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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • माहे‍श्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २४७

अरुणाचलेश्वरकी पूजा, शिवजीके द्वारा सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा विष्णुके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति

नन्दिकेश्वरजी कहते हैं—षडक्षर मन्त्रके द्वारा दहीसे और प्रणवद्वारा दूधसे भगवान् शिवको स्नान कराना चाहिये। विषुव-योगमें तथा अयनारम्भके दिन अरुणाचलनाथको प्रातःकाल भक्तिपूर्वक तुलसी निवेदन करना चाहिये। दोपहरको अमलतास और तीसरे पहरमें वेलाका पुष्प चढ़ाना अरुणाचलेश्वरके लिये उत्तम माना गया है। अघोर मन्त्रद्वारा एक हजार कलशोंके जलसे उन्हें स्नान कराना चाहिये। शिवरात्रिमें शतरुद्रियका पाठ करके बिल्वपत्रोंके द्वारा अरुणाचलेश्वरकी विशेष पूजा करनी चाहिये। रात्रिको जागरण करते हुए जितेन्द्रिय होकर कमल और कनेरके फूलोंसे तथा गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा दिव्य आगमोक्त विधिसे मोक्षके लिये अरुणाचलवासी महेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। भक्तिमान् पुरुष अपने जन्म-नक्षत्रके दिन तथा सम्पत्ति, विपत्ति और भयका अवसर आनेपर भगवान् अरुणाचलनाथकी विशेष पूजा करे। प्रवेश और यात्राके समय भी अरुणेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। यदि इस क्षेत्रमें स्थित होकर तीनों समय शिवजीकी पूजा करे, तो भुजा उठाकर डंकेकी चोट यह कहा जा सकता है कि स्वर्ग और मोक्षके लिये अरुणाचल-क्षेत्रसे बढ़कर दूसरा कोई स्थान नहीं है। 'अरुणक्षेत्र' अपना स्मरण करनेसे मनको, श्रवण करनेसे दोनों कानोंको, दर्शन करनेसे दोनों नेत्रोंको तथा नामोच्चारण करनेसे जिह्वाको तत्काल पवित्र कर देता है। इस महाक्षेत्रमें जन्म प्राप्त होनेपर देहधारी जीव जीते-जी भोग और मरनेपर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

मुने! पूर्वकालमें देव-कल्पके आदिमें विकल्प-शून्य भगवान् शिवने स्वेच्छासे ही सम्पूर्ण विश्वको उत्पन्न किया। उत्पन्न हुए विश्वकी सृष्टि-परम्परा चालू रखने तथा सर्वदा इसकी रक्षा करनेके लिये भगवान् त्रिलोचनने अपने दाहिने अंगसे ब्रह्मा और बायें अंगसे विष्णुको प्रकट किया। तत्पश्चात् ब्रह्माको रजोगुणसे और विष्णुको सत्त्वगुणसे युक्त किया। फिर देवाधिदेव महादेवसे प्रेरित होकर वे दोनों देवता सृष्टि एवं रक्षाके कार्यमें संलग्न हो सम्पूर्ण जगत्का शासन करने लगे। तदनन्तर ब्रह्माजीने मरीचि आदि दस पुत्रोंको अपने मनःसंकल्पसे तथा दक्षको दाहिने अँगूठेसे उत्पन्न किया। फिर मुखसे ब्राह्मणों, दोनों बाहोंसे क्षत्रियों, दोनों ऊरुओंसे वैश्यों और दोनों चरणोंसे शूद्रोंको प्रकट किया। मरीचिनन्दन कश्यपसे देवता और असुर उत्पन्न हुए। मरुत्, नाग, यक्ष, गन्धर्व तथा अप्सराओंका जन्म भी उन्हींसे हुआ। इसी प्रकार मनु भी ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए, जिनकी यह मानव-सन्तान आजतक चल रही है। महर्षि अत्रिसे ऋषिवंश तथा क्षत्रियोंका विविध कुल उत्पन्न हुआ। पुलस्त्य और पुलहसे यक्ष एवं राक्षस हुए। अंगिरा-मुनिसे उत्तथ्य और बृहस्पति आदिका जन्म हुआ। भृगुसे अग्निकी उत्पत्ति हुई तथा च्यवन आदि महर्षि भी उन्हींसे उत्पन्न हुए। वसिष्ठ आदि अन्य ब्रह्मर्षियोंसे भी बहुत-से महर्षियोंका जन्म हुआ। जिनके पुत्र-पौत्रोंसे यह सम्पूर्ण जगत् भरा हुआ है। इस प्रकार ब्रह्माजीने अपनी सन्तानोंसे इस जगत्को पूर्ण किया है।

एक समय भगवान् विष्णुने भगवान् शंकरका इस प्रकार स्तवन किया—'पृथ्वीरूप शरीरवाले महादेव! आपकी जय हो। जलरूपधारी शंकर! आपकी जय हो। सूर्यका रूप धारण करनेवाले शिव! चन्द्रमाकी आकृति धारण करनेवाले रुद्रदेव! आपकी जय हो। अग्निरूप महेश्वर! पवनरूपधारी परमेश्वर! यजमान-मूर्तिधारी शिव! आपकी जय हो। आकाशस्वरूप महेश्वर! त्रिगुणातीत परमेश्वर!

२४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कालस्वरूप मृत्युंजय! मेरी रक्षा कीजिये। अक्षय ऐश्वर्यसे सम्पन्न महादेव! करुणानिधान! मेरी रक्षा कीजिये। आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा और समस्त देहधारियोंके रक्षक हैं, सब भूतोंका संहार करनेवाला भी आपके सिवा दूसरा कौन है? आप सूक्ष्म वस्तुओंमें सबसे अधिक सूक्ष्म (परमाणु) हैं और महान् पदार्थोंमें सबसे महान् भी आप ही हैं। आप ही इस जगत्के बाहर और भीतर व्याप्त होकर विराज रहे हैं। सम्पूर्ण वेद आपके निःश्वास हैं। यह सारा विश्व आपके शिल्पकर्मकी विभूति है। प्रभो! सब कुछ आपका ही है; मुझे ज्ञान दीजिये। देवता, दानव, दैत्य, सिद्ध, विद्याधर, मनुष्य, पशु-पक्षी, पर्वत और वृक्ष भी आप ही हैं। स्वर्ग, अपवर्ग, ॐकार और यज्ञ भी आप ही हैं; आप ही योग तथा पराशक्ति हैं। महेश्वर! ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो आप नहीं हैं? स्थावर, जंगम सभी प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्त भी आप ही हैं। आप ही कालरूप होकर सम्पूर्ण जगत्को अपना ग्रास बनाते हैं। आप ही परात्पर परमेश्वर, सबपर शासन करनेवाले तथा सबपर दया दिखानेवाले शिव हैं। वे भगवान् शंकर किस प्रकार मुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे, जिनका दर्शन पाकर शरणागत भक्त परम कल्याणको प्राप्त होता है। अथवा अपनी बुद्धिके अनुसार मैं उन विश्व-विधाताकी स्तुति करता हूँ।'

देव! महादेव! वामदेव! वृषध्वज! आपकी जय हो! आप कालके भी काल हैं; आपने दक्षके यज्ञका विध्वंस किया है। नीलकण्ठ! चन्द्रशेखर! आपकी जय हो। शम्भो! शिव! ईशान! शर्व! त्र्यम्बक! धूर्जटे! आपकी जय हो। आप कामके शत्रु हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। आप स्थिर होनेसे स्थाणु, उद्भव-हेतु होनेसे भव तथा महान् ईश्वर होनेसे महेश्वर कहलाते हैं। ईश! आपकी जय हो। खण्डपरशो! शूलिन्! पशुपते! हर! सर्वज्ञ! भर्ग! भूतनाथ! कपालिन्! नीललोहित! आपकी जय हो। रुद्र! यज्ञविनाशन! पिनाकपाणे! प्रमथाधिप! गंगाधर! व्योमकेश! गिरीश! परमेश्वर! आपकी जय हो। भीम! मृगव्याध! कृत्तिवासा! कृपानिधे! आपकी जय हो। प्रभो! अग्नि आपका बीज है, आप कैलासपर सदा ही निवास करते हैं, आपकीही आज्ञासे वायु चलती है और शेषनाग पृथ्वीका भार ढोते हैं। शर्व! आपकीके शासनसे सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं, समूचा ब्रह्माण्ड समुद्रमें तैरता रहता है और ग्रह-नक्षत्र आकाशमें विचरण करते हैं। आपके ही आदेशसे मैं और ब्रह्मा पालन तथा सृष्टिके कार्यमें समर्थ होते हैं और कल्पके अन्तमें मैं निद्रा त्यागकर पृथ्वीका पालन करता हूँ। आपका आदि और अन्त नहीं मिला; यह आपकी महिमा ही है। अणिमा, महिमा आदि महासिद्धियोंके कारण आपका वैभव असाधारण है। आप अन्य सब देवताओंसे श्रेष्ठ हैं। शंकर! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? सम्पत्तिमें तो हम आपको भूल जाते हैं और विपत्तिमें स्मरण करते हैं। भक्तोंपर आपको कभी क्रोध नहीं आता; सदा ही उनपर कृपा और प्रसन्नता बनी रहती है। जब आप अपनी भक्ति प्रदान करते हैं, तब बोध प्राप्त होता है और उससे मोक्ष मिलता है।'

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शिव-पार्वतीके दाम्पत्य-जीवनकी एक झाँकी, पार्वतीकी अरुणाचल क्षेत्रमें तपस्या और दुर्गादेवीके द्वारा शुम्भ, निशुम्भ और महिषासुरका वध

मार्कण्डेयजीने पूछा— भगवन्! महादेवी गौरीने अरुणाचल-तीर्थमें किस प्रकार तपस्या की है, यह बताइये।
नन्दिकेश्वरने कहा— महामते मार्कण्डेय! मुझे

  • माहात्म्य-अरुणाचल-माहेश्वरखण्ड * २४९

जैसा मालूम है, वैसा बता रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। यह तो तुम जानते ही हो कि पूर्वकालमें भगवान् शिवने दक्ष-कन्या सतीके साथ विवाह किया था और सती उन्हें बहुत प्यारी थीं। फिर जब उनके पिता दक्षप्रजापतिने उन्हींके पति भगवान् शंकरसे द्रोह किया, तब उन्होंने किस प्रकार क्रोधमें आकर योग-शक्तिसे अपने शरीरका त्याग कर दिया; यह बात भी तुमने सुनी ही होगी। उस समय भगवान् शिवकी आज्ञासे वीरभद्रने जो दक्ष-यज्ञका विध्वंस किया था, वह महान् इतिहास भी तुम्हें ज्ञात ही होगा। तदनन्तर देवी सतीने पुनः गिरिराज हिमवान्‌के घरमें जन्म लिया, उस समय उनका नाम उमा और पार्वती पड़ा। कुछ समय बाद देवी पार्वती स्थाणुवनमें भगवान् शिवकी एकान्त सेवा करने लगीं, परंतु महादेवजीने उनकी ओर रुचि नहीं की और कामदेवको कालाग्निसे भस्म कर दिया। तब अपने प्रियगणोंके साथ कहीं एकान्तवास करनेवाले जितेन्द्रिय महादेवजीको गौरीदेवीने वनवासिनी हो तपस्याके द्वारा सन्तुष्ट किया। तत्पश्चात् उनके साथ विवाह करके महादेवजीने उमाके साथ एकान्तमें प्रसन्नतापूर्वक रमण किया।

