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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

१४० गोलाध्याये गतसौरमासा मध्यमसंक्रान्त्यवधिका योज्यास्ततोऽभीष्टकाले गतसौरदिवसास्त्रिंशद्गुणितेषु योज्याः कल्पादभीष्टकालो गतसौरा दिवसा भवन्तीत्येतदशक्यम् । मध्यममेषादिसंक्रान्त्य- ज्ञानेन गतसौरमासानां गतसौरदिवसानां चाभीष्टकाले ज्ञानाभावदत आचार्यैर्मध्यमसौर- वर्षादिजकल्पगतसौरमासाश्चैत्रादिगतचान्द्रमासतुल्यसौरमासा एव योजितास्ततस्त्रिंशद्- गुणितेषु तेषु वर्तमानचान्द्रमासादिगततिथिमितसौरदिवसा योजिता इति प्रश्नपूर्वार्धोत्तरम् । चान्द्रत्वेन तद्योजनस्याकृतत्वातत्सौरकल्पनैव तद्योजनाच्चेति भावः । अथाधिमासशेषत्यागं व्यवस्थापयति—यत इति । यत्कारणात् । तेऽभीष्टकालजसौरदिवसा अधिशेषोत्थदिनाधिकाः । उक्तरीत्या चान्द्रतुल्यसौरयोजनाच्चन्द्रे वास्तवसौरस्याधिशेषदिनसौराणां चासत्त्वाद्वास्तवा- भीष्टकालिकसौरदिवसा यदि शेषदिनतुल्यसौरदिनयुताः साधितसौरदिवसेषु संजाता इत्यर्थः । अस्मात्कारणात्तत्पूर्वश्लोकोपपादितरूपमधिमासशेषमनुपातसिद्धाधिमासानयनेनाधिमासप्राप्तौ यद्भाज्यशेषाद्दिनादिकं त्यक्तम् । अहर्गणसिद्धयर्थं न गृहीतम् । यथा मासाः सौराणां योजितास्तथाऽधिशेषरूपाधिमासशेषाद्यवयवो न योजितः सौरदिनेषु । तदवयवस्य पूर्वमधि- कत्वेन सत्त्वादन्यथेष्टचान्द्राणां तदधिकत्वेनावास्तवत्वापत्तिरित्यर्थः । न चाधिमासानां वास्तवसौरेभ्योऽसाधनादधिमासानयनावगताधिशेषस्य साधितसौरान्तर्गताधिशेषादधिकत्वेन तुल्यत्वाभावात्कथं त्यागः । अधिशेषयोरन्तरस्य पूर्वमसत्त्वात्तद्योजनावश्यकत्वादिति वाच्यम् । तस्यावास्तवसौरदिनेभ्योऽधिमासानयनोक्त्यैव सिद्धत्वेनासंगतत्वात् ॥१७॥ नन्वेवं कल्पादिष्टचान्द्राणां वास्तवत्वेनावगमात्तत्साधितावमानि निरग्रकाणि कथं सावनसिद्धयर्थं हीनानि कृतानि । नहीष्टचान्द्रेऽवमशेषं न्यूनं येनावमशोधनावसरे तर्ह्यवय- वत्याग इत्यत उपजातिकयोत्तरमाह—तिथ्यन्तेति । तिथ्यन्तसूर्योदययोरहर्गणानयनोपजीव्यमध्यमतिथ्यन्तमध्यमसूर्योदयकालयोर्मध्येऽन्त - राले । तुकारात्तिथ्यन्तादग्रे सूर्योदयात्पूर्वमितिरूपे सदा नियतमवमशेषमेवकारोऽन्ययोग- व्यवच्छेदार्थकः । अस्ति । अतः कारणादवमशेषस्य चान्द्रसावनान्तरत्वेनोक्तरूपत्वादि- त्यर्थः । तेनावमशेषेनानुपातावगतावमाघोऽवयवेन घट्याद्यात्मकेन । त्यक्तेनावमशोधनाव- सरे शोधनार्थमगृहीतेनाहर्गण उदयकालिकः कल्पितनियतमध्यमसावनमानेनावास्तवसूर्योदय- कालिक इत्यर्थः । अन्यथा । अवमशेषशोधिते तिथ्यन्तकालिकवास्तवचान्द्रेषु द्युगणस्तिथ्य- न्तकाले स्यात् । तथा चाहर्गणसिद्ध्यर्थं पूर्वमवमशेषं हीनं ततः सूर्योदयकालिकत्वसिद्ध्यर्थ- मवमशेषं योज्यमित्यवमशोधनावसरे लाघवात्पूर्वमेवावमशेषं न शोधितमिति तात्पर्यम् । एवं चाहर्गणानयनमुक्तं साधूपपन्नमिति व्यवस्थापितम् ॥१८॥ केदारदत्तः—अहर्गण गणित साधन करते समय इष्ट सौर मासों में चैत्रादि चान्द्र- मासों की संख्या क्यों जोड़ी गई है ? क्योंकि योगान्तर तो सजातीय पदार्थों का ही होता है । तथा इसी अवसर पर अनुपात लब्ध सावयव फल में, अधिक मास शेष तथा क्षय शेष को भी जोड़ना चाहिए था, किन्तु जोड़ा नहीं गया ऐसा क्यों ?

मध्यगतिवासना १४१ अमान्त से अमान्त तक चान्द्र मास, एवं संक्रान्ति से संक्रान्ति तक सौर मास होता है । अमान्त के आगे संक्रान्ति तक के समय का नाम अधिशेष है । अमान्त से इष्ट तिथि तक सौर दिन तुल्य चान्द्र तिथियों को या अहर्गण साधन में जोड़ा गया है यहाँ पर अधिक शेष तुल्य संख्या का सुविधा के लिये अधिक जोड़ा हो गया अतः आगे की गणित क्रिया में इसका उपयोग नहीं होता है । इसी प्रकार तिथि के अन्त से सूर्योदय तक अवम धनात्मक अवम शेष संज्ञक काल का भी यहाँ पर त्याग किया गया है । उपपत्ति— मध्यम मान से प्रत्येक अमावास्याओं के अन्त में चान्द्र मास की पूर्ति होती है, तदनुसार कल्प या युग के चान्द्र मासों की संख्या निर्दिष्ट की गई है । तथा मध्यम मान से सूर्य की जितनी संक्रान्तियाँ होती हैं उनकी संख्याओं का भी उल्लेख हो चुका है । चूँकि चान्द्रमास संख्या—सौरमास संख्या = अधिमास संख्या । इसलिये सौर मास और चान्द्रमास के बीच में जितनी भी सावयव तिथियाँ हैं उनकी अधिमास शेष संज्ञा और वह संख्यात्मक होती है । १२ × सौर वर्ष = चैत्रादि (शुक्ल प्रतिपद) समय तक की सौर वर्षीय संख्या को ३० से गुणा करने पर सौर दिन संख्या चैत्रादि तक समीचीन होती है । तदुपरि इष्ट समय के अहर्गण साधन में सौर दिन की जगह सौर दिन तुल्य चैत्रादि चान्द्र दिन (तिथि) जोड़े गए हैं, जोड़ना चाहिए सौर दिन । अतः यहाँ पर इसलिये सौर चन्द्र के अन्तर तुल्य अधिक मान ग्रहण किया गया है । अतएव ऐसी स्थिति में यहाँ पर अधिक शेष दिन तुल्य मान को उक्त इष्ट सौर मास में और कम करना चाहिए इसीलिये अनुपात से प्राप्त अधिक मास और शेष को सौर दिनों में जोड़ देने से इष्ट समय तक की चान्द्रतिथियाँ हो जाती हैं । एक जगह (अ० शे० / क० सौ०) मान जोड़ दिया गया है अतएव वहाँ पर अब अधिशेष जोड़ने की आवश्यकता गणित से प्राप्त नहीं है तस्मात् (अ० शे० / क० सा०) मान का त्याग हुआ है । अवमशेष अर्थात् अनुपात से प्राप्त इष्टचान्द्र + (इष्टचान्द्र / कल्प चां) सावयव फल (इ० चां० / क० चां०) का त्याग क्यों ? प्रत्येक तिथ्यन्त के अनन्तर जितने समय में सूर्योदय होता है उतने समय तक की इस काल की संज्ञा अवमशेष घटिका होती है । चान्द्र दिन–सावन दिन = अवमदि यदि अयमशेष का त्याग न कर लब्ध अवमशेष घटिकाओं को तिथियों में कम करते हैं तो यह अहर्गण सम्बन्धित तिथि के अन्त समय

