37
[ 167 ]
मा वृकोदर पादेन एकादशचमूपतिम्।
पञ्चानामपि यो भर्ता नासाप्रकृतिमानवी।।¹
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि पाँच आदमियों का पोषण करने वाला भी महान होता है दुर्योधन के पास तो ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी।।
प्रदोषसमयेऽन्यस्मिन्कामिनी काममोहिता।
विनयेन शुकं प्राह गच्छामि यदि मन्यसे।।²
विरञ्चिरपि कामार्तःस्वसुतामभिलाषुकः।
दृश्यतेऽद्यापि वियति हारिणीं तनुमाश्रितः।।³
यह अनुष्टुप छन्द यह उपदेश देता है कि कामपीडित व्यक्ति किसी में भी साभिलाष हो सकता है इससे उसे पाप या कलङ्क नहीं लगता।
तयैवं बोधितो मूर्खः स यावद्रमते न ताम्।
फूत्कृतं मुषितास्मीति त्रायतां त्रायतामहो।।⁴
व्रज देवि सुखं भुङ्क्ष्व अर्धभुक्ते पतौ यथा।
कृत राजिकया चित्तमुत्तरं धूलिसयुतम्।।⁵
युक्तमेव विशालाक्षि पर रन्तुं यदृच्छया।
यद्यायाते पतौ वेत्सि धनश्रीरिव भाषितुम।।⁶
न स्नाति न च सा भुङ्क्ते न जल्पति सखीसमम्।
निरस्ताशेषसस्कारा स्वदेहेऽपि पराङ्मुखी।।⁷
मलयानिलमारूढ कोकिलालापडिण्डिमः।
1 शु० स०, श्लोक स० 50, पृष्ठ स० 40
2 शु० स०, श्लोक सं० 83, पृष्ठ स० 69
3 शु० स०, श्लोक स० 96, पृष्ठ स० 76
4 शु० स०, श्लोक स० 98, पृष्ठ स० 76
5 शु० स०, श्लोक स० 100, पृष्ठ स० 80
6 शु० स०, श्लोक स० 101, पृष्ठ स० 82
7 शु० स०, श्लोक स० 102 , पृष्ठ स० 83
[ 168 ]
मल्लिकाामोददूतश्च मधुपारवमङ्गलः ।।¹
अन्यदा तु समायतो वसन्त कालराट् क्षितौ।
मनोऽपि विक्रिया यस्मिन्याति संयमिनां किल ।।²
सत्यमेव त्वयाभाणि कर्तव्यं यन्मनोऽनुगम्।
मनस्तु मुग्धिका यद्वदशक्यान्खेदयत्यलम् ।।³
इस अनुष्टुप के माध्यम से यही कहा गया है कि मनोवाञ्छित कार्य से ही खुशी प्राप्त होती है अन्यथा खिन्नता प्राप्त होती है।
गच्छ देवि न ते दोषो गच्छन्त्याः परवेश्मनि।
यदि काचिच्छरीरे ते बुद्धि सर्षपचौरवत् ।।⁴
कुरु यद्रोचते भीरु यदि कर्तुं त्वमीश्वरा।
यथा सन्तिकया भर्ता स्वच्छन्दा च विमोचिता ।।⁵
गच्छ देवि मनो यत्र रमते ते नरान्तरे।
केलिकावद्यदा वेत्सि पतिवञ्चनमद्भुतम् ।।⁶
अनुरागो वृथा स्त्रीषु गर्वो वृथा तथा।
प्रियोऽहं सर्वदा ह्यस्या ममैषा सर्वदा प्रिया ।।⁷
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि स्त्रीविषयक अनुराग व गर्व व्यर्थ होता है।
ये जात्यादिमहोत्साहा, नोपगच्छन्ति पार्थिवम्।
तेषामामरणं भिक्षा प्रायश्चित्त विनिर्मितम् ।।⁸
1 शु० स०, श्लोक स० 103, पृष्ठ स० 83
2 शु० स०, श्लोक स० 104, पृष्ठ स० 83
3 शु० स०, श्लोक स० 110, पृष्ठ स० 91
4 शु० स०, श्लोक स० 115, पृष्ठ स० 97
5 शु० स०, श्लोक सं० 117, पृष्ठ सं० 98
6 शु० स०, श्लोक स० 119, पृष्ठ स० 101
7 शु० स०, श्लोक स० 322, पृष्ठ स० 272
8 शु० स०, श्लोक सं० 42, पृष्ठ स० 36
[ 169 ]
विवाहे पार्वतीं दृष्ट्वा हरस्य हरवल्लभाम्।
चस्कन्द रेतस्तस्यापि, बालखिल्यास्तदुद्भवाः।।¹
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह बतलाया गया है राजा के समीप न जाने से मनुष्य किस दशा को प्राप्त हो जाता है और बालखिब्य ऋषि की उत्पत्ति कैसे हुई।
शार्दूलविक्रीडित (प्रत्येक चरण में उन्नीस अक्षर) :
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।²
जिस छन्द के प्रत्येक चरण मे क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण तथा अन्त मे एक गुरू वर्ण आये एवं 12 तथा 7 सख्यक अक्षरों पर यति हो, उसे शार्दूलविक्रीडित छन्द कहा जाता है।
वैद्य पानरतं नटं कुपठितं मूर्खं परिव्राजकं
योधं कापुरुषं विटं विवयसं स्वाध्यायहीनं द्विजम्।
राज्यं बालनरेन्द्रमन्त्रिरहित मित्रं छलान्वेषि च
भार्या यौवनगर्वितां पररता मुञ्चन्ति ये पण्डिताः ।।³
