संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३३
योजन समुद्र लाँघकर लंकामें पहुँचे और रातभर सब ओर सीताकी खोज करते रहे। रात्रि समाप्त होते-होते हनुमान्जीको सीताका दर्शन हुआ। द्वादशीको हनुमान्जी अशोक वृक्षपर बैठे रहे। उसी रातमें उन्होंने जानकीजीके विश्वासके लिये उत्तम कथा कही। तदनन्तर त्रयोदशीको अक्षकुमार आदिके साथ युद्ध हुआ। त्रयोदशीको ही मेघनादने ब्रह्मास्त्रसे हनुमान्को बाँध लिया। ब्रह्मास्त्रसे बँधे होनेपर भी वायुपुत्र हनुमान्जीने राक्षसराज रावणको कितने ही रूखे एवं कठोर वचन सुनाये। तब राक्षसोंने उनकी पूँछमें आग लगा दी। उसी आगसे हनुमान्जीने समस्त लंकाको जला डाला और वे पूर्णिमाको पुनः महेन्द्र पर्वतपर लौट आये। मार्गशीर्ष प्रतिपदासे पाँच दिनतक रास्तेमें रहकर वे मधुवनमें आये और षष्ठीको मधुवनका विध्वंस किया। फिर सप्तमीको श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें पहुँचकर पहचान देते हुए सब समाचार निवेदन किया। सीताजीकी मणि देकर श्रीरामसे उन्होंने सब बातें बतायीं। फिर अष्टमीको उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें, जब विजयसंज्ञक मुहूर्त व्यतीत हो रहा था, ठीक दोपहरके समयमें श्रीरामचन्द्रजीने प्रस्थान किया। रामने दक्षिण दिशामें जानेकी प्रतिज्ञा करते हुए कहा—'मैं समुद्रको लाँघकर भी राक्षसराज रावणका वध करूँगा। दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करते समय श्रीरामचन्द्रजीके साथी वानरराज सुग्रीव हुए। सात दिनोंमें समुद्रके तटपर सेनाकी छावनी पड़ी। पौष शुक्ला प्रतिपदासे लेकर तृतीयातक सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीकी उपस्थिति सागरके तटपर हुई। चतुर्थीको विभीषण आकर श्रीरामचन्द्रजीसे मिले। पंचमीको समुद्र पार करनेके विषयमें विचार किया गया। उसके बाद चार दिनतक श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रके किनारे उपवास-व्रत किया। चौथे दिन समुद्रसे वर प्राप्त हुआ। साथ ही समुद्रने समुद्र-पार करनेका उपाय बताया। दशमीसे सेतु बाँधनेका कार्य प्रारम्भ हुआ और त्रयोदशीको पूरा हो गया। चतुर्दशीको सुबेल पर्वतपर पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीने सेनाका पड़ाव डाला। पूर्णिमासे लेकर द्वितीयातक तीन दिनोंमें सारी सेना समुद्र पार करके लंका पहुँच गयी। तत्पश्चात् शुभलक्षण श्रीरामने सीताको प्राप्त करनेके लिये शूरवीर वानरोंकी सेनाके साथ लंकापुरीको चारों ओरसे घेर लिया। तृतीयासे लेकर दशमीतक आठ दिनोंतक सेना टिकी रही। एकादशीके दिन शुक और सारण इन दो मन्त्रियोंका आगमन हुआ। पौष कृष्णा द्वादशीको सेनाकी गणना की गयी। कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने अपनी सेनाके बलाबलका वर्णन किया। त्रयोदशीसे लेकर अमावास्यातक तीन दिन लंकामें रावणने अपनी सेनाका संगठन, उसकी गणना एवं सैनिकोंमें युद्धके लिये उत्साह भरनेका कार्य किया। माघ शुक्ला प्रतिपदाको अंगदजी दूत बनकर रावणके दरबारमें गये। द्वितीयाके दिन सीताजीको मायासे उनके पतिके कटे हुए मस्तक आदिका दर्शन कराया गया। उस दिनसे सात दिनोंतक अर्थात् अष्टमी तिथितक राक्षसों और वानरोंमें घमासान युद्ध हुआ। माघ शुक्ला नवमीकी रातमें मेघनादने युद्ध करके राम और लक्ष्मणको नागपाशमें बाँध लिया। इससे सब कपीश्वर व्याकुल और हताश हो गये। तब वायुके उपदेशसे श्रीरघुनाथजीने गरुड़का स्मरण किया। दशमीको गरुड़जी नागपाशसे छुड़ानेके लिये आये। फिर माघ शुक्ला एकादशीसे लेकर दो दिनतक युद्ध बंद रहा। द्वादशीको हनुमान्जीने धूम्राक्षका और त्रयोदशीको उन्होंने ही अकम्पनका वध किया। रावणने श्रीरामको मायामयी सीताका दर्शन कराकर समस्त सैनिकोंको भयभीत कर दिया। माघ शुक्ला चतुर्दशीसे लेकर कृष्ण पक्षकी प्रतिपदातक तीन दिनमें
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नीलने प्रहस्तका वध किया। माघ कृष्णा द्वितीयासे लेकर चतुर्थीतक तीन दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने तुमुल युद्ध करके रावणको रणस्थलसे मार भगाया। पंचमीसे अष्टमीतक रावणद्वारा जगाया हुआ कुम्भकर्ण चार दिनतक केवल भोजन ही करता रहा। नवमीसे चार दिनतक कुम्भकर्णने युद्ध किया और बहुतसे वानरोंको खा डाला। अन्तमें वह श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया। अमावास्याके दिन लंकामें उसके लिये शोक मनाया गया। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदासे लेकर चतुर्थीतक चार दिनोंमें नरान्तक आदि पाँच राक्षस मारे गये। पंचमीसे सप्तमीतक तीन दिनोंमें अतिकायका वध हुआ। अष्टमीसे द्वादशीतक पाँच दिनोंमें निकुम्भ और कुम्भ मारे गये। फिर चार दिनोंमें मकराक्षका वध किया गया। फाल्गुन कृष्णा द्वितीयाके दिन मेघनाद पराजित हुआ। तीजसे लेकर सप्तमीतक पाँच दिन दवा आदि लानेकी व्यग्रताके कारण युद्ध बंद रहा। अष्टमीको दुर्बुद्धि रावणने शोकके आवेगसे मायामयी मैथिलीका वध किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सेनाके द्वारा इसका पूर्णतः निश्चय किया। फिर त्रयोदशीसे पाँच दिनोंमें लक्ष्मणजीने विख्यात बल और पराक्रमवाले मेघनादको युद्धमें मार डाला। चतुर्दशीको रावणने युद्ध बंद करके यज्ञकी दीक्षा ली। फिर अमावास्याके दिन वह युद्धके लिये निकला। चैत्र शुक्ला प्रतिपदासे लेकर पाँच दिनतक रावण लगातार युद्ध करता रहा। इस युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका संहार हुआ। फिर तीन दिनोंतक रावणके रथ, घोड़े आदि मारे गये। चैत्र शुक्ला नवमीको लक्ष्मणजीको शक्ति लगी। तब श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधमें भरकर दशमुख रावणको खदेड़ दिया। फिर विभीषणकी सलाहसे हनुमान्जी लक्ष्मणके लिये ओषधि लानेको द्रोणाचल पर्वतपर गये और वहाँसे विशल्या (संजीवनी बूटी) ले आकर उन्होंने लक्ष्मणको पिलायी। दशमीके दिन युद्ध बंद रहा। रातमें राक्षसों ने युद्ध आरम्भ किया। एकादशीके दिन श्रीरामचन्द्रजीके पास मातलि नामक सारथिके साथ इन्द्रका रथ आ पहुँचा। चैत्र शुक्ला द्वादशीसे लेकर कृष्णा चतुर्दशीतक अठारह दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने द्वन्द्वयुद्ध करके रावणको मार डाला। अमावास्याके दिन रावण आदि राक्षसोंके दाह-संस्कार हुए। इस प्रकार घोर संग्राम होनेपर श्रीरामचन्द्रजीको विजय प्राप्त हुई। माघ शुक्ला द्वितीयासे लेकर चैत्र कृष्णा चतुर्दशीतक सत्तासी दिनके संग्राममें केवल पंद्रह दिन युद्ध बंद रहा। शेष बहत्तर दिन युद्ध चालू रहा। वैशाख शुक्ला प्रतिपदाको श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें ही रहे। द्वितीयाके दिन उन्होंने विभीषणका लंकाके राज्यपर अभिषेक किया। तृतीयाको सीताकी शुद्धि हुई, देवताओंसे वरदान प्राप्त हुआ। उसी दिन दशरथजीका आगमन हुआ और उनके द्वारा भी सीताजीकी पवित्रताके विषयमे अनुमोदन प्राप्त हुआ।
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंद्वारा कष्टमें डाली हुई परम पवित्र जानकीको बड़े प्रेमसे ग्रहण करके वहाँसे लौटे। वैशाखकी चतुर्थीको श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठे और आकाशमार्गसे अयोध्यापुरीकी ओर चल दिये। चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वैशाख शुक्ला पंचमीको श्रीरामचन्द्रजी अपने दलबलके साथ भरद्वाज आश्रमपर आकर रहे। फिर षष्ठीको पुष्पक विमानसे वे नन्दिग्राममें आये। सप्तमीमें अयोध्याके राज्यपर रघुनाथजीका अभिषेक हुआ। चौदह महीने दस दिनतक सीताको रामसे अलग रावणके घरमें रहना पड़ा था। बयालीसवें वर्षमें श्रीरामचन्द्रजीने राज्यकार्य प्रारम्भ किया। उस समय सीताजीकी आयु पैंतीस वर्षकी थी। चौदह वर्षके बाद ही
