सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
१०४ | सौंदर्य लहरी
पर आकर ३।। कुण्डलाकृति सर्पिणीवत् सो जाती है। कुल का अर्थ शक्ति समझना चाहिये और कुण्ड से उसके रहने का कुंड सदृश स्थान समझना चाहिये। कुहरिणी का अर्थ कुहर अर्थात् बिल में रहने वाली है। कुहर बिल, छिद्र अथवा रंध्र को कहते हैं। नाडियों द्वारा प्रपंच का सींचे जाने का संबन्ध छःओं चक्रों के द्वारा होने के कारण रसाम्नायमहसा का अर्थ जैसा हमने किया है उचित प्रतीत होता है। रस पद से छः और आम्नाय पद से 'मार्ग' अर्थ लेने से यह अर्थ किया गया है। आम्नाय का अर्थ मार्ग दिखाने वाले वेद, और गुरु परम्परा गत संप्रदायोपदेश हैं। और महस् का अर्थ उत्सव और तेज दोनों है (महस्तूत्सवतेजसोः, इति अमरः) इसलिये पूरे पद का तृतीयांत अर्थ छः तेजोमय आम्नायों के द्वारा, अथवा रस (अमृत) से पूर्ण तेजोमय आम्नाय द्वारा होगा, पंचमी विभक्ति में 'द्वारा' की जगह 'से' लगाना पड़ेगा। आम्नाय से चाहे चन्द्र अथवा चक्र समझा जा सकता है। महस् का अर्थ उत्सव भी किया जा सकता, उस पर्याय में शक्ति का शिव के योग से अमृत सिंचन रूपी उत्सव समझना चाहिये। तांत्रिक पद्धति के अनुसार उपासना के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्द्ध और वाम छः आम्नाय हैं, उन सबका फल शक्ति का जागरण होकर समाधि प्राप्त करना ही है। उक्त आम्नाय गुरु परम्परागत उपदेश से जानने चाहिये।
सौंदर्य लहरी १०२
श्रीचक्र
अगले श्लोक में श्रीचक्र का निरूपण करके बहिर्याग का संकेत है।
(११)
चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पंचभिरपि
प्रभिन्नाभिः शंभोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः ।
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल कलाश्र त्रिवलय–
त्रिरेखाभिः सार्ध तव शरण (भवन) कोणाःपरिणताः
**नोटः—**कोष्ठकों में पाठान्तर दिया गया है ।
**अर्थः—**चार श्रीकंठ और पांच शिवयुवतियां, इन ९ मूल प्रकृतियों से तेरे रहने के ४३ त्रिकोण बनते हैं, जो शंभु के विन्दुस्थान से भिन्न हैं । वे तीन वृत्तों (circles) और तीन रेखाओं सहित ८ और १६ दलों से युक्त हैं ।
**सं० टि०—**यहां बहिर्याग का वर्णन है। श्रीचक्र के बनाने के तीन भेद होते हैं, मेरु, कैलाश और भूः । तीन भेदों मे शक्तियों के स्थानों और पूजन विधि में अन्तर है। मेरु श्रीचक्र में उसका १६ नित्या कलाओं से, कैलाश के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसको ८ मातृका शक्तियों से और भूः के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसे ८ वशिनी-देवियों से संबंधित चक्र समझा जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा है कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता
१०६ | सौंदर्य लहरी
से कुण्डलिनी का जागरण करके सहस्रार में शक्ति को उठाया था। इससे विदित होता है कि यह वैदिक मार्ग है।
