सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| २५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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शोकमात्मविद्' इति श्रुतस्य ब्रह्मज्ञानस्य मूलाज्ञानाश्रयभूतसर्वोपादान- ब्रह्मसंसर्गनियतस्य मूलाज्ञाननिवर्तकत्वात् । 'ऐन्द्रियकवृत्तयस्तत्तदिन्द्रिय- सन्निकर्षसामर्थ्यात् तत्तद्विषयावच्छिन्नचैतन्यसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते' इति नियममुपेत्याऽज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतत्वं निवर्तकज्ञानविशेषणं वाच्यम् । तथा च 'यद् अज्ञानं यं पुरुषं प्रति यद्विषयावरकम्, तत् तदीय तद्विषयतद्- ज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतात्मलाभज्ञाननिवर्त्यम्' इति ज्ञानाज्ञानयोर्विरोध- प्रयोजकं निरूपितं भवति ।
इससे अर्थात् 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि नियममें अपरोक्षत्वका निवर्तकज्ञानके विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं हो सकनेसे 'तरति०' (आत्मज्ञानी अज्ञानको तैर जाता है अर्थात् ज्ञानीका अज्ञान निवृत्त हो जाता है) यह श्रुत ब्रह्मज्ञान, जो कि मूलाज्ञानके आश्रयभूत तथा सम्पूर्ण जगत्के प्रति उपादानभूत ब्रह्ममें नियमतः संसृष्ट है*, मूलाज्ञानका निवर्तक है। अतः तत्- तत् इन्द्रियोंकी सामर्थ्यसे इन्द्रियजन्य वृत्तियाँ भी तत्-तत् विषयोंसे युक्त चैतन्यसे संसृष्ट ही उत्पन्न होती हैं, ऐसा नियम मानकर अज्ञानाश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतत्व निवर्तक ज्ञानमें विशेषण देना चाहिए । इससे 'जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरक होता है, वह † तदीय और तद्विषयक तदज्ञानके आश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले ज्ञानसे निवर्त्य है', इस प्रकार ज्ञान और अज्ञानके विरोधके प्रयोजकका स्वरूप निरूपित होता है ।
विषयचैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य है, अज्ञानकी निवृत्तिमें कारण कैसे होगा, अर्थात् कदापि नहीं हो सकता है, इसलिए वह अज्ञाननिवृत्तिके प्रति निवर्तकज्ञानका प्रयोजकत्वरूपसे विशेषण नहीं हो सकता है, यह भाव है ।
* तात्पर्य यह है कि जब ब्रह्मविषयक ज्ञानकी (वृत्तिकी) उत्पत्ति होती है, तब नियमतः वह ब्रह्मसंसृष्ट ही उत्पन्न होती है, क्योंकि ब्रह्म सभीका उपादान है, कार्यमात्र जन्मसे लेकर उपादानभूत ब्रह्मके साथ संसृष्ट होता है, इसीलिए ब्रह्मविषयक वृत्तिज्ञानका भी स्वनिवर्त्य मूलाज्ञानके आश्रयीभूत ब्रह्ममें संसर्गनियम अर्थसिद्ध है।
† घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटको आवृत्त करनेवाले अनेक अज्ञान हैं, उनमें से कोई देवदत्तके प्रति आवरक हैं, तो कोई यज्ञदत्तके प्रति, इस प्रकारसे प्रतिविषय पुरुषके भेदसे अनेक अज्ञान हैं, इसलिए विषयावारक अज्ञानोंमें से जो अज्ञान जिस देवदत्तके प्रति जिस विषयको आवृत्त करता है, वह अज्ञान उसी देवदत्तके घटविषयक उस अज्ञानके आश्रयभूत चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले (नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे) ज्ञानसे निवर्त्य है, अर्थात् देवदत्तके प्रति घटावारक जो अज्ञान है, उसका
वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २५९
न चैवं सति नाडीहृदयस्वरूपगोचरशब्दज्ञानस्याऽप्यज्ञाननिवर्तकत्व- प्रसङ्गः, तस्य कदाचिदर्थसम्पन्ननाडीहृदयान्यतरवस्तुसंसर्गसम्भवेऽपि विषयसंसर्गं विनाऽपि शाब्दज्ञानसम्भवेन तत्संसर्गनियतात्मलाभत्वाभावात् । तस्माज्ज्ञानाज्ञानविरोधनिर्वाहाय वृत्तिनिर्गमो वक्तव्य इति ।
ऐसा होनेपर 'हृदयपुण्डरीकमें नाडियाँ हैं' इस प्रकार शब्दसे उत्पन्न हुए नाडी और हृदयके स्वरूपावगाही ज्ञानमें अज्ञाननिवर्तकत्वका प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि दैववशसे उक्त शब्दजन्यज्ञानका (वृत्तिका) नाडी और हृदयसे अवच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्बन्ध होनेपर भी (किसी समय) विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्बन्धके बिना भी उक्त शब्दजन्यवृत्तिकी उत्पत्ति हो सकती है, अतः चैतन्यसंसर्गसे नियतात्मलाभवाला ज्ञान नहीं है । [तात्पर्यार्थ यह है कि 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि विरोध प्रयोजकको नियमगर्भित माननेसे परोक्षवृत्तियोंका विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ संसर्ग न होनेके कारण उनमें अज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहा जा चुका है, इसपर शङ्का होती है कि यह कहना असङ्गत है, क्योंकि परोक्षवृत्तिका भी किसी स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ संसर्ग देखा जाता है, जैसे कि 'हृदयपुण्डरीकमें नाड़ियाँ हैं' इस वाक्यसे उत्पन्न हुई वृत्तिके दैवयोगसे हृदयपुण्डरीकस्थ अन्तःकरणमें नाड़ी या हृदय दोनोंमें से किसी एकसे अवच्छिन्नरूपसे उत्पन्न होनेपर उस वृत्तिका नाड़ी या हृदयसे युक्त चैतन्यमें संसर्ग होनेके कारण उस वृत्तिमें भी अज्ञानके निवर्तकत्वकी प्रसक्ति आवेगी ? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं कि नहीं, उक्त प्रसक्ति नहीं आ सकती है, कारण कि विरोधका प्रयोजक जो तथाकथित नियम है, वह नियम व्यापकता से घटित है । भाव यह है कि जब जब नाड़ी, हृदयादिविषयक शब्दजन्य वृत्तिका उदय होता है, तब तब उस वृत्तिका नाड़ी आदिसे युक्त चैतन्यमें संसर्ग होता है, यह नियम नहीं है, कारण कि इन्द्रिय-
आश्रयीभूत जो घटावच्छिन्न चैतन्य है, उसमें संसर्गसे नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे ज्ञानसे उक्त अज्ञान निवर्त्य है । जब-जब घटेन्द्रियसन्निकर्षसे घटविषयक वृत्तिज्ञान की उत्पत्ति होती है, तब-तब घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटविषयक वृत्तिज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह नियम है । इसीलिए 'ऐन्द्रियवृत्तयः तत्तद्विषयावच्छिन्नसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते, इति नियममुपेत्य' अर्थात् जब इन्द्रियजन्यवृत्तियोंकी उत्पत्ति होती है, तब उन वृत्तियोंका विषयावच्छिन्न चैतन्यमें संसर्ग है, ऐसा कहा गया है इसी प्रकार इस नियमका अन्यत्र भी उपयोग जानना चाहिए ।
| २६० | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ प्रथम परिच्छेद |
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अन्ये विषयसम्मोहभेदनाय तमास्थिताः ।
परे चिदुपरागार्थम् अभेदव्यक्तयेऽपरे ॥१२१॥