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श्रीरामने अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया था। उस समय रावणका दर्प दलन करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने अपने भाइयोंके साथ ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया। राज्यका पालन करनेके पश्चात् वे सबके साथ परम धाममें गये। रामराज्यमें सब लोग बहुत प्रसन्न रहते थे। सभी धन-धान्यसे सम्पन्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे भरे-पूरे थे। बादल इच्छाके अनुसार पानी बरसाते थे, अन्नकी उपज कई गुनी अधिक होती थी, गौएँ घड़ाभर दूध देती थीं और वृक्षोंमें सदैव फल लगे रहते थे। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें किसीको आधि-व्याधि नहीं सताती थी, सभी स्त्रियाँ पतिव्रता होती थीं, पुरुष पिता-माताकी भक्ति करनेवाले होते थे, ब्राह्मण सदा वेदपाठमें लगे रहते, क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी सेवा करते और वैश्यलोग ब्राह्मणों एवं गौओंमें सदा भक्ति रखते थे। उस समय वर्णसंकरता और कर्मसंकरताका नाम नहीं सुना जाता था। कोई भी स्त्री वन्ध्या, दुर्भाग्यवती, काकवन्ध्या, मृतवत्सा अथवा विधवा नहीं थी। सधवा स्त्रीको कभी विलाप नहीं करना पड़ता था। कोई भी माता-पिता और गुरुकी अवहेलना नहीं करते थे। प्रत्येक मनुष्य पुण्य करता और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा नहीं टालता था। कोई दूसरेकी भूमिपर अधिकार नहीं जमाते थे। सभी परायी स्त्रियोंसे विमुख रहते थे। कोई मनुष्य परनिन्दक, दरिद्र, रोगी, चोर, जुआरी, शराबी और पापी नहीं था। सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीगमन करनेवाला, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या और बालहत्या करनेवाला तथा झूठ बोलनेवाला एक भी मनुष्य नहीं था। कोई किसीकी जीविका नष्ट नहीं करता और झूठी गवाही नहीं देता था। शठ, कृतघ्न और मलिन मनुष्य कहीं देखनेको भी नहीं मिलता था। ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् होते थे और सदा सर्वत्र उनकी पूजा होती थी। अत्यन्त विख्यात रामराज्यमें कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो व्रतका पालन करनेवाला एवं ईश्वरका भक्त न हो। राज्य करते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास उनके पुरोहित महाभाग वसिष्ठ मुनि अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करके आये। श्रीरामचन्द्रजीने अभ्युत्थान, अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क आदिके द्वारा मुनियोंसहित गुरु वसिष्ठका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिवर वसिष्ठने श्रीरामचन्द्रजीसे उनके राज्य, अश्व, हाथी, खजाना, देश, उत्तम बन्धु तथा सेवकोंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा। श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।' तदनन्तर श्रीरामने मुनिवर वसिष्ठजीसे उनकी पत्नी और पुत्रके कुशल-मंगलका समाचार पूछा। तब वसिष्ठजीने भूमण्डलमें जिन-जिन क्षेत्रों, तीर्थों और देवालयोंका सेवन किया था, उन सबकी चर्चा करते हुए सर्वत्र अपना कुशल-मंगल बतलाया। इससे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी बड़े विस्मित होकर वसिष्ठजीसे उत्तमोत्तम तीर्थका माहात्म्य पूछने लगे।
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वसिष्ठजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, श्रीरामकी धर्मारण्ययात्रा, वहाँके भगे हुए ब्राह्मणोंको पुनः लाकर बसाना और सत्यमन्दिरकी स्थापना करना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा— भगवन्! आपने जिन-जिन तीर्थोंका सेवन किया है, उनमें सबसे उत्तम तीर्थ कौन है, यह मुझे बताइये। सीताका अपहरण होनेपर मैंने बहुत-से ब्रह्मराक्षसोंका वध किया है। उस पापकी शुद्धिके लिये आप मुझे किसी ऐसे तीर्थका परिचय दीजिये, जो उत्तम-से-उत्तम हो।
वसिष्ठजी बोले— गंगा, नर्मदा, तापी, यमुना, सरस्वती, गण्डकी, गोमती और पूर्णा—ये सभी नदियाँ परम पावन हैं। इन सबमें नर्मदा और त्रिपथगामिनी गंगा श्रेष्ठ हैं। रघुनन्दन! श्रीगंगाजी दर्शनमात्रसे ही सब पापोंको जला देती हैं। कलियुगमें नर्मदाका दर्शन करनेसे सौ जन्मोंके, समीप जानेसे तीन सौ जन्मोंके और जलमें स्नान करनेसे एक हजार जन्मोंके पापोंका वह नाश कर देती हैं। नर्मदाके तटपर जाकर साग और मूल-फलसे भी एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन देनेका फल होता है। जो सौ योजन दूरसे भी गंगा-गंगाका उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है*। फाल्गुन (चैत्र) मासके अन्तमें अमावस्या तिथिको तथा भाद्रपद (आश्विन) कृष्ण पक्षमें गंगाजीके तटपर जाकर जो मनुष्य स्नान, पितरोंका तर्पण और पिण्डदान करता है, वह अक्षय फलका भागी होता है। तापी नदीका स्मरण करनेपर महापातकियोंके भी सात गोत्रोंका उद्धार हो जाता है। यमुनामें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है और महापातकोंसे युक्त होनेपर भी परम गतिको प्राप्त होता है। कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रका योग होनेपर जो सरस्वती नदीमें स्नान करता है, वह गरुड़की पीठपर बैठकर उत्तम देवताओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ वैकुण्ठधामको जाता है। जो कार्तिक मासमें प्राची सरस्वतीके जलमें स्नान करके भगवान् प्राचीमाधवकी स्तुति करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो गण्डकी (नारायणी) नदीके पुण्यतीर्थमें स्नान करता और शालग्रामशिलाकी पूजा करता है, उसका फिर जन्म नहीं होता है। जो द्वारकावासी श्रीकृष्णके समीप गोमतीके जलकी लहरोंमें स्नान करता है, वह चतुर्भुजरूप धारण करके वैकुण्ठधाममें आनन्दका अनुभव करता है। चर्मण्वती (चम्बल) नदीको नमस्कार करके
* गंगा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ३१। ७)
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जो उसके जलका स्पर्श करता है, वह पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दोनोंका संगम देखकर अथवा समुद्रकी ध्वनि सुनकर ब्रह्महत्यासे युक्त मनुष्य भी पवित्र हो परम गतिको प्राप्त होता है। जो मनुष्य माघ मासमें प्रयागमें गोता लगाता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुधामको प्राप्त होता है। जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें तीन राततक ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक निवास करते हैं, वे यमलोक एवं कुम्भीपाक आदिका दर्शन नहीं करते। जो मनुष्य नैमिषारण्यमें निवास करता है, वह देवत्वको प्राप्त होता है। श्रीराम! जो मनुष्य कुरुक्षेत्रमें चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर स्नान करके सुवर्णदान करता है, उसका इस लोकमें पुनर्जन्म नहीं होता। जो मनुष्य इस पृथ्वीपर कपिला गौको स्पर्श करके दान देता है, वह कामधेनु गौओंके निवासभूत ऋषिलोकको जाता है। जो वैशाख मासमें उज्जयिनीपुरीमें क्षिप्राके जलमें स्नान करता है, वह अपने सहस्रों पूर्वजोंको घोर रौरव नरकसे छुटकारा दिला देता है। जो मनुष्य तीन दिनोंतक सिन्धुनदी अथवा समुद्रमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो कैलासमें आनन्द भोगता है। कोटितीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करनेवाला मनुष्य कहीं भी ब्रह्महत्या आदि पापोंसे लिप्त नहीं होता। महान् अपवित्र स्थानमें जानेवाले अज्ञानी जीव भी यदि भगवान्के चरणोंसे प्रकट हुई गंगाका जल पी लें तो उनका सब पाप नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य सूर्योदयकालमें वेदवती नदीमें स्नान करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो उत्तम सुखका भागी होता है। रघुनन्दन! प्रायः सभी तीर्थ स्नान, जलपान तथा गोता लगानेसे अनायास ही मनुष्योंके सब पापोंका नाश कर देते हैं। सब तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ धर्मारण्य बतलाया जाता है; क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने पूर्वकालमें सबसे पहले इसी तीर्थको स्थापित किया था। सब वनों और तीर्थोंमें विशेषतः धर्मारण्यसे बढ़कर भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला दूसरा कोई तीर्थ नहीं है। स्वर्गके देवता भी धर्मारण्यनिवासी मनुष्योंकी सराहना करते हैं।
रघुनन्दन! द्वारका, काशी, त्रिशूलधारी शिव तथा भैरव—ये सब जैसे मुक्तिदायक हैं, उसी प्रकार धर्मारण्य भी मोक्ष देनेवाला उत्तम तीर्थ है। यह सुनकर महाधनुर्धर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सीतादेवी और अपने भाइयोंके साथ तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान किया। उनके पीछे कपीश्वर हनुमान्जी, माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी, लक्ष्मण, भरत, सेनासहित शत्रुघ्न, अयोध्याके अन्यान्य निवासी तथा प्रजावर्गके लोग भी गये। तीर्थयात्राकी विधिका पालन करनेके लिये घरसे चले हुए राजा श्रीरामने अपने कुलके आचार्य महर्षि वसिष्ठसे कहा—'मुने! यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि आदिमें यह धर्मारण्य क्षेत्र हुआ या द्वारका हुई। धर्मारण्य क्षेत्रकी उत्पत्ति कितने कालसे हुई है, यह बताइये।'
