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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (द्वितीय भाग)

उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका

अमरकोश—24/305; इतिहास-समुच्चय—19/50; 20/58; उज्ज्वलनीलमणि—23/82-86; एकादशी-तत्त्व—17/186; 25/56; कात्यान-संहिता—22/88; कृष्णकर्णामृत—21/136; 23/29, 32; गरुड़पुराण—25/137, 138, 139; गोविन्दलीलामृत—17/210, 212, 214, 216; 18/12; 19/54; गोस्वामीपादोक्त श्लोक—21/45; 22/89; 24/179; चैतन्यचन्द्रोदय नाटक—19/119, 120, 121; 24/344, 345, 346; नारदपञ्चरात्र—19/170; 23/8; पद्मपुराण—17/133, 136; 18/8; 19/219; 20/145; 21/50, 51, 88; 22/109; 23/26; 25/78; पद्यावली—15/110; 19/96, 98, 106; 22/131; पाणिनि—24/26, 293, 295; प्राचीनकृत श्लोक—24/315; बृहत्-गौतमीय-तन्त्र—23/64; ब्रह्मसंहिता—15/170; 20/154, 160, 258, 281, 304, 310, 316; 21/35, 41, 49; भक्तिरसामृतसिन्धु—18/38; 19/134, 167, 170, 176, 186, 211; 20/106, 378, 397, 398, 399; 22/16, 102, 109, 126, 127, 128, 131, 142, 145, 149, 150, 153, 155, 158; 23/5, 7, 14, 15, 18, 19, 23, 26, 30, 33, 36, 63, 64, 66-80, 89-92, 94; 24/37, 116, 121, 124, 129, 165, 167, 176, 190, 269, 274; भगवत्सन्दर्भ—18/114; 24/108, 139, 304; 25/149; भगवद्गीता—17/18, 19/199; 20/116, 121, 163, 373, 374; 22/23, 57, 58, 91; 23/100-107; 24/90, 128, 134, 154, 155, 168, 187; 25/38, 39, 148; भागवत—15/180, 237, 270; 16/145, 186; 17/36, 39, 138, 140, 142; 18/34, 35, 125; 19/72, 142, 143, 150, 171-174, 197, 201, 203-209, 212, 215; 20/57, 59, 119, 137, 138, 147, 148, 151, 156, 158, 170, 173, 249, 262, 266, 267, 270, 274, 275, 299, 306, 312, 313, 318, 331, 335, 336, 340, 342, 343, 345, 353, 357; 21/9, 11, 13, 15, 27, 33, 37, 83, 100, 112, 123, 124; 22/19, 20, 27, 28, 30, 32, 36, 40, 44, 46, 48, 50, 52, 53, 55, 61, 63, 69, 70, 71, 73, 78, 79, 81, 82, 83, 85, 86, 87, 93, 95, 100, 107, 108, 132-134, 136, 139, 141, 157; 23/16, 21, 24, 37, 61, 108; 24/5, 21, 45, 46, 48, 49, 51, 52, 55, 58, 71, 73, 78, 83, 84, 86, 94, 96, 99, 111, 113, 119, 127, 131, 133, 136, 137, 138, 151, 152, 161, 164, 171, 172-174, 178, 185, 192, 194, 195, 202-205, 209, 211, 213, 316, 317; 25/31, 32, 36, 37, 74, 75, 81-83, 99, 103, 107, 111, 117, 121, 124, 126-128, 130, 132, 134, 135, 141, 142, 144, 145, 150-152; भावार्थदीपिका—17/80; 18/114; 24/69, 75; 25/138; महाभारत—15/269; 17/186; 25/56; मुनिवाक्य—22/6; रामायण (वाल्मिकी-कृत)—22/34; रूपगोस्वामीकृत श्लोक—19/53; 23/27, 74-80, 82-86; लघुभागवतामृत—20/242, 251, 371; 21/50, 51, 88; ललितमाधव—19/165; 20/181, 182; विश्वप्रकाश—24/12, 18, 64, 65, 146; विष्णुधर्मोत्तर—17/133; विष्णुपुराण—20/110, 112-115, 344; 24/68, 304; विष्णुस्वामिवाक्य—18/114; वैष्णवतन्त्र—18/116; 22/97, 98; सर्वज्ञसूक्तवाक्य—18/114; सात्वत-तन्त्र—20/251; स्कन्दपुराण—22/142; 24/274; स्मृतिवचन—15/265; हरिभक्तिविलास—18/116; 19/50, 229; 22/34, 88, 97, 98; 23/8; 25/137; हरिभक्तिसुधोदय—19/75; 20/61; 22/42; 23/23; 24/215। i

अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका ईशोपनिषद्—25/99; उद्भटचन्द्रिका—20/3; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक—16/205-210; चैतन्यचरितकाव्य—16/205-210; चैतन्यभागवत—16/55-56, 81, 205, 210, 212; चैतन्यमङ्गल—16/205-210; पद्यावली—19/92; प्रेमदासका भाष्य—16/205-210; भक्तिरसामृतसिन्धु—22/111-125; भागवत—15/265, 19/142, 24/28; भागवतामृत—20/165; सात्वत तन्त्र और शैवतन्त्र—20/173; हरिभक्तिसुधोदय—22/21 । अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका आग्नेय पुराण—15/9; उपदेशामृत (रूपगोस्वामीकृत)—15/106, 111, 16/74, 19/102, 157; ऋग्वेद—23/110, 24/21; कर्णामृत—22/21; काशीखण्ड—17/82; कृष्णगणोद्देशदीपिका—15/241; कृष्ण-सन्दर्भ—23/111, 112; गरुड़-पुराण—15/274; गोपालतापनी-उपनिषद्—8/137; गीता—24/326; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (टिप्पनी)—16/207; चैतन्यभागवत—16/207, 208; 5/140; चैतन्यमङ्गल (श्रीलोचनदास)—16/207; तत्त्व-सागर—24/326; दुर्गम-सङ्गमनी—17/95; नीलकण्ठ टीका—23/110; न्यासादेश विवरण—18/47; पद्मपुराण—15/167-169; 18/116; 20/242; 24/326; पद्यावली—17/145; प्रेमदास—16/207; ब्रह्मसंहिता—20/272-273; ब्रह्मसूत्र-भाष्य—18/47; 8/266, 308-310; भक्तिरत्नाकर—18/26, 38, 47, 49-52, 57-64, 66-68, 70-72; भक्तिरसामृतसिन्धु—15/108; 16/74, 238; 17/95; 19/177-178, 180, 183-185, 187-188; 22/65-67; 23/42-44, 46, 48, 52; भक्तिसन्दर्भ—15/107, 108, 261; 16/74; 18/115; 22/98; भागवत—15/106, 107, 261-262, 264, 274-277; 16/74, 280-281; 17/14-15, 55-56, 95, 186; 18/115; 19/17, 151, 189; 20/63, 127, 245, 248, 278, 332-333; 21/11, 19; 22/31-32, 37-39, 69, 98; 23/111-112; 24/166, 172, 326; 25/131-132; भावार्थ-दीपिका—24/326; मथुराखण्ड—18/38; मथुरा-माहात्म्य—18/58-62; मनुसंहिता—16/150, 20/59; 23/111-112; महाभारत—16/150; 20/59; 23/111-112; महाभारत-टीका (नीलकण्ठ)—23/1110; 24/326; मुक्ताफलटीका—20/59; मुण्डकोपनिषद्—19/17, 139; रागवर्त्म-चन्द्रिका—20/393-395; लघुभागवतामृत—20/165, 184; 21/33, 59-89; 23/111-112; लघुभागवतामृत-टीका (बलदेव)—23/111-112; वराह-पुराण—18/55; विद्वन्मण्डल—18/47; विष्णुपुराण—23/111-112; वैष्णव-मञ्जूषा—18/49; शिक्षाष्टक—16/74; शृङ्गाररसमण्डल—18/47; श्वेताश्वतरोपनिषद्—22/126; श्रुति—22/126; 24/314; सर्वसम्वादिनी—23/111-112; सांख्यकारिका—20/278; सिद्धान्त-शिरोमणि—20/218; 21/84; सिद्धार्थ-संहिता—20/224-236; सुबोधिनी-टिप्पणी—18/47; सूर्यसिद्धान्त—21/84; स्कन्दपुराण—15/261; स्तवावली—18/26, 38, 66; स्मृति—22/126; 24/364; हयशीर्ष-पञ्चरात्र—20/238, 239; हरिवंश—23/110; हरिभक्तिविलास—15/108, 261; 20/202; 24/324, 330-332, 337 । ii ।