कोई लोग कहते हैं किं विषयगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन है, कुछ लोग कहते हैं कि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए वृत्तिका निर्गमन अपेक्षित है और कोई लोग अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन मानते हैं ॥१२१॥
अन्ये तु—विषयगताज्ञानस्य लाघवात् समानाधिकरणाज्ञाननिवर्त्यत्वसिद्धौ वृत्तिनिर्गमः फलतीत्याहुः ।
अपरे तु—बाह्यप्रकाशस्य बाह्यतमोनिवर्तकत्वं सामानाधिकरण्ये सत्येव
जन्य वृत्तियाँ तो तत्-तत् इन्द्रियगोलकसे युक्त अन्तःकरणप्रदेशमें होती हैं, अतः उनमें उक्त नियम घटता है, परन्तु अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियनिरपेक्ष-वृत्तियोंके प्रदेशनियममें कारण न होनेसे हृदयादिविषयक शाब्दवृत्ति कदाचित् हृदयादिदेशस्थ अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है और कदाचित् पैर आदि देशसे युक्त अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है । अतः उक्त नियम नहीं हो सकता है, कारण कि पैरमें जब उक्त वृत्ति होगी तब नाड़ीसे ऽवच्छिन्न चैतन्य ही नहीं है, अतः उसका संसर्ग भी नाड़ीयुक्त चैतन्यमें नहीं होगा ] । इससे—वृत्तिज्ञानमें अज्ञानाश्रयीभूत चैतन्यके साथ सम्बन्धके विना अज्ञान निवर्तकत्व न होनेके कारण—ज्ञान और अज्ञानके विरोधके निर्वाहके लिए वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए ।
कोई लोग कहते हैं कि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति लाघवसे* समानाधिकरण ज्ञानसे ही सिद्ध होती है, अतः वृत्तिनिर्गमन अर्थतः प्राप्त होता है ।
कुछ लोग कहते हैं किं सामानाधिकरण्यके रहनेपर ही बाह्य प्रकाश बाह्य
* अन्वय और व्यतिरेकसे विषयगत अज्ञानके ज्ञाननिवर्त्यत्वपरिज्ञानदशामें प्रथमतः समानाधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व ही अज्ञानमें लाघवसे गृहीत होता है व्यधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व गृहीत नहीं होता है, अतः वृत्तिनिर्गमनके विना ज्ञान और अज्ञानका सामानाधिकरण्य ( एकाधिकरणवृत्तिता ) हो ही नहीं सकता है, इसलिए वृत्तिनिर्गम मानना चाहिए । तात्पर्य यह है कि घटावच्छिन्न चैतन्यमें, घटका आवारक अज्ञान है इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप ज्ञानका कार्य भी विषयावच्छिन्न चैतन्यमें ही होगा । इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप कार्यका, अपने कारण ज्ञानके साथ इन्द्रियसन्निकर्षकी सामर्थ्यसे, सामानाधिकरण्यरूप सम्बन्धके सम्भव होनेपर उसका परित्याग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि कार्य और कारणका सामानाधिकरण्य औत्सर्गिक है ।
वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २६१
दृष्टमिति दृष्टान्तानुरोधाद् वृत्तिनिर्गमः सिद्ध्यतीत्याहुः ।
केचित्तु—आवरणाभिभवार्थं वृत्तिनिर्गमानपेक्षायामपि चिदुपरागार्थं प्रमातृचैतन्यस्य विषयप्रकाशकब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यर्थं वा तदपेक्षेत्याहुः ।
अभेदो जीवपरयोः सिद्धो वेदान्तमानकः ।
यतोऽत्र सर्ववेदान्तास्तात्पर्येण समन्वियुः ॥१२२॥
जीव और ब्रह्मका अभेद वेदान्तप्रमाणसे सिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्मके बोधनमें ही है ॥१२२॥
इति श्रीमद्गङ्गाधरसरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां प्रथमपरिच्छेदः समाप्तः ।
अथ किं प्रमाणकोऽयं जीवब्रह्मणोरभेदः, यो वृत्त्याऽभिव्यज्यते ?
अन्धकारका निवर्तक देखा गया है, इसलिए दृष्टान्तके अनुसार वृत्तिका निर्गम सिद्ध होता है *।
कोई लोग कहते हैं कि यद्यपि आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिके निर्गमनकी अपेक्षा नहीं है, तथापि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए अथवा प्रमातृ-चैतन्य और विषयप्रकाशक ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिके लिए उसकी (वृत्तिनिर्गमकी) अपेक्षा है† ।
अब शङ्का होती है कि जीव और ब्रह्मके अभेदमें क्या प्रमाण है, जो वृत्तिसे अभिव्यक्त होता है।
* भाव यह है कि लोकमें दूसरे देशके प्रकाशसे दूसरे देशके अन्धकारकी निवृत्ति नहीं होती है, किन्तु समानदेशमें ही स्थित अंधकार और प्रकाशका परस्पर निवर्त्यनिवर्तक भाव होता है, इसी दृष्टान्तके अनुसार ज्ञान और अज्ञानका, जो कि प्रकाश और अन्धकाररूप हैं, निवर्त्य-निवर्तक भाव सामानाधिकरण्यसे ही होगा। उनका सामानाधिकरण्य अज्ञानके आश्रय विषयावच्छिन्नचैतन्यमें ही हो सकता है, अतः सामानाधिकरण्यके लिए अर्थात् विषयावच्छिन्न चैतन्यमें वृत्तिज्ञानके संसर्गके लिए वृत्तिका निर्गमन मानना ही चाहिए ।
† यदि विषयचैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन न भी माना जाय, तो भी वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए, इस अभिप्रायसे 'केचित्तु'का मत है ।
| ३६२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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'वेदान्तप्रमाणकः' इति घण्टाघोषः। सर्वेऽपि वेदान्ता उपक्रमोप-संहारैकरूप्यादितात्पर्यलिङ्गैर्विमृश्यमानाः प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मण्यद्वितीये समन्व-यन्ति। यथा चायमर्थः, तथा शास्त्रे एव समन्वयाध्याये प्रपञ्चितः। विस्तरभयान्नेह प्रदर्श्यते इति ॥१९॥
इति सिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः।
इस शङ्काका परिहार करते हैं कि जीव और ब्रह्मके अभेदमें वेदान्त (उप-निषत्-वाक्य) ही प्रमाण हैं, यह घण्टाघोष है अर्थात् उक्त अभेदमें वेदान्त ही प्रमाण हैं, यह बात जगत्प्रसिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका उपक्रम, और उपसंहारके ऐक्यरूप* आदि तात्पर्यलिङ्गोंसे विचार करनेपर जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्ममें ही पर्यवसान होता है। जिस प्रणालीसे वेदान्तोंका तात्पर्य-विषयीभूत जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्म है, उसका शास्त्रमें—समन्वयाध्यायमें—विचार किया गया है। विस्तारके भयसे प्रकृतमें उसका प्रपञ्च नहीं किया जाता है।
इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहके वेदान्ताचार्य-श्रीपण्डितमूलशङ्करव्यासविरचित भाषानुवादमें प्रथम परिच्छेद समाप्त
* उपक्रम आदिका (३३ वें पेजकी) टिप्पणीमें विचार और लक्षण बतलाए गये हैं, अतः वहींसे उपक्रमादिके लक्षणोंका अवधान करना चाहिए।
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिके अबाधितत्वका विचार] भाषानुवादसहित २६३
ॐ नमः परमात्मने द्वितीय परिच्छेद
ननूपजीव्यप्रत्यक्षाविरुद्धं श्रुतियुक्तिभिः ।
बोध्यते कथमद्वैतम्,
यहाँपर शङ्का होती है कि सभी प्रमाणोंके उपजीव्य—कारण—प्रत्यक्षप्रमाणसे विरोध होनेके कारण श्रुति और युक्तियोंसे अद्वैतका बोध कैसे हो सकता है ?