वसिष्ठजी बोले—महाराज! मैं नहीं जानता कि यह क्षेत्र कितने दिनोंसे प्रकट है। दीर्घजीवी लोमश और जाम्बवान् इसका कारण जानते होंगे। शरीरमें जो अनेक जन्म-जन्मान्तरोंका किया हुआ पाप संचित है, उन सभी पापोंका उत्तम प्रायश्चित्त यह धर्मारण्य क्षेत्र माना गया है।
वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने वहाँ जानेका विचार करके यात्रा-विधिका पालन किया। फिर वसिष्ठजीको आगे करके महामाण्डलिक राजाओं (सामन्तों)-के साथ पुरश्चरणविधि पूर्ण कर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। आगे जाकर फिर वे पश्चिम दिशाकी ओर मुड़ गये। गाँव-से-गाँव, देश-से-देश और वन-से-वनको लाँघते हुए आगे बढ़ते चले गये। सेना, सामान, हजारों हाथी, घोड़े, करोड़ों रथ आदि वाहनों और असंख्य शिविकाओंके साथ श्रीरघुनाथजी
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यात्रा कर रहे थे। वे हाथीपर बैठकर नाना प्रकारसे मैत्रीभाव प्रदर्शित करनेवाले विभिन्न देशोंको देखते हुए जा रहे थे। उनके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था और उनके पार्श्व भागमें सुन्दर चँवर डुलाया जा रहा था।
दसवें दिन श्रीरामचन्द्रजी परम उत्तम धर्मारण्य क्षेत्रके निकट पहुँच गये। धर्मारण्यके समीप ही 'माण्डलिकपुर' को देखकर श्रीरामने अपनी सेनाके साथ रातमें वहीं निवास किया। उन्होंने सुना, धर्मारण्य क्षेत्र इस समय निर्जन एवं उजाड़ होकर बड़ा भयानक प्रतीत होता है। वहाँ बाघ और सिंह भरे हुए हैं। यक्ष और राक्षस निवास करते हैं। धर्मारण्य अब केवल जंगल रह गया है। जनताके मुखसे ये सारी बातें सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'तुमलोग चिन्ता न करो।' उन्होंने वहाँके व्यवसायकुशल, शूरवीर, महान् बली एवं पराक्रमी तथा समर्थ वैश्योंको बुलाकर कहा—'तुमलोग मेरी यह सोनेकी पालकी शीघ्र ले चलो, जिससे मैं अभी धर्मारण्यमें पहुँच जाऊँ। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीसे प्रेरित होकर उन सभी वैश्योंने 'तथास्तु' कहकर पालकी उठायी और उन्हें धर्मारण्यमें पहुँचा दिया। सेनासहित श्रीरामने जब उस क्षेत्रमें प्रवेश किया तब प्रत्येक वाहनकी गति मन्द हो गयी। बाजोंकी आवाज भी कम हो गयी, हाथी मन्द गतिसे चलने लगे, घोड़ोंकी भी यही दशा हुई। यह सब देखकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने विनयपूर्वक मुनिश्रेष्ठ गुरु वसिष्ठसे पूछा—'मुनीश्वर! यह क्या बात है? सब वाहनोंकी गति मन्द हो गयी, यह तो एक विचित्र बात है?' तब तीनों कालोंकी बात जाननेवाले मुनि वसिष्ठने कहा—'राम! यह धर्मक्षेत्र आ गया। इस पुरातन तीर्थमें पैदल यात्रा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे पीछे सेनाको सुख मिलेगा।' तब श्रीरामचन्द्रजी सेनाके साथ पैदल चलने लगे। जाते-जाते वे 'मधुवासनक' नामवाले परम पावन ग्राममें पहुँचे। वहाँ गुरु वसिष्ठकी बतायी हुई पद्धतिसे भाँति-भाँतिके उपहारोंद्वारा प्रतिष्ठाविधिके साथ मातृकाओंका पूजन किया। तदनन्तर श्रीरामने सुवर्णा नदीके दक्षिण तटपर हरिक्षेत्रका निरीक्षण किया और यज्ञके योग्य बहुत-से स्थलोंको देखा। उस समय रघुनाथजीने धर्मस्थानका निरीक्षण करके अपने-आपको कृतार्थ माना और सुवर्णाके उत्तर तटपर सैनिकोंको उतारकर स्वयं उस क्षेत्रमें भ्रमण करने लगे। वहाँके सभी तीर्थों और देवमन्दिरोंमें जा-जाकर श्रीरामने सभी शास्त्रोक्त कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न किये। उन्होंने बड़ी श्रद्धाके साथ विधिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध किया। स्थानसे वायव्य कोणमें सुवर्णाके दोनों तटोंपर श्रीरामेश्वर और कामेश्वरका स्थापन किया। इन सब विधियोंका पालन करके वे अपनी पत्नी सीताके साथ रात्रिमें उस नदीके तटपर ही सोये। जब आधी रात हुई, तब सबके सो जानेपर भी धर्मवत्सल श्रीराम अकेले जागते रहे। उस समय उन्हें किसी स्त्रीके रोनेका शब्द सुनायी दिया। वह करुणाजनक बातें कहकर उस रातमें कुररीकी भाँति विलाप कर रही थी। श्रीरामने उसी क्षण गुप्तचर भेजकर उस स्त्रीका निरीक्षण कराया। करुणाजनक स्वरसे क्रन्दन करती हुई उस व्याकुल नारीको देखकर श्रीरामके दूतोंने पूछा—'सुन्दरी! तुम कौन हो? देवी हो या दानवी? किसने तुम्हें भय पहुँचाया है? किसने तुम्हारा धन लूट लिया है, जिससे व्याकुल हो बार-बार तुम कठोर शब्दोंका उच्चारण करती हुई रो रही हो? सच-सच बताओ, राजा श्रीराम तुम्हारा समाचार पूछते हैं?' उस स्त्रीने उत्तर दिया—'दूतो! अपने स्वामीको ही मेरे पास भेज दो, जिससे मैं अपने मानसिक दुःखको उनसे कहूँ और शान्ति पाऊँ।' 'बहुत अच्छा' कहकर दूत लौट गये और उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर सब बातें कह सुनायीं।
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दूतमण्डली—भगवान्! उस स्त्रीने कहा है कि श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे दुःखका निवारण कर सकते हैं; अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींको भेज दो।
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत वहाँ गये और दुःखसे सन्तप्त हुई उस अबलाको देखकर वे स्वयं भी दुखी हो गये। उस समय उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर पूछा—'शुभे! तुम कौन हो?
किसकी पत्नी हो? किसने तुम्हें दुखी करके इस निर्जन वनमें निकाल दिया है? किसने तुम्हारा धन लूटा है? ये सब बातें मेरे सामने कहो।'
उनके इस प्रकार पूछनेपर उस स्त्रीने मधुर वाणीमें प्रेमपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका स्तवन किया—परमात्मन्! आप सनातन परमेश्वर एवं सबका दुःख हरनेवाले हैं। जिसके लिये आपका अवतार हुआ था, वह कार्य आपने पूरा कर लिया। रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद, खर, दूषण, त्रिशिरा, मारीच और अक्षयकुमार आदि असंख्य भयानक राक्षसोंको आपने समरांगणमें परास्त किया है। लोकेश! मैं आपकी उत्तम कीर्तिका वर्णन क्या कर सकती हूँ, जब साक्षात् ब्रह्माजी आपकी नाभिसे प्रकट कमलसे उत्पन्न हुए हैं और जैसे वटके बीजमें महान् वटवृक्षकी स्थिति मानी गयी है, उसी प्रकार उन्होंने इस सम्पूर्ण विश्वको आपके उदरमें विराजमान देखा है। श्रीराम! संसारमें राजा दशरथ तथा आपकी माता कौशल्या धन्य हैं, जिनकी कुक्षिसे आप प्रकट हुए हैं। वह कुल धन्य है, जिसमें आप स्वयं आये हैं। वह अयोध्या नगरी धन्य है, जिसे आपकी जन्मभूमि होनेका गौरव मिला है। वे लोग धन्य हैं, जो आपकी शरणमें रहते हैं। वे महर्षि वाल्मीकि धन्य हैं, जिन्होंने मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंके लिये अपनी बुद्धिसे भावी रामायणकी रचना की। आपके द्वारा यह रघुकुल अत्यन्त पवित्र हो गया है। लोकमें जो साधारण राजा होता है, उसे भी सब लोग भगवान् विष्णुका अंश समझते हैं। परंतु आप तो अपने रमणीय गुणोंसे सुशोभित स्वयं ही साक्षात् विष्णु हैं। लोकहितका कोई भी कार्य, जिसे करनेका विचार करके आपने यहाँ अवतार लिया है, करते समय आपके मार्गमें कभी कोई विघ्न-बाधा न आवे। इस प्रकार स्तुति करके उसने श्रीरामजीसे कहा—'रघुनन्दन! आप-जैसे स्वामीके रहते हुए जो मैं दीर्घकालसे सूनी हो रही हूँ, यह आपका ही दोष है। मुझे धर्मारण्य क्षेत्रकी अधिदेवता समझिये। आज बारह वर्ष हो गये, मैं यहीं दुःखमें डूबी रहती हूँ। महामते! आजसे आप यहाँकी निर्जनता दूर कीजिये। इस तीर्थमें निवास करनेवाले ब्राह्मण लोहाकके भयसे सब दिशाओंमें भाग गये हैं, उन्हींके साथ सब वैश्य भी दुःखी होकर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें चले गये। यद्यपि देवताओंने यहाँ आक्रमण करके उस महामायावी दुर्जय एवं दुर्धर्ष दैत्यको मार डाला है तथापि उसके भयसे अत्यन्त शंकित रहनेवाले मनुष्य अबतक यहाँ लौटकर
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नहीं आ रहे हैं। बारह वर्ष बीत गये, यहाँका प्रत्येक घर अनाथकी भाँति सूनसान पड़ा है। जिस बावलीमें स्नान और दानके लिये उद्यत मनुष्योंकी भीड़ लगती थी, उसीमें अब सूअर कूदते हैं। जहाँ ब्राह्मणलोग निरन्तर सामवेदका गान करते थे, वहाँ अब सियारिनोंके अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी देते हैं। जहाँ घर-घरमें अग्निहोत्रका धूम दृष्टिगोचर होता था, वहीं अत्यन्त भयंकर दावानल धूएँके साथ दिखायी देता है। जिस सभामण्डपमें मन्त्रजप करनेवाले ब्राह्मण बैठा करते थे, वहीं अब गवय, रीछ और स्याही आदि जीव बैठते हैं। यहाँ जो ऊँची-ऊँची यज्ञकी चौकोर वेदियाँ बनी थीं, वे अब बाँबीकी मिट्टीके ढेरसे घिरी दिखायी देती हैं। नृपश्रेष्ठ श्रीराम! अब मेरा निवास-स्थान इस दशाको पहुँच गया है। यहाँसे जो ब्राह्मण चले गये, इसका मुझे बहुत दुःख है। नरेश्वर! मुझे इस संकटपूर्ण अवस्थासे उबारिये।'
