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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी २८१


भगवती के स्तन पान कराने की दैवी कृपा की घटना इस प्रकार घटित हुई बताई जाती है कि एक बार भगवत्पाद के शिशुकाल में जब उनके पिता किसी स्थानान्तर को जाने लगे, तो अपनी धर्मपत्नी को भगवती का पूजन करने को कह गये । परन्तु वे पति की अनुपस्थिति में मासिक धर्म के कारण पूजन नहीं कर सकीं, और बालक शंकर को भगवती का पूजन करने का सुअवसर मिला । भगवती को नैवेद्यार्थ दूध अर्पण किया जाता था । शंकर भगवत्पाद बालपन के भोलेपन से समझे कि भगवती दूध को प्रतिदिन साक्षात् पीया करती थीं, परन्तु उसदिन न पीते देखकर, वे रोकर प्रार्थना करने लगें । बालक के आग्रह से प्रसन्न होकर भगवती प्रकट हो गईं और सारा दूध पी गईं । परन्तु शंकर भगवत्पाद के पिता नैवेद्य का दूध पुत्र को दिया करते थे । भगवती के सारा दूध पी लेने पर बाल शंकर रो पडे । इसपर भगवती को दया आई, और बालक को अपने स्तनों का दूध पिलाया । भगवती के स्तन का पान करते ही शंकर एक उच्चकोटि की कविता में भगवती की स्तुति करने लगे, जो उनके मुख से स्वतः निकलने लगी थी । पिता को घर आकर यह सब सुनने पर बडी प्रसन्नता हुई । फिर भगवती ने उनको स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि यह बालक एक महान पुरुष होगा । यह कथा कैवल्य शर्मा ने लिखी है ।

इसपर कुछ लोग आपत्ति करते हैं कि शंकर भगवत्पाद अपनी लेखिनी से अपनी श्लाघा नहीं कर सकते, इसलिये द्रविड शिशु कोई दूसरा व्यक्ति होना चाहिये, जो भगवत्पाद का सम कालीन था । परन्तु हमें तो, इतना कहने में कि एक शिशु प्रौढ कवियों जैसी

२८२ सौंदर्य लहरी


कमनीय कविता करने लगा, कोई विशेष आत्मश्लाघा की बात नहीं दिखती। यदि उसे आत्मश्लाघा कहा भी जाय, तो वह वास्तव में भगवती के स्तन पान के फल की महिमा का गान मात्र है।

एक ऐसी भी किंवदन्ती है कि द्रविड शिशु एक सिद्ध महात्मा थे, उन्होंने एक स्तोत्र कैलाश के पत्थरों पर लिखा था, जब शंकर भगवत्पाद कैलाश यात्रा को गये, तब उन्होंने उसे पढा। परन्तु भगवती के इशारे से इनको स्तोत्र पढते देखकर सिद्ध ने उसे मिटाना आरंभ कर दिया। इतने अवसर में भगवत्पाद ने पूर्व के ४१ श्लोक कंठाग्र कर लिये थे, वे ही इस स्त्रोत्र के प्रथम ४१ श्लोक हैं। उस द्रविड शिशु का संकेत इस श्लोक में किया गया है। परन्तु हमारे मत की पुष्टि, कि द्रविड शिशु से भगवत्पाद ने अपना ही संकेत किया है, श्लोक १०० से होती है, जिससे सौन्दर्य लहरी का लेखन समय उनका विद्यार्थी वय सिद्ध होता है।

नाभि का ध्यानः -

( ७६ )

हरक्रोधज्वालाऽवलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसंगो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥

अर्थः— हे अचल तनये ! हर के क्रोध की ज्वालाओं से लिपटे हुए शरीर से कामदेव ने गहरे सरोवर सदृश तेरी

