श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ६६ ) यदि कहो कि—पहिले तो कहा था कि निद्रा आदि दशाओं में सविशेष अनुभव रहता है ? ( उत्तर ) ठीक है, कहा था, वह तो आत्मा- नुभव का प्रसंग था । उसमें तो सविशेष अनुभव होता ही है इस बात को तो आगे भी कहूँगा । यहाँ तो समस्त विषयों से रहित निराश्रित संवित् के निषेध का प्रसंग है। केवल संविद ही आत्मानुभव है, ऐसा नहीं है; आत्मानुभवरूप संवित् तो साश्रया है, इसका आगे उपपादन करूँगा । अनुभूति स्वयं स्थित रहते हुए अपने प्रागभाव को सिद्ध नहीं कर सकती अतः अनुभूति का प्रागभाव सिद्ध नहीं होता ऐसा नहीं कह सकते । अनुभूति की अनुभाव्यता के उपपादन से भी तथा अन्य युक्तियों से भी अनुभूति की नित्यता की सिद्धि की बात निरस्त हो जाती है । प्रागभाव आदि की असिद्धि से संवित् की अनुत्पत्ति का समर्थन नहीं किया जा सकता । यद्यप्यस्यानुत्पत्त्या विकारान्तरनिरसनम्, तदप्यनुपपन्न, प्राग- भावे व्यभिचारात् । तस्य हि जन्माभावेऽपि विनाशोदृश्यते । भावे- ष्विति विशेषणे तर्ककुशलताऽविष्कृता भवति । तथा च भवदभिमताऽ- विद्यानुत्पन्नैव, विविधविकारास्पदं तत्त्वज्ञानोदयादन्तवती चेतितस्या- मनैकान्त्यम् । तद्विकाराः सर्वे मिथ्याभूता इति चेत्; किं भवतः परमार्थभूतोऽप्यस्ति विकारः ? येनैतद् विशेषणमर्थवद् भवति । न हि असावभ्युपगम्यते । यद्यपि संवित् की अनुत्पत्ति की स्वीकृति से, संवित् में संभावित अन्यान्य विकारों का भय समाप्त हो जाता है, फिर भी अनुत्पत्ति की बात सिद्ध नहीं हो पाती, क्योंकि संवित् का प्रागभाव सिद्ध हो चुका है । इसके जन्म के अभाव को मान लेने पर भी, प्रत्यक्ष ज्ञात होने वाला इसका जो विनाश है, उसको अस्वीकार नहीं कर सकते । [ जो वस्तु 'विनाशशील है, वह उत्पत्तिशील भी निश्चित है । ] यदि कहो कि, उक्त बात तो संवित् की नित्यता के विषय में भी कही जा सकती है; मेरी समझ में तो ऐसा नहीं आता, हाँ तर्क कुशलता ankurnagpal108@gmail.com
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अवश्य लक्षित होती है। दूसरी बात ये है कि, आपकी अभिमत अविद्या जन्म रहित होते हुए भी अनेक विकारों वाली और तत्त्वज्ञान से नष्ट हो जाने वाली है, संविद् की नित्यता भी इसी से मिलती जुलती है क्या ? यदि कहें कि अविद्या के सारे विकार तो मिथ्या होते हैं; तो आपकी दृष्टि में कोई विकार सत्य भी हैं क्या ? जिससे आपका उक्त विशेषण सार्थक हो सके, सो इसे आप स्वीकार नहीं करेंगे।
यदपि, अनुभूतिरजत्वात् स्वस्मिन् विभागं न सहते इति, तदपिनोपपद्यते, अजस्यैवात्मनोदेहेन्द्रियादिभ्यो विभक्तत्वात् अनादि- त्वेन चाभ्युपगतायाअविद्याया आत्मनो व्यतिरेकस्य अवश्याश्रय- णीयत्वात्। स विभागो मिथ्यारूप इति चेत्, जन्मप्रतिबद्धः परमार्थ विभागः किं क्वचिद् दृष्टः त्वया ? अविद्याया आत्मनः परमार्थतो विभागाभावे वस्तुतो हि अविद्याैवस्यादात्मा अबाधित प्रतिपत्तिसिद्ध दृश्यभेद समर्थनेन दर्शनभेदोऽपि समर्थित एव छेद्यभेदाच्छेदनभेद- नवत् ।
“अनुभूति अजन्मा होने के कारण अपने में भेद को सहन नहीं करती” आपका यह कथन भी सही नहीं है, क्योंकि—जन्मरहित परमात्मा भी देह इन्द्रियादि भागों में विभक्त होता है, अविद्या को अनादि मानकर उसकी परमात्मा से भिन्नता माननी ही पड़ेगी। यदि कहो कि—वह भेद तो काल्पनिक मिथ्या है तो जन्म से प्रतिबद्ध वास्तविक भेद की कहीं आपने देखा है क्या ? अविद्या से आत्मा का वास्तविक भेद न मानने से, वह अविद्या वस्तु ही आत्मा हो जायगी । प्रत्यक्ष सिद्ध दृश्य घट पट आदि भेदों के समर्थन से दर्शन भेद भी समर्थित ही है, जैसे कि—छेद्य वृक्ष आदि के भेदानुसार छेदन की क्रियायें भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं।
यदपि—"नास्या दृशेदृँशिश्वरूपाया दृश्यः कश्चिदपिधर्मोऽस्ति, दृश्यत्वादेवेतेषां न दृशिधर्मत्वं” इति च। तदपि स्वाभ्युपगतैः प्रमाणसिद्धैः नित्यत्व स्वयंप्रकाशत्वादिधर्मैरुभयमनैकांतिकम्। न ankurnagpal108@gmail.com
( ७१ ) च ते संवेदनमात्रम्, स्वरूपभेदात् । स्वसत्तयैव स्वाश्रयं प्रति कस्यचिद् विषयस्य प्रकाशनं हि संवेदनम् । स्वयं प्रकाशता तु स्वसत्तयैव स्वाश्रयाय प्रकाशमानता । प्रकाशश्च चिदचिदशेषपदार्थ साधारणं व्यवहारानुगुण्यम् । जो यह कहा कि—"अनुभूति स्वयं दृष्टि स्वरूप ( ज्ञान स्वरूप ) है इसके लिए कोई भी दृश्य धर्म नहीं है, तथा इसकी जो नित्यता स्वयं प्रकाशता आदि विशेषतायें हैं यदि उन्हें ही दृश्य कहा जाय तो वे भी उक्त मतानुसार दृष्टि स्वरूप अनुभूति से दृश्य नहीं हो सकतीं" आपकी यह उक्ति भी अनुभूति की स्वीकृत प्रमाण सिद्ध नित्यता और स्वयं प्रकाशता आदि धर्मों से अनिश्चित हो जाती है । नित्यता, स्वयं प्रकाशता आदि संवेदन ही हैं ऐसा भी नहीं कह सकते क्योंकि इनसे संवेदन का स्वरूप भेद है । अपनी सत्ता से अपने आश्रित पदार्थ में