भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

दक्षके द्वारा सतीका तिरस्कार

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ७


हुए। लोकसंहारकारी रुद्रने अपनी जटा उखाड़कर उसे पर्वतके शिखरपर क्रोधपूर्वक दे मारा। जटा उखाड़नेसे महायशस्वी वीरभद्र प्रकट हुए। साथ ही करोड़ों भूतोंसे घिरी हुई कालीका भी प्राकट्य हुआ। महात्मा रुद्रके क्रोध और निःश्वाससे सैकड़ों प्रकारके ज्वर तथा तेरह प्रकारके सन्निपात रोग उत्पन्न हुए। वीरभद्रने भयंकर पराक्रमी रुद्रसे निवेदन किया—'प्रभो! शीघ्र आज्ञा कीजिये, इस सेवकसे क्या काम लेना है?' भगवान् रुद्रने आज्ञा दी—'महाबाहु वीर! शीघ्र जाओ और दक्ष-यज्ञका विनाश करो।'

देवाधिदेव शूलपाणि महादेवजीकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके महातेजस्वी वीरभद्र समस्त भूतोंसे घिरे हुए दक्ष-यज्ञकी ओर चल दिये। उनके साथ कालिका देवी भी थीं। उसी समय दक्षके यहाँ सहसा अपशकुन प्रकट होने लगे। धूल और कंकड़ोंसे भरी हुई रूक्ष वायु चलने लगी। मेघ रक्तकी वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया। पृथ्वीपर सहस्त्रशः उल्कापात होने लगे। इस प्रकारके अनिष्टसूचक उत्पात वहाँ देवता आदिको दिखायी दिये। दक्षको भी बड़ा भय हुआ। वे भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और विनयपूर्वक कहने लगे—'महाविष्णो! आप हमारे परम गुरु हैं; रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप ही यज्ञ हैं, इस महान् भयसे मुझे मुक्त कीजिये।'

दक्षके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् मधुसूदनने कहा—ब्रह्मन्! इसमें सन्देह नहीं कि मुझे तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; किंतु तुमने धर्मको जानते हुए भी महेश्वरकी अवहेलना की है। महेश्वरकी अवज्ञासे तुम्हारा सब कुछ निष्फल हो जायगा। जहाँ अपूज्य व्यक्तियोंका पूजन होता तथा पूजनीय महात्माका पूजन नहीं किया जाता, वहाँ तीन संकट अवश्य प्राप्त होंगे—दुर्भिक्ष, मृत्यु तथा भय।* इसलिये सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् शंकरको मनाना चाहिये। तुम्हारे यज्ञमें महेश्वरका सम्मान नहीं किया गया है, इसी कारण यह महान् भय उपस्थित हुआ है। इस समय तो हम सब लोग मिलकर भी इस भयका निवारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सब कुछ तुम्हारी दुर्नीतिके कारण हो रहा है।

भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दक्ष चिन्तित हो उठे। उनका मुँह सूख गया। इतनेमें ही अपनी सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी वीरभद्र भी आ पहुँचे। उनके साथ काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी—ये नव दुर्गाएँ तथा भूतोंका महान् समुदाय भी था। शाकिनी, डाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, कर्पट, वटुक, ब्रह्मराक्षस, भैरव, क्षेत्रपाल, राक्षस, यक्ष, विनायक तथा चौंसठ योगिनियोंका मण्डल—ये सब उस महान् प्रकाशमय यज्ञ-मण्डपमें सहसा प्रकट हो गये। भगवान् शंकरके उन पार्षदोंनें देवताओंके साथ युद्ध आरम्भ किया। लोकपालोंसहित देवताओंने भी शिवगणोंपर अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार किया। यद्यपि वे लाखोंकी संख्यामें थे, तथापि इन्द्र आदि लोकपालोंने उन्हें रणसे विमुख कर दिया। उस समय देवताओंकी विजय और यजमानके सन्तोषके लिये महर्षि भृगुने शिवगणोंके प्रति उच्चाटनका प्रयोग किया था। इसीसे उस समय देवता विजयी हुए।

अपने सैनिकोंकी पराजय देखकर वीरभद्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने भूतों, प्रेतों और पिशाचोंको पीछे करके वृषभास्यको आगे किया और स्वयं भी आगे आ गये। महाबली वीरभद्रने एक तीक्ष्ण त्रिशूल हाथमें लेकर देवताओं, यक्षों, (दक्षपक्षीय) पिशाचों, गुह्यकों तथा राक्षसोंको भी उस युद्धमें मार गिराया। समस्त शिवगणोंने शूलके आघातसे


* अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दुर्भिक्षो मरणं भयम्॥
(स्क० पु०, मा० के० ३।४८-४९)

८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


देवताओंको गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो सम्पूर्ण देवता पराजित होकर भागने लगे। सबने एक-दूसरेको छोड़कर स्वर्गकी राह ली। केवल इन्द्र आदि लोकपाल ही विजयके लिये उत्सुक होकर वहाँ खड़े रहे। वे बारंबार बृहस्पतिजीसे पूछते थे—'गुरुदेव! हमारी विजय कैसे होगी?' तब बृहस्पतिजीने कहा—'भगवान् विष्णुने जो बात बहुत पहले कह दी थी, वह आज सत्य हुई। यदि फलरूपमें परिणत हुए कर्मका नियामक कोई ईश्वर है तो वह भी कर्ताका ही आश्रय लेता है। जो कर्ता नहीं है, उसपर वह अपना प्रभुत्व नहीं प्रकट करता—कर्म करनेवालेको ही ईश्वर उसका फल देता है, न करनेवालेको नहीं। वह ईश्वर केवल अनन्य भक्तिसे जानने योग्य है। परम शान्ति और सन्तोषसे ही भगवान् सदाशिवके स्वरूपको जाना जा सकता है। उन्हींसे यह सम्पूर्ण सुख-दुःखात्मक जगत् जन्म और जीवन धारण करता है। (इस समय तुम्हारी विजयका कोई उपाय नहीं दिखायी देता।) इन्द्र! तुम मूर्खता और लोलुपताके वश इन लोकपालोंके साथ यहाँ आ गये हो। बताओ तो इस समय क्या करोगे? ये परम शोभायमान गण भगवान् शिवके किंकर हैं; वे ही इनके सहायक हैं। ये महाभाग कुपित होनेपर जब संहार आरम्भ करते हैं तब किसीको शेष नहीं छोड़ते।'