श्रीचक्र ब्रह्मांड और पिण्ड दोनों का प्रतीक होता है, इसकी रचना ४ श्रीकंठ अर्थात् शिव त्रिकोण और ५ शिवयुवति अर्थात् शक्ति त्रिकोणों के योग से होती है। शिव और शक्ति त्रिकोणों का मुख एक दूसरे के विपरीत रहता है, जैसे ⧖। सृष्टि क्रम में ५ शक्ति त्रिकोण ऊर्ध्वमुख होते हैं और ४ शिव त्रिकोण अधोमुख और अप्यय क्रम में शक्ति त्रिकोण अधोमुख और शिव त्रिकोण ऊर्ध्वमुख रखे जाते हैं। प्रथम केन्द्रीय त्रिकोण को जिसके केन्द्र में शंभु का स्थान है, छोड़ कर शेष त्रिकोणों की संख्या ४२ हैं। इसलिये त्रयश्चत्वारिंशत् पाठ ठीक है। प्रथम मध्य त्रिकोण के बाहर चारों ओर दूसरे नंबर पर ८ कोण बनते हैं, उसको अष्टकोण कहते हैं, फिर तीसरे और चौथे स्तर पर दस २ कोण बनते हैं उन्हें अन्तर्दशार और बहिर्दशार कहते हैं, उनके ऊपर १४ कोण बनते हैं, उनको चतुर्दशार कहते हैं। सबका योग १+८+१०+१०+१४ = ४३ होता है। मध्य केन्द्रीय बिन्दु शंभु का स्थान है जो प्रकृति स्वरूप ९ त्रिकोणों के योग से रचित पूरे चक्र से पृथक् अर्थात् असंग है। उक्त ४३ कोणों के चक्र के बाहर प्रथम वृत्त (circle) पर अष्ट दल पद्म और उसके बाहर दूसरे वृत्त पर षोडश-दलपद्म हैं, षोडशदलपद्म तीन वृत्तों से घिरा है। सबके बाहर तीन रेखाओं का चतुष्कोण है, जिसे भूगृह कहते हैं। भूगृह की चारों भुजाएं बराबर हैं और चारों दिशाओं में ४ द्वार होते हैं। इस श्लोक में द्वारों का उल्लेख नहीं किया गया है।
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सौंदर्य लहरी | १०७
३६ तत्व जिनका वर्णन हम ऊपर प्रथम श्लोक के नीचे कर आये हैं, सप्त धातुओं सहित ४३ हो जाते हैं। सात धातुओं के नाम ये हैं—रक्त, मांस, मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा और शुक्र।
५ शिवयुवतियां शान्त्यातीतादि ५ कलायें अथवा शक्ति, शुद्धविद्या, माया, कला और अशुद्धविद्या हैं और ४ श्रीकंठ, सदारव्य, महेश्वर, महत्तत्व और पुरुष (जीव) हैं अथवा पुरुष, अव्यक्त, महत् और अहंकार ४ श्रीकंठ हैं, जिनके साथ शब्दस्पर्शादि ५ तन्मात्रायें शिवयुवतियां माननी पडेंगी।
गीता में भगवान ने नवधा प्रकृति का वर्णन किया है, एक जीव-भूता परा प्रकृति और अष्टधा अपरा प्रकृति। वहां आकाशादि से ५ तन्मात्रा और मन, बुद्धि, अहंकार से समष्टि अहंकार, महत् और अव्यक्त क्रमशः समझना चाहिये। देखें गीता अध्याय ७ के श्लोक ४, ५ पर शंकर भाष्य।
श्रीचक्र के उपरोक्त क्रम से ९ विभाग किये जाते हैं, जिनमें विन्दु प्रथम है और मध्यस्थ त्रिकोण दूसरा इत्यादि और प्रत्येक विभाग को आवरण कहते हैं। श्रीचक्र का विशेष विवरण साथ दिये हुए विवरण पत्र (chart) पर देखें।
| श्री चक्र निर्माण की विधि | यह विधि सौन्दर्य लहरी के भाष्यकार कैवल्य शर्मा के मतानुसार है। श्री चक्र मनुष्य देह का प्रतीक है और मनुष्य देह का माप अपनी अंगुलियों के नाप से ९६ अंगुल प्रमाण होता है। इसलिये श्री चक्र का माप भी ९६ इकाइयों पर रखा जाता है। एक ८ इंच |
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१०८ सौन्दर्य लहरी
