श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ५६२ ) इस प्रकरण में उपाय (साधना) उपेय (साध्य) और उपेतृ (साधक) इन तीनों का ही उपन्यास अर्थात् तीनों को ही ज्ञेय रूप से बतलाया गया है, और उन्हीं के विषय में प्रश्न प्रस्तुत किया गया है, अव्यक्त आदि का प्रश्न ही नहीं है। ऐसा वर्णन मिलता है कि-मुमुक्षु नचिकेता ने मृत्यु प्रदत्त तीन वरों में सर्व प्रथम पुरुषार्थयोग्यतापादिनी पिता की प्रसन्नता प्राप्त की, दूसरे वर में मोक्ष साधन भूत नाचिकेताग्नि विद्या मांगी “हे मृत्यु ! आप स्वर्ग साधन भूत अग्नि विद्या को जानते है, मुझ श्रद्धालु को उसका उपदेश करिये, स्वर्ग लोकगामी अमृतत्व भोग करते है, द्वितीय वर के रूप में मैं उसी की याचना करता हूँ।” यहाँ स्वर्ग शब्द परम पुरुषार्थ मोक्ष का द्योतक है। अमृतत्वं भजन्ते पद स्वर्गीय लोगों के जन्म मरण के अभाव और क्षयशील कर्म की निंदा का द्योतक है। “जो तीन बार नाचिकेताग्नि का चयन करता है, वह माता पिता और आचार्य इन तीनो से संबंधित तीनो कर्मों से कृतकार्य हो चुका, वह जन्म मरण को भी अतिक्रमण कर चुका” इस उत्तर से भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि होती है। “तीसरे वर में मनुष्य के मरणोत्तर अस्तित्व को कोई मानता है, कोई नही मानता, आपके उपदेश से इस संशयात्मक रहस्य को जानना चाहता हूँ” इत्यादि में मोक्ष के स्वरूप विषयक प्रश्न द्वारा प्राप्तव्य, प्रापक और उसके उपायरूप कर्म-संपादित उपासना के स्वरूप की जिज्ञासा की गई है। एवं मोक्षे पृष्टे तदुपदेशयोग्यतां परीक्ष्योपदिदेश-“तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति। तदेवं सामान्येनोपदिष्टे नचिकेताः प्रीतस्सन् “देवं मत्वा” इत्युपास्यतया निर्दिष्टस्य प्राप्य- भूतस्य देवस्य “अध्यात्मयोगाधिगमेन” इति वेदितव्यतया निर्दिष्ट- प्राप्तुः प्रत्यगात्मनश्च “मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति निर्दिष्टस्य ब्रह्मोपासनस्य च स्वरूप विशोधनाय पुनः पप्रच्छ-“अन्यत्र धर्मादन्य- त्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्। अन्यत्र भूताद्भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद् वद” इति। एवं सकलेतरातीतानागतवर्त्तमान साध्यसाधनसाधक-
( ५६३ ) विलक्षणे त्रये पृष्टे प्रथमं प्रणवं प्रशस्य तद्वाच्यं प्राप्यस्वरूपं, तदंतर्गतं च प्राप्तृस्वरूपं वाचकरूपं चोपायं पुनरपि सामान्येन ख्यापयन् प्रणवं तावदुपदिदेश–“सर्वे वेदा यत् पदमामनंति तपांसि सर्वाणि च यद् वदंति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरंति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्” इति । एवमुपदिश्य पुनरपि प्रणवं प्रशस्य प्रथमं तावत् प्राप्तुः प्रत्यगात्मनः स्वरूपमाह-“न जायते म्रियते वा विपश्चित्”इत्यादिना । प्राप्यस्य परस्य ब्रह्मणो विष्णोः स्वरूपम् “अणोरणीयान्” इत्यादिना “क इत्था वेद यत्र सः” इत्यंतेनोपदिशन् मध्ये “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन” इत्यादिनोपायभूतस्योपासनस्य भक्तिरूपतामप्याह । “ऋतं पिबन्तौ” इति चोपास्यस्योपासकेन सहावस्थानात् सुपास्यतामुक्त्वा “आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिना “दुर्गं पथस्तत् कवयो वदंति” इत्यंतेनो- पासनप्रकारमुपासीनस्य च वैष्णवपरमपद प्राप्तिमभिधाय “अशब्द- मस्पर्शम्” इत्यादिनोपसंहृतम् । अतस्त्रयाणामेवात्र ज्ञेयत्वेनोपन्यासः प्रश्नश्च, तस्मान्नेह तांत्रिकस्याव्यक्तस्य ग्रहणम् । उक्त मोक्ष विषयक प्रश्न के उपरान्त, नचिकेता की उपदेश ग्राहिका शक्ति की परीक्षा करके यमराज उपदेश देते हैं- “धीर पुरुष दुर्दर्श, गूढ़, सर्वान्तर्यामी, गुहावस्थित, हृदयकन्दरस्थ, पुराण पुरुषोत्तम देव का अध्यात्म बल से दर्शन करके सुख दुःख से छूटते हैं ।” ऐसे सामान्य सरल उपदेश से संतुष्ट नचिकेता “देवं मत्वा” पद से उपास्य रूप से निर्दिष्ट प्राप्य परमात्मा--“अध्यात्मयोगाधिगमेन” पद से वेदितव्य रूप से निर्दिष्ट जीवात्मा--“धीरो हर्षशोकौ जहाति” पद से निर्दिष्ट ब्रह्मोपासना और स्वरूपगत भाव को समझकर, इस तथ्य को विस्तृतरूप से जानने के लिए प्रश्न करता है--“हे यमराज ! धर्म और अधर्म से भिन्न, कार्य और कारण से पृथक् , अतीत और अनागत से पृथक् जो कुछ भी आप जानते हैं उसे बतलाइये ।” नचिकेता द्वारा इस प्रकार अतीत अनागत और ankurnagpal108@gmail.com
( ५६४ ) वर्त्तमान तथा साध्य, साधक और साधन से विलक्षण तत्त्व की जिज्ञासा करने पर, यमराज ने, जिज्ञासा की प्रशंसा करते हुए, उपासना लभ्य प्रणव के वाच्यार्थ, प्राप्य स्वरूप, प्राप्ति के उपायरूप ब्रह्मवाचक प्रणव- स्वरूप का प्रकाश करने के लिए, प्रणवरहस्य का विवेचन किया- "सारे वेद जिस पद का बारबार प्रतिपादन करते हैं, संपूर्ण तप जिस पद को दिखलाते हैं, जिसको चाहने वाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद तुम्हें संक्षेप में बतलाता हूँ वह ओम् ही है ।' ऐसा उपदेश देकर पुनः प्रणव की प्रशंसा करते हुए, सर्व प्रथम साधक जीवात्मा के स्वरूप को “विद्वान् का न जन्म होता है न मरता है' इत्यादि से, तथा प्राप्य परब्रह्म विष्णु के स्वरूप को “अणु से भी अणु” इत्यादि से लेकर - “वह ऐसा कहाँ स्थित है इसे कौन जाने" इत्यादि तक बतलाते हुए मध्य में “यह