बृहस्पतिजीका यह कथन सुनकर वे सम्पूर्ण देवता, लोकपाल तथा इन्द्र भी चिन्तामें डूब गये। तदनन्तर शिवगणोंसे घिरे हुए वीरभद्रने कहा—'तुम सब देवता मूर्खताके कारण यहाँ भेंट लेनेके लिये आ गये हो। मेरे निकट तो आओ। मैं तुम्हें भेंट देता हूँ। सखे इन्द्र! मित्रवर सूर्य! चन्द्रमा! धनाध्यक्ष कुबेर! पाशधारी वरुण! मृत्यो! यमुनाके बड़े भैया यमराज! मैं आपलोगोंकी तृप्तिके लिये शीघ्र ही भेंट अर्पित करूँगा।' यों कहकर क्रोधमें भरे वीरभद्रने सब देवताओंपर बाणोंकी बौछार आरम्भ की। उन बाणोंके आघातसे पीड़ित होकर वे सब-के-सब दसों दिशाओंमें भाग गये। लोकपालोंके और देवताओंके पलायन कर जानेपर भगवान् विष्णु भी चले गये। फिर वीरभद्र अपने गणोंके साथ यज्ञशालामें आये। उस समय देवता, ऋषि तथा अन्य जो यज्ञोपजीवी लोग थे, उन सबको भगवान् शिवके गणोंने परास्त कर दिया। महर्षि भृगुको धरतीपर पटककर उनकी दाढ़ी और मूँछ नोंच ली। पूषाने दाँत दिखाकर हँसी उड़ायी थी, अतः शिवगणोंने उनके सारे दाँत उखाड़ लिये। अग्निपत्नी स्वधा और स्वाहाको भी अपमानित किया तथा क्रोधमें भरकर उन्होंने और भी ऐसे-ऐसे बर्ताव किये, जो वाणीद्वारा कहने योग्य नहीं हैं। दक्ष महान् भयके मारे अन्तर्वेदीमें छिपे हुए थे। इस बातका पता लगनेपर रोषमें भरे हुए वीरभद्र उन्हें पकड़ लाये और उनका जबड़ा पकड़कर सिरके ऊपर तलवारसे चोट की। फिर दक्षके कटे हुए सिरको उन्होंने तुरंत ही यज्ञकुण्डमें डालकर जला दिया। उस यज्ञशालामें दूसरे-दूसरे जो देवता, पितर, ऋषि, यक्ष और राक्षस रह गये थे, वे सब शिवगणोंके उपद्रवसे भयभीत होकर भाग चले। चन्द्रमा, आदित्यगण, ग्रहमण्डल, नक्षत्र और तारे—इन सबको शिवगणोंने भगा दिया। ब्रह्माजी अपने पुत्र दक्षके शोकसे पीड़ित होकर सत्यलोकको चले गये और वहाँ स्वस्थचित्तसे विचार करने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? इस अपमानके कारण ब्रह्माजीको शान्ति नहीं मिलती थी। 'यह सब कुछ उस दक्षके ही पापका फल है' यह जानकर पितामहने कैलास पर्वतपर जानेका निश्चय किया। महातेजस्वी ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हो सब देवताओंके साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर गये। वहाँ उन्होंने नन्दीके साथ एकान्तमें बैठे हुए भगवान् सदाशिवका दर्शन किया। उनके मस्तकपर जटा-जूट शोभा पा रहा था। भगवान् शिवको देखकर ब्रह्माजी दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये और अपना अपराध क्षमा करानेके

वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञ-विध्वंस

१०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लिये उद्यत हो अपने चारों मुकुटोंसे भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका स्पर्श करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

ब्रह्माजी बोले— शान्तस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, परब्रह्मरूप परमात्मा भगवान् रुद्रको नमस्कार है; मस्तकपर जटा-जूट धारण करनेवाले महान् ज्योतिर्मय महेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतियोंके भी स्रष्टा हैं। आप ही सबका धारण-पोषण करते हैं। आप सबके प्रपितामह हैं। आप ही रुद्र, महान्, नीलकण्ठ और वेधा हैं; आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका स्वरूप है। आप ही इसके बीज (आदिकारण) हैं। इस जगत्को आनन्दकी प्राप्ति करानेवाले भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है। आप ही ओंकार, वषट्कार तथा सम्पूर्ण आयोजनोंके प्रवर्त्तक हैं। यज्ञ, यजमान और यज्ञ-प्रवर्त्तक भी आप ही हैं। प्रभो! देवेश्वर! यज्ञ-प्रवर्त्तक होकर भी आपने इस यज्ञका विनाश कैसे किया? महादेव! आप ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, तो भी आपके द्वारा दक्षका वध कैसे हुआ? रुद्र! आप तो गौओं और ब्राह्मणोंके प्रतिपालक हैं। समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं। रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

श्रीमहादेवजीने कहा— पितामह! सावधान होकर मेरी बात सुनिये, दक्ष अपने ही कर्मसे मारा गया। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इसलिये किसीको भी कदापि ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये जो दूसरोंको क्लेश पहुँचानेवाला हो। ब्रह्मन्! जो दूसरोंको कष्ट देनेवाला कर्म किया जाता है, वह एक दिन अपने ही ऊपर आ पड़ता है।