्छेद् भुक्तासूपूर्वं विहितं तदानीम् । कृतं तथा स्याच्चरकर्ममिश्रं कर्म ग्रहाणामुदयान्तराख्यम् ॥ २२ ॥ वा० भा०—सायनांशेन रविणा मेषादेरारभ्य ये भुक्ता राशयस्तत्संबन्धिनो ये निरक्षोदयासवो गगनभूधरषट्कचन्द्रा १६७० इत्यादयस्तेषामैक्यं कृत्वा भुज्य- मानराशेर्ये भुक्ता भागास्तांस्तदुदयासुभिः संगुण्य त्रिंशता ३० विभज्य लब्धास- सवोऽपि तत्र क्षेप्याः । एवं मध्यार्कभुक्तासवः स्युः । भदिनान्तादूर्ध्वं तावत्यस्वात्म- के काले लङ्कायां मध्यमस्यार्कस्योदयः । तत्काले हि ग्रहाः साध्याः । अथ चाहर्गं- णेन ये सिद्धास्ते मध्यमार्क कलामितेऽस्वात्मके काले भदिनान्तादूर्ध्वं जाताः । अतोऽसूनां कालानां च यदन्तरं तेनार्कोदयोऽन्तरितः । अतस्तदुदयान्तराख्यं

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... wait, is it त्व or ध्व? Wait, some people transcribe this as: तन्मध्येध्वन्तरस्य or तन्मध्येऽन्तरस्य or तन्मध्ये त्वन्तरस्य? Let's search Google / memory for: "वर्षचरणान्तेषु चतुर्ष्वप्यन्तराभावः तन्मध्ये" In Siddhānta-śiromaṇi, Madhyamagatilavāsanā, Bhāskara writes: "वर्षचरणान्तेषु चतुर्ष्वप्यन्तराभावः । तन्मध्ये त्वन्तरस्य वृद्धिक्षयौ ॥" YES! "तन्मध्ये त्वन्तरस्य वृद्धिक्षयौ"! Wait, is it "त्वन्तरस्य" or "ध्वन्तरस्य" in the print? If you look at the print, the typesetter set त्वन्तरस्य or did they make a typo? Wait, let's look at त्व in त्वन्तरस्य: + = त्व. In this typeface, त्व looks like a attached to . That's why it looks like त्व! Wait, let's look at it: has a curved arm, and below it is . That is standard Devanagari त्व! Wait, why did I initially think ध्व? Because the curve of can look like the upper curve of , but it has a full headline

१४४ गोलाध्याये सावनमानेन कल्पादनुपातसिद्धो योऽहर्गणो यश्च मध्यगतिकलोत्पन्नासुयुतषष्टिघटीमितप्रति- पादितभिन्नसावनेन गणनयाऽहर्गणस्तयोरन्तरमभीष्टकाले यत्सावनजनितान्तरं तत्र स्फुटमध्य- सावनानां वर्षेऽभिमतत्वाद्यावन्तः कल्पादभीष्टवर्षदौ मध्यमसावनाहास्तावन्तः स्फुटसावनदिवसा इति तयोरहर्गणयोः कल्पाद्यान्तरं येन बहुदिनान्तरसंभावना । अपि तु वर्तमानसौरवर्षादिरेव तयोरन्तरम् । तत्रापि मानयोर्गतितुल्यासु मध्यगत्युत्पन्नासु जनितयोर्मध्यस्पष्टयोरन्तरेणैव तदुपपत्तेः सौरवर्षादिरभीष्टकालपर्यन्तं सूर्यस्य मध्यगतिभोगेनैवानुपातजत्वान्मध्यार्ककला- तुल्या असवः साधिताहर्गणसंबद्धा यत्संख्याका भवन्ति । मध्यार्कस्य प्रतिराश्युदयकाल- भेदेनोक्तरीत्या यत्संख्याका असवो नियतमध्यममानावगताहर्गणसंबद्धाः । चः समुच्चये । तयोरन्तरं यत्संख्याकं भवति तदेवास्र्फुटमध्ययोः, अनियतमध्यममानावगतोक्तमानानुपात- जयोरहर्गणयोरन्तरं स्यान्नान्यत् । षष्टिघटीनामुभयत्र संबन्धादित्यर्थः । न चेदमन्तरमहर्गणे संस्कार्यं ततोऽस्मादुक्तरीत्या ग्रहसाधनं युक्तमिति स्पष्टाधिकारे ग्रहाणामुद्यान्तरसंस्कारः कथमूक्त इत्यत आह— गतिघ्नमिति । तदन्तरे स्वस्वमध्यगत्या कलात्मिकया गुणितं मध्य- गत्युत्पन्नासुजनिताहोरात्रमानासुभिर्भक्तं लब्धदिना ग्रहा यथायोग्यं हीनाः यद्यसवः कला- भ्योऽल्पा भवन्ति । तदन्यथा । उक्तवैपरीत्ये । कलाभ्योऽसुनामधिकत्वे तुकाराल्लब्धकला- दिना ग्रहा इति लाभः । युक्ताः । असुकालस्य मुक्तत्वादित्यर्थः । तथा च विनार्कज्ञानं तत्संस्कारोऽहर्गणे कर्तुं न शक्यते । सावयवाहर्गणाद्गुणनादौ प्रयासाच्च लाघवाच्चालनं ग्रहे ऋणधनं दत्तमिति भावः । नन्वेवं पूर्वोक्तादधिकसंस्कारोक्त्या गौरवमेवेत्यत आह— निजोदयैरिति । यदि स्वदेशराश्युदयासुभिर्भक्तासुपूर्वं सावनमध्यार्कासवः । पूर्वशब्दाद- होरात्रासव इत्यर्थः । विहितं कृतं तदानीमुद्यान्तराख्यं कर्म चरकर्ममिश्रं चरसंस्कृतं कृतम् । ग्रहाणां संस्कृतं यथा स्यात्तथा कृतं भवतीत्यर्थः । तथा च यदि निरक्षदेशो- दयैरुद्यान्तरं साध्यते तदा खलु गौरवं स्वदेशोदयैस्तु भिन्नचरसंस्काराकरणे भोद्यान्तर- संस्कारेण तत्सिद्धे गौरवानवकाश इति भावः । तदपेक्षया लाघवं च स्पष्टाधिकारे प्रति- पादितम् ॥१९॥२०॥२१॥२२॥ केदारदत्तः— स्पष्ट और मध्यम सावन दिनों का कालात्मक अन्तर उदयान्तर गणित बताया जा रहा है—स्पष्ट सावन दिन चल है, एक रूप स्थिर नहीं है अतः एव चल सावन से दिन गणना का अनुपात करना संभव नहीं है अत एव मध्यम मानीय सावनदिन संख्यात्मक अहर्गण साधित होता है । सभी गणित-विषय स्फुट सावनात्मक अहर्गण से सम्बन्धित है । गणित साधन क्रिया के अभाव से मध्यममानीय अहर्गण से ग्रहों का सूक्ष्म स्थान ज्ञात किया गया है अत एव मध्यम सावनमान से साधित अहर्गणोत्पन्न ग्रहों की स्थूलता को समझ कर “उदयान्तर” नामक प्रसिद्ध गणित गवेषणा से प्राप्त मध्यम सावन दिन और स्पष्ट सावन दिनात्मक अन्तर काल से गुणित ग्रह गतियों से प्राप्त विकलात्मक अन्तर (संस्कार) को मध्यम सावन साधित ग्रहों में देने से ही लङ्कोदयकालिक ग्रह स्पष्ट होते हैं ।

