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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ
१६६सौंदर्य लहरी

कठिन शब्दः— जहि= (ओहाक् त्यागे) त्यागें, बचें ।

अर्थः— शंकर को अकस्मात् अपने भवन में आते देख खडी होकर स्वागतार्थ आगे बढने पर तेरी परिचारिकाओं की इन उक्तियों की जय है कि ‘सामने ब्रह्मा के मुकुट से बचें,’ ‘कैटभ के मारने वाले विष्णु के कठोर मुकुट से ठोकर लगेगी,’ ‘जम्भारि इन्द्र के मुकुट से बचकर चलें ।’

सं०टि० भाव यह है कि सब देव भगवती को सदा साष्टांग प्रणाम किया करते हैं।

**व्याख्या—**अभिप्राय यह है कि एक दिन जब भगवती को इन्द्र ब्रह्मा और विष्णु प्रणाम कर रहे थे, तब अकस्मात् शंकर आगये, पति का स्वागत करने जब भगवती उठीं, तो उनकी परिचारिकायें कहने लगीं कि ब्रह्मा इन्द्र और विष्णु के मुकुटों से ठोकर न लगे, इसलिये उन से बचकर चलिये ।

विष्णु भगवान को मधुसूदन और कैटभारि भी कहते हैं क्योंकि

कैटभ भिद् — मधु और कैटभ दो राक्षस उनके कान के मैल से उत्पन्न हो गये थे । वे जब ब्रह्माजी को खाने लपके ब्रह्माजी ने भगवान को शेष शय्या पर सोते देखकर भगवती की प्रार्थना की । प्रार्थना से प्रसन्न होकर नारायण के नेत्रों में निवास करने वाली महामाया ने भगवानको जगा दिया, तब भगवान ने दोनों राक्षसों का बध किया, और नाभि से उत्पन्न हुए कमल पर बैठे ब्रह्माजी को भय से मुक्त किया । उपरोक्त आख्यायिका में नारायण आध्यात्म भाव है

सौंदर्य लहरी १६७

और शेष भगवान विराट की कुण्डलिनी वत् आधार शक्ति। नारायण को सुलाने वाली निद्रा देवी महासुप्ति स्वरूपा बीजशक्ति है। पद्म जो नाभि से निकलता है वह स्पन्दस्वरूपा रजोगुण की विमर्ष शक्ति है, और ब्रह्मदेव स्वयं शब्दब्रह्म स्वरूप प्रणव है। ब्रह्मदेव को विराट के प्राण और बुद्धि समझना चाहिये। प्रणव का प्रथम स्वरूप ध्वन्यात्मक होता है फिर शब्दों का रूप धारण कर के वेदों के रूप में व्यक्त होने लगता है। वेदों के शब्दों से फिर उनके वाच्य अर्थ स्वरूप रूपात्मिका सृष्टि का प्रसार होने लगता है। शब्द से विराट ब्रह्माण्ड का श्रोत्र, श्रोत्र से आकाश, और आकाश से स्थूल शब्दों का संबंध है। विराट् भगवान के कानों से आकाश की उत्पत्ति कही गई है, कानों का मैल शब्दब्रह्म रूपी ब्रह्मदेव को खाने के लिये उद्यत नाद का आवरण है, जो निद्रा के कारण जम गया है, और जिससे मधु और कैटभ दो राक्षसों की उत्पत्ति बताई जाती है। आलस्य प्रमादादि की मादकता को मधु कह सकते हैं, और ज्ञान के ऊपर आवरण डालने वाले भ्रांति विक्षेपादि को कैटभ कह सकते हैं। कैटभ का अर्थ कीटवत् आभा वाला किया जा सकता है। कान के मैल को भी कीट कह सकते हैं, कीट का अर्थ कीड़ा भी होता है। अर्थात् कैटभ वह प्रकाश है जो मलावृत्त होने के कारण भ्रांति उत्पन्न करता है, अथवा उसका प्रकाश कीटाणु सदृश है। ये दोनों ज्ञान के महानशत्रु हैं। भगवान जागकर अर्थात् अध्यात्म जागृति होने पर दोनों का नाश होता है। दुर्गा सप्तशति में इस समय ब्रह्मदेव से की गई भगवती की प्रार्थना पढने योग्य है, जो विषयान्तर भय से यहां नहीं दी जाती।

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शक्ति के जागते ही शंकर से मिलने की आतुरता में सहस्रार पर चढते समय नीचे के चक्रों पर प्रणाम करते हुए ब्रह्मा विष्णु और इन्द्र के मुकुटों से उसको ठोकर लगने की आशंका सूचक परिचारिकाओं की उपरोक्त उक्तियां स्वाभाविक ही हैं। मूलाधार में ब्रह्मा का स्थान है और तत् सम्बन्धी पृथ्वी तत्व का स्वामी इन्द्र है, स्वाधिष्ठान में विष्णु का स्थान है। ये दोनों चक्र अन्धकारमय माने जाते हैं देखें श्लोक ३२, ३३ की व्याख्या में 'षोडशी विज्ञान' का विषय पृष्ठ १८३। अन्धेरे में ठोकर लगने की सम्भावना रहती है। अर्थात् साधक की शक्ति उन्नेय पथ पर इस मण्डल में रुक कर ठिठकनी नहीं चाहिये । श्लोक ९ में बताये गये चक्रों के वेधक्रम और ४१ वें श्लोकोक्त समयाचार की व्याख्या भी इस सम्बन्ध में ध्यान में रखने योग्य है। कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर शिवभाव का प्रादुर्भाव होना साधकों के अनुभव की बात है। परिचारिकाओं का विभिन्न चक्रों की योगिनीओं से अभिप्राय हो सकता है।