लंबी भुजाओं वाला समचतुष्कोण लो, उसके बीचोंबीच में एक खडी रेखा खेंचो, जो चतुष्कोण को दो सम भागों में विभक्त करती हो। उस रेखा के प्रति इंच के १२ विभाग के अनुपात से ९६ सम विभाग करलो। इस चतुष्कोण के भीतर एक एक विभाग छोडकर दो वैसे ही सम चतुष्कोण और बनाओ, इन तीन चतुष्कोणों का भूगृह नामक त्रैलोक्य मोहन चक्र कहलाता है। चारों दिशाओं में मध्य में एक एक द्वार खोल देना चाहिये। अब उस मध्यवर्ती खडी रेखा के मध्य विन्दु को केन्द्र मानकर ४५, ४४ ३/८, ४४, ३५ और २४ विभागों के बराबर अर्धव्यास मानकर पांच वलयाकार वृत्त ( circles ) खेंचो। सब से अन्दर के वृत्त पर अष्ट दल पद्म और उसके ऊपर वाले वृत्त पर षोडषदल पद्म बनाओ। बीच के शेष वर्तुलाकार क्षेत्र में ५ उर्ध्व त्रिकोण और ४ अधस्त्रिकोण बनाने से पूरा श्री चक्र बन जाता है। इन ९ त्रिकोणों का निर्माण इस प्रकार किया जाता है। मध्य रेखा पर ऊपर से नीचे की ओर ६, ६, ६, ३, ४, ३, ३, ५, और ६ विभागों के अन्तर पर ९ चिन्ह बनालो। जिनको हम यहां पर कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै, से नामांकित करते हैं। इन चिन्हों पर ऊर्ध्व रेखा पर सम कोण बनाने वाली और अन्तर्वृत्त ( innermost circle ) के १० खंड करने वाली कोटि रेखायें ( chordlines ) खैंचो। उन के नाम भी क्रमशः कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै वाली रेखाएं समझना चाहिये। फिर उन रेखाओं के दोनों सिरों पर से नीचेबताए हिसाब से दोनों ओर सम भाग मिटा दो। कै और पै रेखाओं का ५/१६ भाग दोनों सिरों पर अर्थात पूरी रेखा
श्रीचक्रम्
(श्रीचक्र का रेखाचित्र)
सृष्टियोगेन चक्रमिदम्
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सौंदर्य लहरी १०९
का १/८ भाग मिटाना है। गै रेखा के सिरों पर से ५/८८ वां और र्द रेखा के सिरों से ७/३२ भाग, जैं और र्ड रेखाओं के सिरों पर से ३/८ भाग और टें रेखा के सिरों पर से ३/८ भाग मिटा दो, चै और तैं रेखाएं पूरी रहेंगी। खडी रेखा पर कं बिन्दु के ६ विभाग ऊपर वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को स मानों और पें बिन्दु से ६ विभाग नीचे वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को ह मानो। ह को चै वाली रेखा के सिरों को मिलाने से चौथा श्रीकंठ (शिव-त्रिकोण) बनता है, पें बिन्दु को गै रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से तीसरा, र्द बिन्दु को जैं रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से दूसरा, और तैं बिन्दु को कें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम श्रीकंठ बनता है। इसी प्रकार जैं बिन्दु को पें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम शक्ति त्रिकोण, चै बिन्दु को टें रेखा के सिरों को मिलाने से दूसरा, गै बिन्दु को र्ड रेखा से मिलाने से तीसरा, कें बिन्दु को र्द रेखा से मिलाने से चौथा और स बिन्दु को तैं रेखा से मिलाने से पांचवां शक्ति त्रिकोण बनता है।
उक्त ९ त्रिकोणों को बनाने का क्रम इस प्रकार होना चाहिये, जिससे मध्य त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, और चतुर्दशार चक्रों का निर्माण क्रमशः सामने आता जाय।
पहिले प्रथम शक्ति त्रिकोण बनाओ, फिर दूसरा शक्ति त्रिकोण बनाने से मध्य त्रिकोण स्पष्ट दिखने लगता है। वैसे तो वह प्रथम शक्ति त्रिकोण के बनने से ही टें रेखा के ऊपर दिखने लगता है दूसरे शक्ति त्रिकोण की उसे अपेक्षा नहीं है। फिर प्रथम शिव