मध्यगतिवासना १४५ यह उदयान्तर गणित कर्म क्या है— अयनांश युक्त सूर्य स्पष्ट की युक्त राशियों के काल में वर्त्तमान राशि के अंशों को उस राशि के उदयासुओं से गुणा कर ३० से भाग देने से वर्त्तमान राशि तक सायन स्पष्ट सूर्य के भुक्त असु (पलों से अनुपात से पल) होते हैं । इस वस्तु का नाम मध्यमार्क भुक्तासु होता है । नक्षत्र दिनान्त के अन्तर उक्त समय के पश्चात् निरक्ष खमध्य में मध्यम सूर्य का उदय होता है, निश्चित यही सही समय है । अहर्गण से साधित ग्रह नक्षत्र दिनान्त के अनन्तर मध्यम सूर्य के कला तुल्य अधिक काल में निरक्ष क्षितिज में ग्रहों की साधनिका की गई है । यदि राशि की कला १८०० कला का उदयमान उसी राशि के असु १८०० के तुल्य होता तो भी गणित में कोई अन्तर नहीं आता । एक राशि के कलामानों से उत्पन्न असुमानों में विभिन्नता होने से अहर्गण से साधित ग्रह क्षितिज में नहीं होकर कभी क्षितिज के नीचे और कभी क्षितिज के ऊपर ही होगा । इसीलिये जहाँ पर अन्य सभी आचार्यों ने साधित ग्रहों को औदयिक या उदय कालिक शब्द से स्पष्ट किया है, वहाँ पर आचार्य भास्कर ने ग्रह गणिताध्याय में “क्षितिजे, या उदयकाले ग्रहा भवन्ति” ऐसा न कहकर “क्षितिजसन्निधिगे सति मध्यमः” से साधित ग्रह उदय के समीप आगे पीछे होते हैं न कि क्षितिज में उदयकालिक होते हैं ऐसा स्पष्ट कहा भी हैं । असुओं और कलाओं से अन्तरित काल का नाम आचार्य ने “उदयान्तर” काल कहा है । उदयान्तर काल से गुणित ग्रह गति में अहोरात्रासु २१६५९ = सावन दिन से भाग देने पर लब्धफल को अहर्गण से साधित मध्यम ग्रहों में धन या ऋण कला से असु अधिक हों तो धन, न्यून हों तो ऋण करने से सही रूप से निरक्ष क्षितिज में ग्रहों का स्थान होने से ग्रह दृक्पथ में आते हैं । यह क्रिया निरक्षोदय मानों से की जाने पर ग्रह का निरक्ष- देशीय ग्रह स्थान ज्ञान स्पष्ट होता है । अब यदि अपने देशीय उदयमान वशेन यह मध्यम ग्रह वश यह कर्म किया गया है तो याम्योत्तरान्तरात्मक चर संस्कार भी ग्रहों में स्वतः हो जाता है । स्पष्टार्कस्वदेशोदय मान से किये गये उक्त संस्कार से देशान्तर भुजान्तर और याम्योत्तरान्तर संस्कार जन्य ग्रह स्वदेशीय क्षितिज में स्वयं दृष्ट हो जाते हैं । पूर्वाचार्यों ने ऐसे उत्तम ग्रह गणित संस्कार की उपेक्षा क्यों की ? पूर्वाचार्यों के प्रति सम्मान प्रदर्शनार्थ आचार्य भास्कर ने पूर्वाचार्यों की त्रुटि न कह कर “अत्यन्त अल्प अन्तर होने से उक्त उदयान्तर कर्म की पूर्वाचार्यों ने उपेक्षा की है” कह कर विश्राम किया हैं । सही अर्थ में भास्कराचार्य की यह ग्रह गोल ज्ञान की चमत्कारिक सूझ की देन है । १०

१४६ गोलाध्याये मे. स्था वृ कदम्ब तारा ० स्था' मि. ध्रुव तारा स्था'' क. क्षेत्र देखिये । मे वृ मि क = क्रान्तिवृत्त या राशि वृत्त । मे स्था स्था' स्था'' = विषुवद्वृत्त । मे वृ = मेष राशि की कलाएँ = १८०० मे स्था = मेष राशि के उदय असु = १६७० इसी प्रकार मे मि = मे वृ = वृ मि प्रत्येक की कला १८०० तथा वृ मि० के विषुवांश = असु १७९५ तथा मे क — मे मि = मि. क. = मिथुन की कला १८०० एवं स्था' स्था'' = मिथुन राशि के असु १९३५ पदान्त में तीनों राशियों की कलायें = १८०० + १८०० + १८०० = ५४०० ,, ,, ,, ,, का असुमान = १६७० + १७९५ + १९३५ = ५४०० इससे सिद्ध होता है कि पदादि पदान्त में उदयान्तर का अभाव पदमध्य में उदयान्तर का परमत्व होता है । मध्य सावन मान के अहर्गण से ६० घटी + मध्यमगति कला के सावन दिन और स्पष्ट सावन प्रतिक्षण चल होने से ६० घटी + स्पष्ट रविगति उत्पन्न काल फल में अन्तर स्पष्ट हैं । अत एव मध्यम सावन अहर्गण से साधित ग्रह निरक्ष क्षितिज में न होकर आचार्य ने "क्षितिजसन्निधिगे सति मध्यमः" गणिताध्याय में उदयान्तर गणित का दिग्दर्शन कराते हुये, इस ग्रन्थ के इस गोलाध्याय में यहाँ पर उदयान्तर गणित साधनिका स्पष्ट कर दी है । भास्कराचार्य के पूर्ववर्त्ती ग्रह गणित सिद्धान्त मर्मज्ञों का ध्यान इस दिशा में नहीं गया या अत्यन्त स्वल्पान्तर से यह उदयान्तर गणित उपेक्षित हुआ है। वस्तुतः गणित विद्या के वर्षादि मानों में स्वल्पान्तर की उपेक्षा से दीर्घ काल में दृग्गणितैक्यता अन्तर आ जाने स सारा पञ्चाङ्ग कर्म पूर्णरूपेण दोषावह हो जाने का भय रहता है । वस्तुतः जैसा कि आज

