श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पद्य सूची भाल-याँहा ] भालकर्म देखि' तारे १२/११६ भालमते शोधन करह १२/९३ भाष्य कह तुमि-सूत्रेर् ६/१३१ भोगेर् समय लोकेर १३/२०१ भोजन करिलुँ, ना १२/१८९ म मणि यैछे अविकृते ६/१७१ मण्डली छाड़िया गेला ८/११३ मत्तगज भावगण, प्रभुर २/६४ मध्वाचार्य-ठाञि कृष्ण ९/२४७ मध्वाचार्य-स्थाने आइला ९/२४५ मनुष्येर वेश धरि' १/२६८ मने ना मिलिले करे १२/११६ मने भावेन, कुरुक्षेत्रे १/५३ मन्दिरेर चक्र देखि' ११/१९५ मन्दिर-निकटे याइते ११/१६५ मर्यादा हैते कोटि १०/१४० महा-अपराध कैनु गर्वित ६/२०० महाकुलीन तुमि-विद्या ५/२२ महानुभावेर चित्तेर स्वभाव ७/७२ महान्त-स्वभाव एइ ८/३९ महाप्रभु बिना केह नाहि १२/१८२ महाप्रभुर गुण गाञा १/२६९ महाप्रभुर भक्त, सब ११/६७ महाप्रभुर भक्त तैं हो ६/१८ महाभागवत देखे स्थावर ८/२७२ महाभाव-चिन्तामणि' ८/१६४ मात्सर्य छाड़िया मुखे ९/३६१ मातारे तावत् आमि ३/१७६ माने केह हय 'धीरा' १४/१४३ 'मायाधीश'-'मायावश' ६/१६२ मायावादि-भाष्य शुनिले ६/१६९ मायासीता' दिया अग्नि ९/२०५ मायासीता' रावण निल ९/२०४ माला-प्रसाद लञा याय ११/७४ मुकुन्द सेवन-व्रत कैल ३/७ मुकुन्द-सेवाय हय संसार ३/८ मुक्त-मध्ये कोन् जीव ८/२४८ मुक्ति, कर्म-दुइ वस्तु ९/२७१ मुक्तिपद-शब्दे साक्षात् ६/२७१ मुक्ति पदे याँर, सेइ ६/२७२ मुक्ति, भुक्ति वाञ्छे येइ ८/२५६ मुक्ति-शब्द कहिते मने ६/२७६ मुखे ना निःसरे वाणी ६/१८३ मुख्य' छाड़ि' लक्षणा'ते ६/१५१ मुख्यार्थ छाड़िया कर ६/१३४ मुञि तोमा छाड़िल १०/१२५ मुञि-नीच, अस्पृश्य ११/१८८ मूर्च्छित हञा आचार्य ९/५६ मूर्च्छित हञा सबे ७/९२ मूढ़ अधमजनेरे तैं हो १/३३ मो-बिनु दयार पात्र १/२०१ मोर अपराधे तोमार दण्ड ५/१५१ मोर आगे निजरूप ना ८/२७७ मोर कर्म, मोर हाते १/१९८ मोर गृहे 'प्रभुपदेर' हवे १०/२३ मोर जिह्वा-वीणायन्त्र ८/१३२ मोर प्रतिज्ञा-ताँहा बिना ११/४८ मोर मनेर कथा तुञि १/६९ मोर मनेर कथा रूप १/७१ मोर मुखे वक्ता तुमि ८/१९९ मोर लागि' प्रभुपदे करिबे १२/८ मोर श्लोकेर अभिप्राय ना १/६९ मोरे दया करि' कर १/२०२ मोरे ना धुँइह प्रभु ११/१५६ मोरे पूर्ण कृपा कैल ९/१६० म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी १/१९७ म्लेच्छ-भये सेवक मोर ४/४२ य यत नद नदी यैछे १०/१८७ यत पिये, तत तृष्णा १२/२१५ यतेक विचारे, तत पाय ९/३६४ यदि मोरे कृपा ना १२/१० यदि सेइ महाप्रभुर ना ११/४९ यद्यपि असम्भाष्य बौद्ध ९/४८ यद्यपि आपनि हुये १/२८ यद्यपि आपने पूर्ण, सर्वैश्वर्य ११/१३५ यद्यपि ईश्वर तुमि परम १२/२९ यद्यपि गोपाल सब अन्न ४/७७ यद्यपि गोसाञि तारे हञाछे १२/१२४ यद्यपि जगद्गुरु तुमि ६/८५ यद्यपि वस्तुतः प्रभुर किछु १/२२५ यद्यपि मुक्ति हय एइ ६/२६६ यद्यपि राजारे देखि' हाड़िर १३/१८४ यद्यपि राय-प्रेमी ८/१२९ यद्यपि शुनिया प्रभुर १२/२२ यद्यपि सखीर कृष्ण ८/२११ यद्यपि सहसा आमि ३/१७५ यद्यपि सौन्दर्य कृष्ण ८/९३ यबे येइ रस, ताहा १३/१६७ याइते नारिल, विघ्न ३/१७४ याँर ठाञि कलाविलास ८/१८२ याँर पतिव्रता-धर्म ८/१८३ याँर मुखे कैल प्रभु ८/३१० याँर सद्गुण-गणने ८/१८४ याँर सौन्दर्यादि-गुण ८/१८३ याँरे कृपा करि' करेन ११/११७ याँहा ताँहा राधाकृष्ण ८/२७६ याँहा नेत्र पड़े, ताँहा १०/१७९ । 577
[ यहाँ-लक्ष्मी श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत याहाँ याहाँ प्रभुर चरण 1/165 याँहार सर्वस्व, ताँरे मिले 8/309 याँर सौभाग्य-गुण वाञ्छे 8/182 याँहा लञा याय, ताँहा 11/37 याहाँ सङ्गे चले एइ 1/224 याज्ञिक-ब्राह्मणी सब 12/32 यादवेर विपक्ष, यत 13/156 यावत् पड़ौं, तावत् पाङ 9/101 यारे जानाह, सेइ जाने 9/126 याँरे ताँर कृपा, सेइ 13/59 यारे देखे, तारे कह 7/101 याँहा इच्छा, याह, आमा 10/65 याँहार महिमा सर्वशास्त्रेते 8/97 याहा लागि' मदनदहने 1/55 याहा हैते हय कृष्णे 9/307 येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता, सेइ 8/127 येइ ग्रामे रहि' भिक्षा 7/106 येइ भट्टाचार्य पड़े पड़ाय 6/278 येइ मतनाचाओ, सेइ 8/131 येइ येइ कहे, सेइ 12/113 ये इहा एकबार पिये 8/305 ये-काले करेन जगन्नाथ 1/53 ये-काले निमाञि पड़े 3/166 ये काले वा स्वप्ने 2/37 ये तोमार माया-नाटे 8/198 ये तोमारे राज्य दिल 1/176 ये ना वाञ्छे, तार 4/146 ये मदन तनुहीन, परद्रोहे 2/22 ये यैछे भजे, कृष्ण 8/90 योगपट्ट ना निल, नाम 10/108 योग्यपात्र हय गूढरस 1/74 र रत्नगण-मध्ये यैछे 4/193 रथयात्रा देखि' ताँहा 1/47 रथयात्राय आगे यबे 1/54 रन्धने निपुणा ताँ-सम 9/298 'रस'-कोन् तत्त्व, 'प्रेम' 8/118 रसज्ञ कोकिल खाय 8/257 'रसराज', 'महाभाव'-दुइ 8/281 रसामृतसिन्धु, आर विदग्ध 1/38 राक्षसे स्पर्शिल ताँरे 9/189 रागमार्गे भजि' पाइल 8/222 रागानुग-मार्गे ताँरे भजे 8/220 राजवेश, हाती, घोड़ा 1/79 राजा कहे,-उपवास 11/111 राजा