अमृतानुकणामें उद्धत ग्रन्थादि-तालिका कृष्ण-सन्दर्भ—23/112-113; गीता—15/48; 22/90, 152-153, 23/112-113; छान्दोग्योपनिषद्—20/127-128; दशमूल—22/80; पद्मपुराण—21/125; बृहन्नारदीयपुराण—22/80; ब्रह्मपुराण—23/112-113; ब्रह्माण्डपुराण—21/33; भक्तिरसामृतसिन्धु—22/80, 22/148-149, 152-153; भागवत—21/33, 22/84, 152-153, 23/112-113; मन्त्रार्थ-दीपिका—21/125; रागवर्त्म-चन्द्रिका—22/148-149; वर्णागम-भास्वत्—21/125; विष्णुपुराण—23/112-113; श्रीचैतन्यशिक्षामृत—22/103-104, 152-153; श्रीलघुभागवतामृत—21/33; 23/112-113; स्कन्दपुराण—23/112-113।

अमृतानुकणिकामें उद्धत ग्रन्थादि-तालिका कूर्मपुराण—15/136; गीता—20/118; बृहद्भागवतामृत—18/34; भागवत—18/34; 19/157; 22/107; विष्णुपुराण—25/191-193; शिक्षाष्टक—19/157; श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम्—21/112; श्रीहरिभक्तिविलास—15/236।

iii

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (द्वितीय भाग) अध्याय-विवरण पन्द्रहवाँ अध्याय— 1-47 महाप्रभुकी गोप और हनुमानके वेशमें लीला, श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ एकान्तमें परामर्श, श्रीवासके द्वारा नवद्वीपमें माताको सांत्वना-वाक्य भेजना, राघव पण्डित, खण्डवासी मुकुन्द और रघुनन्दन, मुरारी गुप्त, वाचस्पति आदि भक्तोंके गुणोंकी व्याख्या करके प्रत्येकको सेवा निर्देश करके विदायी देना। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नोंके उत्तरमें सभी साधकोंके नित्य कर्त्तव्योंका उपदेश देना, वासुदेवके अपूर्व जीवोंपर दया-सूचक वाक्यकी आलोचना, सार्वभौमके घरमें भिक्षा और भट्टके दामाद अमोघका उद्धार। सोलहवाँ अध्याय— 49-90 अगले वर्ष गौड़देशसे वैष्णव-गृहिणियोंका भक्तोंके साथ महाप्रभुके लिये नैवेद्य एकत्रित करके पुरीमें आगमन और चातुर्मासके अन्तमें गौड़देशमें लौट जाना। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नके उत्तरमें वैष्णवोंके अधिकार-तारतम्यका निर्देश, विद्यानिधिका श्रीक्षेत्रमें ‘ओड़नषष्ठी’-दर्शन, विजयदशमीके दिन महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्रा, महाप्रभुके साथमें गदाधरकी जानेकी इच्छा और उनका महाप्रभुके प्रति अनुपम प्रेम, गदाधरको विदायी देकर जलपथसे पानिहाटी, कुमारहट्ट और विद्यानगरसे होते हुए कुलियामें आगमन और अनेक अपराधियोंके अपराधोंका मोचन, रामकेलिमें रूप-सनातनके साथ साक्षात्कार, सनातनके इङ्गितानुसार कनाई-नाटशालासे पुरीकी ओर वापस लौटना, उसके द्वारा नृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके ध्यानके आवेशमें उच्चारित भविष्यवाणीकी सफलताका विधान, पथमें शान्तिपुरमें आकर रघुनाथको उपदेश देना और अन्तमें पुरीमें वापस लौटना। सत्रहवाँ अध्याय— 93-127 बलभद्र ब्राह्मणके साथ वृन्दावन-यात्रा, झारिखण्ड मार्गसे काशीमें आगमन, तपनमिश्रके घरमें अवस्थान, कृष्णनामापराधी मायावादियोंकी निन्दा, मथुरा जाकर माधवेन्द्रपुरीके शिष्य सनोड़िया ब्राह्मणको वैष्णव जानकर जातिबुद्धि न करके उसके घरमें भोजन, वृन्दावनमें स्थित द्वादश-वनोंमें भ्रमण और कृष्णप्रेमविकार। अठारहवाँ अध्याय— 129-169 वृन्दावनमें सभी कृष्णलीला-स्थानोंका दर्शन, बलभद्रके कालिय हृदमें मछुआरे कृष्णवर्ण नाविकको ‘कृष्ण’-भ्रमरूप विवर्त्त दूर करना, उस देशके वासियोंको जीव और कृष्णके स्वरूपका वर्णन, मथुरासे वापस लौटते हुये मार्गमें बिजली-खाँ और उसके सङ्गियोंका उद्धार करना, मुसलमानशास्त्रसे कृष्णभक्ति-संस्थापन, त्रिवेणीमें आगमन। उन्नीसवाँ अध्याय— 171-219 श्रीरूपका अपने देशमें अपने घरमें आगमन, राजकार्यको त्याग करनेके कारण सनातनको कारावास, अनुजके साथमें श्रीरूपका गृहत्याग और प्रयागमें महाप्रभुके साथ मिलन, वल्लभाचार्यको महाप्रभुके द्वारा दोनों भाइयोंका परिचय देना, महाप्रभु और रघुपति उपाध्यायका वार्तालाप, दशाश्वमेध-घाटपर श्रीरूपको कृष्णभक्तिरसतत्त्वकी शिक्षा प्रदान करना और वृन्दावनमें iv ।