उन्हीं दिनों शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्योंने ब्रह्माजीसे यह वरदान प्राप्त किया कि देवता, दानव और मनुष्योंमें किसी भी पुरुषसे मेरी मृत्यु न हो। उसके इस वचनको सुनकर सब देवता थर्रा उठे, तब विष्णु आदिने महादेवजीसे प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर महादेवजी बोले—'भय न करो, समयानुसार ऐसा प्रयत्न किया जायगा, जिससे वे दोनों दानव मारे जायँ।' यों कहकर भगवान् शिवने देवताओंको विदा कर दिया और स्वयं पार्वतीदेवीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। पार्वतीजीका रंग साँवला था। उन्होंने शंकरजीकी प्रसन्नताके लिये अपनी उस काली चमड़ीको उतार फेंका। जहाँ वह चमड़ी फेंकी गयी, वहाँ 'महाकाली-प्रपात' नामक उत्तम क्षेत्र बन गया और काली कौशिकी-नामसे प्रसिद्ध हो, विन्ध्याचल पर्वतपर रहकर तपस्या करने लगीं। वहीं उन्होंने अपने प्रति आसक्त होनेवाले शुम्भ-निशुम्भ नामक दोनों महादैत्योंको मार डाला। फिर वहीं परम मनोहर गौरीशिखरपर तपस्यासे गौर वर्ण प्राप्त करके देवीने अपने (आदिस्वरूपमें स्थित होकर) पतिको सन्तुष्ट किया। पुनः क्रमशः गर्भवती होकर पार्वतीने गणेश तथा छः मुखोंवाले सेनानी—इन दो पुत्रोंको जन्म दिया। बालकोंको बढ़ते हुए देखकर माता-पिता हर्षके समुद्रमें मग्न हुए-से रहते थे और पुत्रोंके प्रति उनका प्रेम अत्यन्त पुष्ट हो रहा था। भगवान् शिव और पार्वती कभी वीणा बजाते और कभी दिव्य शास्त्रोंकी चर्चा करते। कभी मैनाक, कभी मेना और कभी हिमवान् इन दोनों दम्पतिकी पूजा किया करते थे। इस प्रकार चराचर जगत्के माता-पिता शिव-पार्वतीने मेरु आदि पर्वतोंपर निवास करके दीर्घकालतक एक-दूसरेके साथ अत्यन्त सुखका अनुभव किया।

एक समयकी बात है, गिरिराजकुमारी पार्वतीने अरुणाचल पर्वतके समीप जाकर किसी आश्रमको देखा। वहाँ कौवे और उल्लू, शुक और श्येन (बाज), मृग और व्याघ्र, हाथी और सिंह, मोर तथा सर्प और चूहे तथा बिल्लियोंने परस्पर मित्रता स्थापित कर ली थी* तथा वृक्षोंके बीचसे निकलती हुई अत्यन्त पवित्र धूमराशि जहाँ होम किये हुए पुरोडाशकी सुगन्ध फैला रही थी। उस आश्रमपर एक ऋषिश्रेष्ठ दिखायी दिये, जो हाथके अग्रभागसे


* काकोलूकैः शुकश्येनैर्मृगव्याघ्रैर्हरिद्विपैः। कलापिसर्पैरत्राखुमार्जारैः सौहृदं श्रितम् ॥
(स्क० पु०, मा० अ० ख० उ० वें० प्र० १८। २९)

२५०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रुद्राक्षकी माला जप रहे थे। वहाँ पहुँचकर पार्वतीनो

तपोधनसे पूछा—‘तुम कौन हो? तथा यह श्रेष्ठ पर्वत कौन है? जहाँ तुम तपस्या करते हो?’ वे बोले—‘देवि! यह अरुणाचल पर्वत है, जो समस्त पुण्य-क्षेत्रोंमें सम्मानित है। मैं गौतम नामक मुनि हूँ और तपस्याद्वारा भगवान् शिवकी आराधना करता हूँ।’ यों कहकर तथा विजया आदि सखियोंके मुँहसे पार्वतीजीका परिचय पाकर उन्होंने बड़ी भक्तिसे देवीको प्रणाम किया और अपनी पर्णशालामें ले जाकर कन्द-मूल और फल आदिके द्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार किया। मुनिने सम्पूर्ण जगत्के मंगलकी मूलभूता तपस्याके लिये अनुमति दी और ज्योतिस्तम्भके प्रादुर्भावसे लेकर अरुणाचलकी समस्त महिमाका यथाशक्ति वर्णन किया। साथ ही यह भी बताया कि मैं यहीं भगवान् त्रिलोचनकी स्थापना करके पवित्र चित्तसे तपस्याके द्वारा यथाशक्ति उनकी आराधना करता हूँ। देवि! मेरे आश्रमके समीप यह बड़ा भारी पुण्यक्षेत्र है, यहाँ आश्रम बनाइये और चिरकालतक तपस्या कीजिये।

मुनिके इस प्रकार आदेश देनेपर पार्वतीनो आश्रम बनाना स्वीकार किया और बड़ी भारी तपस्या करनेके लिये उद्योग किया। अन्यान्य जीवोंसे आश्रमकी रक्षा करनेके लिये वनवासिनी उमाने सुभगा और धुन्धुमारीको पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापित किया। फिर सम्पूर्ण तपोवनकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने उन दुर्गाजीको आदेश दिया जिनका प्रयत्न कभी प्रतिहत नहीं होता तथा जो पार्वतीजीकी आज्ञा निभानेमें समर्थ हैं। तत्पश्चात् उमाने मन्दारके फूल गूँथनेयोग्य अपनी वेणीको खोलकर उसे तपस्याके लिये जटाभारके रूपमें परिणत कर दिया। हंसछाप किनारेकी हलकी साड़ीको उतारकर कठोर वल्कल पहन लिया। उन्होंने कुश और बिल्वपत्र तोड़े तथा सबेरे पवित्र नदीमें स्नान करके रक्त चन्दनमिश्रित जल और फूलसे सूर्यनारायणको विधिपूर्वक अर्घ्य दिया। उसके बाद प्रदक्षिणा करके सहस्रों बार प्रणाम किया। फिर स्वयं ही शास्त्रोक्त विधिसे शिवलिंगकी स्थापना करके उसकी विधिपूर्वक पूजा की। पाद्य और अर्घ्य निवेदन करके भगवान्‌का अभिषेक किया। चन्दन और पुष्प चढ़ाये तथा धूप और दीप अर्पण किये। तत्पश्चात् पंचोपचारोंसे पुनः भगवान् शिवके हृदयादि छः अंगोंका पूजन किया। इस प्रकार एक दिनका पूजन पूर्ण करके प्रतिदिन वे इसी प्रकार प्रदक्षिणा और प्रणाम आदिके सहित शिवजीकी पूजा करने लगीं। शिवशास्त्रोंमें बतायी हुई विधिके अनुसार सौभाग्यदायक द्रव्योंसे पूजाके अन्तमें प्रज्वलित अग्निके भीतर वे आहुति देती थीं। कन्द, मूल, फल आदि समस्त उपचारोंका संग्रह करके वे उनके द्वारा अतिथियोंका सत्कार करती थीं। ग्रीष्म ऋतुमें पाँच प्रदीप्त अग्नियोंके मध्य अँगुठेके बलपर खड़ी रहती थीं। सर्दीमें सरोवरके भीतर खड़ी हो, चन्द्रमाकी सुधामयी किरणोंसे पुष्ट होती थीं। वर्षाकी रात्रियोंमें अन्धकारके भीतर स्थिरभावसे खड़ी हुई पार्वती ऐसी दिखायी देती थीं मानो वर्षाकी धाराओं और बादलोंके साथ बिजली ही प्रकाशित हो रही हो। अपने

* माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य *२५१

मनोरथकी सिद्धिके लिये वे सखियोंके साथ अरुणाचलकी प्रदक्षिणा करती थीं। पंचाक्षरका जप, शिवजीके स्तोत्रोंका पाठ तथा मनके द्वारा अरुणाचल पर्वतरूपी महादेवजीका ध्यान तथा साष्टांग प्रणाम करना उनका नित्यका नियम था। इस प्रकार उन्होंने दीर्घकालतक तपस्या की।

इसी बीचमें देवताओंकी अवहेलना तथा इन्द्रके वैभवका विध्वंस करनेवाले महिषासुरने कहींसे यह सुनकर कि अरुणाचलमें पार्वती रहती हैं, उन्हें देखनेके लिये किसी दूतीको भेजा। वह वरदानके प्रभावसे सम्पूर्ण शस्त्रोंद्वारा अवध्य हो गया था। वह पापी धर्ममार्गका नाशक तथा मुनिपत्नियोंको भी कलंकित करनेवाला था। बल, पुलोमा, नमुचि तथा वृत्रासुरसे भी उसमें अधिक बल था। उसकी भेजी हुई दूती तपस्विनीका रूप धारण करके पार्वतीके पास आयी और सखियोंके सामने ही अनुनय-विनयके साथ इस प्रकार बोली—‘सुन्दरी! तुम इस भयंकर स्थानमें क्यों निवास करती हो? तुम्हें यहाँ देखकर मुझे खेद होता है। तुम तो मनोहर अन्तःपुरके महलोंमें विहार करनेयोग्य हो। तुमने अपने चित्तको भोगोंकी ओरसे हटाकर किसलिये ऐसी तपस्यामें लगा रखा है, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर है? भाग्यवश तपस्वी शिवकी पूजा तो तुमने पहले ही कर ली है, तुम्हारे योग्य देवताओंमें दूसरा कोई नहीं है। किंतु इस त्रिभुवनके स्वामी दानवराज महिष अवश्य तुम्हारे योग्य हैं। सुभ्रु! यदि तुम उन्हें देख लोगी तो क्षणभरमें इस तपस्याका त्याग कर दोगी। वे सबके स्वामी महाराज महिषासुर तुम्हें यहाँ आयी हुई सुनकर कामवेदनासे व्याकुल हो उठे हैं, उन्होंने तुम्हें बुला लानेके लिये मुझ दूतीको यहाँ भेजा है।’