कहे,-शास्त्र-प्रमाणे 11/101 राजा कहे,-शुन, मोर 1/180 राज्य छाड़ि' योगी हइ' 12/10 राज्यभोग নহে चित्ते बिना 12/20 रात्रि-दिन कुञ्जे क्रीड़ा 8/188 रात्रि-दिन चिन्ते 8/227 राधाकृष्ण-कुञ्जसेवा साध्य 8/204 राधाकृष्णपदाम्बुज-ध्यान 8/252 राधाकृष्ण-प्रेमकैलि कर्ण 8/254 राधाकृष्णे तोमार महाप्रेम 8/276 राधाकृष्णे प्रेम याँर, सेइ 8/246 राधाकृष्णेर प्रेमकैलि-येइ 8/249 राधाकृष्णेर लीला एइ अति 8/200 राधा चाहि' वने फिरे 8/104 राधा-प्रति कृष्ण-स्नेह 8/165 राधा-प्रेमावेशे प्रभु हैला 14/235 राधार कुटिल-प्रेम हइल 8/109 राधार स्वरूप-कृष्णप्रेम 8/208 राधा लागि' गोपीरे यदि 8/102 राधिका-उन्माद यैछे 1/87 राधिकार भावकान्ति करि' 8/278 रामानन्द आइला अपूर्व 8/17 रामानन्द-चरित्र ताहे 8/303 रामानन्द-मिलन-लीला 8/311 'रामानन्द राय' आछे 7/62 रामानन्द राये मोर कोटी 8/310 राय कहे,-आमि-नट 8/131 राय कहे,-आमि शुद्र 10/54 राय कहे,-इहा आमि 8/120 राय कहे,-इहार आगे 8/96 राय कहे,-इहा वइ बुद्धि 8/190 राय कहे,-कान्तभाव प्रेम 8/79 राय कहे,-कृष्ण-कर्मार्पण 8/59 राय कहे,-कृष्णभक्ति-बिना 8/244 राय कहे,-'कृष्ण हय 8/186 राय कहे,-चरण-रथ 11/37 राय कहे,-ज्ञानमिश्रा भक्ति 8/64 राय कहे,-ज्ञानशून्या भक्ति 8/66 राय कहे,-दास्य-प्रेम 8/71 राय कहे,-प्रभु तुमि 8/277 राय कहे,-प्रेमभक्ति-सर्व 8/68 राय कहे,-येइ कहाओ 8/197 राय कहे,-स्वधर्माचरणे 8/57 रावण आसितेइ सीता 9/194 रावण देखिया सीता लैल 9/203 रावण हैते अग्नि कैल 9/203 रावणेर आगे माया-सीता 9/194 रास ना पाइल लक्ष्मी 9/120 रासलीला-वासनाते राधिका 8/112 ल लक्षणा' करिते स्वतः 6/137 लक्ष्मी-आदि नारीगणेर 8/144 लक्ष्मीकान्तादि अवतारेर 8/144 लक्ष्मी केने ना पाइल 9/122 578 ।
पद्य सूची लक्ष्मी-शुद्ध ]
लक्ष्मी चाहे सेइ देहे 9/136 | विश्वम्भर जगन्नाथे के 13/13 | 'वैष्णव' हइल लोक, सबे 7/89 लक्ष्मी जिनि' गुण याँहा 14/226 | विश्वरूप-उद्देशे अवश्य 7/11 | वैष्णवेर हय एइ एक 10/13 लक्ष्मी-सङ्गे दासीगणेर 14/135 | विश्वरूप-सिद्धि-प्राप्ति 7/13 | वैष्णवेर मध्ये राम-उपासक 9/11 लघुभागवतामृतादिके करु 1/41 | विश्वास करि' शुन 8/307 | व्यथा पाञा करे, येन 14/199 ललितादि सखी-ताँर 8/164 | विश्वासे पाइये, तर्के 8/308 | व्यथा येन नाहि लागे 3/166 लावण्यामृत-धाराय तदुपरि 8/167 | विषय छाड़िया तुमि 8/296 | व्याज-स्तुति करे दुँहे 12/196 लीलाय चड़िल ईश्वर रथेर 13/22 | विषाद करेन कामबाणे 8/114 | 'व्याप्य'-'व्यापक'-भावे 10/168 लुकाइले प्रेम-बले जान 8/288 | वृन्दावन-क्रीड़ाते लक्ष्मीर 14/122 | व्यास-भ्रान्त बलि' सेइ 6/172 लोकापेक्षा नाहि इँहार 7/27 | वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना 13/143 | व्यास-सूत्रेर अर्थ-यैछे 6/138 लोके कहे, -ए संन्यासी 9/314 | वृन्दावन याइबार ए 1/224 | व्रजदेवीरे सङ्गे ताँर 8/93 लोकेरे कहिब गिया साक्षीर 5/104 | वृन्दावन याबेन प्रभु शुनि' 1/155 | व्रजवासी लोकेर कृष्णे 4/95 लोहाके यावत् स्पर्शि' 6/279 | वृन्दावन-लीलाय कृष्णेर 14/123 | व्रजलोकेर कोन भाव 8/221 व | वृन्दावने अप्राकृत नवीन 8/137 | व्रजलोकेर भावे पाइये 9/128 वंशीगानामृत-धाम, लावण्य 2/29 | वृन्दावने आइला कृष्ण 14/73 | व्रजलोकेर भावे येइ 9/131 वज्रेर स्थापित, आमि इँहा 4/41 | वृन्दावने उदय कराओ 13/127 | व्रजे तोमार सङ्गे येइ 13/130 वस्तुतत्त्व-ज्ञान हय कृपाते 6/89 | वृन्दावने गोविन्द-स्थाने 5/13 | व्रजेन्द्रनन्दन बिना फाटे 2/16 वस्त्र पाञा राजार हैल 12/38 | वृन्दावने साहजिक ये 14/219 | व्रजेन्द्रनन्दन' बलि' ताँर 9/130 वाणीनाथ-पट्टनायके निकटे 10/61 | वृन्दावनेर सम्पद् देख 14/204 | व्रजेन्द्रनन्दन-स्मृति हय 12/61 वात्सल्ये हयेन तँह येन 9/297 | वेद-आज्ञा यैछे, माता 3/186 | व्रजेश्वरीसुत भजे गोपीभाव 9/133 वामन हञा चाँद धरिते 1/205 | वेदधर्म त्यजि' से कृष्णके 8/219 | श विजातीय लोक देखि' 8/28 | वेद-धर्म लङ्घि' कैले 6/234 | शङ्करारण्य' नाम ताँर 9/299 वितण्डा, छल, निग्रहादि 6/177 | वेद ना मानिया बौद्ध 6/168 | शतकोटि-गोपीते नहे 8/115 विदुरेर घरे कृष्ण 10/138 | वेद-पुराणेते एइ कहे 9/195 | शतकोटि गोपी-सङ्गे 8/108 विधिमते कैल तँहो 8/15 | वेद-पुराणे कहे ब्रह्म 6/139 | शत श्लोक कैल 6/206 विधिमार्गे ना पाइये व्रजे 8/225 | वेदान्त पड़ाइते तबे 6/120 | शतेक संन्यासी यदि 3/100 विनोदिनी लक्ष्मीर हय 9/119 | वेदान्त-श्रवण, -एइ 6/121 | शान्त-दास्य-सख्य 8/86 विप्र कहे, -तुमि साक्षात् 9/214 | वेदाश्रय नास्तिक्यवाद 6/168 | शास्त्रव्याख्या करिते ऐछे 6/191 विप्र कहे, -मूर्ख आमि 9/98 | वेदेर निगूढ़ अर्थ बुझन 6/148 | शिरे वज्र पड़े यदि 7/48 विप्र बोले, -प्रतिमा हञा 5/95 | वैराग्य-अद्वैत-मार्गे प्रवेश 6/75 | शिष्य पड़िछा-द्वारा निल 6/8 विप्र लागि' कर तुमि 5/96 | वैशाखेर प्रथमे दक्षिण 7/6 | शीतल, निर्मल कैल 12/133 'विवर्त्तवाद' स्थापियाछे 6/172 | वैष्णव-ज्ञाने बहुत 9/251 | शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु 12/51 विरक्त संन्यासी आमार 11/7 | वैष्णव सकल पड़े 9/305 | शुद्ध हय यदि, प्रभुरे 10/114 विशारदेर समाध्यायी,-एइ 6/53 | वैष्णव-संन्यासी इँहो 6/49 | शुद्धाशुद्ध गीता पड़ि 9/98