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बोले—'आपके ब्राह्मण चारों दिशाओंमें चले गये हैं। मैं न तो उनकी संख्या जानता हूँ और न उनके नाम-गोत्रसे ही मेरा परिचय है। अतः उनकी जाति और गोत्रके विषयमें आप यथार्थ रूपसे बताइये, जिससे उन सबको यहाँ ले आकर मैं अपने-अपने स्थानपर बसाऊँ।'
श्रीमाता बोली—नरेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु और शिवने जिन्हें यहाँ स्थापित किया था, वे वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण अठारह हजारकी संख्यामें यहाँ रहते थे। तीनों वेदोंकी विद्यामें उनकी बड़ी ख्याति है। वे प्रतिष्ठित ब्राह्मण चौंसठ गोत्रोंके हैं। उनके साथ छत्तीस हजार वैश्य थे, जो धर्मपरायण, सदाचारी और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहनेवाले थे। जहाँ संज्ञारानीके साथ राजा वकुलादित्य नामसे विख्यात भगवान् सूर्य विराजते हैं; जहाँ दोनों अश्विनीकुमार हैं, जहाँ व्ययकी पूर्ति करनेवाले साक्षात् कुबेर हैं, वही यह धर्मारण्य क्षेत्र है, जिसकी अधिष्ठातृदेवी मैं मानी गयी हूँ। मैं यहाँकी भट्टारिका (स्वामिनी) हूँ।
श्रीसूतजी कहते हैं—उस स्थानके जो आचार और वहाँ रहनेवालोंके जो कुलाचार थे, उन सब प्राचीन वृत्तान्तोंको श्रीमाताने श्रीरामचन्द्रजीके आगे निवेदन किया। उसकी बात सुनकर रघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा—'आपने मुझसे सत्य-सत्य बातें बतायी हैं। अतः मैं इसी नामसे यहाँ नगर बसाऊँगा। यह नगर तीनों लोकोंमें उत्तम सत्यमन्दिरके नामसे विख्यात होगा।' यों कहकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने एक लाख सेवकोंको ब्राह्मणोंको बुला लानेके लिये भेजा और कहा—'जिस देश, प्रदेश, नदी, तट, वन अथवा ग्राममें जहाँ-जहाँ धर्मारण्यनिवासी ब्राह्मण गये हों, वहाँ-वहाँसे अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें तुमलोग शीघ्र यहाँ बुला लाओ। मैं तभी यहाँ भोजन करूँगा, जब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके दर्शन कर लूँगा।'
भगवान्का यह आदेश सुनकर उनके आज्ञापालक दूत सब दिशाओंमें चले गये। उन्होंने सब ब्राह्मणोंको खोज निकाला और उन्हें पाकर सब-के-सब बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शास्त्रोक्त विधानसे अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा उन सबका पूजन किया, स्तुति की और विनययुक्त बर्ताव करते हुए श्रीरामचन्द्रजीका अनुरोध सुनाकर उन सबको धर्मारण्य चलनेके लिये आमन्त्रित किया। तदनन्तर वे सभी वेद-शास्त्रपरायण ब्राह्मण सेवकोंके साथ वहाँ जानेको उद्यत हुए और बड़े आदरपूर्वक श्रीरामके समीप गये। उन्हें देखकर दशरथनन्दन महाराज रामके अंगोंमें हर्षसे रोमांच हो आया और उन्होंने अपनेको कृतार्थ-सा माना। वे बड़े वेगसे उठकर पैदल ही उनकी अगवानीके लिये
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६४१
गये और धरतीपर घुटने टेककर आनन्दके आँसू बहाते हुए दोनों हाथ जोड़कर बोले—'ब्राह्मणो! मैं ब्राह्मणके ही प्रसादसे लक्ष्मीपति हूँ, ब्राह्मणके ही प्रसादसे धरणीधर हूँ, ब्राह्मणके ही प्रसादसे जगतीपति हूँ और ब्राह्मणके ही प्रसादसे मेरा राम नाम है*।' श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने जय-जयकार एवं आशीर्वादसे उनका सम्मान करते हुए कहा—'रघुनन्दन! आप दीर्घायु हों।' श्रीरामने उन्हें पुनः प्रणाम करके पाद्य, अर्घ्य और आसन आदिके द्वारा उनका सत्कार किया और दण्डवत् प्रणाम करके स्तुति की। तत्पश्चात् हाथ जोड़कर उनके चरणोंकी वन्दना की। फिर विचित्र प्रकारके आसन और सोनेके आभूषण समर्पित किये। अँगूठी, यज्ञोपवीत और कानोंके कुण्डल दिये। इतना ही नहीं, उन्होंने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये अनेक रंगकी सौ-सौ गायें भी दीं, जो बछड़ेवाली थीं और जिनके थन घड़ेके समान थे। उनकी पीठपर वस्त्र ओढ़ाया गया था, गलेमें घंटे बँधे थे, सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये थे। उनका पृष्ठभाग ताम्रपत्रसे विभूषित था और दूध दुहनेके लिये प्रत्येक गायके साथ एक-एक काँसेका पात्र था।
तत्पश्चात् श्रीराम बोले—ब्राह्मणो! मैं श्रीमाताकी आज्ञासे इस तीर्थका जीर्णोद्धार करूँगा। आपलोग इस कार्यके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरा दान ग्रहण करें। सत्पात्रको ही दान देना चाहिये। अपात्रको कुछ नहीं दिया जाता; क्योंकि सुपात्र नौकाकी भाँति सदा पार उतारता है और अपात्र लोहपिण्डके समान केवल डुबानेवाला होता है। द्विजो! केवल जातिमात्रसे ब्राह्मणता नहीं आती है, उसके साथ-साथ ब्राह्मणोचित कर्म भी होना चाहिये। संसारमें क्रिया बलवती होती है। कर्महीन ब्राह्मणोंको दान देनेसे कहाँसे फल प्राप्त होगा? इस कारण सत्यवादी ब्राह्मण ही परम पूजनीय माने गये हैं। अब यज्ञकार्य प्रारम्भ होनेवाला है, इसमें आपलोग सदा कृपा करें।
तब वे सब ब्राह्मण आपसमें मिलकर विचार करने लगे। उनमेंसे कुछ ब्राह्मणोंने श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार कहा—'रघुनन्दन! हम सब शिलोञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले हैं। पूर्ण सन्तोषका आश्रय लेकर धर्मानुष्ठानमें लगे रहते हैं। अतः हमें दान लेनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। राजाका प्रतिग्रह बड़ा भयंकर होता है, अतः हम भयदायक प्रतिग्रह नहीं लेना चाहते।' उन ब्राह्मणोंमेंसे कुछ एकाहित व्रतवाले थे। वे दिनमें एक बार भोजन करते थे। कुछ अमृतवृत्तिसे रहते थे—बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीपर सन्तोष करते थे। कुछ कुम्भीधान्य संज्ञावाले ब्राह्मण थे, वे एक घड़ेसे अधिक धान्यका संग्रह नहीं करते थे। कुछ ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन और दान तथा प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें तत्पर रहते थे। वे सभी ब्राह्मण ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन मूर्तियोंके स्थापित किये हुए थे। सबके स्वभाव और गुण पृथक्-पृथक् थे। कुछ ब्राह्मण इस प्रकार बोले—'हमलोग ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों स्वरूपोंकी आज्ञा लिये बिना कैसे प्रतिग्रह स्वीकार कर सकते हैं। जबतक ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंने नहीं कहा, तबतक हमने किसीका ताम्बूल भी स्वीकार नहीं किया है।'
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने महात्मा वसिष्ठजीसे परामर्श किया और गुरुके साथ ही उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओंका स्मरण
* विप्रप्रसादात्कमलावरोऽहं विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम्। विप्रप्रसादाज्जगतीपतिश्च विप्रप्रसादान्मम राम नाम ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ३२। ६०)
भगवान् रामचन्द्रका दान
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * | ६४३ ---|---
किया। स्मरण करते ही सब देवता वहाँ आ पहुँचे। उनके विमानोंकी पंक्ति कोटि-कोटि सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी। श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन सबका यथायोग्य पूजन किया और वह सब वृत्तान्त निवेदन करते हुए कहा—'मैं इस क्षेत्रकी अधिदेवीके कहनेसे यहाँ धर्मारण्य हरिक्षेत्रमें धर्मकूपके समीप जीर्णोद्धार करना चाहता हूँ।' तदनन्तर वे सब ब्राह्मण तीनों मूर्तियोंको प्रणाम करके हर्षमें भर गये। उनका मनोरथ सफल हो गया। उन्होंने अर्घ्य-पाद्य आदिकी विधिसे श्रद्धापूर्वक उनका पूजन किया। वे तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव क्षणभर विश्राम करके विनयसे हाथ जोड़े हुए महाशक्तिशाली श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—'सूर्यवंश-विभूषण राम! तुमने देवद्रोही रावण आदि राक्षसोंका जो संहार किया है, इससे हमलोग बहुत प्रसन्न हैं। तुम इस महास्थानका उद्धार करो और महान् सुयश प्राप्त करो।'