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि पण्डितजनों को मद्यपीने वाले वैद्य, ठीक सवाद न कहने वाले अभिनेता, मूर्ख संन्यासी, कायर योद्धा, बुड्ढे विट, वेदादि नहीं पढ़ने वाले ब्राह्मण, मन्त्रिरहित बालराजा के राज्य, कपटाचारी मित्र तथा यौवनोन्मत्त एवं परपुरूष मे आसक्त पत्नी का परित्याग कर देना चाहिये।
क्षुत्क्षामस्य करण्डपिण्डिततनोम्म्लानिन्द्रियस्य क्षुधा
कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा
स्वस्थास्तिष्ठत दैवमेव हि नृणां वृद्धौ क्षये कारणम्।⁴
¹ शु० स०, श्लोक स० 97 पृष्ठ स० 76
² वृत्तरत्नाकर, 3/100
³ शुकसप्तति, श्लोक स० 27, पृष्ठ सं० 28
⁴ शुकसप्तति, श्लोक स० 62, पृष्ठ स० 47-48
[ 170 ]
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को धैर्य रखना चाहिये क्यों कि उसकी समृद्धि और विपत्ति, जीवन और मरण सबका कारण दैव है।
रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषीं धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।¹
इस छन्द के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरूष भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाते है।
यत्र स्वेदलवैरलं विलुलितैर्व्यालुप्यते चन्दनं
सच्छेदैर्मणितैश्च यत्रा रणित न श्रूयते नुपुरम्।
यत्रायान्त्यचिरेण सर्वविषयाः काम तदेकाग्रतः
सख्यस्तत्सुरत भणामि रतये शेषा च लोकस्थितिः ।।²
प्रस्तुत छन्द में किस प्रकार का सुरत प्रीतिकारक होता है, इसके बारे में बताया गया है।
उन्नादाम्बुदवद्धितान्धतमसि प्रभ्रष्टदिङ् मण्डले।
काले यामिकजागरूकसुभटव्याकीर्णकोलाहले।
भूपस्यासुहृदार्णवाम्बुवडवावह्नस्त्वमन्तःपुरा
दायातासि यदम्बुजाक्षि कृतक मन्ये भयं योषिताम।³
प्रस्तुत छन्द के माध्यम से यही बताया गया है कि प्रमदा-जन में जो भय की प्रवृत्ति है वह केवल कृत्रिम है, वास्तव में उन्हें किसी से भय नही लगता।
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 131 पृष्ठ स० 112-113
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 259 पृष्ठ स० 227
[ 171 ]
माधुर्यं प्रमदाजने सुललितं दाक्षिण्यमार्ये जने, शौर्यं शत्रुषु मार्दवं गुरूजने धर्मिष्ठता साधुषु। मर्मज्ञेष्वनुवर्तनं बहुविधं मानं जने गर्विते, शाठय पापजने नरस्य कथित. पर्यन्तमष्टौ गुणां.।।¹
इस छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि यदि ये आठ गुण मुनष्य में अर्न्तनिहित हैं तभी वह गुणी माना जायेगा।
अप्राज्ञेन च कातरेण च गुणः स्यात्सानुरागेण कः प्रजाविक्रमशालिनोऽपि हि भवेत् कि भक्तिहीनात्फलम्। प्रज्ञाविक्रमभक्तयः समुदिता येषां गुणा भूतये ते भृत्या नृपतेः कलत्रमितरे सम्पत्सु चापत्सु च।²
उपरोक्त शार्दूलविक्रीडित छन्द के माध्यम से यही आदर्श दर्शाया गया है कि जिस सेवक मे प्रज्ञा, विक्रम, भक्ति ये तीनों गुण पूर्ण विकसित हों वे ही सेवक राजा की समृद्धि बढ़ाने वाले, सम्पत्ति और विपत्ति में साथ देने वाले दूसरे कलत्र (पत्नी) है।
स्वामी दुर्णयवारणव्यतिकरे शास्त्रोपदेशे गुरू- र्विश्रम्भे हृदयं नियोगसमये दासो भये चाश्रयः। दाता सप्तसमुद्रसीमरशनादामान्तिकायाःक्षितेः सर्वाकारमभूत्स्वयं वरसुहृत्को वा न कर्णो मम।।³
प्रस्तुत छन्द मे मन्त्री में होने वाले गुणों को दर्शाया गया है।
मालिनी : (प्रत्येक चरण में पन्द्रह अक्षर)
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।⁴
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 119 पृष्ठ स० 104
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 229 पृष्ठ स० 197
