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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

७४ स्पन्दकारिका का सत्य व्यावहारिक है तथापि जीव एवं जगत् ब्रह्म से कोई पृथक् स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है। शांकर दृष्टि में ब्रह्म और जगत् की एकता—१. यह सम्पूर्ण विश्व जो अज्ञान के कारण नानात्मक प्रतीत हो रहा है समस्त भावनाओं के दोषों से रहित (निर्विकल्प) ब्रह्म ही है—जगत् ('रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः' भी है) भ्रम भी है किन्तु ब्रह्म से पृथक् स्वतन्त्र सत्ता भी नहीं है। 'यदिदं सकलं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात्। तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्तराशेषभावनादोषम् ॥' २. मृत्तिका का कार्य होने से घट उससे पृथक् नहीं हो सकता क्योंकि सब ओर से मृत्तिका रूप होने के कारण घट का रूप मृत्तिका से पृथक् नहीं है अतः मृत्तिका में मिथ्या कल्पित नाममात्र घर की सत्ता ही कहाँ है?१ आचार्य शङ्कर का जगन्मिथ्यात्ववाद— मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः, कुंभोऽस्ति सर्वत्र मृत्स्वरूपात् । न कुंभरूपं पृथगस्ति कुंभः, कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥ ३. मृत्तिका से घट का रूप कोई दिखा नहीं सकता। अतः घट तो मोह से कल्पित है। वस्तुतः सत्यात्मक तो मृत्तिका मात्र है।२ सत्-ब्रह्म का कार्य यह सकल प्रपञ्च सत्स्वरूप ही है क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् वही तो है उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो कहता है कि उससे पृथक् भी कुछ है उसका मोह दूर नहीं हुआ है एवं उसका यह कथन सुषुप्त पुरुष के प्रलाप के सदृश है— १. केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं, घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते । अतो घटः कल्पित एव मोहान्मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥ २. सद्ब्रह्म सकलं सदैव, तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति । अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो, विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥ 'यह संपूर्ण विश्व ब्रह्म ही है' ऐसा अति श्रेष्ठ अथर्व श्रुति कहती है अतः यह विश्व ब्रह्ममात्र ही है क्योंकि अधिष्ठान से आरोपित वस्तु की पृथक् सत्ता हो ही नहीं सकती।३ 'यदि यह जगत् सत्य हो तो आत्मा की अनन्तता में दोष आता है और श्रुति अप्रामाणिक हो जाती है एवं ईश्वर भी मिथ्यावादी ठहरते हैं। ये तीनों बातें सत्पुरुषों के लिए शुभ नहीं है। 'यदि विश्व सत्य होता तो सुषुप्ति में भी उसकी प्रतीति होनी चाहिए थी किन्तु उस समय इसकी कुछ भी प्रतीति नहीं होती अतः यह स्वप्नवत् असत एवं मिथ्या है—४ १. ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी, श्रोती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा । तस्मादेतद् ब्रह्ममात्रं हि विश्वं, नानाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥ १-४. विवेक चूड़ामणि।

प्रथमः निष्यन्दः ७५ २. सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनोऽनन्तत्वहानिर्निगमाप्रमाणता । असत्यवादित्वमयीशितुः स्यान्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥ ३. यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तावुपलभ्यताम् । यन्नोपलभ्यते किंचिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥१ अतःपरमात्मा से पृथक् जगत् है ही नहीं। उसकी पृथक् प्रतीति तो गुणी से गुण आदि की पृथक् प्रतीति के सदृश मिथ्या ही है। आरोपित वस्तु की वास्तविकता ही क्या? वह तो अधिष्ठान ही भ्रम से उस प्रकार भासित हो रहा है। अज्ञानी जनों को अज्ञानवश जो कुछ प्रतीत हो रहा है वह सब ब्रह्म ही है जिस प्रकार भ्रम से प्रतीति हुआ रजत = वस्तुतः सीपी है। 'यह जगत् है' इसमें 'इदम्' रूप से सदा ब्रह्म ही कहा जाता है, ब्रह्म में आरोपित जगत् तो नाममात्र ही है। १. अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः, पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत् । आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता- धिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥ २. भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं ब्रह्मैवतत्तद्रजतं हि शुक्तिः । इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यतेत्वारोपित ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥२ 'परिणामवाद'-अवस्थान्तरपरिणमन ही 'परिणाम' है- (क) अतत्त्व-प्रथा = 'विवर्त' (ख) सतत्त्व-प्रथा-'परिणाम' परिणाम में एक रूप का तिरोभाव एवं रूपान्तर का आविर्भाव होता है-परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति, रूपान्तरं च प्रादुर्भवतीत्युक्तम् ॥३ असत्य रूप में निर्भास ही 'विवर्त' है 'विवर्तो हि असत्य रूपनिर्भासात्मेत्युक्तम् ।' (अभिनवगुप्तः ई०प्र०वि०वि०) शुक्ति में रजताभास 'विवर्त' है और दूध का दही में परिणमन 'परिणाम' है। 'परिणाम' अपने उपादान का समसत्ताक होता है किन्तु 'विवर्त' अपने उपादान का 'विषम-सत्ताक' होता है यथा रज्जु में अहि का भ्रम ॥ भास्करराय का 'अविकृत परिणामवाद' - भर्तृहरि, शान्तरक्षित ('तत्त्वसंग्रह') एवं भवभूति 'विवर्त' एवं 'परिणाम' को एकार्थक मानते रहे जब कि दोनों शब्द विष- मार्थी है। अविकृत परिणामवाद - भास्करराय जगत् को 'परिणाम' मानते हैं किन्तु प्रचलित परिणामवाद के सिद्धान्त से पृथक् अर्थ में। भास्करराय कहते हैं- १. मृत्तिका एवं घट में कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जगत् और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य है। भेदभावना ही मिथ्यात्व है- १-२. विवेकचूड़ामणि । ३. ई०प्रत्यभिज्ञाविवृत्ति वि० (पृ ८, अ १, वि० १)

७६ स्पन्दकारिका 'वस्तुतस्तु जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तांत्रिकाणां मते जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव ब्रह्मजगतोरत्यन्ताभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि सत्यत्वावश्यंभावात् भेदतमात्रस्य मिथ्यात्वस्वीकारेणाद्वैतश्रुतीनामखिलानां निर्वाहः । भेदस्य मिथ्यात्वादेव भेदघटिताधाराधेय भावसंबन्धोऽपि मिथ्यैव ।'१ २. 'वाचारंभणं विकारः' (छा०उ० ६.१.४) तथा 'ब्रह्मसूत्र'— 'आत्मकृतेः परिणामात्' (ब्र०सू० १,४,२६) की व्याख्या करते हुए भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' में श्रुति एवं व्यास दोनों को परिणामवादी सिद्ध किया है । आचार्य रामानुज, निम्बार्काचार्य, बल्लभाचार्य, भास्कराचार्य, श्रीपति, श्रीकण्ठ आदि सभी आचार्यों ने 'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन किया है । 'वामकेश्वरतन्त्र' भी 'परिणामवाद' का प्रतिपादक है— १. 'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित्पर इष्यते' (वामकेश्वरीमतम्) २. तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव, तस्यां परिणतायां ॥ ३. 'परिणामवाद एवाभिप्रेतः' (वरिवस्यारहस्यम् भास्कर) कहकर भास्कर ने तो इसको प्रतिपादित किया ही है । भास्करराय—तांत्रिक मत परिणामवादी है । आचार्य शङ्कर का विवर्तवाद एवं परिणामवाद दोनों में विश्वास—वेदान्ती शङ्कराचार्य तो 'विवर्तवादी' हैं किन्तु भक्त शङ्कराचार्य परिणामवादी हैं । आचार्य शङ्कर 'सौन्दर्यलहरी' में इसी 'परिणामवाद' का प्रतिपादन करते हैं— 'मनस्त्वं व्योमस्त्वं, मरुदसि मरुत्सारथिरसि । त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि, परिणतायां नहि परम् ॥ त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा । चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन विभृषे ॥'२ आभासवाद एवं प्रतिबिम्बवाद—शैव तांत्रिक दृष्टि आभासवाद की भी पोषक है । संकुचित रूप से जो किसी भी भाव, सत्ता या पदार्थ का प्रकाशन होता है उसका अभिधान है—'आभास' : 'आभासनं—आ ईषत् संकोचेन भासनं प्रकाशना ॥'३ आचार्य अभिनवगुप्तपादाचार्य ने प्रतिबिम्ब को 'आभास' संज्ञा दी है । 'भासन- सारतैव हि प्रतिबिम्बता ।' 'इह अवभासनसारमेव प्रतिबिम्बतत्त्वम्' । निष्कर्ष—'आभास' के दो पक्ष हैं— (क) विमर्शसमवेत 'प्रकाश' का संकुचित या अपूर्ण आत्मप्रकाशन (ख) विमर्शसमन्वित 'प्रकाश' रूपी मुकुर में अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्तवद् जड़चेतन निखिलविश्व का प्रतिबिम्बन ॥ १. सौभाग्यभास्कर (पृ० १५१) । २. सौन्दर्यलहरी । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा वि०वि० (२ वि० २) ।