परमात्मा, प्रवचन, मेधा और शास्त्राभ्यास से लभ्य नहीं है" इत्यादि वाक्य से ब्रह्म प्राप्ति की उपाय रूप उपासना की भक्तिरूपता का प्रति- पादन करते हैं। “दोनों ही भोक्ता है" इत्यादि वाक्य में उपास्य और उपासक की एकत्र स्थिति दिखलाई गई है, इसलिए उपासना करना सरल है, इस रहस्य की ओर लक्ष्य करते हुए “आत्मा को रथी जानो" इत्यादि से लेकर 'ज्ञानी उसे दुर्गम पथ बतलाते हैं" इस अंतिम वाक्य तक उपासना के विशेष प्रकार तथा उपासीन की पर वैष्णव पद की प्राप्ति बतलाकर “वह अशब्द और अस्पर्श है" इत्यादि से प्रसंग का उपसंहार करते हैं। इस विवेचन से ज्ञात होता है कि इसमें उपास्य- उपासक-और उपासना की ही उक्त प्रसंग में जिज्ञासा की गई है, सांख्योक्त अव्यक्त संबंधी कोई प्रश्न नहीं है। महद्वच्च ।१।४।७॥ यथा-"बुद्धेरात्मा महान् परः” इत्यात्मशब्द सामानाधि- करण्यान्न तंत्रसिद्धं महत्तत्त्वं गृह्यते, एवमव्यक्तमप्यात्मनः परत्वे- नाभिधानान्न कपिलतंत्रसिद्धं गृह्यत इति स्थितम् । जैसे कि - “बुद्धि से महान् आत्मा श्रेष्ठ है" इस वाक्य में आत्मा शब्द के साथ महान् शब्द का अभेद संबंध होने से, महान् शब्द से सांख्योक्त महत् तत्त्व की उपलब्धि नहीं होती, वैसे ही “आत्मा से ankurnagpal108@gmail.com
( ५६५ ) अव्यक्त श्रेष्ठ है” इस वाक्यगत अव्यक्त से, सांख्योक्त अव्यक्त को नहीं स्वीकार सकते । २ चमसाधिकरण— चमसवदविशेषात् ।१।४।८॥ अत्रापि तंत्रसिद्ध प्रक्रिया निरस्यते, न ब्रह्मात्मकानां प्रकृति- महदहंकारादीनां स्वरूपम्, श्रुतिस्मृतिभ्यां ब्रह्मात्मकानां तेषां प्रतिपादनात्, यथा आथर्वणिका अधीयते-“विकारजननीमज्ञामष्ट- रूपामजां ध्रुवाम्। ध्यायतेऽध्यासिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः। सूयते पुरुषार्थं च तेनैव अधिष्ठिताजगत्। गौरनाद्यंतवती सा जनित्री भूतभाविनी। सिताऽसिता च रक्ता च सर्वकामदुघा विभोः। पिबंत्ये- नामविषमामविज्ञाताः कुमारकाः। एकस्तु पिबते देवः स्वच्छंदोऽत्र वशानुगाम्। ध्यानक्रियाभ्यां भगवान् भुंक्तेऽसौ प्रसभं विभुः। सर्व- साधारणीं दोग्ध्रीं पीड्यमानां तु यज्वभिः” इति। अत्र प्रकृत्यादीनां स्वरूपमभिहितम् यदात्मकाश्चैते प्रकृत्यादयः स परमपुरुषोऽपि “तं षड्विंशकमित्याहुः सप्तविंशमथापरे, पुरुषं निर्गुणं सांख्यमथर्वशिरसो विदुः” इति प्रतिपाद्यते। अपरे चाथर्वणिकाः-“अष्टौ प्रकृतयः षोडश विकाराः” इत्यधीयते। श्वेताश्वतराश्चैवं प्रकृति पुरुषेश्वर स्वरूपमामनंति-“संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्व- मीशः, अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृ भावात् ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पापैः”-“ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा ह्येका भोक्तृभोगार्थयुक्ता, अनंतश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्त्ता त्रयंयदा विन्दते ब्रह्ममेतत्”-“क्षरं प्रधानं अमृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः, तस्याभिध्याना- द्योजनात्तत्वभावाद्भूयश्चांते विश्वमायानिवृत्तिः”-“छंदांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदंति, अस्मान्मायी सृजते ankurnagpal108@gmail.com
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विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः”—“मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्” इति । तथोत्तरत्रापि—“प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थिति- बंधहेतुः” इति । इस प्रसंग में भी सांख्य तंत्र प्रक्रिया का खंडन किया गया है, ब्रह्मात्मक प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार आदि का निराकरण नहीं है। श्रुति स्मृति में ब्रह्मात्मक प्रकृति आदि का प्रतिपादन ही मिलता है, जैसे कि आथर्वणिक श्रुति में—“समस्त कार्यों की कारण, आठ रूपों वाली, अचेतन, नित्यरूपा अजा प्रसिद्ध है, परमेश्वर उसमें अधिष्ठान पूर्वक उसे स्थूलादि रूपों में परिणत करते हैं, कार्योत्पादन में प्रेरित करते हैं, वह अजा ही परमेश्वर द्वारा परिचालित होकर जगत का प्रसव करती है। अतीत और अनागत स्वरूपा, श्वेत कृष्ण और रक्तवर्णा, जगज्जननी, आद्यंतरहित वह अजा ही परमेश्वर की सर्वकाम प्रसविनी गौ है। अज्ञानी बाल प्रकृति जीव, सर्वत्र समभाववाली इस गौ का भोग करता है। इस जगत में एकमात्र वह परमात्मा ही, अपनी वशवर्त्तिनी इस अजा का स्वच्छंद रूप से भोग करते हैं। ध्यान और क्रिया द्वारा पीड़िता और सर्व भोग्या, दूधवाली, याज्ञिकों द्वारा सरलता से प्राप्त इस गौ का, विभु भगवान बलपूर्वक भोग करते हैं, चौबीस प्रकार की यह अव्यक्त, व्यक्त होती है।” इत्यादि में प्रकृति का स्वरूप वर्णन किया गया है। ये सब जिससे आत्मीय संबंध रखती हैं उस परमपुरुष का भी जैसे—“कुछ लोग जिसे छब्बीस तत्त्वों वाला, कोई सत्ताइस तत्त्वों वाला बतलाते हैं, अथर्व शिखा उपनिषद् में इस संख्यावाले को निर्गुण बतलाया गया है।” इत्यादि प्रतिपादन किया गया है। दूसरी आथर्वणिक उपनिषद् में जैसे- “आठ प्रकार की प्रकृति और सोलह प्रकार के प्रकृति के विकार हैं।” इत्यादि-श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी प्रकृतिपुरुष का रूप इस प्रकार कहा गया है-“विनाशशील जड़वर्ग और अविनाशी जीवात्मा, इन दोनों के संयुक्त रूप व्यक्त और अव्यक्त इस विश्व का, परमेश्वर ही धारण पोषण करते हैं, जीवात्मा-इस जगत के विषयों का भोक्ता होने से प्रकृति के अधीन होकर इसमें बँध जाता है, परमपुरुष परमात्मा को जानकर ही