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 233 पृष्ठ सं० 200
4 वृत्तरत्नाकर, 3/87
[ 172 ]
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः नगण, नगण मगण, यगण तथा यगण आये, साथ ही साथ भोगी अर्थात् नाग (8) तथा लोक (7) सख्यक अक्षरों पर यति हो, उसे मालिनी कहते हैं।
सुवृत्त-तिलक मे मालिनी छन्द का इस प्रकार वर्णन किया गया है–
कुर्यात्सर्गस्य पर्यन्ते मालिनी द्रुततालवत्।
सर्ग के अन्त में द्रुतताल के समान मालिनी छन्द का प्रयोग करना चाहिये। महाकाव्यों मे सर्ग के अन्त में छन्द परिवर्तन करने का नियम है। सर्ग की समाप्ति में जब कवि को किसी कथा को अथवा प्रसङ्ग को शीघ्रता से समाप्त करना होता है तब मालिनी छन्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता है।
शुकसप्तति कथा काव्य होने के कारण इसमें सर्ग नहीं प्राप्त होते हैं। अतः कवि ने मालिनी के स्वरूप का पालन करते हुये इस छन्द का प्रयोग कहीं-कहीं कथा के मध्य और कहीं-कही कथा के अन्त में किया है।
जैसे–
उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना–
ममृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः
भवति विकलमूर्तिर्मण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम्।।¹
मालिनी छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि तेजस्वी से तेजस्वी व्यक्ति भी दूसरे के घर जाकर लघुता को प्राप्त करता है अर्थात् उसका तेज घट जाता है।
वंशस्थ- (प्रत्येक चरण में बारह अक्षर)
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।²
¹ शुकसप्ततिः, श्लोक स० 307 पृष्ठ स० 257
² वृत्तरत्नाकर, 3/46
[ 173 ]
वीर एवं रौद्र रस के मेल में वसन्ततिलका छन्द उपयुक्त माना गया है किन्तु शुकसप्तति में स्त्रियों के स्वभाव, कथन उनके आचरण, साधुपुरूषों के आचरण इत्यादि का कथन करने के प्रसङ्ग में कवि ने इस छन्द का प्रयोग किया है। जैसे-
अद्यापि नोज्झति हरः किल कालकूटं, कूर्मी बिभर्ति धरणीं खलु चात्मपृष्ठे। अम्भोनिधिर्वहति दुःसहवाडवाग्नि- मङ्गीकृतं सुकृतिन. परिपालयन्ति।¹
वसन्तलिका छन्द के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि महान पुरुष अपना सर्वस्व बलिदान करके भी दिये गये वचन का परिपालन करते हैं।
चिन्तामिमां वहषि किं गजयूथनाथ यूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म। पिण्डं गृहाण पिब वारि यथोपनीतं दैवाद्भवन्ति विपदः किल सम्यदो वा।
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को हर स्थिति में धैर्य धारण करना चाहिये और जो कुछ भी दैवकृपा से प्राप्त हो रहा हो उसी में संतोष रखना चाहिए। सुख-दुःख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।
संमोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति। एताः प्रविश्य हृदयं सदयं नराणा किं नाम वामनयना न समाचरन्ति।²
इस छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि किस प्रकार से कुटिल नेत्र वाली स्त्रियाँ दयालु हृदय पुरुषों के साथ कौन-कौन से व्यवहार करती हैं।
1 शुकसप्तति, श्लोक सं० 13, पृष्ठ सं० 12
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 330, पृष्ठ स० 275-276
[ 175 ]
स्रग्धरा (प्रत्येक चरण में इक्कीस अक्षर)
म्रभ्नैर्यानां त्रायेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।¹
जिसके चारो चरणो मे क्रमश मगण, रगण, भगण, नगण तथा तीन यगणों से युक्त और तीन बार मुनि अर्थात् (7) सख्यक अक्षरों पर यति हो ऐसी छन्द रचना को स्रग्धरा कहा जाता है। जैसे–
सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवित पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां । लज्जां तावद्विधत्ते विनयमपि समालम्बते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ।²