प्रथमः निष्यन्दः ७७ उत्पलदेवाचार्य ने 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' (३२) में 'अवभास' की दृष्टि का प्रतिपादन किया है— 'वर्तमानावभासानां, भावानांमवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव, घटते बहियत्मना ॥'१ अर्थात् 'प्रत्यक्षेऽपि यावदर्थानां भेदेनावभासः प्रमात्रन्तर्लीनानामेव सतां युक्तः ।२ अन्तःस्थित सत्ता का बहिःप्रकाशन ही आभासन है यथा कच्छप का अपने अंगों को अपने भीतर सिकोड़कर पुनः उन्हें बाहर निकालना ।। चिदात्मा भी इसी प्रकार स्वलीन सत्ता का बहिःप्रकाशन किया करता है— आभासवाद—चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।। ३८ ।।३ अर्थात्—चित्तत्त्वमेवेश्वरत्वात्स्वात्मरूपतयोपपन्नाभासरूपमनन्तशक्तित्त्वादिच्छावशा- न्मृदादिकारणं विनैव बाह्यत्वेन घटपटादिकमर्थराशिं प्रकाशयेत् ॥४ 'अवभास' का स्वभाव क्या है? 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।।' 'विमर्श' ही प्रकाश की मुख्य आत्मा है और अवभासों का स्वभाव भी—'प्रकाशस्य मुख्य आत्मा प्रत्यवमर्शः' (स्वभावमवभासस्य विमर्श')५ परमात्मा व्यावहारिक जगत् के व्यवहारानुसार ही स्वेच्छापूर्वक आन्तर अर्थजातों को बाहर प्रकाशित किया करता है— 'तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ।।' (५८)६ प्रतिबिम्बवाद—'जगत्' शिव से पृथक् बाहर कुछ भी नहीं है। दर्पण से अलग प्रतिबिम्ब की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती अतः दर्पण से पृथक उसका स्वतन्त्र देश भी नहीं होता । प्रतिबिम्ब कोई कठिन वस्तु नहीं अन्यथा उसका दर्पण से पृथक् देश होता है। प्रतिबिम्ब में घनता न होने से इसका कोई पूर्ववर्ती रूप भी नहीं होता । काल पूर्वापरभावसत्ताक होने से प्रतिबिम्ब में काल भी नहीं है। घनता न होने से उसमें परिमाण भी नहीं है। उसी एक ही दर्पण में अनेक प्रतिबिम्बों के एक साथ पड़ने पर भी उनमें परस्पर संश्लेष नहीं होता । अन्य पदार्थों का भी एक साथ ही प्रतिबिम्बत होने के कारण अन्योन्य संग न होना भी सही नहीं है। इसे अवस्तु भी नहीं कह सकते । आभास- मात्रसार होने के कारण उसमें निजी स्वतन्त्रता भिन्न सत्ता की विद्यमानता देखना भी उपपन्न नहीं है 'दर्पणविधि' पर ध्यान दें— 'न देशो नो रूपं न च समययोगो न परिमा । न चान्योन्यासंगो न च तदपहानिर्न घनता ।। न चावस्तुत्वं स्यान्न च किमपि सारं निजमिति । ध्रुवं मोहः शाम्येदिह निरदिशद्दर्पणविधिः ॥'७ साधारण रूप से जो प्रतिबिम्ब क्रिया होता है उसमें बिम्ब पृथक् होता है—वह १-६. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेवाचार्यः । ७. अभिनवगुप्तपाद—तंत्रालोक (ई०प्र०वि०वि०) ।

७८ स्पन्दकारिका वस्त्वन्तररूप है—किन्तु विमर्श शक्ति अपने स्वातन्त्र्य के ऐश्वर्य से पृथक् बिम्ब के बिना ही स्वस्वरूपभित्ति पर विश्वाकार में अपने को प्रतिबिम्बित करती है— ‘अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह, यद्वद्विचित्र रचना मुकुरान्तराले । बोधः पुनर्निजविमर्शनसारवृत्या, विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ॥’ ‘अवभासन’ है क्या? ‘अवभासनं विकल्पघनीभावेन स्फुरणम्’ ‘उल्लेखन’ क्या है? उल्लेखनं मनसि कल्पनम्’ (भास्करी) जगत् अवभासन एवं उल्लेखन है । आत्मा की सभी अवस्थाओं में अविचल एकरूपता जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति । निवर्तते निजात्रैव स्वभावादुपलब्धृतः ॥ ३ ॥ जाग्रत् आदि भेदात्मक अवस्थाओं के मध्य भी वह (अभिन्न रूप में रहने वाला संवित् तत्त्व) अभिन्न रूप में है । (अपनी स्वरूपावस्था में ही समान रूप से) (वेदक के रूप में) प्रसरण करता रहता है । (अतएव इन विभिन्न अवस्थाओं की विद्यमानता में भी वह वेदक संवित् तत्त्व) अपने स्वस्वरूप से कभी निवृत्त (च्युत) नहीं होता ॥ ३ ॥

  • सरोजिनी * तन्त्रालोक में पाँच अवस्थाओं का उल्लेख किया गया है—‘जाग्रत स्वप्न सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम् । इति पञ्च पदान्याहुः ॥’ (तं० १०.२२८) शिवसूत्रकार कहते हैं कि ‘ज्ञान’ ही जागृतावस्था है—‘ज्ञानं जाग्रत्’ (१।८) वस्तु शून्य शाब्दिक ज्ञान ‘विकल्प’ है । ‘स्वप्नो विकल्पः ॥ (१।९) पञ्चकंचुकावृत अविवेकी ज्ञान ही ‘सुषुप्ति’ है ‘अविवेको माया सौषुप्तम्’ (१।१०) । निजात् स्वभावात् नैव निवर्तते—भट्टकल्लट (स्पन्दकारिकावृत्ति)— १. न तस्य स्वरूपम् आव्रियते यस्माद् उपलब्धरूपत्वं त्रिष्वपि पदेषु साधारणम् २. न तस्य स्वरूपान्यथाभावः ॥’ ‘निजात’ = अपने आत्मीय । उपाधि शून्य स्वस्वरूप । ‘स्वभाव’ = स्वरूप ‘न निवर्तते’ = अन्यथा स्वरूप ग्रहण नहीं करता है ॥ (रामकण्ठ) ॥ उसका स्वभाव कैसा है? ‘उपलब्धृतः’ = उपलब्धक, ज्ञाता । अनुभविता ॥ (रामकण्ठ) ॥ उत्पलदेव इस कारिका के प्रारंभ में प्रश्न उठाते हैं— ‘सर्ववृत्युपसंहारो निरोधो मास्तु तस्य तु । जाग्रदाद्यस्ववस्थासु कुतः स्यादनिरुद्धता ?’ (‘स्पन्दप्रदीपिका’) उत्पलाचार्य कहते हैं कि ‘भले ही उसका (ज्ञानस्वरूप आत्मा का) सर्ववृत्युप- संहाररूप निरोध न हो किन्तु जाग्रत्; स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में वह अनिरुद्ध कैसे रह सकता है? इसी प्रश्न के उत्तर में ग्रन्थकार ने तृतीय कारिका कही है । ग्रन्थकार