किसी विषय को प्रकाशित करना संवेदन है तथा अपनी सत्ता से ही अपने आश्रित पदार्थ को प्रकाशित करना स्वयं प्रकाशता है तथा प्रकाश जड़ चेतन सभी सामान्य पदार्थों के व्यवहार के अनुरूप होता है । सर्वकालवर्त्तमानत्वं हि नित्यत्वम् । एकत्वमेक संख्यावच्छेद इति । तेषां जडत्वादिभावरूपतायामपि तथाभूतैरपि चैतन्यधर्मभूतैः तैरनैकान्त्यमपरिहार्यम्, संविदि तु स्वरूपातिरेकेण जडत्वादि प्रत्यनीकत्वमित्यभावरूपोभावरूपो वा धर्मोनाभ्युपेतश्चेत्; तत्तन्निषेधोक्त्या किमपि नोक्तं भवेत् । सर्वकाल वर्त्तमानता ही नित्यता है एक संख्या से परिमित होना ही एकत्व है । इन सबका जड़ता आदि भाव रूप होते हुए भी ये चैतन्य के धर्म हैं; इस प्रकार चैतन्य धर्मता को प्राप्त इन सबकी एकता अनिवार्य हो जाती है । संवित् में तो, स्वरूप से भिन्न जड़ता आदि उक्त समस्त धर्म भाव रूप हों या अभाव रूप, यदि उनका संवित के साथ संबंध नहीं मानेंगे तो, उन सबकी अनुभूति धर्मता का प्रत्याख्यान करना कठिन होगा ।
( ७२ ) अपि च—संवित् सिद्ध्यति वा न वा ? सिद्ध्यति चेत् सधर्मता स्यात् । न चेत्तुच्छता गगनकुसुमादिवत् । सिद्धिरेव संविदिति चेत्, कस्य कं प्रति वक्तव्यम्, यदि न कस्यचित् कंचित् प्रति सा तर्हि न सिद्धिः । सिद्धिर्हि पुत्रत्वमिव कस्यचित् कंचित् प्रति भवति । आत्मनि इति चेत्, कोऽयमात्मा ? ननु संविदेत्युक्तम् । सत्यमुक्तम् दुरुक्तंतत् । तथाहि, कस्यचित् पुरुषस्य किंचिदर्थजातं प्रति सिद्धिरूपतया तत्संबंधिनी सा संवित् स्वयं कथमिवात्मभाव- मनुभवेत् ? एतदुक्तं भवति, अनुभूतिरिति स्वाश्रयं प्रति स्वसद्भावेनैव कस्यचित् वस्तुनोव्यवहारानुगुण्यापादनस्वभावो ज्ञानावगति संवि- दाद्यपरनामा सकर्मकोऽनुभवितुरात्मनो धर्मविशेषो, घटमहं जानामीममर्थमवगच्छामि पटमहं संवेद्मीति सर्वेषामात्मसाक्षिकः प्रसिद्धः । एतत् स्वभावतया हि तस्याः स्वयंप्रकाशता भवताप्युप- पादिता । अस्यसकर्मकस्य कर्तृधर्मविशेषस्य कर्मत्ववत् कर्तृत्वमपि दुर्घटमिति । वह संवित् प्रमाण द्वारा सिद्ध होती है या नही ? यदि होती है, तो वह सधर्मा है । यदि नहीं तो वह गगन कुसुम आदि की तरह तुच्छ काल्पनिक वस्तु है । यदि कहो कि सिद्धि ही संवित् है, तो किसके प्रति किसकी सिद्धि है ? यदि वह किसी के प्रति नहीं है, तो वह सिद्धि नहीं है । सिद्धि तो पुत्रता की तरह, किसी की किसी के प्रति होती हैं । यदि कहो कि आत्मा में होती है, तो बतलाओ उस आत्मा का क्या स्वरूप है ? यदि कहो कि सिद्धि ही संवित् का आत्मा है, तो ठीक ही कहा, उसी बात को पुनः दोहरा दिया । जरा विचारो तो, किसी पुरुष की किसी विषय की सिद्धि रूप, उससे सबंधिनी वह अनुभूति, स्वयं अपने भाव का अनुभव कैसे कर सकेगी ? कथन यह है कि—अनुभूति अपने सद्भाव से अपनी आश्रित किसी वस्तु को व्यवहार योग्य कर देती है । ज्ञान, अवगति, संवित् आदि सब उसी के दूसरे नाम हैं, वह बिना कर्म के स्थिर नहीं रहती, इसलिए वह सकर्मक है, अनुभव कर्त्ता आत्मा का धर्म ankurnagpal108@gmail.com
( ७३ ) विशेष ही अनुभूति है “मैं घट को जानता हूँ”—इस विषय का मैं ज्ञाता हूँ—“पट का अनुभव करता हूँ” इत्यादि सभी आत्माओं की प्रतीति के रूप में अनुभूति की प्रसिद्धि है आपभी इसके इस स्वभाव के कारण, इसकी स्वयं प्रकाशता का प्रतिपादन करते हैं। कर्तृगत धर्म विशेष, कर्मसापेक्ष अनुभूति, जैसे स्वयं कर्म नहीं हो सकती, वैसे ही इसमें कर्तृता भी असंभव है। तथाहि, अस्यकर्त्तुः स्थिरत्वं कर्तृधर्मस्य संवेदनाख्यस्य सुख दुःखादेरिवोत्पत्तिस्थितिनिरोधाश्च प्रत्यक्षमीक्ष्यन्ते। कर्तृ स्थैर्यंतावत् स एवायमर्थः पूर्वंमयानुभूत इति प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्षसिद्धम्। अहं जानामि अहमज्ञासिषम्, ज्ञातुरेव ममेदानींज्ञानंनष्टमिति च संवित् उत्पत्त्यादयः प्रत्यक्षसिद्धा इति कुतस्तदैक्यम्। एवं क्षणभंगिन्याः संविदः आत्मत्वाभ्युपगमे पूर्वेद्युर्दृष्टमपरेद्युरिदमदर्शमिति प्रत्यभिज्ञा च न घटते, अन्येनानुभूतस्य न हि अन्येन प्रतिज्ञान संभवः। तथा, संवित् का कर्त्ता स्थिर होता है, कर्त्ता के संवेदन नामक धर्म के सुख दुःख आदि की तरह, उत्पत्ति, स्थिति और विनाश प्रत्यक्ष दीखते हैं। कर्त्ता की स्थिरता “यह वही पदार्थ है जिसकी मैंने पहिले अनुभूति की थी इस प्रत्यभिज्ञा से प्रत्यक्ष सिद्ध है।” मैं जानता हूँ—“मैं इस विषय का ज्ञाता हूँ”—“यह वस्तु मेरी जानी हुई है, इस समय मैं इसे भूल रहा हूँ” ऐसी अनुभूतियों से अनुभूति की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश प्रत्यक्ष सिद्ध है, इसलिए ज्ञाता और ज्ञान की एकता कैसे संभव है ? ऐसी क्षणस्थायी संविद् को यदि आत्मा मान लिया जाय, तो पहिले दिन के दृष्ट पदार्थ की दूसरे दिन “मैंने इसे देखा था” ऐसी प्रतीति संभव नहीं हैं। अन्य की अनुभूत वस्तु की कोई अन्य व्यक्ति तो प्रत्यभिज्ञा कर नहीं सकता। किं च अनुभूतेरात्मत्वाभ्युपगमे तस्या नित्यत्वेऽपि प्रतिसंधान असंभवस्तदवस्थः। प्रतिसंधानं हि पूर्वापरकाल स्थायिनमनुभवितार- मुपस्थापयति, नानुभूतिमात्रम्। ankurnagpal108@gmail.com