इस प्रकार वह दूती जब अत्यन्त विरुद्ध और अनाप-शनाप वाक्य बोलने लगी, तब देवी पार्वतीकी मानसिक अवस्थाको जानकर उनकी सखी विजयाने उसे आश्रमके बाहर निकाल दिया। तब उसने अपना दैत्यरूप प्रकट करके अत्यन्त रोषके साथ पार्वतीको ले जानेकी प्रतिज्ञा की और घर जाकर महिषासुरको सब समाचारोंसे अवगत कराया। वह भी वहाँकी सब बातें सुनकर क्रोधसे जल उठा और अत्यन्त लाल आँखें करके करोड़ों दैत्योंके साथ पार्वती देवीको पकड़ ले जानेके लिये आया। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल—इस चतुरंगिणी सेनाके द्वारा उसने पृथ्वीको और रथके ध्वजोंसे आकाशको आच्छादित कर दिया। दैत्योंके पदाघातसे पृथ्वी फटने लगी। कराल, दुर्धर, विचक्षु, विकराल, वाष्कल, दुर्मुख, चण्ड, प्रचण्ड, अमरासुर, महाहनु, महामौलि, उग्रास्य, विकटेक्षण, ज्वालास्य और दहन—ये सेनापति भी युद्धके लिये प्रस्थित हुए। यह कोलाहल सुनकर पार्वती देवीने अपनी तपस्यामें विघ्न पड़नेकी आशंकासे दुर्गादेवीको दैत्योंके संहारके लिये आदेश दिया। दुर्गादेवी अरुणाचलकी एकान्त गुफामें सिंहपर आरूढ़ हुईं और अपने हाथोंमें प्रदीप्त अस्त्र धारण करके कालिकाकी भाँति पृथ्वीपर आयीं। उन्होंने मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान बड़ा भयंकर सिंहनाद किया। पार्वतीका प्रिय तथा दैत्योंका संहार करनेके लिये

२५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दुर्गादेवीके अंगोंसे योगिनियोंकी मण्डली तथा सहस्रों रोषमें भरी हुई मातृकाएँ प्रकट हुईं। उन सबकी कान्ति कमलके समान थी, उन्होंने व्याघ्रपर सवार हो रणके लिये प्रस्थान किया। उनके साथ घर्घर शब्द करनेवाले बहुत-से गण तथा अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाली करोड़ों मातृकाएँ भी चलीं। चन्द्रमाके समान गौर वर्णवाली उन मातृकाओंने आश्रमके बाहर पहुँचकर हठपूर्वक चौसठ करोड़ दैत्योंको घेर लिया। तदनन्तर योगिनीमण्डल तथा दानवसेनामें परस्पर घोर युद्ध होने लगा, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर था। योगिनियोंके छोड़े हुए बाणोंसे दैत्योंके मस्तक कट-कटकर पृथ्वीको इस प्रकार आच्छादित करने लगे, मानो वे स्थलसे ही उत्पन्न हुए हैं। थोड़ी ही देरमें रक्तकी नदियाँ बह चलीं। कुछ दैत्य डंडोंसे, कुछ शूलोंसे, कुछ शक्तियोंसे, कुछ वज्रोंसे और कुछ योगिनियोंकी तलवारोंसे मौतके घाट उतारे गये। इस प्रकार मारे हुए दानवेश्वर बिना सेनापतिके सैनिकोंकी भाँति सर्वथा नष्ट हो गये। चामुण्डाने चक्रके अग्रभागसे चण्ड-मुण्डके मस्तक काट डाले, इन्हीं दोनों दैत्योंका संहार करनेसे इनका यह (चामुण्डा) नाम प्रसिद्ध हुआ। तब महिषासुरने क्रोधमें भरकर युद्ध करनेके लिये देवीपर आक्रमण किया। उस समय प्रचण्ड, चामर, महामौलि, महाहनु, उग्रास्य, विकटाक्ष, ज्वालास्य तथा दहन भी उसके पीछे-पीछे चले। ठीक वैसे ही, जैसे कालनेमि आदि असुर विप्रचित्तिके पीछे चलते हैं। वे सभी शिरस्त्राण (टोप) धारण किये, रथपर बैठे, तरकस बाँधे और धनुष लिये युद्ध-भूमिमें पहुँचे। दैत्य बाणोंकी वर्षा करते हुए मातृमण्डलकी ओर दौड़े। उस समय वे मातृकाएँ देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगीं—
'देवि! आप ही ब्रह्माकी सृष्टिशक्ति, विष्णुकी पालनशक्ति तथा रुद्रकी संहारशक्ति कही जाती हैं। आप ही यशोदा और नन्दसे उत्पन्न हुई देवी हैं, जो एका और अनंशाके नामसे प्रसिद्ध हैं। आप ही कंस आदि असुरोंका संहार करनेके कार्यमें भगवान् विष्णुकी सहायता करेंगी। देवि! दुर्गे! आप ही महामाया, लक्ष्मी, सरस्वती तथा पार्वती हैं।'

इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर दुर्गादेवीने मातृकाओंको अभयदान दिया और स्वयं महिषासुरसे युद्ध करनेके लिये निकलीं। उन्होंने हलके अग्रभागसे प्रचण्डको, भिन्दिपालसे चामरको, छुरीसे महामौलिको, कृपाणसे महाहनुको, कुठारसे उग्रवक्त्रको, शक्तिसे विकटाक्षको, मुद्गरसे ज्वालामुखको और मुसलसे दहनको मार गिराया। फिर महिषासुरके सामने स्वयं ही रोषपूर्वक युद्ध करती हुई देवीने बड़ा भयंकर सिंहनाद किया। उस समय वे मन-ही-मन प्रसन्न थीं। देवीका सिंहनाद सुनकर महिषासुरको बड़ा क्रोध हुआ। उसने बाणोंसे दुर्गाजीके तालू और नेत्रोंपर प्रहार किया। तब दुर्गाने भी कुपित होकर उस असुरेश्वरकी दोनों बाहों, छाती और मुखमें जलती हुई धारवाले बाणोंसे प्रहार किया। यह देख दैत्यने तीन बाणोंसे दुर्गाके मुखको बींध डाला, पाँच-पाँच बाणोंसे उनकी दोनों भुजाओंमें और दो-दो बाणोंसे दोनों नेत्रोंमें आघात किया। फिर दुर्गाने भी एक बाणसे दैत्यके सारथिको और आठ बाणोंसे घोड़ोंको मार डाला। तीन बाणोंसे उसके धनुषको और चार सायकोंसे रथकी ध्वजाको भी काट गिराया। तब दैत्यराज महिषने पैदल होकर दुर्गाजीके ऊपर सब ओरसे प्रज्वलित एक शतघ्नी चलायी, जो कालदण्डके समान भयंकर थी। देवता हाहाकार कर उठे, मातृकाएँ भाग खड़ी हुईं; परंतु दुर्गाने अपनी ओर आती हुई उस शतघ्नीको लीलापूर्वक पकड़ लिया। तब प्रलयकालीन मेघके समान महिषासुरने एकके बाद एक करके धनुष, पाश, भुशुण्डी, तलवार, कील, शक्ति, गदा, चक्र, तोमर, फलक, अंकुश, फरसा, भिन्दिपाल, पट्टिश और दण्ड आदि अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा की, परंतु शत्रुके चलाये

  • माहेस्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २५३

हुए उन सभी आयुधोंको अपने पास आते ही दुर्गादेवी हाथसे पकड़ लेतीं और जैसे हथिनी कमलकी नालको अनायास ही तोड़ डालती है, उसी प्रकार वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डालती थीं। महिषासुर क्षणमें सिंह, क्षणमें वाराह, क्षणमें व्याघ्र, क्षणमें हाथी तथा क्षणमें भैंसा होकर दुर्गाजीसे युद्ध कर रहा था। उसने अत्यन्त रोषमें भरकर अपने तीखे सींगोंसे दुर्गादेवी और उनके सिंहको भी बार-बार घायल किया। वह क्षणमें आकाशमें चला जाता, क्षणमें पृथ्वीपर उतर आता, क्षणमें चारों दिशाओंमें घूम आता और क्षणमें गर्जना करने लगता था।

इसी समय दानवराज महिष अपने असली रूपमें देवीके सामने आया। तब दुर्गाने तलवारसे ही उसके मस्तकको काट डाला और उस कटे हुए मस्तकको हाथमें लेकर वे रणभूमिमें नृत्य करने लगीं। इस प्रकार दुर्गादेवीके द्वारा समस्त भुवनोंके कण्टकरूप महिषासुरके मारे जानेपर देवता हर्षसे नाचने लगे, महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हो गये और मेघोंने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की।


## खड्गतीर्थकी उत्पत्ति, ज्योतिदर्शन, पार्वतीपर अरुणाचलेश्वरकी कृपा तथा भगवान् शिवका वरदान

**मार्कण्डेयजी बोले—** प्रभो ! इस प्रकार भद्रकालीद्वारा महिषासुरके मारे जानेपर तपस्यामें लगी हुई गिरिराजनन्दिनी पार्वतीनै क्या किया ?

**नन्दिकेश्वरने कहा—** मुने ! तदनन्तर दुर्गादेवीने एक हाथमें दैत्यका मस्तक लिये दूसरे खड्गयुक्त हाथसे गौरीदेवीको प्रणाम किया। हर्षसे नृत्य करती हुई दुर्गाको दयार्द्रदृष्टिसे देखकर पार्वतींने अपने दाँतोंकी किरणोंसे आकाशमें प्रकाश बिखेरते हुए उनसे इस प्रकार कहा— **'विन्ध्यवासिनि !** तुमने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम किया है। तुम्हारे प्रभावसे मेरी तपस्याका विघ्न दूर हो गया। देवि ! तुम्हारा चरित्र सम्पूर्ण जगत्में पवित्र है। तुमने अपने हाथमें जो यह महिषासुरका अपवित्र एवं भयंकर मस्तक ले रखा है, उसे त्याग दो और एक नूतन पापनाशक तीर्थ उत्पन्न करो, जिसमें स्नान करनेसे पापका प्रायश्चित्त होगा।' गौरीदेवीके यों कहनेपर पापकी आशंकावाली सामर्थ्यशालिनी दुर्गाने अपनी तलवारसे एक शिलाखण्डको विदीर्ण किया। वह पत्थर पातालतक छिद्रयुक्त हो गया। फिर वहाँसे अत्यन्त निर्मल, परम पवित्र, तरंगयुक्त जल ऊपरकी ओर उठा। उस पावन एवं गम्भीर जलमें दुर्गादेवीने **'नमः शोणाद्रिनांथाय'** इस उत्तम मन्त्रका उच्चारण करके गोता लगाया। इतनेहीमें महिषासुरके कण्ठमें स्थित शिवलिंग उसमेंसे खिसककर जलके किनारे स्वयं प्रतिष्ठित हो गया और **'पापनाशन'** नामसे प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात् तीर्थके जलसे समस्त पाप धुल जानेपर दुर्गादेवी बाहर निकलीं। फिर उनके हाथसे महिषासुरका मस्तक नीचे गिर पड़ा।

तदनन्तर कार्तिककी पूर्णिमाको रात्रिमें अरुणाचलके शिखरपर कोई अपूर्व ज्योति दिखायी दी।