ब्रह्म भाव

( ३० )

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाऽऽद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥

कठिन शब्दः—घृणि=किरण, संवर्ताग्नि=प्रलयाग्नि, नीराजन=आरती

सौंदर्य लहरी १६९

अर्थ:— हे सेवा करने के योग्य वरेण्ये, नित्ये ! अपने देह से निकलने वाली अणिमादि सिद्धियों रूपी किरणों से घिरा हुआ तेरा भक्त जो 'त्वां अहम्' अर्थात् तुझको अपना ही रूप मानकर सदा भावना करता है, त्रिनयन की समृद्धि को भी तृणवत् तुच्छ समझने वाले उस साधक की संवर्ताग्नि आरती उतारता है, इसमें क्या आश्चर्य है ?

सं० टि० ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति । ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है, वह प्रलय में भी क्षोभ नहीं पाता, मानो संवर्ताग्नि का जलना उसकी आरती उतारने के सदृश है ।

जिस योगी ने सारूप्य मुक्ति प्राप्त करली है, और भगवती में स्वभाव से रहने वाली अणिमादि सिद्धियों युक्त ब्रह्म तेज की किरणें जिसके शरीरसे फूट २ कर निकलने लगी हैं, उस योगी को अहम् ब्रह्मास्मि भाव के उदय होने की चरम दशा में तीसरा दिव्य ज्ञाननेत्र खुल जाने से जो समृद्धि प्राप्त होती है, उसको भी वह सायुज्य मुक्ति के सामने तुच्छ समझने लगता है । देखें योग दर्शन सूत्र (३,५०) 'तद्वैराग्यादपि दोष बीज क्षये कैवल्यम्'। अर्थात् सर्वज्ञता और सर्व शक्तिमत्ता से भी वैराग्य होने से सब दोषों के बीज रूपी वासना के क्षय होने पर कैवल्य पद की प्राप्ति होती है ।

'नित्ये' पद से संबोधन करने का अभिप्राय यह है कि योगी सर्वाशा परिपूरक षोडशार चक्रस्थ कामाकर्षिणी आदि १६ नित्या कलाओं को जीत कर नित्य मोक्ष पद की प्राप्ति की इच्छा रखता

१३० | सौंदर्य लहरी


है क्यों कि भगवती की आराधना का फल महावाक्यात्मक ब्रह्मात्मैक्य अपरोक्षानुभूति का उदय होनाही है ।

सर्वकर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परि समाप्यते । (गीता)

६४ तंत्रों से भगवती का तंत्र स्वतंत्र है

[ ३१ ]

चतुः षष्ट्यातन्त्रैः सकलमति(भि)संधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना—
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥

अर्थः— पशुपति शंकर ने ६४ तंत्रों से सारे भुवन को भरकर, जो अपनी २ उन सिद्धियों के देने वाले हैं जो प्रत्येक का अपना विषय है, फिर तत्पश्चात् तेरे आग्रह से सब पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाले स्वतंत्र तेरे तंत्र को भूतल पर उतारा ।

सं० टि० भगवती का तंत्र अर्थात् श्री विद्या का तंत्र स्वतंत्र है और सब तंत्र गौण हैं । भगवती के तंत्र से कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर सहस्रार में ले जाया जाता है, परन्तु अन्य सब तंत्र धर्म, अर्थ, और काम की ही सिद्धि दे सकते हैं । भगवती का तंत्र चारों पदार्थ देता है ।

