सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| २६६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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न प्रत्यक्षैण ग्रहणं सम्भवति । देशकालव्यवधानेनाऽसन्निकृष्टानापि प्रतियोगिनां सम्भवात् । भेदज्ञानं प्रतियोग्यंशे संस्कारापेक्षणात् स्मृतिरूपमस्तु प्रत्यभिज्ञानमिव तत्तांशे इति चेत्, न ; तथाऽपि भेदगतप्रतियोगिवैशिष्ट्यांशे तदभावात् ।
न च कनकाचलो भेदप्रतियोगी, वस्तुत्वादिति भेदे प्रतियोगिवैशिष्ट्यगोचरानुमित्या तत्संस्कारसम्भवः । भेदे ज्ञानं विनाऽनुमित्यभावेनाऽऽ-
और विपर्यासशून्य भेद प्रकाशित होता है, प्रतियोगीके साथ ही * जिसकी उपलब्धि नियत है, ऐसे भेदका प्रत्यक्षप्रमाणसे अर्थात् चक्षुरादिसे ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि देश और कालके व्यवधानसे असम्बद्ध भी प्रतियोगी हो सकते हैं। यदि कहो कि प्रतियोगी अंशमें भेदका ज्ञान संस्कारकी अपेक्षा रखता है, अतः स्मृतिरूप ही प्रतियोगी अंशमें ज्ञान होगा, जैसे प्रत्यभिज्ञा तत्तांशमें स्मरणात्मक होती है, यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी भेदप्रतियोगीके सम्बन्धांशमें स्मृतिरूप ज्ञान नहीं हो सकता है †।
यदि शङ्का हो कि कनकाचल भेदका प्रतियोगी है, वस्तु होनेसे, इस प्रकार की, भेदमें प्रतियोगीके वैशिष्ट्यको विषय करनेवाली, अनुमितिसे भेदगत
* सारांश यह है कि ससम्बन्धिक पदार्थके प्रत्यक्षमें सम्पूर्णसम्बन्धिविषयकत्व और सम्पूर्णसम्बन्धिप्रत्यक्षजन्यत्व, संयोग आदिके प्रत्यक्षमें कॢप्त है, अतः भेदप्रत्यक्षमें भी यावत्प्रतियोगिविषयकत्व और यावत्प्रतियोगिप्रत्यक्षजन्यत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि भेदप्रत्यक्ष भी ससम्बन्धिकपदार्थप्रत्यक्ष है, इस परिस्थितिमें संसारभरके सारे प्रतियोगियोंका प्रत्यक्ष न हो सकनेके कारण कॢप्त सामग्रीके न होनेसे भेदप्रत्यक्ष प्रमाणके योग्य नहीं हो सकेगा, इसलिए उसको भ्रान्तिसिद्ध ही मानना पड़ेगा। सिद्धान्तमें भेद-प्रत्यक्षके नित्यसाक्षीरूप होनेसे कारणकी भी अपेक्षा नहीं है।
† वस्तुतस्तु भेदज्ञानमें प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे प्रतियोगीके ज्ञानको भेदवादी कारण मानते हैं, और यहाँ प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे सम्पूर्ण प्रतियोगियोंका अनुभव नहीं होनेसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः असन्निकृष्ट पदार्थमें स्मृतिरूपत्वकी उपपत्ति कैसे होगी ? अर्थात् नहीं होगी। यदि कथंचित् मान भी लिया जाय कि स्मरण होता है, तो भी जो कनकाचलका भेद समीपस्थ घटमें अनुभूत होता है, वह नहीं होना चाहिए, क्योंकि कनकाचलका कदापि ग्रहण न होनेके कारण तज्जन्य संस्कार हो ही नहीं सकता। और उसमें स्मृतित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है।
प्रत्यक्षसे अद्वैत श्रुतिका अबाधितत्वविचार] भाषानुवादसहित २६७
त्माश्रयापत्तेः । पक्षसाध्यहेतुपक्षताद्यभेदभ्रमे सति सिद्धसाधनादिनाऽनुमानाप्रवृत्त्या तदभेदज्ञानविघटनीयस्य तद्द्भेदज्ञानस्याऽपेक्षितत्वात् ।
अस्तु तर्हि भेदांशे इव प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशेऽपि प्रत्यक्षमिवि चेत्, न; प्रतियोगिनोऽप्रत्यक्षत्वे तद्वैशिष्ट्यप्रत्यक्षायोगात् सम्बन्धिद्वयप्रत्यक्षं विना सम्बन्धप्रत्यक्षासम्भवात् । तस्मात् प्रत्यक्षायोग्यस्य प्रतियोगिनो भ्रान्तिरूप एव प्रतिभास इति तदेकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य भेदस्य भेदैकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य घटादेश्च भ्रमैकविषयत्वात् प्रत्यक्षं निर्विशेषसन्मात्रग्राह्यद्वैतसिद्धयनुकूलमिति ।
प्रतियोगीके सम्बन्धके संस्कारका आधान हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेदज्ञानके विना अनुमितिके न होनेसे आत्माश्रय होगा, [ तात्पर्य यह है कि अनुमिति तभी हो सकती है जब पक्षादिके भेदका ज्ञान हो, और पक्षादिभेदज्ञान तभी हो सकता है जब अनुमिति हो, इससे अपने ज्ञानमें अपनी ही अपेक्षा होनेसे आत्माश्रय दोष होगा । अतः आत्माश्रयरूप दोषसे दुष्ट होनेके कारण उक्त अनुमिति नहीं हो सकती है और अनुमितिके न होनेसे भेदगत प्रतियोगीके वैशिष्ट्यका भान भी नहीं हो सकता है ], क्योंकि पक्ष, साध्य, हेतु और सपक्ष आदिका अभेदभ्रम होनेपर सिद्धसाधन आदिसे अनुमानकी प्रवृत्तिके न होनेके कारण उनके अभेदज्ञानके विघटनके लिए भेदज्ञानकी अपेक्षा है ।
यदि प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशका स्मृतिरूप ज्ञान सम्भव नहीं है, तो भेदांशके समान वैशिष्ट्यांशमें भी प्रत्यक्षरूप ही हो ? तो यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेके कारण प्रतियोगीके वैशिष्ट्यका भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, क्योंकि दो सम्बन्धियोंके ज्ञानके विना सम्बन्धका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । इससे प्रत्यक्षके लिए सर्वथा अयोग्य प्रतियोगीका प्रतिभास केवल भ्रान्तिसे ही होता है, अतः प्रतियोगीप्रत्यक्षवेद्यत्वसे नियत भेदमें और नियमतः भेदज्ञानमें विषयीभूत घट आदिमें केवल भ्रान्तिज्ञानकी विषयता होनेसे निर्विशेष संद्रूपका केवल ग्रहण करनेवाला प्रत्यक्ष प्रमाण भी अद्वैत सिद्धिमें अनुकूल ही है * ।
* प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेसे भेदका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, और भेदके प्रत्यक्ष के विना घट आदिका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, प्रतियोगी प्रत्यक्षयोग्य नहीं है, तथापि उसका जो प्रतिभास होता है, वह भ्रान्तिमात्र है, अतः भ्रमात्मक प्रतियोगीके ज्ञानका विषय भेद तथा
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ब्रह्मसत्तानुविद्धं हि विश्वमिन्द्रियगोचरः ।
स्वतो नेत्यविरोधत्वमाहुर्न्यायसुधाकृतः ॥ ३ ॥
ब्रह्मसत्तासे अनुविद्ध ( युक्त ) ही सम्पूर्ण जगत् इन्द्रियका गोचर होता है, स्वतः नहीं, अतः प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा न्यायसुधाकार कहते हैं ॥ ३ ॥
न्यायसुधाकृतस्त्वाहुः—घटादेरिन्द्रियकत्वेऽपि 'सन् घटः' इत्यादिरधिष्ठानसत्त्वानुवेध इति न विरोधः । एवं 'नीलो घटः' इत्यादिरधिष्ठाननैल्यानुवेधः किं न स्यादिति चेत्, न; श्रुत्या सद्रूपस्य वस्तुनो जगदुपादानत्वमुक्तमविरोधात् सर्वसम्मतमिति, तदनुवेधेनैव 'सन् घटः' इत्यादिप्रतिभासोपपत्तौ घटादावपि सत्ताकल्पने गौरवम् । तस्य रूपादिहीनत्वाद्, नैल्यादिकं घटादावेव कल्पनीयमिति वैषम्यादिति ।