होकर पुनः अपनी जगह पर"

Line 4: "ठीक आ जाती है ॥१९॥२०॥२१॥२२॥"

Line 5: "इदानीं देशान्तरस्वरूपमाह—"

Line 6: "येऽनेन लङ्कोदयकालिकास्ते देशान्तरेण स्वपुरोदये स्युः ।"

Line 7: "देशान्तरं प्रागपरं तथाऽन्यद्याम्योत्तरं तच्चरसंज्ञमुक्तम् ॥२३॥"

Line 8: "वा० भा०—य उदयान्तरकर्मणा लङ्कायामौदयिका ग्रहा जातास्ते देशान्तर-"

Line 9: "कर्मणा स्वपुरौदयिकाः स्युः । तच्च देशान्तरं द्विविधम् । एकं पूर्वापरमन्यद्याम्यो-"

Line 10: "त्तरम् । तच्चरसंज्ञमुक्तम् ॥२३॥"

Line 11: "तत्र तावत् पूर्वापरमाह—"

Line 12: "यल्लङ्कोज्जयिनीपुरोपरि कुरुक्षेत्रादिदेशान् स्पृशत्"

Line 13: "सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः ।"

Line 14: "आदौ प्रागुदयोऽपरत्र विषये पश्चाद्धि रेखोदयात्"

Line 15: "स्या

१४८ गोलाध्याये संज्ञम् । अन्यत् । द्वितीयं याम्योत्तरम् । तथा देशान्तरम् । तदप्रसिद्धिं परिहरति— तद्याम्योत्तरसंबन्धिदेशान्तरं फलं चरसंज्ञमुक्तं पूर्वैः । कालभेदेन भिन्नत्वात् । अतएव चञ्चलत्वाच्चरम् । पूर्वापरसंबन्धिदेशान्तरं फलं स्थिरत्वाद्देशान्तरसंज्ञम् । उभयोर्देश- संबन्धाद्देशान्तरत्वम् । तथा च रेखायां पूर्वापरप्रसिद्धदेशान्तराभावेऽपि याम्योत्तरचररूप- देशान्तरप्रसिद्धेस्तेनैव तत्सूर्योदये भवन्तीति भावः । अत एव लङ्कात् पूर्वापरनिरक्षदेशे देशान्तरेण पूर्वापरेणैवार्कोदयकाले भवन्ति । रेखाभिन्नस्वदेशे तु देशान्तराभ्यामिति लङ्कातः पूर्वापरयाम्योत्तरदेशेषु क्षितिजानां भेदसिद्धेर्भूर्मेर्गोलकत्वादित्युक्तं सम्यगेव ॥२३॥ अथ पूर्वापरदेशान्तरं तच्चरेखादेशसंबन्धीति स्पष्टं रेखादेशकथनव्याजेन मध्याधि- कारोक्तश्लोकार्धेन संसूचय

मध्यगतिवासना १४९ ग्रहगति × देशान्तर काल ──────────────────────── = देशान्तर फल ६० घटी इस क्षेत्रात्मक फल को पूर्वापर देश सम्बन्ध से क्रमशः ऋण और धन करने से पूर्वापर- देशीय सूर्योदय कालिक ग्रह होते हैं ॥२३॥२४॥ इदानीं भूगोले स्फुटपरिधिप्रदेशं स्फुटताऽनुपातं चाऽऽह— स्वदेशमेर्वन्तरयोजनैर्यल्लम्बांशजैर्मेरुगिरेः समन्तात् । वृत्तं स्फुटो भूपरिधिर्यतः स्यात्त्रिज्याहृतो लम्बगुणः कृतोऽस्मात् ॥२५ वा० भा०—स्वपुरस्य मेरुगर्भस्य चान्तरे यावन्ति योजनानि तावन्ति लम्बांशजानि । यतो निरक्षदेशस्वपुरान्तरयोजनान्यक्षांशजानि । भागेभ्यो योज- नानि च व्यस्तमित्युपपद्यत इत्यर्थः । तैर्लम्बांशजैर्योजनैर्मेरुगिरेः समन्ताद्यद्वृत्त- मुत्पद्यते स स्फुटो भूपरिधिः । यो मध्यपरिधिः पठितः स निरक्षदेशोपरि । अयं तु स्वपुरोपरि । अतः किञ्चिन्न्यूनो भवति । अथ तदानयनम् । मध्यपरिधेरभीष्टं त्रिज्यातुल्यं व्यासार्धं प्रकल्प्य तस्मिन् व्यासार्धे स्वपुरे यावती लम्बज्या तावत् स्फुटपरिधेर्व्यासार्धं भवितुमर्हति । अतस्तेन त्रैराशिकम् । यदि त्रिज्याव्यासार्धे मध्यमः परिधिर्लभ्यते तदा लम्बज्यामिते क इति । फलं स्फुटपरिधिरित्यु- पपन्नम् ॥२५॥ इति गोलाध्याये मध्यगतिवासना । मरीचिः—ननु देशान्तरफलानयनं स्पष्टभूपरिध्युपजीव्यम् । तत्र भूगोलिकत्वात्सर्वत्र भूपरिधेस्तुल्यत्वेन स्पष्टभूपरिधिस्त्वयुक्त इत्यतस्तत्स्वरूपप्रतिपादनपूर्वकं तदानयनोपपत्ति- मुपजातिकयाऽऽह—स्वदेशेति । स्वदेशो मेरुर्मेरुमध्यसमसूत्रेण भूपृष्ठस्थानं तयोरन्तरयोजनैर्भू पृष्ठस्यैर्मेरुगिरेर्मेरुम- ध्यसम्बन्धिभूगोलपृष्ठस्थानादित्यर्थः । समन्तात्तत्तत्केन्द्रकल्पनेन तद्योजनैर्भू गोलपृष्ठे तदभितो यद्वृत्तं भवति । ननु तद्योजनज्ञानाभावात्कथमिदमत आह—लम्बांशजैरिति । यथा भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तमित्युक्त्या निरक्षस्वदेशयोरन्तरयोजनान्यक्षांशेम्य- स्तथाऽक्षांशोननवतिरूपलम्बांशेभ्यस्तद्योजनानि भवन्ति । स स्पष्टो भूपरिधिर्यतः कार- णात्स्यात् । अतः कारणान्निरक्षदेशसंबन्धिपरमः स्पष्टपरिधिरूपस्वरूपस्त्रिज्या तुल्यलम्ब- ज्ययोक्तो भूपरिधिस्तदा स्वदेशलम्बज्यया क इत्यनुपातेन लम्बज्यागुणितो भवेत्कुपरिधिः स्पष्टस्त्रिज्याहृत इत्यनेन पूर्वोक्तेन त्रिज्याहृतो लम्बगुणाः स्पष्टपरिधिसिद्ध्यर्थं कृतः ॥२५॥ ननु खेटोऽनुपातेन यः स्यात्तस्यास्फुटना कथमिति मौलिकभूतप्रश्नस्योत्तरं न दत्तमित्यतः फक्किकयोत्तरमाह—इति मध्यमगतिवासनेति । अत्राहर्गणाद्युक्तं वासनया मध्यममानेति ।