११० | सौन्दर्य लहरी
त्रिकोण बनाओ, तीनों के योग से अष्टार स्पष्ट बन जाता है । फिर तीसरा शक्ति और दूसरा शिव त्रिकोण बनाने से अन्तर्दशार बन जाता है, फिर चौथा शक्ति और तीसरा शिव त्रिकोण बनाने से बहिर्दशार और फिर पांचवां शक्ति और चौथा शिव त्रिकोण बनाने से चतुर्दशार बन जाता है । यह सृष्टि क्रम है जिसमें शिव के त्रिकोण नीचे को उतरते हैं और शक्ति त्रिकोण ऊपर को चढते हैं अर्थात् शिव त्रिकोणों का मुख नीचे की ओर और शक्ति त्रिकोणों का मुख ऊपर की ओर होता है । इसके विपरीत जब शिव के त्रिकोण ऊपर चढते हैं और शक्ति त्रिकोण नीचे को उतरते हैं, उसे लय क्रम समझना चाहिये । क्योंकि शिव त्रिकोण उर्ध्वमुख और शक्ति त्रिकोण अधोमुख हो जाते हैं । यह क्रम बाह्य उपासना में ग्रहण किया जाता है, परन्तु अन्तरुपासना में जब शक्ति मूलाधार से सहस्रार में चढती है तो लय क्रम होता है क्योंकि तब शिव भाव की वृद्धि होती है और जब शक्ति नीचे उतरती है तब जीव भाव की वृद्धि होती है, इसलिये यह प्रभव क्रम है ।
भगवती का सौंदर्य कल्पनातीत है
ऊपर के दो श्लोकों में भगवती का अन्तः और बाह्य ध्यान पूजन बताया गया है । आज्ञा चक्र के ऊपर अमृत की वर्षा करती हुई ज्योतिर्मयी भगवती का ध्यान करते समय देवी के सौंदर्य की कल्पना का वर्णन इस श्लोक में है । परन्तु वह वैखरी बाणी का विषय नहीं,
सौन्दर्य लहरी १११
कवियों की कल्पना के बाहर का विषय है; इस भाव को प्रकट करने के लिये भगवत्पाद कहते हैं कि:—
[ १२ ]
त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चि प्रभृतयः । यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥
अर्थ:— हे हिमगिरि सुते ! तेरे सौन्दर्य की तुलना करने को ब्रह्मा प्रभृति कवीन्द्र भी कुछ कुछ कल्पना किया करते हैं । तेरे सौन्दर्य को देखकर स्वर्ग की अप्सराएं ध्यानस्थ हो जाती हैं और अनेक तपश्चर्या से भी कठिनता से प्राप्त होने वाली शिवसायुज्य पदवी को सहज प्राप्त कर लेती हैं ।
सं० टि०:— यहां आनन्द लहरी के सौन्दर्य के चिन्तन से शिव-सायुज्य पदवी की प्राप्ति कही गई है ! साधक को अपने अधिकारा-नुसार बहिर्याग और अन्तर्याग द्वारा भगवती को प्रसन्न करना चाहिये । बहिर्याग का फल अन्तर्याग है और अन्तर्याग द्वारा शिव-सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति होती है । क्योंकि सहस्रार में शिव शक्ति का ऐक्य होने पर परंपद की उपलब्धि कही गई है ।
११२ | सौंदर्य लहरी
हिमाचल की कन्या का वर्ण भी हिमवत् स्वच्छ होना चाहिये । हिम में शीतलता रहती है और प्रकाश भी । चन्द्रमा में भी शीतल प्रकाश होने के कारण उसे अमृत बरसाने वाला कहा जाता है । इसी प्रकार भगवती का स्वरूप सुधामयी ज्योति के सदृश है । अमृत को प्रकाशमान् समझना चाहिये ।
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधातं ।
तद्वात्मतत्वं प्रसमीक्ष्यदेही एकः कृतार्थो भवते वीत शोकः ॥
(श्वे. २, १४)
अर्थः— मिट्टी से लिपे हुए, तेजोमय अमृत सदृश चमकते हुए शीतल बिंबवत् आत्म तत्व को देखकर देहाभिमानी जीव ब्रह्म से एकता प्राप्त करके कृतार्थ और वीत शोक हो जाता है ।