* न्यायसुधाकार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थ इन्द्रियजन्य प्रत्यक्षके विषय अवश्य हैं, तथापि 'सन् घटः' इस प्रकार जो घट आदिमें सत्ताका प्रतिभास होता है, वह अधिष्ठानकी सत्ताके सम्बन्धको ही विषय करता है, अतः विरोध नहीं है । यदि शङ्का हो कि 'नीलो घटः' ( घट नीला है ) इस प्रत्यक्षसे घटादिमें भासमान नैल्यका प्रतिभास भी ( सन् घटः, इस ज्ञानके समान ) अधिष्ठानगत नैल्यको ही विषय करेगा, वस्तुतः नैल्यका अवगाहन नहीं करेगा, [अतः ब्रह्म भी रूपवान् होगा,] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुतिने सद्रूप ब्रह्मवस्तुमें जगत्के प्रति जो उपादान कारणता कही है, वह विरोध न होनेके कारण सभीको सम्मत है, इसलिए अधिष्ठानकी सत्ताको लेकर ही 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षकी उपपत्ति हो सकती है, तो घटादिमें सत्ताकी कल्पना करना केवल गौरवमात्र है । और जगत्के अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें रूप न होनेके कारण नीलिमाकी कल्पना घटमें ही करनी चाहिए, यह वैषम्य है ।
भ्रमात्मक भेदज्ञानके विषय घट आदि भी भ्रान्तिसिद्ध होंगे, इसलिए प्रत्यक्ष अधिष्ठानभूत सद्वस्तुके ग्रहणमें ही प्रमाण है, यह भाव है ।
* न्याय सुधाकारका कहना है कि घट आदिमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानकी विषयता है, इसलिए उन्हें अनुभवके अनुसार चाक्षुष मानना पड़ता है, तथापि प्रपञ्चमें मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ उसका विरोध नहीं है, क्योंकि घट आदिमें जिस सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, वह अतिरिक्त अर्थात् अधिष्ठानसत्तासे अलग सत्ता नहीं है, जैसे स्फटिकमें स्वतः रक्तिमा न होनेपर भी जपाकुसुमगत रक्तिमाका ग्रहण होता है, वैसे ही घटमें स्वतःसत्ता न होनेपर भी ब्रह्मसत्ताका ही घटादिमें प्रतिभास होता है, यह भाव है ।
प्रत्यक्षंसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व विचार] भाषानुवादसहित २६९
जडेष्वावरणायोगाच्चक्षुरादेर्न तात्त्विकी।
मानतेत्यविरुद्धत्वं संक्षेपाचार्यदर्शने ॥ ४ ॥
घटादि जड़ पदार्थोंमें आवरणका योग न होनेके कारण चक्षु आदिकी प्रामाणिकता तात्त्विक नहीं है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुतिप्रतिपादित अद्वैतका विरोध नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं ॥ ४ ॥
संक्षेपशारीरकाचार्यास्त्वाहुः—प्रत्यक्षस्य घटादिसत्त्वग्राहित्वेऽपि पराग्विषयस्य प्रत्यक्षादेस्तत्त्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्याभावाद् न तद्विरोधेनाऽद्वैत-
आचार्य संक्षेपशारीरककार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थकी सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तथापि जड़मात्र वस्तुको विषय करनेवाले प्रत्यक्ष आदिमें तत्त्वावेदकत्वरूप ꙳ प्रामाण्यके न रहनेसे प्रत्यक्षादिके विरोधसे
꙳ प्रमाणका लक्षण है—तत्त्वावेदकत्व, तत्त्वशब्दार्थ है—अनधिगत होकर जो अबाधित हो, इस तत्त्व वस्तुका आवेदक—बोधक जो प्रमाण होगा, वही प्रमाण कहलावेगा । प्रत्यक्ष आदि जो हैं, वे तत्त्वावेदक याने अज्ञात और अबाधित वस्तुके बोधक नहीं हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष आदि घटादि बाह्य वस्तुओंको ही विषय करते हैं, घटादि बाह्य वस्तु अज्ञात (अनधिगत—भावरूप अज्ञानके विषय) नहीं हैं। क्योंकि घटादि बाह्य वस्तुके अबाधित होनेपर भी उसके अज्ञातत्वमें कोई भी प्रमाण नहीं है। इस अर्थका प्रतिपादन करनेके लिए संक्षेपशारीरककारने कहा है—
'अज्ञातमर्थमवबोधयदेव मानं
तच्च प्रकाशकरणक्षममित्यभिज्ञाः ।
न प्रत्यगात्मविषयादपरस्य तच्च
मानस्य संभवति कस्यचिदत्र युक्त्या ॥ ८ ॥
अज्ञातमर्थमवबोधयितुं न शक्त-
मेयं प्रमाणमखिलं जडवस्तुनिष्ठम् ।
किन्त्वप्रबुद्ध पुरुषं व्यवहारकाले
संश्रित्य यंजनयति व्यवहारमात्रम् ॥ २१ ॥'
अर्थात् अज्ञात अर्थका अवबोधक प्रमाण ही अपने विषयको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता है, ऐसा बड़े-बड़े तन्त्रकारोंका मत है, इसलिए अज्ञातार्थ बोधकत्वरूप प्रामाण्य आत्मविषयक प्रमाणसे भिन्न प्रत्यक्षादिमें युक्तिपूर्वक विचारनेसे भी नहीं हो सकता है। इस रीतिसे प्रत्यक्षादि प्रमाण अज्ञात वस्तुका यद्यपि बोध नहीं कराते हैं, तथापि अज्ञानी पुरुषका अवलम्बन करके व्यवहारकालमें व्यवहारमात्रकी उपपत्ति कराते हैं। इस विषयमें अधिक विचार संक्षेपशारीरकके द्वितीय अध्यायके ८वें श्लोकमें किया गया है, अतः वहींसे अधिक युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, विस्तारके भयसे उसका प्रकृतस्थलमें विचार नहीं किया जाता है।
| २७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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श्रुत्यादिबाधशङ्का । अज्ञातबोधकं हि प्रमाणम् । न च प्रत्यक्षादिविषयस्य घटादेरज्ञातत्वमस्ति, जडे आवरणकृत्याभावेनाऽज्ञानविषयत्वानुपगमात् । स्वप्रकाशतया प्रसक्तप्रकाशं ब्रह्मैवाऽज्ञानविषय इति तद्बोधकमेव तत्त्वावेदकं प्रमाणम्, तदेव प्रमितिविषयः ।
अत एव श्रुतिरपि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यात्मन एव प्रमेयत्वमिति नियच्छति । नहि 'द्रष्टव्यः' इत्यनेन दर्शनं विधीयते, प्रमाणपरतन्त्रस्य तस्य विध्यगोचरत्वात्, किन्तु 'आत्मा दर्शनार्हः' इति । अज्ञातत्वादात्मन एव प्रमेयत्वमुचितम्, नाऽन्यस्येति नियम्यते इति ।
अद्वैत बोधक श्रुति आदिके बाधकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रमाण वही होता है जो अज्ञातका बोध करावे, प्रत्यक्ष आदिके विषय अज्ञात नहीं हैं, जड़पदार्थमें आवरण कार्य न होनेसे अज्ञानविषयत्वरूप अज्ञातत्व नहीं माना गया है । स्वप्रकाश होनेके कारण जिसकी प्रकाशता प्रसक्त है, उसी ब्रह्ममें अज्ञानकी विषयता भी है, इसलिए अज्ञात ब्रह्मवस्तुका बोध करानेवाली 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियां ही तत्त्वावेदक प्रमाण हैं, और वही ब्रह्मप्रमितिका विषय भी हो सकती हैं ।
ब्रह्मके अज्ञात होनेसे ही 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (अरे मैत्रेयि ! आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए) इत्यादि श्रुति भी आत्मामें ही प्रमाविषयत्वका समर्पण करती है । यदि शङ्का हो कि 'द्रष्टव्यः' इससे विधान होता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ⁕ प्रमाणाधीन आत्मदर्शनमें विधिविषयता हो ही नहीं सकती है । [ यदि शङ्का हो कि विधायक तव्यप्रत्ययकी क्या व्यवस्था होगी ? तो इसका यही उत्तर है कि वह तव्यप्रत्यय अहार्थक है ]—अर्थात् आत्मा साक्षात्कारके योग्य है, इस अर्थका बोधक है । इससे आत्माके अज्ञात होनेसे उसीमें प्रमेयत्व (प्रमाज्ञानकी विषयता) मानना उचित है, 'अन्यत्र नहीं, इस प्रकार नियम होता है †
⁕ विधान उसका होता है, जिसमें कि पुरुष स्वतन्त्र अर्थात् कर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ हो, ज्ञानमें पुरुष स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि प्रमाणोंके रहनेसे ज्ञान तो अपने आप ही हो जाता है, इसलिए प्रमाण पराधीन—प्रमाणमात्रसे ही जिसकी उत्पत्ति हो सकती है, ऐसे—आत्मसाक्षात्कारमें 'द्रष्टव्यः' विधि नहीं हो सकती है, यह भाव है ।