प्रस्तुत श्लोक में स्रग्धरा छन्द के माध्यम से पुरुषों की सीमाओं एवं उसके धैर्य का वर्णन किया गया है।
इन्द्रवज्रा (प्रत्येक चरण मे ग्यारह अक्षर)
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।³
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण तथा दो गुरू वर्ण क्रमशः हों, उसे इन्द्रवज्रा छन्द कहते हैं। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होता है। जैसे–
इन्दात्प्रभुत्वं ज्वलनात्प्रतापं क्रोधं यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम् । सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञः क्रियते शरीरम् ।।⁴
प्रस्तुत छन्द के माध्यम से राजा के शरीर की रचना कैसे होती है यह बताया गया है।
1 वृत्तरत्नाक, 3/104
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 118 पृष्ठ स० 99
3 वृत्तरत्नाक, 3/23
4 शुकसत्तति, श्लोक स० 49 पृष्ठ स० 39
[ 176 ]
छठवाँ अध्याय : संस्करण एवं सूक्तियाँ
आर्याछन्द :
यस्या. पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि ।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चमदश साऽऽर्या ।।¹
अर्थात जिसके प्रथम चरण मे तथा तृतीय चरण मे भी बारह मात्रायें हों, द्वितीय चरण में अठारह तथा चतुर्थ चरण मे पन्द्रह मात्रायें हो, वह आर्या है।
जैसे-
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात् ।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ।²
प्रस्तुत आर्या छन्द के माध्यम से यही उपदिष्ट किया गया है कि अनुकूल दैव दूसरे दीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात् शीघ्र लोकर मिला देता है।
उपर्युक्त छन्दो के प्रयोग को देखकर यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी किसी विशिष्ट बात पर बल देने के लिये छन्दों का आश्रय लिया है। आदर्श सम्बन्धी, व्यवहार परक, नीतिपरक कथनों मे वैशिष्ट्य उत्पन्न करने के लिये ही कवि ने विविध छन्दो का प्रयोग किया है जो गद्य द्वारा संभव नहीं था। शुकसप्तति की गद्यमयी कथा के मध्य में इन छन्दो का प्रयोग ‘सोने मे सुहागे’ का काम करते हैं। ये छन्द कथा को गति प्रदान करने में ही सार्थक भूमिका निभाते हुये दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार कवि का छन्द प्रयोग अत्यन्त सार्थक है।
¹ श्रुतबोध।
² शुकसप्तति-, श्लोक स० 61 पृष्ठ स० 39
[ 177 ]
छठाँ अध्याय
"संस्करण एवं सूक्तियाँ"
"संस्करण एवं सूक्तियाँ"
शुकसप्तति के प्रधान रूप से दो संस्करण प्राप्त होते हैं -
(1) सामान्य संस्करण :
इसका सम्पादन स्मिट नामक विद्वान ने किया है किन्तु इसका काल अनिश्चित है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इसे संक्षिप्त वाचनिका माना है। प्रसिद्ध इतिहासकार कीथ के अनुसार सामान्य और अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत दोनों संस्करणों का सम्पादन स्मिट ने किया है। यद्यपि श्वेताम्बर जैन की रचना प्रतीत होती है।¹ इनमें से साधारण संस्करण प्राचीन नहीं है। यह बहुत कुछ परिष्कृत-संस्करण का एक संक्षिप्त रूपान्तर है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि इसमें कहानियों के वास्तविक अभिप्राय को अस्पष्ट ही छोड़ दिया गया है। ऐसा लगता है कि जैन ग्रन्थकार हेमचन्द्र किसी न किसी रूप में इससे परिचित थे।
इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तिपरक पद्यों का निवेश किया गया रहा होगा और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन-परक पद्य रहे होंगे।