( ५६७ ) हर प्रकार के बंधनों से मुक्त होता है । सर्वज्ञ और अज्ञानी, समर्थ और असमर्थ ये दो अजन्मा हैं, भोगने वाले जीव के लिए उपयुक्त सामग्री वाली अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है । परमात्मा अनंत रूपों वाला होते हुए भी, कर्त्तापन के अभिमान से रहित है । जीवात्मा जब जीव, माया और ईश्वर इन तीनों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है तो ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । प्रकृति विनाश शील है, पर उसको भोगने वाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है । इस विनाश शील और अमृत दोनों को परमात्मा अपने वश में रखता है । उस परमेश्वर का निरन्तर ध्यान करने से, मन को उसमें लगाये रहने से तथा तन्मय हो जाने से अंततोगत्वा, समस्त माया की निवृत्ति हो जाती है । छंद-यज्ञ-व्रत आदि तथा जिसका भी भूत-भविष्य-वर्त्तमान रूप से वेद वर्णन करते हैं ऐसे संपूर्ण जगत को, मायाधीश परमेश्वर भूत समुदाय से रचता है, मायाधीन जीवात्मा इस प्रपंच में बँधा हुआ है । माया प्रकृति तथा मायापति महेश्वर को जानना चाहिए, उसी के अंगरूप कारण और कार्य से यह सारा जगत व्याप्त है । प्रकृति और जीवात्मा का स्वामी, समस्त गुणों का शासक, जन्म मृत्यु संसार में बांधने वाला, स्थिति रखने वाला, और उससे मुक्त करने वाला परमात्मा है ।” इत्यादि । स्मृतिरपि—“प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि, विका- रांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृति संभवान् । कार्यकारण कर्त्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते, पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते । पुरुषः प्रकृतिस्थोऽहि भुंक्ते प्रकृतिजान् गुणान्, कारणं गुण संगोऽस्य सदस- द्योनि जन्मसु । सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति संभवाः, निबध्नंति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।” तथा—“सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यांति मामिकाम्, कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः, भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् । मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्, हेतुनानेन कौन्तेय जगद् हि परिवर्तते” तस्माद् ब्रह्मात्मकत्वेन कापिल तंत्र- सिद्धाः प्रकृत्यादयो निरस्यंते । ankurnagpal108@gmail.com
( ५६८ ) स्मृति में भी इसी प्रकार जैसे—"प्रकृति-पुरुष दोनों को ही अनादि जानों, विकारों और गुणों को प्रकृति से ही उत्पन्न जानों। कार्य कारण में प्रकृति कारण कहलाती है, सुखदुःख भोगने में पुरुष कारण कहलाता है। पुरुष, प्रकृति में स्थित हुआ ही, प्राकृतिक गुणों को भोगता है, गुणों की आसक्ति ही उसकी ऊंची-नीची योनि के जन्म का कारण है। सत्व रज तम आदि प्राकृतिक गुण ही, अव्यय आत्मा को देह में बांधते हैं।" तथा "कल्प के अंत में सारे भूत, मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, कल्प के आदि में मैं पुनः उनकी सृष्टि करता हूँ। प्रकृति के वशीभूत विवश समस्त भूत समुदाय को मैं, अपनी प्रकृति का अवलंबन कर, अनेक प्रकार से बार-बार सृजन करता हूँ। मुझ अध्यक्ष द्वारा प्रेरित, प्रकृति, समस्त चराचर जगत को उत्पन्न करती है, इसी से यह जगत चलता रहता है।" इत्यादि उदाहरणों से अब्रह्मात्मक सांख्य तंत्र सिद्ध प्रकृति आदि का स्वतः खंडन हो जाता है। श्वेताश्वतरोपनिषदि श्रूयते—"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सुजमानां सरूपाः, अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः" इति । तत्र संदेहः, किमस्मिन् मंत्रे केवला तंत्र सिद्धा प्रकृतिरभिधीयते, उत ब्रह्मात्मिका ? इति, किं युक्तम् ? केवलेति, कुतः ? "अजामेकाम्" इत्यस्याः प्रकृतेरकार्यत्व श्रवणात्, “बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः” इति स्वातन्त्र्येण सरूपाणां बह्वीनां प्रजानां स्रष्टृत्वत्व श्रवणात् । इति । श्वेताश्वतरोपनिषद् में प्रसंग आता है कि—"अपने ही समान भूत समुदायों को रचने वाली रक्त-श्वेत और कृष्ण वर्णा एक अजा को, निश्चय ही एक अज आसक्त होकर भोगता है, दूसरा अज इस भोगी हुई श्रजा को त्याग देता है।" इस पर संदेह होता है कि—इस मंत्र में सांख्योक्त केवला (स्वतः सिद्धा) प्रकृति का वर्णन है अथवा ब्रह्मात्मिका प्रकृति का ? कह सकते हैं कि केवला का, क्यों कि—"अजामेकाम्" पद में प्रकृति की अकार्यता बतलाई गई है तथा "बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः" इस वाक्यांश में, अपने ही समान प्रजा का स्वतंत्र रूप से सर्जन कहा