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[ शुनितेइ-साक्षाते श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
स्तम्भ १
शुनितेइ गोपालेर हइल १२/१४९ शुनि' प्रभु कहे किछु ६/१९० शुनिले ना हय प्रभुर १०/११३ शुष्कतर्क-खलि खाइते १४/८७ शैल-उपरि हैते आमा ४/४२ श्लोक करि' एक तालपत्रेते १/६१
श्र
श्रद्धाय चैतन्यलीला शुने ६/२८५ श्रवण-मध्ये जीवेर कोन् ८/२५४ श्रीगोपाल' नाम मोर ४/४१ श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत ८/३०९ श्रीनृसिंह, जय नृसिंह ८/५ श्रीपाद, धर मोर गोसाञिर ९/२८९ श्रीविग्रह ये ना माने ६/१६७ श्रीवृन्दावन-भूमि-याँहा ८/२५३ श्री-वैष्णव एक, —व्येङ्कट ९/८२ श्रीभागवतसन्दर्भ-नाम ग्रन्थ १/४३ श्रीमाधवपुरीर सङ्गे श्रीरङ्ग ९/२९५ श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत ९/१३३ श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ ६/१३६ श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ ६/१३५ श्रेयो-मध्ये कोन् श्रेयः ८/२५० श्रेष्ठ-उपास्य-युगल ८/२५५ शृङ्गार-रसराजमय-मूर्त्तिधर ८/१४२
ष
षड्विध ऐश्वर्य—प्रभुर ६/१६१ षडैश्वर्यपूर्णानन्द-विग्रह ६/१५२
स
सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे करे ११/९९ संस्कार करिये उत्तम ६/७६ सकल-वैष्णवशास्त्र-मध्ये ९/२४० सकल लोकेर आगे ५/११२
स्तम्भ २
सखीगण हय तार पल्लव ८/२०८ सखी बिना एइ लीला ८/२०२ सखी बिना एइ लीलाय ८/२०३ सखीभावे पाय राधाकृष्णेर ८/२२८ सखीभावे ये ताँरे करे ८/२०३ सखीर स्वभाव एक ८/२०६ सखी लीला विस्तारिया ८/२०२ सखी हैते हय एइ ८/२०१ सङ्गीत-गन्धर्व-सम, शास्त्रे १०/११६ सच्चिदानन्द-तनु, व्रजेन्द्र ८/१३५ सच्चिदानन्दमय कृष्णेर स्वरूप ८/१५३ सच्चिदानन्दमय हय ईश्वर ६/१५८ सत्य एक बात कहौँ १/२०१ सत्यविग्रह ईश्वरे', करह ९/२७७ सत्य-सीता आनि' दिल ९/२०७ सनकादि-शुकदेव ताहाते ६/१९८ संन्यास करि' विश्वरूप ७/४४ संन्यास करिला शिखा १०/१०८ संन्यास ग्रहण कैल १०/१०४ संन्यासी देखिया मोरे ९/२७२ संन्यासी' बलिया मोरे ना ८/१२८ संन्यासीर अल्प छिद्र १२/५१ संन्यासीर धर्म नहे ३/७४ संन्यासीर धर्म नहे—संन्यास ३/१७७ संन्यासीर धर्म लागि' श्रवण ६/१२७ संन्यासीर वेष देखि' ८/२८३ संन्यासीर वेषे मोरे दिला ९/२१४ 'सप्तताल-वृक्ष' देखे कानन ९/३१२ सप्तदिन पर्यन्त ऐछे करेन ६/१२३ सब खण्डि' प्रभु निज-मत ६/१७७ सब-भक्तेर आज्ञा निल १४/६ सबे, एक गुण देखि ९/२७७ सबे एक दोष तार १/१९४
स्तम्भ ३
सबे एक सखीगणेर इँहा ८/२०१ सबे दण्डधन छिल, ताहा ५/१५३ सबे बले, केने आइला १/२१३ 'समाः'-शब्दे कहे श्रुतिर ८/२२४ सम्पत्तिर मध्ये जीवेर ८/२४६ सम्भाषिले जानिबे तुमि ७/६५ सम्भाषिले जानिबे ताँर ७/६७ सम्यक् वासना कृष्णेर ८/११२ सर्व-अवतारी, सर्वकारण ८/१३३ सर्व-चित्ताकर्षक, साक्षात् ८/१३८ सर्व त्यजि' जीवेर कर्त्तव्य ८/२५३ सर्वत्र जल-याँहा अमृत १४/२२५ सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णव ९/४४ सर्वत्र हय ताँर इष्टदेव ८/२७३ सर्वदेश वैष्णव' हैल प्रभुर ७/१०८ सर्व मत दुषि' प्रभु ९/४३ सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण स्वयं ६/१४० सर्वैश्वर्य-सर्वशक्ति-सर्वरस ८/१३५ सशरीरे सप्तताल अन्तर्धान ९/३१३ ससागर-शैल मही करे १३/८३ सहज गमन करे, —यैछे १४/२२४ सहज गोपीर प्रेम, —नहे ८/२१४ सहज लोकेर कथा-याँहा १४/२२४ सहजेइ नित्यानन्द-कृष्णप्रेम १/२ सहजेइ पूज्य तुमि, आरे ६/५६ सहजे विचित्र मधुर चैतन्य ४/५ साक्षात् ईश्वर इँह, नाहिक १/१८० साक्षात् ईश्वर तुमि, के ८/१२१ साक्षात् पाण्डु तुमि, तोमार १०/५३ साक्षात् महाप्रभुर द्वितीय १०/१११ साक्षात् श्रीकृष्ण, तैं हो १०/१५ साक्षाते ना देखिले मने ५/१०५ साक्षाते ना देय देखा १३/६१
580 ।