१५० गोलाध्याये मध्यमाधिकारोक्तं मुख्यपदार्थानां निर्णयः कृतः । तदुत्तरं च स्पष्टज्ञानोपजीव्यं स्पष्टीकरण- वासनायां वक्तुमुचितमिति भावः ॥ दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीमद्रङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । यातः शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं मध्याधिकारगदितार्थसुवासनोऽयम् ॥ इति श्रीसकलसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वर- गणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये मध्यमगति- वासनाध्यायः ॥ केदारदत्तः—अपने भू-पृष्ठीय स्थान विशेष बिन्दु पर, भूपरिधिज्ञान— अपने स्थान और मेरु नाम ध्रुव स्थान के अन्तर योजन लम्बांश मान से ध्रुव स्थान से समान अन्तरित वृत्त की परिधि अपने देश की स्फुट भूपरिधि होती है । ध्रुव से स्वदेशीय याम्योत्तर में निरक्ष खमध्य तक त्रिज्या होने से पूर्व में पठित भूपरिधियोजन में त्रिज्या से भाग देकर लम्बज्या से गुणा करने से अपने देश की भूपरिधि होती है । उपपत्तिः—ध्रुवद्वय और अपने खमध्यद्वय गत याम्योत्तर वृत्त का नाडी वृत्त से जो सम्पात होता है उस सम्पात का नाम निरक्ष खमध्य होता है । निरक्ष खमध्य से अपने खमध्य तक याम्योत्तर वृत्त में अक्षांश चाप की ज्या का नाम अक्षज्या है । अक्षांश को ९० में घटाने से ध्रुव से अपने खमध्य तक लम्बांश की ज्या का नाम लम्ब-ज्या है और ध्रुव से निरक्ष खमध्य तक ९० अंश की ज्या का नाम त्रिज्या है । उ. ध्रु. अपना खमध्य पश्चिम पूर्व निरक्ष देशीय परिधि निरक्ष मध्य द. ध्रु. अतः अनुपात से—(क्षेत्र देखिये) ध्रु० पू० ध्रु० प० = ध्रुव का याम्योत्तर वृत्त । ध्रु० ख, नि० ध्रु० = अपने देश में याम्योत्तर वृत्त ।

मध्यगतिवासना १५१ ख० नि० = अक्षांश = ध्रु नि = ९०° । अतः ध्रु नि-नि ख = ध्रु ख = लम्बांश ९०° ज्या = त्रिज्या, ख० नि० ज्या = अक्षांश ज्या तथा ध्रु० ख० ज्या = लम्ब ज्या । पठित भूपरिधि योजन × लम्बज्या अतः अनुपात से --------------------------- = स्वदेशीय भूपरिधि मान उपपन्न त्रिज्या होता है ।२५।। इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के ग्रह गोलाध्याय के मध्यगतिवासनाध्यायः-४ की श्री पं० हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदार- दत्त:” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।

अथ छेद्यकाधिकारः इदानीं गोलं विवक्षुरादौ ज्योत्पत्तिकथने कारणमाह— पटो यथा तन्तुभिरूर्ध्वतिर्यग्रूपैर्निबद्धोऽत्र तथैव गोलः । दोःकोटिजीवाभिरमुं प्रवक्तुं ज्योत्पत्तिमेव प्रथमं प्रवक्ष्ये ॥१॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥१॥ मरीचिः — अथ मौलीभूतप्रश्नोत्तरदानरूपस्पष्टीकरणवासनाऽऽरब्धा व्याख्यायते । तत्र विना गोलस्थित्यवगमं तज्ज्ञानमशक्यमतो गोलस्वरूपं विवक्षुस्तदुपजीव्यां ज्योत्पत्तिमप- जातिकया प्रतिजानीते—पट इति । अत्र जगति पटो वस्त्रं यथोर्ध्वतिर्यग्रूपैर्दीर्घविस्तारयोनिवेशितैस्तन्तुभिर्निबद्धं तत्संनिवे- शात्मकं भवति तथा दोःकोटिज्याभिरूर्ध्वतिर्यक्स्थाभिः । एवकारोऽप्यर्थे । तेन कर्णसूत्रे- णेत्यर्थः । निबद्धो ग्रहाधिष्ठिताकाशगोलः । ग्रहस्पष्टीकरणार्थं दोःकोटिजीवानां ज्यासाधन- प्रकारेण साधनात्तद्युक्त्युक्तिरिति ध्येयम् । अमुं ग्रहादिगोलं प्रवक्तुं स्वरूपेण प्रतिपादयितुं प्रथममादौ ज्योत्पत्ति जीवासाधनप्रकारोपजीव्यखेटात्मकसिद्धजीवामुपपत्तिमित्यर्थः । एव- कारोऽप्यर्थे । तेन स्पष्टीकरणवासनात्मकं गोलाश्रितं तच्छोधकं चेत्यर्थः । प्रवक्ष्ये सूक्ष्म- त्वेनाहं कथयिष्ये । तथा च विना तन्तुस्वरूपज्ञानं पटस्वरूपज्ञानं तथा विना ज्यास्वरूप- ज्ञानं तदात्मकं गोलस्वरूपज्ञानमशक्यमिति प्रथमं ज्योत्पत्तिरुच्यत इति भावः ॥१॥ केदारदत्तः—गोल बन्धन की उपमा वस्त्र से दी जा रही है— जिस प्रकार, पूर्वापरयाम्योत्तरादि अनेक सूत्रों से वस्त्र का निर्माण कर वह उपयोग में आता है उसी प्रकार भुजज्या कोटिज्या उत्क्रम-कोट्युत्क्रम आदि अनेक ज्या और कोटिज्या रेखाओं से संवृत्त पिण्ड का नाम गोल होने से ग्रहगोलीय इस प्रकरण में सर्व प्रथम ज्योत्पत्ति बताई जा रही है ॥१॥ इष्टां त्रिज्यां सा श्रुतिर्दोर्भुजज्या कोटिज्या तद्वर्गविश्लेषमूलम् । दोःकोट्यंशानां क्रमज्ये पृथक् ते त्रिज्याशुद्धे कोटिदोरुत्क्रमज्ये ॥२॥ ज्याचापमध्ये खलु बाणरूपा स्यादुत्क्रमज्या त्रिभमौर्विकायाः । वर्गार्धमूलं शरवेदभागजीवा ततः कोटिगुणोऽपि तावान् ॥३॥ त्रिभज्यकार्धं खगुणांशजीवा तत्कोटिजीवा खरसांशकानाम् । क्रमोत्क्रमज्याकृतियोगमूलाद्दलं तदर्धांशकशिञ्जिनी स्यात् ॥४॥