सौंदर्य लहरी १७१


तंत्र

सनातन धर्म में उपासना की पद्धति वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक तीन प्रकार की है। तथापि द्विजों के लिये मिश्रित पद्धति काम में लाई जाती है, जो द्विज नहीं हैं उनको वेदों का अधिकार नहीं दिया गया है, वे तांत्रिक और पौराणिक उपासनाओं में ही दीक्षित किये जाते हैं। तांत्रिक उपासना के दो भेद हो गए हैं-- समयाचार और कौलाचार, जिनको दक्षिण और वाम मार्ग भी कहते हैं। ब्राह्मणों के लिये कौलाचार निषिद्ध है, क्योंकि उसमें पंचमकार अर्थात् मांस, मदिरा, मत्स्य, मैथुन और मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। वामाचार के कारण ही साधारण जनता की दृष्टि में सारी तांत्रिक उपासना बदनाम हो रही है। यद्यपि पंचमकारों का आध्यात्मिक अर्थ भी किया जाता है, जैसे मदिरा से सोमपान, मैथुन से शिवशक्ति का सहस्रार में योग, इत्यादि; और कुलार्णव तंत्र में स्पष्टतया उनका निषेध कराने के लिये साधकों को चेतावनी दी गयी है कि इनका प्रयोग करने वाला मनुष्य नर्कगामी होता है। परन्तु तो भी यह निर्विवाद मानना पड़ता है कि सब साधक आध्यात्मिक दृष्टि वाले नहीं होते। प्रायः अधिक मनुष्यों का लक्ष्य सांसारिक भोगों की उपलब्धि तक ही सीमित रहता है। उक्त ६४ तंत्रों में ऐसी ही सिद्धियां प्राप्त करने के साधन हैं, जो सच्चे जिज्ञासु को पथभ्रष्ट कर सकते हैं। श्री अरविन्दजी इस विषय पर कल्याण के ‘शक्ति अंक’ में पृष्ठ ३२ पर प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं कि “विशेषकर तंत्र के वाम मार्ग में ऐसी २ बातें आ गई हैं, जिनसे न केवल अच्छे बुरे का, पापपुण्य का कोई विचार न रहा प्रत्युत पाप पुण्यादि द्वंद्वों के स्थान में स्वभाव नियत सद्धर्म की स्थापना होने के बजाय

१७२सौन्दर्य लहरी

अनियंत्रित कामाचार, असंयत सामाजिक व्यभिचार दुराचार का मानो एक पंथ ही बन गया--तथापि मूलतः तंत्र एक बडी चीज थी, बडी बलवती योग पद्धति थी।........इसके दक्षिण और वाम दोनों ही मार्ग एक बडी गंभीर अनुभूति के फल थे......एक है ज्ञान का मार्ग और दूसरा आनन्द का मार्ग।”

एक मत यह भी है कि कौलाचार अथवा वाम मार्ग बहिर्पूजा का साधन है और समयाचार अथवा दक्षिण मार्ग भावना प्रधान धारणा ध्यान समाधि युक्त अन्तर्याग रूपी योग साधन और मनन निदिध्यासन पूर्वक ब्रह्म भावना का साधन है। बहिर्पूजा कर्म प्रधान होती है, और अन्तर्पूजा भावना प्रधान। इसलिये निकृष्ट श्रेणि के अधिकारियों को बहिर्पूजा में दीक्षित किया जाता है और उत्तम अधिकारियों को अन्तर्पूजा में। परन्तु मध्यम श्रेणि के साधकों को दोनों का आश्रय लेना पडता है, वे क्रमशः जैसे २ उनकी अन्तर्गति दृढ होती जाती है शनैः २ कर्म काण्ड से हटते जाते हैं।

इस श्लोक में ६४ तंत्रों का उल्लेख है, परन्तु भगवती ने देखा कि उनसे श्रेय की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये उन्होंने शंकर से श्रेय की प्राप्ति का साधन बताने का अनुरोध किया, तब शंकर ने समयाचार का साधन कहा, जो पूर्वोक्त ६४ तंत्रों से पृथक है। वह भगवती के आग्रह पर श्रेय की जिज्ञासा रखने वालों के कल्याणार्थ कहे जाने के कारण, शंकराचार्य भगवत्पाद ने उसको भगवती का अपना स्वतंत्र तंत्र कहकर संकेत किया है, अर्थात् ‘तेरा तंत्र’ कहा है। शंकर भगवत्पाद उसे लोक हितार्थ सौन्दर्य लहरी में प्रकाशित करते हैं। यह तंत्र सब तंत्रों से स्वतंत्र है।

सौंदर्य लहरी १७३

अन्य ६४ तंत्र अनेक सिद्धियों के विषय हैं, परन्तु यह तंत्र श्रेयस् का देने वाला है, और मोक्ष के साथ धर्म अर्थ काम की भी सिद्धि देने के कारण अन्य सब तंत्रों की अपेक्षा नही रखता । इस तंत्र में श्री विद्या का रहस्य बताया गया है, जो स्वयं महा त्रिपुर सुन्दरी का स्वरूप है । यह बात अगले दो श्लोकों से स्पष्ट हो जाती है ।

श्री विद्या को चन्द्रकला विद्या भी कहते हैं, क्योंकि चन्द्रमा की १६ कलाओं के अनुरूप षोडशी में भी १६ अक्षर हैं, और १६ नित्या कला हैं। इसको, ब्रह्म विद्या ही जानना चाहिये । इस विषय पर चन्द्रकला, ज्योतिष्मती, कला निधि, कुलार्णव, कुलेश्वरी, भुवनेश्वरी, वार्हस्पत्य, और दुर्वासा मत मुख्य ग्रंथ हैं । इसी प्रकार समयाचार पर वशिष्ट, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और शुकदेवजी विरचित शुभागम पंचक भी हैं ।