इस संस्करण में मूलकथा के रूप में हरिदत्त नामक व्यापारी का मदनसेन नामक एक मूर्ख पुत्र की कथा प्राप्त होती है। जो शुक और मैना के उपदेश के कारण सदाचारी बन जाता है। यहाँ तक कि जब वह व्यापार हेतु यात्रा पर जाने लगता है तब अपनी पत्नी को उन दोनों पक्षियों के सुपुर्द कर जाता है। बुद्धिमान शुक प्रतिदिन एक कथा को सुनाकर उसकी पत्नी के चरित्र की रक्षा करता है।
¹ संस्कृत-साहित्य का इतिहास-ए बी कीथ।
भाषान्तरकार (डा० मङ्गलदेव शास्त्री) पृष्ठ-345
(2) परिष्कृत संस्करण :
इस संस्करण का सम्पादन चिन्तामणि भट्ट नामक एक ब्राह्मण द्वारा किया गया है। इसमें चिन्तामणि भट्ट ने पञ्चतन्त्र के पूर्णभट्ट कृत (1999) जैन संस्करण का उपयोग किया था। ऐसा भी विचार प्रकट किया गया है कि बहुत सम्भव है कि कुलटा पत्नियो की कम से कम कुछ कहानियाँ शुकसप्तति के एक प्राचीनतर रुप से ली गयी थी। इसका समय लगभग 12 वीं शताब्दी के आस-पास है।
इस संस्करण मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता से यह सम्भावना प्रकट की जा सकती है कि यह संग्रह अपने मूलरुप में प्राकृत भाषा में रहा होगा।
इस संस्करण में 70 कहानियाँ प्राप्त होती हैं। जिसमें कथा के रुप में हरिदत्त व्यापारी के मूर्खपुत्र की कथा प्राप्त होती है जिसके विदेश जाने पर उसकी पत्नी को कुमार्ग पर जाने से बचाने के लिए शुक द्वारा प्रतिदिन एक कहानी सुनाकर उसके पति के आने तक पथभ्रष्ट होने से रोका जाता है।
(3) "सूक्तियाँ" :
सूक्ति का अर्थ है, सु+उक्ति अर्थात् सुन्दर कथन। काव्य शास्त्रकारों ने काव्य के प्रयोजनों के अन्तर्गत "व्यवहाविदे" "कान्दासम्मिततयोपदेशयुजे"। इन दो प्रयोजनों का कथन किया है।¹ यदि यह कहा जाय कि इन दोनों प्रयोजनों की पूर्ति काव्य में प्रयुक्त सूक्तियों के माध्यम से होती है तो गलत न होगा, क्योंकि सूक्तियाँ व्यवहारिक ज्ञान तो प्रदान करती ही हैं, साथ ही "कान्तावत्" उपदेश भी देती हैं।
किसी भी कथन को सारगर्भित रुप से ऐसे सुन्दर ढंग से कहना कि उसका प्रभाव चिरस्थायी हो सके, सूक्ति कहलाता है। प्राचीन काल से कवि नैतिक, धार्मिक,
¹ काव्य यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य परिनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।
आचार्य मम्मट, काव्य प्रकाश, प्रथम उल्लास, कारिका 2, पृ० स० 10
[ 179 ]
राजनैतिक, तथा लौकिक जगत से सम्बन्धित अपने कथन को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने के लिये सूक्तियों का आश्रय लेते आये हैं। यदि कथन को सामान्य रूप से कहा जाय तो समाज में उसका प्रभाव प्रायः नही पड पाता, किन्तु उसी कथन को यदि अलङ्कारिक या चमत्कारिक ढंग से कहा जाय तो व्यक्ति और समाज पर उसक प्रभाव निश्चित रुप से पडता है । ये सूक्तियाँ अर्थान्तरन्यास अलङ्कार ही हैं।
सस्कृत-साहित्य की प्रत्येक विधा सूक्तियों से समृद्ध है। काव्य, नाटक, कथा एवं आख्यायिका में प्रचुर मात्रा में सूक्तियो का प्रयोग मिलता है। वस्तुतः ज्ञानी पुरुषों एव कवियों की वाणी से उद्भूत निष्कर्ष कथन ही सूक्तियों का रुप धारण कर लते हैं।¹ संस्कृत साहित्य में जीवन, जगत, समाज, राजनीति, भौतिक द्वन्द्वों, भाग्य, पुरुषार्थ, सज्जन, दुर्जन, मित्र, अमित्र, आदि विविध विषयों से सम्बन्धित सूक्तियों का प्रयोग देखा जा सकता है। जीवन के हर क्षेत्र पर इन सूक्तियों का प्रभाव देखा जा सकता है।²
शुकसप्तति में प्रचुर मात्रा मे सूक्तियों का प्रयोग हुआ है। कवि ने अपने कथन को अधिक प्रभावशाली एव शिक्षात्मक बनाने के लिये प्रायः प्रत्येक कथा के अन्तर्गत शुक के माध्यम से सारगर्भित कथनों का प्रयोग किया है। इस ग्रंथ में सूक्तियों की विविधता दर्शनीय है। मदनविनोद की पत्नी प्रभावती को कुमार्ग पर जाने से बचाने के लिये अनेक उपदेशात्मक, व्यवहारिक, नैतिक-आदर्शों से युक्त सूक्तियों का प्रयोग