यों कहकर भगवान् शंकर उस समय ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ कनखल तीर्थमें, जहाँ प्रजापति दक्षका यज्ञमण्डप था, गये। वहाँ जाकर उन्होंने वीरभद्रके द्वारा जो कुछ किया गया था, सब देखा। स्वाहा, स्वधा, पूषा, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भृगु, अन्यान्य ऋषि, समस्त पितर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—जो भी वहाँ जिस अवस्थामें पड़े थे, सबको भगवान् शिवने देखा। किसीके अंग-भंग हो गये थे, किसीकी दाढ़ी और मूँछें नोंच ली गयी थीं तथा कुछ लोग रणभूमिमें मरे पड़े थे। भगवान् शंकरको आया देख वीरभद्रने समस्त गणोंके साथ उनके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया और वे सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। महाबली वीरभद्रको अपने आगे खड़ा देख महादेवजीने हँसते हुए कहा—‘वीरवर! यह तुमने क्या किया? दक्षको शीघ्र यहाँ ले आओ, जिसने ऐसा यज्ञ किया और उसका वैसा ही विलक्षण फल भी प्राप्त किया।’

शंकरजीके यों कहनेपर वीरभद्रने बड़ी उतावलीके साथ दक्षका धड़ लाकर उनके सामने डाल दिया। तब शंकरजीने कहा—‘वीर! इस दुरात्मा दक्षका मस्तक कौन ले गया? यदि मिल जाय तो कुटिल होनेपर भी इसे मैं जीवित कर दूँगा।’ यह सुनकर वीरभद्र फिर बोले—‘भगवन्! मैंने उसी समय इसके मस्तकको अग्निमें होम दिया था, अब तो केवल पशुका सिर बचा है। किंतु उसका मुख बहुत विकृत हो गया है।’ ये सब बातें जानकर भगवान् शिवने पशुके भयंकर मुखको, जिसमें दाढ़ी भी लगी थी, दक्षके धड़से जोड़ दिया। इस प्रकार भगवान् शंकरकी कृपासे दक्षको नया जीवन प्राप्त हुआ। दक्ष अपने सामने भगवान् रुद्रको उपस्थित देख लज्जासे गड़ गये, उन्होंने लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकरके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उनका स्तवन किया।

दक्ष बोले— सबको वर देनेवाले सर्वश्रेष्ठ देव भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। सनातन देवता शिवको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। देवताओंके पालक और ईश्वर, पापहारी हरको मैं प्रणाम करता हूँ। जगत्के एकमात्र बन्धु शम्भुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी, विश्वरूप, सनातन ब्रह्म और स्वात्मरूप हैं, उन

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ९१


भगवान् शिवको मैं शीश झुकाता हूँ। अपनी भक्तिसे प्राप्त होने योग्य सर्वरूप भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वरदायक हैं, वरस्वरूप हैं और वरण करनेयोग्य हैं, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक नवाता हूँ।^१

दक्षके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकरने कहा—सुरश्रेष्ठ! चार प्रकारके पुण्यात्मा जन मेरा सदा भजन करते हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। (इन सबमें ज्ञानी श्रेष्ठ है।) इसलिये समस्त ज्ञानी पुरुष मुझे विशेष प्रिय हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो ज्ञानके बिना ही मुझे पानेका यत्न करते हैं, वे अज्ञानी हैं। तुम केवल यज्ञादि कर्मके द्वारा संसार-सागरके पार जाना चाहते हो; परंतु कर्ममें आसक्त हुए मूढ़ पुरुष वेद, यज्ञ, दान और तपस्यासे भी मुझे कभी नहीं प्राप्त कर सकते। अतएव तुम अन्तःकरणको एकाग्र करके ज्ञाननिष्ठ होकर कर्म करो। सुख और दुःखमें समान भाव रखकर सदा प्रसन्न रहो।^२

तदनन्तर दक्षको वहीं कनखल तीर्थमें रहनेका आदेश देकर भगवान् शिव अपने निवास-स्थान कैलास पर्वतपर चले गये। फिर ब्रह्माजीने भृगु आदि सम्पूर्ण महर्षियोंको आश्वासन तथा बोध प्रदान किया। वे सब ऋषि-मुनि तत्क्षण ज्ञानी हो गये। इसके बाद पितामह ब्रह्माजी अपने धामको गये। इधर प्रजापति दक्षको भगवान् शंकरके उपदेशसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। वे शिवजीके ध्यानमें तत्पर होकर तपस्या करने लगे। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके सबको भगवान् शंकरकी आराधना करनी चाहिये।


१. नमामि देवं वरदं वरेण्यं नमामि देवं च सदा सनातनम्।
नमामि देवाधिपमीश्वरं हरं नमामि शम्भुं जगदेकबन्धुम्॥
नमामि विश्वेश्वरविश्वरूपं सनातनं ब्रह्म निजात्मरूपम्।
नमामि सर्वं निजभावगम्यं वरं वरेण्यं वरदं नतोऽस्मि॥
(स्क० पु०, मा० के० ५।३९-४०)

२. दक्षेण संस्तुतो रुद्रो बभाषे प्रहसन् हरः॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनः सदा । आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च सुरसत्तम॥
तस्मान्मे ज्ञानिनः सर्वे प्रियाः स्युर्नात्र संशयः । विना ज्ञानेन मां प्राप्तुं यतन्ते ते हि बालिशाः॥
केवलं कर्मणा त्वं हि संसारं तर्तुमिच्छसि । न वेदैश्च न यज्ञैश्च न दानैस्तपसा क्वचित्॥
न शक्नुवन्ति मां प्राप्तुं मूढाः कर्मवशा नराः । तस्माज्ज्ञानपरो भूत्वा कुरु कर्म समाहितः॥
सुखदुःखसमो भूत्वा सुखी भव निरन्तरम्॥
(स्क० पु०, मा० के० ५।४१—४६)