भेजना तथा बादमें पुरीमें आकर पुनः मिलनेका आदेश देकर महाप्रभुका काशीमें आगमन।

बीसवाँ अध्याय— 221-289 सनातनका कारागारसे छूटकर निकल जाना, काशीमें गमन और चन्द्रशेखरके घरमें महाप्रभुसे मिलन, श्रीसनातन शिक्षा—(1) 'सम्बन्ध ज्ञान'—(क) जीवके और भगवान्के स्वरूपका वर्णन।

इक्कीसवाँ अध्याय— 291-324 (ख) कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन।

बाइसवाँ अध्याय— 327-375 (2) वैध और रागानुग-भेदसे 'अभिधेय'-साधन- भक्तिका वर्णन।

तेइसवाँ अध्याय— 377-407 (3) 'प्रयोजन'-प्रेम-तत्त्व-वर्णन।

चौबीसवाँ अध्याय— 409-474 “आत्मारामश्च”-श्लोककी 61 प्रकारकी व्याख्या, श्रीमद्भागवतके माहात्म्यका कीर्तन, वैष्णव-स्मृति हरिभक्तिविलासका मूल सूत्र-वर्णन।।

पचीसवाँ अध्याय— 477-519 प्रमुख-प्रकाशानन्द और काशीवासियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा, भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उनका उद्धार (आदिलीला सातवाँ अध्याय देखें), एकत्रित हुए समस्त कुतार्किकोंके कुतर्कोंका खण्डन, सभीके द्वारा महाप्रभुको साक्षात् नारायण मानना, प्रकाशानन्दके एक शिष्यके द्वारा महाप्रभुके प्रचारित मतकी अर्थात् श्रुतियोंकी अवरोहपन्यासे और सविशेष- ब्रह्मतत्पर्य एवं शक्तिपरिणामवादकी प्रशंसा तथा निर्विशेष-ब्रह्मपरता विवर्त्तवाद या आरोहवादपन्थाकी निन्दा, प्रकाशानन्दके द्वारा उस वाक्यका समर्थन, अन्य दार्शनिक मतवादोंका खण्डन, महाप्रभुका दर्शन, महाप्रभुके द्वारा पाषण्ड-संज्ञाका निर्देश, प्रकाशानन्दको उनकी प्रार्थनापर महाप्रभुके द्वारा चतुःश्लोकीकी व्याख्या, उसके बाद “आत्मारामश्च” श्लोककी 61 प्रकारकी व्याख्या, काशीवासियोंका उद्धार-साधन, सनातनको वृन्दावनमें भेजना, सुबुद्धिरायको निरन्तर कृष्णनाम- ग्रहण-व्यवस्था प्रदान, पुरीमें पुनः लौटकर आना और भक्तोंके साथ मिलन।

| v

vi ।

पन्द्रहवाँ अध्याय कथासार—रथयात्राके पूर्ण होनेपर श्रीअद्वैतप्रभुने महाप्रभुकी पुष्प-तुलसी देकर पूजा की, महाप्रभुने भी पूजापात्रमें बचे हुए पुष्प-तुलसी देकर श्रीअद्वैताचार्यकी योऽसि सोऽसिं-मन्त्रसे पूजा की। उसके बाद श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण करके भोजन करवाया। नन्दोत्सवके दिन महाप्रभुने अपने भक्तोंके सहित गोपवेश धारण करके आनन्दोत्सव मनाया। विजयादशमीके दिन लङ्का-विजयोत्सवमें महाप्रभुने अपने भक्तोंको वानर सेनाके वेशमें सजाकर स्वयं हनुमानके आवेशमें बहुत आनन्द प्रकाशित किया। उसके बाद अन्यान्य उत्सवोंको देखनेके बाद महाप्रभुने समागत भक्तोंको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी। महाप्रभुने श्रीरामदास, श्रीगदाधरदास आदि कुछ वैष्णवोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुको भी गौड़देशमें भेजा। बादमें बहुतसे दैन्यपूर्ण वचनोंके साथ (श्रीवासके हाथसे) अपनी माताके लिये प्रसाद-वस्त्र आदि भिजवाये। महाप्रभुने श्रीराघवपण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, कुलीन-ग्रामवासी भक्तों आदि सभी वैष्णवोंके अनेक गुणोंकी व्याख्या करके उन्हें विदायी दी। श्रीरामरामानन्द और श्रीसत्यराजके प्रश्नोंके उत्तरमें महाप्रभुने गृहस्थ-वैष्णवोंके लिये शुद्धनामपरायण वैष्णवोंकी सेवाका निर्देश दिया। तब महाप्रभुने खण्डवासी-वैष्णवोंके माहात्म्य (और सेवा-निर्देश), श्रीसार्वभौम और श्रीविद्या-वाचस्पतिको (दारु और जलब्रह्मकी सेवाका आदेश) और श्रीमुरारि-गुप्तकी श्रीरामके चरणकमलोंमें निष्ठाकी व्याख्या की। तत्पश्चात् श्रीवासुदेव दत्तकी सम्पूर्ण-वैष्णवोचित प्रार्थनाके अनुसार श्रीकृष्णके (अनायास) जगत्के उद्धारके सामर्थ्यका विचार किया। उसके बाद श्रीसार्वभौमके घरपर (महाप्रभुके द्वारा) भिक्षा ग्रहणके समय अमोघकी कुछ दुर्बुद्धि होनेपर अगले दिन प्रातःकालमें उसे हैजाका रोग हो गया। महाप्रभुने कृपा करके उसे रोगसे मुक्त कराके श्रीकृष्ण-नाममें रुचि प्रदान की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अपने निन्दक अमोघको आत्मसात्कारी श्रीगौरसुन्दर :— सार्वभौमगृहे भुञ्जन् स्वनिन्दकममोघकम्। अङ्गीकुर्वन् स्फुटां चक्रे गौरः स्वां भक्तवश्यताम्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमके घरमें भोजन करते समय अपने निन्दक अमोघ-भट्टाचार्यको अङ्गीकार करके श्रीगौरचन्द्रने स्पष्टरूपसे अपनी भक्तवश्यताको प्रकाश किया था॥१॥ अनुभाष्य— गौरः सार्वभौमगृहे (भट्टाचार्यभवने) भुञ्जन् (भिक्षां स्वीकुर्वन्) स्वनिन्दकं (निज-निन्दाकारिणम्) अमोघकं (तन्नामकं सार्वभौमदुहितृ-'षष्ठी'-पतिम्) अङ्गीकुर्वन् (निजदासगणमध्ये गणयन्) स्वां (निजां) भक्तवश्यतां (अनुगत-जनबाध्यतां) स्फुटां (व्यक्तीभूतां) चक्रे (कृतवान्)॥१॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'अमोघ'— श्रीसार्वभौमकी पुत्री 'षष्ठी'का पति॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय :— जय श्रीचैतन्यचरितामृत-श्रोतागण। चैतन्यचरितामृत—याँर प्राणधन॥३॥ । 1