सौंदर्य लहरी २८३

नाभि में जब गोता लगाया, उसमे लता सदृश उठने वाले धूवें की जो रेखा बनी, उसे जन साधारण, हे जननि ! तेरी नाभी के ऊपर उठने वाली रोमावलि समझते हैं ।

इसका आध्यात्मिक भाव यह है कि कामोद्दीपन होने पर भ्रूमध्य में शंकर का ध्यान करने से जहां उनका ज्ञानरूपी तीसरा नेत्र है. हृदय में उदय होने वाला काम का ताप नाभि चक्र में उतर कर शान्त हो जाता है और अग्नि के पानी में बुझने से जो धुआं सा ऊपर उठता है, तद्वत् नाभि से हृदय में उठने वाली रोमांच की लता सी उठकर शांति प्रदान करती है ।

( ७७ )

यदेतत्कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशेमध्ये किञ्चिज्जननि तव तद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनुभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥

कठिन शब्दः— कालिन्दी=यमुना, कुहरिणी=कुं हरतीति कुहर, कुहं राति ददातीति वा, बिल, रंध्र, सर्पिणी ।

अर्थः— हे शिवे, हे जननि ! यह जो यमुना की बहुत पतली तरंग के सदृश आकृति वाली ( रोमावलि ) तेरे कृश कटि भाग में किंचित दिख रही है, वह सद्बुद्धि वाले मनुष्यों को ऐसी जान पड़ती है, मानो तेरे कुच कलशों के बीच एक

२८४ सौंदर्य लहरी

दूसरे की रगड से पिस २ कर पतला होने पर आकाश तेरी नाभि के बिल में अथवा नाभि में सर्पिणी की तरह प्रवेश कर रहा है ।

यमुना नदी और आकाश दोनों का रंग श्याम है, इसलिये आकाश को यमुना की पतली तरंग से उपमा दी गई है ।

आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति मानी जाती है । प्रत्येक तत्व का अर्ध भाग और दूसरे आधे भाग में शेष चारों तत्वों का सम भाग मिलने से पंचीकरण द्वारा पांचों महाभूतों की रचना होती है । इसलिये मूलाधार में पृथिवी तत्व के साथ १/८ अंश जल, १/८ अंश अग्नि, १/८ अंश वायु और १/८ अंश आकाश रहता है, इसी प्रकार स्वाधिष्ठान में जल के साथ १/८ अंश प्रत्येक पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश का होता है, मणिपूर में अग्नि के साथ दूसरे चार तत्वों का प्रतितत्व १/८ अंश रहता है, हृदय में वायु के साथ चारों अन्य तत्व १/८ अंश में रहते हैं और विशुद्ध चक्र में आकाश का आधा भाग और अन्य तत्वों का अष्टांश रहता है । इसलिये विशुद्ध चक्रस्थ आकाश तत्व का संबंध नीचे के सब चक्रों से बना हुआ है, और विशुद्ध चक्र में आकाश का वेध होने के साथ ही नीचे के चक्रों के आकाश का भी वेध होना संभव है, उससे पूर्व नहीं। मानो भगवती के भारी कुचों के परस्पर रगड़ने से, चक्की के गले से उतरने वाले धान्य के सदृश,

सौन्दर्य लहरी १८२


विशुद्ध चक्र से आकाश नीचे उतरकर दबता हुआ नीचे गिर रहा है। आकाश तत्व के वेध की पिसई से सुन्दर उपमा दी गई है। जिन योगियों को तत्ववेध की क्रिया का ज्ञान है, उनको ही यहां बुद्धिमान कहा गया है।

कालिन्दी अर्थात् यमुना सूर्य पुत्रि है। नाभि में उत्पन्न वाली आकाश रूपी रोमावलि हृदय के सूर्य मण्डल से नीचे उतर रही है, इसलिये उसकी उपमा यमुना नदी की तरंग से दी जानी सर्वथा संगत है। और आकाश, रोमावलि और यमुना तीनों का वर्ण भी श्याम है। यमुना पिंगला नाडी को भी कहते हैं, जिसका संबंध प्राण से है और प्राण की क्रिया से ही षट् चक्र वेध होता है। इस अभिप्राय से भी कालिन्दी रूपी पिंगलागत प्राण की क्रिया से उनकी उपमा ठीक सिद्ध होती है।