अथ कथमद्वितीये ब्रह्मणि वेदान्तानां समन्वयः, प्रत्यक्षादिविरोधाद् ? इति चेन्, न; आरम्भणाधिकरणो- ( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ )-दाहृतश्रुतियुक्तिभिः प्रत्यक्षाद्यधिगम्यस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मविवर्त-तया मिथ्यात्वावगमात् । ननु न श्रुतियुक्तिभिः प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं
* यहां पर शङ्का होती है कि वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्ममें कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे विरोध है, [ अर्थात् ब्रह्माभिन्न घटादि-प्रपञ्चके प्रत्यक्ष आदिसे सिद्ध होनेके कारण ब्रह्ममें अद्वितीयत्व बाधित है, अतः श्रुतिका बाधित अर्थमें तात्पर्य माना जायगा, तो अप्रामाण्य प्रसक्त होगा, इसलिए वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्ममें नहीं हो सकता है, यह शङ्काका भाव है ], नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि आरम्भणा-धिकरणमें उदाहृत श्रुति और युक्तियोंसे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे गृहीत पदार्थोंके ब्रह्मविवर्त होनेसे उनमें मिथ्यात्वका ही अनुमान होता है। यदि शङ्का हो कि श्रुति और युक्तियोंसे प्रपञ्चमें मिथ्यात्वका साधन ही
* प्रथमपरिच्छेदमें ब्रह्मलक्षणविचारके प्रसङ्गमें, मतभेदसे ज्ञेय ब्रह्ममें लक्षणकी वृत्तिता है और ईश्वररूप ब्रह्ममें भी है, ऐसा निरूपण करनेसे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके 'तत्' शब्दके लक्ष्य और वाच्य अर्थका निरूपण किया गया है। उसके बाद जीव और जीव-साक्षीके निरूपणसे 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थका भी विवेचन किया गया है, और इनके निरूपणसे अभेदरूप वाक्यार्थका भी अर्थात् निरूपण किया गया है, इसलिए प्रथम परिच्छेदमें जीवाभिन्न निर्विशेष ब्रह्ममें वेदान्तसमन्वयरूप प्रथमाध्यायार्थका तात्पर्य निरूपण हो जाता है। अब द्वितीयाध्यायार्थरूप वेदान्तसमन्वयका मानान्तरसे विरोधके परिहारका निरूपण करनेके लिए द्वितीय परिच्छेदका आरम्भ करते हैं—"अथ" इत्यादिसे, यह भाव है।
| २६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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प्रत्याययितुं शक्यते; 'घटः सन्' इत्यादिघटादिसत्त्वग्राहिप्रत्यक्षादिविरोधात् ।
तत्त्वशुद्धिकृतो विदुः ॥ १ ॥
शुक्तीदन्तेव सन्मात्रं सर्वाध्यक्षेषु गोचरः ।
रूप्यवद्घटभेदादिर्भ्रान्तेरित्याविरुद्धता ॥ २ ॥
उक्त शङ्काके परिहारमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं कि शुक्तिमें इदन्त्वके समान सभी प्रत्यक्षोंमें सन्मात्रका अवगाहन होता है और शुक्तिमें रूप्यका ज्ञान भ्रान्तिसे ही होता है, वैसे ही सन्मात्रमें घट आदिका भ्रान्तिसे ही अवभास होता है, अतः विरोध नहीं है ॥ १ ॥ २ ॥
**अत्राहुस्तत्त्वशुद्धिकाराः—**न प्रत्यक्षं घटपटादि तत्सत्त्वं वा गृह्णाति, किन्तु अधिष्ठानत्वेन घटाद्यनुगतं सन्मात्रम् । तथा च प्रत्यक्षमपि सद्रूपब्रह्माद्वैतसिद्धयनुकूलमेव । तथा सति 'सद्' 'सद्' इत्येव प्रत्यक्षं स्यात्, न तु 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षमिन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधायीति चेत्, न; यथा भ्रमेष्विदमंशस्याऽधिष्ठानस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, इन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोः तत्रैवोपक्षयः । रजतांशस्य त्वारोपितस्य भ्रान्त्या प्रतिभासः,
नहीं सकता है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इस प्रकारके घट आदिमें सत्त्वके ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्ष आदिके साथ विरोध होगा ।
इस आक्षेपके समाधानमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं—प्रत्यक्षसे घट, पट आदि विषयोंका अथवा उनमें रहनेवाले सत्त्वका ग्रहण नहीं होता है, किन्तु अधिष्ठानत्वरूपसे घट, पट आदिमें अनुगत सन्मात्रका ही ग्रहण होता है, इसलिए प्रत्यक्षप्रमाण भी सद्रूप, अद्वितीय ब्रह्मकी सिद्धिमें अनुकूल ही है । पुनः शङ्का होती है कि यदि प्रत्यक्ष सन्मात्रविषय ही है, तो 'सत्' 'सत्' इसी प्रकारसे प्रत्यक्ष होना चाहिए, 'घट सत् है, इस प्रकार इन्द्रियके साथ अन्वय और व्यतिरेकका अनुविधायी प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिए, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे भ्रमात्मक ज्ञानमें इदमंशरूप अधिष्ठानका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है । इन्द्रियके अन्वय और व्यतिरेक अधिष्ठानप्रत्यक्षमें ही चरितार्थ हैं, और आरोपित रजतांशका प्रतिभास साक्षिरूप भ्रान्तिसे होता है, वैसे ही सर्वत्र इन्द्रियोंसे सन्मात्र अधिष्ठानका ही ग्रहण होता है, इन्द्रियोंका व्यापार उसीके प्रत्यक्षमें समाप्त होता है, और घट, पट आदि वस्तुका प्रतिभास भ्रान्तिसे होता है.
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्वविचार ] भाषानुवादसहित २६५
तथा सर्वत्र सन्मात्रस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, तत्रैवेन्द्रियव्यापारः । घटादि- भेदवस्तुप्रतिभासो भ्रान्त्येत्यभ्युपगमात् ।
ननु तद्वदिह बाधादर्शनात् तथाऽभ्युपगम एव निर्मूल इति चेत्, न; बाधादर्शनेऽपि देशकालव्यवहितवस्तुवद् घटादिभेदवस्तुनः प्रत्यक्षा- योग्यत्वस्यैव तत्र मूलत्वात् ।
तथाहि—इन्द्रियव्यापारानन्तरं प्रतीयमानो घटादिः सर्वतो भिन्न एव प्रतीयते । तदा तत्र घटादिभेदे संशयविपर्ययादर्शनात् । यत्राऽपि स्थाण्वादौ पुरुषत्वादिसंशयः, तत्राऽपि तद्व्यतिरिक्तेभ्यो भेदोऽसन्दिग्ध- विपर्यस्तत्वात् प्रकाशते एव । भेदस्य च प्रतियोगिसहोपलम्भनियमवतो
अर्थात् इन्द्रियजन्यवृत्तिसे अभिव्यक्त सन्मात्ररूप साक्षिचैतन्यरूप भ्रान्तिसे होता है, ऐसा स्वीकार किया गया है ।
यदि कहो कि शुक्तिरजत आदिके समान * घटादि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं देखा जाता है, अतः घटादिप्रपञ्च भ्रान्तिसिद्ध है, यह कहना अनु- चित है ? यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि बाधका दर्शन न होनेपर भी देश, काल आदिसे व्यवहित वस्तुके समान घट आदिमें रहनेवाले भेदरूप वस्तुओंका प्रत्यक्षायोग्यत्व ही घटादिके भ्रान्तिसिद्धत्वमें प्रयोजक है ।
जैसे कि इन्द्रियव्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट आदि अन्य सभी से भिन्न ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उस समय घटादिमें रहनेवाले भेदमें संशय और विपर्ययका अवभास नहीं होता है । और जहांपर स्थाणुप्रभृतिमें पुरुषत्व आदिका सन्देह होता है, वहाँ भी पुरुषत्वादिसे अन्य पदार्थोंका असंदिग्ध