प्रथमः निष्यन्दः ७९ का कथन है कि—यह सत्य है कि जाग्रत आदि अवस्थायें परिवर्तित होती रहती हैं किन्तु वे सभी आत्मसंवित् से अभिन्न ही हैं। अवस्थाओं के भिन्न-भिन्न होने पर भी 'स्पन्दतत्त्व' अपने निज उपलब्धिमात्र स्वभाव से च्युत नहीं होता क्योंकि वह उपलब्धा है। उपलब्धा तीनों अवस्थाओं में समान रूप से रहता है। भेद अवस्थाओं में होता है अवस्थाता में नहीं। विष-वृक्ष का अंकुर क्या छोटा क्या बड़ा विष में भेद नहीं होता— ‘अवस्थास्वेव भेदोऽयं नावस्थातुः कदाचन । यथा विषस्यांकुरादौ तच्छक्तेर्न तु भिन्नता ॥ इति ॥’१ जाग्रत् एवं स्वप्न में संवेदन प्रसिद्ध है। सुषुप्ति के उत्तरकाल में भी सुख-निद्रा का संवेदन होता है। संवेत्ता अक्षुण्ण है। जल की लहरियों के साथ प्रतिबिम्ब हिलता है' किन्तु चन्द्रमा के साथ उस क्रिया का स्पर्श नहीं होता— ‘वेल्लत्सु प्रतिबिम्बेषु जलस्पन्दानुवर्तिषु । यथेन्दोर्न क्रियावेशस्तथाऽत्र परमात्मनः ॥’२ अवस्थायें नाचती हैं, अपना रूप बदलती हैं, किन्तु परमात्मा से उनका संबन्ध नहीं है। अंग की कोई भी चेष्टा अंग से भिन्न नहीं प्रत्यूत् अभिन्न है उसी प्रकार कोई भी भेद परमात्मा की अंग-चेष्टा ही है। द्रष्टा इन्द्रियों से अर्थ-ग्रहण करता है तो ‘जाग्रत्’, और उनके बिना केवल मन से अर्थ-ग्रहण करता है तो ‘स्वप्न’ और जहाँ न अर्थ है न स्मरण वह है ‘सुषुप्ति’। किन्तु आत्मा शुद्ध बोधैकस्वरूप है—ज्यों का त्यों है। यही उसकी तुरीयता है—३ अक्षैर्योऽर्थग्रहो द्रष्टुस्तज्जाग्रदिति कथ्यते । यत्तैर्विनार्थस्मरणं मनसा स्वप्नसंज्ञितम् ॥ यत्रार्थस्मरणे नस्तत् सौषुप्तमुदाहृतम् । शुद्धबोधैकरूपो योऽवस्थाता सैव तुर्यता ॥४ किसी किसी का कथन है कि अवस्थाएँ तो विश्व के अन्तर्गत हैं किन्तु अवस्थाता नहीं। प्रत्यभिज्ञा आदि युक्ति से उसका खण्डन करने के लिए ही कारिकाकार ने अग्रिम कारिका कही है— अवस्था एवं विश्वान्तर्नावस्थातेति ये जगुः । प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥५ ‘जाग्रदादि’ = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति (तुरीय, तुरीयातीत) अवस्थायें। यद्यपि ईश्वर तत्त्व किसी के द्वारा भी निरुद्ध नहीं किया जा सकता किन्तु जाग्रतादि अवस्थाओं में वह गुप्त रहता है और किसी के अनुभव में नहीं आता। ग्रन्थकार तर्क करता है कि प्रतिपक्षी मेरे कथन को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि ऊपर उठाई गई शंका अद्यावधि अनुत्तरित है। इसी तारतम्य में ग्रन्थकार आगे कहता है कि यद्यपि व्यक्तिगत विभिन्नताओं के प्रवाह में जो कि जाग्रत आदि अवस्थाओं से पृथक्

१-५. उत्पलाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका।

८० स्पन्दकारिका

नहीं हैं तथापि पृथकत्व प्रतीत होता है लेकिन वह तत्त्व अपने प्रत्यभिज्ञा (Cognition) के सत्स्वरूप से कभी अपने को पृथक् नहीं करता अर्थात् अपने सत्स्वरूप से च्युत नहीं होता ॥१ विभेदेऽपि—भिन्न होने पर भी, पृथक् होने पर भी । प्रसर्पति = (प्रकृष्टेन सर्पति) —प्रसरण करती है, चलती है । ‘निवर्तते’ = यद्यपि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थायें पृथक्-पृथक् हैं अतः स्पन्द तत्त्व, एक होता हुआ भी व्यवहार में पृथक्-पृथक् अवस्थाओं में व्यवहार करने के कारण, एकाधिक सा प्रतीत होता है किन्तु सत्य तो यह है कि यह स्पन्द तत्त्व स्वस्वभाव से उपलब्धृरूप से—स्वसंवित्स्वरूप से कभी निवर्तित (च्युत या पृथक्) नहीं होता— ‘तत् स्पन्दतत्त्वं निजादात्मीयात् स्वभावादुपलब्धृरूपात् स्वसंवित्स्वरूपात्रैव निवर्तते ॥’२ ऐसा क्यों ? क्योंकि वह सभी अवस्थाओं में (बिना परिवर्तन या पार्थक्य के, बिना किसी विभेद के) स्वस्वरूप में विद्यमान मिलता है । अतः स्पष्ट है कि तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में स्पन्द तत्त्व का उपलब्धृरूपत्व सामान्य रूप से (अपृथक् रूप से, अपरिवर्तित दशा में) विद्यमान रहता है । जाग्रत एवं स्वप्न दशाओं के अनुभवों में तो स्पन्दतत्त्व की एकता की धारा अविच्छिन्न रहती ही है किन्तु जब व्यक्ति सो जाने के समय अपने को भूल जाता है—उसे अपनी विद्यमानता की भी स्मृति नहीं रह जाती— आत्मप्रत्यभिज्ञा भी सुषुप्त हो जाती है—ऐसी सुषुप्ति की दशा में भी (जब व्यक्ति सोकर उठता है तो जो यह कहता है कि ‘मैं अत्यन्त सुखपूर्वक सोया’—इस अनुभूति के कारण यही सिद्ध होता है कि सारी अवस्थाओं के पृथक्-पृथक् होने पर भी उनमें एक वस्तु अवश्य है जो कि अविच्छिन्न निरन्तरता बनाए रखती है अतः) स्पन्द तत्त्व अपरिवर्तित रूप में अखण्डतः एक ही रहा आता है । संवेदन भले ही पृथक्-पृथक् हो जायें, अवस्थायें भले ही पृथक्-पृथक् हो जायें किन्तु अवस्थातीत स्पन्द तत्त्व या संवेत्ता प्रारंभ से अन्त तक सभी अवस्थाओं में अक्षुण्ण रूप में एक ही रहा आता है ‘संवेत्ता निर्दिष्ट एव भवति ।’३ ‘विभेदे’ (विशेषेण भेदो विभेदः तस्मिन्) = विशिष्ट प्रकार के भेदों के होने पर ।४ ‘अभित्रे’ = वह स्पन्दतत्त्व ताद्रूप्य में अवस्थित होने के कारण आद्योपान्त निरन्तर एकरूप, तद्रूप एवं स्वस्वरूपावस्थित रहा आता है— ‘किंभूते? तदभिन्ने? तस्यैव ताद्रूप्येणावस्थानात् ।’५ ‘तत्तत्वं ... सर्वस्यात्मभूताच्च अनुभवितृरूपात् स्वभावात्रैव निवर्तते ॥ यदि हि स्वयं निवर्तेत तज्जाग्रदाद्यपि तत्प्रकाशं बिना कृतं न किंचित् प्रकाशेत् । उपलब्धृता च एतदीया जाग्रत्स्वप्नयोः सर्वस्य स्वसंवेदनसिद्धा, सौषुप्ते यद्यपि सा तथा न चेत्यते तथापि एव च स्वभावात् न निवर्तते ॥’६


१. अचार्य क्षेमराजः—स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दप्रदीपिका । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका । ६. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः ८१ आचार्य क्षेमराज इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यद्यपि चेतना की जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति की धारायें पृथक्-पृथक् हैं एवं योगियों को अवधान, धारणा, एकाग्रता ध्यान एवं समाधि आदि के रूप में भी वे पृथक्-पृथक् दृष्टिगोचर होती हैं तथापि वह स्पन्द तत्त्व जो कि समस्त विश्व के जीवन का प्राणतत्त्व है (वह) अपरिवर्तित रूप में नित्य, एकरस एवं अखण्डप्रवाहित रहा करता है क्योंकि यदि वही निवर्तित हो जाय-तब तो जाग्रत = स्वप्न-सुषुप्ति की अवस्था में प्राणी में जाग्रत अवस्था वाली प्रत्यभिज्ञा- शक्ति (Cognitive Power) तो विद्यमान नहीं रहती तथापि इस अवस्था में भी उसका वहाँ अस्तित्व विद्यमान ही रहता है क्योंकि उसे सुषुप्ति के पूर्व की, स्वप्न की, एवं सुषुप्तिगत सुस्वाप की अनुभूतियाँ सोने के बाद पुनः जागने पर भी अविच्छिन्न रूप में बनी रहती हैं। स्पन्द तत्त्व अपने यथार्थ स्वरूप या बोधस्वरूपता से कभी पृथक् नहीं हुआ करता चाहे उसके माहात्म्य के कारण जागृत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि अवस्थायें भले ही नष्ट क्यों न हो जायें। 'एव'—यहाँ 'एव' शब्द 'अपि' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।¹ भाव यह है कि— उनकी (उन अवस्थाओं की) अनुपस्थिति में भी वह नित्य स्पन्द तत्त्व अपने स्वस्वरूप से च्युत नहीं होता—निरुद्ध नहीं होता। 'तदभिन्ने' का अर्थ क्या है? 'उससे भिन्न नहीं' अर्थात् इसका प्रथम तात्पर्य है— 'नानुभूयते न निरुध्यते । न निरोत्स्यते ।'² 'तदभिन्ने' = 'उससे भिन्न नहीं'। अर्थात् जागृदादि अवस्थाओं में तो परस्पर भिन्नता है किन्तु 'स्पन्दतत्त्व' में भिन्नता नहीं है। 'तदभिन्ने' = जागृदादि अवस्थाओं से अभिन्न। अर्थात् जागृदादि अवस्थायें भले भिन्न-भिन्न हों तथा स्पन्दतत्त्व भी अभिन्न होने के कारण इन अवस्थाओं से भिन्न हो तथापि यह मानना ही पड़ेगा कि तत्त्वतः ये जागृदादि अवस्थायें भी स्पन्द तत्त्व से अभिन्न हैं क्योंकि वे उसी का आश्रय लेकर जीवित रहने के कारण स्पन्द से एकरूप हैं। शिवस्वभाव से अभेदात्मक रूप में प्रकाशमान होने के कारण अवस्थायें भी प्रकाशरूप हैं—'तस्मात् शिवस्वभावाद् अभेदेन प्रकाशमानत्वात् प्रकाशरूपेत्यर्थः ।'³ जो एकात्मक है वह किस प्रकार उसके निवृत्त हो जाने पर भी स्थित रह सकेगा ? किसी भी एक वस्तु की सत्ता एक दूसरे के बिना असंभव है।⁴ 'अभिन्न' = शिवतत्त्व । स्वस्वभाव = आत्मा । 'स्वस्वभाव' = निर्मलचिन्मात्ररूप । जो पदार्थ इदन्तापन्न प्रमेयों का प्रकाशक होने के कारण उनकी स्थिति (अस्तित्व) का मूलाधार हो, जो कर्ता होने के कारण प्रमेयों का कारण (उत्पत्तिस्थान) हो और जो अपनी अनवच्छिन्न महिमा से महिमान्वित निर्मल- चिन्मात्रैकरूप हो—वही है 'स्वस्वभाव'। 'यः पदार्थः सर्वस्य इदन्तापन्नतया प्रमेयभूतस्य ... प्रकाशकत्वेन स्थितिहेतुत्वात् आधारभूतः .... अनवच्छिन्नमहिमा निर्मलचिन्मात्रैकरूपः १-४. स्पन्दनिर्णय । स्पं० ६