( ७८ )

स्थिरं गङ्गाऽऽवर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
निजाबालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।
रतेर्लीलाऽगारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धे गिरिशनयनानां विजयते ॥

कठिन शब्दः— आवाल=गमला, कुसुमशर=कामदेव

अर्थः— हे गिरि सुते ! तेरी नाभि की जय है। उसकी उपमा नीचे दिये हुए किसी भी प्रकार से दी जा सकती है।

२८६सौंदर्य लहरी

( १ ) गंगा का स्थिर भंवर, ( २ ) तेरे स्तन रूपी विकसित पुष्पों को धारण करने वाली रोमावलि रूपी लता के उगने का गमला, ( ३ ) काम देव के तेज रूपी अग्नि को धारण करने वाला हवन कुंड, ( ४ ) रति का क्रीडा स्थल, अथवा ( ५ ) गिरीश शंकर के नयनों को सिद्धि प्राप्त करने के लिये तप करने की गुफ़ा का द्वार ।

( ७९ )

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नाभौश्चव लघु च शनैस्त्रुट्यत इव ।
चिरंते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीगतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥

पाठान्तर— नारीतिलकशनकै स्त्रुट्यत इव ।
तिलक=तिलक और एक वृक्ष विशेष का नाम । शनकैः=शनै;

अर्थ:— हे शैल तनये ! तेरे मध्य भाग की सम अवस्था चिर कुशल रहे, जो स्वाभाविक ही क्षीण है और स्तन रूपी तट के भार से क्लान्त होने के कारण झुकी हुई तेरी मूर्ति के नाभि देश पर पडने वाली वलियों पर शनैः २ नदी के तट के वृक्ष के सदृश टूटता सा प्रतीत होता है ।

यहां कटि का बहुत पतला होना और स्तनों का भारी होना दिखा गया है । ये दोनों स्त्रियों के सौन्दर्य के चिन्ह हैं ।

सौंदर्य लहरी २८७


( ८० )

कुचौ सद्यः स्विद्यत्तट घटित कूर्पासभिदुरौ
कपन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयतः ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधानद्धं देवि त्रिवलिलवल्लीवल्लिभिरिव ॥

कठिन शब्द:— कूर्पास=अंगिया, चोली। दोर्मूल=कांख, बगल,
बलग्नं=जुडासा जोड, तनुभू=काम देव ।

हे देवि ! कांखों की रगड से झट २ पसीना आने के कारण जिनके किनारे पर से अंगिया फट गई है सुवर्ण कलश की आभा-युक्त तेरे कुच द्वय के हिलने से टूटने से बचाने के लिये अलम् अर्थात् पर्याप्त हैं इतना मात्र जुडा हुआ तेरा ( कटि प्रदेश ) मानो काम देव ने लवली वल्लि ( एक प्रकार की बेल ) से वलियों से तीन बार बांध रखा है ।

भाव यह है कि छाती का भाग भारी है और नीचे कटि प्रदेश इतना पतला है कि हिलने मात्र से टूट सकता है, परन्तु पेट की तीन बलियां ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो काम देव ने उसके सौन्दर्य की रक्षा करने के लिये लवली की बेल से तीन बार लपेट कर बांध रखा है । नहीं तो टूटने में कोई कसर नहीं जान पडती थी ।

२८८ | सौंदर्य लहरी


नितंब का ध्यान:—

( ८१ )

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजात्
नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥

कठिन शब्द:— हरणरुपेणं = दहेज,

अर्थ:— हे पार्वति ! पर्वतराज हिमालय ने अपने नितंबों से काटकर अपना भारीपन और विस्तार तुझको दहेज में दिये थे, इसीलिये तेरे नितंब इतने विस्तीर्ण और भारी हैं, कि तेरे नितंब के भार से सारी पृथिवी की गति रुक गई है और तेरे विस्तार की अपेक्षा से पृथिवी छोटी दिखने लगी है।

यदि पृथिवी को स्थिर मानें तो भगवती के उसपर बैठ जाने से उसकी गति रुक गई है और यदि उसे चल माने तो उसकी गति स्थगित होकर नियम बद्ध हो गई है । भाव यह हैं कि प्रकृति देवी ने पृथिवी को अपना आसन बना रखा है । और भूमि पर जो भी शोभा फैली हुई है, उसका सारा श्रेय पर्वतों को ही है, जिनकी देन रूपी स्रोत सारी पृथिवी को हरा भरा ही नहीं कर रहे, वरन् बडे २ देश उनके नितंबों से काटकर लाई हुई मिट्टी की ही कृपा है । अर्थात् भूमि की प्राकृतिक शोभा हिमाच्छादित पर्वतराज की ही तनुजा है।

सौंदर्य लहरी २८९


उरुयुग्मका ध्यानः—

( ८२ )

करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामुरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमपि ॥

**कठिन शब्दः—**पटली=पटं विस्तारं त्याति आददाति,

**अर्थः—**हे गिरि सुते ! आप अपने दोनों उरुओं मे गजेन्द्रों के सूंडों को और सुवर्ण के बने हुए केले के लंबे स्तंभों को जीतकर, पति को प्रणाम करते २ कठिन हो गये हैं ऐसे दोनों सुन्दरगोल घुटनो से बुद्धिमान हाथीके दोनों (मस्तक के) कुंभों को भी पराजित कर रही हैं !


जंघाओं का ध्यानः—

( ८३ )

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमुकुटशाणैकनिशिताः ॥

**कठिन शब्दः—**निषङ्ग=तरकस, विशिखः=शर, बाण; विषम विशिखः=कामदेव

२९० | सौंदर्य लहरी

**अर्थ:—**हे गिरि सुते ! तेरी दोनों पिंडलियां रुद्र को जीतने के लिये दुगुने बाणों से भरे कामदेव के दो तरकसों के समान हैं। जिनके अग्रफल पैरों की १० अंगुलियों के नखों के अग्र भाग के रूप में दस दिख रहे हैं, जो देवताओं के मुकुट रुपी सान पर पैनाए गये हैं।

भाव यह है कि कामदेव के तरकस में केवल ५ पुष्प बाण हैं, उनसे वह शंकर को नहीं जीत सका, इसलिये उसने भगवती के चरणों की अंगुलियों के नख रुपी फल वाले १० और बाण अपनी सहायता के लिये लेलिये हैं, जो दोनों पिंडलियों रुपी तरकसों में पांच २ रखे हैं। इन बाणों के फल वत् नखों के अग्रभाग देवताओं के प्रणाम करते २ उनके मुकुट रुपी सान पर घिसर कर पैने हो गये हैं।

कामदेव के ५ बाण शब्द स्पर्श रूप रस गंध ५ विषय हैं। भगवती के चरणों में ५ सामान्य और ५ दिव्य शब्द स्पर्श रूप रस गंध सहित १० बाण हैं। योगदर्शन में दिव्य विषयों का वर्णन (१-३५) सूत्र में मिलता है। ‘विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थिति निबंधिनी’। (१-३५) विषयों की दिव्य प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर मन की स्थिरता का उदय होता है। इसलिये भगवती के चरणों के नखों का ध्यान योगी को सामान्य और दिव्य भोग देकर चित्त को एकाग्रता प्रदान करता है। मानों कामदेव के ५ बाणों के स्थान पर भगवती के चरणों की शरण लेकर दस बाणों से शंकर को जीतना चाहता है, परन्तु मन की एकाग्रता हो जाने से मनुष्य स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है।