( ५६६ ) गया है, जिससे ज्ञात होता है कि-सांख्य तंत्र सिद्ध केवला का ही वर्णन है । एवं प्राप्तेऽभिधीयते—“चमसवदविशेषात्”। न जायत इति अजा इति अजात्वमात्र प्रतिपादनात् तंत्रसिद्धाब्रह्मात्मकाजाग्रहणे विशेषाप्रतीतेः चमसवत्, यथा—“अर्वाग्विलश्चमश ऊर्ध्वबुध्नः” इत्यस्मिन् मंत्रे चमसस्य भक्षणसाधनत्वमात्रं चमसशब्देन प्रतीयत इति न तावन्मात्रेण चमसविशेष प्रतीतिः, यौगिकशब्दानामर्थ- प्रकरणादिभिर्विनाऽर्थविशेषनिश्चयायोगात्, तत्र “यथेदं तच्छिरः एष हि अर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः” इत्यादिना वाक्यशेषेण शिरसः चमसत्वनिश्चयः, तथा अत्रापि अर्थ प्रकरणादिभिरेव अजा निर्णोतव्या, न चात्र तंत्रसिद्धा अजाग्रहणहेतवोऽर्थ प्रकरणादयो दृश्यन्ते, नचास्याः स्वातंत्र्येन स्रष्टृत्वत्वं प्रतीयते “बह्वीः प्रजाः सृजमानां” इति स्रष्टृमात्रप्रतीतेः । अतोऽनेन मंत्रेण न अब्रह्मात्मि- काऽजाऽभिधीयते । उक्त संशय पर “चमसवदविशेषात्’ सूत्र प्रस्तुत करते हैं, जिसका तात्पर्य है कि-इस प्रसंग में सांख्योक्त प्रकृति का वर्ण'न नहीं है, जो जन्म न ले उसे अजा कहते हैं, ऐसी सामान्य अजा का ही प्रतिपादन किया गया है। इससे सांख्योक्त अब्रह्मात्मक अजाविशेष की प्रतीति नहीं होती, जैसे कि-‘अर्वाग्विलश्चमस’’ इत्यादि मंत्र में चमस शब्द भक्षण के साधनत्व मात्र का ही बोधक है, चमसविशेष की प्रतीति नहीं कराता । यौगिक शब्दों का अर्थ, प्रकरण आदि के बिना, अर्थ विशेष का बोधक नहीं होता । जैसे कि—“यथेदं तच्छिरः” इत्यादि वाक्य के शेषांश से चमस शब्द, शिर अर्थ की प्रतीति कराता है, उसी प्रकार उक्त प्रसंग में भी, प्रकरण आदि से ही अजा शब्द का अर्थ निर्णय करना होगा । प्रकरण आदि में कहीं भी सांख्योक्त अजा की अर्थ प्रतीति नहीं होती, और न उसकी स्वतंत्र रूप से सृष्टि करने की ही प्रतीति होती है । “बह्वीः प्रजाः ankurnagpal108@gmail.com
सृजमानां' में तो केवल सृष्टिमात्र की ही चर्चा है। इससे निर्णय होता है कि-इस मंत्र में सांण्योक्त अब्रह्मात्मिका अजा अभिधेय नहीं है। ब्रह्मात्मकाऽजाग्रहण एव विशेषहेतुरस्तीत्याह— इस प्रकरण में ब्रह्मात्मक अजा ही मानी जायगी इसका विशेष कारण प्रस्तुत करते हैं— ज्योतिरुपक्रमा तु तथाह्यधीयत एके ॥१।४।६॥ तु शब्दोऽवधारणार्थः, ज्योतिरुपक्रमैवैषाऽजा, ज्योतिः ब्रह्म “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते” इत्यादि श्रुति प्रसिद्धेः । ज्योतिरुपक्रमा, ब्रह्मकारणिका इत्यर्थः । तथा हि अधीयत एके-हीति हेतौ, यस्मादस्या अजाया ब्रह्मकारण- कत्वमेके शाखिनः तैत्तिरीया अधीयते- “अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः” इति हृदयगुहायामुपास्यत्वेन सन्निहितं ब्रह्माभिधाय “सप्त प्राणाः प्रभवंति तस्मात्” इत्यादिना सर्वेषां लोकानां ब्रह्मादीनां च तत उत्पत्तिमभिधाय सर्वकारणीभूता- ऽजा तत उत्पन्नाऽभिधीयते “अजामेकाम्” इत्यादिना । सर्वस्य तद्- व्यतिरिक्तस्य वस्तुजातस्य तत उत्पत्त्या तदात्मकत्वोपदेशे प्रक्रिय- माणेऽभिधीयमानत्वात् प्राणसमुद्रपर्वतादिवदेषाप्यजा वह्वीनां सरूपाणां प्रजानां स्रष्ट्री कर्मवश्येनात्मना भुज्यमाना अन्येन विदुषा- त्मना त्यज्यमाना च ब्रह्मण उत्पन्ना ब्रह्मात्मिकाऽवगंतव्येत्यर्थः । श्रतो वाक्यशेषाच्चमसवशेषवच्छाखांतरीयादेतत्स्वरूपात् प्रत्यभिज्ञाय- मानार्थान् वाक्यानियमिताऽजा ब्रह्मात्मिकेति निश्चीयते । सूत्रस्थ तु शब्द निश्चयात्मक है। इस प्रकरण में कही गई अजा ज्योतिरुपक्रमा (ज्योतिर्मय ब्रह्मात्मिका) ही है। “देवता ज्योतियों की ज्योति की उपासना करते हैं, वह ज्योति द्युलोक के ऊपर चमक रही
( ५७१ ) है'' इत्यादि श्रुतियों में ज्योति ब्रह्म की प्रसिद्धि है। ज्योतिरुपक्रमा का अर्थ है ब्रह्मकारणिका, अर्थात् ज्योति ब्रह्म ही जिसका कारण है। तैत्तिरीयोपनिषद् की एक शाखा में इसे ब्रह्मकारणिका बतलाया गया है— “इस जीवात्मा की अन्तर्गुहा में, अणु से अणु और महान् से महान रूप वाला वह परमात्मा विराजमान है'' इस वाक्य में, हृदय की गुहा में उपास्य रूप से सन्निहित ब्रह्म का वर्णन करके “सात प्राण उससे उत्पन्न होते हैं'' इत्यादि में सभी लोकों और ब्रह्मा आदि की उत्पत्ति उसी से बतलाकर, सबकी कारणीभूत अजा है उसी से सब उत्पन्न हुए हैं, ऐसा “अजामेकाम्'' इत्यादि में बतलाया गया है। ब्रह्म के अतिरिक्त, उत्पन्न होने वाले सारे पदार्थ ब्रह्मात्मक हैं, ऐसे उपदेश के प्रसंग में, अनेक प्रजाओं की सृष्टि करने वाली, कर्माधीन जीवात्मा से भोग्या, अन्य ज्ञानी जीव से परित्यक्ता, ब्रह्मोत्पन्ना, इस अजा को भी, प्राण समुद्र पर्वत आदि की तरह, ब्रह्मात्मक मानना होगा। यही उक्त प्रकरण का तात्पर्य है। जैसे कि वाक्यांश से चमस शब्द की विशेष अर्थ प्रतीति होती है, वैसे ही उक्त शाखान्तरीय वाक्य से भी अजा शब्द की विशेष अर्थ प्रतीति होती है, इसलिए यह अजा ब्रह्मात्मिका है, ऐसा निश्चित होता है। इहापि प्रकरणोपक्रमे “किं कारणं ब्रह्म” इत्यारभ्य “ते ध्यान- योगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढां” इति परब्रह्म शक्ति- रूपाया अजाया अवगते, उपरिष्टाच्च “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत- तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः” “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” “यो योनिंयोनिमधितिष्ठत्येकः” इति च तस्या एव प्रतीतेर्नास्मिन्मंत्रे तंत्रसिद्ध स्वतंत्र प्रकृति प्रतिपत्ति गंधः। इस प्रकरण के उपक्रम में “इस जगत का मुख्य कारण ब्रह्म कौन है ?” इत्यादि से प्रारंभ करके “उन्होंने ध्यान योग में स्थित होकर, अपने गुणों से आवृत आत्म शक्ति का साक्षात् किया” इस वाक्य तक जो वर्णन किया गया है उससे अजा परब्रह्म की शक्ति रूपा है, ऐसा परिज्ञान होता है। इसके बाद के वाक्य से भी यही निश्चित होता है, जैसे— ankurnagpal108@gmail.com