६४ तंत्रों के नाम

६४ तंत्रों के नाम ये हैं—(१) महामाया शंवर नाम का मोहन तंत्र, (२) योगिनीजाल शंबर, (३) तत्व शंबर, तत्वों में संकरण करने की विद्या, (४) सिद्ध भैरव, (५) वटुक भैरव, (६) कंकाल-भैरव, (७) काल भैरव, (८) कालाग्नि भैरव, (९) योगिनी भैरव, (१०) महा भैरव, (११) शक्ति भैरव, उक्त ८ भैरव तंत्र कापालिकों के तंत्र हैं । इनमें अनेक सिद्धियों का वर्णन है जैसा भूतल के नीचे धन देखना इत्यादि । (१२) ब्राह्मी, (१३) माहेश्वरी, (१४) कौमारी, (१५) वैष्णवी, (१६) वाराही, (१७) माहेन्द्री, (१८) चामुण्डा, (१९) शिवदूती, इन ८ तंत्रों को बहुरूपाष्टक कहते हैं;

१७४ | सौंदर्य लहरी

इनमें उक्त शक्तियों की उपासना है। (२०) ब्रह्म यामल, (२१) विष्णु यामल, (२२) रुद्र यामल, (२३) लक्ष्मी यामल, (२४) उमा यामल, (२५) स्कन्द यामल, (२६) गणेश यामल, (२७) जयद्रथ यामल, ये आठ काम सिद्ध यामल तंत्र हैं। (२८) चंद्र-ज्ञान (२९) मालिनी विद्या-समुद्रों को पार करने की विद्या, (३०) महासंमोहन, (३१) वामजुष्ठ, (३२) महादेव, (३३) वातुल, (३४) वातुलोत्तर, (३५) कामिक, (३६) हृद्भेद तंत्र, वामाचार द्वारा षड्चक्रवेध, (३७) तन्त्र भेद, (३८) गुह्य तंत्र, (३९) कला-वाद, (४०) कलासार, (४१) कुंडिका मंत, (४२) मतोत्तर, पारद विज्ञान का तंत्र, (४३) वीणाख्य-यक्षिणी का तंत्र, (४४) त्र्रोतल, जादू तावीज इत्यादिका तंत्र, (४५) त्र्रोतलोत्तर-६४ हजार यक्षिणियों को आवाहन करने की विद्या । (४६) पंचामृत-आयुदीर्घ करने का विज्ञान, (४७) रूपभेद, (४८) भूतोड्डामर (४९) कुलसार, (५०) कुलोड्डीश, (५१) कुलचूडामणि, इन सब में मारण उच्चाटन प्रयोग हैं। (५२) सर्वज्ञानोत्तर, (५३) महा कालीमत, (५४) अरूणेश, (५५) मोदिनी ईशा, (५६) विकुण्ठेश्वर-ये ५ तंत्र दिगंवरों के हैं। (५७) पूर्व आम्नाय, (५८) पश्चिम आम्नाय, (५९) दक्षिण आम्नाय, (६०) उत्तर आम्नाय, (६१) निरुत्तर आम्नाय, (६२) विमल, (६३) विमलोत्तर, और (६४) देवीमत, ये क्षपणकों के तंत्र हैं। यह नामावली वामकेश्वर तंत्र में है। भास्करराय के मतानुसार ४ से ११ तक भैरवाष्टक को एक ही तंत्र माना गया है, और (३१, ३२) वामजुष्ठ और महादेव दोनों को एक तंत्र माना गया है इसलिये नीचे दिये हुए आठ और तंत्रों सहित ६४ की संख्या पूरी की जाती है। उनके नाम ये हैं (१) महालक्ष्मी मत, (२)

सौंदर्य लहरी १७५


सिद्ध योगेश्वरी मत (३) कुरुपिका मत, (४) देवरूपिका मत, (५) सर्ववीर मत, (६) विमला मत, (७) ज्ञानार्णव और (८) वीरावलि ।

हादि और कादि विद्याओं के रूप

[ ३२ ]

शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥

[ ३३ ]

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
(जपंति) भजंति त्वां चिन्तामणिगुणनिबद्धाक्षव(र)लयाः
शिवाऽग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराऽऽहुतिशतैः ॥

अर्थ— हे जननि ! शिव, शक्ति, काम, क्षिति और फिर रवि, शीतकिरण (चन्द्र), स्मर (काम), हंस, शक्र, इसके पीछे परा (शक्ति), मार (काम), हरि, इन तीनों के अन्त में ३ हृल्लेखा जोडकर तेरे नाम के अवयव स्वरूप अक्षरों का साधक जन भजन करते हैं । (३२)

१७६सौन्दर्य लहरी

यह हादि लोपा मुद्रा का मंत्र बताया गया है । इसके १५ अक्षर हैं ।

अर्थः— हे नित्ये ! स्मर, (काम), योनि (त्रिकोण), लक्ष्मी इन तीनों को तेरे मंत्र के आदि (अक्षरों के स्थान) पर रखकर निरवधि महा भोग के रसिक तेरे कुछ भक्त, चिन्तामणियों की गुंथी हुई अक्ष माला पर तेरा भजन करते हैं, और शिवा (त्रिकोण) अग्नि हवन कुण्ड में सुरभि (गाय) के घी की सैकड़ों धाराओं की आहुतियां देते हैं । (३३)