उन देवताओंकी आज्ञा पाकर दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए और ब्रह्मा आदि देवताओंके समीप जीर्णोद्धारका कार्य प्रारम्भ किया। उन्होंने पहले महान् पर्वतके समान सुन्दर एवं विशाल वेदी बनवायी और उसके ऊपर अनेकानेक सुन्दर ब्राह्मशाला, गृहशाला तथा ब्रह्मशालाका निर्माण कराया। उन शालाओंमें यथास्थान खजाना और गृहोपयोगी आवश्यक वस्तुओंका संग्रह किया गया। कोटि-कोटि स्वर्णमुद्राओं तथा रस और वस्त्र आदिसे वे शालाएँ भर गयीं। उनमें धन-धान्य-समृद्धि एवं सब प्रकारके धातुओंका भी संग्रह किया गया था। यह सब करके श्रीरामने ब्राह्मणोंको दान दिया। उन्होंने एक-एक ब्राह्मणके लिये दस-दस दूध देनेवाली गौएँ दीं। उन्होंने वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके लिये चार हजार चार गाँव दिये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवताओंने उन्हें स्थापित किया था, इसीलिये संसारमें त्रैविद्य नामसे उनकी ख्याति हुई। इस प्रकार ब्राह्मणोंको वह परम अद्भुत दान दिया। मण्डलोंमें जो उत्तम शूद्र वैश्यवृत्तिसे जीविका चला रहे थे, उनकी संख्या सवा लाख थी। वे सब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे और माण्डलिक कहलाते थे। उन सबको श्रीरामने ब्राह्मणोंकी सेवामें नियुक्त किया। श्रीरामचन्द्रजीने दो चँवर और खड्ग दिये। प्रतिष्ठा-विधिके साथ अपने कुलके स्वामी भगवान् सूर्यको स्थापित किया। चार वेदोंसे युक्त ब्रह्माजीकी स्थापना की, महाशक्ति श्रीमाता एवं श्रीहरिको भी स्थापित किया। विघ्नोंका निवारण करनेके लिये दक्षिण द्वारपर उन्होंने गणेशजी तथा अन्य देवताओंकी स्थापना की। वीरवर श्रीरघुनाथजीने सात मंजिलके मन्दिर बनवाये और यह नियम किया कि 'जो कोई भी यहाँ शुभ एवं मांगलिक कार्य करे, पुत्र होनेपर जातकर्म, अन्नप्राशन तथा मुण्डन आदि कर्म करे, यज्ञकर्मोंमें लक्ष होम और कोटि होम करे, वास्तुपूजा एवं ग्रहशान्ति करे तथा ऐसे महोत्सवोंके अवसरपर मनुष्य जो कुछ भी द्रव्य, अन्न, वस्त्र, धेनु, सुवर्ण, रजत आदिका दान ब्राह्मणों, शूद्रों, दीनों, अनाथों और अन्धोंके लिये देवे, उस समय पहले कार्यकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि होनेके लिये भगवान् वकुलादित्य और श्रीमाताका भाग निकाल दे। जो मनुष्य मेरी आज्ञाका उल्लंघन करके विपरीत आचरण करेगा, उसके उस कर्ममें विघ्न उपस्थित होगा।'
ऐसा कहकर श्रीरामने प्रसन्नचित्तसे देवताओंकी बावलियों, सुन्दर चहारदिवारियों, दुर्गके उपकरणों, विस्तृत सड़कों और गलियों, कुण्ड, सरोवर, तलैया, धर्मवापी तथा अन्यान्य देवनिर्मित कूपोंका पुनर्निर्माण कराया। इस प्रकार मनोरम धर्मारण्यमें इन सब वस्तुओंका विस्तारपूर्वक निर्माण कराकर
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श्रीरघुनाथजीने उन्हें त्रयीविद्याके मुख्य-मुख्य विद्वानोंको सौंप दिया। श्रीरामचन्द्रजीका शासन वहाँ ताम्रपत्रपर लिखकर रख लिया गया है। जो उसको लोप करेगा, उसके पूर्वज नरकमें पड़ेंगे और आगे उसके कुलमें संतति नहीं होगी। तत्पश्चात् श्रीरामने पवनपुत्र हनुमान्जीको बुलाकर कहा—'महावीर वायुकुमार! तुम्हारी भी पूजा होगी। तुम इस क्षेत्रकी रक्षाके लिये यहाँ निवास करो।' हनुमान्जीने प्रणाम करके प्रभुकी आज्ञाको शिरोधार्य किया। इस प्रकार उस तीर्थका जीर्णोद्धार किया। श्रीमाताका पूजन करके वे अन्य तीर्थोंमें जानेको उद्यत हुए। ब्रह्मा आदि देवता भी श्रीरामको आशीर्वाद दे अपने-अपने लोकको चले गये।
रामनामकी महिमा, कलियुगका प्रभाव तथा धर्मारण्यक्षेत्रके माहात्म्यश्रवणका फल
व्यासजी कहते हैं—जो लोग 'राम-राम-राम' इस मन्त्रका उच्चारण करते हैं, खाते, पीते, सोते, चलते और बैठते समय सुखमें या दुःखमें राममन्त्रका जप करते हैं, उन्हें दुःख, दुर्भाग्य, आधि-व्याधिका भय नहीं रहता। उनकी आयु, सम्पत्ति और बल प्रतिदिन बढ़ते रहते हैं। रामका नाम लेनेसे मनुष्य भयंकर पापसे छूट जाता है। वह नरकमें नहीं पड़ता और अक्षयगतिको प्राप्त होता है।
इस प्रकार श्रीरामजीने तीर्थोद्धारका सब कार्य पूरा कर ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया और गाय, घोड़े, भैंस तथा रथ आदि बहुत-से दान देकर वे सेनासहित लौट आये। क्रमशः अयोध्या नगरीमें आकर उन्होंने दीर्घकालतक राज्य किया।
युधिष्ठिरने पूछा—मुने! कलियुग प्राप्त होनेपर संसारमें कैसा भय होता है?
व्यासजी बोले—राजन्! कलियुगमें लोग असत्यवादी और साधुपुरुषोंकी निन्दा करनेवाले होंगे। वे सभी लुटेरोंके कर्म करनेवाले तथा पितृभक्तिसे दूर होंगे। अपने ही गोत्रकी स्त्रियोंसे रमण करनेवाले और चपलताके ही चिन्तनमें तत्पर होंगे। सब एक-दूसरेके विरोधी, ब्राह्मणद्वेषी तथा शरणागतोंका वध करनेवाले होंगे। कलियुग प्राप्त होनेपर ब्राह्मण वेदभ्रष्ट, अहंकारी, वैश्योचित आचार (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य)-में तत्पर और सन्ध्याकर्मका लोप करनेवाले होंगे। शान्तिकालमें शूरताकी डींग मारनेवाले और भय प्राप्त होनेपर अत्यन्त दीन होंगे। श्राद्ध और तर्पणसे दूर रहेंगे। असुरोंके समान आचारवाले तथा विष्णुभक्तिसे रहित होंगे। दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले और सूदखोर होंगे। ब्राह्मण बिना नहाये भोजन कर लेंगे। क्षत्रिय युद्धका नाम सुनकर दूर भागेंगे। कलिमें सब लोग दुष्टवृत्तिवाले तथा मलिन होंगे। मदिरा पीयेंगे और जो यज्ञके अधिकारी नहीं हैं, ऐसे लोगोंसे भी यज्ञ करावेंगे। स्त्रियाँ पतिसे द्वेष करनेवाली तथा पुत्र पितासे वैर रखनेवाले होंगे। कलियुगके क्षुद्र मनुष्य भाईसे शत्रुता रखेंगे। ब्राह्मण धनसंग्रहमें तत्पर होकर गायका दूध, दही और घी बेचेंगे। कलिकालमें गौएँ प्रायः दूध नहीं देती हैं, वृक्षोंमें कभी फल नहीं लगते हैं। लोग कन्या बेचनेवाले होंगे। गाय और बकरीको भी बेचेंगे। विष-विक्रय तथा रस-विक्रय करेंगे। कलियुगके ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे। स्त्रियाँ ग्यारह वर्षकी आयुमें
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६४५
ही गर्भ धारण करेंगी। प्रायः लोग एकादशीके उपवाससे रहित होंगे। तीर्थसेवनमें ब्राह्मणोंकी प्रवृत्ति नहीं होगी। ब्राह्मण अधिक खानेवाले और अधिक सोनेवाले होंगे। सब लोग कुटिलवृत्तिसे जीविका चलानेवाले तथा वेदोंकी निन्दामें तत्पर होंगे। संन्यासियोंकी निन्दा करेंगे और परस्पर एक-दूसरेको छलनेवाले होंगे। कलियुगमें छूआछूतके दोषको नहीं मानेंगे। क्षत्रियलोग राज्यसे वंचित होंगे और म्लेच्छ राजा होगा। प्रायः सब विश्वासघाती, गुरुद्रोही, मित्रद्रोही तथा शिश्नोदरपरायण होंगे। महाराज! कलियुग आनेपर चारों वर्णके लोग एक हो जायेंगे, यह मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा। कलियुग प्राप्त होनेपर सब ब्राह्मण स्थानसे भ्रष्ट होंगे। वे बलवान् पक्षको ग्रहण करेंगे और पक्षपाती होंगे तथा वेदभ्रष्ट होंगे।
प्राचीन कालमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने धर्मारण्य तीर्थको स्थापित किया था। सत्ययुगमें इस तीर्थका नाम धर्मारण्य, त्रेतामें सत्यमन्दिर, द्वापरमें वेदभवन और कलियुगमें मोहेरक हुआ*। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक सब पापोंका नाश करनेवाले धर्मारण्य-माहात्म्यको सुनता है, वह मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले त्रिविध पातकका नाश कर देता है। एक बार इसके सुनने अथवा कीर्तन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है। स्त्री हो या पुरुष, जो भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह कभी नरकका दर्शन नहीं करता है। श्रेष्ठ पुरुष पवित्रचित्त होकर इस पुराणकी पुस्तकको किसी उत्तम स्थानपर स्थापित करके रेशमी वस्त्र तथा गन्ध, माल्य आदिसे इसकी पृथक्-पृथक् पूजा करे। कथा समाप्त होनेपर वाचककी भी पूजा करे। विचित्र वस्त्र दे। गन्ध, माला और चन्दन आदिके द्वारा देवताके समान पूजा करके वाचकको दूध देनेवाली गौका दान करे।
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धर्मारण्य-माहात्म्य सम्पूर्ण।
\sim\sim\circ\sim\sim$
* धर्मारण्यं कृतयुगे त्रेतायां सत्यमन्दिरम्। द्वापरे वेदभवनं कलौ मोहेरकं स्मृतम्॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ४०। ६७)
| ६४६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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चातुर्मास्य-माहात्म्य
चातुर्मास्य व्रतका माहात्म्य, संयम-नियम, दयाधर्म तथा चौमासेमें अन्न आदि दानोंकी महिमा