1 'महापुरुषो की वाणियों मे अद्भुत शक्ति होती है। कठिनाई के समय और कर्तव्यगत द्वन्द उपस्थित होने पर ये सूक्तियाँ प्रकाश और प्रेरणा देती हैं। ससार की समृद्धि भाषाओं में सूक्तियों का बड़ा मान है।'
हजारी प्रसाद द्विवेदी
रमाशंकर गुप्त संग्रहीत "सूक्ति सागर", भूमिका पृ० 7, 1959
2 विधाता की मानव सृष्टि में सूक्तियाँ कल्प-तरु के समान हैं। उनकी सुविस्तृत सघन-छाया में जीवन-पंथ की थकान को ही दूर करने की शक्ति नहीं है, प्रत्युत भविष्य की दुर्गम-यात्रा को सुखपूर्वक समाप्त करने का इनमें अक्षय तथा दैवी सम्बल भी रहता है। किं बहुना, मानव-मन की कोई ऐसी अज्ञात दिशा अथवा अँधेरी गली नहीं है, जिसमें इन सूक्तियों के शुभ्र किरणों का प्रकाश न पड़ता हो। सुख-दुख, विपत्ति, अनुराग-विराग, सज्जन-दुर्जन, योग-भोग, प्रशंसा-निन्दा से भरे इस द्वन्द्वात्मक जगत में इन सूक्तियों की गति सर्वत्र है। ब्रह्मा की भाँति ये सर्वव्यापी बन गई हैं।
राम प्रताप शास्त्री, रमाशंकर गुप्त संग्रहीत-
'सूक्ति-सागर' पृ० 10, 1959
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कवि ने किया है। ग्रन्थकार ने सूक्तियों का प्रयोग पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों रूपों में किया है।
सज्जनो का व्यवहार किस तरह होता है इस तरह की भी सूक्तियाँ कुछ श्लोकों में दृष्टव्य हैं-
सज्जनों के प्रति :
सज्जन तीर्थरुप होते हैं, सज्जनों का दर्शन पवित्रकर होता है। सज्जन तीर्थों से भी बढकर होते है क्योकि तीर्थ तो कुछ समय मे फलदायी होते हैं परन्तु सज्जनों का समागम तत्काल फल देता है।¹
दुष्टो की सङ्गति से सज्जन भी विकार को प्राप्त हो जाते हैं। दुर्योधन का साथ करने से भीष्म गायों को हरने के लिये गये थे।²
इसी प्रकार मनुष्य को एक दूसरे के प्रति किस प्रकार का व्यवहार रखना चाहिये इसके लिये भी विभिन्न प्रकार की सूक्तियाँ शुकसप्तति ग्रन्थ में कही गयी हैं।
यथा-
(अ) व्यवहारिक सूक्तियाँ :
सत्कर्म के बल से गर्वयुक्त धीर सदा निर्दोष एवं भय रहित होते हैं और कुकर्म में संलग्न सत्रस्त पापी-जन सदा सर्वत्र शंका युक्त ही होते हैं।³
1 साधुना दर्शनं पुण्य तीर्थभूता हि साधवः।
तीर्थं फलति कालेन सद्य साधुसमागमः।
— शुकसप्तति, श्लोक सं० 316, पृष्ठ स० 264
2 असता सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधनप्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः।।
— शुकसप्तति, श्लोक सं० 336, पृष्ठ स० 279
3 सर्वत्र शुचयो धीरा सुकर्मबलगर्विता ।
कुकर्मभयसन्त्रस्ताः पापाः सर्वत्र शङ्किता ।।
— शुकसप्तति, श्लोकसं० 323, पृष्ठसं० 272
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अविश्वस्त पर विश्वास न करें, विश्वास पर भी विश्वास न करें, क्योंकि विश्वास से उत्पन्न भय समूल विनष्ट कर देता है।¹
बिना दूसरों के मर्मस्थल का छेदन किये, बिना दुष्कर कर्म किये, बिना किसी को मारे, मत्स्यघाती (मछुआ) की भाँति कोई महालक्ष्मी को नहीं पाता है।²
भूखा क्या पाप नहीं करता? भूख से पीड़ित जन निष्करुण हो जाते हैं। ये जीवन के लिये (पाप–कर्म) करते हैं। सज्जनों का जो मत (पुण्य–कर्म) है वह इन्हें मान्य नहीं हैं।³
हे भीरु! प्राणियों की बुद्धि बलवती है, पराक्रम नहीं। (जैसे) अल्प बल वाले शशक ने पराक्रमी सिंह को मार डाला।⁴
राजन ! प्रिय बोलने वाले पुरुष तो सदा सुलभ होते हैं किन्तु अप्रिय तथा हित की बात कहने वाला और सुनने वाला ये दोनों दुर्लभ होते हैं।