यह कादि मूल विद्या का मंत्र है ।

स०टि० दोनों श्लोकों में हादि कादि विद्याओं के मंत्र बताये गये हैं। देखे त्रिपुरोपनिषद् (परिशिष्ट) ऋचा ८ । शिवाग्नि=कुण्डलिनी का मुख, घी=अमृत, चिन्तामणि=चित्कला, गुण=सत्व, रज, तम, निरवधि- महाभोगरसिकाः=भोग और मोक्ष दोनो की इच्छा रखने वाले ।

व्याख्याः— षोडशी का १६ वां अक्षर गुरु मुख से जानना चाहिये । मंत्र के चार पाद होते हैं, प्रथम तीन पाद तीन कूट वाग्भवव, कामकला, और शक्ति कूट के नामों से प्रसिद्ध हैं, चौथा पाद श्रीकूट है। प्रथम तीन पादों को अग्नि, सूर्य और चन्द्र; विष्णु ब्रह्मा और रुद्र की क्रमशः क्रिया, इच्छा और ज्ञान शक्तियां; जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के अनुरूप विश्व, तैजस् और प्राज्ञ; सत्व, रजस् और तमस् समझना चाहिये । चौथा पाद तुरीय पद है । बाह्य

सौंदर्य लहरी १७७


उपासना में ऋषि, छंद, देवता विनियोग इत्यादि की आवश्यकता रहती है, परन्तु अन्तर्याग में केवल आत्म तत्व पर ही लक्ष्य रहता है। देखें भासकर राय का वरिवस्यारहस्य ।

त्रिपुरोपनिषद् में दोनों विद्याओं का संकेत निम्न श्रुतियों द्वारा किया गया है। वहां दोनों का क्रम सौन्दर्य लहरी के क्रम से विपरीत है, वहां पहिले कादि मूल विद्या बताकर उससे लोपा मुद्रा का निर्माण किया गया है, यहां लोपा मुद्रा पहिले कहकर उससे मूल विद्या का निर्माण किया गया है।

कादि मूल विद्या को बताने वाली श्रुति यह है: —

कामोयोनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाअ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमाताऽऽदि विद्या ॥ (८)

और लोपा मुद्रा (हादि विद्या) का इससे निर्माण करने के लिये नीचे वाली श्रुति है।

षष्ट सप्तममथ बहिसारथिमस्या मूलत्रिकमादेशयन्तः । (९)
अर्थ देखें परिशिष्ट (२)

दोनों श्लोकों में पञ्चदशी के दोनों रूप हैं। दूसरे श्लोक में 'एके' पद के प्रयोग से, जिससे अन्य मतावलंबी साधक जन अभिप्रेत हैं, यह प्रतीत होता है कि श्री शंकर भगवत्पाद स्वयं प्रथम श्लोक में बताये हुए मंत्र के उपासक थे। और यह ही बात

१७८ सौंदर्य लहरी


इससे भी सिद्ध होती है कि वे लोग जो दूसरे श्लोकोक्त मंत्र की उपासना करते हैं, जप के पश्चात् दशांश आहुति भी देते हैं, और वे कभी समाप्त न होने वाली भोगों की इच्छा से सकाम अनुष्ठान किया करते हैं, जैसा कि 'निरवधि महाभोग रसिकाः' पद से स्पष्ट है। शंकर भगवत्पाद एक सन्यासी थे, उनने दारेष्णा, वित्तेष्णा और लोकेष्णा तीनों का त्याग किया हुआ था, अग्नि का स्पर्श भी नहीं करते थे, और कर्म काण्ड का सर्वथा त्याग किया हुआ था; इस लिये वे प्रथम श्लोकोक्त भावना प्रधान विद्या के ही उपासक थे। अर्थात् प्रथम श्लोक में सन्यासियों के लिये लोपा मुद्रा हादि विद्या का मंत्र बताया गया है। और दूसरे में सब प्रयोगों की सिद्धि देने वाले कादि विद्या के मंत्र का वर्णन है। यह ही बात त्रिपुरोपनिषद् से भी स्पष्ट है। देखें परिशिष्ट (२) श्रुतियां ८, ९, १०, ११, और १२। श्लोक ८ की व्याख्या में हम यह भी दिखा चुके हैं कि आनन्द लहरी पद का भी संकेत हादि विद्या की ही ओर है।

भगवती की उपासना भोग और मोक्ष दोनों देती है। भोगों में आसक्त गृहस्थियों के लिये कादि विद्या की सपर्या पद्धति, जो श्री चक्र के पूजन न्यास और बहिरनुष्ठानों से संयुक्त है, आणवी दीक्षा द्वारा दी जाती है। कर्म काण्ड का उपयोग कामनाओं की तृप्ति मात्र नहीं है, वरन सब भोगों को भगवती के चरणों में समर्पण कर के अन्तःकरण की शुद्धि के लिये है। सकाम अनुष्ठानों से कामनाओं की पूर्ति अवश्य होती है, परन्तु यह मंत्रशास्त्र का गौण फल है। कहा है— 'मननात् त्रायते इति मंत्रम्....'