सौंदर्य लहरी | २२१


इसलिये—

( ८४ )

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मात: शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥

कठिन शब्द— पाथ=जल, तटिनी=नदी, चूड़ा=केश, शेखर=चोटी, रुचि=कान्ति ।

अर्थ— हे मां ! तेरे चरण जो श्रुतियों की मूर्धा पर शिखरवत् रखे हैं, दया करके उनको मेरे शिर भी रख दे, जिनका चरणोदक शंकर की जटाजूट से निकली हुई गंगा है, और जिनके तलवों में लगी लाक्षा की कान्ति हरि के चूड़ा में (केशों में) धारण की हुई अरुण मणि की कान्ति के सदृश है ।

( ८५ )

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो—
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥

कठिन शब्द— अलक्तक=लाक्षा, कङ्केलि=अशोक, असूयति=ईर्ष्या करते हैं ।

२९२सौंदर्य लहरी

**अर्थ—**हम तेरे इन दोनों चरणों को प्रणाम कहते हैं, जो नयनों को रमणीय हैं, और जिन पर लाक्षा की तीव्र कान्ति चमक रही है। जिनके अभिहनन की स्पृहा से पशुपति तेरे प्रमदावन के अशोक वृक्ष से अनन्य असूया रखते हैं।

ऐसा कहते हैं कि पद्मिनी स्त्री के पद प्रहार से अशोक वृक्ष प्रसन्न होता है। इस श्लोक में यह भाव है कि भगवती की वाटिका के अशोक वृक्ष को भगवती के पद प्रहार का सौभाग्य सदा प्राप्त है, इसलिये पशुपति उससे ईर्ष्या रखते हैं, क्योंकि उनको भी भगवती के चरण प्रहार की स्पृहा है। अशोक का अर्थ वीत शोक अथवा शोक रहित है। और पशुपति भी वीतशोक होने के कारण अशोक है। जीवों को पशु कहते हैं, क्योंकि वे संसार की आसक्ति स्वरूप राग पाश में बंधे हैं। शिव को इसी अभिप्राय से पशुपति कहा जाता है।

पाशबद्धस्तथा जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः।
पाशबद्धः पशुप्रोक्तः पाशमुक्तः पशुपतिः ॥

प्रत्येक मनुष्य में जीव भाव और शिव भाव साथ २ रहते हैं। जैसा कि भगवान गीता में कहते हैं—

उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेतिचाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥

वेदानुवचन भी हैं 'द्वासुपर्णा सयुजा सखाया' 'असंगोयमात्मा' इत्यादि।

सौंदर्य लहरी २९३


इसलिये बद्धजीव का अन्तरात्मा रूपी शिव सदा असंग होने पर भी भगवती के पद प्रहार से अपने को शोक रहित अनुभव करने की सदा स्पृहा किया करता है ।

( ८६ )

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥

कठिन शब्द— मृषाकृत्वा=झूठा करके, गोत्र=वंश, पहाड, नाम, अथवा गां इन्द्रियं त्रायते इति गोत्र । स्खलन=गिरावट, फिसलना । वैलक्ष्य=लज्जा, स्वभाव का परिवर्तन, लक्ष्य से हटना । शल्यं=बाण, अन्तर्दाह । उन्मूलितवता=जड़ से उखाड़ता हुआ, सर्वथा नष्ट करता हुआ । तुलाकोटि=मंजीरा, नूपुर, तराजू के पल्ड़ों की आकृति वाला । क्वाणैंकिलिरतं=घंटियां, मंजीरों, अथवा नूपुरों के बजने का शब्द । ईशानरिपु=शिव का शत्रु, काम । भर्ता=पालने वाला, पति ।