[ 15/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीचैतन्य-चरितरूपी अमृत ही जिनका प्राणधन है, उन श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय हो॥3॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी पुरुषोत्तम-लीला :- एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। नीलाचले राहि' करे नृत्यगीत-रङ्गे ॥4॥ अनुवाद-इस प्रकार नीलाचलमें रहकर महाप्रभु भक्तोंके साथ नृत्य-गान करके आनन्दका आदान-प्रदान करते थे॥4॥ प्रथम-वत्सरे जगन्नाथ-दरशन। नृत्यगीत करे दण्ड, प्रणाम, स्तवन ॥5॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके बाद प्रथम वर्षकी कुछ लीलाओंका वर्णन करते हुए कह रहे हैं-) महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करते और उनके आगे नृत्य-गीत, दण्डवत्-प्रणाम और उनकी स्तुति करते ॥5॥ मध्याह्न भोगके बाद श्रीहरिदासके साथ साक्षात्कार :- 'उपलभोग' लागिले करे बाहिरे विजय। हरिदास मिलि' आइसे आपन-निलय ॥6॥ अनुवाद-'उपलभोग' लगनेके समय महाप्रभु मन्दिरसे बाहर चले आते। तब वे श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलकर अपने आवास-स्थानपर आ जाते ॥6॥ अनुभाष्य-मध्याह्नकालमें भोगवर्धन-खण्डमें भोग अर्थात् उपल-भोग लगनेपर महाप्रभु श्रीमन्दिरसे बाहर चले आते। उससे पहले गरुड़-स्तम्भके पीछे खड़े होकर दण्डवत्-प्रणाम और स्तवादि करते थे। लौटते समय 'सिद्धबकुल'में श्रीहरिदास ठाकुरके साथ मिलकर अपने वासस्थान श्रीकाशीमिश्र-भवनमें आ जाते॥6॥ अपने वासस्थानमें बैठकर नामकीर्तन, श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- घरे बसि' करे प्रभु नाम-सङ्कीर्त्तन। अद्वैत आसिया करे प्रभुर पूजन ॥7॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने वास-स्थानमें बैठकर नाम-जप करते। एक दिन श्रीअद्वैताचार्यने वहाँ आकर महाप्रभुकी पूजा की॥7॥ सुगन्धि-सलिले देन पाद्य, आचमन। सर्वाङ्गे लेपये प्रभुर सुगन्धि चन्दन ॥8॥ गले माला देन, माथाय दिल तुलसी-मञ्जरी। जोड़-हाते स्तुति करे पदे नमस्करि' ॥9॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके चरण और मुख धोने (पाद्य और आचमन) के लिये सुगन्धित जल प्रदान करके महाप्रभुके समस्त अङ्गोंपर सुगन्धित चन्दनका लेपन किया। उन्होंने महाप्रभुके गलेमें माला पहनायी और उनके मस्तकपर तुलसी-मञ्जरी प्रदान की। तब उन्होंने हाथोंको जोड़कर महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम करते हुए उनकी स्तुति की॥8-9॥ अमृतानुकणिका-महाप्रभु यद्यपि स्वयं भगवान् हैं और उनके चरणोंमें तुलसी देनेसे कोई अपराध नहीं होता। परन्तु महाप्रभु उस समय भक्तरूपमें लीला कर रहे थे, इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने उनके मस्तकपर तुलसी-मञ्जरी प्रदान की ॥8-9॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतका प्रतिपूजन :- पूजा-पात्रे पुष्प-तुलसी शेष ये आछिल। सेइ सब लञा प्रभु आचार्ये पूजिल ॥10॥ 'योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते' एइ मन्त्र पड़े। मुखवाद्य करि' प्रभु हासाय आचार्ये ॥11॥ अनुवाद-पूजा-पात्रमें जो भी पुष्प और तुलसी-पत्र बच गये, महाप्रभुने उनके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी पूजा की। पूजा करते समय उन्होंने यह मन्त्र पढ़ा,-'आप जो हो, सो हो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।' तथा अपने मुखसे वाद्ययन्त्रकी भाँति कुछ ध्वनि की जिसे सुनकर श्रीअद्वैताचार्य हँसने लगे ॥10-11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'आप जो हो, सो हो, मैं 2 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/11-19 ] आपको ही नमस्कार करता हूँ,—यह मन्त्र पढ़कर आचार्यकी पूजा की॥ 11 ॥ अनुभाष्य—कोई यह पाठ बोलते हैं— “राधे कृष्ण रमे विष्णो सीते राम शिवे शिव। योऽसि सोऽसि नमो नित्यं योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते।” अर्थात् “आप चाहे राधा-कृष्ण या रमा-विष्णु या सीता-राम या शिवानी-शिव, जो हों, सो हों, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नित्य नमस्कार करता हूँ॥” 11 ॥ अमृतानुकणिका—उपरोक्त मन्त्र शिवमन्त्रका एक विशेष अंश है। श्रीअद्वैताचार्य सदाशिव हैं, इसलिये महाप्रभुने उनकी इस मन्त्रके द्वारा पूजा की ॥ 10-11 ॥ एइमत अन्योन्ये करेन नमस्कार। प्रभुरे निमन्त्रण करे आचार्य बार बार ॥ 12 ॥ आचार्यके वासस्थानपर महाप्रभुकी भिक्षा— श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णित :— आचार्येर निमन्त्रण—आश्चर्य-कथन। विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 13 ॥ एक-एक भक्तके घरमें सगण महाप्रभुको निमन्त्रण :— पुनरुक्ति हय ताहा, ना कैलुँ वर्णन। आर भक्तगण करे प्रभुरे निमन्त्रण ॥ 14 ॥ एक एक दिन एक एक भक्तगृहे महोत्सव। प्रभु-सङ्गे ताँहा भोजन करे भक्त सब ॥ 15 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्यने परस्पर एक-दूसरेको नमस्कार किया। उसके बाद श्रीअद्वैताचार्य बार-बार महाप्रभुको अपने वासस्थानपर भोजनके लिये निमन्त्रण करते। एक दिन श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण करनेकी घटना बहुत आश्चर्यजनक है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें इसका विस्तारसे वर्णन किया है। पुनरुक्ति दोष हो जायेगा, इसलिये मैं (ग्रन्थकार) उसका वर्णन नहीं कर रहा हूँ। इसी प्रकार अन्यान्य भक्त भी महाप्रभुको निमन्त्रण देते थे। एक-एक दिन एक-एक भक्तके स्थानपर महोत्सव होता और महाप्रभुके साथ समस्त भक्त भी वहाँपर भोजन करते थे ॥ 12-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्यभागवतमें अन्त्यखण्ड, नौवाँ अध्याय देखें ॥ 13 ॥ गौड़ीयगणोंका महाप्रभुके साथ चारमास रहना :— चारिमास रहिला सबे महाप्रभु-सङ्गे। जगन्नाथेर नाना यात्रा देखे महारेङ्गे ॥ 16 ॥ अनुवाद—समस्त भक्त चार मास तक नीलाचलमें महाप्रभुके साथ रहे और उन्होंने बड़े आनन्दसे श्रीजगन्नाथदेवके सभी महोत्सवोंका दर्शन किया ॥ 16 ॥ नन्दोत्सवके दिन गोपवेशमें भक्तोंके साथ ब्रजलीलाका अभिनय :— कृष्णजन्मयात्रा-दिने नन्द-महोत्सव। गोपवेश हैला प्रभु लञा भक्त सब ॥ 17 ॥ दधिदुग्ध-भार प्रभु निज-स्कन्धे करि'। महोत्सव-स्थाने आइला बलि 'हरि' 'हरि' ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीके अगले दिन नन्द-महोत्सवमें महाप्रभु और सभी भक्तोंने गोपवेश धारण किया। महाप्रभु दूध और दहीसे भरे पात्रोंको अपने कन्धोंपर उठाकर 'हरि' 'हरि' बोलते हुए महोत्सव-स्थलपर आये ॥ 17-18 ॥ अनुभाष्य—'कृष्णजन्मयात्रा-दिन'—जन्माष्टमीसे अगले दिन अर्थात् नन्दोत्सवके दिन ॥ 17 ॥ श्रीकानाइ-खुटियाका 'नन्द' और श्रीजगन्नाथ-माहातिका 'यशोदा'-वेश :— कानाइ-खुटिया आछेन 'नन्द' वेश धरि'। जगन्नाथ-माहाति हञाछेन 'व्रजेश्वरी' ॥ 19 ॥ अनुवाद—श्रीकानाइ खुटियाने श्रीनन्द महाराजका वेश धारण किया। और श्रीजगन्नाथ-माहातिने व्रजेश्वरी श्रीयशोदाका वेश धारण किया ॥ 19 ॥ । 3