सौंदर्य लहरी १७९.


मननात् प्राणनाच्चैव मद्रूपस्यावबोधनात् ।
मंत्रमित्युच्यते ब्रह्मन् मदधिष्ठानतोपिवा ॥ यो०शि०(२,७)

शिवजी ब्रह्माजी से कहते हैं कि मनन किये जाने के कारण, प्राणों का उत्थान करने के कारण, मेरे रूप का ज्ञान उत्पन्न करने के कारण अथवा मेरा अधिष्ठान होने के कारण मंत्र मंत्र कहलाता है।

मंत्र के जप से कुण्डलिनि शक्ति का जागरण होता है, शक्ति के जागरण से आत्मज्ञान का उदय होता है, इसलिये मंत्र को देवता का अधिष्ठान कहा गया है। शक्ति दीक्षा से शक्ति का जागरण होने पर मंत्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग चारों का विकास होता देखा जाता है। इसलिये शक्ति जागरण को ही महायोग कहते हैं।

मंत्रो लयोहठो राजयोगोऽन्तर्भूमिकाः क्रमात् ।
एक एव चतुर्धायं महायोगोऽभिधीयते ॥ यो०शि० (१,१२९)

मंत्र के प्राप्त करने पर उक्त चारों भूमिकाएं उदय होती हैं। आणवी दीक्षा में मंत्र का उपदेश करके शिष्य को श्रीचक्र पर भगवती की सपर्यापद्धति के अनुसार पूजन विधि बताई जाती है। शक्ति दीक्षा में गुरु शिष्य के सिर पर स्पर्श करके शक्ति जागृत करता है। तीसरी शांभवी दीक्षा में ब्रह्मात्मैक्य भाव में शिष्य को ले जाया जाकर उसको महावाक्यों का उपदेश दिया जाता है। इस विषय के सम्बन्ध में श्री विद्या पर लिखित नित्योत्सव ग्रंथ में दीक्षा प्रकरण देखें।

१८० | सौंदर्य लहरी

पंचदशी और उसके आधार पर अन्य विद्याएं

श्री विद्या का मंत्र १५ अक्षरों का होने के कारण उसे पंचदशी भी कहते हैं, उसमें एक १६ वां बीज लगा देने से वह ही षोडशी विद्या बन जाती है । प्रथम ५ अक्षरों को वाग्भवकूट, बीच के ६ अक्षरों को कामकला कूट और अन्तिम ४ अक्षरों को शक्ति कूट कहते हैं । कादि विद्या मूल विद्या है, उसके आधार पर अगस्त्य मुनि की पत्नि लोपामुद्रा, दुर्वासा, कुबेर, चन्द्र, नन्दि, मनु, अगस्त्य, सूर्य, षडानन, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, यमराज, इन्द्र और कामदेव सबने अपने २ इष्ट के अनुसार मूल विद्या को भिन्न २ विद्याओं का रूप दिया, और वे विद्याएं उस २ देवता या ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हैं । कामदेव ने मूलकादि विद्या की ही उपासना की थी । इन विद्याओं को त्रैलोक्य मोहन कवच से जाना जा सकता है ।

चिन्तामणि गुणनिवद्धांक्षवलयाः— सकाम प्रयोगों की शीघ्र सिद्धि के लिये, माला का भी जिस पर जप किया जाता है संस्कार करना आवश्यक है ।

माला का विधान

माला की संस्कार विधि अक्षमालोपनिषद् में दी हुई है । तद्नुसार मेरु अर्थात् शिखामणि पर अनुस्वार सहित क्षकार और दोनों ओर के पचास २ मणियों पर अकार से ळकार पर्यंत सानुनासिक एकाक्षरी मंत्रों की प्रतिष्ठा करनी पडती है । इस प्रकार वर्णमाला के ५१ वर्ण रूपी चिन्तामणियों की गुणनिवद्धा अर्थात् सत्व, रजोगुण और तमोगुण रूपी डोरों के प्रतीक विवर में सुवर्ण, दक्षिण ओर चान्दी, और बाम ओर ताम्र के तारों में गूंथी हुई माला लेनी चाहिये ।

सौंदर्य लहरी १८१


माला के लिये प्रवाल, मोती, स्फटिक, शंख, सोना, चांदी, चन्दन, पुत्र जीविक (जीयापोता), कमलगट्टा, और रुद्राक्ष में से किसी प्रकार के मणिके लिये जा सकते हैं। माला को गंध और पंचगव्य से स्नान कराकर अष्टगंध से लेपकर, अक्षत् पुष्पादि से पूजन करके, अ से क्ष पर्यन्त चिन्तामणियों की उक्त उपनिषदुक्त मंत्रों से भावना-युक्त प्रतिष्ठा करनी चाहिये। देखें अक्षमालोपनिषद्।