† अर्थात् संसारमें एक आत्मा ही ज्ञातव्य है, अन्य नहीं, क्योंकि वही सम्पूर्ण दुःखोंका
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्वविचार ] भाषानुवादसहित २७१
जातिकालादिकं सत्त्वमिष्टमध्यक्षगोचरः ।
नहि तच्छ्रौतमिथ्यात्वाविरुद्धमिति केचन ॥ ५ ॥
जातिरूप या देश, कालादि सम्बन्धस्वरूप सत्त्व प्रत्यक्षका गोचर है, अतः श्रुतिसे प्रतिपादित मिथ्यात्वसे प्रत्यक्षका विरोध नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ५ ॥
केचित्तु—घटादिसत्त्वग्राहिणः प्रत्यक्षस्य प्रामाण्ये ब्रह्मप्रमाणन्यूनताऽनवगमेऽपि तद्ग्राह्यं सत्त्वमनुगतप्रत्ययात् सत्ताजातिरूपं वा, 'इहेदानीं घटोऽस्ति' इति देशकालसम्बन्धप्रतीतेः तत्तद्देशकालसम्बन्धरूपं वा, 'नास्ति घटः' इति स्वरूपनिषेधप्रतीतेर्घटादिस्वरूपं वा पर्यवस्यति । तच्च स्वमिथ्यात्वेन न विरुध्यते । नहि मिथ्यात्ववादिनाऽपि घटादेः स्वरूपं
* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थोंकी सत्ता ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षके प्रामाण्यमें ब्रह्मप्रतिपादक श्रुतिप्रमाणोंसे स्वल्प भी न्यूनता नहीं है, तथापि प्रत्यक्षप्रमाणसे ग्रहण किया जानेवाला सत्त्व 'घटः सन्, पटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्यय होनेसे सत्ता जातिरूप ही है, अथवा यहाँ इस समय घट है, इस प्रकारसे घट आदिमें देश, कालके सम्बन्धकी प्रतीति होनेसे, तत्-तत् देशकालके सम्बन्धरूप ही है, अथवा 'घट नहीं है' इस प्रकार घटके स्वरूपनिषेधकी प्रतीतिसे घटादिस्वरूप ही है । परन्तु वह सत्त्वके मिथ्या होनेपर भी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाला भी घटादिका स्वरूप, उसका देशकालसंसर्ग अथवा घट आदिमें जाति आदि नहीं मानता है, ऐसा नहीं है, किन्तु उनमें अबाध्यत्व ही नहीं मानता है। यदि शङ्का हो कि
अभिभावक है, इस प्रकार आत्माके ज्ञातव्यमें विशेष योग्यताका सूचन करनेके लिए 'द्रष्टव्यः' में तव्यप्रत्यय है, विधायक नहीं है, यह भाव है ।
* इस केचित्तुके ग्रन्थका यह भाव है कि जैसे श्रुति यथार्थ वस्तुका ही ग्रहण करती है, वैसे प्रत्यक्ष भी तात्त्विक अर्थात् सत्य ही घट आदि पदार्थका ग्रहण करता है, परन्तु घट आदिमें प्रतिभात होनेवाली सत्ता ब्रह्मसत्ता (त्रिकालाबाधित सत्ता) नहीं है, किन्तु 'घटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्ययसे सिद्ध हुई सत्ता जाति ही है, अतः श्रुति और प्रत्यक्षके भिन्न-भिन्न विषय होनेके कारण प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे श्रुतिमें अप्रामाण्यकी शङ्का नहीं हो सकती है । और यह भी आग्रह नहीं है कि घटादिमें भासमान सत्ता जातिरूप ही है । परन्तु जातिरूप हो या देशकालसम्बन्धरूप हो या घटादिस्वरूप हो, इनको जगन्मिथ्यावादी भी व्यवहारदशामें मानता ही है, अतः विरोध नहीं है ।
२७२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
वा, तस्य देशकालसम्बन्धो वा, तत्र जात्यादिकं वा नाभ्युपगम्यते, किन्तु तेषामबाध्यत्वम्। न चाबाध्यत्वमेव सत्त्वं प्रत्यक्षग्राह्यमस्त्वितिवाच्यम्, 'कालत्रयेऽपि नाऽस्य बाधः' इति वर्तमानमात्रग्राहिणा प्रत्यक्षेण ग्रहीतुमशक्यत्वादित्याहुः।
अयावज्ज्ञानबाध्यत्वमबाध्यत्वमिति द्विधा।
सत्त्वयोर्भेदमाश्रित्याविरोधमितरे जगुः ॥ ६ ॥
कुछ-कालतक अर्थात् ब्रह्मज्ञानपर्यन्त अबाध्यत्वरूप सत्ताके दो भेद मान करके प्रत्यक्ष और श्रुतिके अविरोधका समाधान कोई लोग करते हैं ॥ ६ ॥
अन्ये तु—अबाध्यत्वरूपसत्यत्वस्य प्रत्यक्षग्राह्यत्वेऽपि 'प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्' इतिश्रुत्या प्रधानभूतप्राणग्रहणोपलक्षितस्य कृत्स्नस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मणश्च सत्यत्वोत्कर्षापकर्षप्रतीतेः, सत्यत्वे चाबाध्यत्वरूपे सर्वदैवाबाध्यत्वं किञ्चित्कालमबाध्यत्वमित्येवंविधोत्कर्षापकर्षं विना 'राजराजो मन्मथमन्मथः' इत्यादिशब्दतात्पर्यगोचरनियन्तृत्वसौन्दर्यादी-
अबाध्यत्वरूप सत्त्वका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण क्यों नहीं होता है ? तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'तीनों कालोंमें इस विषयका बाध नहीं है, इस प्रकार अबाध्यत्वका प्रत्यक्षसे, जो कि केवल वर्तमान विषयका ही ग्रहण करनेमें पटु है, ग्रहण नहीं हो सकता है।
और कुछ लोग कहते हैं कि कदाचित् यह मान भी लिया जाय, कि घटादिमें अबाध्यत्वरूप सत्ताका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तो भी 'प्राणा वै सत्यम्०' ( प्राण सत्य हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सूत्रात्मक जगत्के विधारक मुख्य प्राणसे उपलक्षित सम्पूर्ण प्रपञ्च और ब्रह्ममें सत्यत्वका उत्कर्ष और अपकर्ष प्रतीत होता है। यदि अबाध्यत्वरूप ही सत्यत्व है, तो सर्वदा अबाध्यत्व और कुछ कालतक अबाध्यत्व, इस प्रकार उत्कर्ष और अपकर्षकी कल्पनाके विना, 'राजराजः' और 'मन्मथमन्मथः' * इत्यादि शब्दोंके तात्पर्य
* राजशब्दका अर्थ है—पालकत्वरूप नियामकत्व, और वह पाल्य (जिसका पालन किया जाय) वस्तुसे सापेक्ष है, इस अवस्था में 'विष्णुशर्मा राजराजः' (विष्णुशर्मा राजाका भी राजा है) ऐसे प्रयोगमें विष्णुशर्माका अन्य राजाओंकी अपेक्षासे कुछ उत्कर्ष सूचित होता है और अन्य राजाओंमें अपकर्ष सूचित होता है, वे उत्कर्ष और अपकर्ष पालनके अधिकदेशविषयकत्व और अल्पदेशविषयकत्वरूप हैं, इसी प्रकार 'श्रीरामः मन्मथमन्मथः' (भगवान्
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७३
नामिव भूयोविषयत्वाल्पविषयत्वादिरूपोत्कर्षापकर्षासम्भवाद्, विधान्तरेण तत्सम्भवेऽपि प्रपञ्चस्य ब्रह्मज्ञानबाध्यत्वश्रुत्यन्तरैकार्थ्याद् उक्तोत्कर्षापकर्षे एव पर्यवसानाच्च प्रत्यक्षग्राह्यं घटादिसत्यत्वं यावद्ब्रह्मज्ञानमबाध्यत्वरूपमिति न मिथ्यात्वश्रुतिविरोध इत्याहुः ।
प्रत्यक्षं बाध्यमाचख्युरपच्छेदनयात् परे । यतः शङ्कितदोषं तन्निर्दोष बाधते श्रुतिः ॥ ७ ॥
अपच्छेद-न्यायसे प्रत्यक्ष बाधित होता है, क्योंकि जिसके विषयमें दोषकी शङ्का हो सकती है, ऐसे प्रत्यक्षका निर्दुष्ट श्रुति बाध करती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ७ ॥
विषयीभूत नियन्तृत्व और सौन्दर्यादिके समान अधिकविषयता और न्यून-विषयता आदिरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो नहीं सकता है । यद्यपि त्रिकाला-बाध्यत्वरूप सत्त्वका अङ्गीकार करके अन्य रीतिसे † भी उत्कर्ष और अपकर्षका निरूपण कर सकते हैं, तथापि प्रपञ्चमें ब्रह्मज्ञानबाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य श्रुतिके साथ एकार्थत्वके लिए, अर्थात् उससे विरोध न हो इसलिए, तथा-कथित उत्कर्ष और अपकर्षमें ही पर्य्यवसान होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत होनेवाला घट आदिका सत्यत्व ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति तक ही अबाध्यरूप है, अतः मिथ्या-त्वप्रतिपादक श्रुतिके साथ प्रत्यक्षादि प्रमाणका विरोध नहीं है ।