**सामान्य अर्थ—**तेरे गोत्र का अपमान करने से लज्जित नीचे नेत्र किये हुए भर्त्तार के ललाट पर तेरे चरण कमलों का ताडन होने पर ईशानरिपु ( कामदेव ) ने जिसको चिरकाल से जलाया जाने के कारण अन्तर्दाह था उसे निकालते हुए अपना बदला देखकर, तेरे नूपुरों के बजने के क्वणत्कार की किल-किलाहट रूपी हर्ष ध्वनि की ।

२९४ सौंदर्य लहरी


पूर्व श्लोक में शिवजी को भगवती के चरणों के ताडन की स्पृहा दिखाकर, इस श्लोक में यह दिखाया गया है कि भगवती ने भर्त्तार के ललाट पर चरण कमलों से लात मारकर उनकी इच्छा पूरी की । इसका सामान्य अर्थ शृंगार रस पूर्ण है और शृंगार रस के प्रेमी जन प्रेयसी के चरणस्पर्श करना, अथवा उसके पदप्रहारों से प्रसन्न होना शृंगार-रस की विशेषता मानते हैं । श्रीकृष्ण भगवान से भी राधिका के भक्त गण उनके चरण पलोटन कराने में अपनी उपासना की उत्कृष्टता समझते हैं । परन्तु आपत्ति जनक विषय तो यह है कि क्या ९७ श्लोकोक्त सतीत्व की चरम सीमा पति के ललाट पर पद प्रहार करने में होती है । ऐसे विरुद्ध भावों का समन्वय कैसे किया जा सकता है ? इसलिये हम इसका कूटार्थ योगपर दिखाने का नीचे यत्न करते हैं । सामान्य भाव तो यह ही है कि शंकर जिन्होंने काम को भस्म कर दिया, वह भी पत्नि की लातें खाकर काम के उपहास्यास्पद बनते हैं ।

इस श्लोक का दूसरा अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है । गोत्र का अर्थ इन्द्रिय संयम किया जा सकता है, अर्थात् 'गां त्रायते इति गोत्रम्' इसलिये गोत्रस्खलनं से इन्द्रिय संयम की गिरावट अथवा इन्द्रिय संयम से च्युत होना है, उसको मृषाकृत्वा अर्थात् झूटा करने से इन्द्रिय संयम की कमी को पूरा करने का अभिप्राय है वैलक्ष्यनमितं उस दृष्टि को कहते हैं, जिसमें लक्ष्य रहित दृष्टि नीचे को झुकी होती है । शांभवी मुद्रा में भी नेत्रों की मुद्रा ऐसी ही रहती है । जिसमें अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टि होने से दृष्टि लक्ष्य रहित हो जाती है, और नेत्र अर्धोन्मीलित से खुले रहते हैं, जालंधर

सौंदर्य लहरी २९५

बंध लग जाने से शिर भी आगे को झुक जाता है और चिबुक कंठ कूप पर जा लगती है, उस समय दृष्टि नीचे की ओर झुक जाती है और उसे वैलक्ष्य नमित कह सकते हैं। इन्द्रिय संयम युक्त जालंधर बन्ध लगने पर शांभवी मुद्रा का फल यह होता है कि शक्ति का उत्थान होकर वह झट आज्ञा चक्र के ऊपर चढ जाती है, अर्थात् आज्ञा चक्रस्थ शिव के ललाट पर पदार्पण करती हुई सहस्रार में प्रवेश करने को उतावली हो उठती है। भर्त्तार पद से देहाभिमानी देह का पोषण करने वाला भर्ता ही महेश्वर है।

उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः ॥ गीता

क्योंकि आज्ञा चक्र तक ही देहाभिमान रहता है, उसके ऊपर चित्त की अवस्था उन्मुन्याभिमुखी होने लगती है और देहाभिमान शिथिल होने पर भर्ता शब्द की उपयुक्तता कम होने लगती है।