८२ स्पन्दकारिका

स इह स्वस्वभावशब्देनाभिहितः न तु जात्याद्यवच्छिन्नाभिमानसङ्कोचितात्मनो मायाशक्त्य- पह्नुत स्वैश्वर्यसंविदः कार्यवर्गान्तःपातिनः प्राणिप्रबन्धस्य स्वरूपं स्वस्वभावः' इति युक्तम् उक्तम् 'आत्मैव शङ्कर' इति ॥ १ 'न निवर्तते' = अन्यथा । नहीं हो जाता, पृथक् नहीं हो जाता (नान्यथा भवति। न च्यवते ।)² 'स्वस्वभावात्' = स्वरूप द्वारा उसका 'स्वभाव' है कैसा ? उत्तर—'उपलब्धृतः' अर्थात् उसका स्वभाव उपलंभक, ज्ञाता एवं अनुभविता का है अर्थात् वह 'उपलब्धृलक्षण' है । 'विभेद'-व्यतिरेक । अवस्थाओं का अन्योन्य वैलक्षण्य । 'जाग्रदादि' = जाग्रत आदि अवस्थायें । 'आदि' = स्वप्न, सुषुप्ति की अवस्थायें । 'स्वप्न' की अवस्था में स्मृति आदि एवं 'सुषुप्ति' की अवस्था में मद, मूर्च्छा आदि अवस्थायें अन्तर्भूत हैं । 'जाग्रत अवस्था' का क्या अर्थ है?—'यस्यां श्रोत्रादिभिः इन्द्रियैः शब्दादीन् इन्द्रियार्थान् गृहणन् प्रसृतशक्तिः पुरुषः परिस्पन्दते' (अर्थात् जिसमें श्रवणेन्द्रिय आदि इन्द्रियों से शब्दादिक ऐन्द्रिय विषयों को ग्रहण करके बाहर फैली हुई पुरुष रूप शक्ति परिस्पन्दन करती है उसे जागृतावस्था कहते हैं ) । 'स्वप्नावस्था' किसे कहते हैं ? —'स्वप्नः स्वापावस्था, यस्यां स्वव्यापारपरि- श्रान्तः श्रोत्रादिविहार-विरतावपि मनसैव असौ विषयान् परिगृह्णाति ।' (अर्थात् वह अवस्था जिसमें कि इन्द्रियों के द्वारा स्वव्यापार से परिश्रान्त होकर श्रवणेन्द्रियादिक इन्द्रियों के विरत हो जाने पर भी केवल मन के द्वारा विषयों का ग्रहण किया जाता है 'स्वप्नावस्था' कहलाती है) । 'सुषुप्ति अवस्था' किसे कहते हैं? 'सुषुप्तं गाढ़निद्रारूपा सुखस्वापावस्था, मनो व्यापारस्यापि व्युपरमे सति यत्र व्यतिरिक्तं वेद्यसंवेदनं तात्कालिकं नास्ति ॥' (अर्थात् सुखपूर्वक सोने की वह प्रगाढ़ावस्था जिसमें मन भी व्यापार करना बन्द कर देता है और व्यक्ति को व्यतिरिक्त वेद्य-संवेदन का तात्कालिक ज्ञान भी नहीं होता 'सुषुप्ति की अवस्था' कहलाती है ।) । 'विभेदेऽपि' = विभिन्न अवस्थाओं में प्रवर्तमान रहने पर भी । 'न निवर्तते' = अपने उपलंभक, उपलब्धा स्वभाव से निवर्तित नहीं होता । समस्त अवस्थायें (जागृतादिक अवस्थायें) उसके अन्तर्गत ही स्थित हैं। यदि यह उपलब्धा अवस्थात्मक होता तो अवस्थाओं के पृथक्-पृथक् रूप में स्थित होने पर वह भी पृथक्-पृथक् स्वरूपों में रूपान्तरित (विभिन्न रूपों में विभाजित) हो जाता किन्तु ऐसा नहीं होता—'यदि अवस्था-त्मक एव अयम् उपलब्धा स्यात् तत् अवस्थावत् सोऽपि विभिद्येत ॥' 'अपि'—भी । यह स्वभाव से (अवस्था व्यतिरेक से) निवर्तित नही होता । इसका प्रमाण यह है कि अवस्थाओं के भिन्न-भिन्न होने पर भी उपलब्धृलक्षण अवस्थाओं के भिन्न-भिन्न होने पर भी उपलब्धृलक्षण अवस्थाता भिन्न-भिन्न रूपों में बदलता हुआ


१-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।

प्रथमः निष्यन्दः ८३ स्वरूपच्युत नहीं होता प्रत्युत् अभेदस्वरूप ही रहता है—यही सभी को अनुभव होता है—‘अवस्थाभेदेऽपि उपलब्धृलक्षणस्य अवस्थातुः अभेदः, इति सर्वस्य अत्र स्वानुभवः प्रमाणम् ।।'¹ ‘जो मैं सोया था वही मैं अब जाग रहा हूँ'—इस प्रकार की एकानुसंधानात्मक अनुभूति जाग्रदादिक सभी अवस्थाओं में चलती रहती है । जिस प्रकार एक देह में अवस्थाव्यतिरिक्तस्वरूप उपलब्धा एक ही रहता चला आता है । उसी प्रकार समस्त देहों में भी एक ही आत्मा रूप उपलब्धा निरन्तर एक ही रहता चला आता है ।² प्रत्येक प्राणी में जो ‘अहमस्मि' की पृथक्-पृथक् अनुभूति होती है यह पार्थक्य- संवलित अस्मद् प्रत्यय मायीय है न कि तात्त्विक । योगशास्त्रों में प्रख्यात जाग्रदादिक अवस्थाओं में भी उस आत्मसंवित् में अभेदता बनी ही रहती है क्योंकि संवित् तत्त्व वहाँ भी उपलब्धक के रूप में ही स्थित रहता है । क्योंकि—योगशास्त्र की साधनावस्थाओं- एवं जाग्रदादिक अवस्थाओं में भी साम्य है, अभेद है—अभिन्नता है । (‘एताभिः अवस्थाभिः योगशास्त्र प्रसिद्धास्वपि जाग्रदाद्यवस्थासु तस्य अभेदः प्रति- पादितो वेदितव्य । तास्वपि तस्य उपलब्धृत्वेन व्यापकत्‍या अवस्थानात्') । १. जाग्ररावस्था एवं धारणा में अभेद—³ ‘तत्र ध्येये अर्थे झगिति प्रवृत्तिमात्रं जाग्ररावस्था, धारणा इति क्वचित्प्रसिद्धा ।' २. स्वप्नावस्था एवं ध्यान में अभेद—⁴ ‘तत्रैव विसदृशप्रत्ययपरिहारेण समान प्रत्यय प्रवाहैकतानतानुसंधानं स्वप्नावस्था ध्यानम् इति याम् आहुः । ३. ‘सुषुप्तावस्था एवं समाधि में अभेद—⁵ ‘क्रमेण ऐकायातिशयात् प्रत्ययान्तरासंकीर्णसूक्ष्मध्येयाभासमात्रविशेषता चित्तस्य संवेद्यसुषुप्तावस्थायां वितर्कविचारानन्दास्मितानुरूपानुगमलक्षस्य संप्रज्ञातस्य समाधेः आनन्दास्मितामात्रानुगतम् अवस्थाविशेषम् आचक्षते । यस्तु—‘विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः' (पा० १७)— इति कृतलक्षणः असंप्रज्ञातसमाधिः, तत अप-वेद्य सुषुप्तम् ।। (सर्वासु एतासु च अनुभावितृरूपस्य व्यापकस्य एकस्य स्वभावस्य सत्ता स्थितैव) ।।⁶ सारांश यह कि इन समस्त योगावस्थाओं एवं जीवों की जाग्रदादिक सभी अवस्थाओं में अनुभविता, अद्वैत, सर्वव्यापक संवित्तत्त्व रूप स्वस्वभाव की सत्ता अखण्ड रूप में प्रवाहित है और वह अभेदरूप है । ४. सालम्बन समाधि—‘यतः सालम्बने तावत् समाधौ व्यतिरिक्तवेद्यसद्भावात् लौकिकावस्थावत् वेदकस्य उपलब्धुः सत्वं स्फुटम् एव ।⁷ ५. निरालम्बन समाधि—‘यत्र तु निरालम्बनत्वात् अभावरूपत्वं तत्र तत्कालमेव १-७. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।