रामचन्द्रजी कामदेवके भी कामदेव हैं अर्थात् कामदेवसे भी अत्यन्त सुन्दर हैं) इस प्रयोगका अत्यन्त सौन्दर्यके बोधके लिए ही व्यवहार किया जाता है, साधारण सौन्दर्यका अर्थ उत्कृष्ट रूपादिमत्त्व और असाधारण सौन्दर्यका अर्थ उससे भी अत्युत्कृष्ट रूपादिमत्त्व है, प्रकृत स्थलमें व्यावहारिक सत्त्व और पारमार्थिक सत्त्व में भी संसारकालमें अबाध्यत्व और त्रिकालाबाध्यत्व-रूपसे उत्कृष्टत्व और अपकृष्टत्वका आपादन कर सकते हैं, यह भाव है ।
† प्रकृतमें शङ्काका भाव यह है कि केवल अबाधितत्वरूप सत्ताका अङ्गीकार करके भी अन्य प्रकारसे उत्कर्ष और अपकर्षका सम्भव हो सकता है, वह इस प्रकार है—ब्रह्म और प्रपञ्चमें त्रिकालाबाध्यतारूप सत्त्व समान है, परन्तु ब्रह्ममें त्रिकालाबाध्यत्व श्रुतिगम्य है और प्रपञ्चमें लौकिक प्रमाणगम्य है, अतः वैदिकप्रमाणगम्य होनेसे ब्रह्मका सत्त्व उत्कृष्ट है और प्रपञ्चका सत्त्व लौकिकप्रमाणवेद्य होनेसे अपकृष्ट है, इस परिस्थितिमें मिथ्यात्वविरुद्ध सत्त्वका प्रपञ्चमें प्रत्यक्षादिसे ग्रहण होनेके कारण विरोध हो सकता है, इसपर कहा गया कि 'प्राणा वै सत्यम्' इत्यादि श्रुतिमे यदि लौकिक प्रपञ्चमें त्रिकालाबाधित सत्ताका ही ग्रहण किया जाय, तो लौकिक प्रपञ्चमें असत्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य श्रुतिके साथ विरोध होगा, अतः उक्त उत्कर्षा-पकर्ष नहीं कर सकते हैं, यह भाव है ।
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२७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
अपरे तु—प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसत्यत्वग्राहिणोः श्रुतिप्रत्यक्षयोर्विरोधेऽपि दोषशङ्काकलङ्कितात् प्रथमप्रवृत्तात् प्रत्यक्षाद् निर्दोषत्वादपच्छेदन्यायेन परत्वाच्च श्रुतिरेव बलीयसी ।
'प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम्' इति स्मरणाच्च ।
न च वैदैकगम्यार्थविषयकमिदं स्मरणम्, तत्र प्रत्यक्षविरोधशङ्काऽभावेन शङ्कितप्रत्यक्षविरोधे एव वेदार्थे वेदस्य प्राबल्योक्त्यौचित्यात् ।
❊ कुछ लोग कहते हैं—प्रपञ्चमें मिथ्यात्व और सत्यत्वका ग्रहण करनेवाले श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षप्रमाणका परस्पर विरोध होनेपर भी दोषकी आशङ्कासे कलङ्कित, तथा प्रथम प्रवृत्त प्रत्यक्षसे निर्दुष्ट होनेके कारण और अपच्छेदन्यायसे पर होनेके कारण श्रुति ही बलवती है, अतः श्रुतिका प्रत्यक्षसे बाध नहीं हो सकता है, यह भाव है।
और 'प्राबल्यम्०' (आगम होने से ही प्रत्यक्ष आदि तीनों प्रमाणोंमें से आगमप्रमाण बलवान् है, यह प्रसिद्ध है) इस प्रकार शास्त्रके बलवत्तर प्रामाण्यमें स्मृति भी प्रमाण है।
यदि शङ्का हो कि केवल वेदगम्य अर्थोंमें ही उक्त स्मृति है, अर्थात् उक्त स्मृतिवाक्य उसी आगमको बलवत्तर कहता है, जो वैदैकगम्य स्वर्गसाधनत्वादिका प्रतिपादन करते हैं, मिथ्यात्व केवल वेदगम्य नहीं है, क्योंकि अनुमानादिसे भी मिथ्यात्वकी सिद्धि होती है, अतः मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतिमें उक्त स्मृतिसे प्रबलता सिद्ध नहीं होगी ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि वैदैकगम्य पदार्थमें प्रत्यक्षसे विरोधकी शङ्काका उदय ही न होगा, अतः [ उक्त वचनको वैदैकगम्य अर्थविषयक माननेमें प्राबल्य-बोधक वचन व्यर्थ हो जायगा, इससे ] जिस वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षके साथ विरोध शङ्कित हो, † उसी वेदार्थमें वेदको प्रबल कहना उचित है।
* इन लोगोंके मतमें घटादिनिष्ठ सत्त्व त्रिकालाबाध्यरूप ही है, और उसी सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, अतः प्रत्यक्ष और आगमका अवश्य ही विरोध है, तथापि पर होनेसे अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षका आगम बाध करता है, यह विशेष है। अपच्छेदन्यायका आगे वर्णन किया जायगा।
† शङ्कितप्रत्यक्षविरोध—शङ्कितः प्रत्यक्षेण सह विरोधो यस्य मिथ्यात्वरूपस्य वेदार्थस्य स तथा, इस व्युत्पत्तिसे जिस मिथ्यात्व आदि वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षसे विरोध शङ्कित हो वही
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७५
'तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव ।
न तलं विद्यते व्योम न खद्योतो हुताशनः ॥ १ ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टेऽपि युक्तमर्थं परीक्षितुम् ।
परीक्ष्य ज्ञापयन्धर्मान्न धर्मात् परिहीयते ॥ २ ॥'
इति नारदस्मृतौ साक्षिप्रकरणे प्रत्यक्षदृष्टस्याऽपि प्रत्यक्षमविश्वस्य प्रमाणोपदेशादिभिः परीक्षणीयत्वप्रतिपादनाच्च । नहि नभोनील्यप्रत्यक्षं
'तलवत्०' ( आकाश इन्द्रनीलमणिसे बनी हुई कड़ाईके सदृश दीखता है और जुगनू अग्निके सदृश दिखाई देता है, परन्तु आकाश न तो कटाह है और न जुगनू अग्नि ही है; अतः प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थमें भी खूब परीक्षा करनी चाहिए । यदि परीक्षा करके आचार्य अपने शिष्यवर्गको उपदेश करे, तो शिष्यवर्ग ध्येयसे भ्रष्ट नहीं होता । )
इस प्रकार नारदस्मृतिके साक्षीके प्रकरणमें प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थकी, प्रत्यक्षप्रमाणका अविश्वास करके प्रमाण ( आगमप्रमाण ), उपदेश आदिसे परीक्षा करनेका प्रतिपादन किया गया है । आकाशकी नीलिमाका जो प्रत्यक्ष
पर आगम प्रत्यक्षसे बलवान् होता है, तात्पर्य यह है कि जिस अर्थमें वेद और वेदसे इतर प्रमाणका परस्पर विरोध प्रसक्त हो, वहींपर एक अर्थमें दोनोंका प्रामाण्य न होनेके कारण उन दोनोंमेंसे किसी एकका बाध होता है, इस अवस्थामें यही प्राप्त होता है कि जो बलवान् है, उससे दुर्बल प्रमाणका बाध करना चाहिए । कौन दुर्बल है ? इस प्रकार जिज्ञासा होनेपर अपेक्षित अर्थका समर्पक होनेसे वचन सार्थक है, इस विषयमें एक शङ्का होती है, वह यह है कि प्रत्यक्षप्रमाण कहींपर अप्रमाण हो, तो प्रपञ्चसत्यत्वके ग्राहक प्रत्यक्षमें भी मिथ्यात्व-रूप विरुद्ध कोटिका अनुसन्धान करनेवालोंको अप्रामाण्यकी शङ्का हो, और इससे शङ्कितदोष-प्रत्यक्ष निर्दुष्ट प्रबल श्रुतिसे बाधित हो, परन्तु वह नहीं होगा, क्योंकि कहींपर भी प्रत्यक्षमें अप्रामाण्यकी अवगति नहीं हुई है, परन्तु रामानुजादिवादियोंकी यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'तलवद्' इत्यादि नारदस्मृतिसे यह अर्थ स्पष्ट प्रतीत होता है, और व्यवहारमें आकाशमें जो नीलादिकी प्रतीति होती है, वह विरुद्ध ही है, अतः प्रत्यक्षप्रमाणमें कहींपर अप्रामाण्य गृहीत नहीं होता, यह कथन असङ्गत है । नारदस्मृतिमें इन श्लोकोंका पाठ साक्षिप्रकरणमें है, उस प्रकरणमें यह शङ्का हुई है कि आत्मामें साक्षित्व नहीं हो सकता है, कारण कि यद्यपि वह ज्ञाता है, परन्तु उदासीन नहीं है, क्योंकि 'मैं करता हूँ' इस प्रकार सब को कर्तृत्वका अनुभव होता है। इसपर इन श्लोकोंसे यही कहा गया कि लोकमें जैसे आकाशादिमें नीलिमा आदिका ग्रहण होता है, परन्तु वह वास्तविक नहीं है, वैसे ही आत्मामें कर्तृत्व आदिका ग्रहण वास्तविक नहीं है, अतः आत्मामें साक्षित्वकी अनुपपत्ति नहीं है, यह भाव है।