शंकर भगवत्पाद ने स्थान २ पर भगवती के अंग प्रत्यंग की सुन्दरता का वर्णन करते समय उसके हावभावों में कामदेव का सहयोग दिखाया है, मानो कामदेव सदा भगवती का आश्रय लेकर अपना कार्य करता रहता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवती कामदेव की ही प्रति मूर्ति है। कादि विद्या का प्रथम अक्षर ककार है, जिससे ब्रह्म की आदि काम रूपा शक्ति अभिप्रेत है। उसकी त्रिपुरतापिन्युपनिषद में इस प्रकार व्याख्या मिलती है।

स एको देवः शिव रूपी दृश्यत्वेन विकासते, यतिषु, यज्ञेषु, योगिषु कामयते । कामं जायते । स एष निरंजनोऽका-

२९६ || सौंदर्य लहरी

मत्वेनोज्जृम्भते, अक्रचटतपयशान् सृजते । तस्मादीश्वरः कामोऽभिधीयते, तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति ।

**अर्थः—**वह एक शिव रूपी देव दृश्य के रूप में विकसित होता है । यतियों में, यज्ञों में, योगियों में कामना करता है । इस प्रकार काम उत्पन्न होता है । वह निरंजन कामना रहित ब्रह्म जंभुहाई लेता है (विकसित होता है ।) अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग और श वर्गों की सृष्टि करता है । इसलिये ईश्वर को काम कहते हैं । उसकी परिभाषा करने से काम ककार में व्यापक माना जाता है ।

सृजन शक्ति आद्योपान्त काम शक्ति ही है, सामान्य इच्छा के रूप में उसे कामना कहते हैं और प्रजनन वासना को काम वासना कहते हैं । वह शिव की प्रभवाभिमुखी शक्ति है । परन्तु जब वह प्रति प्रसव रूपा होती है, तब उसे शिवा कहते हैं । प्रभव और लय क्रम दोनों उसके विपरित भाव होने के कारण एक दूसरे के प्रति-बन्ध और शत्रु हैं । समाधि काल में काम शिव का शत्रु हैं, परन्तु सृष्टिकाल में वह ही शक्ति के रूप में शिव की अर्धांगिनी का सहयोगी बन जाता है । समाधि काल में जिस काम को शंकर अपने तीसरे नेत्र को खोलकर भस्म कर देते हैं, वह ही उनके प्रभवाभिमुख होने पर मानो उनका उपहास करता है । भगवती के नूपुरों के श्रृंगार रस परिपूर्ण क्वण २ शब्द की ध्वनि में मानों कामदेव के उक्त उपहास का व्यंग व्यक्त हो रहा है । नृत्य के समय नूपुर ध्वनि अथवा गान वाद्य के साथ मंजीरों का

सौंदर्य लहरी २९७


बजना, जो ध्यान समाधि के प्रतिपक्षी हैं, कामदेव की प्रसन्नता को व्यक्त करने वाले हास्य की खिलखिलाहट सदृश्य हैं।

मन के लय और व्युत्थान का स्थान आज्ञा चक्र के ऊपर है। अनाहत् में ईश्वर, विशुद्ध में सदाशिव और आज्ञा में शिव का स्थान है। शांभवी मुद्रा को समाधि का दृागोद्घाटन कहना चाहिये। व्युत्थान के समय जब शक्ति नीचे उतरती है, तब मानो शिव के ललाट पर पद प्रहार करती हुई नीचे उतरती है, और उसके नूपुरों के शब्द में कामदेव के हास्य की प्रति ध्वनि बताई गई है। शांभवी मुद्रा के अभ्यासी को काम वासना रूपी अन्तर्दाह का उन्मूलन हो जाता है।

(८७)

हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवसैकचतुरौ
निश्यायां निद्राणं निशि च पर भागे च विशदौ।
परं लक्ष्मी पात्रं श्रियमनिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥

**अर्थ—**हे जननि ! तेरे दोनों चरण कमल पर जय प्राप्त कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य क्या है ? क्योंकि कमल बर्फ से मर जाता, तेरे चरण हिमगिरि पर निवास करने में कुशल हैं। कमल रात को सो जाता है, तेरे चरण दिन रात विशद रहते

२६८सौंदर्य लहरी

हैं; वह दिन में लक्ष्मी का पात्र रहता है और तेरे चरण समयाचार के उपासकों को खूब लक्ष्मी देते हैं ।

अर्थात् तेरे चरणों को कमल की उपमा कैसे दी जा सकती है ? कदापि नहीं दी जा सकती ।

( ८८ )

पदं ते कीर्त्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीखर्परतुलाम् ।
कथंचिद्वाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥

**अर्थ—**हे देवि ! तेरा पद कीर्त्तियों का प्रपद (स्थान) है और विपदाओं का अपद है । न जाने सत्पुरुषों ने उसकी तुलना कछुवे की कठिन खोपरी से कैसे की है, वह इतना कोमल है कि विवाह के समय पुरारि ने दयार्द्र मन से किसी प्रकार (अर्थात् बडी हिचकिचाहट और बडे संकोच के साथ) दोनों हाथों से उठाकर उसे पत्थर पर रखा था ।

विवाह में फेरों या भांवरों के समय वर वधू के एक चरण को अपने हाथों से उठाकर पत्थर पर रखकर कहता है, कि हे देवि ! तू धर्म पालनार्थ अपना चित्त इतना दृढ रखना जैसा यह पत्थर है ।

सौंदर्य लहरी २९९


कैवल्यशर्मा का मत है कि यह श्लोक मद्रास की भाषाओं की प्रतियों में नहीं मिलता, इसलिये क्षेपक है।

( ८९ )

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमहायददतौ ॥

कठिन शब्द— नाक=स्वर्ग, किसलय=पत्र, पल्लव, अहाय=तुरन्त, स्वःस्थ=स्वावलंबी, स्वर्ग निवासी, अनिशं=निरन्तर ।

**अर्थ—**हे चण्डि ! तेरे दोनों चरण अपने नखों ने कल्पवृक्षों का परिहास सा कर रहे हैं, जो नख देवांगनाओं के कर रूपी कमलों को (हाथ जोडने समय) बंद करने के लिये संख्या में १० चन्द्रमा सदृश हैं। कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में रहने वाले स्वावलंबी देवताओ को अपने पल्लव रूपी कराग्रों से फल देते हैं, परन्तु तेरे चरण दरिद्रियों को निरन्तर, तुरन्त और बहुत धन देते रहते हैं।

कल्पवृक्ष से स्वर्ग निवासियों को ही लाभ है, यहां के दरिद्रियों को कुछ नहीं।

३०० | सौन्दर्य लहरी

( ९० )

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशाऽनुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दं विकिरति ।
तवास्मिन्मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥

कठिन शब्द— करण चरणः=इन्द्रियां रूपी चरण वाला,
षट्चरण=भौँरा, मधुकर ।

**अर्थ:—**इस तेरे चरण में जो मंदार वृक्ष के पुष्पों के स्तबक जैसा सुन्दर है, मेरा ५ ज्ञानेन्द्रिय और १ अन्तः करण रूपी ६ चरण वाला यह जीव छः चरणों वाला मधुकर बनकर डूबा रहे । तेरा चरण जो दीनों को उनकी आशा के अनुसार निरन्तर लक्ष्मी देता रहता है, और सौन्दर्य राशि के मकरन्द को खूब फैलाता रहता है और मन्दार के पुष्पों के स्तबक सदृश सुभग है ।

अर्थात् मैं भौंर की तरह तेरे चरण कमल पर अपना सर्वस्व मनसा, वाचा कर्मणा सब इन्द्रियों और मनके व्यापारों को समर्पण करदूं ।