( ७४ ) अहमेवेदं, पूर्वमप्यन्वभूवमिति । भवतोऽप्यनुभूतेर्नहि अनुभवि- तृत्वमिष्टम् अनुभूतिरनुभूतिमात्रमेव । संविन्नाम काचिन्निराश्रया निर्विषया वा अत्यंतानुलब्धेर्न संभवतीत्युक्तम् । उभयाभ्युपेता संविदेवात्मेत्युपलब्धि पराहतम् । अनुभूतिमात्रमेव परमार्थ इति निष्कर्षंक हेत्वाभासाश्च निराकृताः । अनुभूति को आत्मा मानकर उसकी नित्यता हो भी जाय फिर भी उसमें प्रत्यभिज्ञा की असंभावना तो बनी ही रहेगी । प्रत्यभिज्ञा, अनुभव करने वाले की, पूर्व पर कालीन उपस्थिति बतलाती है; केवल अनुभूति की ही स्थिति नही बतलाती । “मैंने इसे पहिले भी जाना था” ऐसी अनुभूति को अनुभविता कहना तो संभव; आपको भी अभिप्रेत न होगा; अनुभूति केवल अनुभूति ही है । निराश्रय और निर्विषय संवित् कभी संभव नही है, उसकी ऐकांतिक उपलब्धि नही होती । “आश्रय और विषय युक्त संविद ही आत्मा है” ऐसा सिद्धान्त प्रतीति सिद्ध भेदानुभव द्वारा पराभूत हो गया तथा “अनुभूति मात्र ही परमार्थ है” इस मत की स्थापना में उपस्थित किये जाने वाले गलत तर्क भी निराकृत हो गए । ननु च—अहंजानामीत्यस्यस्मत्प्रत्यये योऽनिदमंशः प्रकाशैकरसः चित् पदार्थः स आत्मा । तस्मिन् तद्बलनिर्भासिततया युष्मदर्थलक्ष- णोऽहं जानामीति सिद्धयन्नहमर्थः चिन्मात्रातिरेकी युष्मदर्थ एव । नैतदेवं, अहंजानामि इति धर्मधर्मितया प्रत्यक्ष प्रतीति विरोधादेव । (वाद) “मैं जानता हूँ” इस कथन में जो “अहं” रूप चैतन्यांश प्रकाशैकरस पदार्थ है वही आत्मा है।” मैं जानता हूँ “इस प्रतीति में जो अर्थ निहित है वह, उस चैतन्य आत्मा द्वारा ही समुद्भासित होता है, अतः “अहं” का तात्पर्य चिन्मात्र अखंड आत्मा ही है। (विवाद) “मै जानता हूँ” इस प्रत्यभिज्ञा में, धर्म और धर्मी की प्रत्यक्ष भिन्न प्रतीति हो रही है इसी से आपकी उक्त बात कट जाती है । ankurnagpal108@gmail.com
( ७५ ) किं च—अहमर्थो न चेदात्मा प्रत्यक्त्वं नात्मनो भवेत् । अहम्बुद्ध्या परागर्थात् प्रत्यगर्थोहि भिद्यते । निरस्ताऽखिल दुःखोऽह मनन्तानन्दभाक् स्वराट् । भवेयमिति मोक्षार्थी श्रवणादौ प्रवर्त्तते । अहमर्थ विनाशश्चेन्मोक्ष इत्यध्यवस्यति । अपसर्पेदसौ मोक्षकथा- प्रस्ताव गन्धतः । मयिनष्टेऽपि मत्तोऽन्या काचित्ज्ञप्तिरवस्थिता, इति प्राप्तयेत्नः कस्यापि न भविष्यति । स्वसम्बन्धितयाह्यस्याः सत्ताविज्ञप्तितादि च, स्वसम्बन्ध वियोगेतुज्ञाप्तिरेव न सिद्ध्यति । छेत्तुश्छेद्यस्य चाभावे छेदनादेरसिद्धिवत् अतोऽहमर्थो ज्ञातैव प्रत्य- गात्मेति निश्चितम् । विज्ञातारमरे केन जानात्येवेति च श्रुतिः, एतद्योवेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति च स्मृतिः । नात्माश्रुतेरित्यारभ्य सूत्रकारोऽपि वक्ष्यति, ज्ञोऽत एवेत्यतोनात्मा ज्ञप्तिमात्रमितिस्थितम् । अहं का अर्थ आत्मा नहीं है, तथा प्रत्यगात्मा परमात्मा नहीं हो सकता, अहं बुद्धि से एक दूसरी ही वस्तु की प्रतीति होती है, अहं के अर्थ से प्रत्यगात्मा का भिन्न अर्थ है। “मैं समस्त दुःखों से मुक्त हो गया, अनंत आनंद युक्त स्वच्छन्द हूँ” ऐसे मोक्ष की कामना वाला श्रवण आदि नवधा भक्ति में संलग्न होता है । “अहं अर्थ का विनाश ही मोक्ष है” ऐसे मोक्ष कथा के प्रस्ताव की गंध भी जहाँ हो, वहाँ से दूर ही भागना चाहिए। “अहंता” के नष्ट हो जाने पर भी यदि “अहं” से भिन्न किसी प्रकार की ज्ञप्ति होती है तो, ऐसी प्राप्ति के लिए प्रयास किसी में भी नहीं हो सकता । ज्ञान की सत्ता और विज्ञप्ति आदि सब जीव की सत्ता पर ही निर्भर है, यदि इन सबका जीव से संबंध विच्छेद हो जाय तो, ज्ञप्ति की सिद्धि नहीं हो सकती जैसे कि—वृक्ष और वृक्ष के काटने वाले के अभाव में काटना आदि कार्य नहीं हो सकते । इसलिए “अहं” अर्थ का ज्ञाता जीवात्मा ही निश्चित होता है । “विज्ञातारमरे केन जानाति एव” ऐसा श्रुति वचन तथा “एतद्योवेत्तित्तं प्राहुः क्षेत्रज्ञः” ऐसा गीता स्मृति का वचन उक्त कथन में प्रमाण है सूत्रकार भी “नात्माश्रुतेः” से लेकर “ज्ञोऽतएव” सूत्र तक, आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही नहीं हैं, ऐसा निर्णय करते हैं । ankurnagpal108@gmail.com
( ७६ )