| २७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ द्वितीय परिच्छेद |
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नभसः शब्दादिषु पञ्चसु शब्दैकगुणत्वप्रतिपादकागमोपदेशमन्तरेण प्रत्यक्षादिना शक्यमपवदितुम् । न च 'नभसि समीपे नैल्यानुपलम्भाद् दूरे तद्धीर्दूरत्वदोषजन्या' इति निश्चयेन तद्बाधः । दूरे नैल्यदर्शनात् समीपे तदनुपलम्भस्तुहिनावगुण्ठानानुपलम्भवत् सामीप्यदोषजन्य इत्यपि सम्भवात् । अनुभवबलाद् नभोनैल्यमव्याप्यवृत्तीत्युपपत्तेश्च ।
नाऽपि दूरस्थस्य पुंसो यत्र भूसन्निहिते नभःप्रदेशे नैल्यधीः, तत्रैव समीपं गतस्य तस्या नैल्यबुद्धेरभावप्रत्यक्षेण बाधः । उपरिस्थितस्यैव
होता है, उसका—शब्द आदि पाँच गुणोंमें से आकाशमें केवल शब्दगुणाश्रयत्वका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोपदेशके सिवा—प्रत्यक्षसे अपवाद नहीं कर सकते हैं । यदि कहो कि आगमके विना भी आकाशमें नैल्यका बाध होता है, जैसे कि 'आकाशमें समीपसे नैल्यका उपलम्भ न होनेसे दूरमें नैल्यबुद्धि दूरत्व आदि दोषसे जन्य है' इस प्रकारके निश्चयसे नैल्यका बाध होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे वृक्षमें हिमका आवरण दूरसे दिखाई देता है समीपमें नहीं दिखाई देता, क्योंकि समीपमें उसका (हिमावरणका) * सामीप्यदोषसे अनुपलब्भ ही है, वैसे ही आकाशमें दूरसे नैल्यका प्रत्यक्ष होता है और समीपमें प्रत्यक्ष नहीं होता, इसमें मुख्य कारण सामीप्य दोष ही है, अतः आकाशमें नैल्यरूपका अभाव प्रसक्त नहीं होगा, इस प्रकार भी कल्पना कर सकते हैं और अनुभवके आधारपर आकाशके नैल्यको अव्याप्यवृत्ति मानकर भी उक्त उपपत्ति कर सकते हैं ।
और यह भी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि अत्यन्त दूर प्रदेशमें खड़े हुए पुरुषको जहाँ पृथ्वीसन्निहित आकाशमें नैल्यबुद्धि होती है, वहींपर यदि पुरुष समीपमें जाय, तो उसको वह नीलबुद्धि नहीं होती है, अतः इसी अभावप्रत्यक्षसे आकाशमें नैल्यका बाध होता है, क्योंकि ऊपरके देशमें अवस्थित नैल्यका ही (मेघ)—
* सामीप्यदोषके अधीन है अवस्थिति जिसकी, ऐसा अनुपलब्भ (ज्ञानका अभाव) यह सामीप्यदोषजन्यका अर्थ करना चाहिए, अन्य अनुपलब्भशब्दका अर्थ है—उपलम्भका प्रागभाव, वह जन्य कैसे हो सकता है । सामीप्यदोषसे उपलम्भके निरुद्ध होनेपर, तो उसके प्रागभावका विनाश न होनेके कारण दोषाधीन स्थिति हो सकती है, अतः असङ्गति नहीं होगी, यह भाव है ।
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७७
नैल्यस्याऽभ्रनक्षत्रादेरिव दूरत्वदोषाद् भूसन्निधानावाभास इत्युपपत्तेः । पृथिव्यादिषु सङ्कीर्णतया प्रतीयमानानां गन्धादीनाम्—
‘उपलभ्याऽप्सु चेद्गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
पृथिव्यामेव तं विद्यादपो वायुं च संश्रितम् ॥ १ ॥’
इत्यादिभिरागमैरेव व्यवस्थाया वक्तव्यत्वेन प्रत्यक्षादागमप्राबल्यस्य निर्विशङ्कत्वाच्च । नह्याजानसिद्धजलोपष्टम्भादिगतं गन्धादि ‘पृथिवीगुण एव गन्धः, न जलादिगुणः’ इत्यादिरूपेणाऽस्मदादिभिः प्रत्यक्षेण शक्यं विवेचयितुम् । पृथिव्यादीनां प्रायः परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भवति इति शङ्कितदोषं प्रत्यक्षम् । अतस्तत्राऽऽगमेन शिक्ष्यत इति चेत्, तर्हि इहाऽपि ब्रह्मप्रपञ्चयोरुपादानोपादेयभावेन परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भाव्यते इति शङ्कितदोषं प्रत्यक्षम्—
बादल या नक्षत्र आदिके समान दूरत्वदोषसे पृथिवीकी सन्निधिमें अवभास होता है, इस प्रकार भी उपपत्ति कर सकते हैं ।
और ‘उपलभ्याप्सु०’ (पृथ्वीके समान जल और वायुमें गन्धका ग्रहण करके यदि कोई अपरिपक्वबुद्धि कहे कि ‘जल और वायुमें भी स्वाभाविक गन्ध है’ तो उसका वैसा कहना युक्त नहीं है, किन्तु, जल और वायुमें उपलभ्यमान गन्ध उनके अन्तर्गत पृथिवीका ही है, ऐसा जानना चाहिए ।) इत्यादि आगमप्रमाणोंसे ही पृथ्वी आदिमें संकीर्णरूपसे प्रतीयमान गन्ध आदिकी भी व्यवस्था कह सकते हैं, अतः प्रत्यक्षसे आगमप्रमाणकी बलवत्तरतामें कोई शङ्का नहीं है । स्वभावतः सिद्ध जलोपष्टम्भ पार्थिव द्रव्यमें रहनेवाले गन्ध आदि ‘पृथिवीके ही गुण हैं, जलके गुण नहीं हैं’ इस प्रकार हम लोग प्रत्यक्षसे विवेक नहीं कर सकते हैं, [क्योंकि जलमें भी कहींपर स्वाभाविक गन्ध है, और कहींपर औपाधिक है, ऐसी भी कल्पना हो सकती है] प्रायः पृथ्वी आदिके परस्पर संसृष्ट होनेके कारण अन्य धर्मोंका अन्यमें अवभास होता है, इसलिए प्रत्यक्ष शङ्कितदोषसे कलङ्कित है, इसलिए यदि जलादिमें गन्धके प्रत्यक्षका उक्त शास्त्रसे बाध होता है ? तो प्रकृतमें भी ब्रह्म और प्रपञ्चके परस्पर उपादानोपादेयभाव होनेके कारण अन्योऽन्य तादात्म्यापन्न होकर अन्यके धर्मोंका अन्यत्रमें अवश्य अवभास हो सकता है, इसलिए प्रपञ्चमें सत्यत्वका प्रत्यक्ष भी दोषशङ्कासे कलङ्कित ही है । अतः समान रीतिसे उस प्रत्यक्षकी—
| २७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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'अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥१॥'
इति वृद्धोक्तप्रकारेणाऽऽगमेन व्यवस्थाप्यतामिति तुल्यम् । न चैवमुपजीव्यविरोधः । आगमप्रमाणेन वर्णपदवाक्यादिस्वरूपांशप्रत्यक्षमुपजीव्याऽनुपजीव्यतत्सत्यत्वांशोपमर्दनादित्याहुः ॥
* 'अस्ति भाति प्रियं०' (घट है, घट प्रकाशित होता है, घट प्रिय है, ये तीन अंश ब्रह्मरूप हैं और घट यह नाम अंश और घटादिका कम्बुग्रीवादिमत्त्व आदिरूप अंश ये दोनों जगत्रूप हैं) इस प्रकारके वृद्धोक्त आगमसे—व्यवस्था करनी चाहिए । यदि कहो कि; आगमसे प्रत्यक्षका बाध होगा, तो उपजीव्यके साथ विरोध होगा ? तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि वर्ण, पद, वाक्य आदि स्वरूपांशके प्रत्यक्षको उपजीव्य करके आगम-प्रमाण अनुपजीव्य प्रत्यक्षगत सत्यत्वांशका उपमर्दन कर सकता है† ॥ १ ॥
* ब्रह्ममें अध्यस्त होनेके कारण घटमें अस्तित्त्वका, चैतन्यका और आनन्दका अव भास होता है—घट है, घट भासता है, और घट प्रिय है, इसलिए घटमें भासनेवाले ये तीन अंश ब्रह्मके ही हैं, घटके नहीं हैं घटादि नाम और उनका स्वरूप ब्रह्मरूप नहीं है, क्योंकि ब्रह्म नाम और रूपसे विनिर्मुक्त है । इसलिए जगत्में भासनेवालोंमें से प्रथम तीन रूप ब्रह्मके और इतर दो रूप जगत्के हैं, सभी जगत्के पदार्थोंमें पांच अंश अवश्य भासते हैं, यह निर्विवाद है, क्योंकि शत्रु आदिका दुःख सबको प्रिय भासता है । अतः जगत्के पञ्चांशमें कोई विरोध नहीं है, यह भाव है ।