पद्य सूची साक्षि-हरि ] 'साक्षिगोपाल' बलि' ताँर ५/११८ | सेइ जल वंश-सहित ७/१२२ | सेइ सुखसमुद्रेर इँहा नाहि १३/१३० सातदिन कर तुमि वेदान्त ६/१२४ | सेइ जल लञा आपने १२/१२३ | सेइ से ए-सब लीला ७/११० साधारण-प्रेमे देखि' सर्वत्र ८/१०९ | सेइ त' ईश्वर-तत्त्व ६/८३ | सेइ से कर्त्तव्य, तुमि ६/१२२ साध्यवस्तु' साधन'-बिना ८/१९६ | सेइत' पराण-नाथ १/५५, १३/११३ | सेइ से ताँहारे कृष्ण' ११/१०२ साध्य-साधन आमि ना ९/२५५ | सेइ त' सुमेधा, आर ११/९९ | सेइ हैते कृष्णनाम ९/२७ साध्य-साधन-श्रेष्ठ जानाह ९/२५५ | सेइ दण्ड काँहा पड़िल ५/१५० | सेइ हैते भट्टाचार्येर ६/२३६ साध्वी हञा केने चाहे ९/११२ | सेइ दिन ताँर घरे ९/२० | सेइ हैते भाग्यवान् १२/६८ साम्प्रतिक दुइ ब्रह्म' इहाँ १०/१६३ | सेइ दुइर दण्ड हय ६/२६५ | सेकाले दक्षिण हैते १०/९१ सायुज्य' शुनिते भक्तेर हय ६/२६८ | सेइ दुइ स्थाप' तुमि ९/२७१ | से काले नाहि जन्मे ६/१४६ सार्वभौम कहे, - नीलाम्बर ६/५३ | सेइ देहे कृष्णसङ्गे ९/१३४ | से-मन्दिरे गोपालेर ५/१३ सार्वभौम परिवेशान करेन ६/४३ | सेइ नाम हइल तार १/१९५ | से मृत्तिका लय लोक १/१६५ सार्वभौम-सङ्गे मोर मन ८/१२४ | सेइ पञ्चम पुरुषार्थ ९/२६१ | से-विग्रहे कह सत्त्वगुणे ६/१६६ सार्वभौम हैला प्रभुर भक्त ६/२५७ | सेइ फेन लञा शुभानन्द १३/११० | सौभाग्य-तिलक चारु ८/१७५ सार्वभौमेर हैल महाप्रसादे ६/२३१ | सेइ बहिर्वास सार्वभौम १२/३७ | स्त्री-दरशन-सम विषेर ११/७ सिद्धदेहे चिन्ति' करे ८/२२८ | सेइ बुझे, दुँहार पदे ५/१५८ | स्त्रीधन देखाञा तारे लोभ ९/२२७ सिद्धान्त-शास्त्र नाहि ९/२३९ | सेइ ब्रह्म-बृहद्वस्तु ६/१३९ | स्थावर-जङ्गम देखे, ना ८/२७३ सिद्धिप्राप्तिकाले गोसाञि १०/१३३ | सेइ ब्रह्मे पुनरपि हये ६/१४३ | स्थावरदेह, देवदेह यैछे ८/२५६ सीतार आकृति-माया ९/१९३ | सेइ भाव, सेइ कृष्ण १/८० | स्नान करिबारे आइला ८/१४ सीता लञा राखिलेन ९/२०५ | सेइ महाभाव हय चिन्तामणि ८/१६३ | स्नेहवश हञा करे १०/१३९ सुखरूप कृष्ण करे सुख ८/१५७ | सेइ महाभावरूपा राधा ८/१५९ | स्नेह-भक्ति करि' किछु ६/१२० सुभद्रा-सहित देखे, वंशी १/८५ | सेइ याइ' अन्य ग्रामे ७/१०४ | स्नेह-सेवापेक्षा मात्र १०/१३९ सुराबिन्दु-पाते केह ना १२/५३ | सेइ वेष कैल, एबे ३/९ | स्वकल्पित भाष्य-मेघे करे ६/१३८ सूक्ष्म धूलि, तृण, काँकर १२/९३ | सेइ व्रजे पाये शुद्ध ९/१३१ | स्वतःप्रमाण वेद-वाक्ये ६/१७९ सूत्रेर अर्थ-भाष्य कहे ६/१३१ | सेइ शक्ति-द्वारे सुख ८/१५६ | स्वतःप्रमाण वेद सत्य ६/१३७ सूत्रेर मुख्य अर्थ ना ६/१३२ | सेइ शक्ति प्रकाशि' ७/१०९ | स्वमाधुर्ये सर्व चित्त ९/१२७ सूर्य येन उदय करि' १/२८० | सेइ शब्दे आमार गमन ५/९९ | 'स्वयं भगवान्' कृष्ण ९/१४१, ६/१४७, ९/१४७ सेइ अर्थ मुख्य, -व्याससूत्रे ६/१३३ | सेइ सती-प्रेमवती १३/१५३ | स्वरूप कहे, -याते जानिल १/७२ सेइ कृष्णे' गोपिकार नहे ९/१४९ | सेइसब आचार्य हञा ७/१०७ | स्वरूपेर इन्द्रिये प्रभुर १३/१६४ सेइ गोपीभावामृते याँर ८/२१९ | सेइ सब तत्त्ववस्तु हैल ८/११६ | स्वाद जानि' तैछे क्षीर ४/१२० सेइ छले निस्तारये सांसारिक १०/११ | सेइ सब तीर्थ स्पर्शि' ९/४ | स्वाभाविक तिन शक्ति ६/१५३ सेइ छले सेइ देशेर ९/४ | सेइ सब दयालु मोरे १२/८ | सेइ छिद्र अद्यापिह आछये ५/१३० | सेइ सब रसामृतेर 'विषय' ८/१४० | ह सेइ जन पाय व्रजे ८/२२० | सेइ साध्य पाइते आर ८/२०४ | हरिदास कहे, - आमि ११/१६५ । 581
[ हरि-ह्लादिनीर श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत हरिदास ठाकुर, श्रीरूप 1/63 | हासिञा गोपालदेव तथाय 5/106 | हेन-जीवे ईश्वर-सह 6/162 हरिदास' बलि' प्रभु डाके 12/160 | हृदये प्रेरण कर, जिह्वाय 8/122 | हेन तोमार सङ्गे मोर 12/195 हरिबोल' बलि' काङ्गाल 14/46 | हेनकाले गोविन्देर हैल 10/131 | हेन-भगवाने तुमि कह 6/152 हरिबोल' बलि' तारे 14/45 | हेनकाले गौड़ीय एक 12/122 | हेन-मोरे स्पर्श' तुमि 7/145 हरिभक्तिविलास, आर 1/35 | हेनकाले दोलाय चड़ि' 8/14 | हेन शक्ति नाहि मान 6/161 हस्ते ताँरे स्पर्श कहे 13/93 | हेनकाले महाकाय एक 9/54 | हेन-सङ्ग विधि मोर 7/47 हरि' हरि' प्रभुमते करेन 9/45 | हेन-जीवे भेद' कर 6/163 | ह्लादिनीर सार अंश, तार 8/158 582 ।
शब्दकोश
अ अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके अच्युत—जो च्युत नहीं हो अज—अजन्मा अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली स्तनके जैसी चीज अज्ञ—ज्ञानरहित अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक, जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म हो जाता है अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका उल्लङ्घन अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लङ्घन किया हुआ अतिशय—अत्यधिक अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर कहना अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य अत्युत्तम—अति उत्तम अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात अधिदैव—आराध्य देवता अधिरूढ़—बढ़ा हुआ अधिष्ठान—आधार, आश्रय अनभिज्ञ—न जाननेवाला अनवरत—निरन्तर अनायास—बिना कष्टके अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य