अहं प्रत्यय सिद्धो हि अस्मदर्थः युष्मत् प्रत्ययविषयो युष्मदर्थः। तत्राहं जानामीति सिद्धो ज्ञाता युष्मदर्थ इति वचनं जननी मे बन्ध्या इतिवत् व्याहतार्थच । न चासौज्ञाता अहमर्थो अन्याधीन प्रकाशः स्वयंप्रकाशत्वात् । चैतन्य स्वभावता हि स्वयं प्रकाशता । यः प्रकाश स्वभावः सो न अन्याधीन प्रकाशः दीपवत् , न हि दीपादेः स्वप्रभा- बलनिर्भासितत्वेनाप्रकाशत्वमन्याधीन प्रकाशत्वंच । किं तर्हि ? दीपः प्रकाशस्वभावः स्वयमेव प्रकाशते । अन्यानपि प्रकाशयति स्वप्रभया । “अहं” प्रत्यय की सिद्धि अस्मत् शब्द से तथा “त्वं” प्रत्यय की सिद्धि युष्मद् शब्द से होती है। मैं जानता हूँ” इस प्रतीति का ज्ञाता युष्मद्वाची को कहा जाय तो वह कथन “मेरी माता बन्ध्या है” के समान मूर्खतापूर्ण होगा । उक्त प्रतीति का ज्ञाता “अहं” वाची व्यक्ति उक्त प्रतीति में स्वयं प्रकाश है, इसलिए उसे उक्त प्रतीति में अन्य के द्वारा प्रकाशित नहीं कह सकते । व्यक्ति स्वभाव से चैतन्य है, इसलिए उसमें स्वयं प्रकाशता है । स्वयं प्रकाशता दीपक के समान स्वाभाविक और स्वायत्त होती है । दीप आदि अपनी प्रकाश शक्ति से ही उद्भासित होते हैं, दूसरे के प्रभाव से उनमें प्रकाश नहीं होता, अधिक क्या ? वह स्वयं तो प्रकाशित होते ही हैं, अपनी प्रभा से अन्यों को भी प्रकाशित करते हैं । एतदुक्तं भवति—यथैकमेव तेजोद्रव्यं प्रभा प्रभावद् रूपेण अवतिष्ठते । यद्यपि प्रभा प्रभावद् द्रव्यगुणभूता, तथापि तेजो द्रव्यमेव, न शौक्ल्यादिवद् गुणः । स्वाश्रयादन्यत्रापि वर्त्तमानत्वात् रूपवत्वाच्च शौक्ल्यादिधर्म वैधर्म्यात् प्रकाशवत्वाच्च तेजोद्रव्यमेव नार्थान्तरम् । प्रकाशवत्वंच स्वस्वरूपस्यान्येषांच प्रकाशकत्वात् । अस्यास्तु गुणत्वव्यवहारो नित्यतदाश्रयतवतच्छेषत्व निबंधनः । न चाश्रयावयवा एव विशीर्णाः प्रचरन्तः प्रभेत्युच्यन्ते, मणिद्युमणि प्रभृतीनां विनाश प्रसंगात् ।
( ७७ )
कथन यह है कि—जैसे एक ही ज्योति, प्रभा और प्रभावान होती है वैसे ही आत्मा चित्स्वरूप और चैतन्यता दोनों से संपन्न है। यद्यपि प्रभा की प्रभावत्ता उसका गुण है, फिर भी है वह ज्योति रूप ही, शुक्लता, पीतिमा आदि की तरह कोई पृथक् गुण नहीं है। वह ज्योति अपने आश्रय दीप से दूर रहते हुए भी, अपने रूप में उद्भासित होती है, शुक्लता आदि गुणों की तरह न होकर, तेजोमय द्रव्य ही रहती है, कुछ और नहीं। स्वयं को और अपने स्वरूप से दूसरों को प्रकाशित करना ही उसकी प्रकाशता है। ज्योति को रूपवाली होने से रूप गुण संपन्न कहा जाता है। प्रभा की आश्रय दीप ज्योति के अवयव जो इधर-उधर फैलते हैं, उन्हें ही प्रभा कहते हों सो बात नहीं है, यदि ऐसा मानेंगे तो मणि और सूर्य की तो सत्ता ही न रह जायगी। दीपेऽप्यवयवि प्रतिपत्तिः कदाचिदपि न स्यात्, न हि विशरण- स्वभावावयवा दीपादश्चतुरंगुलमात्रं नियमेन पिंडीभूता ऊर्ध्वमुद्गम्य ततः पश्चाद् युगपदेव तिर्यगूर्ध्वमधश्चैकरूपा विशीर्णाः प्रचरन्तीति शक्यंवक्तुम्, अतः सप्रभाकाएवदीपाः प्रतिक्षणं उत्पन्ना विनश्यन्तीति पुष्कलकारणक्रमोपनिपातात् तद् विनाशे विनाशाच्चावगम्यते । प्रभायाः स्वाश्रयसमीपे प्रकाशाधिक्यम् औष्ण्याधिक्यम् इत्यादि उपलब्धि व्यवस्थापि अयमग्न्यादीनां औष्ण्यादिवत्, एवमात्मा चिद्रूप एव चैतन्यगुण इति, चिद्रूपता हि स्वयं प्रकाशता। दीप की ज्योति में अवयव अवययी की बात लागू नहीं हो सकती, और न इसके अवयव फैलने वाले हैं, ऐसा ही कह सकते हैं, क्योंकि दीप की चार अंगुल वाली ज्योति पहिले ऊपर उठकर प्रायः आड़ी तिरछी ऊपर नीचे होती हुई भी एक ही प्रकार की बनी रहती है। रुई तेल आदि वस्तुओं के संयोग से प्रकाशवान दीप, उन वस्तुओं की स्थिति से सत्तावान तथा उनके विनाश से विनष्ट होते देखे जाते हैं। अग्नि के सामीप्य में जैसी ऊष्मा की प्रतीति होती है, ज्योति भी, अपने आश्रय दीप के निकट, वैसी ही ऊष्मा और प्रकाश देती है इसे स्वयं अनुभव करके जाना जा सकता है। इसी प्रकार आत्मा भी चिद्रूप होता हुआ ही चैतन्य गुणवाला है, उसकी चिद्रूपता ही स्वयं प्रकाशता है। ankurnagpal108@gmail.com
( ७८ ) यथाहि श्रुतयः—“सयथां सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एव, एवं वाअरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव”—विज्ञानघन एव”—अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति” “न विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपोविद्यते”—“अथयोवेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा—“कतम आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः—‘‘एष द्रष्टा श्रोता रसयिता घ्राता मंता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः”—‘‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”—‘‘जानात्येवायं पुरुषः” “न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम्”—‘‘स उत्तमः पुरुषः” “नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्”—“एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति”—“तस्माद् वा एतस्माद् मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः”—इत्याद्याः । वक्ष्यतिच “ज्ञोऽत एव” इति । श्रुतियाँ भी उक्त विषय का प्रतिपादन करती हैं—“जैसे सेंधे नमक की डली बाहर से भीतर तक रसघन है, वैसे ही यह आत्मः बाहर से भीतर तक प्रज्ञानघन (ज्योतिर्मय) है ।” यह विज्ञान