व्यवहारिक सूक्तियो के अतिरिक्त इस कथा–ग्रन्थ में उपदेशप्रद सूक्तियों की भी अनुपम छटा दर्शनीय है। यथा–
1
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमुत्पन्न मूलादपि निकृन्तति।।
शुकसप्तति, श्लोक स० 120, पृष्ठ स० 105
2
नाभित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम्।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम्
शुकसप्तति, श्लोक सं० 156, पृष्ठ सं० 125
3
बुभुक्षितः किं न करोति पाप क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति।
प्राणार्थमेते हि समाचरन्ति मतं सता यन्न मत तदेषाम्।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 59, पृष्ठ सं० 45
4
बुद्धिर्बलवती भीरु सत्त्वानां न पराक्रमः।
शशकेनाल्पसत्त्वेन हतः सिंह पराक्रमी।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 178, पृष्ठस० 147
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(ब) उपदेशात्मक सूक्तियाँ :
भूख से दुर्बल, बाँस की डलिया मे शरीर को सपिडित किये स्थित, भूख से म्लानेन्द्रिय सर्प के मुख मे रात के समय मूषक उसमें बिल बनाकर स्वयं चला गया। अतः तुम सब धैर्य रक्खो, मनुष्य की समृद्धि और विपत्ति, जीवन और मरण का कारण दैव है।¹
मनुष्य के पास आठ गुण कहे गये हैं इनके होने पर ही वह गुणी माना जाता है। वे ये हैं (1) तरुणी स्त्रियों के साथ मधुर व्यवहार (2) शिष्ट समुदाय के साथ अनुकूल व्यवहार, (3) शत्रुओं पर पराक्रम दिखाना, (4) पूज्य एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों से नम्रता, (5) सज्जनों के साथ धर्मिष्ठता, (6) रहस्य जानने वालों के साथ उनके मनोनुकूल आचरण करना (7) अभिमानियों के साथ बहुविध मान करना (8) शठों के साथ शठता का व्यवहार करना चाहिये।²
जो लोग कपटी जनों के साथ कपट पूर्ण व्यवहार नहीं करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।³
दैव के प्रतिकूल होने पर साधनों का आधिक्य भी निष्फल होता है। अस्त को प्राप्त होने वाले सूर्य को उसकी सहस्र किरणें भी अवलम्ब नहीं दे सकीं।⁴
1 सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभा ।।
— शुकसप्तति., श्लोक स० 325, पृष्ठस० 274
2 माधुर्यं प्रमदाजने सुललितं दाक्षिण्यमार्ये जने शौर्यं शत्रुपु मार्दवं धर्मिष्ठता साधुषु।
मर्मज्ञेष्वनुवर्तनं बहुविध मान जने गर्विते शाठयं पापजने नरस्य कथिता. पर्यन्तमष्टौ गुणा.।।
— शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 119, पृष्ठसं० 104
3 व्रजन्ति ते मूढधिय. पराभव भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः।।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषव ।।
— शुकसप्ततिः श्लोक स० 123, पृष्ठ सं० 106
4 प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ विफलत्वमेति बहुसाधनता।
अवलम्बनाय दिनभर्तुरमूर्न्न पतिष्यत. करसहस्रमपि।।
— शुकसप्तति. श्लोक स० 143, पृष्ठ सं० 118
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हे गजयूथनाथ! यूथ से वियोग होने के कारण मुँदे नेत्र वाले। इस प्रकार चिन्ता क्यो कर रहे हो? जो कुछ प्राप्त रहा है वह ग्रास ग्रहण करो और जल पियो। दुःख-सुख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।¹
जो कोई जैसा करे उसके साथ वैसा ही करो-कोई उपकार करता है तुम भी प्रत्युपकार करो, हिंसा करता है तुम प्रतिहिंसा करो। तुमने पंख नोच डाले, मैंने सिर को रोमहीन कर दिया अर्थात् जो कोई जैसा व्यवहार करे उसके साथ वैसा व्यवहार करो।²