त्रिज्योत्क्रमज्यानिहतेर्दलस्य मूलं तदर्द्धांशकशिञ्जिनी वा । तस्याः पुनस्तद्दलभागकानां कोटेश्च कोट्यंशदलस्य चैवम् ॥५॥ एवं त्रिषट्सूर्यजिनादिसंख्या अभीष्टजीवाः सुधिया विधेयाः । त्रिज्योत्थवृत्ते भगणाङ्किते वा ग्राह्या अभीष्टा विगणय्य जीवाः ॥६॥ वा० भा०—अत्र त्रिज्योत्थवृत्ते भगणाङ्किते वेत्येतदन्त्यवृत्तस्योत्तरार्धमादौ व्याख्यायते । ज्योत्पत्तावभीष्टा त्रिज्या कल्प्यते समायां भूमौ त्रिज्यामिताङ्गुलेन सूत्रेण वृत्तं विलिख्य दिगङ्कितं चक्रांशकैश्चाङ्कितं कृत्वा तत्रैकस्मिन्नेकस्मिन् वृत्त- चतुर्थांशे नवतिर्नवतिर्भागा भवन्ति । ततो यावन्ति ज्यार्धानि कार्याणि तावद्भि- विभागैरेकैकं वृत्तचतुर्थांशं विभज्य तत्र चिह्नानि कार्याणि । तद्यथा । यत्र चतुर्विं- शतिर्जीवाः साध्यास्तत्र चतुर्विंशतिर्भवन्ति । एवं द्वितीयचतुर्थांशेऽपि । ततो दिक्- चिह्नादुभयतश्चिह्नद्वयोपरि गतं सूत्रं ज्यारूपं भवति । एवं चतुर्विंशतिर्ज्या भवन्ति । तासामर्धानि ज्यार्धानि । तत्प्रमाणान्यङ्गुलेर्मित्वा ग्राह्याणि । अथाऽऽदितो व्याख्यायते । येष्टा त्रिज्या स कर्णः कल्प्यः । या भुजज्या स भुज- स्तयोः कर्णभुजयोर्वर्गान्तरपदं कोटिः । कोटिज्येत्यर्थः । तत्र ये भुजकोटिज्ये ते भुज- कोट्यंशानां क्रमज्ये ज्ञातव्ये । भुजज्या त्रिज्यातो यावद्विशोध्यते तावत् कोट्यं- शानामुत्क्रमज्याऽवशिष्यते । एवं कोटिज्योना त्रिज्या भुजांशानामुत्क्रमज्या स्यात् । अथोत्क्रमज्यास्थानं दर्शयति । तत्र पूर्वलिखिते वृत्ते चिह्नयोरुपरि गतं सूत्रं किल ज्या । तदुपरि तयोश्चिह्नयोर्मध्ये यद्वृत्तखण्डं तच्चापं धनुः । चापमध्यस्य ज्यामध्यस्य च यदन्तरं बाणाकारं सोत्क्रमज्येत्युच्यते । त्रिभमौर्विकाया इत्यग्रे संबन्धः । एवं साधारण्येन ज्याक्षेत्रं दर्शयित्वाऽथ निर्दिष्टांशानां गणितेन ज्यानयनम् । त्रिभमौर्विकाया यद्वर्गार्धस्य मूलं सा पञ्चचत्वारिंशदंशानां ज्या स्यात् । तस्या यावत् कोटिज्या साध्यते तावत् तावत्येव भवति । यतस्तत्र कोट्यंशा अपि पञ्चचत्वारिंशत् । अत्रोपपत्तिः । त्रिज्या भुजस्त्रिज्या च कोटिस्तद्वर्गयोगपदं वृत्तान्तःसमचतुर- स्रस्य भुजः स्यात् । सैव नवतिभागानां ज्या । तदर्धं ग्राह्यम् । अतो वर्गयोगस्य चतुर्थांशः कृतः । तदेव त्रिज्यावर्गार्धमतस्तन्मूलं शरवेदभागज्येत्युपपन्नम् । अथ त्रिंशद्भागानां ज्या त्रिज्यार्धमिता स्यात् । तस्याः कोटिज्या षष्टिभागानां ज्या स्यात् । अत्रोपपत्तिः । वृत्तान्तःपातिसमषडस्रस्य भुजो व्यासार्धमितः स्यादिति प्रसिद्धं गणितेऽपि कथितम् । अतस्त्रिज्यार्धं त्रिंशद्भागज्येत्युपपन्नम् ।

$1 \cdot versin^2$ उत्रिभा २ = $2 \cdot versin \cdot R$ (भा = ? no, "उ त्रि भा २" = उत्क्रमज्या × त्रिज्या × भावन? भा = 2? No, त्रि = त्रिज्या, भा = भावित?) Yes! In Indian algebra, 'भा' stands for भावित (product of two unknowns)! "उ त्रि भा २" = उत्क्रमज्या and त्रिज्या product, coefficient 2! But here "उत्रिभा २" has a minus sign? Wait, in Indian algebra, a dot above a number indicates negative. Look at line 8: above 'उत्रिभा २', is there a dot over '२'? Wait! Look above '२' in 'उत्रिभा २': There is a dot! Look above '२': yes, a dot! That means negative! Wait, user said: "Do NOT output LaTeX math syntax." Can we use Unicode dot or just write it as printed? Wait, is it "उत्रिभा २" or "उत्रिभा २̇"? Usually in transcription, people transcribe the text literally, but let's see if the dot is visible: Look at: "उव १ उत्रिभा २ त्रिव १ ।" Wait, above '२' in line 8, there is a dot: उत्रिभा २ं or उत्रिभा २̇. But wait, in standard Devanagari text, it's often

मध्यसूत्रादुभयतस्तुल्यपरिध्येकदेशयोः संलग्नऋज्वी रेखा संपूर्णज्या। तत्सं- बद्धोऽस्य परिध्येकदेशः संपूर्णं चापम्। अनयोर्मध्येऽन्तराले मध्यसूत्रान्तर्गतरेखैकदेशा या रेखा बाणरूपाऽवगता सोत्क्रमज्या स्यात् । खल्वित्यनेनोत्क्रमज्यायाः स्वरूपावगमे तदुपपत्तिः सुज्ञेया । तद्यथा—पूर्वमध्यसूत्राद्या भुजज्या तत्तुल्यमेव पूर्वकेन्द्रादितरमध्यसूत्रे कोटिज्या- मूलपर्यन्तमन्तरम् । तदूनं व्यासार्धं कोट्युत्क्रमज्या । एवमितरमध्यसूत्राद्या कोटिज्या तत्तुल्यमेव पूर्वमध्यसूत्रे भुजज्यामूलपर्यन्तं तदूनात्रिज्या भुजोत्क्रमज्या । अथ ज्योत्पत्तौ पञ्चचत्वारिंशद्भागानां ज्यानयनमाह—त्रिभमोर्विकाया इति । त्रिज्याया वर्गस्यार्धितस्य मूलं पञ्चचत्वारिंशद्भागानां जीवा । ततोऽनन्तरमियं भुजज्या त्रिज्याकर्ण इति प्रागुक्त्या तद्वर्गविश्लेषमूलमित्यनेनास्याः कोटिज्या तावान् भुजज्यामितेत्यर्थः । अपिशब्दो भुज- कोट्योस्तुल्यत्वनियमव्यवच्छेदार्थकः । तेनात्रोपपत्तिः प्रसिद्धा । तथा हि—पञ्चचत्वारिंशद्भा- गचिह्ने मध्यसूत्राभ्यां वृत्ते भुजकोट्योः समत्वात्तज्ज्ञानेऽपि त्रिज्यामितकर्णज्ञानात्तज्ज्ञानं सुलभम् । कर्णस्य भुजकोटिवर्गयोगमूलत्वात्कर्णवर्गो भुजकोटिवर्गयोरैक्यम् । तत्रापि भुज- कोट्योः समत्वेन प्रकृतकर्णवर्गे भुजज्यावर्गः कोटिज्यावर्गो वा द्विगुणः संभवत्यतः कर्ण- वर्गोऽर्धं भुजज्या तद्वर्गः कोटिज्यावर्गो वा तन्मूलं भुजज्या कोटिज्या वा तुल्यैवेति । तथा गजाग्निवेदाग्निमितत्रिज्यानुरोधेन त्रिज्यावर्गः ११८१९८४४ अस्यार्धं ५९०९९२२। अस्य सूक्ष्मं मूलं पञ्चचत्वारिंशद्भागानां ज्या २४३१।१।५९। इयं स्पष्टाधिकारोक्तः चतुर्विंशज्यासु द्वादशी ॥३॥