२५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ईंधन, तेल और रूईकी बत्तीके बिना ही जलते हुए उस महाप्रदीपको देखकर पार्वतीको बड़ा विस्मय हुआ। वे प्रदक्षिणा करके पग-पगपर अरुणाचलनाथको प्रणाम करती हुई इस प्रकार स्तुति करने लगीं—'मेरुगिरिपर निवास करनेवाले आप कैलासवासी भगवान् शिवको नमस्कार है। हिमाचलके जामाता, अरुणाचलरूपधारी आपको प्रणाम है। वरुण आदि देवताओंके पूजनीय, मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजस्वी, करुणामूर्ति अरुणाचलनाथको नमस्कार है। भगवन्! आपका मस्तक जाह्नवी गंगा तथा चन्द्रमाकी कलासे सुशोभित है; आप भगवान् शिवकी जय हो। मायासे नारायणस्वरूप धारण करके भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करनेमें परम प्रवीण महादेव! अपने आनन्दसे ताण्डव नृत्य करनेवाले शम्भो! शिव! ईशान! देवता, गन्धर्व, सिद्ध और विद्याधरोंसे पूजित होनेवाले प्रभो! गणेशके जन्मदाता आपकी जय हो। छः मुखोंवाले कार्तिकेयपर अत्यन्त स्नेह रखनेवाले शिव! आपकी जय हो। हिमवान्कुमारी पार्वतीके प्रार्थनीय पतिदेव! प्रभो! राजाओंको भी आपका दर्शन दुर्लभ है; आपकी जय हो।'

इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक स्तुति करके उस ज्योतिमें नेत्र लगाये रखनेवाली देवी पार्वतीको देखकर उनपर दया करनेके व्याजसे भगवान् वृषभध्वज अन्तर्धान हो गये और पुनः अपने अत्यन्त सुन्दर रूपको प्रकट करके दिव्य वृषभपर आरूढ़ हो कल्याणमयी पार्वतीको सान्त्वना देनेके लिये उद्यत हुए। महादेवजीको अपने समीप आया देख उमादेवी आनन्दमें निमग्न हो गयीं। उन्होंने चिरकालसे प्राप्त प्रियतमके वियोगजनित दुःखको भुला दिया। उनके शरीरमें रोमांच हो आया, मुखपर पसीना छा गया। उन्होंने काँपते-काँपते पतिदेवके चरणोंकी अंगुलियोंपर दृष्टिपात किया। तब भगवान् शिव वृषभसे उतरकर उनका हाथ अपने हाथमें ले मुसकराते हुए मुखारविन्दसे प्रेमपूर्वक बोले—'देवि! क्यों अकारण अपने चित्तको व्याकुल कर रही हो? क्या तुम नहीं जानती—चन्द्रमा और चाँदनीकी भाँति हम दोनों सदा एक-दूसरेसे अभिन्न हैं? मैं नारायण हूँ, तुम लक्ष्मी हो; मैं ब्रह्मा हूँ, तुम सरस्वती हो; मैं शेषनाग हूँ, तुम वारुणी हो; मैं चन्द्रमा हूँ और तुम रोहिणी हो; तुम स्वाहा, मैं अग्नि; तुम सुवर्चला, मैं सूर्य; तुम शची, मैं इन्द्र; तुम रति, मैं काम; तुम बुद्धि, मैं राजराज; तुम शिवा, मैं समीर; तुम लहर, मैं समुद्र तथा तुम प्रकृति और मैं पुरुष हूँ। तुम विद्या हो और मैं तुम्हारे द्वारा जाननेयोग्य तत्त्व हूँ। तुम वाणी हो, मैं अर्थ हूँ। पार्वती! मैं ईश्वर हूँ और तुम्हीं मेरी शक्ति हो। सृष्टि, पालन और संहारके कार्यमें सदा अनुग्रह रखनेवाली ईश्वरी! तुम्हें अन्य साधारण जनोंकी भाँति मुझमें और अपनेमें भेद-भाव नहीं करना चाहिये। देवि! हम दोनों चेतना और प्रकाशरूप हैं। हमने स्वेच्छासे पृथक् शरीर धारण किये हैं।'

ऐसा कहकर महादेवजीने स्वयं बैठकर पार्वतीको भी अपने वामपार्श्वमें बिठा लिया। वे लज्जासे भगवान् शिवके वामांगमें मानो छिपी जा रही थीं। प्रेमसे परस्पर लीन हुए शिव और पार्वतीके दो शरीर एकताको प्राप्त हो गये; मानो अत्यन्त सन्निकट पहुँचे हुए दो अर्थ स्पष्ट प्रतीत हो रहे हों। शिव और शिवाका एकताको प्राप्त हुआ वह शरीर विचित्र शोभा धारण कर रहा था। आधा अंग कपूरके समान श्वेत था, तो आधा अंग ईंगुरके समान लाल। आधे सिरमें घुँघराले बाल, आधी छातीमें हार और चोली, एक पैरमें नूपुर, एक कानमें झूमक और एक हाथमें कंकणसे वह रूप बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता था। इस प्रकार अपना वामार्द्ध भाग पार्वतीदेवीको समर्पित करके महादेवजीने उनसे कहा—'देवि! अब तुम्हें ऐसे रोषका अवसर न मिले, जिससे कि तुम दूध पीनेकी इच्छा रखनेवाले कार्तिकेयको छोड़कर तपस्याके लिये चल दी थीं; इसलिये अब मेरे समीप इस तीर्थमें तुम 'अपीतस्तनी'

* माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य *२५५
नामसे निवास करो। देवि! अपीतस्तनी नामसे तुम्हारा और अरुणाचलेश्वर नामसे मेरा आराधन करके सब लोग भोग और मोक्षका सुख प्राप्त करें। तुम्हारे अंशसे उत्पन्न हुई यह महिषासुरमर्दिनी दुर्गा यहाँ साधन करनेवाले मनुष्योंको मन्त्रसिद्धि प्रदान करेंगी। यह पवित्र खड्गतीर्थ एक ही बार गोता लगानेसे मनुष्योंके सब रोगोंको हर लेनेवाला और सब पापोंका नाश करनेवाला हो। ये पापनाशक भगवान् अरुणाचलनाथ अपनेमें भक्ति और श्रद्धा रखनेवाले मनुष्योंको सदा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हों। देवि! ये गौतम मुनि तुम्हारे कृपापात्र हैं; अतः जबतक चन्द्रमा और ताराओंकी स्थिति रहे, तबतक ये सब लोकोंमें अपनीतपस्याके अनुरूप फल प्राप्त करें। ये सात लोकोंकी एकमात्र जननी सातों मातृकाएँ संसारको वैभव प्रदान करनेके लिये आजसे इस तीर्थमें निवास करें। शासक भैरव, क्षेत्रपाल और बटुक भी इस अरुणाचलक्षेत्रमें ही नित्य निवास करें। मैं भी तुम करुणामयी अरुणादेवीके साथ अरुण नाम धारण करके इस अरुणाचलक्षेत्रमें निवास करूँगा। अतः इस अरुणक्षेत्रमें सब प्रकारकी सिद्धियाँ सुलभ होंगी।' जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीद्वारा अरुणाचलेश्वरको प्रसन्न करनेके इस पावन प्रसंगको सुनता है, वह काम-क्रोध आदि शत्रुओंका नाश करके अनायास सुलभ स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त कर लेता है।

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कान्तिशाली तथा कलाधरका उद्धार, राजा वज्रांगदद्वारा अरुणाचलेश्वरकी आराधना तथा भगवान् शिवकी उनके ऊपर कृपा

मार्कण्डेयजीने पूछा— भगवन्! पाण्ड्यदेशके राजा वज्रांगदने किस प्रकार भगवान् अरुणाचलका व्यतिक्रम किया और फिर उन्हींकी भक्तिसे वे किस प्रकार वैभवको प्राप्त हुए? कान्तिशाली और कलाधर—ये दोनों विद्याधरराज भगवान् अरुणाचलेश्वरकी कृपासे किस प्रकार दुर्वासाके शाप-बन्धनसे मुक्त हुए? <br><br> नन्दिकेश्वर बोले— मुने! पाण्ड्यदेशमें वज्रांगद नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े धर्मात्मा, न्यायवेत्ता, शिवपूजापरायण, जितेन्द्रिय, गम्भीर, उदार, क्षमाशील, शान्त, बुद्धिमान्, एकपत्नीव्रती और पुण्यात्मा थे। राजा वज्रांगद शीलवानोंमें सबसे श्रेष्ठ थे और शत्रुओंको जीतकर समूची पृथ्वीका शासन करते थे। एक दिन घोड़ेपर सवार हो वे शिकार खेलनेके लिये निकले और अरुणाचलतकके दुर्गम वनमें गये। उन्होंने वहाँ किसी कस्तूरी-मृगको देखा। उसके शरीरसे सब ओर बहुत सुगन्ध फैल रही थी।उसे देखते ही राजाने कौतूहलवश उसके पीछे घोड़ा दौड़ाया। मृग वायु और मनके समान वेगसे भागा और अरुणाचल पर्वतके चारों ओर चक्कर लगाने लगा। तब अधिक परिश्रम होनेके कारण राजा कान्तिहीन होकर घोड़ेसे गिर पड़े। उस समय मध्याह्नकालीन सूर्यके प्रखर तापसे उन्हें अत्यन्त पीड़ा हुई। वे ग्रहसे गृहीत हुएकी भाँति क्षणभरके लिये अपने-आपकी भी सुध-बुध खो बैठे थे। तत्पश्चात् उन्होंने सोचा—'मेरी शक्ति और धैर्यका यह अकारण ह्रास कहाँसे हो गया? वह हृष्ट-पुष्ट मृग मुझे इस पर्वतपर छोड़कर कहाँ चला गया?' राजा जब इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल और अज्ञानसे दुःखी हो रहे थे, इसी समय आकाश सहसा विद्युत्पुंजसे व्याप्त-सा दिखायी दिया। उनके देखते-देखते घोड़े और मृगने तिर्यग् (पशु) योनिका शरीर त्यागकर क्षणभरमें आकाशचारी विद्याधरका रूप धारण कर लिया। उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें

२५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


कुण्डल, कण्ठमें हार और बाहोंमें भुजबन्ध शोभा पा रहे थे। दोनों रेशमी धोती और दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ धारण करके शोभा पा रहे थे।

यह सब देखकर राजाका चित्त आश्चर्यचकित हो रहा था; तब वे दोनों विद्याधर बोले—'राजन्! विषाद करनेकी आवश्यकता नहीं। आपको मालूम होना चाहिये, हम दोनों भगवान् अरुणाचलेश्वरके प्रभावसे इस उत्तम दशाको प्राप्त हुए हैं।' उनकी इस बातसे राजाको कुछ आश्वासन-सा मिला। तब वे हाथ जोड़कर उन दोनोंसे विनयपूर्वक बोले—'आप दोनों कौन हैं? मेरा यह पराभव किस कारणसे हुआ है? आप दोनों कल्याणकारी पुरुष हैं, अतः मुझे मेरी पूछी हुई बातें बताइये? क्योंकि संकटमें पड़े हुए पुरुषोंकी रक्षा करना महापुरुषोंका महान् गुण है।'