नारदजी बोले— देवाधिदेव! इस समय मैं शुभकारक चातुर्मास्य व्रतको सुनना चाहता हूँ।
ब्रह्माजीने कहा— देवर्षे! ये भगवान् विष्णु ही सबको मोक्ष देनेवाले तथा संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं। इनके स्मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। संसारमें मनुष्य-जन्म दुर्लभ है। उसमें भी उत्तम कुलमें जन्म पाना और दुर्लभ है। कुलीन होनेपर भी दयालु स्वभावका होना और कठिन है। यह सब होनेपर भी कल्याणमय सत्संग प्राप्त होना और भी दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं, विष्णुभक्ति नहीं और व्रत नहीं हैं, वहाँ कल्याणकी प्राप्ति दुर्लभ है। विशेषतः चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुका व्रत करनेवाला मनुष्य उत्तम माना गया है। सब तीर्थ, दान, पुण्य और देवस्थान चातुर्मास्य आनेपर भगवान् विष्णुकी शरण लेकर स्थित होते हैं। जो चातुर्मास्यमें श्रीहरिको प्रणाम करता है, उसीका जीवन शुभ है। संसारमें मनुष्यका जन्म और भगवान् विष्णुकी भक्ति दोनों ही दुर्लभ हैं। जो मनुष्य चातुर्मास्यमें नदीस्नान करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। जो झरना, तड़ाग और बावलीमें स्नान करता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पुष्कर, प्रयाग अथवा और किसी महातीर्थके जलमें जो चातुर्मास्यमें स्नान करता है, उसके पुण्यकी संख्या नहीं है। नर्मदा, भास्करक्षेत्र, प्राची सरस्वती तथा समुद्र-संगममें एक दिन भी जो चातुर्मास्यमें स्नान करता है, उसमें पापका लेशमात्र भी नहीं रह जाता। जो नर्मदामें एकाग्रचित्त होकर तीन दिन भी चौमासेका स्नान करता है, उसके पापके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो गोदावरी नदीमें सूर्योदयके समय चौमासेमें पंद्रह दिनतक स्नान करता है, वह कर्मजनित शरीरका परित्याग करके भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। जो मनुष्य तिलमिश्रित एवं आँवलामिश्रित जलसे अथवा बिल्वपत्रके जलसे चातुर्मास्यमें स्नान करता है, उसमें दोषका लेशमात्र भी नहीं रह जाता। देवाधिदेव भगवान् विष्णुके चरणोंके अंगुष्ठसे प्रवाहित होनेवाली गंगाजी सदा ही पापनाशिनी कही गयी हैं। चातुर्मास्यमें उनका यह माहात्म्य विशेषरूपसे प्रकट होता है। भगवान् विष्णु स्मरण करनेपर सहस्रों पाप भस्म कर डालते हैं, इसलिये उनका चरणोदक मस्तकपर चौमासेमें धारण किया जाय तो वह कल्याणकारी होता है। चातुर्मास्यमें भगवान् नारायण जलमें
* ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६४७
शयन करते हैं, अतः उसमें भगवान् विष्णुके तेजका अंश व्याप्त रहता है। उस समय उसमें किया हुआ स्नान सब तीर्थोंसे अधिक फल देनेवाला होता है। नारद! बिना स्नानके जो पुण्यकार्यमय शुभकर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है, उसे राक्षस ग्रहण कर लेते हैं। स्नानसे मनुष्य सत्यको पाता है। स्नान सनातन धर्म है, धर्मसे मोक्षरूप फल पाकर मनुष्य फिर दुःखी नहीं होता^१। रातको और सन्ध्याकालमें बिना ग्रहणके स्नान न करे, गर्म जलसे भी स्नान नहीं करना चाहिये। सूर्यके दर्शनसे सब कर्मोंमें शुद्धि कही गयी है। चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे जलकी शुद्धि होती है। शरीर असमर्थ हो तो भस्मस्नानसे उसकी शुद्धि होती है। मन्त्रस्नानसे, भगवान् विष्णुके चरणोदकसे अथवा भगवान् नारायणके आगे क्षेत्र, तीर्थ और नदी आदिमें जो स्नान करता है, उसका चित्त शुद्ध हो जाता है। चातुर्मास्यमें यह महत्त्व और बढ़ जाता है।
चातुर्मास्यमें भगवान्के शयन करनेपर प्रतिदिन स्नानके अन्तमें श्रद्धायुक्त चित्तसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये। इससे महान् फलकी प्राप्ति होती है। नदियोंके संगममें स्नानके पश्चात् पितरों और देवताओंका तर्पण करके जप, होम आदि कर्म करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। पहले भगवान् गोविन्दका स्मरण करके पीछे शुभकर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये। ये भगवान् गोविन्द ही देवता, पितर और मनुष्य आदिको तृप्ति देनेवाले हैं। चातुर्मास्य सब गुणोंसे उत्कृष्ट समय है। उसमें धर्मयुक्त श्रद्धा एवं स्मृतिसे पवित्र समस्त कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये। सत्संग, ब्राह्मणभक्ति, गुरु, देवता और अग्निका तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दानमें प्रीति—ये सब सदा धर्मके साधन हैं^२। भगवान् विष्णुके शयन करनेपर उक्त धर्मोंका साधन एवं नियम भी महान् फल देनेवाला होता है। दो घड़ी भी भगवान् विष्णुका ध्यान एवं उन निरंजन परमेश्वरके सेवनसे सौ जन्मोंका पाप भस्म हो जाता है। यदि मनुष्य चौमासेमें भक्तिपूर्वक योगके अभ्यासमें तत्पर न हुआ, तो निःसन्देह उसके हाथसे अमृत गिर गया। बुद्धिमान् मनुष्यको सदैव मनको संयममें रखनेका प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि मनके भलीभाँति वशमें होनेसे ही पूर्णतः ज्ञानकी प्राप्ति होती है। यह बात निश्चयपूर्वक कही जा सकती है। अतः क्षमाके द्वारा मनको वशमें करना चाहिये। एकमात्र सत्य ही परम धर्म है, एक सत्य ही परम तप है, केवल सत्य ही परम ज्ञान है और सत्यमें ही धर्मकी प्रतिष्ठा है। अहिंसा धर्मका मूल है, इसलिये उस अहिंसाको मन, वाणी और क्रियाके द्वारा आचरणमें लाना चाहिये^३। पराये धनका अपहरण और चोरी आदि पापकर्म सदा सब मनुष्योंके लिये वर्जित हैं। चातुर्मास्यमें इनसे विशेषरूपसे बचना चाहिये। ब्राह्मण तथा देवताकी सम्पत्तिका विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये। न करने योग्य कर्मोंका आचरण विद्वान् पुरुषोंके
१- स्नानेन सत्यमाप्नोति स्नानं धर्मः सनातनः। धर्मान्मोक्षफलं प्राप्य पुनर्नैवावसीदति॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० १। २५)
२- सत्संगो द्विजभक्तिश्च गुरुदेवाग्नितर्पणम्। गोप्रदानं वेदपाठः सत्क्रिया सत्यभाषणम्॥
गोभक्तिर्दानभक्तिश्च सदा धर्मस्य साधनम्।
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० २। ५-६)
३- सत्यमेकं परो धर्मः सत्यमेकं परं तपः। सत्यमेकं परं ज्ञानं सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः॥
धर्ममूलमहिंसा च मनसा तां च चिन्तयन्। कर्मणा च तथा वाचा तत एतां समाचरेत्॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० २। १८-१९)
६४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लिये सदैव त्याज्य है। नारद! जो सम्पूर्ण कार्योंमें निष्कामभावसे प्रवृत्त होता है, जिसमें अहंबुद्धिका अभाव है, जो बुद्धिके नेत्रोंसे ही देखता है, ऐसा पुरुष ही महाज्ञानी और योगी है। मनुष्योंके शरीरमें यह अहंकार विष है। अतः वह सदैव त्याग देने योग्य है। मनुष्य कामनाके त्यागद्वारा क्रोध और लोभको जीते। ऐसे मनुष्यके सहस्रों पाप उसके शरीरसे निकलकर सहस्रों टुकड़ोंमें नष्ट हो जाते हैं। शान्तिके द्वारा मोह और मनको जीतकर विचारके द्वारा शान्तिभावको अपनाना चाहिये। सन्तोषसे भी शान्तिका उदय होता है। जो अपनी कोमलता एवं सरलताके द्वारा ईर्ष्याभावको दबा देता है, यह मुनीश्वर है। चातुर्मास्यमें जीवदया विशेष धर्म है। प्राणियोंसे द्रोह करना कभी भी धर्म नहीं माना गया है। अतः सदा सब मासोंमें भूतद्रोहका परित्याग करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस भूतद्रोहको सहस्रों पापोंका मूल बताते हैं। इसलिये मनुष्योंको सर्वथा प्रयत्न करके प्राणियोंके प्रति दया करनी चाहिये। सब प्राणियोंके हृदयमें सदा भगवान् विष्णु विराज रहे हैं। जो उन प्राणियोंसे द्रोह करनेवाला है, उसके द्वारा भगवान्का ही तिरस्कार होता है। जिस धर्ममें दया नहीं है, वह दूषित माना गया है। दयाके बिना न विज्ञान होता है, न धर्म होता है और न ज्ञान ही होता है। अतः सब प्राणियोंके प्रति आत्मभाव रखकर सबके ऊपर दया करना सनातन धर्म है, जो सब पुरुषोंके द्वारा सदा सेवन करने योग्य है।