* तात्पर्य यह है कि शुक्तिमें रजतका भ्रम होनेके अनन्तर दोष आदिकी निवृत्ति होनेपर 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस प्रकार बाधज्ञान होता है, इसी प्रकार घटादि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं होता है, इसलिए घटादि द्वैतप्रपञ्चको भ्रान्तिसिद्ध कैसे मानना ? इस प्रकारका संशय होनेपर उत्तरदाता कहता है कि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं देखा जाता है, इसका क्या अर्थ है, क्या श्रोतबाधका अदर्शन अर्थ है या प्रत्यक्षबाधका अदर्शन अर्थ है, अथवा यौक्तिकबाधका अदर्शन अर्थ है । प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतिसे बाध देखा जाता है, द्वितीयपक्ष अङ्गीकार करके तृतीयका 'बाधादर्शनेऽपि' इत्यादिसे निषेध करते हैं ।
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| २६६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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न प्रत्यक्षैण ग्रहणं सम्भवति । देशकालव्यवधानेनाऽसन्निकृष्टानापि प्रतियोगिनां सम्भवात् । भेदज्ञानं प्रतियोग्यंशे संस्कारापेक्षणात् स्मृतिरूपमस्तु प्रत्यभिज्ञानमिव तत्तांशे इति चेत्, न ; तथाऽपि भेदगतप्रतियोगिवैशिष्ट्यांशे तदभावात् ।
न च कनकाचलो भेदप्रतियोगी, वस्तुत्वादिति भेदे प्रतियोगिवैशिष्ट्यगोचरानुमित्या तत्संस्कारसम्भवः । भेदे ज्ञानं विनाऽनुमित्यभावेनाऽऽ-
और विपर्यासशून्य भेद प्रकाशित होता है, प्रतियोगीके साथ ही * जिसकी उपलब्धि नियत है, ऐसे भेदका प्रत्यक्षप्रमाणसे अर्थात् चक्षुरादिसे ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि देश और कालके व्यवधानसे असम्बद्ध भी प्रतियोगी हो सकते हैं। यदि कहो कि प्रतियोगी अंशमें भेदका ज्ञान संस्कारकी अपेक्षा रखता है, अतः स्मृतिरूप ही प्रतियोगी अंशमें ज्ञान होगा, जैसे प्रत्यभिज्ञा तत्तांशमें स्मरणात्मक होती है, यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी भेदप्रतियोगीके सम्बन्धांशमें स्मृतिरूप ज्ञान नहीं हो सकता है †।
यदि शङ्का हो कि कनकाचल भेदका प्रतियोगी है, वस्तु होनेसे, इस प्रकार की, भेदमें प्रतियोगीके वैशिष्ट्यको विषय करनेवाली, अनुमितिसे भेदगत
* सारांश यह है कि ससम्बन्धिक पदार्थके प्रत्यक्षमें सम्पूर्णसम्बन्धिविषयकत्व और सम्पूर्णसम्बन्धिप्रत्यक्षजन्यत्व, संयोग आदिके प्रत्यक्षमें कॢप्त है, अतः भेदप्रत्यक्षमें भी यावत्प्रतियोगिविषयकत्व और यावत्प्रतियोगिप्रत्यक्षजन्यत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि भेदप्रत्यक्ष भी ससम्बन्धिकपदार्थप्रत्यक्ष है, इस परिस्थितिमें संसारभरके सारे प्रतियोगियोंका प्रत्यक्ष न हो सकनेके कारण कॢप्त सामग्रीके न होनेसे भेदप्रत्यक्ष प्रमाणके योग्य नहीं हो सकेगा, इसलिए उसको भ्रान्तिसिद्ध ही मानना पड़ेगा। सिद्धान्तमें भेद-प्रत्यक्षके नित्यसाक्षीरूप होनेसे कारणकी भी अपेक्षा नहीं है।
† वस्तुतस्तु भेदज्ञानमें प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे प्रतियोगीके ज्ञानको भेदवादी कारण मानते हैं, और यहाँ प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे सम्पूर्ण प्रतियोगियोंका अनुभव नहीं होनेसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः असन्निकृष्ट पदार्थमें स्मृतिरूपत्वकी उपपत्ति कैसे होगी ? अर्थात् नहीं होगी। यदि कथंचित् मान भी लिया जाय कि स्मरण होता है, तो भी जो कनकाचलका भेद समीपस्थ घटमें अनुभूत होता है, वह नहीं होना चाहिए, क्योंकि कनकाचलका कदापि ग्रहण न होनेके कारण तज्जन्य संस्कार हो ही नहीं सकता। और उसमें स्मृतित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है।
प्रत्यक्षसे अद्वैत श्रुतिका अबाधितत्वविचार] भाषानुवादसहित २६७
त्माश्रयापत्तेः । पक्षसाध्यहेतुपक्षताद्यभेदभ्रमे सति सिद्धसाधनादिनाऽनुमानाप्रवृत्त्या तदभेदज्ञानविघटनीयस्य तद्द्भेदज्ञानस्याऽपेक्षितत्वात् ।
अस्तु तर्हि भेदांशे इव प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशेऽपि प्रत्यक्षमिवि चेत्, न; प्रतियोगिनोऽप्रत्यक्षत्वे तद्वैशिष्ट्यप्रत्यक्षायोगात् सम्बन्धिद्वयप्रत्यक्षं विना सम्बन्धप्रत्यक्षासम्भवात् । तस्मात् प्रत्यक्षायोग्यस्य प्रतियोगिनो भ्रान्तिरूप एव प्रतिभास इति तदेकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य भेदस्य भेदैकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य घटादेश्च भ्रमैकविषयत्वात् प्रत्यक्षं निर्विशेषसन्मात्रग्राह्यद्वैतसिद्धयनुकूलमिति ।
प्रतियोगीके सम्बन्धके संस्कारका आधान हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेदज्ञानके विना अनुमितिके न होनेसे आत्माश्रय होगा, [ तात्पर्य यह है कि अनुमिति तभी हो सकती है जब पक्षादिके भेदका ज्ञान हो, और पक्षादिभेदज्ञान तभी हो सकता है जब अनुमिति हो, इससे अपने ज्ञानमें अपनी ही अपेक्षा होनेसे आत्माश्रय दोष होगा । अतः आत्माश्रयरूप दोषसे दुष्ट होनेके कारण उक्त अनुमिति नहीं हो सकती है और अनुमितिके न होनेसे भेदगत प्रतियोगीके वैशिष्ट्यका भान भी नहीं हो सकता है ], क्योंकि पक्ष, साध्य, हेतु और सपक्ष आदिका अभेदभ्रम होनेपर सिद्धसाधन आदिसे अनुमानकी प्रवृत्तिके न होनेके कारण उनके अभेदज्ञानके विघटनके लिए भेदज्ञानकी अपेक्षा है ।
यदि प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशका स्मृतिरूप ज्ञान सम्भव नहीं है, तो भेदांशके समान वैशिष्ट्यांशमें भी प्रत्यक्षरूप ही हो ? तो यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेके कारण प्रतियोगीके वैशिष्ट्यका भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, क्योंकि दो सम्बन्धियोंके ज्ञानके विना सम्बन्धका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । इससे प्रत्यक्षके लिए सर्वथा अयोग्य प्रतियोगीका प्रतिभास केवल भ्रान्तिसे ही होता है, अतः प्रतियोगीप्रत्यक्षवेद्यत्वसे नियत भेदमें और नियमतः भेदज्ञानमें विषयीभूत घट आदिमें केवल भ्रान्तिज्ञानकी विषयता होनेसे निर्विशेष संद्रूपका केवल ग्रहण करनेवाला प्रत्यक्ष प्रमाण भी अद्वैत सिद्धिमें अनुकूल ही है * ।
* प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेसे भेदका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, और भेदके प्रत्यक्ष के विना घट आदिका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, प्रतियोगी प्रत्यक्षयोग्य नहीं है, तथापि उसका जो प्रतिभास होता है, वह भ्रान्तिमात्र है, अतः भ्रमात्मक प्रतियोगीके ज्ञानका विषय भेद तथा
| २६८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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ब्रह्मसत्तानुविद्धं हि विश्वमिन्द्रियगोचरः ।