राजाके ऐसा प्रश्न करनेपर कलाधरने कान्तिशालीकी आज्ञासे इस प्रकार कहा—'राजन्! हम दोनों पहले विद्याधरोंके राजा थे। हममें बसन्त और कामदेवकी भाँति परस्पर बड़ी मित्रता थी। एक दिन मेरुगिरिके पार्श्वभागमें दुर्वासाके तपोवनमें, जहाँ मनसे भी पहुँचना अत्यन्त कठिन है, हम दोनों जा पहुँचे। वहाँ मुनिकी परम पवित्र पुष्पवाटिका थी, जो एक कोसतक फैली हुई थी। वह वाटिका शिवाराधनके काममें आती थी। हमने देखा—खिले हुए फूलोंसे वह बड़ी मनोहर जान पड़ती थी। हम लोग तत्त्व-चिन्तनमें तत्पर हो फूल तोड़नेकी उत्कण्ठासे उस फुलवाड़ीमें घुस गये। उस रमणीय स्थानके प्रति प्रेम हो जानेसे हमारा मित्र यह कान्तिशाली गर्वसे फूल उठा और बारंबार वहाँकी भूमिपर पैर पटकता हुआ इधर-उधर विचरने लगा। मैं वहाँ पुष्पोंकी अतिशय सुगन्धसे मोहित हो दुर्वासनावश विकसित पुष्पोंपर हाथ रख दिया करता था।

'मेरे इस अपराधके कारण बिल्ववृक्षके नीचे व्याघ्र-चर्मके आसनपर बैठे हुए तपोराशि दुर्वासा मुनि आगकी भाँति जल उठे और अपनी दृष्टिसे मानो हमें जला डालेंगे—इस प्रकार देखते हुए हमारे समीप आ गये। आकर हमें फटकारते हुए बोले—'ओ पापियो! तुमलोगोंने सज्जनोचित सदाचारका उल्लंघन किया है और अत्यन्त अहंकारमें भरकर मेरे इस पवित्र तपोवनमें विचर रहे हो। मेरा यह उद्यान सब प्राणियोंका पोषण करनेवाला है। इसे अपने चरणोंके प्रहारसे दूषित करनेवाला यह पापी संसारमें घोड़ा हो जाय तथा दूसरेकी सवारी ढोनेके कारण कष्ट उठाता रहे तथा दूसरा जो यह अत्यन्त उग्र स्वभाववाला है, फूलोंकी सुगन्धके प्रति लोभ रखकर आया है इसलिये कस्तूरीमृग होकर पर्वतकी कन्दरामें गिरे।'

'इस प्रकार भयानक रोषसे वज्रके समान दुर्वासा मुनिका शाप प्राप्त होनेपर उसी क्षण हम दोनोंका गर्व गल गया और हम मुनिकी शरणमें गये। उनके चरणारविन्दोंको अपने हाथोंसे पकड़कर हमने प्रार्थना की—'भगवन्! आपका यह शाप अमोघ है, अतः यह बतानेकी कृपा करें कि इसका अन्त कब होगा।' राजन्! तब हम दोनोंको अत्यन्त दीन एवं दुःखी देखकर मुनिके हृदयमें दयाका संचार हो आया। वे करुणाकी वर्षासे शीतलस्वभाव होकर बोले—'अरे! तुम दोनों अब कभी खोटी बुद्धिका आश्रय लेकर ऐसे बर्ताव

  • माहात्म्य-खण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * | २५७ ---|---

न करना। अरुणाचलकी परिक्रमा करनेसे तुम्हारे इस शापका निवारण होगा। अरुणाचल साक्षात् भगवान् शिवके स्वरूप हैं। प्राचीन कालमें इन्द्र, उपेन्द्र और यम आदि दिक्पालोंने सैकड़ों वर्षोंतक इनकी उपासना की थी। उसी समय नन्दनवनके देवता इन्द्रने देवाधिदेव महादेवजीको एक लाल रंगका अद्भुत फल भेंट किया। वह मनको लुभा लेनेवाला था। उसे देखकर गणेश और कार्तिकेय दोनों भाई अपने बालक-स्वभावके कारण कौतूहलवश उसकी ओर आकृष्ट हो गये और अपने पिता भगवान् शंकरसे वह फल माँगने लगे। तब भगवान् शिवने वह फल अपनी मुट्ठीमें छिपा लिया और उसकी अभिलाषा रखनेवाले दोनों कुमारोंसे इस प्रकार कहा, 'पुत्रो! तुम दोनोंमेंसे जो भी लोकालोक पर्वतसे घिरी हुई इस समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करनेमें समर्थ हो उसे ही यह फल दूँगा।' पार्वतीवल्लभ शिवने जब मुसकराते हुए मुखचन्द्रसे ऐसी बात कही, तब कार्तिकेयजीने समस्त पृथ्वीकी परिक्रमा आरम्भ कर दी। परंतु गणेशजी अरुणाचलरूपी पिता महादेवजीकी ही परिक्रमा करके तत्काल उनके सामने खड़े हो गये। उनकी यह चतुराई देखकर भगवान् शिवने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघकर उन्हींको वह फल दे दिया और यह वरदान दिया कि 'आजसे तुम सभी फलोंके अधिपति हो जाओ।' एक दाँतवाले गणेशजीको ऐसा वर देकर भगवान् शंकरने वहाँ आये हुए समस्त देवताओं और असुरोंसे कहा—'यह अरुणाचल मेरा स्थावर विग्रह है। जो इसकी परिक्रमा करता है, वह समस्त ऐश्वर्योंका भागी होता है। जो पुरुष इस पर्वतको अपने दाहिने रखकर इसके चारों ओर चक्कर लगाता है वह चक्रवर्ती राजा होकर अन्तमें सर्वोत्कृष्ट सनातन पदको प्राप्त कर लेता है।' महादेवजीकी इस आज्ञासे सब देवताओंने अरुणाचलकी परिक्रमा करके अपना-अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त किया। अतः तुम दोनों भी जब अरुणाचलकी प्रदक्षिणा कर लोगे, तब उससे तुम्हारे शापका अन्त हो जायगा। पशुयोनिमें रहनेपर भी पाण्ड्यनरेश वज्रांगदके सम्बन्धसे तुम दोनोंके द्वारा अरुणाचलकी परिक्रमा सम्पन्न होगी और वह सफल भी हो जायगी।'

कलाधरने कहा—नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मेरा मित्र कान्तिशाली काम्बोजदेशमें घोड़ा हुआ और आपकी सवारीमें आया। मैं भी कस्तूरी-मृग होकर अपने ही शरीरसे उत्पन्न सुगन्धके मदसे उन्मत्त हो इस अरुणाचलपर विचरने लगा। धर्मात्मन्! आपने मृगयाके बहाने इस समय यहाँ आकर हम दोनोंसे अरुणाचलनाथकी परिक्रमा करवा दी। आपने सवारीपर चढ़कर यह परिक्रमा की है। इस दोषसे आपकी ऐसी शोचनीय दशा हो गयी है। हम दोनोंने पैदल चलनेके पुण्यसे अपने पूर्वपदको प्राप्त किया। महाराज! आपके ही सम्बन्धसे हम इस पशुयोनिके बन्धनसे छूटकर अपने धामको प्राप्त हुए हैं; इसलिये आपका सदा ही कल्याण हो।

यों कहकर कलाधर अपने मित्र कान्तिशालीके साथ जब अपने धामको जाने लगा, तब राजाने हाथ जोड़कर कहा—'आप दोनों तो अरुणाचलरूपी भगवान् शंकरके प्रभावसे शापरूपी समुद्रके पार हो पुनः अपने पदको प्राप्त हो गये, परंतु मेरा चित्त भ्रान्त-सा हो रहा है। मेरे नेत्र अन्धे-से हो गये हैं और ऐसा जान पड़ता है मानो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। अतः ऐसा होनेमें दैवबलका ही उत्कर्ष सूचित होता है।'

कलाधरने कहा—राजन्! मैं तुमसे तुम्हारे हितके लिये भी जो कहता हूँ उसे निश्चिन्त तथा एकाग्रचित्त होकर सुनो। संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भगवान् महेश्वरके स्वरूपभूत अरुणाचलनाथ करुणाके सागर हैं। तुम इन्हींमें अपना मन लगाओ (इनकी महिमा तो तुमने इस समय अपनी आँखों देखी जो कि पशुयोनिमें पड़े हुए हम दोनोंको इन्होंने ऐसे दिव्य पदकी प्राप्ति करा दी)। तुम भी पैदल होकर भगवान् अरुणाचलकी परिक्रमा करो। इन्हें कस्तूरीकी

२५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गन्ध बहुत प्रिय है इसलिये कस्तूरीके चन्दन और कचनारके फूलोंसे तुम इनकी पूजा करो। प्रभो! तुम्हारे पास जितनी सम्पत्ति है वह सब भगवान् अरुणाचलके मन्दिर, गोपुर, चहारदीवारी तथा आँगनका चौक आदि बनवानेके लिये दे डालो। ऐसा करनेसे शीघ्र ही तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त होगी। मनु, मान्धाता, नाभाग तथा भगीरथसे भी उत्कृष्ट पद तुम्हें प्राप्त हो जायगा।

तत्काल अपने धामको प्राप्त करनेवाले उन दोनों विद्याधरोंका यह वचन सुनकर राजा वज्रांगदने सन्देहरहित चित्तसे भगवान् अरुणाचलनाथके प्रति भक्ति बढ़ायी और उसी समयसे विशेष संयम-नियमका पालन आरम्भ किया।

मार्कण्डेयजीने पूछा—भगवन्! पाण्ड्य-नरेश वज्रांगदने किस प्रकार महादेवजीका पूजन किया और देव अरुणाचलनाथने कैसे उनपर अनुग्रह किया?