† शङ्काका तात्पर्य यह था कि प्रत्यक्षशब्दका उपजीव्य है अर्थात् प्रत्यक्षके विना शब्द स्वार्थका बोध कर ही नहीं सकता है, अतः शब्दप्रमाण अपने अर्थके बोधनमें प्रत्यक्षकी अपेक्षा करेगा, अतः उपजीव्य है, यदि शब्दप्रमाण अपने उपजीव्यका विरोध करेगा, तो स्वार्थका बोध ही नहीं करेगा, इसलिए आगमका प्रत्यक्षसे बाध करना असङ्गत है ? इस शङ्का-पर उत्तर है कि अवश्य प्रत्यक्षशब्दका उपजीव्य है, परन्तु वह कौनसा प्रत्यक्ष है ? वर्ण, पद और वाक्यात्मक शब्दका श्रोत्रसे होनेवाला प्रत्यक्ष, क्योंकि शब्दज्ञानके विना शाब्दबोध नहीं हो सकता है । इस परिस्थितिमें यदि श्रुति सम्पूर्ण प्रत्यक्षका बाध करेगी, तो उपजीव्य प्रत्यक्षका भी विरोध प्रसक्त होगा, परन्तु श्रोत्र इन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाला शब्द प्रत्यक्ष, जो शब्दात्मक ही है, उसका सत्त्व भी ग्रहण करता है, और श्रुतिसे प्रत्यक्षके सत्त्वांशका बाध होता है, परन्तु यह शब्दका उपजीव्य नहीं है, क्योंकि कल्पित शब्दसे भी शाब्दबोध हो सकता है, तो उसकी सत्ता मानना निरर्थक है, और शब्दस्वरूपांशके प्रत्यक्षरूप उपजीव्यका बाध नहीं करता है, अतः उपजीव्यके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७९
ननु सोमपदे नैवं भवेन्मत्वर्थलक्षणा ।
प्रस्तरो यजमानः स्याद्
यदि आगम प्रत्यक्षसे बलवान् है, तो 'सोमेन यजेत' इसमें सोमपदकी मत्वर्थमें लक्षणा नहीं होगी और प्रस्तर यजमान भी होगा।
नन्वागमस्य प्रत्यक्षाद् बलीयस्त्वे 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यत्र प्रत्यक्षाविरोधाय यजमानशब्दस्य प्रस्तरे गौणी वृत्तिर्न कल्पनीया । तथा 'सोमेन यजेत' इत्यत्र वैयधिकरण्येनाऽन्वये यागे इष्टसाधनत्वम्, सोमलतायां
अब शङ्का होती है कि यदि आगमको प्रत्यक्षसे बलवान् माना जाय, तो 'यजमानः प्रस्तरः' (कुशमुष्टि यजमान है) इस श्रुतिमें प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहारके लिए यजमानशब्दकी कुशमुष्टिमें गौणी वृत्ति नहीं माननी चाहिए, [तात्पर्यार्थ यह है कि चूंकि कुशमुष्टि यजमान (याग करनेवाला) नहीं हो सकती है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इस श्रुतिसे प्रस्तरको जो यजमान कहा गया है, वह मुख्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुतिका तात्पर्य प्रस्तरको यजमान कहने में नहीं है, किन्तु केवल लाक्षणिक है, यह सिद्धान्त किया गया है, परन्तु अब इस सिद्धान्तकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे आगम बलवान् ही ठहरा, अतः गौण कल्पना निरर्थक है, ] वैसे 'सोमेन यजेत' * (सोमवल्लीवाले यागसे अभीष्ट प्राप्त करे) इस श्रुतिमें कहा गया है—वैयधिकरण्यसे सोम और यागका अन्वय हो, तो यागमें इष्टसाधनत्व और सोमलतामें याग-
* 'सोमेन यजेत' (सोमयागसे इष्टका सम्पादन करे) इस श्रुतिमें शङ्का हुई कि सोम-शब्दका अन्वय धात्वर्थ यागमें सामानाधिकरण्यसे करना या वैयधिकरण्यसे ? सामानाधिकरण्य-शब्दका अर्थ है—एकार्थकत्व अर्थात् अभेद, वैयधिकरण्यका अर्थ होगा भिन्नार्थकत्व। और जहाँ जहाँ सामानाधिकरण्यसे अन्वय होता है, वहाँ वहाँ अभेद ही देखा जाता है, जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' (वही देवदत्त है) इसलिए यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय करें, तो 'सोमेन यजेत' इसका अर्थ होगा सोमरूप यागसे इष्टका सम्पादन करे, परन्तु यह नहीं हो सकता है, क्योंकि द्रव्यदेवतात्मक याग सोम नहीं हो सकता है, इसमें केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। यदि वैयधिकरण्यसे अन्वय मानेंगे, तो यह अर्थ होगा—याग इष्टका साधन है और सोम-यागका साधन है, इस परिस्थितिमें एक बार श्रुतविधिप्रत्ययकी दो व्यापारोंमें लक्षणा माननी होगी, इसलिए उस व्यापारसे घटित वाक्यका भी द्विविध व्यापार होगा, अतः वाक्य-भेद प्रसक्त होगा, यह भाव है, इनमें सामानाधिकरण्यसे अन्वयका प्रत्यक्षविरोधसे परित्याग किया जाता है, परन्तु प्रत्यक्षसे श्रुति के बलवती होनेसे सामानाधिकरण्यसे अन्वय हो सकता है, तो क्यों उसका परित्याग किया जाता है, यह पूर्वपक्षका भाव है।
| २८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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यागसाधनत्वं च बोधनीयमिति व्यापारभेदेन वाक्यभेदापत्तेः । सामाना- धिकरण्येनाऽन्वये वक्तव्ये प्रत्यक्षाविरोधाय 'सोमवता यागेन' इति मत्वर्थ- लक्षणा न कल्पनीया । उभयत्राऽपि सत्यपि प्रत्यक्षविरोधे तदनादृत्याऽऽ- गमेन बलीयसा प्रस्तरे यजमानाभेदस्य, यागे सोमाभेदस्य च सिद्धि- सम्भवादिति चेत्,
अत्राऽऽहुर्भामतीकृतः ॥ ८ ॥
मानान्तराद्बलवती श्रुतिस्तात्पर्यगोचरे ।
अन्यत्र त्वविरुद्धार्थे देवताविग्रहादिके ॥ ९ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें भामतीकार कहते हैं कि तात्पर्यविषयपदार्थमें अन्य प्रमाणोंसे श्रुति बलवती है और अन्यत्र देवताशरीर आदि अविरुद्ध अर्थमें श्रुतिप्रमाण है ॥ ८ ॥ ९ ॥
अत्रोक्तं भामतीनिबन्धे—तात्पर्यवती श्रुतिः प्रत्यक्षात् बलवती
साधनत्वकी कल्पना करनी होगी, अतः व्यापारके भेदसे वाक्यभेद प्रसक्त होगा, यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय किया जायगा, तो प्रत्यक्षसे विरोध होगा, अतः मत्वर्थमें लक्षणा करनी होगी, परन्तु अब प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए मत्वर्थमें लक्षणा करनेकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों स्थलोंमें प्रत्यक्ष विरोध होनेपर भी उसकी परवा न कर बलवान् आगमप्रमाणसे प्रस्तरमें यज- मानका अभेद और यागमें सोमका अभेद सिद्ध हो सकता है ।
परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें भामतीकारने कहा है कि तात्पर्यसे युक्त श्रुति ही प्रत्यक्षसे बलवती होती है, श्रुतिमात्र ( सब श्रुति ) बलवती * नहीं होती है । मन्त्रोंका और अर्थवादवाक्योंका स्तुतिके
* जब तात्पर्यवाली श्रुति ही प्रमाण है, तो 'सोमेन यजेत' इत्यादि श्रुतियोंका सोम और याग आदिके सम्बन्धमें तात्पर्य न होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही बलवान् होगा, इसलिए प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहारके लिए सोमशब्दकी मत्वर्थमें लक्षणा करनी चाहिए, वैसे ही 'यजमानः प्रस्तरः' यह श्रुति भी, स्वार्थमें तात्पर्य न होनेसे, गौणार्थक ही माननी चाहिए, प्रपञ्चमें मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतियोंका स्वार्थके प्रतिपादनमें ही तात्पर्य होनेसे प्रत्यक्षकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती होती है, अतः उन श्रुतियोंसे प्रत्यक्षका बाध होना अनिष्टकारक है, यह समाधानका भाव है ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८१
न श्रुतिमात्रम् । मन्त्रार्थवादानां तु स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे वाक्यार्थद्वारभूते पदार्थे इव न तात्पर्यम् । तात्पर्याभावे मानान्तराविरुद्धदेवताविग्रहादिकं न तेभ्यः सिध्येत् । तात्पर्यवत्येव शब्दस्य प्रामाण्यनियमादिति चेत्, न;