स्वतो नेत्यविरोधत्वमाहुर्न्यायसुधाकृतः ॥ ३ ॥
ब्रह्मसत्तासे अनुविद्ध ( युक्त ) ही सम्पूर्ण जगत् इन्द्रियका गोचर होता है, स्वतः नहीं, अतः प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा न्यायसुधाकार कहते हैं ॥ ३ ॥
न्यायसुधाकृतस्त्वाहुः—घटादेरिन्द्रियकत्वेऽपि 'सन् घटः' इत्यादिरधिष्ठानसत्त्वानुवेध इति न विरोधः । एवं 'नीलो घटः' इत्यादिरधिष्ठाननैल्यानुवेधः किं न स्यादिति चेत्, न; श्रुत्या सद्रूपस्य वस्तुनो जगदुपादानत्वमुक्तमविरोधात् सर्वसम्मतमिति, तदनुवेधेनैव 'सन् घटः' इत्यादिप्रतिभासोपपत्तौ घटादावपि सत्ताकल्पने गौरवम् । तस्य रूपादिहीनत्वाद्, नैल्यादिकं घटादावेव कल्पनीयमिति वैषम्यादिति ।
* न्यायसुधाकार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थ इन्द्रियजन्य प्रत्यक्षके विषय अवश्य हैं, तथापि 'सन् घटः' इस प्रकार जो घट आदिमें सत्ताका प्रतिभास होता है, वह अधिष्ठानकी सत्ताके सम्बन्धको ही विषय करता है, अतः विरोध नहीं है । यदि शङ्का हो कि 'नीलो घटः' ( घट नीला है ) इस प्रत्यक्षसे घटादिमें भासमान नैल्यका प्रतिभास भी ( सन् घटः, इस ज्ञानके समान ) अधिष्ठानगत नैल्यको ही विषय करेगा, वस्तुतः नैल्यका अवगाहन नहीं करेगा, [अतः ब्रह्म भी रूपवान् होगा,] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुतिने सद्रूप ब्रह्मवस्तुमें जगत्के प्रति जो उपादान कारणता कही है, वह विरोध न होनेके कारण सभीको सम्मत है, इसलिए अधिष्ठानकी सत्ताको लेकर ही 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षकी उपपत्ति हो सकती है, तो घटादिमें सत्ताकी कल्पना करना केवल गौरवमात्र है । और जगत्के अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें रूप न होनेके कारण नीलिमाकी कल्पना घटमें ही करनी चाहिए, यह वैषम्य है ।
भ्रमात्मक भेदज्ञानके विषय घट आदि भी भ्रान्तिसिद्ध होंगे, इसलिए प्रत्यक्ष अधिष्ठानभूत सद्वस्तुके ग्रहणमें ही प्रमाण है, यह भाव है ।
* न्याय सुधाकारका कहना है कि घट आदिमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानकी विषयता है, इसलिए उन्हें अनुभवके अनुसार चाक्षुष मानना पड़ता है, तथापि प्रपञ्चमें मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ उसका विरोध नहीं है, क्योंकि घट आदिमें जिस सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, वह अतिरिक्त अर्थात् अधिष्ठानसत्तासे अलग सत्ता नहीं है, जैसे स्फटिकमें स्वतः रक्तिमा न होनेपर भी जपाकुसुमगत रक्तिमाका ग्रहण होता है, वैसे ही घटमें स्वतःसत्ता न होनेपर भी ब्रह्मसत्ताका ही घटादिमें प्रतिभास होता है, यह भाव है ।
प्रत्यक्षंसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व विचार] भाषानुवादसहित २६९
जडेष्वावरणायोगाच्चक्षुरादेर्न तात्त्विकी।
मानतेत्यविरुद्धत्वं संक्षेपाचार्यदर्शने ॥ ४ ॥
घटादि जड़ पदार्थोंमें आवरणका योग न होनेके कारण चक्षु आदिकी प्रामाणिकता तात्त्विक नहीं है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुतिप्रतिपादित अद्वैतका विरोध नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं ॥ ४ ॥
संक्षेपशारीरकाचार्यास्त्वाहुः—प्रत्यक्षस्य घटादिसत्त्वग्राहित्वेऽपि पराग्विषयस्य प्रत्यक्षादेस्तत्त्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्याभावाद् न तद्विरोधेनाऽद्वैत-
आचार्य संक्षेपशारीरककार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थकी सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तथापि जड़मात्र वस्तुको विषय करनेवाले प्रत्यक्ष आदिमें तत्त्वावेदकत्वरूप ꙳ प्रामाण्यके न रहनेसे प्रत्यक्षादिके विरोधसे
꙳ प्रमाणका लक्षण है—तत्त्वावेदकत्व, तत्त्वशब्दार्थ है—अनधिगत होकर जो अबाधित हो, इस तत्त्व वस्तुका आवेदक—बोधक जो प्रमाण होगा, वही प्रमाण कहलावेगा । प्रत्यक्ष आदि जो हैं, वे तत्त्वावेदक याने अज्ञात और अबाधित वस्तुके बोधक नहीं हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष आदि घटादि बाह्य वस्तुओंको ही विषय करते हैं, घटादि बाह्य वस्तु अज्ञात (अनधिगत—भावरूप अज्ञानके विषय) नहीं हैं। क्योंकि घटादि बाह्य वस्तुके अबाधित होनेपर भी उसके अज्ञातत्वमें कोई भी प्रमाण नहीं है। इस अर्थका प्रतिपादन करनेके लिए संक्षेपशारीरककारने कहा है—
'अज्ञातमर्थमवबोधयदेव मानं
तच्च प्रकाशकरणक्षममित्यभिज्ञाः ।
न प्रत्यगात्मविषयादपरस्य तच्च
मानस्य संभवति कस्यचिदत्र युक्त्या ॥ ८ ॥
अज्ञातमर्थमवबोधयितुं न शक्त-
मेयं प्रमाणमखिलं जडवस्तुनिष्ठम् ।
किन्त्वप्रबुद्ध पुरुषं व्यवहारकाले
संश्रित्य यंजनयति व्यवहारमात्रम् ॥ २१ ॥'
अर्थात् अज्ञात अर्थका अवबोधक प्रमाण ही अपने विषयको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता है, ऐसा बड़े-बड़े तन्त्रकारोंका मत है, इसलिए अज्ञातार्थ बोधकत्वरूप प्रामाण्य आत्मविषयक प्रमाणसे भिन्न प्रत्यक्षादिमें युक्तिपूर्वक विचारनेसे भी नहीं हो सकता है। इस रीतिसे प्रत्यक्षादि प्रमाण अज्ञात वस्तुका यद्यपि बोध नहीं कराते हैं, तथापि अज्ञानी पुरुषका अवलम्बन करके व्यवहारकालमें व्यवहारमात्रकी उपपत्ति कराते हैं। इस विषयमें अधिक विचार संक्षेपशारीरकके द्वितीय अध्यायके ८वें श्लोकमें किया गया है, अतः वहींसे अधिक युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, विस्तारके भयसे उसका प्रकृतस्थलमें विचार नहीं किया जाता है।
| २७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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श्रुत्यादिबाधशङ्का । अज्ञातबोधकं हि प्रमाणम् । न च प्रत्यक्षादिविषयस्य घटादेरज्ञातत्वमस्ति, जडे आवरणकृत्याभावेनाऽज्ञानविषयत्वानुपगमात् । स्वप्रकाशतया प्रसक्तप्रकाशं ब्रह्मैवाऽज्ञानविषय इति तद्बोधकमेव तत्त्वावेदकं प्रमाणम्, तदेव प्रमितिविषयः ।
अत एव श्रुतिरपि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यात्मन एव प्रमेयत्वमिति नियच्छति । नहि 'द्रष्टव्यः' इत्यनेन दर्शनं विधीयते, प्रमाणपरतन्त्रस्य तस्य विध्यगोचरत्वात्, किन्तु 'आत्मा दर्शनार्हः' इति । अज्ञातत्वादात्मन एव प्रमेयत्वमुचितम्, नाऽन्यस्येति नियम्यते इति ।
अद्वैत बोधक श्रुति आदिके बाधकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रमाण वही होता है जो अज्ञातका बोध करावे, प्रत्यक्ष आदिके विषय अज्ञात नहीं हैं, जड़पदार्थमें आवरण कार्य न होनेसे अज्ञानविषयत्वरूप अज्ञातत्व नहीं माना गया है । स्वप्रकाश होनेके कारण जिसकी प्रकाशता प्रसक्त है, उसी ब्रह्ममें अज्ञानकी विषयता भी है, इसलिए अज्ञात ब्रह्मवस्तुका बोध करानेवाली 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियां ही तत्त्वावेदक प्रमाण हैं, और वही ब्रह्मप्रमितिका विषय भी हो सकती हैं ।