अथैकद्विराशिज्याज्ञातज्ञानज्यासंबन्धिभागानां तदर्धांशानां ज्याज्ञानं चोपजातिकयाऽऽह— त्रिभज्यकार्धमिति । त्रिज्यार्धे त्रिंशद्भागानां ज्या । त्रिंशद्भागानां कोटिजीवा पूर्वोक्तप्रकारेण षष्टिभागानां ज्या स्यात् । यथा त्रिज्या ३४३८ अर्धमेकराशिज्या १७१९ अष्टमी प्रकृते अस्या वर्गः २९५४९६१ त्रिज्यावर्गाच्छुद्धो ८८६४८८३ अस्य मूलं द्विराशिज्या षोडशी २९७७। २३।४३ । क्रमोत्क्रमज्येति येषामंशानां क्रमज्या ज्ञाता तेषामंशानामुक्तरीत्योत्क्रमज्या कोटि- ज्योनत्रिज्यारूपा ज्ञेया । ततस्तयोः क्रमज्ययोर्वर्गयोरैक्यान्मूलस्यार्धम् । ज्ञातक्रमज्योत्क्रम- ज्यासंबन्धिभागानामर्धांशास्तेषां क्रमज्या स्यादित्यर्थः । यथा पञ्चचत्वारिंशद्भागानां क्रमज्या २४३१ । एतत्तुल्यैव तेषां कोटिज्या । तयोना त्रिज्या तेषामुत्क्रमज्या १००७ । अनयोर्वर्गयो ५९०८९२२ । १०१४०४९ योगो ६९२३३७१ अस्य मूलस्यार्धं सार्धद्वा- विंशत्यंशानां ज्या षष्ठी १३१५।४०।१९। यथा वैकराशिक्रमज्या १७१९ द्विराशिज्योन- त्रिज्यैकराश्युत्क्रमज्या ४६१ अनयोर्वर्गयो २९५४९६१।२१२५२१ योगोऽ३१६७४८२स्य मूलार्धं पञ्चदशभागानां चतुर्थी ज्या ८८९।५३। अत्रोपपत्तिः । त्रिज्यामितव्यासार्धेन यद्- वृत्तं तद्द्वादशराश्यकं कार्यम् । तत्र परिधौ तद्व्यासार्धेन वृत्तम् । तद्वृत्तपूर्ववृत्तसंपातात्तद्व्या- सार्धेन पुनर्वृत्तम् । पुनस्तत्पूर्वपरिधिसंपातात्तद्व्यासार्धेन वृत्तमेवं पूर्ववृत्ते षड् वृत्तानि भवन्ति । तेषु व्यासार्धं त्रिज्या । सा पूर्ववृत्ते षडस्रभुजरूपा राशिद्वयस्य संपूर्णज्या तदर्ध-

, two avagrahas: ऽऽह.

त्रिज्योत्क्रमज्ययोर्घातार्धस्य मूलं यदंशानामुक्तक्रमज्या तदंशार्धांशानां क्रमज्या स्यात् । Correct.

वा प्रकारान्तरे । यथा पञ्चचत्वारिंशद्भागानामुक्तक्रमज्या १००७ त्रिज्यागुणा ३४६२०६६ Wait: वा प्रकारान्तरे । -> वा प्रकारान्तरे । Numbers: १००७, ३४६२०६६. Wait, check १००७: 1007. Check ३४६२०६६: 3462066. (1007 * 3438 = 3462066). Exactly!

अर्धिताऽ१७३१०३३ स्या मूलं सार्धद्वाविंशत्यंशानां ज्या १३१५ । १९ । यथा वैकराश्यु- Wait, अर्धिताऽ१७३१०३३ -> 3462066 / 2 = 1731033. Correct! Wait, स्या मूलं -> स्या मूलं or स्य मूलं? It says स्या मूलं (looks like स्या or अस्या?). Wait, look at the letter: स्या with a matra? Yes, स्या मूलं.

षण्मतज्योनात्रिज्याऽष्टादश्युत्क्रमज्या । अष्टादशोना त्रिज्या षण्मितोत्क्रमज्या । आभ्यां सपादेकदशांशानां सपादचतुस्त्रिंशदंशानां चोक्तरीत्या तृतीया नवमी च तयोः कोटिज्ये । एवं विंशीपञ्चदश्यौ । एवमर्धांशानामभीष्टज्या साध्योक्तरीत्याऽपेक्षावशादिति । यथा च प्रकृते सार्धद्वाविंशत्यंशज्यायाः कोटिज्या ३१७६ । २४ तयोना त्रिज्या तस्या उत्क्रमज्या २६१ । ३६ त्रिज्यागुणा ८९८८०८ अर्धं ४४९४०४ मूलं तृतीया ज्या ६७०।३४। एवमन्यान्यप्यानेयानि । अत्राधर्माधिकायवयस्यैकग्रहणग्रहणमार्षोक्ताविरुद्धम् । अर्धन्यूनाव- यवस्यैकग्रहणं क्वचित्तदनुरोधादेवेति ध्येयम् । अत्रोपपत्तिः । भुजोत्क्रमज्योना त्रिज्या कोटिक्रमज्या ऊ१ त्रि १ एतद्वर्गौ उव १ उत्त्रि २ त्रिव १ निस्त्रिज्यावर्गो भुजज्यावर्गः उव१ उत्त्रि २ । अस्य भुजोत्क्रमज्यावर्गो योज्य इत्यधनघनयोस्तुल्योनाशादवशिष्टं क्रमोत्क्रम- ज्याकृतियोगस्य स्वरूपमुत्क्रमज्या त्रिज्याघातो द्विगुण इति । अस्य मूलदलमिति लाघवा- दस्यैव दलमूलं ग्राह्यम् । तत्र मूलदलस्य वर्गचतुर्थांशरूपत्वादूर्गेण वर्गं गुणयेद्द्बजेच्चेत्युक्त- त्वाच्चोत्क्रमज्या । त्रिज्याघातस्य द्विगुणस्य चत्वारो हर इति भाड्यहरयोर्द्व्यर्थापवर्तनेनोत्क्रम- ज्या त्रिज्याघातार्धमूलमुपपन्नम् । एवमर्धांशकज्योत्पत्तिसाधनेन सर्वा अपि जीवास्तद्रूपा उत्पत्स्यन्तीति तस्याः पुनरित्याद्युपपन्नम् ॥ ५ ॥ न चैवमनियमाज्ज्याः कियत्यः साध्याः । न त्वत्करीत्या पूर्णानामेव ज्याज्ञानं येन नवधेयोर्निनियताः (?) स्युरित्यतस्तदुत्तरं प्रकारान्तरेण जीवाज्ञानं चोपजातिकयाऽऽह— एवमिति । एवमर्धांशज्यासाधनप्रकारेण । सुधिया गणकेन । अभीष्टजीवा अभीष्टांशानां ज्या विधेयाः सिद्धाः कार्याः । अयमर्थः । स्वेच्छया यन्मिता ज्या इष्टास्तत्संख्यया नवत्यंशास्त- त्कला वा भक्ताः, यल्लब्धं तदन्तरेणाभीष्टा ज्या उक्तरीत्या साध्याः । सुधियेति हेतुगर्भम् । तेनार्धांशज्याप्रकारेण तदन्तराभावेन यत्र ज्या सिध्यति सोपेक्षणीया । यत्र च तदन्तरे नोक्तप्रकारेण ज्यासिद्धिरुत्र पूर्वापरज्याभ्यामनुपातेन ज्या साध्येति सूचितम् । तत्रोदाह- रति—त्रिषडिति । यथाऽत्र ग्रन्थे चतुर्विंशतिजीवाकल्पनेन त्रिषट्सूर्यजिनादयश्चतुर्विंशति- जीवा उक्तरीत्योपपन्नाः । पञ्चचत्वारिंशदंशज्याया अर्धज्यासाधनरीत्या षष्ठी तृतीया जीवा भवति नान्या । तदुद्देशेनैकविंशत्यष्टादश्योर्जीवयोरुद्देशः । कोटिज्याया उपजीव्यत्वात् । एवमष्टादश्या नवमीष्टांशानां ज्याज्ञानासम्भवादनुपातस्यात्रासंगतत्वादित्यतः प्रकारान्तरेण सूक्ष्मजीवाज्ञानमाह—त्रिज्योत्थवृत्त इति । त्रिज्यामितव्यासाधैन कृतवृत्ते । भगणाङ्किते । द्वादशराशिकलाविकलाभिरङ्किते । अभीष्टा जीवा विगणय्य गणयित्वा ग्राह्या