नन्दिकेश्वर बोले—मुने! राजा वज्रांगदने अपने नगरको लौटनेकी इच्छा त्यागकर उन्हीं भगवान् अरुणाचलनाथके चरणोंके समीप रहना पसंद किया। तदनन्तर रथ, हाथी, घोड़े और पैदलसे भरी हुई उनकी विशाल चतुरंगिणी सेना घोड़ेके मार्गका अनुसरण करती हुई वहाँ आ पहुँची। पुरोहित, मन्त्री, सामन्त, सेनापति तथा सुहृदोंनें धैर्यसिन्धु महाराज वज्रांगदका उस अवस्थामें दर्शन किया। तब वहाँ आयी हुई सेनाको राजाने आदरपूर्वक अरुणाचल क्षेत्रके बाहर ही ठहराया और भक्तियुक्त होकर अपने सम्पूर्ण कोश तथा समृद्धिशाली देशोंको भगवान् अरुणाचलनाथकी पूजाके लिये संकल्प कर दिया। उन्होंने गौतमजीके आश्रमके निकट अपने लिये एक तपोवन बनाया और पुरोहितके कथनानुसार मन्त्रीसहित वे भगवान् शिवकी पूजामें तत्पर हो गये। अपने पदपर उन्होंने राजकुमार रत्नांगदको बैठा दिया और उसके भेजे हुए धनसे भी भगवान् अरुणाचलनाथको ही तृप्त किया। राजाने अरुणाचलके चारों ओर जलसे भरे हुए जलाशय खुदवाये और ब्राह्मणोंको बहुत-से दान दिये। अग्निस्तम्भरूपी अरुणाचलनाथके तेजसे यद्यपि वह देश मरुभूमिकी भाँति निर्जल-सा हो गया था तथापि वहाँ राजा वज्रांगदने सैकड़ों बावलियोंका निर्माण कराया। उस समय लोपामुद्राके साथ आये हुए महर्षि अगस्त्यने अरुणाचलेश्वरकी पूजामें लगे हुए राजाका अभिनन्दन किया। प्रतिदिन नयतीर्थ नामक सरोवरमें स्नान करके वे पापनाशक श्रीप्रवालेश्वरका पूजन करते थे। समस्त दुर्गम पीड़ाओंका निवारण करनेवाली महिषासुरमर्दिनी भगवती दुर्गाकी आराधना भी उनके द्वारा प्रतिदिन होती रहती थी। ब्रह्मा और भगवान् विष्णुकी प्रार्थनासे लिंगरूपमें प्रकट हुए आदिदेव भगवान् शिवकी वे प्रतिक्षण नाना प्रकारकी सेवा-पूजा किया करते थे। प्रतिदिन सबेरे उठते और स्नान करके पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए अरुणाचलनाथकी तीन बार परिक्रमा करते थे। कार्तिककी पूर्णिमा आनेपर राजाने पार्वतीवल्लभ शिवके महादीपोत्सवका आयोजन किया, जो तीनों लोकोंमें पूजित एवं प्रशंसित है। कस्तूरी, कह्लार-पुष्प, कर्पूर और जलसे भरे हुए एक हजार स्वर्णकलशोंसे उन्होंने भगवान् त्रिलोचनका अभिषेक किया। प्रत्येक मासमें राजा ध्वजारोहणपूर्वक तीर्थोत्सव आदिका प्रबन्ध करते तथा रथपर भगवान्‌की सवारी निकालते थे। उस समय रथारोहणका बड़ा भारी उत्सव मनाया जाता था। यह उत्सव तीनों लोकोंमें विशेष सम्मानित है। महामना राजा वज्रांगदने तीन योजनतक फैले हुए अरुणाचलकी प्रदक्षिणा भी की। उस समय वे 'हे अरुणाचलनाथ! हे करुणामृतसागर! हे अरुणाम्बाके प्राणनाथ!' इस प्रकार पुकारते हुए बार-बार भगवान्‌की स्तुति करते थे। भाँति-भाँतिके द्रव्योंसे भगवान्‌के अंगोंमें आलेपन करके पंचामृत आदिके द्वारा उनका अभिषेक करते तथा कपूरका चूर्ण मिलानेसे उज्ज्वल प्रतीत होनेवाले कस्तूरीके चन्दनसे भगवान्‌की पूजा करते थे। एक लिंगस्वरूप अरुणाचलनाथकी पीठसे लेकर सम्पूर्ण अंगोंतक वे कस्तूरी और कह्लार-पुष्पोंसे भलीभाँति अर्चना करते थे। इस प्रकार तीन वर्षोंतक निरन्तर

  • माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २५९

सेवा करनेसे सन्तुष्ट होकर अरुणाचलनाथने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे हिमालयके समान श्वेत वृषभराजकी पीठपर चढ़कर अपने पीछे बैठी हुई पार्वतीदेवीसे सटे हुए थे। वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षि, नारद आदि महर्षि तथा निकुम्भ, कुम्भ आदि गण उनकी जय-जयकार एवं स्तुति कर रहे थे। कमलके समान विकसित एवं विशाल नेत्रोंके कटाक्षपात मानो करुणासिन्धुकी उठती हुई तरंग थे और उनके द्वारा भगवान् शिव सम्पूर्ण जगत्की मलिनताका निवारण-सा कर रहे थे। इस प्रकार देवाधिदेव महादेवको उपस्थित देखकर महाराज वज्रांगदको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने भगवान्‌को साष्टांग प्रणाम किया और मस्तकपर अंजलि बाँधकर कहा—'देवेश ! मैंने जो मोहवश आपके समीप सवारीपर बैठकर विचरण किया है, उस मेरे एकमात्र अपराधको आप क्षमा करें।'

इस प्रकार अत्यन्त दीन भावसे बोलनेवाले राजासे करुणानिधान जगदीश्वर भगवान् अरुणाचलेश्वरने कहा—वत्स! भय न करो, तुम्हारा कल्याण हो। मेरी आठ मूर्तियाँ हैं। वे सब सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये कल्पित हुई हैं। पूर्वकालमें तुम इन्द्र थे और अहंकारवश तुमने कैलाशशिखरपर बैठे हुए मेरा अपमान किया। तब मैंने उसी समय तुम्हें स्तम्भित करके जडवत् बना दिया। तुम्हारा सारा अभिमान और पापभार क्षणभरमें गल गया और तुम लज्जित होकर मेरे समीप बैठ गये। उस समय मैंने तुम्हें समस्त ऐश्वर्योंके कारणभूत शिव-ज्ञानका उपदेश किया और यह आज्ञा दी कि तुम पृथ्वीपर जन्म ले राजा वज्रांगद होकर मेरी कृपा प्राप्त करोगे। इस समय तुम्हारी की हुई दिन-रातकी सेवाओंसे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें यह ज्ञान देता हूँ, सुनो। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और पुरुष—इन मेरी आठ मूर्तियोंसे व्याप्त होकर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रकाशित होता है। मैं इन सब तत्त्वोंसे परे शिव हूँ, मुझसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। मेरे स्वरूपभूत चिदानन्द-समुद्रसे उठी हुई कुछ लहरें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंको आनन्दसे परिपूर्ण करती हैं। मैं समस्त संसारका स्वामी हूँ। यह गौरीदेवी मेरी महाशक्ति माया हैं। इन्हींके द्वारा सम्पूर्ण विश्व सदा आच्छादित होता और विस्तारको प्राप्त होता है। इन महाशक्तिके द्वारा सदा सृष्टि-रक्षा और संहाररूप लीलाविलासोंसे अत्यन्त विचित्ररूपमें प्रस्तुत किये हुए इस जगत्‌को मैं स्वेच्छासे देखता रहता हूँ। तुम अपने-आपको मेरी महिमासे उसी प्रकार अभिन्न देखो जैसे समुद्रकी तरंग उससे भिन्न नहीं होती। ऐसी दृष्टि हो जानेपर यह सारी पृथ्वी तुम्हें मेरे ही रूपसे सुशोभित दिखायी देगी और उसपर मेरी कृपासे प्रभुत्व प्राप्त करके तुम उत्तम भोगोंका सुखसे उपभोग करोगे। इसके बाद तुम्हें पुनः इन्द्ररूपसे दिव्य सुखदायी भोग दीर्घकालके लिये प्राप्त होंगे। तदनन्तर तुम मुझसे एकरूपता एवं विशुद्ध चिन्मयता प्राप्त कर लोगे।

यों कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये और पुण्यात्मा राजा वज्रांगदने भगवान् अरुणाचलनाथकी आराधना करते हुए ही समस्त भोगोंको प्राप्त किया। 'मुने! इस प्रकार तुमसे शिवभक्तकी उन्नतिका वृत्तान्त, अरुणाचलकी प्रदक्षिणाका फल तथा सदाचारका अक्षय परिणाम बताया गया। अरुणाचलसे बढ़कर दूसरा क्षेत्र नहीं है। अरुणाचलेश्वरसे बढ़कर और कोई देवता नहीं है तथा उनकी परिक्रमासे अधिक तीनों लोकोंमें दूसरा कोई तप नहीं है।' नन्दिकेश्वरके ऐसा कहनेपर मार्कण्डेयजीके सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांच हो आया। वे बार-बार नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी वर्षा करते हुए अमृतके महासागरमें निमग्न हो गये।

अरुणाचल-माहात्म्यखण्ड सम्पूर्ण

माहेश्वरखण्ड समाप्त

राजा वज्रांगदपर भगवान् अरुणाचलेश्वरकी कृपा

४. वैष्णवखण्ड (वेंकटाचलमाहात्म्य)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण


वैष्णव-खण्ड


भूमिवाराहखण्ड या वेंकटाचल-माहात्म्य


मेरुगिरिपर भगवान् वाराहकी सेवामें पृथ्वीदेवीका उपस्थित होना और श्रेष्ठ पर्वतों तथा वेंकटाचलवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य सुनना

एक समय कथा कहनेके लिये रोमहर्षण-पुत्र उग्रश्रवा मुनि आये, जो व्यासजीके परम बुद्धिमान् शिष्य थे। वहाँ आनेपर मुनियोंने उनका भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीने उनसे स्कन्द नामक दिव्य पुराणकी कथा कही। सृष्टि-संहार, वंश-परिचय, विभिन्न वंशोंमें उत्पन्न महापुरुषोंके चरित्र तथा मन्वन्तरोंकी कथाका उन्होंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया। तीर्थोंके माहात्म्यकी बहुत-सी कथाएँ सुनकर उन मुनिवरोंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले सूतजीसे कथाश्रवणकी अभिलाषा मनमें रखकर इस प्रकार कहा।

ऋषि बोले—रोमहर्षणकुमार सूतजी! आप सर्वज्ञ हैं, पौराणिक विषयोंका वर्णन करनेमें कुशल हैं, अतः हमलोग आपके मुखसे भूतलके मुख्य-मुख्य पर्वतोंका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।

सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें मैंने यही प्रश्न गंगाजीके तटपर बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ व्यासजीसे पूछा था। उसके उत्तरमें मेरे सर्वोत्तम गुरु व्यासजीने इस प्रकार कहा।

व्यासजी बोले—सूत! प्राचीन युगकी बात है। एक दिन मुनिश्रेष्ठ नारद नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित सुमेरु-पर्वतके शिखरपर गये और उसके मध्यभागमें ब्रह्माजीका अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य एवं विस्तृत भवन देखा। उसके उत्तरप्रदेशमें पीपलका एक उत्तम वृक्ष था, जिसकी ऊँचाई एक हजार योजनकी और विस्तार दुगुना था। उस पीपलके मूलभागके समीप अनेक प्रकारके रत्नोंसे युक्त दिव्य मण्डप बना हुआ था, जिसमें वैदूर्य, मोती और मणियोंके द्वारा स्वस्तिक गृह बनाये गये थे। वह दिव्यमण्डप नूतन रत्नोंसे चिह्नित तथा दिव्य तोरणों (बाहरी फाटकों)-से सुशोभित था। उसका मुख्यद्वार पुष्पराग मणिका बना हुआ था, जिसका गोपुर सात मंजिलका था। चमकते हुए हीरोंसे बनाये गये दो किवाड़ उस द्वारकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस मण्डपके भीतर प्रवेश करके नारदजीने देखा, दिव्य मोतियोंका एक मण्डप है, उसमें वैदूर्यमणिकी वेदी बनी हुई है। महामुनि नारद उस ऊँचे मण्डपके ऊपर चढ़ गये। वहाँ उक्त मण्डपके मध्यभागमें एक बहुत ऊँचा सिंहासन था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। उस मध्यभागमें सहस्र दलोंसे सुशोभित दिव्य कमल था, जिसका रंग श्वेत था। उसकी प्रभा सहस्रों चन्द्रमाओंके समान