ब्रह्मा सृष्टि के कर्ता हैं, इसलिये सर्व प्रथम कवि हैं, चारों मुखों से वेदों का गान करते हैं, इसलिये सब कवियों में श्रेष्ठ हैं । वे भी भगवती के सौन्दर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके, अन्य कवि इसलिये कुछ-२ कल्पना किया करते हैं। यदि अप्सराओं की उपमा दी जाय तो वे भी तो भगवती के रूप को उत्सुकता से देखकर ध्यान मग्न होकर समाधिस्थ हो जाती हैं । भाव यह भी है कि भगवती के सौन्दर्य की कल्पना करने से समाधि लग सकती है ।
सौंदर्य लहरी ११३
काय सम्पत् सिद्धि
अगले श्लोक में यह दिखाया गया है कि कुंडलिनी के जागरणोपरान्त अमृत सिंचन स्वरूप भगवती की कृपा से शारीरिक कल्प हो जाता है। अर्थात् वृद्ध मनुष्य भी युवा हो जाता है।
[ १३ ]
नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात्त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥
कठीन शब्दों का अर्थ:— नर्म=क्रीडा, विस्रस्त=गलित, कांची=मेखला ।
अर्थ:— वयोवृद्ध, देखने में कुरूप, क्रीडा में जड मनुष्य भी तेरी दृष्टि के पडने मात्र से ऐसा रमणीय हो जाता है कि सैकड़ों युवतियां उसके पीछे भागने लगती हैं, जिनके बेणी के बन्ध खुल गये हैं, कुच कलशों पर से चोली फट गई है, जिनकी मेखला हटात् टूट गई हैं और जिनकी साड़ी शरीर से उतरी जा रही हैं।
सं० टि०:— यहां काम कला ईं की ओर संकेत है ।
११४ | सौंदर्य लहरी
शक्ति जागरण से काय संपत् विभूति भी प्राप्त हो सकती है, जो षट चक्र बेध द्वारा पंच महा भूत जय होने पर होती है। रूप, लावण्य, बल, और शरीर का वज्रवत संगठित होना काय संपत् कहलाता है। देखे योग दर्शन (३, ४५-५६)। भूत जय से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति भी होती है। अणिमादि सिद्धियों का श्री चक्र के सब से बाह्य चतुष्कोण पर स्थान दिखाया जाता है और इन सिद्धियों का फल भी युवावस्था की एक गौण सिद्धि है। प्रत्येक नाडी में अमृत का संचार होने का फलस्वरूप ही यह काय संपत् है। श्लोक १० में प्रपंचं सिञ्चन्ती पद में अमृत से प्रत्येक नाडी का भर जाना दिखाया गया है, जिससे देह दिव्य हो जाता है। वह मनुष्य उर्द्धू रेता हो जाता है, उसके शरीर की glands में रसोत्पादन की शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि शरीरस्थ निर्माण शक्ति का ह्रास बन्द हो जाता है। उसके स्नायुओं में जीवन शक्ति संचार करने लगती है, और सातों धातुओं का पुनः निर्माण होने लगता है। ज्ञानेश्वरी के छठे अध्याय में कुण्डलिनी जागरण से शारीरिक कल्प होने की बात इन शब्दों में कही गई है—
“तब अवयवों की कान्ति की शोभा ऐसी दिखाई देती है कि मानों वह स्फटिक का ही हो, अथवा संध्या काल के आकाश के रंग निकालकर उनका ही वह शरीर बनाया गया हो, अथवा आत्म ज्योति का लिंग ही स्वच्छ किया रखा हो इत्यादि। कुण्डलिनी जब चन्द्रामृत पीती है, तब ऐसा शरीर हो जाता है, कृतान्त भी उस देहाकृति से भय खाता है, वार्धक्य पीछे हटता है, यौवन की गांठ खुल जाती है, और लुप्त हुई बालदशा फिर प्रकट होती है। इत्यादि।”
सौंदर्य लहरी १२७
तत्त्वों की किरणें
[ १४ ]