१२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शिवपूजनकी महिमा

लोमशजी कहते हैं—जो मनुष्य शिवमन्दिरके आँगनमें झाडू लगाते हैं, वे निश्चय ही भगवान् शिवके लोकमें पहुँचकर सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय हो जाते हैं। जो भगवान् शिवके लिये यहाँ अत्यन्त प्रकाशमान दर्पण अर्पण करते हैं, वे आगे चलकर शिवजीके सम्मुख उपस्थित रहनेवाले पार्षद होंगे। जो लोग देवाधिदेव, शूलपाणि शंकरको चँवर भेंट करते हैं, वे त्रिलोकीमें जहाँ कहीं जन्म लेंगे, उनपर चँवर डुलता रहेगा। जो परमात्मा शिवकी प्रसन्नताके लिये धूप निवेदन करते हैं, वे पिता और नाना दोनोंके कुलोंका उद्धार करते हैं तथा भविष्यमें यशस्वी होते हैं। जो लोग भगवान् हरि-हरके सम्मुख दीपदान करते हैं, वे भविष्यमें तेजस्वी होते और दोनों कुलोंका उद्धार करते हैं। जो मनुष्य हरि-हरके आगे नैवेद्य निवेदन करते हैं, वे एक-एक (ग्रास)-में सम्पूर्ण यज्ञका फल पाते हैं। जो लोग टूटे हुए शिव-मन्दिरको पुनः बनवा देते हैं, वे निस्सन्देह द्विगुण फलके भागी होते हैं। जो ईंट अथवा पत्थरसे भगवान् शिव तथा विष्णुके लिये नूतन मन्दिर निर्माण कराते हैं, वे तबतक स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं, जबतक इस पृथ्वीपर उनकी वह कीर्ति स्थित रहती है। जो महान् बुद्धिमान् मानव भगवान् शिवके लिये अनेक मंजिलोंका महल (मन्दिर) बनवाते हैं, वे उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। जो अपने और दूसरोंके बनवाये हुए शिव-मन्दिरकी सफाई करते या उसमें सफेदी कराते हैं, वे भी उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष अथवा स्त्रियाँ शिवजीके आँगनमें विविध रंगोंके चौक पूरती हैं, वे सर्वश्रेष्ठ शिवधाममें पहुँचकर दिव्य रूप प्राप्त करेंगी। जो पुण्यात्मा मनुष्य भगवान् शिवको चँदोवा भेंट करते हैं, वे स्वयं तो शिवलोकमें जाते ही हैं, अपने समस्त कुलको भी तार देते हैं। जो अधिक आवाज करनेवाला घण्टा लेकर उसे शिव-मन्दिरमें बाँधते हैं, वे भी त्रिलोकीमें तेजस्वी और कीर्तिमान् होंगे। धनवान् हो या दरिद्र, जो एक-दो या तीनों समय भगवान् शिवका दर्शन करता है, वह सुखी होता और समस्त दुःखोंसे छूट जाता है।

हे हरे! और हे हर! इस प्रकार भगवान् शिव और विष्णुके नाम लेनेसे परमात्मा शिवने बहुतेरे मनुष्योंकी रक्षा की है।* तीनों लोकोंमें महादेवजीसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं दिखायी देता। इसलिये सब प्रकारके प्रयत्नोंसे भगवान् सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये। पत्र, पुष्प, फल अथवा स्वच्छ जल तथा कनेरसे भी भगवान् शिवकी पूजा करके मनुष्य उन्हींके समान हो जाता है। आक (मदार) का फूल कनेरसे दसगुना श्रेष्ठ माना गया है। आकके फूलसे भी दसगुना श्रेष्ठ है धतूरे आदिका फल। नील-कमल एक हजार कह्लार (कचनार)-से भी श्रेष्ठ माना गया है। यह चराचर जगत् विभूतिसे प्रकट हुआ है। वह विभूति भगवान् शिवके श्रीअंगोंमें भलीभाँति लगती है, इसलिये सदा उसे धारण करना चाहिये।

जिनके मुखसे 'नमः शिवाय' यह पंचाक्षर मन्त्र सदा उच्चारित होता रहता है, वे मनुष्य भगवान् शंकरके स्वरूप हैं। प्रातःकाल, मध्याह्नकाल तथा सन्ध्याके समय शंकरजीका दर्शन करना चाहिये। प्रातःकाल भगवान् शिवके दर्शनसे सम्पूर्ण पातकोंका नाश हो जाता है। दोपहरके समय शिवजीके दर्शनसे मनुष्योंके सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं तथा रात्रि-कालमें शंकरजीके दर्शनसे जो पुण्य होता है, उसकी तो कोई गणना ही नहीं है। 'शिव' यह दो अक्षरोंका नाम महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। जिन मनुष्योंके मुखसे **'शिव'**नामका


* हरे हरेति वै नाम्ना शम्भोश्चक्रधरस्य च। रक्षिता बहवो मर्त्याः शिवेन परमात्मना॥
(स्क० पु०, मा० के० ५।९२)

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * १३


जप होता रहता है, उन्होंने ही इस सम्पूर्ण जगत्को धारण किया है। पुण्यात्मा पुरुषोंने शिवजीके आँगनमें आरतीके समय बजानेके लिये जो बड़ा-सा नगारा रख छोड़ा हो, उसकी आवाजसे पापी मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये चिरकालसे संचित प्रचुर धन, बहुमूल्य चँवर, मंच, शय्या, दर्पण, चँदोवा, आभूषण तथा विचित्र वस्त्र भगवान् शिवकी सेवामें अर्पित करने चाहिये। पुराण-पाठ, कथा, इतिहास और संगीत आदि नाना प्रकारके आयोजन भगवान् शिवको प्रिय हैं; इनकी व्यवस्था करनी चाहिये। ऐसी व्यवस्था करके पापी मनुष्य भी अपने पापसे मुक्त होकर शिवलोकमें चले जाते हैं। जो स्वधर्मका पालन करनेवाले, महात्मा और शिव-पूजाके विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने गुरुके मुखसे शिवकी दीक्षा ली है, जो निरन्तर शिवजीकीपूजामें संलग्न रहते हैं, मनमें दृढ़ विश्वास रखकर सम्पूर्ण विश्वको शिवके रूपमें देखते हैं, उत्तम बुद्धिका आश्रय ले सदाचारका पालन करते तथा अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्ममें स्थित रहते हैं, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा कोई भी क्यों न हों, भगवान् शिवके परम प्रिय होते हैं। चाण्डाल हो या सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, भजन करनेपर सभी भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय लगते हैं। भगवान् शंकर ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के आधार हैं, अतः सब कुछ शिवस्वरूप है— यह बात विशेष रूपसे जाननी चाहिये। वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद्, आगम और देवता— सबके द्वारा भगवान् सदाशिव ही जानने योग्य हैं। मनुष्य निष्काम हो या सकाम, सबको भगवान् सदाशिवकी आराधना करनी चाहिये।