( ५७२ ) “प्रकृति को माया तथा महेश्वर को मायाधीश जानो, उसी के अंगभूत कारण समुदाय से यह संपूर्ण जगत् ब्याप्त है ।” इन सब से ब्रह्मात्मिका अजा की ही प्रतीति हो रही है । सांख्य तंत्रोक्त, स्वतंत्र स्वभावा अजा की तो इस मंत्र में लेशमात्र भी चर्चा नहीं है । कथं तर्हि ज्योतिरुपक्रमाया लोहित शुक्ल कृष्ण रूपाया अस्याः प्रकृतेरजात्वम्, अजाया वा कथं ज्योतिरुपक्रमात्वमित्य- त्राह-- ज्योतिरुपक्रमा, रक्त श्वेत कृष्ण वर्णा इस प्रकृति का अजा होना कैसे संभव है ? यदि अजा है तो वह ज्योतिरुपक्रमा कैसे है ? इस शंका की निवृत्ति करते हैं-- कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिषदविरोधः ॥१।४।१०॥ प्रसक्ताशंकानिवृत्यर्थश्च शब्दः । अस्याः प्रकृतेरजात्वं ज्योति- रुपक्रमात्वं च न विरुध्यते, कुतः ? कल्पनोपदेशात् । कल्पनं क्लृप्तिः सृष्टिः जगद् सृष्ट्युपदेशादित्यर्थः । यथा-“सूर्याश्चंद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इति कल्पनं सृष्टिः । अत्रापि “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” इति जगत् सृष्टिरुपदिश्यते । स्वेनाविभक्ताद- स्मात् सूक्ष्मावस्थात् कारणान्मायी सर्वेश्वरः सर्वं जगत् सृजती- त्यर्थः । अनेन कल्पनोपदेशेनास्याः प्रकृतेः कार्यकारणरूपेणावस्था- द्वयान्वयोऽवगम्यते । सा हि प्रलयवेलायां ब्रह्मतापन्ना अविभक्त नामरूपा सूक्ष्मरूपेणावतिष्ठते । सृष्टि वेलायां तद्भूत सत्वादिगुणाः विभक्त नामरूपाऽव्यक्तादि शब्दवाच्या तेजोऽबन्नादिरूपेण च परिणता लोहित शुक्ल कृष्णाकारा चावतिष्ठते । अतः कारणावस्था अजा कार्यावस्थाज्योतिरूपक्रमेति न विरोधः । सूत्रस्थ च शब्द की गई शंका की निवृत्ति के लिए प्रयोग किया गया है । इस प्रकृति के अजात्व और ज्योतिरुपक्रमात्व में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि-कल्पना का उपदेश दिया गया है । क्लृप्ति का अर्थ
( ५७३ ) होता है सृष्टि, इसलिए कल्पना के उपदेश का तात्पर्य है सृष्टि का उपदेश । जैसे कि--"विधाता ने वैसे ही सूर्य और चंद्र की कल्पना की" इस वाक्य में कल्पना शब्द सृष्टि वाची है । इसमें भी "यह मायावी भूत समुदाय से जगत की सृष्टि करता है" ऐसा जगत सृष्टि का उपदेश दिया गया है । उक्त वाक्य का तात्पर्य है कि-मायाधीश सर्वेश्वर, अपने से अभिन्न, सूक्ष्म कारण रूप में स्थित इस प्रकृति से ही जगत को रचते हैं। इस कल्पनोपदेश से इस प्रकृति की कार्यकारण रूप दोनों अवस्थाओं की प्रतीति होती है। यह प्रकृति प्रलयावस्था में, अविभक्त नाम रूप वाली होकर सूक्ष्म रूप से ब्रह्म में लीन होकर स्थित रहती है । सृष्टि काल में यही, सत्त्व आदि गुणों के रूप में प्रकट विभक्त नाम रूपवाली, अव्यक्त आदि नामों वाली, तेज जल पृथिवी आदि रूपों में परिणत, रक्त शुक्ल कृष्ण आकार वाली हो जाती है । इस प्रकार कारण अवस्था वाली अजा और ज्योतिरुपक्रमा अजा में कोई विरोध प्रतीत नहीं होता । मध्वादिवत्-यथेश्वरेणादित्यस्य कारणावस्थायामेकस्यैवाव- स्थितस्य कार्यावस्थायामृग्यजुःसामाथर्व प्रतिपाद्य कर्मनिष्पाद्यरसा- श्रयतया वस्वादि देवताभोग्यत्वाय मधृत्वकल्पनं उदयास्तमय कल्प- नं च न विरुध्यते, तदुक्तं मधुविद्यायाम्-"असौ वा आदित्यो देवमधु" इत्यारभ्य "अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य नैवोदेतानास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता" इत्यंतेन । एकलः एकस्वभावः । अतोऽनेन मंत्रेण ब्रह्मा- त्मिकाऽजैवाभिधीयते, न कपिलतंत्र सिद्धेति सिद्धम् । जैसे कि--कारणावस्था में स्थित एक ही आदित्य की कार्यावस्था अर्थात् उदीयमान अवस्था की ऋग् यजु साम और अथर्व वेद में, कर्म- फलावाप्ति के लिए, वसु आदि देवताओं की भोग्यता संपादन के लिए मधुरूप से की गई कल्पना में कोई विरुद्धता नहीं है, वैसे ही अजा के भी कार्यकारण रूप में कोई विरुद्धता नहीं है, मधुविद्या के-"यह आदित्य ही देवताओं का मधु है" इत्यादि से प्रारंभ कर "जैसा अब उदय हुआ है, वैसा अब उदय न होगा" इस अंतिम वाक्य तक के वर्णन से यही ankurnagpal108@gmail.com
( ५७४ ) बात स्पष्ट होती है। मंत्र में प्रयुक्त एकल शब्द एक स्वभाव का वाची है। इस मंत्र से ब्रह्मात्मिका अजा की ही प्रतीति होती है, कापिल तंत्र- सिद्ध प्रकृति की नहीं यह निश्चित मत है। अन्ये त्वस्मिन् मन्त्रे तेजोबन्नलक्षणाऽजैकाभिधीयत इति ब्रुवते । ते प्रष्टव्याः, किं तेजोवन्नान्येव तेजोबन्नात्मिकाऽजेका, उत तेजोबन्न रूपं ब्रह्मैव, किं वा तेजोबन्नकारणभूता काचित्—इति । प्रथमे कल्पे तेजोबन्नानां अनेकत्वात् “अजामेकाम्” इति विरुध्यते । न च वाच्यं तेजोबन्नानामनेकत्वेऽपि त्रिवृत्करणे नैकतापत्तिरिति त्रिवृत्करणेऽपि बहुत्वानपगमात्--“इमास्तिस्रो देवताः” तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि' इति प्रत्येकं त्रिवित्करणोपदेशात् । द्वितीयः कल्पो विकल्प्यः, किं तेजोबन्नरूपेण विकृतं ब्रह्मैवाजैका, किं वा स्वरूपेणावस्थितमविकृतमिति । प्रथमः कल्पो बहुत्वानपायादेव निरस्तः । द्वितीयोऽपि “लोहितशुक्लकृष्णां” इति विरुध्यते । स्वरूपेणावस्थितं