घन ही है । यह पुरुष स्वयं ज्योतिरूप होता है । इस विज्ञाता का विज्ञान कभी लुप्त नहीं होता । जो ऐसा अनुभव करता है कि सूं घ रहा हूँ वही आत्मा है । आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय, प्राणों में स्थित, हृद्यन्तर्ज्योति है । वह विज्ञान मय आत्मा ही, मनन करने वाला, कर्त्तव्य निर्धारक, स्वाद लेने वाला, सूं घने वाला और कर्त्ता है । अरे ! उस विज्ञाता को और कैसे जानोगे । जो जानता है वही आत्मा है । जो उसे देख लेता है, वह मृत्यु को नहीं देखता और न रोग तथा दुःखों को भोगता है । वह उत्तम पुरुष है । उसे जानकर निकटस्थ इस शरीर का भी भान नहीं रहता । आत्मदर्शी पुरुष के आश्रित इस सोलह कला वाले पुरुष को प्राप्त कर तृप्त हो जाता है । इस मनोमय कोष का अन्तरवर्त्ती विज्ञानमय आत्मा है” इत्यादि । सूत्रकार भी “ज्ञोऽत एव” सूत्र में उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं । ankurnagpal108@gmail.com
( ७१ ) अतः स्वयं प्रकाशोऽयमात्मा ज्ञातैव, न प्रकाशमात्रम्। प्रकाश- त्वादेव कस्यचिदेव भवेत्प्रकाशः दीपादि प्रकाशवत् तस्मान्नात्मा भवितुमर्हति संवित्, संविदनुभूतिज्ञानादिशब्दाः संबन्धि शब्दा इति च शब्दार्थविदः, न हि लोक वेदयोर्जानाति इत्यादेरकर्मकस्याकर्तृ कस्य च प्रयोगो दृष्टचरः । उक्त शास्त्र वाक्यों से ज्ञात होता है कि— स्वयं प्रकाशमय आत्मा केवल प्रकाश ही नहीं है, ज्ञाता भी है । प्रदीप आदि के प्रकाश की तरह, इसकी प्रकाशता भी अन्याधीन नहीं है, क्योंकि यह स्वयं प्रकाश है, इसलिए आत्मा संवित् नहीं हो सकता । शब्द वेत्ताओं का कथन है कि— संवित्, अनुभूति, ज्ञान आदि शब्द, किसी से संबंध रखने वाले शब्द हैं। लोक या वेद में कहीं भी “जानता है” इत्यादि पदों का कर्म रहित या कर्त्ता रहित प्रयोग नहीं देखा जाता । यच्चोक्तम्—अजडत्वात् संविदेवात्मेति, तत्रेदं प्रष्टव्यम् अजड- त्वमिति किमभिप्रेतम् ? स्वसत्ताप्रयुक्तप्रकाशत्वमिति चेत्, तथासति दीपादिष्वनैकान्त्यम्, संविदतिरिक्तप्रकाशधर्मानभ्युपगमेनासिद्धि- विरोधश्च । अव्यभिचरितप्रकाशसत्ताकत्वमति सुखादिषु व्यभि- चारान्निरस्तम् । जो यह कहा कि—जड न होने से संवित् ही आत्मा है; उस पर प्रश्न यह है कि, अजडता से आपका क्या तात्पर्य है ? यदि कहें कि— स्वयं प्रकाशता ही अजडता है, सो तो दीप आदि अनेकों में विद्यमान है। जब तक संवित् · से भिन्न, प्रकाश नामक किसी धर्म विशेष को नहीं मानोगे, तब तक तुम्हारा अभिप्राय सिद्ध नहीं हो सकेगा अपितु विरोध ही होगा । यदि कहो कि जिसकी कभी भी प्रकाश रहित सत्ता नहीं होती, वही अजडता है, सो यह बात भी सुख दुःख आदि के विनाश से कट जाती है । यदि उच्येत, सुखादिरव्यभिचरितप्रकाशो अपि अन्यस्मै प्रकाशमानतया घटादिवज्जडत्वेन अनात्मेति । ज्ञानंवा किं स्वस्मै ankurnagpal108@gmail.com
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प्रकाशते ? तदपि हि अन्यस्यैवाहमर्थस्य ज्ञातुरवभासते, अहं सुखी- तिवज्जानाम्यहमिति, अतः स्वस्मै प्रकाशमानत्वरूपजडत्वं संविद्य- सिद्धम्, तस्मात्स्वात्मानं प्रति स्वसत्तयैव सिध्यन्नजडोऽहमर्थ एवात्मा । ज्ञानस्यापि प्रकाशता तत्सम्बन्धायत्ता; तत्कृतमेव हि ज्ञानस्य सुखा- देरिव स्वाश्रयचेतनंप्रतिप्रकटत्वं इतरंप्रत्यप्रकटत्वं च, अतो न ज्ञप्तिमात्रमात्मा अपितुज्ञातैवाहमर्थः । यदि कहो कि-सुख आदि का निरन्तर होने वाला प्रकाश भी दूसरे से प्रकाशमान होने से, घट आदि की तरह जड़ है इसलिए वे अनात्म तत्त्व है । मै पूछता हूँ कि-ज्ञान क्या स्वतः प्रकाशित होता है ? “मै सुखी हूँ” की तरह “मै जानता हूँ” ऐसी ज्ञानात्मक प्रतीति भी, “अहं” पद से विख्यात ज्ञाता द्वारा ही उद्भासित होती है । इसलिए स्वतः प्रकाशता ही संवित् की अजडता है, यह बात असिद्ध हो जाती है । अपनी सत्ता से अपने में स्वयं सिद्ध “अहं” पद वाच्य आत्मा ही अजड है । ज्ञान की प्रकाशता भी उसी से संबद्ध होने से, उसी के अधीन है । इसीलिए ज्ञान, सुख आदि की तरह, अपने आश्रय चेतन आत्मा के समक्ष व्यक्त तथा अन्यों के समक्ष अव्यक्त रहता है । इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान ही आत्मा नही है, अपितु ज्ञान करने वाला “अहं” वाच्य ज्ञाता, आत्मा है । अथ यदुक्तम्-“अनुभूतिः परमार्थतो निर्विषया निराश्रया च सती भ्रान्त्या ज्ञातृतयाऽवभासते, रजततयेवशुक्तिर्निरधिष्ठान भ्रमानुपपत्तेः” इति । तदयुक्तम्-तथा सत्यनुभवसामानाधिकरण्ये- नानुभविताऽहमर्थः प्रतीयेत, अनुभूतिरहमिति पुरोऽवस्थित भास्वर द्रव्याकारतया रजतादिरिव अत्रतु पृथगवभासमानैवेयमनुभूतिरर्था- न्तरमहमर्थं विशिनष्टि, दंड इव देवदत्तं, तथा हि अनुभवाम्यहमिति प्रतीतिः, तदेवमस्मदर्थमनुभूतिविशिष्टं प्रकाशयन्ननुभवाम्यहमिति प्रत्ययो दंडमात्रे दंडी देवदत्त इति प्रत्ययवद् विशेषणभूतानुभूति- मात्रावलंबनः कथमिव प्रतिज्ञायेत ?