अनुक्षण—निरन्तर अनुगत—अनुगामी, अधीन अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना अन्तर्भूत—अन्तर्गत अन्त्य—अन्तका, आखिरी अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध, मेल अन्वेषण—खोज, ढूँढना अपकार—अहित अपटुता—अकुशलता अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो अपरिमित—अगणित, अनगिनत अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा अप्राकट्य—अप्रकट होना अप्राकृत—अलौकिक अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न भोगा जा रहा हो अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध, प्रसङ्गके विरुद्ध अबाध—बाधारहित अभयत्व—अभयता अभिज्ञ—जाननेवाला अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली शब्द शक्ति अभिधान—शब्दकोष अभिधेय—अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय
। 583
[ अभिप्राय-ईशिता श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना अभिव्यक्ति-प्रकट करना अभिसन्धि-जोड़, समझौता अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना अभिहित-कहा हुआ अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया अभ्युदय-उदय अमित-अत्यधिक अरण्य-वन अवगत-जाना हुआ अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना, निश्चय करना अवयव-अङ्ग, अंश अवरुद्ध-रुका हुआ अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना अवलोकन-देखना अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष अवस्थान-रहना, अवस्थिति अविचिन्त्य-अचिन्त्य अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट अव्यय-अविकारी अव्याकृत-अव्यक्त अशेष-सम्पूर्ण अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ असङ्ग-आसक्तिहीन असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित असङ्गति-मेलका ना होना असंस्कृत-संस्कारहीन असमोध्र्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर कोई नहीं हो असार-सारहीन असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना आ आख्यायिका-कहानी आच्छन्न-ढका हुआ आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी आत्मसात्-अपने अधिकारमें आत्यन्तिक-असीम आदित्य-सूर्य आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान रखना आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी आपाततः-अचानक, अन्तमें आप्त-पूर्ण, कुशल आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश आयुध-अस्त्र आरूढ़-आसीन आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा आर्ष-ऋषियोंका आलोचना-गुण-दोष निरूपण आलोच्य-आलोचना योग्य आह्लादित-आनन्दित इ इति-इस प्रकार, समाप्ति इहलोक-यह लोक ई ईक्षण-दृष्टिपात ईशिता-ईश्वरत्व 584 |
शब्दकोश उच्छिष्ट-छन्दविद्या ] उ उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ उद्यत—तैयार उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास उपशम—विराग, विरक्ति उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग उपार्जित—कमाया हुआ उपादान—साधन-सामग्री उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव उरु—विस्तृत, महान उरुक्रम—विष्णु उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका स्तुतिगान किया गया हो ए एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे, एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो ऐ ऐहिक—सांसारिक औ औत्सुक्य—उत्सुकता औद्धत्य—उद्धतता, अखड़पन औपाधिक—उपाधियुक्त क कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया जानेवाला कर्म कैतव—छल, धोखा केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति कैङ्कर्य—दासत्व कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति कौतूहलवश—उत्सुकतावश क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत क्लान्त—थका हुआ, क्षीण क्ष क्षिति—पृथ्वी क्षेत्र—शरीर क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा परमात्मा क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता ग ग्रथित—गूँथा हुआ ग्रन्थि—गाँठ ग्रास—आहार ग्रीवा—गर्दन घ घ्राण—गन्ध, सूँघनेकी शक्ति च चित्तगुहा—हृदयरूपी कन्दरा चित्-शक्ति—भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति चिदालोचना—चित्-वस्तुकी आलोचना चिन्तामल—चिन्तारूपी मल चिन्मयत्व—चिन्मयता चैतन्यत्व—चेतनता चैतन्यनिष्ठ—चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है चैतन्यहीन—चेतनारहित छ छन्दविद्या—अठारह विद्याओंमें एक | 585