ब्रह्म तेजोबन्नलक्षणमिति वक्तुमपि शक्येत । तृतीये कल्पेऽप्यजाशब्देन तेजोबन्नानि निर्दिश्य तैस्तत्कारणावस्थोपस्थापनी- येत्यास्थेयम् । ततो वरमजाशब्देन तेजोबन्नकारणावस्थायाः श्रुति- सिद्धाया एवाभिधानम् । अन्य संप्रदाय वाले कहते हैं कि—इस मंत्र में तेज जल पृथिवी रूपा एक अजा का वर्णन है। ऐसा कहने वालों से प्रश्न है कि–तेज जल पृथिवी रूप ही तेज जल पृथिव्यात्मिका एक अजा है ? अथवा तेज जल पृथिवी रूप ब्रह्म ही अजा है ? अथवा तेज जल पृथिवी की कारण भूता कोई शक्ति विशेष है ? प्रथम प्रकार तो संभव नहीं है क्योंकि तेज जल पृथिवी आदि तो अनेक हैं और अजा एक है, यह विरुद्धता कैसे संभव होगी । आप यह नहीं कह सकते कि--तेज जल पृथिवी अनेक होते हुए भी त्रिवृत् प्रक्रिया से एक ही माने जाते हैं। उनके व्यात्मक होते हुए भी उनकी अनेकता भंग नहीं होती, जैसा कि--“इन तीन देवताओं को एक-एक के तीन-तीन करूँगा” इत्यादि से ज्ञात होता है। ankurnagpal108@gmail.com
( ५७५ ) द्वितीय प्रकार भी वैकल्पिक है, अर्थात् यह अजा, तेज जल पृथवी रूप से विकृत ब्रह्म है, अथवा स्वरूपावस्थ अविकृत ब्रह्म है ? उसका विकृत रूप तो हो नहीं सकता, क्योंकि विकृत रूप अनेक होता है, और अजा एक है । अविकृत रूप भी "लोहित शुक्ल कृष्णा" इस विकृत वर्णन से विरुद्ध है । इसलिए तेज जल पृथ्वी आदि रूप वाली स्वरूपावस्थिति है ऐसा तो कह नहीं सकते । तृतीय प्रकार में भी, अजा शब्द से तेज जल पृथिवी आदि निर्दिष्ट उसकी कारणावस्था ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा ही मानना है तो, श्रुतिसिद्ध कारणावस्था के निर्देश को मानना ही श्रेष्ठ है । यत्पुनरस्याः प्रकृतेरजाशब्देन छागत्वपरिकल्पनमुपदिश्यत इति, तदप्यसंगतम्, निष्प्रयोजनत्वात् । यथा-“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिषु ब्रह्मप्राप्त्युपायताख्यापनाय शरीरादिषु रथादिरूपणं क्रियते तद्वदस्यां प्रकृतौ छागत्वपरिकल्पनं क्वोपयुज्यते ? न केवल- मुपयोगाभाव एव, विरोधश्च, कृत्स्न जगत् कारणभूतायाः स्वस्मि- न्नादिकाल संबद्धानां सर्वेषामेव चेतनानां निखिल सुखदुःखोपभोगा- पवर्ग साधनभूतायाः अचेतनायाः अत्यल्प प्रजासर्गकरागंतुक संगम- चेतन विशेषैकरूपा अत्यल्प प्रयोजन साधन स्वपरित्यागाहेतुभूत स्वसंबंधिपरित्याग समर्थ चेतन विशेषरूपच्छागस्वभावख्यापनाय तद्रूपत्वकल्पनं विरुद्धमेव । “अजामेकां” अजो ह्येकः “अजोऽन्यः” इत्यत्राजाशब्दस्य विरूपार्थकल्पनं च न शोभनम् । सर्वत्र छागत्वं परिकल्प्यत इतिचेत् “जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः” इति विदुष आत्यंतिक प्रकृति परित्यागं कुर्वंतो अनेन वान्येन वा पुनरपि संबंध- योग्छागत्वपरिकल्पनमत्यंत विरुद्धम् । यदि यह कहें कि--अजा शब्द का अर्थ बकरी है, ऐसा कहना भी असंगत है, ऐसे अर्थ में अजा शब्द के प्रयोग का कोई प्रयोजन समझ में नहीं आता । जैसे कि-“आत्मा को सारथी जानो” इत्यादि वाक्य में, ankurnagpal108@gmail.com
ब्रह्म प्राप्ति की उपायता दिखलाने के लिए, शरीरादि की रथादि रूपों में कल्पना की गई, वैसे ही इस अजा का बकरी अर्थ करने में क्या उपयोग है ? अजा शब्द का बकरी अर्थ करने में केवल प्रयोजन का ही अभाव नहीं है अपितु विरोध भी पड़ता है । संपूर्ण जगत की कारण रूपा प्रकृति, अचेतन होती हुई भी, अनादिकाल से अपने में संबद्ध विशिष्ट चेतनों के समस्त सुख दुःखों के भोग की तथा अपवर्ग की राधिका भी है । उसको अत्यल्प संतान समुत्पादनार्थ, चेतन विशेष के साथ अभिनव संगम संबंध से केवल दुग्ध प्रदान रूप प्रयोजन के लिए बकरी रूप से कल्पित करना, उसके स्वरूप के विरुद्ध ही होगा । “अजामेकाम्, अजो ह्ये कः, अजोऽन्यः” इन पदों में प्रयुक्त अजा शब्द जो कि क्रमशः प्रकृति, बद्धजीव और मुक्त जीव के लिए कहा गया है, यहाँ बकरी अर्थ करना अशोभनीय भी है । यदि कहो कि हम तीनों ही अर्थों में बकरी अर्थ करेंगे तो “दूसरा अज इस भुक्तभोगी अजा का त्याग करता है” इस वाक्य में संपूर्ण रूप से प्रकृति को त्याग करने वाले जिस ज्ञानी पुरुष अज का वर्णन किया गया है, उसकी बकरी रूप से कल्पना करना तो उस मुक्त पुरुष को पुनः माया संबंधी बकरी रूप से बांधना है, जो कि अत्यंत विरुद्ध है । ३ संख्योपसंग्रहाधिकरण :— न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ।१।४।११॥ वाजसनेयिनः समामनंति-“यस्मिन् पंच पंचजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः, तमेवम्मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम्” इति । किमयं मंत्रः कपिलतंत्रसिद्ध तत्वप्रतिपादनपरः उत नेति संदि- ह्यते । किं युक्तम् ? तंत्रसिद्धतत्व प्रतिपादनपर इति, कुतः ? पंच- शब्द विशेषात् पंचजनशब्दात् पंचविंशति तत्त्व प्रतीतेः । एतदुक्तं भवति-“पंचजनाः” इति समासः समाहार विषयः । पंचानां जनानां समूहः पंचजनाः “पंचपूल्य” इतिवत् । पंचजना इति लिंगव्यत्य- यश्छांदसः, ते च समूहाः कतीत्यपेक्षायां पंचजनशब्द विशेषेण ankurnagpal108@gmail.com