क्षितौ षट्पंचाशद्द्विसमधिकपंचाशदुदके हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपंचाशदनिले दिवि द्विःषट्त्रिंशन्मनसि च चतुःषष्टिरिति ये मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥
अर्थः— पृथिवी में ५६, जल में ५२, अग्नि में ६२, वायु में ५४, आकाश में ७२, और मन में ६४ मयूखा अर्थात् रश्मियों के ऊपर, हे देवि ! तेरे दोनों चरण कमल हैं ।
सं० टि० मातृका न्यास में छःओं चक्रों का न्यास हंसः सहित उक्त किरणों से संबंधित अक्षरों से किया जाता है ।
उक्त किरणें छः चक्रों से संबंध रखने वाले तत्त्वों की किरणें हैं, और भगवती के चरण युगल सब के ऊपर होने का अभिप्राय यह है कि वे आज्ञा चक्र के ऊपर बिराजते हैं । उक्त किरणों में आधी शिवात्मिका और आधी शक्त्यात्मिका हैं, अर्थात् दो दो के जोडें से पृथिवी में २८, जल में २६, अग्नि में ३१, वायु में २७, आकाश में ३६ और मन में ३२ किरणों के जोडे हैं । सब का योग ३६० है, जो चान्द्र वर्ष के अनुसार एक वर्ष की ३६० तिथियों से उपमित की जाती हैं। प्रत्येक पक्ष की १५ तिथियों को १५ नित्या कहते हैं। श्री चक्रस्थ षोडश दल की गुप्ततर योगिनियां नित्या कहलाती हैं ।
११६ | सौंदर्य लहरी
नवम श्लोक में कहे अनुसार चक्रों के बेध के साथ तत्वों का भी वेध होना कहा गया है। और तत्वों के बेध से उन पर जय प्राप्त की जाती है, जिसको योग दर्शन में भूतजय, मनोजय और प्रकृतिजय कहा गया है।
भूतजय, इन्द्रियजय और मनो जय के साधन विभूति पाद के ४४, ४७, और ४८ सूत्रों में बताए गये हैं। स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व पर संयम करने से भूत जय होता है। विशेष धर्मी को प्रथम स्थूल और सामान्य धर्मी को दूसरा स्वरूप तन्मात्राओं को सूक्ष्म, अर्थात तीसरा रूप और तीनों गुणों का अन्वय उनका कारण रूप और उनके भोग और अपवर्ग के लिये उपयोगिता का ज्ञान, इन ५ स्तरों पर संयम अर्थात् धारणा ध्यान समाधि करने से प्रत्येक भूत का जय प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार इन्द्रियों की ग्रहण शक्ति, स्वरूप, अस्मिता (अहं की सूक्ष्म कारण वृत्ति,) अन्वय (तीनों गुणों से संबंध) और अर्थवत्त्व पर संयम करने से इन्द्रियों का जय होता है। इन्द्रियों के जय से मनोजय और क्रमशः प्रकृतिजय किया जाता है। यह राजयोग का साधन क्रम है। इस श्लोक में ५ भूतों और मन के स्थूल, सूक्ष्म आदि क्रम से व्यतिरेक स्वरूप पृथक्करण (analysis) को रश्मियों की संख्या द्वारा दिखाया गया है। सब तत्वों के द्विविध भेद ईडा और पिंगला गत भेद हैं। ईडा से संबंध रखने वाली किरणें चन्द्रमा अथवा शक्ति की किरणें और पिंगला से संबंध रखने वाली प्राण की किरणें, सूर्य अथवा शिव की किरणें हैं। इन को स्त्रीलिंग और पुंलिंग वाचक भी कह सकते हैं। सुषुम्ना में दोनों
सौंदर्य लहरी ११७
का योग हो जाता है। सब किरणों को सुषुम्ना पथ में, कार्य को कारण में लीन करते हुए, भगवती के चरणों तक पहुंचा जाता है, अर्थात् आज्ञा चक्र के ऊपर जाया जाता है। जैसा कि श्लोक में कहा है कि भगवती के दोनों चरण सब किरणों का अतिक्रमण कर के सब के ऊपर स्थित हैं।
किरणों का संबंध तत्वों से, वर्ण माला से और उनके अधिष्ठातृ शक्तियों से त्रिविध जानना चाहिये।