२६२संक्षिप्त स्कन्दपुराण

थी। उस कमलके मध्यमें दस हजार पूर्ण चन्द्रमाओंसे भी अधिक कान्तिमान् कैलाशपर्वतके समान आकारवाले एक सुन्दर पुरुष बैठे हुए थे। उनके चार भुजाएँ थीं, अंग-अंगसे उदारता टपक रही थी, वाराहके समान मुख था। वे परम सुन्दर भगवान् पुरुषोत्तम अपने चारों हाथोंमें शंख, चक्र, अभय एवं वर धारण किये हुए थे। उनके कटिभागमें पीताम्बर शोभा पाता था। दोनों नेत्र कमलदलके समान विशाल थे। सौम्यमुख पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत कर रहा था। मुखारविन्दसे धूपकी-सी सुगन्ध निकलती थी। सामवेद उनकी ध्वनि, यज्ञ उनका स्वरूप, स्रुक् उनका मुख था और स्रुवा उनकी नासिका थी। मस्तकपर धारण किये हुए मुकुटके प्रकाशसे उनका मुख अत्यन्त उद्भासित हो रहा था। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। श्वेत यज्ञोपवीत धारण करनेसे उनके श्रीअंगोंकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। उनकी छाती चौड़ी और विशाल थी। वे कौस्तुभमणिकी दिव्य प्रभासे देदीप्यमान हो रहे थे। ब्रह्मा, वसिष्ठ, अत्रि, मार्कण्डेय तथा भृगु आदि अनेक मुनीश्वर दिन-रात उनकी सेवामें संलग्न रहते थे। इन्द्र आदि लोकपालों और गन्धर्वोंसे सेवित देवदेवेश्वर भगवान्‌के पास जाकर नारदजीने प्रणाम किया और पृथ्वीको धारण करनेवाले उन वाराहभगवान्‌का दिव्य उपनिषद्-मन्त्रोंसे स्तवन करके अत्यन्त प्रसन्न हो वे उनके पास ही खड़े हो गये।

इतनेहीमें दिव्य दुन्दुभी बज उठी। तत्पश्चात् वहाँ पृथ्वीदेवीका शुभागमन हुआ। रत्नोंसहित समुद्रके सदृश दिव्य वस्त्र धारण करके वे बड़ी शोभा पा रही थीं। इला और पिंगला नामवाली दो सखियाँ उनके साथ थीं। उन दोनोंके लाये हुए फूलोंको लेकर पृथ्वीदेवीने भगवान् वाराहके चरणोंमें बिखेर दिया और उन देवदेवेश्वरको प्रणाम करके वे दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ी हो गयीं।

तब भगवान् वाराहने कहा—'पृथ्वीदेवि! मैं तुम्हें शेषनागके सुखदायक मस्तकपर बिठाकर और सम्पूर्ण विश्वको तुम्हारे ऊपर स्थापित करके पर्वतोंको तुम्हारा सहायक बनाकर यहाँ आया हूँ। फिर किसलिये तुम यहाँ आयी हो?'

पृथ्वी बोली—भगवन्! आपने पातालसे मेरा उद्धार करके ऊँचे रत्नसिंहासनकी भाँति शेषनागके रत्नयुक्त मस्तकपर, जो सहस्रों फणोंसे सुशोभित है, मुझे बिठाया है। इस प्रकार मुझे भलीभाँति स्थिर करके मुझ धारण करनेमें समर्थ पुण्यमय पर्वतोंको भी मेरे ऊपर स्थापित किया है, जो आपके ही स्वरूप हैं। महाबाहु पुरुषोत्तम! उन पर्वतोंमेंसे जो मेरे आधारभूत मुख्य-मुख्य पर्वत हैं, उनका मुझे परिचय दीजिये।

श्रीभगवान् वाराहने कहा—सुमेरु, हिमवान्, विन्ध्याचल, मन्दराचल, गन्धमादन, शालग्राम, चित्रकूट, माल्यवान्, पारियात्रक, महेन्द्र, मलय, सह्य, सिंहाचल, रैवत तथा मेरुपुत्र अंजन, जो बड़ा भारी स्वर्णमय पर्वत है; वसुन्धरे! ये सभी

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २६३

श्रेष्ठ पर्वत तुम्हारे आधार हैं। मैंने देवसमूह और ऋषिसमूहके साथ इन पर्वतोंका सेवन किया है। माधवि ! इनमें जो श्रेष्ठ पर्वत हैं, उनका यथार्थ वर्णन करता हूँ, सुनो। देवि! शालग्राम, सिंहाचल तथा गिरिराज गन्धमादन—ये उत्तम शैल हिमालयकी ओर उत्तर दिशामें स्थित हैं। वसुधे ! अब मैं दक्षिणके प्रधान पर्वतोंका नाम बतलाता हूँ—अरुणाचल, हस्तिपर्वत, गृध्राचल तथा घटिकाचल—ये सभी श्रेष्ठ पर्वत क्षीर नदीके समीपवर्ती हैं। हस्तिपर्वतसे पाँच योजन उत्तर सुवर्णमुखरी नामक उत्तम नदी बहती है। उसीके उत्तर तटपर कमला सरोवर है, जिसके किनारे शुकदेवजीको वर देनेवाले तथा भक्तोंकी पीड़ाओंका नाश करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण बलभद्रजीके साथ निवास करते हैं। शुद्धचित्तवाले वानप्रस्थ मुनि सदा उनकी आराधना करते हैं। कमला सरोवरसे उत्तर दो कोसकी दूरीपर कल्पवृक्षोंसे सुशोभित श्रेष्ठ वनमें श्रीवेंकटाचल नामक प्रसिद्ध पर्वत है, जो भगवान् विष्णुका महान् आश्रय है। वह शैलराज एक योजन ऊँचा और सात योजन चौड़ा है। वह समूचा पर्वत सुवर्णमय है। उसके शिखर रत्न धारण करनेवाले हैं। इन्द्र आदि देवता, वसिष्ठ आदि मुनीश्वर, सिद्ध, साध्य, मरुद्गण, दानव, दैत्य, राक्षस तथा रम्भा आदि अप्सराएँ वहाँ नियमपूर्वक निवास करती हैं। नाग, गरुड़ और किन्नर वहाँ तपस्या करते हैं। इन सबसे सेवित अनेक नदियाँ हैं, जिनका दर्शन भी पुण्यप्रद है। पृथ्वी ! उस पर्वतपर अनेक प्रकारके दिव्य सरोवर शोभा पा रहे हैं।

अब सब तीर्थोंमें प्रधान चक्र आदि तीर्थोंका वर्णन सुनो। चक्रतीर्थ, दैवतीर्थ, आकाशगंगा, कुमारधारिकातीर्थ, पापनाशनतीर्थ, पाण्डवतीर्थ तथा स्वामिपुष्करिणीतीर्थ—ये सात तीर्थ उस उत्तम नारायणगिरि (वेंकटाचल)—पर सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं। इन सातोंमें भी सबसे श्रेष्ठ कल्याणमयी स्वामिपुष्करिणी है। भूदेवि ! उस स्वामिपुष्करिणीके पश्चिम तटपर तुम्हारे साथ मैं निवास करता हूँ और दक्षिण तटपर सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् लक्ष्मीन निवास (विष्णु) विराजमान हैं। समुद्रवसना पृथ्वी ! वह स्वामिपुष्करिणी गंगा आदि सम्पूर्ण तीर्थोंके समान है। तीनों लोकोंमें जो तीर्थ, सरोवर और नदियाँ हैं, उन सबका आधिपत्य स्वामिपुष्करिणी तीर्थको प्राप्त है। उस परम पवित्र स्वामिपुष्करिणी तीर्थका सेवन करनेके लिये दिव्य गिरि वेंकटाचलपर सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। उनमें भी छः सबसे प्रधान हैं।

माधवि ! अब मैं तुम्हें नारायणगिरिका माहात्म्य बतलाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। देवता, ऋषि तथा सनकादि योगी सत्ययुगमें अंजनगिरिको, त्रेतामें नारायणगिरिको, द्वापरमें सिंहाचलको और कलियुगमें श्रीवेंकटाचलको परमात्मा भगवान् विष्णुका निवासस्थान कहते हैं। अन्य विद्वानोंका भी यही मत है। जो सहस्रों योजन दूरसे अथवा द्वीपान्तरमें पहुँचकर भी गिरिराज वेंकटाचलको प्रणाम करता है, उसे प्रणाम करनेके उद्देश्यसे उसकी दिशाकी ओर भक्तिभावसे मस्तक झुकाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। उस पर्वतपर जो छः प्रधान तीर्थ हैं, उनका समयानुसार माहात्म्य बतलाता हूँ। माघमासमें जब भगवान् सूर्य कुम्भ राशिपर स्थित हों, तब मघा-नक्षत्रयुक्त महातिथि पूर्णिमाको गिरिराज वेंकटाचलपर जो कुमारधारिका नामवाली पुष्करिणी है, वह समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली हो जाती है। जिसके तटपर कृत्तिका और अग्निसे उत्पन्न पार्वतीनन्दन स्कन्द देव-सेनाके साथ भगवान् विष्णुका पूजन करते हुए निवास करते हैं, उस तीर्थमें जो मध्याह्नकालमें स्नान करता है, उसके पुण्यफलको श्रवण करो। वसुधे ! गंगा आदि सब तीर्थोंमें जो बारह वर्षोंतक नियमपूर्वक स्नान करता है, उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल कुमारधारा तीर्थमें स्नान करनेवालेको भी मिल जाता है। जो उस

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तीर्थमें यथाशक्ति दक्षिणाके साथ अन्नदान करता है, उसे भी उतना ही फल मिलता है, जितना स्नानके लिये बताया गया है।