१५८ गोलाध्याये मर्धज्या तन्मापकेन त्रिज्या तन्मापकेनैव गणयित्वा ज्ञेयमेवं स्वेच्छयाऽभीष्टांशानां सूक्ष्मज्या सिध्यतीति ॥ ६ ॥ केदारदत्त:— किसी समान भूमि में अर्थात् जल आदि से समतल कृत भूमि धरातल में अभीष्ट अंगुल व्यासार्ध रेखा से एक वृत्त बना कर उस वृत्त में पूर्व पश्चिमादि दिक् चिह्न लगाकर उस वृत्त में, ३६० अंश, पुनः एक-एक अंश में ६० विकला····के स्थान अङ्कित करने चाहिए। इस प्रकृत वृत्त के चार चतुर्थांश में ९०° होंगे। एक चतुर्थांश चाप में जितनी जीवा करनी है उस चतुर्थांश चाप के उतने अभीष्ट विभाग करने चाहिए। गणिताचार्यों ने एक वृत्त के धनु अंश में २४ विभागों की कल्पना की है अतः इस आधार से (९०° × ६०) / २४ = २२५ कला का एक चाप होता है। प्रत्येक अभीष्ट चिह्नगत सरल रेखा का नाम ज्या होता है। इस प्रकार २४ संख्यक ज्या होती हैं जिनका ज्यार्ध नाम भी होता है। सोपपत्तिक व्याख्या— किसी भी वृत्त खण्ड की इष्ट त्रिज्या कर्ण, भुजज्या = भुज कर्ण और भुज का वर्गान्तर मूल = कोटि होती है। क्षेत्र देखें— अ क ल प ह म न ट र ल स वृत्त का चतुर्थांश वृत्त = अ ह। अभीष्ट चाप = अ प की ज्या सरल रेखा = प य = केत = भुज। चाप अ ह – चाप अ प = चाप प ह = कोटि चाप की ज्या = प त = कोटि। केन्द्र से परिधि तक की केप रेखा = कर्ण। अतः के त² + त प² = के प² तथा = के प² - प त² = के त² = भुज ज्या²

छेद्यकाधिकारः १५९ इस प्रकार भुज ज्या² + कोटि ज्या² = केत² = कर्ण² = कर्ण । अतः २√भुज ज्या² + कोटिज्या² = २√के त² = कर्णवर्ग का मूल = कर्ण इसी प्रकार यह भुज और कोटि की क्रम ज्या होती हैं। केह - केत = त्रिज्या - भुज ज्या = त ह = कोटि उत्क्रम ज्या । तथा के अ - के य = त्रिज्या - कोटि ज्या = अ य = भुजोत्क्रम ज्या । ज्या और चाप के मध्य में बाण (शर) आकार को भुज सम्बन्धेन कोटि उत्क्रम, और कोटि सम्बन्धेन भुजोत्क्रम होती है। सरल त्रिकोणमिति, चापीय त्रिकोणमिति नामक आधुनिक ग्रन्थों के अध्ययन से उक्त सभी विषय और अधिक स्पष्ट होते हैं, छात्रों ने उक्त त्रैकोणमितिक ग्रन्थों का सम्यगध्ययन करना चाहिए । तत्कालीन गणित परम्परा और बहुविकसित आधुनिक गणित का चापीय एवं सरल त्रिकोणमितिक गणितों का मूल स्रोत आचार्योक्त यही गणित हैं। शेष स्पष्ट है। यहाँ पर ग्रन्थ गौरवभय से उक्त विषय का मात्र दिग्दर्शन कराया गया है जो पर्याप्त है ॥२॥३॥४॥५॥६॥ क्योंकि इस गणित सम्बन्ध के आधुनिक गणित ग्रन्थ, गणितज्ञों की देन से यत्र तत्र सर्वत्र सुलभ एवं सुबोध गम्य हैं । अतएव ग्रन्थ विस्तार भय से यहाँ पर इस विषय का संक्षेप किया जा रहा है । भास्कराचार्यरचिता ज्योत्पत्तिरियमद्भुता । मुनीश्वरेण विवृता गुरुरामप्रसादतः ।१। इदानीं स्पष्टीकरणे फलस्योत्पत्तिमाह— भूमेर्मध्ये खलु भवलयस्यापि मध्यं यतः स्याद् यस्मिन् वृत्ते भ्रमति खचरो नास्य मध्यं कुमध्ये । भूस्थो द्रष्टा नहि भवलये मध्यतुल्यं प्रपश्ये- त्तस्मात्तज्ज्ञैः क्रियत इह तद्दोःफलं मध्यखेटे ॥७॥ वा० भा०—यदेतद् भपञ्जरेऽश्विन्यादीनां भानां वलयं तद्भूमेः समन्तात्सर्वत्र तुल्येऽन्तरे वर्तते । यतस्तस्य मध्यं कुमध्ये । अथ यस्मिन्वृत्ते ग्रहो भ्रमति तस्य मध्यं कुमध्ये न । तद्भूमेः समन्तात्समानान्तरं नेत्यर्थः । अतो भूस्थो द्रष्टा भव- लये मध्यमस्थाने ग्रहं न पश्यति । किन्त्वन्यत्र पश्यति । तयोर्भवलये यदन्तरं तद् ग्रहस्य फलमित्यर्थादुक्तं भवति । अत उक्तं—तस्मात्तज्ज्ञैः क्रियत इह तद्दोःफलं मध्यखेट इति ॥७॥ मरीचिः—अथ संसिद्धादित्यादिप्रश्नोत्तरभूतस्पष्टक्रियावासनां निरूपयितुं प्रथमं फल- वासनां संक्षिप्तां वक्ष्यमाणार्थनिरूपणसंगतिसूचिकां मन्दाक्रान्तयाऽऽह—भूमेरिति ।