८४ स्पन्दकारिका वेद्यासंवेदनमात्रं न तु वेदकस्य वेदकत्वाभावः सुषुप्तादिवत्' ततो निःसृतस्य सा अवस्था स्मर्त्तव्यतां वेद्यत्वम् आपन्ना व्यापकस्य सद्भावम् अभिव्यञ्जयत्येव ।'१ कहा भी गया है— 'जाग्रदादिनापि भेदे प्रवर्तमाने न तस्य स्वरूपमाव्रियते ॥'२ परिणामवाद एवं विवर्तवाद— आचार्य क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में प्रश्न उठाते हैं कि— 'जाग्रदादिविभेदेऽपि' शब्दावली में कारिकाकार का ध्वन्य क्या है? १. 'परिणाम' या कि २. 'विवर्त'? १. परिणामवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कारिकाकार ने परिणामवाद का प्रतिपादन नहीं किया है अतः 'तावन्न परिणामोऽस्ति ।।' किरणागम में भी कहा गया है कि—'परिणामोऽचेतनस्य चेतनस्य न युज्यते' अर्थात् परिणाम तो केवल अचेतन का हो सकता है किसी चेतन का नहीं।३ यदि अवस्थाओं की यह अभिव्यक्ति थोड़ी भी चित् तत्त्व से भिन्न होती तो अपर भी पूर्ववर्ती के विकास पर वही हो जाएगा क्योंकि वह विकास है और ऐसी स्थिति में कोई भी प्रकाशित नहीं हो सकता । अतः परिणाम के लिए कोई स्थान नहीं है । आचार्य क्षेमराज कहते हैं— 'अवस्था प्रपञ्चोऽपि यदि चिन्मात्रात्परिणामतया मनागपि अतिरिच्येत् चिद्रूपं वा तत्परिणतौ मनाग् अतिरिच्येत् तन्नकिञ्चिच्चकास्यादिति तावन्न परिणामोऽस्ति ॥'४ २. विवर्तवाद का खण्डन—भासमान यह विश्व एवं उसकी अवस्थायें असत्य नहीं है क्योंकि तब तो स्वयं ब्रह्म भी असत्य सिद्ध हो जाएगा क्योंकि विश्व भगवान् का रूप ही तो है 'न च भासमानोऽसौ असत्यो ब्रह्मतत्त्वस्य अपि तथात्वापत्तेः— इत्यसत्यविभक्तान्यरूपोपग्राहिता विवर्त इत्यपि न संगतम् ।' फिर कारिकाकार का ध्वनित क्या है? वस्तुतः कारिकाकार 'विभेदेऽपि तदभिन्ने' पदावली का प्रयोग करके 'भगवान् के अति दुर्घटकारित्व' को प्रकाशित करना चाहता है—'अनेन चातिदुर्धटकारित्वमेव भगवतो ध्वनितम् ॥'५ आचार्य क्षेमराज यह भी व्याख्या करते हैं कि कारिकाकार ने 'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने' पदावली का जो प्रयोग किया है और उसके द्वारा विभेद होते हुए भी स्वाभेद प्रदर्शित करना और इस प्रकार भेदाभेदोभय की अभिव्यक्ति करना (१) पर (२) अपर एवं (३) परापर—इस शक्तित्रय से युक्त भगवान् का ही जगत् के रूप में स्फुरित होना प्रमाणित करता है । 'विवर्त' मिथ्यावाद का पोषक है । किन्तु सत्य तो यह है कि जाग्रदादि अवस्थाओं में अवस्थित होने पर भी यह संवित् तत्त्व स्वस्वभाव का परिशीलन करता हुआ कोई अन्य नहीं है प्रत्युत मात्र शङ्कर ही है । अतः विवर्त का तो प्रश्न ही नहीं उठता ॥६ 'अभिन्ने' पद, परमात्मा द्वारा असंभव वस्तुओं को भी उत्पन्न करने की क्षमता का १-६. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' ।

प्रथमः निष्यन्दः ८५ द्योतक है । परमात्मा (१) परा (२) अपरा एवं (३) परापरा शक्तियों के रूप में प्रकट होता है क्योंकि वह जाग्रदादि अवस्थाओं की स्वतन्त्र व्यक्तिगत सत्ता (Individuality) एवं उसके साथ अपनी अभेदात्मकता व्यक्त करता है । परमात्मा जाग्रदादि अवस्थाओं में रहता हुआ भी अपने स्वस्वरूप की गवेषणा एवं साक्षात्कार करता रहता है ॥ १ आचार्य रामकण्ठ— 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं कि जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय एवं तुरीयातीत आदि विभिन्न अवस्थाओं में तो आत्मा एक रूप रहती ही है किन्तु अन्य अवस्थाओं में भी वह अविचल, अप्रभावित, अरूपान्तरित, अपरिवर्तित एवं एक रस तथा एक रूप (समस्वभाव, स्वस्वभाव) रहती है यथा— १. स्मृत्यावस्था में—'स्मृत्यावस्था अनुभूतविषयासंप्रमोषात्मिका स्वप्न सदृशी, मनसैव विषयग्रहणसाम्यात् ॥ २. मदावस्था में—'मदः पानातिशयजः चित्तेन्द्रियवृत्ति प्रमोषरूपो विकारः' । ३. मूर्च्छावस्था में—'मूर्च्छा विषादविषादिभोजनादिजनित मोहात्मा' । इसी प्रकार वेद्योँ के ग्रहणाभाव साम्य से सुषुप्ति तुल्य अन्य चेतनावस्थायें भी हैं वे सभी इन्हीं में अन्तर्भूत हैं । किन्तु इन किसी भी अवस्था में आत्मा क्यों न हो किन्तु वह अपने नित्यात्मक स्वस्वभाव, स्वस्वरूप का त्याग कभी नहीं करती—'एतन्निमित्तके विभेदे प्रवर्तमानेऽपि, निजात् उपलब्धुः स्वभावात् असौ न निवर्तते ॥ यदि आत्मा भी अवस्थाओं के साथ अपना रूप, या अपनी अवस्था परिवर्तित कर देती तो—तब तो अवस्थाओं के साथ वह भी बदल जाती—'तत् अवस्थात् सोऽपि विभिद्येत, किन्तु ऐसा होता नहीं । कारिकाकार ने 'अपि' शब्द का प्रयोग क्यों किया ? रामकण्ठ कहते हैं कि— एकस्वभाव, समधर्मा रहकर प्रसरण करती है और 'अयं स्वभावात् अवस्था व्यतिरिक्तात् न निवर्तते इति + अपि शब्दस्य अर्थः'—इसीलिए यहाँ 'अपि' शब्द प्रयुक्त हुआ है । 'तदभिन्ने' क्यों कहा? अवस्थाता होते हुए भी आत्मा अनेक भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में अपने स्वभाव से निवर्तित नहीं होती इसीलिए 'तदभिन्ने' (उनसे भिन्न रूप में किन्तु अपने सत्स्वभाव में अभिन्न रहकर) कहा गया अवस्थाभेदों में भी अवस्थाता अभेदात्मक ही रहता है । 'स्वभाव' क्या है? 'स्वस्वभाव एव शङ्कर इति सम्यक् उपपादितं स्वानुभावा- नपह्नविनः प्रबुद्धान प्रति ।' अवस्थात्रय में भी एकत्व द्वितीय कारिका में आन्तर एवं बाह्य दोनों अवस्थाओं में एक ही स्वभाव (स्पन्दतत्त्व) की व्याप्ति का प्रतिपादन किया गया था । समस्त भेदों में भी अभेद— प्रश्न--जब जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में भिन्नता है फिर सभी में स्वभावगत एकता को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? १. स्पन्दनिर्णय ।