( ५७७ ) प्रथमेन पंचशब्देन समूहाः पंचेति प्रतीयंते, यथा पंच पंचपूल्य इति । अतः “पंच पंचजनाः” इति पंचविंशतिपदार्थावगतौ ते कतम इत्य- पेक्षायां मोक्षाधिकारान्मुमुक्षुभिः ज्ञातव्यतया स्मृति प्रसिद्धाः प्रकृत्या- दय एव ज्ञायंते । “मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त, षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः” इति हि कापिलानां प्रसिद्धिः, अतस्तंत्रसिद्ध तत्त्व प्रतिपादन परः । वाजसनेयी बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया कि--“पाँच, पांच- जन और आकाश जिसपर प्रतिष्ठित हैं, उसी को आत्मा मानकर अमृत- स्वरूप ब्रह्मवेत्ता पुरुष अमर होते हैं ।” इस पर संदेह होता है कि-- यह कापिल तंत्रोक्त तत्त्व का प्रतिपादक है या नहीं ? कह सकते हैं कि - सांख्य तत्त्व का ही प्रतिपादक है, क्योंकि- इसमें पांच-पांच जनों का वर्णन विशेष रूप से किया गया है, जो कि सांख्योक्त पच्चीस तत्त्वों की ही प्रतीति कराता है । “पंचजनाः” पद समाहार समास विषयक है, पांच जनों के समूह को “पंचजन” कहते हैं, यह “पंचपुल्यः” की तरह समस्त पद है। इस पद में वैदिक व्याकरण के अनुसार लिंग विपर्यय है ( पुल्लिंग प्रयोग किया गया है अन्यथा स्त्रीलिंग “पंचजनी” प्रयोग होना चाहिए था) । ये पांच समूह कौन हैं ? ऐसी आकांक्षा होने पर—पंचजन शब्द के विशेषणीभूत, दूसरे “पंच” शब्द से ऐसा ज्ञात होता है कि केवल पांच ही हैं; जैसा कि “पंच पंचपूल्यः” में है । “पंच पंचजनाः” इस वाक्य में कहे गए पांच पांच के वे पांच समूहित पदार्थ कौन हैं ? ऐसी आकांक्षा होने पर--सांख्यतत्त्वप्रसिद्ध मुमुक्षुओं के लिए ज्ञातव्य प्रकृति आदि तत्त्व ही ज्ञात होते हैं, यह शास्त्र एकमात्र मोक्षाधिकार का ही उपदेश देता है । “मूल प्रकृति अविकृत है, महत् आदि सात ( रूप-रस-गंध-स्पर्श- शब्द-महत्-अहंकार ) प्रकृति विकृति दोनों हैं । सोलह ( जिह्वा-चक्षु- कर्ण-त्वग्-घ्राण, हस्त-पाद-पायु-उपस्थ-वाक्-मन-पृथ्वी-जल-वायु-तेज- आकाश ) विकार हैं, पुरुष न प्रकृति है न विकृति ।” ये कापिल तंत्रसिद्ध पच्चीस तत्त्व हैं । इससे यही ज्ञात होता है कि—उक्त श्रुति वाक्य इन तत्त्वों का ही प्रतिपादक है ।
( ५७८ ) सिद्धान्तः—इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे—"न संख्योपसंग्रहादपि" इति । 'पंच पंचजनाः' इति पंचविंशति संख्योपसंग्रहादपि न तंत्रसिद्ध- तत्त्वप्रतीतिः, कुतः ? नानाभावात्—एषां पंच संख्या विशेषितानां पंचजनानां तंत्रसिद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्यः पृथग्भावात्, "यस्मिन् पंच पंच जना आकाशश्च प्रतिष्ठितः" इत्येतेषां यच्छब्द निर्दिष्ट ब्रह्मााश्रयतया ब्रह्मात्मकत्वं हि प्रतीयते । "तमेवम्मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽ- मृतम्" इत्यत्र तमिति परामर्शेन यच्छब्दनिर्दिष्टं ब्रह्मेत्यवगम्यते । अतस्तेभ्यः पृथग्भूताः पंचजना इति न तंत्रसिद्धा एते । अतिरेकाच्च तंत्रसिद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽत्र तत्त्वातिरेकोऽपि भवति । यच्छब्दनिर्दिष्ट आत्मा आकाशश्चात्रातिरिच्येते । अतः "तं षड्विंशकमित्याहुस्सप्त- विंशमथापरे" इति श्रुति प्रसिद्धसर्वतत्त्वाश्रयभूतः सर्वेश्वरः परम- पुरुषोऽत्राभिधीयते, "न संख्योपसंग्रहादपि" इत्यपि शब्दस्य "पंच पंचजनाः इत्यत्र पंचविंशति तत्त्वप्रतिपत्तिरेव न संभवतीत्यभिप्रायः । कथम् ? पंचभिरारब्धसमूह पंचकासंभवात्, न हि तंत्रसिद्धतत्त्वेषु पंचसु पंचस्वनुगतं यत्संख्यानिवेशनिमित्तं जात्याद्यस्ति, न च वाच्यं, पंच कर्मेन्द्रियाणि, पंच ज्ञानेन्द्रियाणि, पंच महाभूतानि, पंच तन्मात्राणि, अविशिष्टानि पंच—इत्यवांतरसंख्यानिवेशाय निमित्त- मस्त्येव इति । आकाशस्य पृथङ्निर्देशेन, पंचभिरारब्धमहाभूत- समूहासिद्धेः । अतः "पंचजनाः" इत्ययं समासो न समाहार विषयः, अयंतु "दिक्संख्ये संज्ञायाम्" इति संज्ञाविषयः, अन्यथा पंचजनाः इति लिंगव्यत्ययश्च । पंचजना नाम केचित्संति, ते च पंच संख्या विशेष्यन्ते, "पंच पंचजनाः" इति, "सप्त सप्तर्षय" इति वत् । उक्त संशय पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से "न संख्योप" इत्यादि सूत्र प्रस्तुत करते हैं । अर्थात् उक्त वाक्य का पचीस संख्या अर्थ मान लेने पर भी सांख्योक्त तत्त्वों की प्रतीति नहीं होती, सांख्योक्त तत्त्वों से ankurnagpal108@gmail.com
( ५७६ ) पृथक्ता है। इन पंच संख्याविशेषित पांच जनों की सांख्योक्त तत्त्वों से पृथक्ता दिखलाई गई है। यत् शब्द निर्दिष्ट ब्रह्म के आश्रित होने से, इन तत्त्वों की ब्रह्मात्मकता प्रतीत होती है। “उसको ही आत्मा मानकर जो अमृत स्वरूप ब्रह्म को जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं” इस वाक्य में प्रयुक्त तत् शब्द से यत् शब्द निर्दिष्ट ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। इससे स्पष्ट है कि-पंचजन सांख्योक्त तत्त्व से पृथक् हैं। इसमें जो तत्त्व बतलाये गए हैं वे सांख्य तत्त्वों से संख्या में अधिक भी हैं। यत् शब्द निर्दिष्ट आत्मा और आकाश ये दो सांख्य तत्त्व से अधिक हैं। “उन्हें कुछ लोग छब्बीस तथा कुछ सत्ताइस तत्त्वों वाला कहते हैं” ऐसे श्रुति प्रसिद्ध, समस्त तत्त्वों के आश्रय सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तम ही उक्त श्रुति के प्रतिपाद्य हैं। सूत्रस्थ अपि शब्द यह निर्देश कर रहा है कि—“पंच-पंचजनाः” पद से पच्चीस तत्त्वों की प्रतीति कदापि संभव नहीं है। क्योंकि पांच-पांच समूहों का व्यवस्थित रूप से आरंभ करना संभव नहीं है। सांख्योक्त तत्त्वों की पांच-पांच संख्यावाली कोई सुनियोजित पद्धति नहीं है। ऐसा नहीं कह सकते कि-पंच कर्मेन्द्रिय, पंच महाभूत, पंच तन्मात्रा और पंच अवशिष्ट (महत्, अहंकार, प्रकृति, मन, पुरुष) ऐसी क्रमबद्ध शृंखला है, क्योंकि-वाक्य में जो आकाश का पृथक् निर्देश किया गया है, उससे पंचमहाभूत समूह असिद्ध हो जाता है। यह “पंचजनाः” पद समाहार समस्त पद नहीं है अपितु “दिक् संख्ये संज्ञायाम्” सूत्र के अनुसार संख्यावाची है। यदि ऐसा न होता तो इस पद में लिंगविपर्यय अवश्य हो जाता (अर्थात् पंचजनी होता), “पंच पंचजनाः” वाक्य “सप्त सप्तर्षयः” की तरह संख्यावाची ही है। के पुनस्ते पंचजनाः ? इत्यत आह— तो फिर वे पांच कौन हैं ? इसका उत्तर देते हैं— प्राणादयो वाक्यशेषात् । १।