( ८१ ) और जो यह कहा कि--"सीप जैसे भ्रांतिवश रजत रूप में प्रतीत होती है, निर्विशेष निराश्रित अनुभूति भी, उसी प्रकार ज्ञाता रूप से अवभासित होती है।" यह कथन भी असंगत है—ऐसा होने से, सामने पड़ी हुई समुज्ज्वल सीप में जैसे रजत की अभेद प्रतीति होती है, उसी प्रकार "अहं" पद वाच्य अनुभावक और अनुभूति दोनों एक प्रतीत होंगे, अतः अनुभावक भ्रांतिवश यह भी कह सकता है कि "मैं अनुभूति हूँ।" "अहं" से पृथक् अवभासमान होने से, अनुभूति "अहं" से निश्चित ही भिन्न है। जैसे कि "दंडी देवदत्तः" कहने से देवदत्त और उसके दंड की पृथकता स्पष्ट भिन्न प्रतीत होती है, वैसे ही 'मैं अनुभव करता हूँ' ऐसी प्रतीति होती है। "मैं अनुभव करता हूँ" इस कथन में अनुभूति, "अहं" पदवाच्य आत्मा की विशेष्य, ज्ञात होती है। ऐसी अनुभूति "अहं" पद वाच्य आत्मा के विशेषण के रूप से कैसे ज्ञात हो सकती है ? यदप्युक्तम्—"स्थूलोऽहमित्यादि देहात्माभिमानवत् एव ज्ञातृत्व प्रतिभासमानात् ज्ञातृत्वमपि मिथ्येति।" तदयुक्तम्—आत्मतया अभिमतया अनुभूतेरपि मिथ्यात्वं स्यात् तद्वत एव प्रतीतेः सकले- तरोपमर्दिततत्त्वज्ञानाबाधितत्वेनानुभूतेर्नमिथ्यात्वमिति चेत् हन्तैवं सति तदबाधादेव ज्ञातृत्वमपि न मिथ्या । और जो यह कहा कि—"मैं मोटा हूँ" इत्यादि भान जैसे देहा- त्माभिमानी व्यक्ति मे ज्ञातृत्वरूप से प्रतिभासित होता है, वैसे ही ज्ञातृता भी मिथ्या है।" यह कथन भी असंगत है—यदि ऐसा कहोगे तो तुम्हारे द्वारा आत्मा रूप से मानी हुई अनुभूति भी मिथ्या हो जायगी, और उसकी प्रतीति भी मिथ्या हो जायगी। यदि कहो कि—समस्त दोषों को नष्ट करने वाले तत्त्वज्ञान से अनुभूति बाधित नहीं होती इसलिए वह मिथ्या नहीं है; यदि ऐसी बात है तो, तत्त्वज्ञान से बाधित न होने वाली ज्ञातृता भी मिथ्या नहीं है। यदप्युक्तम्—"अविक्रियस्यात्मनो ज्ञानक्रियाकर्तृत्वरूपे ज्ञातृत्वं न संभवति, अतो ज्ञातृत्वं विक्रियात्मकं जडे विकारास्पदाव्यक्त परिणामाहंकारग्रन्थिस्थमिति न ज्ञातृत्वमात्मनः अपितु अन्तःकरण ankurnagpal108@gmail.com
ता आदि दोष घटित हो जावेंगे ।" Wait, look at "बाह्यदार्थता": Is it "बाह्यपदार्थता" or "बाह्यदार्थता"? Look closely at line 14: "ब" "ा" "ह" "्" "य" "द" "ा" "र" "्" "थ" "त" "ा" -> "बाह्यदार्थता"! Wait, in line 18: "वाह्यपदार्थता" (with 'व' and 'प'!). In line 14, it is "बाह्यदार्थता" (misprint for बाह्यपदार्थता, missing 'प')! Wait, look at line 14 again: "बाह्यदार्थता" or "वाह्यदार्थता"? First letter: looks like 'व' or 'ब'? In line 14: "वाह्यदार्थता" or "बाह्यदार्थता"? Look at the belly of the letter: in line 14, it's 'व' or 'ब'? No slash inside, but sometimes 'ब' is without slash. Wait, look at line 18: "वाह्यपदार्थता" - it has 'व'. Line 14: "वाह्यदार्थता" or "बाह्यदार्थता"? Wait, look at line 14: "वाह्यदार्थता" -> wait, does it have 'प'? No, it definitely says
( ५३ ) स्वाभाविकमपि वक्ष्यति । अस्य ज्ञानस्वरूपस्यैव मणिप्रभृतीनां प्रभा- श्रयत्वमिव ज्ञानाश्रयत्वमपि अविरुद्धमित्युक्तम् । स्वयमपरिच्छिन्न- मेव ज्ञानं संकोचविकासाहंमित्युपपादयिष्यामः । कथन यह है कि—देह आदि जैसे दृश्यता परार्थता आदि कारणों से विपरीत, दृष्टता आदि धर्मों से विवेचित होते हैं वैसे ही अन्तःकरण रूप अहंकार भी दृश्यता, अचेतनता, परिणामता आदि से उन्हीं कारणों से विवेचित हो सकता है। दृश्यता और दृष्टता की तरह, ज्ञातृता और अहंकार की भी एकता नहीं है। जैसे दृश्यता (ज्ञान) अपने कर्म अहंकार का धर्म नहीं हो सकता वैसे ही ज्ञातृता भी अपने कर्म का धर्म नहीं हो सकता । और न ज्ञातृता विकारात्मक ही है, अपितु ज्ञान गुणाश्रयता ही ज्ञातृता है। इस नित्यज्ञातृता का, ज्ञान स्वाभाविक धर्म है, इसलिए वह भी नित्य है। आत्मा की नित्यता “नात्माश्रुतेः” इत्यादि में तथा “ज्ञोऽतएव” में ज्ञ के उल्लेख से आत्मा की स्वाभाविक ज्ञान गुणाश्रयता सूत्रकार ने भी बतलाई है। इसकी ज्ञान स्वरूपता मणि आदि की स्वाभाविक प्रभा की तरह अविरुद्ध और स्वाभाविक है। ज्ञान स्वयं निस्सीम होते हुए भी संकोच और विकासशील है, इस तथ्य का उपपादन आगे करूँगा। अतः क्षेत्रज्ञावस्थायां कर्मणा संकुचित स्वरूपंतत्तत्कर्मानुगुणतर- तमभावेनवर्त्तति, तच्चेन्द्रियद्वारेण व्यवस्थितम्, तमिमममिन्द्रियद्वारा ज्ञानप्रसरमपेक्ष्योदयास्तमयव्यपदेशः प्रवर्त्तते ज्ञानप्रसरे तु कर्त्तृत्वम- स्त्येव । तच्च न स्वाभाविकम्, अपितु कर्मकृतम् इति अविक्रियस्वरूप एवात्मा । एवंरूप विक्रियात्मकंज्ञातृत्वं ज्ञानस्वरूपस्यात्मन एवेति न कदाचिदपि जडस्याहंकारस्य ज्ञातृत्व संभवः । क्षेत्रज्ञ ( जीव ) की अवस्था में ज्ञान यथायोग्य कर्म के अनुसार तारतम्य से रहता है, यह तारतम्य इन्द्रिय द्वारा ही प्रकट होता है, इन्द्रियों में जो ज्ञान की वृद्धि और क्षीणता होती है वह किसी चेतन वस्तु की अपेक्षा रखती है, इससे सिद्ध होता है कि—ज्ञान के प्रसार में आत्मा