८६ स्पन्दकारिका कारिकाकार इसके उत्तर में कहते हैं कि— (१) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि विभिन्न अवस्थाओं में भी भेद-विमुक्त सत्ता समान रूप से वेदक (प्रमाता) के रूप में अवस्थित रहता है। (२) इन विभिन्न अवस्थाओं के प्रसरण के समय भी वह सत्ता अपने अनुभूत्या- त्मक (अनुभविता) स्वभाव से च्युत नहीं होता। भट्टकल्लट कहते हैं कि— ‘जाग्रदादिनापि भेदे प्रथमाने न तस्य स्वरूपम् आव्रियते, यस्मात् उपलब्धृरूपत्वं त्रिष्वपि पदेषु साधारणाम्, न तस्य स्वरूपान्यथाभावः, यथा विषस्याङ्कुरादिषु च पञ्चसु स्कन्धेषु ॥’ सारांश = १. जाग्रत आदि भेदों के अस्तित्व का भान होने एवं उनका विस्तार (प्रसार) होने पर भी अनुभविता के स्वरूप में कोई भिन्नता नहीं आती। अवस्थायें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं किन्तु उन भिन्नताओं के अनुभव होते रहने पर भी अनु- भविता भिन्न-भिन्न नहीं हो जाता प्रत्युत् एक ही रहता है। उसका स्वरूप आवृत्त नहीं हो जाता। २. अनुभविता के स्वरूप में उसी प्रकार कोई भेद या भिन्नता नहीं आ पाती जैसे कि विष के बीज में उत्पन्न मूल, शाखा, पत्र, फूल एवं फल आदि में व्याप्त विष एवं विष के बीज में व्याप्त विष में कोई भेद नहीं होता। ३. प्रमाता की विभिन्न अवस्थायें निम्नांकित हैं— ‘जाग्रत स्वप्नः सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम्। इति पञ्च पदान्याहुः ... ... ... ... ... ॥’ (तं० १०.२२८) ‘तदभिन्ने प्रसर्पति’—। जाग्रत आदि भेदसमन्वित अवस्थायें भेदशून्य ‘तत्त्व’ से अभिन्न है किन्तु वह ‘तत्त्व’ भेद कल्पना द्वारा (लीला रूप में) भेदों को प्रस्तुत करता है। ‘तदभिन्ने’ = जाग्रदादि अवस्थाओं में पारस्परिक भेद तो है किन्तु उनमें भेद- विमुक्त परासत्ता वेदक के रूप में व्याप्त रहती है। जाग्रदादि = जाग्रत् आदि अवस्थायें— अवस्थायें (चेतना की अवस्थायें)— ──────────────────────────┬────────────────────────── जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय तुरीयातीत गौण अवस्थायें (सां०) (सां०) (सां०) │ ┌─────────┬─────────┬─────────┬─────────┴─────────┐ भ्रान्ति मद मूर्च्छा उन्माद अर्ध सुरादिक मूर्च्छा पानजन्य

प्रथमः निष्यन्दः ८७ 'तुरीय' = अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका। तुरीयातीत = पूर्ण शिवभाव की अवस्था ॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति = (स्पन्द दार्शनिक एवं स्पन्दाचार्यों का अभिष्ट) निर्विकल्पचिद्घनता की भूमिकायें। भेदकल्पना से शून्य अवस्था चिद्घन अवस्था ॥ शाश्वत जागरण की अवस्था। १. 'सर्वसाधारणार्थ विषयं बाह्येन्द्रियजं ज्ञानं लोकस्य जाग्रत 'जागरावस्था' ।— शि०सू०वि०। २. ये तु मनोमात्र जन्या असाधारणार्थविषया विकल्पाः स एव स्वप्नः स्वप्ना- वस्था' ।—शि०सू०वि०। ३. अविवेको विवेचना भावोऽख्यातिः एतदेव सौषुप्तम् ॥—शि०सू०वि०— क्षेमराज ॥ अवस्थाएँ ┌─────────────┬─────────────┐ जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति (योगियों (योगियों (योगियों की धारणा- की ध्याना- की समाधि वस्था) वस्था) की अवस्था) (यौगिक) (यौगिक) (यौगिक) १. जाग्रतस्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगः संभवः ॥ —शि०सू० । २. 'ज्ञानं जाग्रत' (शिवसूत्र) । (१.८) १. 'ज्ञानं जाग्रत' १।८ ॥ २. स्वप्नो विकल्पाः ।१।९। ३. अविवेको माया सौषुप्तम् ।१।१० इन अवस्थाओं की सविस्तार व्याख्या— १. जाग्रत—ज्ञानं बाह्याक्षजं जाग्रत् सर्वसाधारणार्थकम् ॥ १।४६ ॥ २. स्वप्न—स्वप्नः स्वात्मैव संप्रोक्तो विकल्पाः स्वात्मसंभवाः ॥ ३. सुषुप्ति—अविवेको निजाख्यातिर्मायामोहस्तदात्मकः । सौषुप्तं योगिनामेतत्त्रितयं धारणादिकम् । ईश्वरप्रत्यभिज्ञायां जागराद्यपि लक्षितम् ॥ ४८ ॥ शून्ये बुद्ध्याद्यभाव आत्मन्यहन्ताकर्तृतापदे । अस्फुटारूपसंस्कारमायिणि ज्ञेयशून्यता ॥ ४९ ॥ साक्षाणान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता । जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ ५० ॥ तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् । सवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ ५१ ॥

८८ स्पन्दकारिका मनोमात्रपथेऽप्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् । स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ ५२ ॥ सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतरा स्थिरा । सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातॄणां स जागरः ॥ ५३ ॥ इति विस्तरतः प्रोक्ते लोकयोग्यनुसारतः । जगरादित्रयेऽमुष्मिन्नवधानेन जाग्रतः ॥ ५४ ॥ ४. तुर्या— शक्तिचक्रानुसंधानाद्विश्वसंहारकारणात् । तुर्याभोगमयां भेदरख्यातिरख्यातिहारिणी ॥ ५५ ॥ ५. तुर्यातीत—स्फुरत्यविरतं यस्य स तद्वाराधिरोहतः । तुर्यातीतमयं योगी प्रोक्त चैतन्यमामृशन् ॥ वरदराज—'शिवसूत्रवार्तिकम्' सुषुप्ति—ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः ॥ सैव मायावृति जालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता । अर्थस्मृतीस्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥—शि०सू०वा० यस्तु अविवेको विवेचनाभावोऽख्यातिः, एतदेव मायारूपं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी) अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥ (शि०सू०वा०) ग्राह्यग्राहकभेदासंचेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तम्, इत्यप्यनया वचो युक्त्या दर्शितम् ॥ (शि०सू०वा०) दृष्टि स्वभावस्य विभोरन्तर्नव तयोदयः । विकल्पानां स्मृतः स्वप्नस्तदबाह्यार्थनिरासतः ॥ (शि०सू०वा०) जाग्रत अवस्था—जिस अवस्था में पशुप्रमाता की इन्द्रियाँ सामान्य लोगों के विषयों को ग्रहण करने हेतु स्पन्दायमान हो उसे जाग्रत् अवस्था कहते हैं । इस अवस्था के प्रमेय प्रमाता की कल्पना या स्वप्नाश्रित संस्कारों से न उत्पन्न होकर जागतिक स्तर पर एक व्यावहारिक सत्य के रूप में स्थित रहते हैं और एक ही साथ अनेक प्रमाता उनको इन्द्रियगोचर कर सकते हैं । अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से उत्पन्न सुख, दुःख, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, ईर्ष्या, प्रेम, राग, विराग के ज्ञान की इसी व्यावहारिक सत्य की अवस्था को जाग्रत् अवस्था कहते हैं । स्वप्नावस्था—जाग्रतावस्था के बाधित होने पर एवं बाह्य जगत् से ऐन्द्रिय सम्बन्धों के टूट जाने पर जो अन्तर्मुखी काल्पनिक अवस्था उत्पन्न होती है और जिसमें प्रमाता, प्रमेय, प्रमा, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन केवल मन की वृत्तियाँ होती हैं और जो जागने पर बाधित हो जाती है वही संकपविकल्पात्मिकावस्था स्वप्नावस्था है । यह अन्य प्रमाताओं को अज्ञात एवं अननुभूत रहती है, रजोगुण प्रधान है, स्वल्पस्थायी है और जाग्रतावस्था में अस्पन्दित है ।