ब्रह्मके अज्ञात होनेसे ही 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (अरे मैत्रेयि ! आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए) इत्यादि श्रुति भी आत्मामें ही प्रमाविषयत्वका समर्पण करती है । यदि शङ्का हो कि 'द्रष्टव्यः' इससे विधान होता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ⁕ प्रमाणाधीन आत्मदर्शनमें विधिविषयता हो ही नहीं सकती है । [ यदि शङ्का हो कि विधायक तव्यप्रत्ययकी क्या व्यवस्था होगी ? तो इसका यही उत्तर है कि वह तव्यप्रत्यय अहार्थक है ]—अर्थात् आत्मा साक्षात्कारके योग्य है, इस अर्थका बोधक है । इससे आत्माके अज्ञात होनेसे उसीमें प्रमेयत्व (प्रमाज्ञानकी विषयता) मानना उचित है, 'अन्यत्र नहीं, इस प्रकार नियम होता है †
⁕ विधान उसका होता है, जिसमें कि पुरुष स्वतन्त्र अर्थात् कर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ हो, ज्ञानमें पुरुष स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि प्रमाणोंके रहनेसे ज्ञान तो अपने आप ही हो जाता है, इसलिए प्रमाण पराधीन—प्रमाणमात्रसे ही जिसकी उत्पत्ति हो सकती है, ऐसे—आत्मसाक्षात्कारमें 'द्रष्टव्यः' विधि नहीं हो सकती है, यह भाव है ।
† अर्थात् संसारमें एक आत्मा ही ज्ञातव्य है, अन्य नहीं, क्योंकि वही सम्पूर्ण दुःखोंका
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्वविचार ] भाषानुवादसहित २७१
जातिकालादिकं सत्त्वमिष्टमध्यक्षगोचरः ।
नहि तच्छ्रौतमिथ्यात्वाविरुद्धमिति केचन ॥ ५ ॥
जातिरूप या देश, कालादि सम्बन्धस्वरूप सत्त्व प्रत्यक्षका गोचर है, अतः श्रुतिसे प्रतिपादित मिथ्यात्वसे प्रत्यक्षका विरोध नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ५ ॥
केचित्तु—घटादिसत्त्वग्राहिणः प्रत्यक्षस्य प्रामाण्ये ब्रह्मप्रमाणन्यूनताऽनवगमेऽपि तद्ग्राह्यं सत्त्वमनुगतप्रत्ययात् सत्ताजातिरूपं वा, 'इहेदानीं घटोऽस्ति' इति देशकालसम्बन्धप्रतीतेः तत्तद्देशकालसम्बन्धरूपं वा, 'नास्ति घटः' इति स्वरूपनिषेधप्रतीतेर्घटादिस्वरूपं वा पर्यवस्यति । तच्च स्वमिथ्यात्वेन न विरुध्यते । नहि मिथ्यात्ववादिनाऽपि घटादेः स्वरूपं
* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थोंकी सत्ता ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षके प्रामाण्यमें ब्रह्मप्रतिपादक श्रुतिप्रमाणोंसे स्वल्प भी न्यूनता नहीं है, तथापि प्रत्यक्षप्रमाणसे ग्रहण किया जानेवाला सत्त्व 'घटः सन्, पटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्यय होनेसे सत्ता जातिरूप ही है, अथवा यहाँ इस समय घट है, इस प्रकारसे घट आदिमें देश, कालके सम्बन्धकी प्रतीति होनेसे, तत्-तत् देशकालके सम्बन्धरूप ही है, अथवा 'घट नहीं है' इस प्रकार घटके स्वरूपनिषेधकी प्रतीतिसे घटादिस्वरूप ही है । परन्तु वह सत्त्वके मिथ्या होनेपर भी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाला भी घटादिका स्वरूप, उसका देशकालसंसर्ग अथवा घट आदिमें जाति आदि नहीं मानता है, ऐसा नहीं है, किन्तु उनमें अबाध्यत्व ही नहीं मानता है। यदि शङ्का हो कि
अभिभावक है, इस प्रकार आत्माके ज्ञातव्यमें विशेष योग्यताका सूचन करनेके लिए 'द्रष्टव्यः' में तव्यप्रत्यय है, विधायक नहीं है, यह भाव है ।
* इस केचित्तुके ग्रन्थका यह भाव है कि जैसे श्रुति यथार्थ वस्तुका ही ग्रहण करती है, वैसे प्रत्यक्ष भी तात्त्विक अर्थात् सत्य ही घट आदि पदार्थका ग्रहण करता है, परन्तु घट आदिमें प्रतिभात होनेवाली सत्ता ब्रह्मसत्ता (त्रिकालाबाधित सत्ता) नहीं है, किन्तु 'घटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्ययसे सिद्ध हुई सत्ता जाति ही है, अतः श्रुति और प्रत्यक्षके भिन्न-भिन्न विषय होनेके कारण प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे श्रुतिमें अप्रामाण्यकी शङ्का नहीं हो सकती है । और यह भी आग्रह नहीं है कि घटादिमें भासमान सत्ता जातिरूप ही है । परन्तु जातिरूप हो या देशकालसम्बन्धरूप हो या घटादिस्वरूप हो, इनको जगन्मिथ्यावादी भी व्यवहारदशामें मानता ही है, अतः विरोध नहीं है ।
२७२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
वा, तस्य देशकालसम्बन्धो वा, तत्र जात्यादिकं वा नाभ्युपगम्यते, किन्तु तेषामबाध्यत्वम्। न चाबाध्यत्वमेव सत्त्वं प्रत्यक्षग्राह्यमस्त्वितिवाच्यम्, 'कालत्रयेऽपि नाऽस्य बाधः' इति वर्तमानमात्रग्राहिणा प्रत्यक्षेण ग्रहीतुमशक्यत्वादित्याहुः।
अयावज्ज्ञानबाध्यत्वमबाध्यत्वमिति द्विधा।
सत्त्वयोर्भेदमाश्रित्याविरोधमितरे जगुः ॥ ६ ॥
कुछ-कालतक अर्थात् ब्रह्मज्ञानपर्यन्त अबाध्यत्वरूप सत्ताके दो भेद मान करके प्रत्यक्ष और श्रुतिके अविरोधका समाधान कोई लोग करते हैं ॥ ६ ॥
अन्ये तु—अबाध्यत्वरूपसत्यत्वस्य प्रत्यक्षग्राह्यत्वेऽपि 'प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्' इतिश्रुत्या प्रधानभूतप्राणग्रहणोपलक्षितस्य कृत्स्नस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मणश्च सत्यत्वोत्कर्षापकर्षप्रतीतेः, सत्यत्वे चाबाध्यत्वरूपे सर्वदैवाबाध्यत्वं किञ्चित्कालमबाध्यत्वमित्येवंविधोत्कर्षापकर्षं विना 'राजराजो मन्मथमन्मथः' इत्यादिशब्दतात्पर्यगोचरनियन्तृत्वसौन्दर्यादी-
अबाध्यत्वरूप सत्त्वका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण क्यों नहीं होता है ? तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'तीनों कालोंमें इस विषयका बाध नहीं है, इस प्रकार अबाध्यत्वका प्रत्यक्षसे, जो कि केवल वर्तमान विषयका ही ग्रहण करनेमें पटु है, ग्रहण नहीं हो सकता है।
और कुछ लोग कहते हैं कि कदाचित् यह मान भी लिया जाय, कि घटादिमें अबाध्यत्वरूप सत्ताका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तो भी 'प्राणा वै सत्यम्०' ( प्राण सत्य हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सूत्रात्मक जगत्के विधारक मुख्य प्राणसे उपलक्षित सम्पूर्ण प्रपञ्च और ब्रह्ममें सत्यत्वका उत्कर्ष और अपकर्ष प्रतीत होता है। यदि अबाध्यत्वरूप ही सत्यत्व है, तो सर्वदा अबाध्यत्व और कुछ कालतक अबाध्यत्व, इस प्रकार उत्कर्ष और अपकर्षकी कल्पनाके विना, 'राजराजः' और 'मन्मथमन्मथः' * इत्यादि शब्दोंके तात्पर्य
* राजशब्दका अर्थ है—पालकत्वरूप नियामकत्व, और वह पाल्य (जिसका पालन किया जाय) वस्तुसे सापेक्ष है, इस अवस्था में 'विष्णुशर्मा राजराजः' (विष्णुशर्मा राजाका भी राजा है) ऐसे प्रयोगमें विष्णुशर्माका अन्य राजाओंकी अपेक्षासे कुछ उत्कर्ष सूचित होता है और अन्य राजाओंमें अपकर्ष सूचित होता है, वे उत्कर्ष और अपकर्ष पालनके अधिकदेशविषयकत्व और अल्पदेशविषयकत्वरूप हैं, इसी प्रकार 'श्रीरामः मन्मथमन्मथः' (भगवान्