[ जर्जरित-नैतिक श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत ज जर्जरित-जो जर्जर हो गया हो त तत्त्वज्ञान-तत्त्ववस्तुका ज्ञान तत्त्वतः-यथार्थतः तत्त्वविद्-तत्त्वको जाननेवाला तदीय-भगवत्-सम्बन्धी तनय-पुत्र तन्मय-तल्लीन तादात्म्य-दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न होनेका स्वभाव तारतम्य-दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका भाव तिर्यग्-पशु-पक्षी तैलधारावत्-तैलकी भाँति धारावाला त्रिगुणातीत-तीनों गुणोंसे अतीत त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम द दिक्पाल-दश दिशाओंके रक्षक देवता दुर्ज्ञेय, दुर्बोध-कठिनाईसे जानने योग्य दुर्निगृहीत-कठिनाईसे वशमें लाया हुआ दुर्निवारित-कठिनाईसे निवारण किया हुआ दुरूह-कठिन दुस्त्याज्य-नहीं त्यागने योग्य देदीप्यमान-चकमता-दमकता हुआ देहाध्यास-देहमें मिथ्या अभिमान द्रव्यमययज्ञ-द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ द्विजवर-ब्राह्मणश्रेष्ठ द्वैतभाव-दो होनेका भाव ध धूसरित-धूलसे भरा हुआ ध्वनित होना-पता चलना न नराकृति-मनुष्यके समान आकृति नामाभास-नामका आभास निःशक्तिक-शक्तिरहित निःश्वास-प्राणवायु या साँसका बाहर निकलना निःसृत-निकला हुआ निकृष्ट-तुच्छ निकेतन-घर निक्षेप करना-फेंकना निगृहीत-निग्रह किया हुआ निग्रह-संयम निन्तान्त-अत्यन्त, एकदम निमज्जित-डूबा हुआ, स्नात नियमाग्रह-नियम-पालनमें आलस्य निरञ्जन-निर्दोष, अज्ञानसे रहित निरपेक्ष-किसी औरकी अपेक्षा नहीं निर्गत-बाहर निकला हुआ निर्गुण-सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत निर्दिष्ट-निर्देशित निर्वाण-मोक्ष निर्विकल्प-विकल्पसे रहित निर्विवाद-बिना विवादका निरुद्ध-विशेषरूपसे रोका हुआ निरूपक-निरूपण करनेवाला निरूपण-किसी विषयको ठीक-ठीक समझा देना निशा-रात्रि निष्काम कर्म-कामनासे रहित कर्म निष्पन्न-जिसकी उत्पत्ति हुई है निसर्गवाद-प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद) निस्तारक-निस्तार करनेवाला निस्त्रैगुण्य-तीनों गुणोंसे अतीत निहत-मारा हुआ नीलमणि-नीलम नैतिक-नीति-सम्बन्धी 586 |
शब्दकोश नैमित्तिक-प्राकृत ] नैमित्तिक-निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य-निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य-निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर-दूसरी ओर पन्था-पथ परिज्ञात-अच्छे प्रकारसे ज्ञात परनिष्ठित-दूसरेमें निष्ठावाला परदार-दूसरेकी स्त्री परवर्ती-बादमें पराक्रान्त-शक्तिशाली परिग्रह-ग्रहण पराभक्ति-श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत-पराजित परिचर्या-सेवा परिचालक-चलानेवाला परिदृष्ट-दृष्ट परिनिष्ठित-पूर्णतया निपुण परिमित-सीमित परिलक्षित-अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक-संन्यासी परिवेष्टित-घिरा हुआ पर्यन्त-तक पर्यवसित-समाप्त पाण्डित्य-विद्वता पारत्रिक-परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक-परलोक-सम्बन्धी पार्षद-परिकर पाषण्डी-पाखण्डी पूर्वपक्ष-संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग-मिलनसे पहलेका राग प्रकरण-निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत-यथार्थ प्रकृष्ट-उत्तम प्रक्षिप्त-बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ प्रच्छन्न-ढका हुआ प्रजल्प-इधर-उधरकी बात प्रज्ञा-बुद्धि प्रणयन-रचना, निर्माण प्रणत-शरणागत प्रणतपाल-शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति-प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित-सताया गया प्रतिपादित-प्रमाणित प्रतिपाद्य-जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात-प्रभायुक्त, ज्ञात प्रतीयमान-जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा-जीवात्मा प्रत्यवाय-दोष प्रत्याहार-निरोध, रोकना प्रत्युपकार-भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त-दिया हुआ प्रधान-मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः-मुख्यरूपसे प्रपत्ति-शरणागति प्रभूत-अत्यधिक प्रभृति-जैसा प्रयोजनीयता-आवश्यकता प्रयोजक-प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व-प्रयोजक होनेका भाव प्रवर-श्रेष्ठ प्रवर्त्तक-किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति-मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त-प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा-शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक-शान्त करनेवाला प्राकृत-प्रकृति-सम्बन्धी । 587
[ प्राक्तन–विक्षिप्त श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
प्राक्तन–प्राचीन प्रादुर्भूत–आविर्भूत, अवतरित प्रादेशिक वाक्य–प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य प्रापक–प्राप्त करने या करानेवाला प्रापञ्चिक–जगत् या प्रपञ्च–सम्बन्धी प्राप्य–प्राप्त होने योग्य प्रार्थित–प्रार्थना किया हुआ प्रेमास्पद–प्रेमका स्थल प्रेमोत्कर्ष–प्रेमका उत्कर्ष
ब बाहुल्य–अधिकता बाह्य अङ्ग–बाहरी अङ्ग बिद्ध–छेदा हुआ, आहत बृहत्–बड़ा बोधगम्य–समझमें आने योग्य ब्रह्मलय–ब्रह्ममें लय होना ब्रह्मवेत्ता–ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मानन्द–ब्रह्मका आनन्द ब्रह्मानुभूति–ब्रह्मकी अनुभूति