श्लोक ११ की व्याख्या में श्री चक्र का रहस्य समझाया जा चुका है। मंत्र का यंत्र से संबंध है पहिले मंत्र का स्वरूप समझना आवश्यक है, फिर मंत्र, यंत्र (श्री चक्र), षट् चक्र, मातृका और ब्रह्माण्ड पिण्ड का पारस्परिक संबंध समझा जा सकेगा।

षोडशी विज्ञान

मंत्र के तीन कूट हैं और १५ अक्षर हैं, सोलहवां अक्षर गुरुमुख से लेकर वह ही मंत्र षोडशी मंत्र बन जाता है। प्रथम *वाग्भव कूट अग्नेय भगवती का मुख है। दूसरा काम कला कूट सूर्य से संबंध रखता है, वह शक्ति का कण्ठ से नीचे कटि पर्यंत रूप है। दोनों के बीच में हृल्लेखा ब्रह्म ग्रंथि है। तीसरा शक्ति कूट चन्द्र से संबंधित कटिके नीचे का भाग है, वह सर्जन शक्ति का रूप है। दूसरे और तीसरे कूट के बीच की हृल्लेखा विष्णु ग्रंथि है।


*श्रीमद्वाग्भव कूटैकस्वरूप मुखपंकजा ।
कण्ठाधः कटिपर्यन्त मध्यकूट स्वरूपिणी ॥
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभाग धारिणी ।
मूलमंत्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ॥
ललिता सहस्रनाम (८५, ८६, ८७, )

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चौथा पाद एकाक्षरी लक्ष्मी बीज है जो गुरु मुख से ही प्राप्त किया जाना चाहिये। इसको चन्द्रकला कहते हैं। इसके और तीसरे शक्ति कूट के बीच की हृल्लेखा रुद्र ग्रंथि है। १६ अक्षरों का यह मंत्र षोडशी विद्या के नाम से प्रसिद्ध है। १६ अक्षरों को १६ नित्या समझना चाहिये। वास्तव में अन्तिम एकाक्षरी लक्ष्मी बीज ही नित्या है, क्योंकि वह परा कला है, और उसके कारण ही समस्त विद्या श्री विद्या कहलाती है। यह शुद्ध चिति शक्ति स्वरूपा सहस्रारस्थ चन्द्र की १६ वीं कला है, जो विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर प्रतिबिंबित हुआ करती है। प्रथम कला का प्रकाश पूर्व से आरम्भ होकर १६ वीं कला का ईशान पूर्व कोण के पत्र पर समझना चाहिये। सोलहवीं कला के आधीन ही अन्य कलाएं घटती बढती हैं, वे स्वतंत्र नहीं हैं। इस लिये इस विद्या का नाम श्री विद्या पडा है। शुक्ल और कृष्णपक्ष की १४ तिथियां, पूर्णिमा और अमावस्या सहित १६ चन्द्र कलाएं कहलाती हैं। ये सब कलाएं शुक्ल पक्ष में सूर्य के योग से उदय होती हैं और कृष्ण पक्ष में सूर्य में ही अस्त हो जाती हैं। यथा प्रथम कला शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदय होकर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा में अस्त हो जाती है, दूसरी कला शुक्ल पक्ष की द्वितीया को उदय होकर कृष्ण पक्ष की द्वितीया में अस्त हो जाती है, इसी प्रकार अन्य कलाओं को भी समझना चाहिये। पूर्णिमा की पूर्ण कला अमावस्या में अस्त होती है। अमावस्या को पूर्णिमा की कला अस्त हो जाने पर जो चन्द्र कला रहती है वह ही १६ वीं नित्या कला है। क्योंकि वह ही चन्द्रमा का वास्तविक बिंब प्रत्येक कला में सूर्य के प्रकाश से घटती बढती कलाओं के रूप में चमका

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करता है। शुद्ध चिति शक्ति की १५ कलाएं पंचदशी के १५ अक्षरों से क्रमशः संबद्ध हैं और १६ वीं कला शुद्ध चिति शक्ति चिन्मात्र निर्विकल्प समाधि में विराजने वाली स्वयं महात्रिपुरसुन्दरी है क्योंकि अन्य सब कलाएं घटती बढती हैं, चन्द्र का बिंब सदा एक समान रहता है। इसलिये प्रत्येक कला को १६ वीं कला का अंग समझना चाहिये और प्रत्येक कला का पूजन और ध्यान तदनुसार उस कला की संबंधित तिथि में १६ वीं कला सहित किया जाता है। कुण्डलिनी के सहस्रार में चढते समय वह मानस चक्रस्थ चन्द्र मंडल में छिद्र कर देती है, उससे अमृत टपक कर आज्ञा चक्र को अमृत मय कर देता है, जिससे वहां पर चन्द्रमा की सब कलाएं नित्य चमकने लगती हैं, और उनका नाम नित्या कहलाने लगता है। ये कलायें फिर विशुद्ध चक्र पर उतर कर उसकी १६ पंखडियों पर प्रकाशमान हो जाती हैं। सहस्रार के मध्यस्थ चन्द्र मण्डल को बैन्दव स्थान कहते हैं यह शुद्ध चिति शक्ति की आनन्दमयी कला का स्थान है, जिसको श्री अथवा महा त्रिपुर सुन्दरी कहते हैं।