सब धर्मोंमें दानधर्मकी विद्वान् लोग सदा प्रशंसा करते हैं। वेदमें अन्नको ब्रह्म कहा गया है, अन्नमें ही प्राणोंकी प्रतिष्ठा है। अतः मनुष्य सदा अन्न एवं जलका दान करे। जल देनेवाला तृप्तिको और अन्न-दान करनेवाला मनुष्य अक्षय सुखको पाता है। अन्न और जलके समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा। मणि, रत्न, मूँगा, चाँदी, सोना और वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानोंमें भी अन्नदान ही सबसे बढ़कर है^१। चातुर्मास्यमें अन्न और जलका दान, गोदान, प्रतिदिन वेदपाठ और अग्निमें हवन—ये सब महान् फल देनेवाले हैं। यदि भगवान् विष्णुके साथ समागमके लिये वैकुण्ठधाममें जानेकी इच्छा हो, तो सब पापोंके नाशके लिये चौमासेमें अन्नदान करना चाहिये। अन्नदान करनेसे सब प्राणी प्रसन्न होते हैं। देवता भी अन्नदाताकी स्पृहा रखते हैं। गुरु और ब्राह्मणोंको भोजन कराना, घृतदान करना तथा सत्कर्मोंमें संलग्न रहना—ये सब बातें चातुर्मास्यकालमें जिसमें मौजूद हैं, वह साधारण मनुष्य नहीं है। सद्धर्म, सत्कथा, सत्पुरुषोंकी सेवा, संतोंका दर्शन, भगवान् विष्णुका पूजन और दानमें अनुराग—ये सब बातें चौमासेमें दुर्लभ बतायी गयी हैं^२। जो मनुष्य चौमासेमें पितरोंके उद्देश्यसे अन्नदान करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर पितरोंके लोकमें जाता है। उसके अन्नदानसे तृप्त हुए देवतालोग उसे मनोवांछित वस्तु प्रदान करते हैं। चींटी भी उसके घरसे भोजन लेकर जाती है। अन्नदान सबसे उत्तम है, उसका न रातमें निषेध है, न दिनमें। चौमासेमें वह विशेषरूपसे पापोंका नाश करनेवाला है। शत्रुओंको भी अन्न देना मना नहीं है। चौमासेमें दूध, दही एवं मट्ठाका दान
१- अन्नं ब्रह्म इति प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः। तस्मादन्नप्रदो नित्यं वारिदश्च भवेन्नरः॥
वारिदस्तृप्तिमायाति सुखमक्षय्यमन्नदः। वार्यन्नयोः समं दानं न भूतं न भविष्यति॥
मणिरत्नप्रवालानां रूप्यहाटकवाससाम्। अन्येषामपि दानानामन्नदानं विशिष्यते॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ३। २-४)
२- सद्धर्मः सत्कथा चैव सत्सेवा दर्शनं सताम्। विष्णुपूजा रतिर्दाने चातुर्मास्येसुदुर्लभा॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ३। ११)
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६४९
महान् फल देनेवाला होता है। जन्मकालमें जिससे यह शरीर पुष्ट हुआ है, उस अन्न एवं दुग्धका दान उत्तम है। साग देनेवाला मनुष्य न कभी नरकमें जाता है और न यमलोकका दर्शन करता है। वस्त्र देनेवाला प्रलयकालतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। जो चातुर्मास्यमें चन्दन, अगुरु और धूपका दान करता है, वह मनुष्य पुत्र-पौत्रोंसहित विष्णुरूप होता है। भगवान् विष्णुके शयनकालमें जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मणको फल दान करता है, वह यमलोकको नहीं देखता। जो चौमासेमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये विद्यादान, गोदान और भूमिदान करता है, वह अपने पूर्वजोंका उद्धार कर देता है। जो जिस देवताके उद्देश्यसे चौमासेमें गुड़, नमक, तेल, शहद, तिक्त पदार्थ, तिल और अन्न देता है, वह उसीके लोकमें जाता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें मनुष्यको अग्निमें आहुति देनी चाहिये, ब्राह्मणको दान देना चाहिये और गौओंकी भलीभाँति सेवा-पूजा करनी चाहिये। भविष्यमें दान देनेकी प्रतिज्ञा न करके शीघ्र ही दे डालना चाहिये। मनुष्य जो कुछ देनेकी इच्छा करे, वह अवश्य दे डाले। जिसको देनेका निश्चय किया हो उसे ही दे, दूसरेको न दे। दी हुई वस्तु उससे वापस न ले। जो श्रीहरिके शयनकालमें ब्राह्मणोंके लिये सब प्रकारका दान देता है, वह पूर्वजोंसहित अपनेको पापोंसे मुक्त कर लेता है।
चातुर्मास्यमें इष्ट वस्तुके परित्याग तथा नियम-पालनका महत्त्व
ब्रह्माजी कहते हैं—मनुष्य सदा प्रिय वस्तुकी इच्छा करता है। अतः जो चातुर्मास्यमें भगवान् नारायणकी प्रीतिके लिये अपने प्रिय भोगोंका पूर्ण प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षयरूपमें प्राप्त होती हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रिय वस्तुका त्याग करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है। धातुपात्रोंका त्याग करके पलाशके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। गृहस्थ मनुष्य ताँबेके पात्रमें कदापि भोजन न करे। चौमासेमें तो ताँबेके पात्रमें भोजन विशेषरूपसे त्याज्य है। मदारके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य अनुपम फलको पाता है। चातुर्मास्यमें विशेषतः वटके पत्रमें भोजन करना चाहिये। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये गृहस्थ-आश्रमका परित्याग करके बाह्य आश्रमका सेवन करनेवाले मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता। मिर्च छोड़नेसे राजा होता है, रेशमी वस्त्रोंके त्यागसे अक्षय सुख मिलता है, उड़द और चना छोड़ देनेसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती। चातुर्मास्यमें विशेषतः काले रंगका वस्त्र त्याग देना चाहिये। नीले वस्त्रको देख लेनेसे जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यनारायणके दर्शनसे होती है। कुसुम्भ रंगके परित्याग करनेसे मनुष्य यमराजको नहीं देखता। केशरके त्यागसे वह राजाका प्रिय होता है। फूलोंको छोड़नेसे मनुष्य ज्ञानी होता है, शय्याका परित्याग करनेसे महान् सुखकी प्राप्ति होती है। असत्यभाषणके त्यागसे मोक्षका दरवाजा खुल जाता है। चातुर्मास्यमें परनिन्दाका विशेषरूपसे परित्याग करे। पर-निन्दा महान् पाप है, पर-निन्दा महान् भय है, पर-निन्दा महान् दुःख है और पर-निन्दासे बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है*। पर-निन्दाको सुननेवाला भी पापी होता है। चौमासेमें केशोंका संँवारना (हजामत)
* परनिन्दा महापापं परनिन्दा महाभयम्। परनिन्दा महद्दुःखं न तस्याः पातकं परम् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ४। २५)
६५०
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण * त्याग दे तो वह तीनों तापोंसे रहित होता है। जो भगवान्के शयन करनेपर विशेषतः नख और रोम धारण किये रहता है, उसे प्रतिदिन गंगास्नानका फल मिलता है। मनुष्यको सब उपायोंद्वारा योगियोंके ध्येय भगवान् विष्णुको ही प्रसन्न करना चाहिये। समस्त वर्णों एवं श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा भी भगवान् श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये। भगवान् विष्णुके नामसे मनुष्य घोर बन्धनसे मुक्त हो जाता है। चातुर्मास्यमें उनका विशेषरूपसे स्मरण करना उचित है। कर्ककी संक्रान्तिके दिन भगवान् विष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करके प्रशस्त एवं शुभ जामुनके फलोंसे अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्य देते समय इस भावका चिन्तन करे - 'छः महीनेके भीतर जहाँ कहीं भी मेरी मृत्यु हो जाय तो मानो मैंने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् वासुदेवके चरणोंमें ही समर्पित कर दिया।' सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् जनार्दनका सेवन करना चाहिये। जो मनुष्य भगवान् विष्णुकी कथा, पूजा, ध्यान और नमस्कार सब कुछ उन्हीं श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये करता है, वह मोक्षका भागी होता है* । सत्यस्वरूप सनातन विष्णु वर्णाश्रम धर्मके स्वरूप हैं। जन्म- मृत्यु आदिके कष्टका उन्हींके द्वारा नाश होता है। अतः चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे व्रतद्वारा श्रीहरिको ही ग्रहण करना चाहिये। तपोनिधि भगवान् नारायणके शयन करनेपर अपने इस शरीरको तपस्याद्वारा शुद्ध करना चाहिये। भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त जो व्रत है, उसे विष्णुव्रत जानो। धर्ममें संलग्न होना तप है। व्रतोंमें सबसे उत्तम व्रत है - ब्रह्मचर्यका पालन । ब्रह्मचर्य तपस्याका सार है और ब्रह्मचर्य महान् फल देनेवाला है। इसलिये समस्त कर्मोंमें ब्रह्मचर्यको बढ़ावे। ब्रह्मचर्यके प्रभावसे उग्र तपस्या होती है। ब्रह्मचर्यसे बढ़कर धर्मका उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषतः चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके शयन करनेपर यह महान् व्रत संसारमें अधिक गुणकारक है - ऐसा जानो। जो इस वैष्णवधर्मका पालन करता है, वह कभी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता। भगवान्के शयन करनेपर जो यह प्रतिज्ञा करके कि - 'हे भगवन् ! मैं आपकी प्रसन्नताके लिये अमुक सत्कर्म करूँगा।' उसका पालन करता है, तो उसीको व्रत कहते हैं। वह व्रत अधिक गुणोंवाला होता है। अग्निहोत्र, ब्राह्मणभक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, विष्णुपूजा, सत्यभाषण, हृदयमें दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्रमें अनुराग, वेदपाठ, चोरीका त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम, लोभ, क्रोध और मोहका अभाव, इन्द्रियसंयममें प्रेम, वैदिक कर्मोंका उत्तम ज्ञान तथा श्रीकृष्णको अपने चित्तका समर्पण - ये नियम जिस पुरुषमें स्थिर हैं, वह जीवन्मुक्त कहा गया है। वह पातकोंसे कभी लिप्त नहीं होता। एक बारका किया हुआ व्रत भी सदैव महान् फल देनेवाला होता है। चातुर्मास्यमें ब्रह्मचर्य आदिका सेवन अधिक फलद होता है। चातुर्मास्यव्रतका अनुष्ठान सभी वर्णके लोगोंके लिये महान् फलदायक है। व्रतके सेवनमें लगे हुए मनुष्योंद्वारा सर्वत्र भगवान् विष्णुका दर्शन होता है। चातुर्मास्य आनेपर व्रतका यत्नपूर्वक पालन करे। विष्णु, ब्राह्मण और अग्निस্বরূপ तीर्थका सेवन करे। चारों वेदमय स्वरूपवाले अजन्मा विराट् पुरुषको भजे, जिनके प्रसादसे मनुष्य मोक्षरूपी महान् वृक्षके ऊपर चढ़ जाता है और कभी सन्तापको नहीं प्राप्त होता।