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की कर्तृता निश्चित है, पर वह कर्तृता आत्मा का स्वाभाविक धर्म नहीं है, अपितु कर्मानुसार उसके साथ संलग्न है, आत्मा तो निर्विकार ही है। उक्त प्रकार की विकारात्मक ज्ञातृता ज्ञानस्वरूप आत्मा की ही है, जड़ अहंकार की ज्ञातृता कभी भी संभव नहीं है ।
जडस्वरूपस्याप्यहंकारस्य चित्संनिधाने न तच्छायापत्या तत्संभव इति चेत्, केयं चिच्छायापत्तिः ? किमहंकारच्छायापत्तिः संविदः ? उत् संविच्छायापत्तिरहंकारस्य ? य तावत् संविदः, संविदि ज्ञातृत्वानभ्युपगमात् । नाप्यहंकारस्य उक्तरीत्या तस्य जडस्य ज्ञातृत्वायोगात् द्वयोरप्यचाक्षुषत्वाच्च न हि अचाक्षुषाणां छाया दृष्टा । अथ-अग्नि संपर्कात् अयः पिंड औष्ण्यवत् चित् संपर्कात् ज्ञातृत्वोपलब्धिरिति । नैतत् संविदि वास्तव ज्ञातृत्वान- भ्युपगमादेव तत्संपर्कादहंकारे ज्ञातृत्वं तदुपलब्धिर्वा । अहंकारस्यतु अचेतनस्य ज्ञातृत्वासंभवादेव सुतरां न तत्संपर्कात् संविदि ज्ञातृत्वं तदुपलब्धिर्वा ।
यदि कहो कि—जड स्वरूप अहंकार का चित् से संपर्क होने से चित् की छाया पड़ने से अहंकार में ज्ञातृता हो सकती है, तो विचारना होगा कि यह चित् छाया किसकी है ? अहंकार की छाया संवित् पर पड़ती है, या संवित् की छाया अहंकार पर पड़ती है ? संवित् की तो हो नहीं सकती, क्योंकि संवित् में ज्ञातृता आपको ही स्वीकार नहीं है । अहंकार की छाया भी संभव नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त नियमानुसार जड़ अहंकार का ज्ञातृता से कोई सम्बन्ध नहीं है । दोनों ही अप्रत्यक्ष वस्तु है, अप्रत्यक्ष वस्तु की छाया पड़ती देखी नहीं जाती । अग्नि संपर्कित लोहे की उष्णता की तरह, चित् संपर्क से ज्ञातृता की उपलब्धि होती हो, सो भी नहीं है; जब संवित् में ही वास्तविक ज्ञातृता का अभाव है तो उसके संपर्क से अहंकार में ज्ञातृता की उपलब्धि होगी ही कैसे ? जड़ अहंकार में तो ज्ञातृता असंभव ही है, इसलिए उसके संपर्क से संवित् की ज्ञातृता हो, इसका कोई प्रश्न ही नहीं है ।
( ८५ ) तदप्युक्तम्—"उभयत्र न वस्तुतो ज्ञातृत्वमस्ति । अहंकार- स्त्वनुभूतेरभिव्यंजकः स्वात्मस्थामेवानुभूतिमभिव्यनक्ति, आदर्शादिवत् इति । "तदयुक्तम्—आत्मनः स्वयं ज्योतिषो जडस्वरूपाहंकारा- भिव्यंग्यत्वायोगात् । तदुक्तम्—"शान्तांगार इवादित्यमहंकारो जडा- त्मकः, स्वयंज्योतिषमात्मानं व्यनक्तीति न युक्तिमत् ।" स्वयं- प्रकाशानुभवाधीन सिद्धयो हि सर्वेपदार्थाः । तत्र तदायत्तप्रकाशोऽ चिदहंकारोऽनुदितानस्तमितस्वरूप प्रकाशमशेषार्थसिद्धिहेतुभूतमनु- भवमभिव्यनक्ति इति आत्मविदः परिहसंति । उस पर जो कहो कि—"दोनों मे वास्तविक ज्ञातृता नही है । अहकार तो स्वयं अनुभूति का अभिव्यंजक है, जो कि दर्पण आदि की तरह अपने में ही अनुभूति को अभिव्यक्त करता है ।" यह भी नितांत असंगत बात है—स्वयं प्रकाश आत्मा, जड स्वरूप अहंकार से कभी अभिव्यंजित नहीं हो सकता । जैसा कि कहा भी है— "अग्निरहित अंगारे की तरह जड अहंकार, सूर्य की तरह स्वयं प्रकाश आत्मा को व्यंजित करता है, यह बात युक्ति संगत नहीं है ।" सारे पदार्थ स्वयं प्रकाश अनुभव के अधीन सिद्ध हैं । उसका वह स्वाधीन प्रकाश उदय अस्त रहित जड अहंकार से अभिव्यक्त होता है. इस बात को सुनकर, आत्मवेत्ता लोग हंसते हैं । किं च—अहंकारानुभवयोः स्वभावविरोधात् अनुभूतेरननुभूतित्व प्रसंगाच्च नव्यङ्क्तृ व्यंग्यभावः यथोक्तम्— "व्यङ्क्तृव्यंग्यत्वमन्योन्यं न चस्यात् प्रातिकूल्यतः । व्यंग्यत्वे अननुभूतित्वमात्मनि स्यात् यथा घटः ॥" इति न च रविकरनिकराणां स्वाभिव्यंग्यकरतलाभिव्यंग्यत्ववत् संविद्- भिव्यंग्याहंकाराभिव्यंग्यत्वं संविदस्साधीयः, तथापि रविकर- निकराणां करतलाभिव्यंग्यत्वाभावात्, करतलप्रतिहतगतयो हि
( ८६ ) रश्मयो बहुलाः स्वयमेव स्फुटतरमुपलभंते, इति तद्बाहुल्यमात्रहेतु- त्वात् करतलस्य नाभिव्यंजकत्वम् । अहंकार और अनुभव के स्वाभाविक विरोध तथा व्यंग्य होने पर अनुभूति, अनुभूति न रह जायगी, इन दोनों ही बातों से सिद्ध होता है कि—दोनों में व्यंजक व्यंग्य भाव नहीं है। जैसा कि कहा भी गया है— ‘स्वाभाविक विरोध तथा वैलक्षण्य होने से दोनों में परस्पर व्यंग्य व्यंजक भाव नहीं है, यदि व्यंग्य भाव होगा तो, घट की तरह, आत्मा में अनुभूति का अभाव हो जायगा।’ सूर्य किरणें जैसे करतल को अभिव्यक्त करके, स्वयं भी उससे अभिव्यक्त होती हैं, उसी प्रकार संविद् भी अहंकार को अभिव्यक्त करके उससे अभिव्यक्त हो, ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि—सूर्य रश्मियां करतल से व्यंजित नहीं होतीं, अपितु करतल में प्रतिहत वे रश्मियां, इधर उधर फैलकर अधिक स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष दीखने लगती हैं, उनकी विस्तृति के आधार पर ही, करतल को उनकी अभिव्यक्ति का कारण नहीं कहा जा सकता । किं च—अस्य संवित् स्वरूपस्यात्मनोऽहंकारनिर्वर्त्याभिव्यक्तिः कि रूपा ? न तावदुत्पत्तिः, स्वसिद्धतयाऽनन्योत्पद्यत्वाभ्युपगमात् नापि तत्प्रकाशनम्, तस्या अनुभवान्तराननुभाव्यत्वात्, ततएव च न तदनुभवसाधनानुग्रहः । स हि द्विधाज्ञेयस्येन्द्रिसंबंधहेतुत्वेनवा, यथा जाति निजमुखादिग्रहणे व्यक्ति दर्पणादीनां नयनादीन्द्रिय संबंध- हेतुत्वेन, बोद्धृगतकल्मषापनयनेन वा, यथा परतत्त्वावबोधन, साधनस्य शास्त्रस्य शमदमादिना । यथोक्तम्—“करणानामभूमि- र्त्वान्न तत्संबंध हेतुता” इति । इस संवित् स्वरूप आत्मा की अहंकार द्वारा जो अभिव्यक्ति होती है, उसका क्या रूप है.? वह अभिव्यक्ति, उत्पत्ति रूप है, ऐसा तो कह नहीं सकते, क्योंकि, स्वयंसिद्धता के आधार पर उसकी किसी अन्य के