भ भक्तानन्दायिनी–भक्तोंको आनन्द देनेवाली भोक्तृत्वभाव–भोक्ता होनेका भाव
म मत्सम्बन्धी–मेरे सम्बन्धी मत्सरता–डाह, जलन, द्वेष मथन–मथनेका भाव मधुरिमा–माधुर्य मन्वन्तर–ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग मन्तव्य–विचार, मत ममार्थ–सार महत्–बड़ा मायाच्छन्न–मायाके द्वारा आच्छन्न मुकुलित–आधा विकसित मुमुक्षु–मुक्तिकी इच्छा करनेवाला
मेधायुक्त–मेधावी मोहान्ध–मोहसे अन्धा म्लेच्छ–चारो वर्णोंसे भी नीच
य यतिगण–संन्यासी लोग याग–यज्ञ यादृच्छिक–स्वतन्त्र, ऐच्छिक युक्तियुक्त–उचित, युक्तिपूर्ण युगपत्–एक ही समयमें, साथ-साथ युगावतार–प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार योगमाया–भगवान्की परा शक्ति योगस्थैर्य–योगकी स्थिरता
र रक्तिम–लालिमायुक्त रञ्जित–रंगा हुआ रूक्ष–रूखा, नीरस
ल लिङ्गशरीर–सूक्ष्म शरीर लिप्सा–किसी वस्तुको पानेकी इच्छा लुब्ध–ललचाया हुआ, लोभित लोकपाल–लोकका पालन करनेवाला लोकप्रवर्त्तन–लोगोंके कल्याणके लिये
व वञ्चक–वञ्चना करनेवाला वयस–उम्र वर्चस्व–अधिकार वर्णविशिष्ट–वर्णवाला वर्णसङ्कर–भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न वाक्–वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय वाचाल–अधिक बोलनेवाला वागिन्द्रिय–जिह्वा विक्षिप्त–पागल, उद्विग्न
588 |
शब्दकोश विगुण-सारगर्भित ] विगुण—गुणहीन विच्युति—भूल, पतन, वियोग विजितात्मा—जिसने मनको जीत लिया है विज्ञ—पण्डित, जाननेवाला विदित—मालूम विधर्म—धर्मविरुद्ध विधिवादिगण—नैतिक लोग विधेय—करने योग्य विधेयात्मा—जिसकी आत्मा संयत हो विन्यास—व्यवस्थित करना विपर्यय—प्रतिकूलता, विपरीतता विभूति—ऐश्वर्य विरहकातर—विरहसे कातर विरोधाभास—विचारमें विरोध प्रतीत होना विलास—क्रीड़ा विवक्षित—इच्छित, कथित विवृत—स्पष्ट, व्यक्त विशारद—निपुण विशिष्ट—विशेषतायुक्त विशिष्टता—विशेषता विशुद्धचित्त—जिसका चित्त शुद्ध है विशेषत्त्व—विशेषता विषयणी—विषयसे सम्बन्धित विहित—आदेश किया हुआ वृष्टि—वर्षा वेदज्ञ—वेदोंके जाननेवाला वैषम्य—विषमता व्यङ्गोक्ति—गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो व्यतिक्रम—उल्लङ्घन व्यतिरेक—असङ्गति, निषेध व्यवहृत—व्यवहार किया हुआ व्योम—आकाश श शोच्य—शोचनीय शैव—शिवके उपासक श्रुत—सुना हुआ श्रोतव्य—सुनने योग्य श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात ष षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण स सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव संवरण—छिपाना संवेदन—अनुभूति संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श संहर्त्ता—संहार करनेवाला सङ्गति—मेल सञ्चित—जमा किया हुआ सदातन—विष्णु सद्विवेकी—सद् विवेकवाला समत्वभाव—समताका भाव सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र समाहर—समुच्चय, समूह समाहित—संयमित, व्यवस्थित सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला सम्मत—सहमत, एक मत समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता सहस्र—हजार साम—सामवेद सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान् साम्यलक्षण—समानताका लक्षण सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण । 589
[ सालोक्य-हृदगत श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्के साथ एक ही लोकमें वास करना साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, वचन और मन) सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला सुदुराचारी—अति दुराचारी सुधा—अमृत सुरस—रसयुक्त सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट सौम्य—सुन्दर, कोमल स्खलित—गिरा हुआ स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा स्फुरण—व्यक्त होना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी स्थायित्व—स्थिरता स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी स्वच्छन्द—स्वतन्त्र स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण ह हत—मरा हुआ हतभागा—भाग्यहीन हन्त—मारना हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा हेयता—तुच्छता हृदगत—हृदय-सम्बन्धी 590 ।
॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [द्वितीय भाग (अध्याय 15-25)] गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्मामाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी कृत 'अमृतानुकणा', विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स
मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य, अमृताणुकणा और अमृताणुकणिका सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण– श्रीगौर–पूर्णिमा , 9 मार्च, 2020 1000 प्रतियाँ ग्रन्थ प्राप्ति स्थान ★ श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ B-3, म्यूजिकल फॉऊन्टेन पार्कके निकट, जनकपुरी, नई दिल्ली ✆ 9810192540, 8285211049 ★ श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) ✆ 0565-2502334 ★ श्रीरूप–सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ 9456828001 ★ श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) ✆ 0565-2815668 ★ श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.) ✆ 9153125442 ★ श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 162, सैक्टर–16 A, फरीदाबाद (हरियाणा) ✆ 9911283869 ★ जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) ✆ 9776238328 ★ श्रीविनोदबिहारी गौड़ीय मठ Q-29, सैक्टर–12, नोएडा, (उ.प्र.) ✆ 9650824442 ★ श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ D-5, सैक्टर–55, नोएडा, (उ.प्र.) ✆ 9910400878 ★ खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाजार, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ 0565-2443101
विषय-सूची उद्धृत ग्रन्थ ................................................................... i-iii अध्याय विवरण .............................................................. iv-v 15 सार्वभौमके घरमें भोजन-विलास .................................... 1-47 16 पुनःगौड़गमन-विलास .............................................. 49-90 17 श्रीवृन्दावन-गमन .................................................... 93-127 18 श्रीवृन्दावन-दर्शन-विलास ........................................... 129-169 19 प्रयागमें श्रीरूपपर अनुग्रह ........................................... 171-219 20 स्वरूपतत्तत्वरूप-श्रीभगवत्स्वरूप-भेदविचार .................... 221-289 21 सम्बन्धतत्त्व-विचारसे श्रीकृष्ण-ऐश्वर्य-माधुर्य-वर्णन ... 291-324 22 अभिधेयभक्तितत्त्व-विचार ............................................ 327-375 23 प्रेमप्रयोजन-विचार ................................................. 377-407 24 'आत्मारामश्च'-श्लोक-व्याख्यासे श्रीसनातनपर अनुग्रह 409-474 25 काशीवासियोंका वैष्णवकरण और पुनः नीलाचल-गमन 477-519 श्लोक सूची ................................................................. 521-528 पद्य सूची ................................................................. 529-545 शब्दकोष ................................................................. 547-554
साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसंः — ब्रह्मसंहिता बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः — हरिभक्तिविलास
निवेदन हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजजीकी अपार कृपासे गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं सहित हिन्दी भाषामें श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतकी दो भागोंमें आदिलीला एवं मध्यलीला प्रथम भाग प्रकाशित करनेके पश्चात् अब 'मध्यलीला द्वितीय भाग' का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ है। यह कार्य उनकी आज्ञा एवं उनके द्वारा प्रदत्त शक्तिसे ही सम्पादित हुआ है। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा, अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। "मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता", श्रील कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा सरल होनेपर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है। उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतका 'मध्यलीला द्वितीय भाग' भी अब प्रकाशित हो गया है और श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं। इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे। प्रकाशन मण्डली इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP)
प्रकाशन-मण्डली अनुवाद, विन्यास एवं सम्पादन (Translation, Layout & Editing) :- श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास शोधकार्य (Research) :- श्रीमती जानकी दासी / श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास टङ्कण (Typing) :- श्रीमती ऐश्वर्य दासी / श्रीमती प्रज्ञा दासी संस्कृत-हिन्दी अनुवाद :- श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०) प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) :- श्रीमती राधा नूपुर दासी / सुश्री मञ्जुलता दासी मुखपृष्ठ चित्र :- श्रीमान् अनुज प्रकाशक :- श्रीपाद रामचन्द्र दास इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स