प्रथमः निष्पन्दः ८९ सुषुप्ति की अवस्था—यह तमोगुण प्रधान अवस्था है । तमोगुण का आधिक्य इतना प्रवर्द्धित हो जाता है कि प्रमाता शरीर, मन, बुद्धि सभी को विस्मृत करके गंभीर मोह में संलीन हो जाता है । इस अवस्था में एतत्कालिक सुख-दुख का स्मरण तो नहीं रहता किन्तु—'मैं सुखपूर्वक सोया'—इत्याकारक स्मृति-रेखायें अवश्य (स्मृति पटल पर) खिंच जाती है । १. जाग्रत में जाग्रत २. जाग्रत में स्वप्न ३. जाग्रत में सुषुप्ति २. स्वप्न में जाग्रत २. स्वप्न में स्वप्न ३. स्वप्न में सुषुप्ति ३. सुषुप्ति में जाग्रत २. सुषुप्ति में स्वप्न ३. सुषुप्ति में सुषुप्ति ये समस्त अवस्थायें एक ही प्रमाता की अंगभूत अवस्थायें हैं—एक ही अवस्थाता न होता तो इन भिन्न अवस्थाओं का एक ही अवस्थाता प्रमाता अनुभव नहीं कर सकता था 'एकमेव ह्यवस्थातारमधिकृत्यासां तथाभावो भवेदिति भावः ॥' (तं०वि०) ये पाँचों अवस्थायें एक ही वेदक में होती है— 'इति पञ्चपदान्याहुरेकस्मिन् वेदके सति ॥' (तं०) 'एकस्मिन् वेदके सतीति । अनेकस्मिन् वेदके अन्यस्य जाग्रदन्यस्य स्वप्न इत्य- वस्थानामवस्थात्वं पञ्चात्मकत्वं च न स्यात् ।' (तं०वि०) । इन समस्त अवस्थाओं में अनुभविता, ज्ञाता, वेदक या उपलब्धक प्रमाता तो एक ही रहता है । अवस्थायें परिवर्तित होती रहती हैं किन्तु अवस्थातीत आत्मा परिवर्तित नहीं होती—समरूप रहती है यदि एक ही अनुभवी या अवस्थाता न रहे तो इन अवस्थाओं का ज्ञान एवं उसकी स्मृति किसे होगी? ये पाँचों अवस्थायें स्वयं प्रमाता की स्वेच्छागृहीत अवस्थायें हैं । अवस्थाओं में बदलाव आता है किन्तु इन अवस्थाओं का अनुभावक कभी नहीं बदलता । चैतन्यसत्ता एक है और विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव भी वही एक सत्ता करती है—अवस्थाओं की भिन्नता के साथ चैतन्यों (वेदकों प्रमाताओं) में भिन्नता नहीं आ जाती ॥ 'माण्डूक्योपनिषद्' में आत्मा को चतुष्पाद बताते हुए एवं उनका विभिन्न अव- स्थाओं में अवस्थान इस प्रकार समझाया गया है और विभिन्न अवस्थाओं में भी एक अभिन्न प्रमाता की स्थिति का प्रतिपादन किया गया है— सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥ १) आत्मा का प्रथमपाद—१. 'वैश्वानर', २. स्वरूप—बहिःप्रज्ञ, ३. अंग—७, ४. मुख—१९, ५. भोक्ता—स्थूल, ६. इस आत्मा की अवस्था—जाग्रत् अवस्था । २) आत्मा का द्वितीय पाद—तैजस । अन्तप्रज्ञ । ७ अंग । १९ मुख । भोक्ता—सूक्ष्म विषयों का । अवस्था—'स्वप्नावस्था' । ३) आत्मा का तृतीय पाद—'प्राज्ञ' । भोक्ता = आनन्द का । मुख—चेतना स्वरूप = ज्ञान । अवस्था—सुषुप्ति । सुषुप्ति अवस्था = 'यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् ॥' स्थिति—'एकीभूत' ।

९० स्पन्दकारिका एक ही आत्मा के तीन भेद है किन्तु उनमें चैतन्य एक ही है । बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः । घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ (माण्डूक्योप०) १. 'विभुविश्व' = बहिष्प्रज्ञ २. 'तैजस' = अन्तःप्रज्ञ ३. 'प्राज्ञ' = घनप्रज्ञ । विश्व का स्थान = दक्षिणनेत्र । तैजस = मन के भीतर । प्राज्ञ = हृदयाकाश में । (एक ही आत्मा शरीर में ३ प्रकार से स्थित है) 'विश्व' = स्थूलभुक् । तैजस—सूक्ष्मभुक् । प्राज्ञ = आनन्दभुक् । इनको जानने वाला ज्ञाता भोगों को भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता । आत्मा का तुरीय स्वरूप— 'तुरीय' का स्वरूप क्या है?— 'नान्तः प्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य- मव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥' ('माण्डूक्योपनिषद') । विश्व और तैजस— स्वप्न एवं निद्रा से आच्छादित । 'प्राज्ञ' = स्वप्नशून्य किन्तु सनिद्र । तुरीय— न निद्रा न स्वप्न । स्वप्नावस्था—अन्यथा गृह्णतः स्वप्नो ॥ (अन्यथा ग्रहण) । निद्रावस्था—निद्रातत्त्वमजानतः ॥ (तत्त्व का अज्ञान) स्वप्न + निद्रा दोनों का अन्त = तुरीय पद ॥ जो आत्मा विभिन्न अवस्थाओं में अवस्थित रहने के कारण भिन्नात्मक दृष्टिगोचर होती है उसे तात्विक दृष्टि से अभिन्न एवं अद्वैतभाव से देखने वाले ही परमार्थदर्शी हैं— एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः । एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशंकितः ॥ (मा० का०) तुर्यपद तो अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका है । स्थायी अवस्थान प्राप्त करने पर यही तुर्यातीत पूर्णशिवभाव है । स्पन्द दार्शनिक इसी तुर्यपद शाक्तभूमिका प्राप्त करने पर बल देकर शिवभाव तक ले जाने का प्रयास करते हैं । तुर्य + तुरीयातीत = निर्विकल्प चिद्घन अवस्थायें । इसमें भेदकल्पना की संभावना नहीं । चिद्घनावस्था सततोदीयमान रहने के कारण शाश्वत जागरण की अवस्था है । साधना-स्तर पर सांसारिकों की जागरण, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थायें— ध्यान, धारणा एवं समाधि की अवस्थायें हैं । शङ्कराचार्य कहते हैं— 'निद्रा समाधि-स्थितिः' । आराधना— यद् यद् कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्' । प्रदक्षिणा— संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः । अपनी वार्ता— 'स्तोत्राणि सर्वागिरो' अपनी आत्मा—शिव । अपनी बुद्धि = पार्वती । शिवसूत्रकार ने भी— 'कथा जपः, 'उद्यमो भैरवः, 'ज्ञानं जाग्रत' 'स्वप्नो विकल्पः ।' अविवेको माया सौषुप्तम् । इच्छा शक्तिः उमा कुमारी, 'दृश्यं शरीरं, 'वितर्क आत्मज्ञानम्, 'चितं मन्त्रः', 'प्रयत्नः साधकः । 'विद्या शरीरसत्ता मन्त्र रहस्यम्, 'शरीरं

प्रथमः निष्यन्दः ९१ हविः' 'ज्ञानं अन्नम्' आत्मा चित्तम्' ज्ञानं बन्धः । 'नर्तक आत्मा' 'रङ्गोऽन्तरात्मा' आदि रहस्यात्मक सूत्रों के द्वारा साधना-प्रयुक्त शब्दों में गुह्य प्रतीकार्थों को ग्रहण किया है । 'विज्ञानाकल' 'प्रलयाकल' एवं 'सकल' ये सभी आत्माओं के ही भेद तो हैं किन्तु चिदात्मा सभी में एक ही है भिन्न भिन्न नहीं । १. जाग्रत में जाग्रत्, जाग्रत् में स्वप्न, जाग्रत् में सुषुप्ति । २. स्वप्न में जाग्रत्, स्वप्न में स्वप्न, स्वप्न, में सुषुप्ति । ३. सुषुप्ति में जाग्रत्, सुषुप्ति में स्वप्न, सुषुप्ति में सुषुप्ति । अवस्थायें भी होती हैं । ज्ञान की सप्त अवस्थाओं में भी इन सूक्ष्म अवस्थाओं का अन्तर्भाव है । समस्त अवस्थाओं एवं मनोदशाओं में एक ही स्पन्दतत्त्व की अनुस्यूतता अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥ ४ ॥ यह तथ्य तो सम्यक् रूप से स्पष्ट है कि 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' मैं अनुरक्त हूँ'—आदि जो संवेदन (विकल्पात्मक ज्ञान) हैं ये किसी अन्य वेदक सत्ता के साथ संबंधित हैं । वह (वेदक सत्ता) इन सभी से पृथक् होने पर भी इन सभी सुखादिक अवस्थाओं में अनुस्यूत है ॥ ४ ॥