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[ 15/19-27 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'खुटिया'—उड़ीसावासी ब्राह्मणोंकी विशेष उपाधि; 'माहाति'—उड़ीसावासी कायस्थोंकी विशेष उपाधि॥ 19॥ राजा, मिश्र, भट्टाचार्य और तुलसी-पड़िछाके साथ महाप्रभुका लीलाविनोद :— आपने प्रतापरुद्र, आर मिश्र-काशी। सार्वभौम, आर पड़िछा-पात्र तुलसी॥ 20॥ इँहा सबा लञा प्रभु करे नृत्य-रङ्ग। दधि-दुग्ध हरिद्रा-जले भरे सबार अङ्ग॥ 21॥ अनुवाद—उस समय राजा प्रतापरुद्र भी श्रीकाशीमिश्र, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और तुलसी पड़िछा-पात्रके साथ वहाँ उपस्थित थे। इन सबको अपने साथ लेकर महाप्रभु आनन्दपूर्वक नृत्य कर रहे थे और दही-दूध और हल्दीवाले जलसे सभी सराबोर हो रहे थे॥ 20-21॥ अनुभाष्य—'पात्र'—उड़ीसावासी सम्मानित व्यक्तियोंकी उपाधि॥ 20॥ लाठी खेलकर अपने गोपस्वरूपको दिखलानेका अनुरोध :— अद्वैत कहे, —"सत्य कहि, ना करिह कोप। लगुड़ फिराइते पार, तबे जानि गोप॥" 22॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—"मैं सत्य कह रहा हूँ, आप क्रोध मत कीजियेगा। यदि आप लाठी घुमाकर दिखा पायेंगे, तभी मैं मानूँगा कि आप गोप हैं॥" 22॥ अनुभाष्य—'लगुड़'—लाठी; लाठी-खेलमें गोप अथवा गौड़गण ही सबसे आगे होते हैं॥ 22॥ महाप्रभुके द्वारा लाठीको घुमाकर गोप-लीला-प्रदर्शन :— तबे लगुड़ लञा प्रभु फिराइते लागिला। बार बार आकाशे फेलि' लुफिया धरिला॥ 23॥ शिरेर उपरे, सम्मुखे, पृष्ठे, दुइ-पाशे। पादसन्धये फिराय लगुड़, —देखि' लोक हासे॥ 24॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यकी बात सुनकर महाप्रभु लाठीको घुमाने लगे। वे बार-बार लाठीको आकाशकी ओर फेंकते और उसके नीचे आनेपर उसे पकड़ लेते। महाप्रभु कभी अपने सिरके ऊपर, कभी अपने सामने, कभी अपने पीछे, कभी अपनी दाहिनी ओर तथा कभी अपनी बायीं ओर एवं कभी दोनों पैरोंके बीच हाथोंसे लाठीको घुमाते जा रहे थे। इसे देखकर सभी लोग हँस रहे थे॥ 23-24॥ अनुभाष्य—'पादसन्धये'—दोनों पैरोंके बीचके स्थानमें॥ 24॥ उसे देखकर सभीको विस्मय :— अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ फिराय। देखि' सर्वलोक-चित्ते चमत्कार पाय॥ 25॥ अनुवाद—महाप्रभु लाठीको अलात-चक्रकी भाँति घुमा रहे थे जिसे देखकर सभी लोगोंके हृदयमें बड़ा आश्चर्य हो रहा था॥ 25॥ अनुभाष्य—'अलातचक्र'—जलते हुए अङ्गारेको तेजीसे घुमानेपर जैसे वह एक आगके चक्रकी भाँति प्रतीत होता है, महाप्रभुने भी उसी प्रकार बड़ी तेजीसे लाठीको घुमाकर ऐसा प्रदर्शन किया कि देखनेवालोंको चक्रमें सब जगह लाठी दिख रही थी॥ 25॥ श्रीनिताइके द्वारा भी इस प्रकार लाठी घुमाकर अपने गोपस्वरूपका प्रदर्शन :— एइमत नित्यानन्द फिराय लगुड़। के बुझिबे ताँहा दुँहार गोपभाव गूढ़॥ 26॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने भी उसी प्रकार लाठीको घुमाकर दिखलाया। वहाँ उन दोनोंके गूढ़ गोपभावको कौन समझ सकता था ?॥ 26॥ महाप्रभुके मस्तकपर तुलसी-पड़िछाके द्वारा लाये गये प्रसादी-वस्त्रको बाँधना :— प्रतापरुद्रेर आज्ञाय पड़िछा-तुलसी। जगन्नाथेर प्रसाद-वस्त्र एक लञा आसि'॥ 27॥ 4 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/27-36 ] बहुमूल्य वस्त्र प्रभु मस्तके बान्धिल। आचार्यादि प्रभुर गणरे पराइल ॥ 28 ॥ अनुवाद—महाराज प्रतापरुद्रकी आज्ञासे तुलसी पड़िछा श्रीजगन्नाथदेवका एक प्रसादी वस्त्र ले आये। श्रीतुलसी पड़िछाने उस बहुमूल्य वस्त्रके एक खण्डको महाप्रभुके मस्तकपर बाँध दिया। तब उन्होंने श्रीअद्वैताचार्य आदि महाप्रभुके भक्तोंके मस्तकपर भी उस प्रसादी वस्त्रके खण्डोंको बाँधा ॥ 27-28 ॥ श्रीकानाइ और श्रीजगन्नाथका धनादि-वितरण :- कानाञि-खुटिया, जगन्नाथ, —दुइ जन। आवेशे बिलाइल, घरे छिल यत धन ॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीकानाइ खुटिया और श्रीजगन्नाथ माहाति जिन्होंने श्रीनन्द और श्रीयशोदाके वेश धारण किये थे, उस आवेशमें उनके घरमें जितना भी धन था, नन्दोत्सवके उपलक्ष्यमें उन्होंने वह समस्त धन बाँट दिया ॥ 29 ॥ अनुभाष्य—भागवत 10/3/9 संख्या देखें ॥ 29 ॥ महाप्रभुका सन्तोष और माता-पिताको प्रणाम :- देखि' महाप्रभु बड़ सन्तोष पाइला। मातापिता-ज्ञाने दुँहे नमस्कार कैला ॥ 30 ॥ परम-आवेशे प्रभु आइला निज-घर। एइमत लीला करे गौराङ्गसुन्दर ॥ 31 ॥ अनुवाद—उनके इन भावोंको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए और उन दोनोंको माता-पिता मानकर उन्हें प्रणाम किया। तब उस परम-आवेशमें महाप्रभु अपने वासस्थानपर आ गये। श्रीगौराङ्गसुन्दर इस प्रकार मधुर लीलाएँ करते हैं ॥ 30-31 ॥ विजया-दशमी-तिथिमें भक्तोंको वानर-सेनाके रूपमें सजाकर स्वयं हनुमानकी लीलाका अभिनय :- विजया-दशमी—लङ्का-विजयेर दिने। वानर-सैन्य कैला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 32 ॥ हनुमान्-आवेशे प्रभु वृक्षशाखा लञा। लङ्का-गड़े चड़ि' फेले लङ्का भाङ्गिया ॥ 33 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीरामचन्द्रकी लङ्का-विजयके लिये शुभ यात्रा प्रारम्भके दिन विजया-दशमीपर महाप्रभुने अपने भक्तोंको वानर-सेनाके वेशमें सजाया। हनुमानके आवेशमें स्वयं महाप्रभु वृक्षकी शाखाको लेकर लङ्का नगरीके बाहरकी खाईको पारकर लङ्कामें प्रवेश करके उसे तोड़ने-फोड़ने लगे ॥ 32-33 ॥ अनुभाष्य—'लङ्का-गड़'—लङ्का नगरीके चारों ओरकी खाई ॥ 33 ॥ रावण-वध-लीलामें उद्यत महाप्रभु :- 'काँहारे रावणा' प्रभु कहे क्रोधावेशे। 'जगन्माता हरे पापी, मारिमु सवंशे ॥' 34 ॥ अनुवाद—हनुमानके आवेशमें महाप्रभु क्रोधमें भरकर कहने लगे, —'कहाँ है रावण?' 'उस पापीने जगन्माता सीताका हरण किया है, इसलिये मैं उसे वंशसहित मार डालूँगा ॥' 34 ॥ अनुभाष्य—'जगन्माता'—सीतादेवी ॥ 34 ॥ लोगोंका विस्मय और जयध्वनि :- गोसाञिर आवेश देखि' लोके चमत्कार। सर्वलोक 'जय' 'जय' करे बारबार ॥ 35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आवेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभी लोग बार-बार 'जय- जयकार' करने लगे ॥ 35 ॥ कार्तिक मासके वैष्णव-पर्व आदिका दर्शन :- एइमत रासयात्रा, आर दीपावली। उत्थान-द्वादशी-यात्रा देखिला सकलि ॥ 36 ॥ अनुवाद—महाप्रभु और उनके भक्तोंने इसी प्रकार कार्तिक मासके सभी उत्सवों, जैसे—रासलीला, दीपावली, देवोत्थान-द्वादशी आदिमें भाग लिया ॥ 36 ॥ | 5