द्वारभूत अर्थमें अर्थात् विधान करनेके लिए अभीष्ट अर्थोंकी स्तुति आदिके द्वारभूत † अर्थमें वाक्यार्थके द्वारभूत पदार्थके समान तात्पर्य नहीं होता है । यदि ‡ शङ्का हो कि मन्त्र और अर्थवादोंका स्वार्थके प्रतिपादनमें अगर तात्पर्य नहीं है, तो मानान्तरसे (प्रत्यक्ष आदि अन्य प्रमाणोंसे) अविरुद्ध देवताओंके शरीर आदिकी उन वाक्योंसे सिद्धि नहीं होगी ? क्योंकि तात्पर्यविषय अर्थमें ही शब्दका (श्रुतिका) प्रामाण्य है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि
† मन्त्रादिका स्वार्थमें, फल न होनेसे और गौरव होनेसे, तात्पर्य नहीं है, इसलिए 'देवस्य त्वा' इत्यादि मन्त्रोंकी और 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि अर्थवादोंकी विधेयगत स्तुतिमें ही लक्षणावृत्तिका आश्रयण करना चाहिए । इस अवस्थामें द्रव्यदेवतादिरूप मन्त्र आदि वाक्यार्थोका लक्षणायोग्य स्तुतिके साथ सम्बन्ध करना चाहिए, इसलिए स्तुतिमें लक्षणाका मन्त्र आदिका अर्थ द्वारभूत है, जैसे कि गङ्गापदकी तीररूप अर्थमें जो लक्षणा है उसमें प्रवाहरूप अर्थ द्वारभूत है अथवा वाक्यार्थके तात्पर्यसे प्रयुक्त पदोंका वाक्यार्थके ज्ञानमें द्वारभूत स्मारित पदोंका अर्थ द्वार है, परन्तु गङ्गाशब्दका तात्पर्य प्रवाहमें नहीं है और वाक्योंका तात्पर्य स्मारित पदार्थोंमें नहीं है, वैसे ही मन्त्र आदिका भी स्तुतिके द्वारभूत स्वार्थोंमें तात्पर्य नहीं है, इससे तात्पर्यरहित मन्त्रवाक्योंका प्रत्यक्षप्रमाणके अनुकूल ही अर्थ करना चाहिए, यह भाव है ।
‡ शङ्काका तात्पर्य यह है कि यदि मन्त्र, अर्थवाद आदिका स्वार्थमें तात्पर्य न माना जाय, तो देवताओंके शरीरोंको बतलानेवाले 'वज्रहस्तः पुरन्दरः' (वज्र है हाथमें जिसके, ऐसे पुरन्दर) इत्यादि अर्थवादोंका देवताके विग्रह आदि स्वार्थमें तात्पर्य न होनेके कारण देवताओंके शरीरका ज्ञान उन वाक्योंसे नहीं होता, क्योंकि वेदतात्पर्यविषयत्व वेदजन्य-यथार्थज्ञानविषयत्वके प्रति व्यापक है अर्थात् जहां जहां वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता रहेगी, वहां वहां वेदकी तात्पर्यविषयता अवश्य रहेगी, प्रकृतमें वेदके तात्पर्यकी विषयता नहीं है, अतः देवताके शरीरमें भी वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता नहीं रहेगी, क्योंकि व्यापकके अभावसे व्याप्यके अभावका ज्ञान होता है, इस अवस्थामें तात्पर्यवती ही श्रुति प्रमाण है, इस नियमके होनेसे 'वज्रहस्तः' इत्यादि वाक्यसे बोधित इन्द्रका शरीर सिद्ध नहीं होगा ।
३६
२८२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद
'एतस्यैव रेवतीषु वारवन्तीयमग्निष्टोम साम कृत्वा पशुकामो ह्येतेन यजेत' इति विशिष्टविधेस्तात्पर्यागोचरेऽपि विशेषणस्वरूपे प्रामाण्यदर्शनेन उक्तनियमासिद्धेः। अत्र हि रेवतीऋगाधारं वारवन्तीयं साम विशेषणम्। न चैतत् सोमादिविशेषणवल्लोकसिद्धम्। येन तद्विशिष्टयागविधिमात्रे प्रामाण्यं वाक्यस्य स्यात्। नाऽपि विशिष्टविधिना विशेषणाक्षेपः। आक्षेपाद्विशेषणप्रतिपत्तौ विशिष्टगोचरो विधिः। तस्मिंश्च सति तेन विशेषणाक्षेपः इति परस्पराश्रयापत्तेः। अतो विशिष्टविधिपरस्यैव वाक्यस्य विशेषणस्वरूपेऽपि
'एतस्यैव०' ❋ इत्यादि विशिष्टविधिके—तात्पर्यका विषय न होनेपर भी विशेषण-स्वरूपमें—प्रामाण्यके देखनेसे पूर्वोक्त नियम नहीं हो सकता है। प्रकृतमें रेवती नामकी ऋचाओंमें वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, परन्तु यह † वारवन्तीय साम सोम आदि विशेषणके समान लोकसिद्ध नहीं है, जिससे कि उक्त साम-विशिष्ट यागकी विधिमात्रमें वाक्यका प्रामाण्य हो। और विशिष्टविधिसे विशेषणका आक्षेप भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आक्षेपसे विशेषणके ज्ञात होनेपर विशिष्टविधि होगी और विशिष्टविषयकविधिके ज्ञात होनेपर उससे विशेषणका आक्षेप होगा, इस प्रकार ‡ अन्योन्याश्रय प्रसक्त होगा। इससे विशिष्टविधिके
❋ 'एतस्यैव०' (रेवत्यधिकरणवाले वारवन्तीयनामक सामसाध्य अग्निष्टोमस्तोत्रविशिष्ट प्रकृत अग्निष्टुद् धर्मवाले यागसे पशुकी अभिलाषा करनेवाला इष्ट सम्पादन करे) रेवती ऋचा—जिसमें 'रे' शब्द आता है, ऐसी 'रेवतीनः' इत्यादि ऋचा। वारवन्तीयम्—'अश्वं न त्वा वारवन्तम्' इस ऋचामें गेय साम। अग्निष्टोम साम—'यज्ञा यज्ञा वो अग्नय' इसमें गेय साम। प्रकृतमें इस रेवत्याधारऋचारवन्तीयसामादिविशेषणविशिष्ट क्रतुभावनाविधिका तात्पर्यविषय विशेषणस्वरूप नहीं है, परन्तु विशेषणस्वरूपमें प्रामाण्य होनेसे उक्त नियम अर्थात् शब्दतात्पर्यविषयत्व शाब्दप्रमितिविषयताके प्रति व्यापक है, यह नियम सिद्ध नहीं हो सकता है, इसी ग्रन्थका 'अत्र हि' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण किया गया है।
† रेवती ऋचाधारक वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, और यह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यदि वह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त होता, तो वारवन्तीय सामरूप विशेषणकी दधि आदिके समान लोकतः प्राप्ति होनेसे 'एतस्यैव' इत्यादि वाक्यका उससे अतिरिक्त अर्थमें प्रमितिजनकत्वरूप प्रामाण्य होता, परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि वारवन्तीय साम अन्य ऋचाओंमें अध्ययनसिद्ध है, अतः उक्त वाक्यसे ही रेवतीऋचाधारकवारवन्तीयसामरूप विशेषणकी प्रमिति कहनी चाहिए, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि विशेषणगुणविषयक विधिकी कल्पनाके पूर्वमें विशिष्टविधिसे विशेषणका स्वरूप प्रमित है या नहीं? प्रथम पक्ष मानें, तो विशेषगोचरविधिकी कल्पना व्यर्थ है द्वितीय
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८३
प्रामाण्यं वक्तव्यम् । अथ च न तत्र तात्पर्यम् । उभयत्र तात्पर्ये वाक्यभेदापत्तेः ।
एवमर्थवादानामपि विधेयस्तुतिपराणां स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे न तात्पर्यमिति तेभ्यः प्रत्यक्षस्यैव बलवत्त्वात् तद्विरोधाय तेषु वृत्त्यन्तरकल्पनम् । 'सोमेन यजेत' इत्यत्र विशिष्टविधिपरे वाक्ये सोमद्रव्याभिन्नयागरूपं
बोधक वाक्यमें ही विशेषणके स्वरूपमें भी प्रामाण्य कहना चाहिए, यदि कहोगे कि वहां तात्पर्य नहीं है, तो दोनों जगहोंमें तात्पर्यको माननेसे वाक्यभेदकी आपत्ति * प्रसक्त होगी ।
विशिष्टविधिके विशेषणस्वरूपके समान अर्थात् जैसे विशिष्टविधि-बोधकवाक्यका विशिष्टद्वारा विशेषणांशमें प्रामाण्य है, स्वतः नहीं है, वैसे अर्थ-वाद वाक्योंका भी, जो विधेयभूत अर्थके स्तावक हैं, स्तुतिद्वारभूत अर्थमें, तात्पर्य नहीं है [तथापि देवताओंके शरीर आदिके ज्ञानके प्रति कारण हो सकते हैं] †, इसलिए तात्पर्यरहित उन मन्त्र और अर्थवादोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षप्रमाण ही बलवान् है, अतः उनके ( प्रत्यक्ष आदिके ) साथ अविरोधके लिए मन्त्र और अर्थवाद आदिकी अन्यवृत्ति माननी चाहिए । 'सोमेन यजेत' इत्यादि विशिष्टविधिके बोधकवाक्यमें यदि 'सोमलतारूप द्रव्यसे अभिन्न यागरूप