  • सरोजिनी * स्पन्दात्मक स्वभाव समस्त अवस्थाओं में अनुस्यूत है । 'जो मैं पहले सुखी था वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों में 'अहं प्रतीति' के रूप में एक ही संवेत्ता की अनुस्यूतता पाई जाती है । (भट्ट कल्लट) स्पन्दप्रदीपिकाकार इस कारिका का प्रतिपाद्य विषय बताते हुए कहते हैं— 'अवस्था एव विश्रान्तर्नावस्थातेति ये जगुः । प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥' अवस्थाओं का परिवर्तन मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का होता है चैतन्य का नहीं । एक ही चैतन्यात्मा की भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं । तीनों अवस्थाओं में उस स्पन्दतत्त्व के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता अन्यथा सोकर उठने पर तीनों अनुभूतियों को कैसे समानरूप से व्यक्त कर पाता ? समस्त अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता अवस्थित है । सुख, दुःख, प्रसाद, विषाद आदि सभी मनोदशाओं में 'अहंप्रतीति' के रूप में एक ही वेदक अनुस्यूत है । 'स्वभाव' सारी अवस्थाओं से भिन्न है । विवृत्तिकार + रामकण्ठाचार्य कहते हैं कि जाग्रदादि अवस्था विशेष में उपलब्धा संवित् तत्त्व 'स्वभाव' से निवर्तित नहीं होता क्योंकि 'स्व' की अर्थात् अपने (उपलब्धा स्वरूप के) ज्ञान की, 'भाव' (अर्थात् स्वानुभवरूप) की एकरूप अवस्थिति की अखण्ड अविच्छिन्नता (या निरन्तरता) इसे प्रमाणित करती है । किन्तु प्रश्न यह उठता है कि

९२ स्पन्दकारिका 'अनुभविता' 'उपलब्धा' अविच्छिन्न संवित् तत्त्व तो अनेक धरातलों पर भिन्न-भिन्न दिखाई पड़ता है फिर उसकी अभिन्नता सिद्ध कैसे की जा सकती है? विवृत्तिकार पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि अनुभविता इन अवस्थाओं में तो इन निम्न प्रकार के प्रत्ययों से घिरा रहता है— १. 'मैं मनुष्य हूँ' मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदत्त हूँ, मैं युवक हूँ, मैं वृद्ध हूँ, मैं कृश हूँ, मैं स्थूल हूँ—इत्यादि। ये सभी प्रत्यय देहालम्बन हैं। २. 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि। ये प्रत्यय बुद्ध्यालम्बन हैं।१ ३. 'मैं बुभुक्षित हूँ, मैं पिपासु हूँ',—इत्यादि। ये प्रत्यय प्राणालम्बन हैं।२ ४. 'मैं कुछ भी नहीं जानता'—इस प्रकार के शून्यता प्रमाता के प्रत्यय हैं। ये प्रत्यवमर्शप्रत्येय सुषुप्तादि अवस्थाओं से प्रतिबुद्ध प्रमाता के प्रत्यय शून्यालम्बन हैं।३ और देह, बुद्धि, प्राण आदि तो अनित्य हैं और इनसे सम्बद्ध आलम्बन भी अनित्य हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उपलब्धता, अनुभविता, एकात्मप्रत्ययसार, अद्वैत एवं अभेद कहा जाने वाला आत्मतत्त्व स्वभाव से निर्वर्तित नहीं होता?— इसी प्रश्न के उत्तर में कारिकाकार ने चौथी कारिका—'अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः' कही है।४ उत्पलदेवाचार्य कहते हैं कि—किसी-किसी का यह कथन है कि अवस्थायें तो विश्वान्तर्गत हैं किन्तु अवस्थाता तो विश्वान्तर्गत नहीं है अतः अवस्थाओं को भी स्वभाव से अभिन्न कैसे कहा जा सकता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि युक्तियों से इसका समाधान करने हेतु कारिकाकार यह चौथी कारिका प्रस्तुत करते हैं— 'अवस्था एव विश्वान्तर्नावस्थातेति ये जगुः । प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥'५ 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं रागी हूँ'—आदि प्रत्यय एवं अनुभव, संवेदन मात्र अवस्थायें हैं। वे भिन्न-भिन्न संवेदनों से पृथक् संवेत्ता या अवस्थाता (सुख दुःखादि के उपलब्धा) में उपराग रूप से सुस्पष्ट रूप में अवस्थित है। किन्तु ध्यातव्य यह है कि संवेत्ता के बिना भिन्न-भिन्न संवेदनों की सिद्धि कभी हो ही नहीं सकती—'संवेत्तारं विना संवेदनस्याभावात्' ।६ (क) क्षणिकज्ञानवादियों का खण्डन—क्षणिकज्ञान वादियों के मत में अनेक नदियाँ समुद्र में मिलकर तादात्म्य के कारण एक जान पड़ती हैं किन्तु यह संवेत्ता केवल अवस्थाओं का तादात्म्य नहीं है— नद्योऽब्धाविव तादात्म्यं प्रतप्रतिष्ठाः प्रयान्ति वा। क्षणिकज्ञानिनां ह्येव न तु ता एव केवलाः ॥ १-३. स्पन्दकारिकाविवृति । ४. स्पन्दकारिकाविवृति । ५-६. स्पन्दप्रदीपिका ।

प्रथमः निष्यन्दः ९३

क्योंकि—कार्यकारणभाव (या बाध्यबाधकभाव तब तक सिद्ध ही नहीं हो सकता जब तक कि पूर्वदशा एवं उत्तरदशा का एक ही प्रमाता न हो—) कार्यकारणभावो हि बाध्यबाधकताऽपि च । पूर्वापरैकमातारमन्तरेण प्रसिद्धयतः ॥१ जब प्रत्येक क्षण विलक्षण (पृथक्-पृथक्, पूर्वापरा सम्बद्ध) होंगे, प्रत्येक संविद् पृथक्-पृथक् होगी तो पूर्ववर्ती प्रमाण से उत्तरवर्ती प्रमेय को बोध कैसे होगा ? सम्बन्ध का ग्रहण किए बिना प्रमाण की गति क्या होगी? संवेत्ता के बिना मिथ्याज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध कैसे होगा? एक क्षण के अनन्तर यदि शुक्तिका रजत हो जाय तो उसे रोक कौन सकेगा?२ वस्तुतः संवेत्ता के एक हुए बिना प्रमाण-अप्रमाण का भेद ही नहीं रहेगा । ऐसी स्थिति में तो घट की सिद्धि होगी किन्तु पट का अनुभव होगा । ३ 'यह वही व्यक्ति है; यह वही वस्तु है; यह वही दृश्य है'—इत्यादि प्रत्यय भी क्षणिकवादियों के मतानुसार संभव नहीं हैं । अतः पूर्वविज्ञान की स्मृति जिसे 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं—यह 'सर्वथा प्रामाणिक है क्योंकि लोकसिद्ध है और दैनन्दिन अनुभवगत है । इसलिए नित्यस्वभाव आत्मा ही संवेत्ता है । वास्तविक बात तो यह है कि एक प्रमाता आत्मा की सिद्धि के बिना प्रमाण भी अप्रमाण हो जाएगा क्योंकि सब कुछ क्षणिक और अनिश्चित रहेगा । क्षणिक ज्ञान में कार्य कारण की सिद्धि कैसे होगी? स्मृति-बीज कैसे होगा? कारण का नाश कैसे हो गया ? यदि नाश नहीं हुआ तो विनाशी कार्य का कारण कैसे हुआ ? अभाव से भाव-परम्परा कैसे चल सकती है? यदि कार्य का नाश नहीं होता तो वह क्षणिक कैसे हुआ? जो दूसरे क्षण रह सकता है वह सौ क्षण तक भी रह सकता है । अभिप्राय यह कि भाव स्थिर हैं । स्वरूपतः भाव का अभाव नहीं होता- 'नासतो विद्यते भावः नाभावो विद्यते सतः ।' आत्मज्ञान में कुछ भी क्षणिक दृष्टिगत नहीं होता । निश्चय के बिना बाध्य-बाधक भाव भी सिद्ध नहीं होता । स्थिरता के बिना शुक्ति में रजत-भ्रान्ति मिटाने का क्या अर्थ होगा? अतः ज्ञान एक है, नित्य है और वह क्षणिक एवं अनेक नहीं हो सकता । 'प्रामाण्ये क्षणिकत्वेन प्रत्यक्षेणोपपद्यते । प्रागभावादुत्तरज्ञानदार्ढ्यात् प्रामाण्यसिद्धितः ॥ प्रतिक्षणमथान्यत्वात् सामान्यस्याग्रहे सति । विलक्षणाः क्षणाः सर्वे प्रामाण्ये किं निबन्धनम् ॥ सम्बन्धस्याग्रहश्चापि तेन मानस्य का गतिः । मिथ्याज्ञानस्य मिथ्यात्वं ब्रूहि वा किं निबन्धनम् ॥ क्षणान्तरे शुक्तिकायां रजतं केन वार्यते । भिन्नज्ञानस्य कर्तृत्वे सर्वं प्रामाण्यमाप्नुयात् ॥


१-३. स्पन्दप्रदीपिका ।