[ 15/36-43 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'दीपावली'—दीवाली कार्तिक मासकी अमावस्या; 'उत्थान-द्वादशी-यात्रा'—कार्तिकी शुक्ला-द्वादशी; चातुर्मास-व्रत, समुद्रस्नान, नगर-परिक्रमा आदि यात्री-कृत्य॥ 36॥ श्रीनिताइके साथ एकान्त स्थानमें परामर्श :- एकदिन महाप्रभु नित्यानन्दे लञा। दुइ भाइ युक्ति कैल निभृते बसिया॥ 37॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों भाइयोंने एकान्तमें बैठकर कुछ परामर्श किया॥ 37॥ बादमें फलसे भक्तोंके द्वारा कारणका अनुमान :- किवा युक्ति कैल दुँहे, केह नाहि जाने। फले अनुमान पाछे कैल भक्तगणे॥ 38॥ अनुवाद—उन दोनोंने क्या परामर्श किया, इसे कोई नहीं जान सका, परन्तु बादमें भक्तोंने उसके फलसे उसका अनुमान लगाया॥ 38॥ समस्त गौड़ीय-भक्तोंको प्रतिवर्ष गुण्डिचामें मिलनेके लिये उपदेश देकर विदायी देना :- तबे महाप्रभु सब भक्ते बोलाइल। ‘गौड़देशे याह’ सबे विदाय करिल॥ 39॥ सबारे कहिल,—“प्रति वत्सर आसिया। गुण्डिचा देखिया याबे आमारे मिलिया॥” 40॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको बुलवाया और 'गौड़देश जाओ' कहकर सबको विदायी दी। महाप्रभुने सभी भक्तोंसे कहा,—“तुम सब प्रत्येक वर्ष आना और मेरे साथ गुण्डिचा अर्थात् रथ-यात्राके दर्शन करना॥” 39-40॥ श्रीअद्वैतको प्रचारका आदेश :- आचार्येरे आज्ञा दिल करिया सम्मान। “आ-चण्डाल आदि कृष्णभक्ति दिओ दान॥” 41॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका सम्मान करते हुए उन्हें आज्ञा दी,—“आप ब्राह्मणसे लेकर चण्डाल आदि तक सभीको कृष्णभक्तिका दान करना॥” 41॥ श्रीनिताइको प्रचारका आदेश :- नित्यानन्दे आज्ञा दिल,—“याह गौड़देशे। अनर्गल प्रेमभक्ति करिह प्रकाशे॥ 42॥ श्रीनिताइके प्रचारके सङ्गी—श्रीअभिराम और श्रीदास-गदाधर :- रामदास, गदाधर आदि कत जने। तोमार सहाय लागि' दिलुँ तोमार सने॥ 43॥ अदृश्य रहकर गौड़देशमें श्रीनिताइके नृत्य-दर्शनको अङ्गीकार करना :- मध्ये मध्ये आमि तोमार निकटे याइब। अलक्षिते रहि' तोमार नृत्य देखिब॥” 44॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आज्ञा दी,—“आप गौड़देशमें जाकर अधिकारी, अनधिकारी, जाति, वर्ण, उच्च-नीचका विचार किये बिना सर्वत्र प्रेमभक्तिका दान करना। मैं रामदास, गदाधरादि कुछ भक्तोंको आपकी सहायताके लिये आपके साथ भेज रहा हूँ। बीच-बीचमें मैं भी आपके निकट जाऊँगा और अलक्षित रूपमें रहकर आपके नृत्यको देखूँ गा॥” 42-44॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गदाधर'—आँड़ियादह-वासी गदाधर-दास॥ 43॥ अनुभाष्य—'नित्यानन्दे आज्ञा'—प्राकृत-सहजिया लोग रोहिणीनन्दन श्रीबलरामसे अभिन्न श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपने समान प्राकृत मनुष्य समझकर ऐसा कहते हैं,—'महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको वंशकी रक्षा (?) करनेके लिये श्रीनीलाचलसे श्रीगौड़देशमें भेजा।' श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंमें अपराधके कारण ही उनमें ऐसी पाखण्डी बुद्धि उदित हुई है। यद्यपि श्रीनित्यानन्द प्रभु समस्त ईश्वरविग्रह-विष्णु-तत्त्वके मूल 6 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/42-51 ] स्रोत हैं, तथापि प्राकृत सहजिया आदि लोग उन्हें अपने जैसे एक 'कुणपात्मवादी' (कफ-वात-पित्त-इन तीन धातुओंसे बने इस शरीरको आत्मा माननेवाले) और यमदण्डके