वसुन्धरे ! जब मीन राशिके सूर्य हों, तब उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा तिथिको चौथे पहरमें पर्वतकी गुफाके भीतर तुम्बतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह पुनः गर्भमें नहीं आता। जब सूर्यदेव मेष राशिपर स्थित हों, तब चित्रा नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा तिथिको पुण्यमय प्रभातके समय आकाशगंगाके जलमें स्नान करनेवाला पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेता है। सूर्यदेव जब वृष राशिपर विराजमान हों, तब वैशाखमासमें शुक्ल या कृष्ण पक्षकी द्वादशी तिथिको रविवार या मंगलवारका योग होनेपर अथवा शुक्ल या कृष्ण पक्षमें रविवारके दिन पुष्य या हस्त नक्षत्रके योग होनेपर जो मनुष्य संगवकालमें पाण्डव तीर्थके भीतर स्नान करता है, वह इस लोकमें कभी दुःख नहीं पाता तथा परलोकमें सुख भोगता है। महाभागे ! शुक्ल अथवा कृष्ण पक्षमें रविवारके साथ जो सप्तमी तिथि आवे, उसमें यदि पुष्य नक्षत्र अथवा हस्त नक्षत्रका योग हो, तब गिरिराज वेंकटाचलके शिखरपर वर्तमान पापनाशन नामक तीर्थमें जो स्नान करता है, वह श्रेष्ठ मनुष्य कोटिजन्मोपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। भूदेवि ! अब तुम एक रहस्यकी बात सुनो। 'अनन्त' नामक महापर्वतपर मेरे दिव्य मन्दिरके वायव्य कोणमें शिखरपर स्थित गुफामें देवतीर्थ नामसे प्रसिद्ध एक परम सुन्दर सरोवर है। उसमें पुष्य नक्षत्रयुक्त बृहस्पतिवारको अथवा व्यतीपात योगमें अथवा श्रवण नक्षत्रयुक्त सोमवारको जो स्नान करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। इस लोकमें जान-बूझकर या अनजानमें किये हुए जो कोई भी पाप हैं, वे सब अत्यन्त पावन देवतीर्थमें गोता लगाते ही नष्ट हो जाते हैं, पुण्यकी वृद्धि होती है तथा अन्तमें वह चन्द्रलोकमें सम्मानित होता है।

यह सब सुनकर पृथ्वीदेवीने भगवान् वाराहकी इस प्रकार स्तुति की—देवदेवेश्वर ! वाराहमुख ! अच्युत ! आपको नमस्कार है। महाबाहो ! आपकी श्वेतकान्ति क्षीरसागरके समान है। वज्रशृंग ! आपको नमस्कार है। देव ! आपकी सहस्रों भुजाएँ हैं। आपने कल्पके आदिमें एकार्णवके जलसे मेरा उद्धार किया है; तभी मैं सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करती हूँ। प्रभो! आप अनेक दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा यज्ञसूत्रसे सुशोभित हैं, लाल-लाल वस्त्र धारण करते हैं और दिव्य रत्नोंसे अलंकृत होते हैं। आपके चरणारविन्द प्रातःकाल उदय होनेवाले सूर्यनारायणके समान अरुण कान्तिवाले हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आपके दाढ़ोंका अग्रभाग बाल-चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। आपका बल और पराक्रम महान् है। आपके श्रीअंगोंमें दिव्य चन्दनका आलेप लगा हुआ है और कानोंमें तपाये हुए सुवर्णके कुण्डल झिलमिला रहे हैं। आप इन्द्रनीलमणिसे प्रकाशमान, सुवर्णमय अंगद (बाजूबन्द)-से विभूषित हैं। महाबल ! आपने अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वक्षःस्थल चीर डाला है। आपके नेत्र खिले हुए कमलपुष्पके समान परम सुन्दर हैं। आप अपने मुखसे सामवेदके मन्त्रोंका गान करते समय मेरे मनको मोहे लेते हैं। विशाललोचन ! ब्रह्माजी और भगवान् शिव आपके चरणोंकी वन्दना करते हैं। आपका श्रीविग्रह सर्वविद्यामय है। आप शब्दोंकी पहुँचसे परे हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आनन्दविग्रह ! अनन्त ! कालकाल ! आपको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके पृथ्वीदेवीने भगवान्‌के चरणोंमें प्रणाम किया। यह देखकर भगवान् वाराहदेवके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उन्होंने

* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *२६५

पृथ्वीदेवीको साथ लेकर, गरुड़पर आरूढ़ हो, वहाँसे वृषाभाचल (वेंकटगिरि)-को प्रस्थान किया। नारद आदि मुनीश्वरोंसे प्रशंसित होकर पृथ्वीपति भगवान् वाराह स्वामिपुष्करिणीके लोकपूजित पश्चिम तटपर निवास करते हैं। वहाँ अनेकानेक मुनीश्वर, महाभाग वैखानस तथा ब्रह्माजीके तुल्य महात्मा पुरुष वाराहमुख भगवान् विष्णुकी आराधनामें संलग्न रहते हैं। | सूत! जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय पावन संवादको सुनता अथवा देवता और ब्राह्मणोंके आगे पढ़ता है, वह प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है। तथा जितने लोग सुनते हैं, उन सभीको अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है।<br>सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! भगवान् व्यासने यह माहात्म्य मुझसे कहा है और मैंने जैसा सुना है, वैसा ही आपलोगोंके सामने वर्णन किया है।

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भगवान् वाराहका मन्त्र, उसके जपकी विधि, ध्यान तथा उसके अनुष्ठानका फल

ऋषियोंने कहा—सूतजी! पृथ्वीके साथ भगवान् वाराह जब वृषभाचलपर चले गये, तब वहाँ उन्होंने पृथ्वीसे क्या कहा? महामते! वह सब प्रसंग हमें सुनाइये।

सूतजी बोले—मुनियो! आप सब लोग पूर्व-कालकी पुण्यमयी कथा श्रवण करें। पहले वैवस्वत मन्वन्तरके परम पवित्र सत्ययुगमें वाराहरूपधारी पृथ्वीपति देवेश्वर भगवान् विष्णु नारायणगिरिपर निवास करते थे। उस समय पृथ्वीदेवी अपनी सखियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने भगवान्‌के सामने यह प्रश्न उपस्थित किया—'देवेश! आप किस मन्त्रसे आराधना करनेपर प्रसन्न होंगे? जो मन्त्र आपको सदा ही प्रिय है और नियमपूर्वक रहनेवाले मनुष्योंको आपके परमधामकी प्राप्ति करा देता है, उसका मुझे उपदेश कीजिये।'

भूदेवीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर भगवान् वाराहने प्रेमसे मुसकराते हुए कहा—देवि! सुनो। यह परम गोपनीय मन्त्र है, इसे कभी अनधिकारीके सामने प्रकाशमें नहीं लाना चाहिये। जो सेवा करनेवाला भक्त तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला है, उसीको इस मन्त्रका उपदेश करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ नमः श्रीवराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा'। मुमुक्षु पुरुषोंको इस मन्त्रका सदैव जप करना चाहिये। भूदेवि! यह मन्त्र सब सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके संकर्षण ऋषि हैं और मैं ही देवता कहा गया हूँ। इसका छन्द पंक्ति है, श्री बीज है। सद्गुरुसे इस मन्त्रकी दीक्षा लेकर इसका चार लाख जप करना चाहिये और घी तथा मधु मिलाये हुए खीरका हवन करना चाहिये।

अब मैं अपने स्वरूपका ध्यान बतला रहा हूँ, जो अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाला है। समुद्रवसने! मेरे अंगोंकी कान्ति शुद्ध स्फटिक गिरिके समान श्वेत है। खिले हुए लाल कमलदलोंके समान सुन्दर नेत्र हैं, वाराहके समान मुख है, स्वरूप सौम्य है, चार भुजाएँ हैं, मस्तकपर किरीट शोभा पाता है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। हाथोंमें चक्र, शंख, अभयदायिनी मुद्रा और कमल सुशोभित हैं। मेरी बायीं जाँघपर तुम बैठी हो। मैंने लाल, पीले वस्त्र पहनकर लाल रंगके ही आभूषणोंसे अपनेको विभूषित किया है। श्रीकच्छपके पृष्ठके मध्यभागमें शेषनागकी मूर्ति है। उसके ऊपर सहस्रदल कमलका आसन है

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और उसपर मैं विराजमान हूँ। इस प्रकार ध्यान करके जो सदा अष्टोत्तरशत मन्त्रका जप करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

यह सुनकर पृथ्वीदेवीने पुनः प्रश्न किया— देव! पूर्वकालमें किसने इस मन्त्रका अनुष्ठान किया है और उसे किस फलकी प्राप्ति हुई है?

भगवान् वराहने कहा—देवि! पहले कृतयुगमें धर्म नामक महात्मा मनुने ब्रह्माजीसे इस मन्त्रको प्राप्त किया और इसी पर्वतपर उसका जप करके मेरा प्रत्यक्ष दर्शन पाया। फिर मुझसे अभीष्ट वरदान प्राप्त करके वे मेरे पदको प्राप्त हो गये। पूर्वकालमें इन्द्र दुर्वासाके शापसे स्वर्गभ्रष्ट हो गये थे; उस समय इसी मन्त्रसे यहीं मेरी आराधना करके उन्होंने पुनः स्वर्गका राज्य प्राप्त कर लिया। भूदेवि! अन्यान्य मुनियोंने भी इस मन्त्रका जप करके परम गति प्राप्त की है। सर्पोंके स्वामी अनन्तने कश्यपजीसे इस मन्त्रको पाकर श्वेत-द्वीपमें इसका जप किया और उसीसे अद्भुत शक्ति पाकर वे पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हुए हैं। अतः पृथ्वीकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंको इहलोकमें सदा ही इस मन्त्रका जप करना चाहिये।

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महर्षि अगस्त्यकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णुका वेंकटाचलपर श्री-भू देवियोंके साथ निवास तथा आकाशराजके यहाँ पद्मावती और वसुदानका जन्म

भगवान् वराह कहते हैं— महादेवी पृथ्वी! मैं तुम्हें एक पवित्र इतिहास सुनाता हूँ, सुनो। वैवस्वत मन्वन्तरके आदि सत्ययुगमें वायु देवताका बड़ा भारी तप देखकर लक्ष्मीनिवास भगवान् विष्णु श्रीदेवी और भूदेवीके साथ स्वामिपुष्करिणीके तटपर आये। इसके दक्षिण तटपर परम पवित्र आनन्द नामक विमानमें वे श्रीलक्ष्मीकान्त विष्णु सदा वायु देवताका प्रिय करते हुए निवास करते हैं। तभीसे कुमार कार्तिकेयद्वारा निरन्तर पूजित हो, भगवान् हृषीकेश इस विमानपर अदृश्य भावसे रहते हैं और आगे भी रहेंगे।

पृथ्वीने पूछा— मनुष्योंकी दृष्टिमें न आनेवाले भगवान् विष्णु किस प्रकार यहाँ उन्हें प्रत्यक्ष दिखायी देंगे?

भगवान् वराहने कहा— देवि! महर्षि अगस्त्यने इस पर्वतपर आकर सनातनदेव भगवान् विष्णुका दर्शन किया और बारह वर्षोंतक आराधना करके उन्हें बारंबार प्रसन्न किया। तत्पश्चात् भगवान्‌से यह याचना की कि 'प्रभो! आप सदा यहाँ निवास करें और सब लोगोंको आपका प्रत्यक्ष दर्शन होता रहे।'

उनके ऐसा कहनेपर श्री-भू देवियोंके साथ