बुद्धिमान बिना प्रयोजन समझे अथवा प्रयोजन समझ लेने पर सहसा कोई बात न कहे क्योंकि विधाता अथवा दैव न जाने क्या करना चाहता हो।³
(स) शिक्षाप्रद सूक्तियाँ :
राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीडा में चारो भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते है।⁴
अवश्य तुम जाओ-ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है, क्योंकि प्रिय की ओर जाते मन को तथा नीची भूमि की ओर बहते जल को कौन रोकने में समर्थ है।⁵ संकेत रुप से
1 चिन्तामिमा वहसि कि गजयूथनाथयूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म।
पिण्ड गृहाण पिब वारि यथोपनीतं दैवाद्भवन्ति विपद किल सम्पदो वा।।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 159, पृष्ठ सं० 127
2 कृते प्रतिकृतं कुर्या हिंसिते प्रतिहिंसितम्।
त्वया लुञ्चापिता पक्षा मया लुञ्चापित शिर ।
शुकसप्तति, श्लोक स० 331, पृष्ठ स० 277
3 प्रयोजनमविज्ञाय ज्ञात्वा चाथ मनीषिणा।
सहसैव न वक्तव्यमचिन्त्यो विधिनिर्णयः।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 331, पृष्ठ स० 277
4 रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टय च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽयनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 64, पृष्ठसं० 49
5 अवश्यमेव गन्तव्यं त्येत्थ मम निश्चय ।
मनोऽभीष्टे पयो निम्ने गच्छत्क. प्रतिवारयेत्।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 84, पृष्ठसं० 69
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व्यक्त किए भाव को पशु भी ग्रहण कर लेता है। घोडे–हाथी संकेत द्वारा प्रेरित हो (मनुष्य अथवा भार को) एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचाते हैं पडित बिना कहे भाव को तर्क द्वारा जान लेता है क्योकि दूसरो के संकेतित अभिप्राय को जानना ही बुद्धि का फल है।¹
नीच व्यक्ति के ससर्ग से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। क्योंकि दुष्ट अत्यन्तप्रिय के विषय में भी अपना विकार ही दिखाता है।²
मन से विपरीत किए गये को जो सह सकता है और अर्थ त्याग कर सकता है वह मन के अनुकूल कार्य करता हुआ, कभी सज्जनों द्वारा निन्दित नहीं होता।³
(द) राजधर्म सम्बन्धी सूक्तियाँ :
ग्रन्थकार द्वारा "राजनियम" से सम्बन्धित सूक्तियाँ भी दर्शायी गयी हैं। यथा-राजा के प्रसन्न होने पर श्वेत छत्र, मनोरम अश्व, मदशाली गज प्राप्त होते हैं।⁴
राजा कोई साधारण व्यक्ति नही होता, यह अलौकिकरुप धारी होता है और तुम तो हे शत्रुओ को सन्ताप देने वाले! विक्रमादित्य (विक्रम में आदित्य से) यथार्थनामा हो।⁵
-
उदीरितोऽर्थ पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति नोदिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जन परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धय ।।
शुकसप्ततिः, श्लोक स० 86, पृष्ठ स० 70. -
न नीचजनससर्गान्नरो भद्राणि पश्यति।
दर्शयत्येव विकृति सुप्रियेऽपि खलो यतः।।
शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 126, पृष्ठसं० 109 -
सोढु त्यक्तुं च यः शक्तो मनसा कृतमन्यथा।
मनोऽनुकूलता कुर्वन्न् स निन्यः सदा सताम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोकस० 114, पृष्ठस० 96 -
धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः।
सदा मताश्च मातङ्गा प्रसन्ने सति भूयतौ।।
शुकसप्ततिः, श्लोकस० 46, पृष्ठसं० 38 -
इन्द्रात्प्रभुत्व ज्वलनात्प्रताप क्रोध यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञ क्रियते शरीरम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 49, पृष्ठ सं० 39.
[ 185 ]