पक्ष मानें, तो विधिका आक्षेप हो ही नहीं सकता है, क्योंकि जो प्रमित है अर्थात् जिसका यथार्थ ज्ञान हुआ है, ऐसा द्रव्यदेवतासम्बन्धयागविधिका आक्षेपक होता है, इस अवस्था में विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप है, इस प्रकार जो कहनेवाला है उसको आक्षेपसे पूर्वमें विशेषणको जानना चाहिए, उसका प्रमापक कौन है ? इस शङ्कामें आप कल्पित विधिको ही प्रमापक मानेंगे, इससे आक्षिप्तविधिसे विशेषणस्वरूपके ज्ञात होनेपर प्रकृत विधि विशिष्ट विषयक होगी और उस विधिके विशिष्टविषयक होनेपर उस विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप होगा, इसलिए परस्पराश्रय दोषकी प्रसक्ति होनेसे विशेषणविधिका आक्षेप ही असिद्ध होगा ।
* यदि प्रकृतमें कोई शङ्का करे कि 'यत्परः शब्द स वाक्यार्थः' (वही शब्दका अर्थ होता है जो शब्द तात्पर्यसे गम्य होता है ) इस नियमके अनुसार उक्त वाक्योंका तथाकथित अर्थोंमें (विशेषण आदि अर्थोंमें) तात्पर्य न होनेसे उनका बोध नहीं होना चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्परः' इत्यादि नियम औत्सर्गिक है, और गौरवसे बाध भी होता है, यह भाव है ।
† इसलिए जैसे तात्पर्यके अविषय रेवती वारवन्तीय विशेषणस्वरूप अर्थमें भी श्रुति प्रमा उत्पन्न करती है, वैसे अन्यपरक मन्त्र भी देवताके शरीर आदिका बोध करते हैं, अतः देवताधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।
| २८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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विशिष्टं विधेयमित्युपगमे तस्य विधेयस्य ‘दध्ना जुहोति’ इत्यादौ विधेयस्य दध्यादेरिव लोकसिद्धत्वाभावेन विधिपराद्वाक्यादेव रेवत्याधारवारवन्तीयविशेषणस्येव विना तात्पर्यं सिद्धिरेष्टव्या । नहि तात्पर्यविरहितादागमाद्यागसोमलताभेदग्राहिप्रत्यक्षविरुद्धार्थः सिध्यतीति तत्राऽपि तद्विरोधाय मत्वर्थलक्षणाश्रयणम् ।
अद्वैतश्रुतिस्तु उपक्रमोपसंहारैकरूप्यादिषड्विधलिङ्गावगमिताद्वैततात्पर्या प्रत्यक्षाद् बलवतीति ततः प्रत्यक्षस्यैव बाधः, न तद्विरोधाय श्रुतेरन्यथानयनमिति ।
कथंचिद्विषयप्राप्त्या मानान्तरसमर्थने ॥
श्रुतिर्बलीयसी नो चेद्विपरीतं वलावलम् ॥१०॥
यदि प्रत्यक्ष आदिकी व्यावहारिक विषयोंसे उपपत्ति हो सकती है, अतः प्रत्यक्ष आदिकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती है । व्यावहारिक विषयोंसे प्रत्यक्ष आदिकी उपपत्ति न हो, तो बल और अबल विपरीत होंगे याने निरवकाश होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष आदि ही बलवान् होंगे ॥१०॥
विवरणवार्तिके तु प्रतिपादितम्—न तात्पर्यवत्त्वेन श्रुतेः प्रत्यक्षात् प्राबल्यम् । ‘कृष्णलं श्रपयेद्’ इति विधेः श्रपणस्य कृष्णलार्थत्वप्रतिपादने विशिष्टका विधान मानेंगे, तो उस विधेयकी अर्थात् सोमसे अभिन्न यागरूप विशिष्टकी—‘दध्ना जुहोति’ (दधिसे होम करे) इत्यादिमें विधेय दधिके समान लोकसे—सिद्धि न होनेके कारण, रेवती ऋचा है आधार जिसका, ऐसे वारवन्तीय सामरूप विशेषणके समान तात्पर्यके विना ही विशिष्टविधायकवाक्यसे उसकी सिद्धि माननी होगी, परन्तु तात्पर्यरहित आगमसे—सोमलतासे भेदको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थ—सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः ‘सोमेन यजेत’ इत्यादि स्थलमें भी प्रत्यक्षके साथ विरोध न आवे, इसलिए मत्वर्थमें लक्षणाका आश्रयण होता है ।
अद्वैतब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका तो उपक्रम और उपसंहारके ऐक्य आदि छः लिङ्गोंसे अद्वैतमें ही तात्पर्य जाना जाता है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुति बलवती है, इसलिए अद्वैतश्रुतिसे प्रत्यक्षका ही बाध होता है, अतः प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए अद्वैतश्रुतिका गौण अर्थ नहीं कर सकते हैं ।
विवरणवार्तिकमें, तो प्रतिपादन किया गया है कि तात्पर्यवती श्रुतिका भी प्रत्यक्षसे प्राबल्य नहीं है, क्योंकि ‘कृष्णलं श्रपयेत्’ (सोनेके बने हुए छोटे-
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८५
तात्पर्य्येऽपि कृष्णले रूपरसपरावृत्तिप्रादुर्भावपर्य्यन्तमुख्यश्रपणसम्बन्धः प्रत्यक्ष-विरुद्ध इति तदविरोधाय श्रपणशब्दस्य उष्णीकरणमात्रे लक्षणाभ्युपगमात् ।
'तत्त्वमसि' इति वाक्यस्य जीवब्रह्माभेदप्रतिपादने तात्पर्य्येऽपि त्वम्पदवाच्यस्य तत्पदवाच्याभेदः प्रत्यक्षविरुद्ध इति तदविरोधाय निष्कृष्टचैतन्ये लक्षणाभ्युपगमाच्च ।
छोटे माषोंका पाक करे ) * इस विधिका तात्पर्य यद्यपि कृष्णलोंके अङ्गभूत श्रपणमें ही है, तथापि कृष्णलोंमें मुख्यपाकका सम्बन्ध—जो कि रूप और रसकी परावृत्तिके प्रादुर्भावपर्य्यन्त है, प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे—नहीं हो सकता है, इसलिए उसके अविरोधके लिए श्रपणशब्दकी उष्णीकरणमात्रमें लक्षणाका स्वीकार है ।
† और 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका जीव और ब्रह्मके अभेद प्रतिपादनमें तात्पर्य होनेपर भी, 'त्वम्पद' वाच्य जीवका 'तत्पद' वाच्य ब्रह्मके साथ अभेद प्रत्यक्षविरुद्ध है, अतः उसके अविरोधके लिए विशिष्टरूप वाच्यसे अर्थसे—अलग किये हुए केवल विशेष्यरूप चैतन्यमें लक्षणा ‡ मानी जाती है ।
* प्रकृतमें कृष्णलशब्दका अर्थ सुवर्णके विकारभूत माप किया गया है, और 'कृष्णलं श्रपयेत्' इत्यादिसे कृष्णलके अङ्गभूत श्रपण (पाक) का विधान किया जाता है। परन्तु कृष्णलका मुख्य पाक नहीं हो सकता है, क्योंकि रूपरसपरावृत्तिपर्य्यन्त अधिश्रयणादि व्यापार अर्थात् पूर्वके रूप और रस आदिके विनाशपूर्वक अन्यरूप और अन्य रस आदिकी उत्पत्ति तक अधिश्रयण आदि व्यापार ही मुख्य श्रपणशब्दका अर्थ है, और इस पाकके साथ कृष्णलका वस्तुतः सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि कृष्णलोंमें अधिश्रयण (पाकानुकूल व्यापार) आदिके करनेपर भी रूपरसादिकी परावृत्ति या प्रादुर्भाव नहीं देखा जाता है।
† 'कृष्णलं श्रपयेत्' इस श्रुतिसे श्रपणका ही विधान होता है, और वह प्रत्यक्षसे बाधित भी नहीं है, क्योंकि ज्वालाधिश्रयण आदि क्रियारूप पाककी ही श्रपणशब्दसे विवक्षा है, इसलिए कृष्णलमें यह पाक हो सकता है, पूर्वरूपपरावृत्ति या प्रादुर्भाव धात्वर्थके अन्तर्गत नहीं होनेसे उसके न रहनेपर भी कोई हानि नहीं है, किन्तु कर्मत्वरूप पाकका फल वह द्वितीयार्थ ही है, और जो फल होता है, वह विधिके योग्य नहीं होता है, इसलिए वह विधेयभूत श्रपणात्मक भी नहीं है, इस अवस्थामें विधेयभूत श्रपणका कोई दृष्टफल न होनेसे अदृष्टार्थक ही पर्यवसन्न होता है, अतः श्रुतिके तात्पर्यके विषयीभूत श्रपणमें कोई प्रत्यक्ष विरोध न होनेसे उसमें श्रपणशब्दकी लक्षणा करना व्यर्थ है, इस प्रकार यदि किसीको शङ्का हो, तो उसके लिए 'तत्त्वमसि' इत्यादिसे अन्य दृष्टान्त कहते हैं।
‡ तात्पर्य यह है कि 'तत्त्वमसि' आदि जितने महावाक्य हैं, उन सबका तात्पर्य अखण्ड,