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शिवलिंग-पूजनकी महिमा तथा रावणके उत्कर्ष और पतनका वृत्तान्त

लोमशजी कहते हैं—जो विष्णु हैं, उन्हें शिव जानना चाहिये और जो शिव हैं, वे विष्णु ही हैं। पीठिका (आधार अथवा अर्घा) भगवान् विष्णुका रूप है और उसपर स्थापित लिंग महेश्वरका स्वरूप है। अतः शिवलिंगका पूजन सबके लिये श्रेष्ठ है। ब्रह्माजी निरन्तर मणिमय शिवलिंगका पूजन करते हैं। इन्द्र रत्नमय, चन्द्रमा मुक्तामय तथा सूर्य ताम्रमय लिंगकी सर्वदा पूजा करते हैं। कुबेर चाँदीके शिवलिंगकी, वरुण कुछ लाल रंगके शिवलिंगकी, यमराज नीले रंग, नैर्ऋत्य कोणके अधिपति रजतवर्ण तथा वायुदेव केसरिया रंगके शिवलिंगकी निरन्तर आराधना करते हैं। इस प्रकार इन्द्र आदि समस्त लोकपाल शिवलिंगोपासक हैं। पातालमें भी सब लोग शिवपूजक हैं। गन्धर्व और किन्नर भी शिवोपासना करते हैं। दैत्योंमें प्रह्लाद आदि कोई-कोई ही वैष्णव हैं। यही बात राक्षसोंके लिये भी है, उनमें भी विभीषणआदि ही वैष्णव हैं। बलि, नमुचि, हिरण्यकशिपु, वृषपर्वा, संह्लाद— ये तथा बुद्धिमान् शुक्राचार्यके और भी बहुत-से शिष्य शिवजीकी उपासना करनेवाले हैं। इस तरह प्रायः सभी दैत्य-दानव और राक्षस शिवाराधनमें ही रत रहते हैं। हेति, प्रहेति, संयाति, प्रयाची, प्रघस, विद्युज्जिह्व, तीक्ष्णदंष्ट्र, धूम्राक्ष, भीमविक्रम, माली, सुमाली, माल्यवान्, अतिभीषण, विद्युत्केश, खड्गजिह्व, महाबली रावण, दुर्धर्ष वीर कुम्भकर्ण तथा प्रतापी वेगदर्शी आदि समस्त श्रेष्ठ राक्षस सदा शिव-पूजनमें संलग्न रहे हैं। ये सर्वदा शिवलिंगका अर्चन करके उच्चकोटिकी सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। रावणने ऐसी तपस्याकी थी, जो सभीके लिये दुःसह थी। महादेवजीको तपस्या बहुत प्रिय है। वे उसकी तपस्यासे जब बहुत अधिक प्रसन्न हो गये, तब उन्होंने रावणको ऐसे-ऐसे वरदान दिये, जो अन्य सबके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं। रावणने भगवान् सदाशिवसे

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ज्ञान, विज्ञान, संग्राममें अजेयता तथा शिवजीकी अपेक्षा दुगुने सिर प्राप्त किये। महादेवजीके पाँच मुख हैं। इसलिये उनसे द्विगुण मुख पाकर रावण दशमुख हुआ। उसने देवताओं, ऋषियों और पितरोंको भी सर्वथा परास्त करके उन सबपर अपनी प्रभुता स्थापित की। भगवान् महेश्वरके प्रसादसे वह सबसे अधिक प्रतापी हुआ। महादेवजीने उसे त्रिकूट पर्वतका महाराजा बना दिया।

इस प्रकार शिवलिंगकी पूजाके प्रसादसे रावणने तीनों लोकोंको वशमें कर लिया। देवताओंको बड़ी चिन्ता हुई। वे सब मिलकर शिवलोकमें गये और दरवाजेपर किंकरोंकी भाँति खड़े हो गये। उस समय नन्दी, जिनका मुख वानरके समान है, देवताओंसे वार्तालाप करने लगे। देवताओंने नन्दीको प्रणाम करके पूछा—'आपका मुख वानरके समान क्यों है?' नन्दीने कहा—" 'एक समय रावण यहाँ आया और अपने पराक्रमकी बातें बहुत बढ़-चढ़कर कहने लगा; उस समय मैंने उससे कहा—'भैया! तुम भी शिवलिंगके पूजक हो और मैं भी, अतः हम दोनों समान हैं; फिर मेरे सामने यह व्यर्थ डींग क्यों मारते हो?' मेरी बात सुनकर रावणने तुम्हीं लोगोंकी भाँति मेरे वानर-मुख होनेका कारण पूछा। उत्तरमें मैंने निवेदन किया कि 'यह मेरी शिवोपासनाका मुँहमाँगा फल है। भगवान् शिव मुझे अपना सारूप्य दे रहे थे, किंतु उस समय मैंने वह नहीं स्वीकार किया। अपने लिये वानरके समान ही मुख माँगा। भगवान् बड़े दयालु हैं। उन्होंने कृपापूर्वक मुझे मेरी माँगी हुई वस्तु दे दी। जो अभिमानशून्य हैं, जिनमें दम्भका अभाव है तथा जो परिग्रहसे दूर रहनेवाले हैं, उन्हें भगवान् शंकरका प्रिय समझना चाहिये। इसके विपरीत जो अभिमानी, दम्भी और परिग्रही हैं, वे शिवकी कल्याणमयी कृपासे वंचित रहते हैं।' रावण मेरे साथ पूर्वोक्त बातचीतमें अपने तपोबलका बखान करने लगा। उसने कहा—'मैं बुद्धिमान् हूँ, मैंने भगवान् शिवसे दस मुख माँगे हैं। अधिक मुखोंसे शिवजीकी अद्भुत स्तुति की जा सकती है। तुम्हारे इस वानरतुल्य मुखसे क्या होगा? तुम्हें किसीने खोटी सलाह दी होगी; तुमने शंकरजीसे यह वानरका मुख व्यर्थ माँगा है।' देवताओ! रावणका यह उपहासपूर्ण वचन सुनकर मैंने उसे शाप देते हुए कहा—'जब कोई महातपस्वी श्रेष्ठ मानव उन वानरोंके साथ मुझे आगे करके तुमपर आक्रमण करेगा, उस समय वह तुम्हें अवश्य मार डालेगा।' इस प्रकार सारे संसारको रुलानेवाले रावणको मैंने शाप दे डाला। देवाधिदेव महादेवजी साक्षात् विष्णुरूप हैं, अतः आपलोग भगवान् विष्णुसे प्रार्थना करें।'