भागी जड़ेन्द्रिय-भोगोंमें लिप्त जन्म-मरणके चक्रमें बँधे जीवमात्र मानते हैं। इस अपराधके कारण वे लोग नरक-पथके ही पथिक बनते हैं। ऐसे लोग कनक-कामिनी-प्रतिष्ठाके लोभी, व्यापारी-स्वभाववाले और स्वार्थपरायण होते हैं। वे अज्ञानी लोगोंको ठगनेके अपने व्यवसायका, दुर्भावनाके कारण 'सर्वत्र निन्दित स्त्रीसङ्ग'की लालसाका और गृहव्रत अथवा गृहेमेध- धर्मका अन्याय और अशास्त्रीय विचारसे समर्थन करनेका सुयोग ढूँढ़ते हैं। इसलिये वे अपने उपजाऊ मस्तिष्कमें ऐसे शास्त्रविरुद्ध मतको उत्पन्न करके श्रीनित्यानन्द प्रभुका उदाहरण देकर उनकी ईश्वर-चेष्टाओं अर्थात् लीलाओंकी नकल करते हैं। वास्तवमें, महावदान्य श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्णप्रेमदाता महाप्रभुके अभिन्न प्रकाश-विग्रह हैं। ब्रह्माजीने वंशवृद्धिके द्वारा सृष्टिकी रक्षाके लिये रजोगुणाश्रित प्रजापतियोंको आदेश दिया था। परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुको वैसे इन्द्रिय-तृप्तिरूपी कार्यके सहायकके रूपमें किसी आदेशकी बात किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें नहीं लिखी है, और हो भी नहीं सकती, क्योंकि वह किसी प्रकारसे श्रवणके योग्य नहीं है। ऐसी बातोंका प्रचार करके प्राकृत-स्त्रीसङ्गी-सहजिया लोग स्वयं तो परमार्थसे वञ्चित होते ही हैं, और साथ ही सद्-असद्के विवेकसे हीन जगत्की भी वञ्चना करके जगत्में अमङ्गल ही उत्पन्न करते हैं॥42॥ श्रीवासाङ्गनमें नित्य नृत्य करनेको अङ्गीकार करना :- श्रीवास-पण्डिते प्रभु करि' आलिङ्गन। कण्ठे धरि' कहे तारे मधुर वचन॥45॥ “तोमार घरे कीर्त्तने आमि नित्य नाचिब। तुमि देखा पाबे, आर केह ना देखिब॥46॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीवास पण्डितको आलिङ्गन करके उनके गलेमें अपनी भुजा डालकर उन्हें मधुर वचन कहे, - “तुम्हारे घरमें होनेवाले कीर्तनमें मैं नित्य नृत्य करूँगा, तुम मुझे नृत्य करते हुए देख पाओगे, अन्य कोई भी नहीं देख पायेगा॥"45-46॥ मातृवत्सल महाप्रभुका माताको सान्त्वना देनेके लिये श्रीवासके हाथमें वस्त्रके टुकड़ेको देना और माताके त्याग हेतु अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना :- एइ वस्त्र माताके दिह', एइ सब प्रसाद। दण्डवत् करि' आमार क्षमाइह अपराध॥47॥ अनुवाद-(वस्त्रके एक खण्ड और प्रसादको उनके हाथोंमें देते हुए महाप्रभुने आगे कहा-) यह सब माताको दे देना। मेरी ओरसे उन्हें दण्डवत् करके मेरे द्वारा किये गये अपराधके लिये उनसे क्षमा माँगना॥47॥ वात्सल्यरस-विरोधी संन्यास-वेष-ग्रहण-हेतु स्वयंको धिक्कार देना :- ताँर सेवा छाड़ि' आमि करियाछि संन्यास। धर्म नहे, करि आमि निज-धर्मनाश॥48॥ ताँर प्रेम-वश आमि, ताँर सेवा-धर्म। ताहा छाड़ि' करियाछि वातुलरे कर्म॥49॥ वातुल बालकेर माता नाहि लय दोष। एइ जानि' माता मोरे ना करय रोष॥50॥ कि काय संन्यासे मोर, प्रेम निज-धन। ये-काले संन्यास कैलूँ, छत्र हैल मन॥51॥ अनुवाद-उनकी सेवाको छोड़कर मैंने संन्यास ग्रहण किया है, यह कोई धर्मका कार्य नहीं है। ऐसा करके मैंने अपने धर्मका नाश किया है। मैं उनके प्रेमके वशीभूत हूँ और उनकी सेवा करना ही मेरा धर्म है। उस धर्मको छोड़कर मैंने पागल व्यक्ति जैसा कार्य किया है। माता अपने पागल बालकका कोई दोष नहीं लेती। ऐसा जानकर ही माता मेरे प्रति क्रोध नहीं करती। माताका प्रेम जो मेरा वास्तविक धन है, उसका । 7