* विष्णोः कथा विष्णुपूजा ध्यानं विष्णोर्नतिस्तथा। सर्वमेव हरिप्रीत्या यः करोति स मुक्तिभाक् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ५।७-८)
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* ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६५१
चातुर्मास्यमें विशेष-विशेष तप और भगवान्की षोडशोपचार पूजाका क्रम
ब्रह्माजी कहते हैं—षोडशोपचारसे सदैव भगवान् विष्णुकी पूजा करना तप है और भगवान्के शयन करनेपर वही महातप कहा गया है। इसी प्रकार सदा पंचयज्ञोंका अनुष्ठान भी तप है; परंतु चातुर्मास्यमें श्रीहरिको निवेदन करनेपर वही महातप हो जाता है। ऋतुकालमें स्त्रीके साथ सम्बन्ध करना गृहस्थके लिये सदा ही तप माना गया है, किंतु वही चातुर्मास्यमें श्रीहरिकी प्रीतिके लिये किया जाय तो महातप है। सदा सत्य बोलना तप है। यह भूतलपर निवास करनेवाले प्राणियोंके लिये दुर्लभ तप कहा गया है। देवेश्वर श्रीहरिके शयन करनेपर यह सत्यभाषणरूपी तपस्या करनेवाला मनुष्य अनन्त फलका भागी होता है। अहिंसा आदि गुणोंका पालन करना सदा ही तप है; किंतु चातुर्मास्यमें वैरभावका परित्याग करके उसका पालन किया जाय तो वह महातप कहा गया है। पंचायतन पूजा महातप है। मनुष्य चातुर्मास्यमें श्रीहरिकी प्रीतिके लिये इस महातपका विशेषरूपसे अनुष्ठान करे। सभी पर्वोंके अवसरपर सदा दान देना चाहिये, यह तप है; परंतु चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे उसका पालन करनेपर वह दान अनन्त होता है।
चौमासेमें दो प्रकारका शौच ग्रहण करना चाहिये। एक बाह्य शौच और दूसरा आन्तरिक शौच। जलसे नहाना-धोना बाह्य शौच कहलाता है और श्रद्धासे अन्तःकरणको शुद्ध करना आन्तरिक शौच है। इन्द्रियोंका निग्रह करना चाहिये। यह तपस्याका उत्तम लक्षण है। किंतु चातुर्मास्यमें इन्द्रियोंकी चंचलता दूर हो तो वह महातप कहा गया है। इन्द्रियरूपी घोड़ोंको काबूमें रखकर मनुष्य सदा सुख पाता है। वे इन्द्रियरूपी अश्व जब कुमार्गसे चलने लगते हैं, तब जीवको नरकमें गिराते हैं। यह काम महान् शत्रु है। इस एकको ही दृढ़तापूर्वक जीते। जिन महात्माओंने कामको जीत लिया है, उन्होंने सम्पूर्ण जगत्पर विजय पा ली है। काम और संकल्पपर विजय पा लेना ही तपस्याका मूल है। वही सबसे उत्तम ज्ञान है जिसके द्वारा कामको जीत लिया जाय। लोभ सदा त्याग देनेयोग्य है; क्योंकि लोभमें पापकी स्थिति है। लोभको जीत लेना ही तप है। चातुर्मास्यमें इसका विशेष महत्त्व है। मोहका अर्थ है अविवेक। वह सदा त्याग देनेयोग्य है। जो मोहसे रहित है, वही ज्ञानी है। मनुष्योंके शरीरमें रहनेवाला मद ही महान् शत्रु है। यों तो सदा ही, किंतु चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे उसका निग्रह करना चाहिये। मान बड़ा भयंकर शत्रु है। वह सब प्राणियोंके भीतर निवास करता है। उसे क्षमाद्वारा जीतना चाहिये। चातुर्मास्यमें उसे जीतना अधिक गुणकारी होता है। मात्सर्य (ईर्ष्या) भी महान् पातकका कारण है। अतः विद्वान् पुरुष चातुर्मास्यमें उसको जीते। जिसने उसे जीत लिया, उसने तीनों लोक जीत लिये। अहंकारके वशीभूत हुए अजितेन्द्रिय मुनि धर्ममार्गको छोड़कर कुमार्गके कर्म करने लगते हैं। अतः अहंकारका परित्याग करके मनुष्य सदैव सुख पाता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें अहंकारके त्यागका महान् फल है। यह तपस्याका मूल है। जो मनुष्य विष्णुके शयनकालमें प्रतिदिन एक समय भोजन करता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल मिलता है। जो मनुष्य चातुर्मास्यमें प्रतिमास नित्य चान्द्रायणव्रत करता है, उसके पुण्यका वर्णन नहीं किया जा सकता। जो भगवान् विष्णुके शयनकालमें कृच्छ्र व्रतका सेवन करता
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है, वह पापराशिका नाश करके वैकुण्ठमें भगवान्का पार्षद होता है। जो चातुर्मास्यमें केवल दूध पीकर रहता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं। यदि धीर पुरुष चौमासेमें नित्य परिमित अन्नका भोजन करता है, तो वह सब पातकोंका नाश करके वैकुण्ठधाम पाता है। चौमासेमें एक अन्न भोजन करनेवाला मनुष्य रोगी नहीं होता। जो क्षार लवणका सेवन करनेवाला नहीं है, उसमें पापका अभाव हो जाता है। चौमासेमें भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये फलाहार करनेवाला मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो कन्द-मूलका आहार करता है, वह अपने साथ पूर्वजोंका भी घोर नरकसे उद्धार करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो प्रतिदिन चौमासेमें केवल जल पीकर रहता है, उसे रोज-रोज अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य चौमासेमें श्रीहरिकी प्रीतिके लिये शीत और वर्षा सहन करता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान् जगन्नाथ उसे अपने-आपको दे डालते हैं। जो मन-ही-मन भगवान् नारायणका चिन्तन करके इस परम पवित्र और पापकी शुद्धिके हेतुभूत पुराणको सुनता अथवा पढ़ता है, वह मरकर मोक्षको प्राप्त होता है।
**नारदजीने पूछा—**प्रजापते! सोलह उपचारोंसे किस प्रकार भगवान्की पूजा की जाती है?
**ब्रह्माजीने कहा—**वेदों और शास्त्रोंके विधानके अनुसार भगवान् विष्णुकी भक्ति दृढ़ करनी चाहिये। यह सब जो कुछ दिखायी देता है, सबका मूल वेद है और वेद सनातन भगवान् विष्णुका स्वरूप है। वेदोंके आधार हैं ब्राह्मण तथा ब्राह्मणोंके देवता अग्नि हैं। अग्निमें आहुति डालनेवाला ब्राह्मण यज्ञमें सदा भगवान् श्रीहरिका यजन करता हुआ तथा श्रीविष्णुकी पूजामें निरन्तर संलग्न रहता हुआ सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है। भगवान् नारायणका स्मरण और ध्यान क्लेश, दुःख आदिका नाश करनेवाला है। चातुर्मास्यमें भगवान् श्रीहरि जलमें विशेषरूपसे व्याप्त रहते हैं। जलसे अन्न पैदा होता है, जिससे जगत्की तृप्ति होती है। वह अन्न भगवान् विष्णुके शरीरके अंशसे उत्पन्न होता है। अन्नको 'ब्रह्म' कहते हैं। वह अन्न आवाहनपूर्वक भगवान् विष्णुको समर्पण करके मनुष्य पुनर्जन्म, वृद्धता और क्लेशके संस्कारोंद्वारा तिरस्कृत नहीं होता। 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' इत्यादि जो सोलह ऋचाओंवाला यजुर्वेदका महासूक्त है, वह सर्वोत्कृष्ट नारायणमय है। उसके पाठमात्रसे भी ब्रह्महत्या दूर हो जाती है। ब्राह्मणको उचित है कि वह पहले स्मृतियोंमें बतायी हुई विधिके अनुसार अपने शरीरमें उक्त सोलह सूक्तोंका न्यास करे। तत्पश्चात् भगवान्की प्रतिमा अथवा शालग्रामशिलामें विशेषरूपसे न्यास करे। फिर क्रमशः आवाहन आदि करे। वैकुण्ठधाममें विराजमान, कौस्तुभमणिसे सुशोभित, कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी, दण्डधारी, शिखासूत्रसे सुशोभित पीताम्बरधारी-रूपसे भगवान् विष्णुका आवाहन करके ध्यान करे। सब पापोंके समूहका नाश करनेवाले श्रीविष्णुको इस रूपमें अपने ध्यानमें स्थिर करके उन्हें पूजाके लिये अपने आगे आवाहन करे। पुरुषसूक्तकी प्रथम ऋचा 'सहस्रशीर्षा पुरुषः' इत्यादि मन्त्रके आदिमें ॐकार जोड़कर उसका उच्चारण करे और उसीके द्वारा भगवान्का आवाहन करे। इसी प्रकार दूसरी ऋचा 'पुरुष एवेदम्' इत्यादिसे पार्षदोंसहित श्रीहरिको आसन समर्पित करे। वे सभी आसन सुवर्णमय हैं, ऐसा मन-ही-मन चिन्तन करे। भक्तियोगसे चिन्तन करनेपर वह परिपूर्ण होता है। फिर तीसरी ऋचासे पाद्य समर्पण करे और उसमें गंगाजीका स्मरण करे। उसके बाद सरिताओं तथा सातों समुद्रोंके जलसे जगदीश भगवान् विष्णुको अर्घ्य दे। सरिताओं और सागरोंका चिन्तनमात्र करना