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७३
नामिव भूयोविषयत्वाल्पविषयत्वादिरूपोत्कर्षापकर्षासम्भवाद्, विधान्तरेण तत्सम्भवेऽपि प्रपञ्चस्य ब्रह्मज्ञानबाध्यत्वश्रुत्यन्तरैकार्थ्याद् उक्तोत्कर्षापकर्षे एव पर्यवसानाच्च प्रत्यक्षग्राह्यं घटादिसत्यत्वं यावद्ब्रह्मज्ञानमबाध्यत्वरूपमिति न मिथ्यात्वश्रुतिविरोध इत्याहुः ।
प्रत्यक्षं बाध्यमाचख्युरपच्छेदनयात् परे । यतः शङ्कितदोषं तन्निर्दोष बाधते श्रुतिः ॥ ७ ॥
अपच्छेद-न्यायसे प्रत्यक्ष बाधित होता है, क्योंकि जिसके विषयमें दोषकी शङ्का हो सकती है, ऐसे प्रत्यक्षका निर्दुष्ट श्रुति बाध करती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ७ ॥
विषयीभूत नियन्तृत्व और सौन्दर्यादिके समान अधिकविषयता और न्यून-विषयता आदिरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो नहीं सकता है । यद्यपि त्रिकाला-बाध्यत्वरूप सत्त्वका अङ्गीकार करके अन्य रीतिसे † भी उत्कर्ष और अपकर्षका निरूपण कर सकते हैं, तथापि प्रपञ्चमें ब्रह्मज्ञानबाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य श्रुतिके साथ एकार्थत्वके लिए, अर्थात् उससे विरोध न हो इसलिए, तथा-कथित उत्कर्ष और अपकर्षमें ही पर्य्यवसान होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत होनेवाला घट आदिका सत्यत्व ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति तक ही अबाध्यरूप है, अतः मिथ्या-त्वप्रतिपादक श्रुतिके साथ प्रत्यक्षादि प्रमाणका विरोध नहीं है ।
रामचन्द्रजी कामदेवके भी कामदेव हैं अर्थात् कामदेवसे भी अत्यन्त सुन्दर हैं) इस प्रयोगका अत्यन्त सौन्दर्यके बोधके लिए ही व्यवहार किया जाता है, साधारण सौन्दर्यका अर्थ उत्कृष्ट रूपादिमत्त्व और असाधारण सौन्दर्यका अर्थ उससे भी अत्युत्कृष्ट रूपादिमत्त्व है, प्रकृत स्थलमें व्यावहारिक सत्त्व और पारमार्थिक सत्त्व में भी संसारकालमें अबाध्यत्व और त्रिकालाबाध्यत्व-रूपसे उत्कृष्टत्व और अपकृष्टत्वका आपादन कर सकते हैं, यह भाव है ।
† प्रकृतमें शङ्काका भाव यह है कि केवल अबाधितत्वरूप सत्ताका अङ्गीकार करके भी अन्य प्रकारसे उत्कर्ष और अपकर्षका सम्भव हो सकता है, वह इस प्रकार है—ब्रह्म और प्रपञ्चमें त्रिकालाबाध्यतारूप सत्त्व समान है, परन्तु ब्रह्ममें त्रिकालाबाध्यत्व श्रुतिगम्य है और प्रपञ्चमें लौकिक प्रमाणगम्य है, अतः वैदिकप्रमाणगम्य होनेसे ब्रह्मका सत्त्व उत्कृष्ट है और प्रपञ्चका सत्त्व लौकिकप्रमाणवेद्य होनेसे अपकृष्ट है, इस परिस्थितिमें मिथ्यात्वविरुद्ध सत्त्वका प्रपञ्चमें प्रत्यक्षादिसे ग्रहण होनेके कारण विरोध हो सकता है, इसपर कहा गया कि 'प्राणा वै सत्यम्' इत्यादि श्रुतिमे यदि लौकिक प्रपञ्चमें त्रिकालाबाधित सत्ताका ही ग्रहण किया जाय, तो लौकिक प्रपञ्चमें असत्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य श्रुतिके साथ विरोध होगा, अतः उक्त उत्कर्षा-पकर्ष नहीं कर सकते हैं, यह भाव है ।
३५
२७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
अपरे तु—प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसत्यत्वग्राहिणोः श्रुतिप्रत्यक्षयोर्विरोधेऽपि दोषशङ्काकलङ्कितात् प्रथमप्रवृत्तात् प्रत्यक्षाद् निर्दोषत्वादपच्छेदन्यायेन परत्वाच्च श्रुतिरेव बलीयसी ।
'प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम्' इति स्मरणाच्च ।
न च वैदैकगम्यार्थविषयकमिदं स्मरणम्, तत्र प्रत्यक्षविरोधशङ्काऽभावेन शङ्कितप्रत्यक्षविरोधे एव वेदार्थे वेदस्य प्राबल्योक्त्यौचित्यात् ।
❊ कुछ लोग कहते हैं—प्रपञ्चमें मिथ्यात्व और सत्यत्वका ग्रहण करनेवाले श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षप्रमाणका परस्पर विरोध होनेपर भी दोषकी आशङ्कासे कलङ्कित, तथा प्रथम प्रवृत्त प्रत्यक्षसे निर्दुष्ट होनेके कारण और अपच्छेदन्यायसे पर होनेके कारण श्रुति ही बलवती है, अतः श्रुतिका प्रत्यक्षसे बाध नहीं हो सकता है, यह भाव है।
और 'प्राबल्यम्०' (आगम होने से ही प्रत्यक्ष आदि तीनों प्रमाणोंमें से आगमप्रमाण बलवान् है, यह प्रसिद्ध है) इस प्रकार शास्त्रके बलवत्तर प्रामाण्यमें स्मृति भी प्रमाण है।
यदि शङ्का हो कि केवल वेदगम्य अर्थोंमें ही उक्त स्मृति है, अर्थात् उक्त स्मृतिवाक्य उसी आगमको बलवत्तर कहता है, जो वैदैकगम्य स्वर्गसाधनत्वादिका प्रतिपादन करते हैं, मिथ्यात्व केवल वेदगम्य नहीं है, क्योंकि अनुमानादिसे भी मिथ्यात्वकी सिद्धि होती है, अतः मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतिमें उक्त स्मृतिसे प्रबलता सिद्ध नहीं होगी ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि वैदैकगम्य पदार्थमें प्रत्यक्षसे विरोधकी शङ्काका उदय ही न होगा, अतः [ उक्त वचनको वैदैकगम्य अर्थविषयक माननेमें प्राबल्य-बोधक वचन व्यर्थ हो जायगा, इससे ] जिस वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षके साथ विरोध शङ्कित हो, † उसी वेदार्थमें वेदको प्रबल कहना उचित है।
* इन लोगोंके मतमें घटादिनिष्ठ सत्त्व त्रिकालाबाध्यरूप ही है, और उसी सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, अतः प्रत्यक्ष और आगमका अवश्य ही विरोध है, तथापि पर होनेसे अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षका आगम बाध करता है, यह विशेष है। अपच्छेदन्यायका आगे वर्णन किया जायगा।
† शङ्कितप्रत्यक्षविरोध—शङ्कितः प्रत्यक्षेण सह विरोधो यस्य मिथ्यात्वरूपस्य वेदार्थस्य स तथा, इस व्युत्पत्तिसे जिस मिथ्यात्व आदि वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षसे विरोध शङ्कित हो वही
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७५
'तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव ।
न तलं विद्यते व्योम न खद्योतो हुताशनः ॥ १ ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टेऽपि युक्तमर्थं परीक्षितुम् ।
परीक्ष्य ज्ञापयन्धर्मान्न धर्मात् परिहीयते ॥ २ ॥'
इति नारदस्मृतौ साक्षिप्रकरणे प्रत्यक्षदृष्टस्याऽपि प्रत्यक्षमविश्वस्य प्रमाणोपदेशादिभिः परीक्षणीयत्वप्रतिपादनाच्च । नहि नभोनील्यप्रत्यक्षं
'तलवत्०' ( आकाश इन्द्रनीलमणिसे बनी हुई कड़ाईके सदृश दीखता है और जुगनू अग्निके सदृश दिखाई देता है, परन्तु आकाश न तो कटाह है और न जुगनू अग्नि ही है; अतः प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थमें भी खूब परीक्षा करनी चाहिए । यदि परीक्षा करके आचार्य अपने शिष्यवर्गको उपदेश करे, तो शिष्यवर्ग ध्येयसे भ्रष्ट नहीं होता । )
इस प्रकार नारदस्मृतिके साक्षीके प्रकरणमें प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थकी, प्रत्यक्षप्रमाणका अविश्वास करके प्रमाण ( आगमप्रमाण ), उपदेश आदिसे परीक्षा करनेका प्रतिपादन किया गया है । आकाशकी नीलिमाका जो प्रत्यक्ष