नन्दीकी यह बात सुनकर सब देवता मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने वैकुण्ठमें आकर अपनी वाणीद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति आरम्भ की।

देवता बोले—देवदेव जगदीश्वर! आप छहों ऐश्वर्योंसे युक्त होनेके कारण भगवान् कहलाते हैं। आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके आधारपर टिका हुआ है। यह जगत् एक लिंग है, जिसे आपने आधारपीठरूप होकर धारण किया है। प्रभो! हमलोगोंके लिये पहले भी आपने अनेक बार अवतार धारण किया है। आपने ही मत्स्यरूप धारण करके ब्रह्माजीके मुखमें वेदोंकी स्थापना की है। आपने ही हयग्रीवरूपसे मधु और कैटभ नामक दैत्योंको मारा है। कच्छप अवतार धारण करके आपने ही अपनी पीठपर मन्दराचल पर्वत उठाया था। वाराहरूप धारण कर आपने हिरण्याक्ष दैत्यका वध किया तथा नरसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मौतके घाट उतारा है। वामन अवतार धारण कर आपने ही दैत्यराज बलिको बाँधा और भृगुकुलमें परशुरामरूपसे प्रकट होकर आपने ही कार्तवीर्य अर्जुनका वध किया है। विष्णो! आपने बहुत-से दैत्योंका संहार किया है। आप

[चित्र: शुक्लाम्बर शशिवर्ण भगवान् विष्णु]

गीताप्रेस, गोरखपुर
B.K. Mitra

शुक्लाम्बर शशिवर्ण भगवान् विष्णु


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गीताप्रेस, गोरखपुर
B. K. Mitra


तपस्यामें लगी हुई पार्वतीजीका भगवान् शिवके दर्शन

गौतमाश्रममें पार्वती

(चित्र: आश्रममें देवी पार्वती और ऋषि गौतम, जहाँ वन्य पशु-पक्षी परस्पर शान्तिपूर्वक विचरण कर रहे हैं)


आश्रममें हिंसक प्राणियोंका परस्पर प्रेम


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B.K.Mitra

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् बालकृष्ण

[चित्र: संकीर्तनमें उद्धवजीका प्राकट्य]

गीताप्रेस, गोरखपुर

संकीर्तनमें उद्धवजीका प्राकट्य

[गीताप्रेस, गोरखपुर]

भगवान् श्रीरामचन्द्रकी अभ्यर्थना

विष-पान

गीताप्रेस, गोरखपुर

शिव-विवाह

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * १५

ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। अतः रावणके भयसे अवश्य हमारा उद्धार करें।*

सीताको बलपूर्वक प्राप्त करना चाहेगा, उस समय वह दोनों स्थितियोंसे तत्काल भ्रष्ट हो जायगा। सीताके अन्वेषणमें तत्पर होकर वह न तो तपस्वी रह जायगा और न भक्त ही। जो अपनेको न दी हुई ब्रह्मविद्याका बलपूर्वक सेवन करना चाहता है, वह पुरुष धर्मसे परास्त होकर सदा सुगमतापूर्वक जीत लेनेयोग्य हो जाता है।'

परम मंगलमय भगवान् विष्णु इस प्रकारके वचनोंद्वारा सम्पूर्ण देवताओंको आश्वासन देकर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सब देवता अवतार धारण करने लगे। इन्द्रके अंशसे वाली उत्पन्न हुए, सुग्रीव सूर्यके पुत्र थे। जाम्बवान् ब्रह्माजीके अंशसे प्रकट हुए थे। शिलादके पुत्र नन्दी जो भगवान् शिवके अनुचर तथा ग्यारहवें रुद्र थे, महाकपि हनुमान् हुए। वे अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुकी सहायता करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए थे। अन्यान्य श्रेष्ठ देवता मैन्द आदि कपियोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। इसी तरह सभी देवता किसी-न-किसी कपिके रूपमें प्रकट हुए। साक्षात् भगवान् विष्णु ही माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीराम हुए। सम्पूर्ण विश्व उनके स्वरूपमें रमण करता है, इसलिये विद्वान् पुरुष उनको 'राम' कहते हैं। भगवान् विष्णुके प्रति भक्ति और तपस्यासे युक्त शेषनाग भी इस पृथ्वीपर लक्ष्मणके रूपमें अवतीर्ण हुए। श्रीविष्णुके भुजदण्डोंसे भी दो प्रतापी वीर प्रकट हुए, जो तीनों लोकोंमें भरत-शत्रुघ्नके नामसे विख्यात हुए। ब्रह्मवादी पुरुषोंद्वारा जो मिथिलापति जनककी

देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भूतभावन भगवान् वासुदेवने सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'देवगण! तुमलोग अपने प्रस्तावके अनुसार मेरी बात सुनो, नन्दीको आगे करके तुम सभी शीघ्रतापूर्वक वानर-शरीरमें अवतार लो। मैं मायासे अपने स्वरूपको छिपाये हुए मनुष्यरूप होकर अयोध्यामें राजा दशरथके घर प्रकट होऊँगा। तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये मेरे साथ ब्रह्मविद्या भी अवतार लेंगी। राजा जनकके घर साक्षात् ब्रह्मविद्या ही सीतारूपमें प्रकट होंगी। रावण भगवान् शिवका भक्त है। वह सदा साक्षात् शिवके ध्यानमें तत्पर रहता है। उसमें बड़ी भारी तपस्याका भी बल है। जब ब्रह्मविद्यारूप


* नमो भगवते तुभ्यं देवदेव जगत्पते। त्वदाधारमिदं सर्वं जगदेतच्चराचरम्॥
एतल्लिङ्गं त्वया विष्णो धृतं वै पीठरूपिणा। अवताराः कृताः पूर्वमस्मदर्थे त्वया प्रभो॥
मत्स्यो भूत्वा त्वया वेदाः स्थापिता ब्रह्मणो मुखे। हयग्रीवस्वरूपेण घातितौ मधुकैटभौ॥
तथा कमठरूपेण धृतो वै मन्दराचलः। वराहरूपमास्थाय हिरण्याक्षो हतस्त्वया॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नृसिंहरूपिणा हतः। तथा चैव बलिर्बद्धो दैत्यो वामनरूपिणा॥
भृगूणामन्वये भूत्वा कार्तवीर्यात्मजो हतः। हता दैत्यास्त्वया विष्णो त्वमेव परिपालकः॥
रावणस्य भयात्तस्मान्त्रातुमर्हसि च ध्रुवम्।
(स्क० पु०, मा० के० ८। १००–१०६)

९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कन्या बतायी गयी हैं, वे सीता साक्षात् ब्रह्मविद्या थीं; वे भी देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये ही अवतीर्ण हुई थीं। हलसे भूमि जोती जा रही थी; उसी समय सीता (हलकी नोक)-के द्वारा पृथ्वीके खोदे जानेपर पृथ्वीसे ये प्रकट हुई थीं, इसीलिये 'सीता' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। मिथिलामें अवतार लेनेके कारण इन्हें 'मैथिली' भी कहते हैं। जनकके कुलमें जन्म लेनेके कारण ये 'जानकी' नामसे विख्यात हुईं। पूर्वजन्ममें इनका नाम वेदवती था। राजा जनकने ब्रह्मविद्यास्वरूप सीताको परमात्मा ब्रह्मरूप श्रीरामकी सेवामें अर्पित कर दिया। कमलनयन श्रीरामने रावणको जीतनेकी इच्छा तथा देवकार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे वनमें निवास किया। शेषावतार लक्ष्मणने भी उसीके लिये अत्यन्त दुष्कर एवं महान् तप किया। भरत और शत्रुघ्नने भी बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर तपोबलसम्पन्न हो कपिरूपधारी देवताओंको साथ लेकर श्रीरामने छः महीनेतक युद्ध करके रावणका वध किया। भगवान् विष्णुके द्वारा शस्त्रोंसे मारा गया रावण अपने गणों, पुत्रों तथा बन्धुओंसहित तत्काल भगवान् शिवके सारूप्यको प्राप्त हो गया। शंकरजीकी कृपासे उसने सम्पूर्ण द्वैताद्वैत ज्ञान प्राप्त कर लिया।

जो नित्य (द्वादश ज्योतिर्लिंगोंमेंसे किसी भी) लिंगस्वरूप भगवान् शिवकी पूजा करते हैं वे स्त्री, शूद्र, अन्त्यज अथवा चाण्डाल ही क्यों न हों, सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाले शिवको अवश्य प्राप्त कर लेते हैं। जो मनको अपने वशमें करके भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहते हैं, उनका मायामय अज्ञान शीघ्र दूर हो जाता है, तथा मायाका निवारण हो जानेसे तीनों गुणोंका लय हो जाता है। इस प्रकार मनुष्य जब गुणातीत हो जाता है, तब वह मोक्षका भागी होता है। अतः सम्पूर्ण देहधारियोंके लिये शिव-लिंगका पूजन कल्याणकारी है। भगवान् शिव लिंगरूपमें प्रकट होकर चराचर जगत्‌का उद्धार करते हैं। विप्रगण! पहले तुम सब लोगोंने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने बतला दिया। तुम्हारा दूसरा प्रश्न यह था कि भगवान् शिवने विष-भक्षण कैसे किया था; वह सब प्रसंग मैं यथावत् रूपसे कह रहा हूँ। तुम सब लोग सावधान होकर सुनो।


गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रकी दैत्योंद्वारा पराजय, समुद्र-मन्थन, शंकरजीकी कृपासे कालकूट विषसे सबकी रक्षा, विविध रत्नोंका प्राकट्य तथा लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव

**लोमशजी कहते हैं—**एक समय देवराज इन्द्र सम्पूर्ण लोकपालों तथा ऋषियोंसे घिरे हुए अपनी सुधर्मा सभामें बैठे थे। वहाँ सिद्ध और विद्याधरगण उनकी विजयके गीत गा रहे थे। इसी समय परम बुद्धिमान् देवेन्द्रगुरु महाभाग बृहस्पतिजी अपने शिष्योंके साथ देवसभामें पधारे। उन्हें उपस्थित देख देवताओंने सहसा उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। इन्द्रने भी देखा, गुरुदेव वाचस्पति आगे खड़े हैं। किंतु इन्द्रकी बुद्धि राजमदसे दूषित हो रही थी; इसलिये उन्होंने गुरुके प्रति न तो आदरयुक्त वचन कहा, न उन्हें बुलाया, न बैठनेको आसन दिया और न चले जानेको ही कहा। खोटी बुद्धिवाले इन्द्रको राज्यके मदसे उन्मत्त जानकर देवताओंके आचार्य बृहस्पति कुपित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर देवताओंके मनमें बड़ा खेद हुआ। यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा ऋषिगण भी उदास हो गये। नृत्य और गीत समाप्त होनेपर जब इन्द्र सचेत हुए, तब उन्होंने तुरंत देवताओंसे पूछा—'महातपस्वी गुरुदेव कहाँ चले गये?'