आधार चक्र अन्धकारमय चक्र है, स्वाधिष्ठान जल का स्थान है, इसलिये वह भी कुछ थोडा प्रकाशयुक्त अन्धकारमय चक्र है, मणिपुर में अग्नि का प्रकाश भी उज्ज्वल न होने से उसका स्थान भी अन्धकार युक्त ही है। इसलिये नीचे का अग्नि मंडल अन्धकार मिश्रित प्रकाश युक्त मण्डल है। अनाहत् में सूर्य का प्रकाश रहता है और विशुद्ध में चन्द्र का। आज्ञा चक्र अमृत का स्थान है। इसलिये विशुद्ध और आज्ञा स्वयं प्रकाशमान नहीं हैं, वे सहस्रार में स्थित चन्द्रकला से प्रकाशित होते हैं। सहस्रार में स्वतंत्र रूप

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से चन्द्रकला नित्य पूर्ण रहती है, इसलिये वह ही वास्तविक नित्या है । श्री चक्र का तीनों मण्डलों और चक्रों से संबंध पहिले बताया जा चुका है । यदि श्री चक्र के त्रिकोण को मूलाधार, अष्टार चक्र को स्वाधिष्ठान, अन्तर्दशार को मणिपूर, बहिर्दशार को अनाहत, चतुर्दशार को विशुद्ध, ४ श्री कंठों को आज्ञा चक्र समझा जाय और विन्दु को सहस्रार, चतुष्कोण भूगृह को ब्रह्माण्ड, तो विन्दु स्थान में स्थित चिति रूपा चन्द्रकला की चन्द्रिका का प्रकाश सब पर प्रतिबिंबित होता समझना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि मनरूपी चन्द्रमा में चेतना देने वाला चेतन प्रकाश ( Consciousness ) सहस्रार में स्थित चिन्मात्र सत्ता का प्रतिबिंब है । जो अनाहत् चक्र में स्थित प्राणरूपी सूर्य के ऊर्ध्वगामी होने पर अपने विशुद्ध स्वरूप में अनुभवगम्य होता है जो प्राणरूपी सूर्य और मनरूपी चन्द्र दोनों की क्रियाओं का निःस्पन्द स्वरूप योग (neutralization) होने पर अनुभव में आता है । प्राण और मन दोनों को चिति शक्ति से उद्भूत क्रमशः सत्तात्मिका और चिदात्मिका शक्तियों के दो स्रोत ( currents ) समझना चाहिये । जैसे विद्युत् शक्ति की धनात्म ( positive ) और ऋणात्म ( negative ) स्रोत हुआ करते हैं । जहां दोनों का उदय और अस्त होता है वह परम कला है ।

पंचदशी के अक्षरों की सुषुम्नापथ पर सहस्रार में चढते समय इस प्रकार भावना की जाती है । प्रथम अक्षर को अधःसहस्रार से उठाकर उसका विषुस्थान पर लय किया जाता है, दूसरे अक्षर को विषुस्थान से उठाकर उसका मूलाधार में लय किया जाता, तीसरे को मूलाधार से उठाकर स्वाधिष्ठान में, चौथे को स्वाधिष्ठान से

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उठाकर मणिपुर में, पांचवे को मणिपुर से उठाकर अनाहत् में, छठे को अनाहत् से उठाकर विशुद्ध में, सातवे को विशुद्ध से उठाकर लंबिका में, आठवें को लंबिका से उठाकर आज्ञा में, नवें को आज्ञा से उठाकर विन्दु में, दसवें को विन्दु से उठाकर अर्धचंद्रिका में, ११वें को अर्धचन्द्रिका से उठाकर निरोधिका में, १२वें को निरोधिका से उठाकर नाद में, १३ वें को नाद से उठाकर नादान्त में, १४ वें को नादान्त से उठाकर शक्ति में, १५ वें को शक्ति से उठाकर व्यापिका में, इस क्रम से प्रत्येक पूर्व अक्षर को अगले अक्षर में लीन करते हुए पूरा मंत्र उन्मनी में, जो पराकला स्वरूपा श्री कला है, लीन कर दिया जाता है। ललिता सहस्रनाम के श्लोक ११३ की व्याख्या में भास्करराय कहते हैं कि त्रिपुरसुन्दरी निर्विवार्द षोडशकलात्मिका है जैसा कि वासना सुभगोदय में कहा है:—

दर्शाद्याः पूर्णिमान्ताद्या कलाः पंचदशैवतु ।
षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्द रूपिणी ॥

चन्द्र मण्डल में वह कला वृद्धि ह्रासरहिता है, शेष अन्य १५ कलायें आने जाने वाली होती हैं। दर्शा शुक्ल प्रतिपदा को कहते हैं, अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णमासी तक १५ कलाएं होती हैं जो पञ्चदशी मंत्र के १५ अक्षरों के अनुरूप समझी जानी चाहियें। उक्त १५ कलायें नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा भेद से और वाग्भव, कामकला, और शक्ति कूट ऐसे त्रिरावृत्त