किरणों का तत्वों से सम्बन्ध
पृथिवी की ५६ किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति, महत्, और पुरुष। इनका योग २८ है और शिव शक्ति भेद से ५६।
जल किरणें:— ५ महाभूत, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य और मन। इनका योग २६ है और शिव शक्ति भेद से ५२।
अग्नि की किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रायें, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य और मन, सब का योग ३१ है, शिव शक्ति भेद से ६२।
वायु की किरणें: — ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति और पुरुष। इनका योग २७ है, शिव शक्ति भेद से ५४।
आकाश की किरणें:—सब ३६ तत्व, शिव शक्ति भेद से ७२
११८ सौंदर्य लहरी
मन की किरणें:— प्रथम ४ शुद्ध तत्व अर्थात् शिव, शक्ति, सदाख्य और महेश्वर को छोड़कर शेष ३२ । शिव शक्ति भेद से ६४ ।
किरणों का वर्ण-माला से सम्बन्ध — विश्व के प्रस्तार में नाम और रूप अथवा वाचक और वाच्य अथवा शब्द और अर्थ भेद से, दो स्तर हैं। अर्थ भेद से ५ कलाएं, ३६ तत्व, और १४ भुवन हैं। कलाओं और तत्वों के नाम ऊपर दिये जा चुके हैं, १४ भुवन के उपभेद २२४ किये जाते हैं, इन २२४ भुवनों के नाम स्थानाभाव से यहां नहीं दिये जाते ! शब्द भेद से ५१ वर्ण, ८१ पद और ११ मंत्र से सारे विश्व का प्रस्तार है । ३ लिंग (पुं, स्त्री, नपुंसक,) ३ पुरुष (उत्तम, मध्यम और अन्य,) ३ वचन (एक, द्वि और बहु) और ३ काल (भूत, वर्तमान, और भविष्य ) के परस्पर योग से ३x३x३x३=८१ प्रकार के पद होते हैं, और ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां और अन्तःकरण के एकादशविध व्यापारों की सिद्धियों के लिये ११ प्रकार के मंत्र हैं, उनके ११ देवता ११ रुद्र हैं। इसलिये उक्त ३६० किरणों का मातृका (वर्ण माला) से संबंध है और प्रत्येक किरण का पृथक पृथक देवता है । उनका संबंध नीचे दिया जाता है ।
मातृकाओं का तत्वों से संबंध:—
पृथिवी की ५६ किरणें = ५० मातृका + ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ।
जल की ५२ किरणें = ५० मातृका + सौं श्रीं ।
अग्नि की ६२ किरणें = ५० मातृका + औ औ औ औ, हं सः हं सः हं सः हं सः ।
सौंदर्य लहरी ११ ९
वायु की ५४ किरणें = ५० मातृका + यं रं लं वं । आकाशकी ७२ किरणें = अ ५ बार,.......औ ५ बार = १४ × ५ = ७० + ऐं ह्रीं ।
मन की ६४ किरणें = अ वर्ग चार बार = १६ × ४ = ६४ ।
एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ।
आग्नेया व्यापकाः सर्वे सोम सूर्याग्नि देवताः ॥
( शा. नि. २.२ )
तत्वात्मानः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुषो मतः ।
व्यापका दशते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥ (२. ४)
विन्दु पुमान्रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः ।
स्वराणां मध्यमं यच्च चतुस्रं तच्च नपुंसकम् ॥ २. ६
पिंगलायां स्थिता ह्रस्वा ईडायां संगताः परे ।
सुषुम्नायां मध्यगाज्ञेया श्रत्वारो ये नपुंसकाः ॥ २. ७
वाय्वग्निभूजलाकाशाः पंचाशल्लिपयः क्रमात् ।
पंचह्रस्वाः पंचदीर्घाविन्द्रन्ताः संधिसंभवाः ।
क्रमादयः पंचशः ष क्ष ळ स हान्ताः प्रकीर्तिताः ॥ २. ९