तब नारदजीने देवराज इन्द्रसे कहा—'बलसूदन! निस्सन्देह आपके द्वारा गुरुकी अवहेलना हुई

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *

१७

है। गुरुके अनादरसे राज्य अपने हाथसे चला जाता है। अतः आप सब प्रकारसे प्रयत्न करके गुरुसे अपने अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना कीजिये।' महात्मा नारदकी यह बात सुनकर इन्द्र सहसा सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये और उन सभी सभासदोंको साथ ले बड़ी उतावलीके साथ गुरुके निवासस्थानपर गये। इस समय इन्द्र अपने कर्तव्यके प्रति सजग हो चुके थे। वहाँ गुरुपत्नी ताराको देखकर उन्होंने प्रणाम किया और पूछा—'देवि! महातपस्वी गुरुजी कहाँ गये हैं?' ताराने इन्द्रकी ओर देखकर उत्तर दिया—'मैं नहीं जानती।' तब वे चिन्तामग्न होकर अपने घर लौट आये। इसी समय स्वर्गमें अनेक अद्भुत अनिष्टसूचक अपशकुन होने लगे, जो सम्पूर्ण स्वर्गवासियोंको तथा दुरात्मा इन्द्रको भी दुःख-प्राप्तिकी सूचना देनेवाले थे। इन्द्रकी वह करतूत पातालनिवासी राजा बलिने भी सुनी। फिर तो वे दैत्योंकी बहुत बड़ी सेना साथ ले पातालसे अमरावतीपुरीपर चढ़ आये। उस समय देवताओंका दानवोंके साथ बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उसमें दैत्योंने देवताओंको परास्त कर दिया। एक ही क्षणमें दूषित हृदयवाले अविवेकी इन्द्रका सातों ^१ अंगोंसहित सम्पूर्ण राज्य दैत्योंने अपने अधिकारमें कर लिया। विजयी दैत्य शीघ्र पातालको चले गये। शुक्राचार्यकी कृपासे ही दैत्यगण विजयी हुए थे। इन्द्रकी राज्य-लक्ष्मी नष्ट हो चुकी थी, इसलिये देवताओंने भी सर्वथा उनका त्याग कर दिया। श्रीहीन इन्द्र स्वर्गलोकसे अन्यत्र चले गये। कमलके समान कमनीय नेत्रोंवाली इन्द्रपत्नी शची भी दूसरोंकी दृष्टिसे छिपकर रहने लगीं। ऐरावतनामक महान् गजराज तथा उच्चैःश्रवा अश्व आदि जो बहुत-से रत्न थे, उन्हें दुष्ट दैत्योंने लोभवश स्वर्गलोकसे पातालमें पहुँचा दिया। परंतु वे रत्न पुण्यात्मा पुरुषोंके ही उपभोगमें आनेवाले थे। अतः दैत्योंके अधिकारमें न रहकर समुद्रमें कूद पड़े। उस समय राजा बलिने आश्चर्यचकित होकर अपने गुरु शुक्राचार्यसे कहा—'भगवन्! हम देवताओंको जीतकर बहुत-से रत्न यहाँ लाये थे; किंतु वे सभी समुद्रमें जा पड़े। यह तो बड़ी अद्भुत बात है!' राजा बलिकी यह बात सुनकर शुक्राचार्यने उत्तर दिया—'राजन्! सौ अश्वमेध यज्ञोंकी दीक्षा लेकर उन्हें पूर्ण करनेपर ही तुम्हारा देवताओंके राज्यपर अधिकार होगा, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है वही स्वर्गलोकके राज्यको भोगनेका अधिकारी होता है। अश्वमेध यज्ञ किये बिना स्वर्गकी कोई भी वस्तु उपभोगमें नहीं लायी जा सकती।' गुरुका यह वचन सुनकर राजा बलि उस समय चुप हो रहे और दानवोंके साथ उचित कार्योंमें लग गये।

इन्द्र बड़ी शोचनीय दशाको प्राप्त हो गये थे। वे ब्रह्माजीके पास गये और स्वर्गके राज्यपर जो भय आदि प्राप्त हुआ था, वह सब समाचार उन्हें कह सुनाया। इन्द्रकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उनसे कहा—'सब देवताओंको एकत्र करके हम सब लोग तुम्हारे साथ सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुकी आराधना करनेके लिये चलते हैं।' 'ऐसा ही हो।' यह सलाह करके इन्द्र आदि सम्पूर्ण लोकपाल ब्रह्माजीको आगे रखकर क्षीर-समुद्रके तटपर गये। वहाँ उन सबने परस्पर विचार करके भगवान् विष्णुकी स्तुति आरम्भ की।

ब्रह्माजी बोले—देवदेव! जगन्नाथ! देवता और दैत्य दोनों आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। आपकी कीर्ति परम पवित्र है, आप अविनाशी और अनन्त हैं। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। रमापते! आप यज्ञ हैं, यज्ञरूप हैं तथा यज्ञांग हैं। अतः आज कृपा करके देवताओंको वरदान दीजिये। भगवन्! गुरुकी अवहेलना करनेके कारण इन्द्र इस समय ऋषियोंसहित


^१. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग—ये परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अंग हैं।