४।१२॥ “प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं अन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः” इति वाक्यशेषात् ब्रह्माश्रयाः प्राणादय एव पंचपंचजनाः इति विज्ञायन्ते । ankurnagpal108@gmail.com
( ५८० ) “वे प्राणों के प्राण, नेत्रों के नेत्र, श्रोत्रों के श्रोत्र, अन्नों के अन्न और मनों के मन कहे जाते हैं” इस वाक्यांश में कहे गए, ब्रह्माश्चित प्राण आदि ही उक्त वाक्य में पांच संख्यावाले तत्त्व ज्ञात होते हैं । अथ स्यात् काण्वानां माध्यन्दिनानां च “यस्मिन् पंच पंच- जनाः” इत्ययं मंत्रः समानः । “प्राणस्य प्राणः” इत्यादि वाक्यशेषे काण्वानामन्नस्य पाठो न विद्यते । तेषां पंच पंचजनाः प्राणादय इति न शक्यते वक्तुम्–इति, तत्रोत्तरम् । आपकी बात ही ठीक हो सकती है, पर काण्व और माध्यन्दिन दोनों शाखाओं में “पंच पंचजनाः” इत्यादि मंत्र समान रूप से मिलता है, किंतु “प्राणस्य प्राणः” इत्यादि काण्व शाखीय वाक्यशेष में अन्न पाठ नहीं है, इसलिए उसमें तो प्राणादि को पांच तत्त्व कह नहीं सकते । इसका उत्तर देते हैं— ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥१।४।१३॥ एकेषां काण्वानां पाठे असत्यन्ने ज्योतिषः पंचजनाः इंद्रिया- णीति ज्ञायंते, तेषां वाक्यशेषः प्रदर्शनार्थः । एतदुक्तं भवति- “यस्मिन् पंच पंचजनाः” इत्यस्मात्पूर्वस्मिन् मंत्रे “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्” इति ज्योतिषां ज्योतिष्ट्वे ब्रह्मएयभि- धीयमाने ब्रह्माधीनस्वकार्याणि कानिचित् ज्योतींषि प्रतिपन्नानि, तानि च विषयाणां प्रकाशकानीन्द्रियाणीति । “यस्मिन् पंच पंचजना” इत्यनिर्धारितविशेषनिर्देशेनावगम्यंते इति । “प्राणस्य” इति प्राण शब्देन स्पर्शनेन्द्रियं गृह्यते, वायुसंबंधित्वात् स्पर्शनेन्द्रियस्य मुख्य प्राणस्य ज्योतिः शब्देन प्रदर्शनायोगात् । चक्षुष इति चक्षुरिन्द्रियम्, श्रोत्रस्येति श्रोत्रे न्द्रियम्, अन्नस्येति घ्राणरसनयोस्तंत्रे णोपादानम्, अन्न शब्दोदित पृथिवी संबंधित्वात् घ्राणेंद्रियमनेन गृह्यते । अद्यते अनेनेत्यन्नम् इति रसनेन्द्रियमपि गृह्यते । मनस इति मनः । ankurnagpal108@gmail.com
( ५८१ ) घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानमिति पंचत्वमप्यविरुद्धम् । प्रकाशकानि मनः पर्यन्तानीन्द्रियाणि पंचजनशब्दनिर्दिष्टानि तदविरोघाय घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानम् । तदेवम्–“यस्मिन् पंच पंचजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः” इति पंचजन शब्दनिर्दिष्टानि इन्द्रियाणि आकाश शब्द प्रदर्शितानि महाभूतानि च ब्रह्मणि प्रतिष्ठितानीति सर्वतत्त्वानां ब्रह्माश्चयत्व प्रतिपादनात् न तंत्रसिद्ध पंचविंशति तत्त्व प्रसंगः । अतः सर्वत्र वेदांते संख्योपसंग्रहे तदभावे वा न कापिल- तंत्रसिद्ध तत्त्वप्रतीतिः, इति स्थितम् । काण्व शाखीय पाठ में अन्न शब्द के न होते हुए भी, ज्योति शब्द के निर्देश से इन्द्रियों की ही “पंचजन” शब्द से प्रतीति होती है । उक्त अर्थ के प्रकाशन के लिए ही वाक्य के शेष में “पंचजन” शब्द का प्रयोग किया गया है । कथन यह है कि—“पंच पंचजनाः” वाक्य के पूर्ववर्त्ती “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” इत्यादि वाक्य में, ज्योतियों के प्रकाशक के रूप में ब्रह्म का निरूपण किया गया है । उन ज्योतियों का अपना अपना प्रकाशन कार्य ब्रह्म के ही अधीन है । ‘यस्मिन् पंच’ इत्यादि में जो विशेष निर्देश किया गया है उससे, विषयों की प्रकाशक पांच इन्द्रियों का ही बोध होता है । “प्राणस्य” पद में कहे गए प्राण शब्द से स्पर्शनेंद्रिय का ग्रहण होता है, इस इन्द्रिय का वायु के साथ संबंध है । ज्योति शब्द का मुख्य प्राण से तो ग्रहण किया जा नहीं सकता । “चक्षुषः” से चक्षु- रिन्द्रिय, “श्रोत्रस्य’ से श्रोत्रेन्द्रिय का निर्देश किया गया है । “अन्नस्य” से घ्राण और रसन दोनों इन्द्रियों का निर्देश किया गया है । अन्न का अर्थ है पृथ्वी, घ्राणेंद्रिय का पृथ्वी से संबंध है, क्योंकि यह इन्द्रिय गंध- गुणवाली पृथ्वी से ही प्रकट हुई है । “अद्यते अनेन इति अन्नम्” इस व्याख्या के अनुसार, रसनेन्द्रिय भी अन्न शब्दवाची हो सकती है । “मनसः” शब्द से मन का निर्देश है । घ्राण और रसन के एक साथ निर्देश होने पर भी, पांच संख्या में कोई अन्तर नहीं आता । प्रकाश स्वभाव वाली मनपर्यन्त इन्द्रियाँ ही “पंचजन” शब्द से निर्दिष्ट हैं, संख्या विषयक विरोध के परिहार के लिए ही घ्राण और रसन दोनों ankurnagpal108@gmail.com