पर आगम प्रत्यक्षसे बलवान् होता है, तात्पर्य यह है कि जिस अर्थमें वेद और वेदसे इतर प्रमाणका परस्पर विरोध प्रसक्त हो, वहींपर एक अर्थमें दोनोंका प्रामाण्य न होनेके कारण उन दोनोंमेंसे किसी एकका बाध होता है, इस अवस्थामें यही प्राप्त होता है कि जो बलवान् है, उससे दुर्बल प्रमाणका बाध करना चाहिए । कौन दुर्बल है ? इस प्रकार जिज्ञासा होनेपर अपेक्षित अर्थका समर्पक होनेसे वचन सार्थक है, इस विषयमें एक शङ्का होती है, वह यह है कि प्रत्यक्षप्रमाण कहींपर अप्रमाण हो, तो प्रपञ्चसत्यत्वके ग्राहक प्रत्यक्षमें भी मिथ्यात्व-रूप विरुद्ध कोटिका अनुसन्धान करनेवालोंको अप्रामाण्यकी शङ्का हो, और इससे शङ्कितदोष-प्रत्यक्ष निर्दुष्ट प्रबल श्रुतिसे बाधित हो, परन्तु वह नहीं होगा, क्योंकि कहींपर भी प्रत्यक्षमें अप्रामाण्यकी अवगति नहीं हुई है, परन्तु रामानुजादिवादियोंकी यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'तलवद्' इत्यादि नारदस्मृतिसे यह अर्थ स्पष्ट प्रतीत होता है, और व्यवहारमें आकाशमें जो नीलादिकी प्रतीति होती है, वह विरुद्ध ही है, अतः प्रत्यक्षप्रमाणमें कहींपर अप्रामाण्य गृहीत नहीं होता, यह कथन असङ्गत है । नारदस्मृतिमें इन श्लोकोंका पाठ साक्षिप्रकरणमें है, उस प्रकरणमें यह शङ्का हुई है कि आत्मामें साक्षित्व नहीं हो सकता है, कारण कि यद्यपि वह ज्ञाता है, परन्तु उदासीन नहीं है, क्योंकि 'मैं करता हूँ' इस प्रकार सब को कर्तृत्वका अनुभव होता है। इसपर इन श्लोकोंसे यही कहा गया कि लोकमें जैसे आकाशादिमें नीलिमा आदिका ग्रहण होता है, परन्तु वह वास्तविक नहीं है, वैसे ही आत्मामें कर्तृत्व आदिका ग्रहण वास्तविक नहीं है, अतः आत्मामें साक्षित्वकी अनुपपत्ति नहीं है, यह भाव है।
| २७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ द्वितीय परिच्छेद |
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नभसः शब्दादिषु पञ्चसु शब्दैकगुणत्वप्रतिपादकागमोपदेशमन्तरेण प्रत्यक्षादिना शक्यमपवदितुम् । न च 'नभसि समीपे नैल्यानुपलम्भाद् दूरे तद्धीर्दूरत्वदोषजन्या' इति निश्चयेन तद्बाधः । दूरे नैल्यदर्शनात् समीपे तदनुपलम्भस्तुहिनावगुण्ठानानुपलम्भवत् सामीप्यदोषजन्य इत्यपि सम्भवात् । अनुभवबलाद् नभोनैल्यमव्याप्यवृत्तीत्युपपत्तेश्च ।
नाऽपि दूरस्थस्य पुंसो यत्र भूसन्निहिते नभःप्रदेशे नैल्यधीः, तत्रैव समीपं गतस्य तस्या नैल्यबुद्धेरभावप्रत्यक्षेण बाधः । उपरिस्थितस्यैव
होता है, उसका—शब्द आदि पाँच गुणोंमें से आकाशमें केवल शब्दगुणाश्रयत्वका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोपदेशके सिवा—प्रत्यक्षसे अपवाद नहीं कर सकते हैं । यदि कहो कि आगमके विना भी आकाशमें नैल्यका बाध होता है, जैसे कि 'आकाशमें समीपसे नैल्यका उपलम्भ न होनेसे दूरमें नैल्यबुद्धि दूरत्व आदि दोषसे जन्य है' इस प्रकारके निश्चयसे नैल्यका बाध होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे वृक्षमें हिमका आवरण दूरसे दिखाई देता है समीपमें नहीं दिखाई देता, क्योंकि समीपमें उसका (हिमावरणका) * सामीप्यदोषसे अनुपलब्भ ही है, वैसे ही आकाशमें दूरसे नैल्यका प्रत्यक्ष होता है और समीपमें प्रत्यक्ष नहीं होता, इसमें मुख्य कारण सामीप्य दोष ही है, अतः आकाशमें नैल्यरूपका अभाव प्रसक्त नहीं होगा, इस प्रकार भी कल्पना कर सकते हैं और अनुभवके आधारपर आकाशके नैल्यको अव्याप्यवृत्ति मानकर भी उक्त उपपत्ति कर सकते हैं ।
और यह भी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि अत्यन्त दूर प्रदेशमें खड़े हुए पुरुषको जहाँ पृथ्वीसन्निहित आकाशमें नैल्यबुद्धि होती है, वहींपर यदि पुरुष समीपमें जाय, तो उसको वह नीलबुद्धि नहीं होती है, अतः इसी अभावप्रत्यक्षसे आकाशमें नैल्यका बाध होता है, क्योंकि ऊपरके देशमें अवस्थित नैल्यका ही (मेघ)—
* सामीप्यदोषके अधीन है अवस्थिति जिसकी, ऐसा अनुपलब्भ (ज्ञानका अभाव) यह सामीप्यदोषजन्यका अर्थ करना चाहिए, अन्य अनुपलब्भशब्दका अर्थ है—उपलम्भका प्रागभाव, वह जन्य कैसे हो सकता है । सामीप्यदोषसे उपलम्भके निरुद्ध होनेपर, तो उसके प्रागभावका विनाश न होनेके कारण दोषाधीन स्थिति हो सकती है, अतः असङ्गति नहीं होगी, यह भाव है ।
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७७
नैल्यस्याऽभ्रनक्षत्रादेरिव दूरत्वदोषाद् भूसन्निधानावाभास इत्युपपत्तेः । पृथिव्यादिषु सङ्कीर्णतया प्रतीयमानानां गन्धादीनाम्—
‘उपलभ्याऽप्सु चेद्गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
पृथिव्यामेव तं विद्यादपो वायुं च संश्रितम् ॥ १ ॥’
इत्यादिभिरागमैरेव व्यवस्थाया वक्तव्यत्वेन प्रत्यक्षादागमप्राबल्यस्य निर्विशङ्कत्वाच्च । नह्याजानसिद्धजलोपष्टम्भादिगतं गन्धादि ‘पृथिवीगुण एव गन्धः, न जलादिगुणः’ इत्यादिरूपेणाऽस्मदादिभिः प्रत्यक्षेण शक्यं विवेचयितुम् । पृथिव्यादीनां प्रायः परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भवति इति शङ्कितदोषं प्रत्यक्षम् । अतस्तत्राऽऽगमेन शिक्ष्यत इति चेत्, तर्हि इहाऽपि ब्रह्मप्रपञ्चयोरुपादानोपादेयभावेन परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भाव्यते इति शङ्कितदोषं प्रत्यक्षम्—
बादल या नक्षत्र आदिके समान दूरत्वदोषसे पृथिवीकी सन्निधिमें अवभास होता है, इस प्रकार भी उपपत्ति कर सकते हैं ।
और ‘उपलभ्याप्सु०’ (पृथ्वीके समान जल और वायुमें गन्धका ग्रहण करके यदि कोई अपरिपक्वबुद्धि कहे कि ‘जल और वायुमें भी स्वाभाविक गन्ध है’ तो उसका वैसा कहना युक्त नहीं है, किन्तु, जल और वायुमें उपलभ्यमान गन्ध उनके अन्तर्गत पृथिवीका ही है, ऐसा जानना चाहिए ।) इत्यादि आगमप्रमाणोंसे ही पृथ्वी आदिमें संकीर्णरूपसे प्रतीयमान गन्ध आदिकी भी व्यवस्था कह सकते हैं, अतः प्रत्यक्षसे आगमप्रमाणकी बलवत्तरतामें कोई शङ्का नहीं है । स्वभावतः सिद्ध जलोपष्टम्भ पार्थिव द्रव्यमें रहनेवाले गन्ध आदि ‘पृथिवीके ही गुण हैं, जलके गुण नहीं हैं’ इस प्रकार हम लोग प्रत्यक्षसे विवेक नहीं कर सकते हैं, [क्योंकि जलमें भी कहींपर स्वाभाविक गन्ध है, और कहींपर औपाधिक है, ऐसी भी कल्पना हो सकती है] प्रायः पृथ्वी आदिके परस्पर संसृष्ट होनेके कारण अन्य धर्मोंका अन्यमें अवभास होता है, इसलिए प्रत्यक्ष शङ्कितदोषसे कलङ्कित है, इसलिए यदि जलादिमें गन्धके प्रत्यक्षका उक्त शास्त्रसे बाध होता है ? तो प्रकृतमें भी ब्रह्म और प्रपञ्चके परस्पर उपादानोपादेयभाव होनेके कारण अन्योऽन्य तादात्म्यापन्न होकर अन्यके धर्मोंका अन्यत्रमें अवश्य अवभास हो सकता है, इसलिए प्रपञ्चमें सत्यत्वका प्रत्यक्ष भी दोषशङ्कासे कलङ्कित ही है । अतः समान रीतिसे उस प्रत्यक्षकी—