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- द्वारा उत्पत्ति नही हो सकती, ऐसा निर्णय कर चुके है । वह अभिव्यक्ति, प्रकाश रूप भी नही हो सकती, क्योकि--संवित् स्वय प्रकाश है, उसे प्रकाश मे किसी अन्य की अपेक्षा नही होती । इससे सिद्ध होता है कि-- ज्ञानानुभूति मे, अहकार द्वारा अभिव्यक्ति की सहायता अपेक्षित नही है । सहायता दो ही प्रकार से हो सकती है (१) ज्ञेय की, इन्द्रिय सबंधी कारणो से होने वाली, जैसे कि--मनुष्य आदि जाति के जानने के लिए, उस जाति के साथ चाक्षुष सबध वाले व्यक्ति द्वारा दी गई अथवा अपनी आकृति की जानकारी मे दर्पण की सहायता, (२) ज्ञाता के (हृदयगत) दोषों के अपनयन द्वारा दी जाने वाली, जैसे कि--परतत्त्व परमेश्वर को बतलाने वाले शास्त्रो से सम्मत, शम दम आदि उपायो द्वारा दी जाने वाली सहायता । जैसा कि--कहा गया है--‘‘वह अधोक्षज है (इन्द्रिय गम्य नही है) इसलिए इन्द्रियो की उससे कोई सबध हेतुता नही है ।’’ किंच-अनुभूतेरनुभाव्यत्वाभ्युपगमेऽप्यहमर्थेन न तदनुभव साध- नानुग्रहः सुवचः, स हि अनुभाव्यानुभवोत्पत्तिप्रतिबंधनिरसनेन भवेत् । यथा रूपादिग्रहणोत्पत्तिनिरोधितमसनिरसनेन चक्षुषो दीपादिना । न चेह तथाविधं निरसनीयं संभाव्यते । न तावत्सविदा- त्मगतं तज्ज्ञानोत्पत्तिनिरोधि किंचिदप्यहंकारापनेयमस्ति । अस्तिहि अज्ञानमिति चेत्, न अज्ञानस्याहंकारापनोद्यत्व अनभ्यु- पगमात् । ज्ञानमेव हि अज्ञानस्य निवर्त्तकम् । अनुभूति की अनुभाव्यता मान लेने पर भी, अहकार को, अनुभूति का सहयोगी साधक नही कहा जा सकता । ऐसा तो तभी सभव है, जब कि--अनुभाव्य के, अनुभवोत्पत्ति के अन्य प्रतिबन्धकों का, निराकरण कर दिया जाय । जैसे कि--प्रदीप आदि का आलोक, रूप आदि प्रत्यक्ष के विरोधी घने अधकार का निराकरण कर, नेत्रों का सहायक होता है । अनुभूति की अभिव्यक्ति में उस प्रकार के निवारण की संभावना ही नही है, अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा की ज्ञान प्रतिबन्धक ऐसी कोई वस्तु नहीं हैं, जिसे अहंकार दूर कर सके यदि कहो कि-अज्ञान, ज्ञान का प्रतिबंधक है; सो अज्ञान का निराकरण, अहंकार से हो नहीं सकता । ankurnagpal108@gmail.com
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ज्ञान ही अज्ञान का निवर्त्तक हो सकता है, अज्ञान, ज्ञान का निवर्त्तक नहीं है। न च संविदाश्रयत्वमज्ञानस्य सम्भवति, ज्ञानसमानाश्रयत्वात्- त्समानविषयत्वाच्च ज्ञातृभाव विषयभाव विरहिते, ज्ञानमात्रेसाक्षिणि नाज्ञानं भवितुमर्हति । यथा ज्ञानाश्रयत्वप्रसक्तिशून्यत्वेन घटादेर्ना- ज्ञानाश्रयत्वम् तथा ज्ञानमात्रेऽपि ज्ञानाश्रत्वाभावेन नाज्ञानाश्रयत्वं स्यात् । संविदोऽज्ञानाश्रयत्वाभ्युपगमेऽपि आत्मतयाऽभ्युपगतायास्त- स्याज्ञानविषयत्वाभावेन ज्ञानेन न तद्गता ज्ञान निवृत्तिः । ज्ञानं हि स्वविषय एवाज्ञानं निवर्त्तयति, यथारज्ज्वादौ, अतो न केनापि कदाचित्संविदाश्रयमज्ञानमुच्छिद्येत् । अस्य च सदसदनिर्वचनीय- स्याज्ञानस्य स्वरूपमेव दुर्निरूपमित्युपरिष्टाद् वक्ष्यते । ज्ञान प्रागभाव रूपस्यचाज्ञानस्य ज्ञानोत्पत्ति विरोधित्वाभावेन न तन्निरसनेन तज्ज्ञानसाधनानुग्रहः अतो न केनापि प्रकारेण अहंकारेणानुभूतेर- भिव्यक्तिः । और न; संविद्, अज्ञान का आश्रय हो सकता है, क्योंकि— अज्ञान के आश्रय और विषय, ज्ञान के समान ही होते हैं। ज्ञातृता और विषय- भाव रहित, साक्षि स्वरूप शुद्ध ज्ञान में, अज्ञान का प्रवेश हो ही नहीं सकता । जैसे ज्ञानाश्रयता की संभावना से शून्य घट आदि में अज्ञान का आश्रय नहीं होता, वैसे ही ज्ञानाश्रय की संभावना से रहित अज्ञान के आश्रय में, ज्ञान की संभावना भी नहीं है। संविद् को अज्ञान का आश्रय मान भी लें, पर संवित् को ही जब आत्मा मान चुके हो, इस लिए संवित् कभी ज्ञान का विषय ( ज्ञेय ) तो हो नहीं पावेगा, जिसके फलस्वरूप, संवित् के आश्रित अज्ञान की निवृत्ति का होना कठिन हो जायगा ( क्योंकि—ज्ञेय वस्तु ही, स्वाश्रित भ्रांति रूप अज्ञान की निवारक होती है ) ज्ञान ही स्वविषयक अज्ञान की निवृत्ति करता है, जैसे कि— रज्जु में हुई सर्प की भ्रांति की निवृत्ति स्वतः ज्ञान से ही होती है। इस प्रकार अज्ञान को ज्ञानाश्रित मान लेने पर, कभी भी, किसी उपाय से ज्ञानाश्रित उस अज्ञान की निवृत्ति न हो सकेगी। सद् असद् अनिर्वच- ankurnagpal108@gmail.com