[ 15/48-51 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला त्याग करके मुझे संन्यास नहीं लेना चाहिये था। मैंने जिस समय संन्यास ग्रहण किया था, उस समय मेरा मन विक्षिप्त (पागल) हो गया था॥48-51॥ अनुभाष्य—मैं संन्यास लेकर माताके सेवारूपी धर्मका पालन नहीं करके धर्मसे भ्रष्ट हुआ हूँ॥48॥ अमृताणुकणा—श्रीमद्भगवद्गीतामें (18/66) भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं घोषणा की है- “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥” इसलिये उसके अनुसार सब प्रकारके नश्वर धर्मोंका परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत किसी संन्यासीके लिये पुनः किसी नश्वर धर्मका पालन न करनेसे जनित पापकी आशङ्का नहीं रह सकती है। धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने गीतामें अपने कहे गये उक्त वाक्यकी ही परम-सार्थकता सम्पादन करनेके लिये स्वयं ही सभी धर्मोंको त्यागकर और संन्यास ग्रहण करके श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करनेका उज्ज्वलतम दृष्टान्त स्थापित किया था। इसलिये “ताँहार सेवा छाड़ि' आमि करियाछि संन्यास। धर्म নহে, करि आमि निज धर्म नाश॥” आदि वचनके द्वारा उनकी कोई जड़ासक्तिका आश्रय सूचित नहीं होता है, बल्कि शचीमाताके साथ उनका नित्य सम्बन्ध ही इसके द्वारा ज्ञापित हुआ है। शचीमाता श्रीगौरसुन्दरकी नित्यसिद्ध पार्षद हैं। वे वात्सल्य-रसकी मूल आश्रय-विग्रह हैं। विषय-विग्रह और आश्रय-विग्रह दोनोंके मध्य परस्पर जो नित्य सेव्य-सेवकका सम्बन्ध है, वह कोई जड़ीय या नश्वर सम्बन्ध नहीं है—उसे ही श्रीगौरसुन्दरने श्रीवास पण्डितको बतलाया है। भक्तके प्रति भगवान्का जो 'निजधर्म' है, उसको उन्होंने स्वयं ही व्यक्त किया है—“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” (गीता 4/11)। शचीमाता वात्सल्य-रसमें श्रीगौरहरिकी नित्य उपासिका हैं, इसलिये उनसे उक्त रसमें सेवा ग्रहण करना ही श्रीगौरसुन्दरका 'निजधर्म' है। “ताँर प्रेम वश आमि, ताँर सेवा-धर्म।” वहाँपर संन्यास-ग्रहण वात्सल्य-रसका विरोधी होनेपर उनका उक्त 'निजधर्म' बाहरी रूपसे नाश हुआ। किन्तु परोक्षरूपसे उन्होंने अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे शचीमाताके निकट जाकर उनकी प्रेमसेवा ग्रहण करके उस 'निजधर्म'का ही पालन किया। “नित्य याइ देखि मुञि ताँहार चरणे। स्फूर्त्तिज्ञाने तेंहो सत्य नाहि माने॥” (मध्यलीला 15/53) श्रीगौरसुन्दर यहाँपर अपने विषयविग्रहोचित-भावको व्यक्त करते हुये कह रहे हैं,—“कि काय संन्यासे मोर, प्रेम निज धन।” श्रीकृष्ण सेवामें नियोजित होना ही त्रिदण्डी भिक्षुका एकमात्र व्रत है और श्रीकृष्णप्रेमधन ही उसके उस निवॄत्तिमार्गका 'महाफल' है। किन्तु वह प्रेमधन श्रीगौरसुन्दरका एकान्त अपना—“प्रेम निजधन” है। अद्वयज्ञान-परतत्त्व श्रीगौरसुन्दर अपने नित्य प्रेममय परिकरों और धामके साथ स्वयं पूर्ण तत्त्व हैं। इसलिये उक्त प्रेमधनके लिये उनको संन्यास ग्रहण करनेकी कोई अपेक्षा नहीं है। “न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।” (गीता 3/22) ऐसा होनेपर तब उनके संन्यास ग्रहण करनेका क्या कारण है? इसके उत्तरमें कहते हैं—“ये काले संन्यास कैलु, छत्र हैल मन।” श्रीकृष्ण सम्भोग-विग्रह हैं, श्रीराधा विप्रलम्भ-मूर्ति हैं और श्रीगौररूपी कृष्ण श्रीराधाभावोंके आस्वादनकारी हैं। उन श्रीराधाभावोंका आस्वादन करनेके लिये विप्रलम्भ-महाभावमें जो प्रबल श्रीकृष्ण-अन्वेषणकी चेष्टा और श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे जो तीव्र वैराग्य है, उससे प्रेरित होकर ही श्रीगौरकृष्णने मुख्यतः संन्यास ग्रहण किया। “प्रभु बोले,—शुन सार्वभौम महाशय। 'संन्यासी' आमारे नाहि जानिह निश्चय॥ कृष्णेर विरहे मुञि विक्षिप्त हइया। बाहिरे हइलुँ शिखा-सूत्र मुड़ाइया॥” (चैः भाः अः 3/66-67)। अर्थात् यहाँपर उनका वह सुतीव्र विप्रलम्भजनित दिव्योन्माद ही उक्त 'छन्न हैल मन' वाक्यका मुख्य तात्पर्य है और दूसरे प्रकारसे उक्त वाक्यसे पाखण्डी मायावादी, कर्मनिष्ठ, निन्दक आदि जीवोंके उद्धार 8 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/48-62 ]

करनेकी वासनाके द्वारा उनके आवृत्त-चित्तको ही समझना चाहिये॥ 48-51॥

मायापुरमें बीच-बीचमें शचीमाताके दर्शनके लिये आगमन स्वीकार करना :- नीलाचले आछि मुञि ताँहार आज्ञाते। मध्ये मध्ये आसिमु, ताँर चरण देखिते॥ 52 ॥

अनुवाद—मैं नीलाचलमें उन्हींकी आज्ञासे ही वास कर रहा हूँ। मैं बीच-बीचमें उनके चरणोंके दर्शन करनेके लिये आऊँगा॥ 52 ॥

पहलेसे ही नित्य शचीमाताके साथ साक्षात्कार, किन्तु महाप्रभुकी मायाके प्रभावसे शचीमाताका संशय :- नित्य याइ' देखि मुञि ताँहार चरणे। स्फूर्त्ति-ज्ञाने तैं हो ताहा सत्य नाहि माने॥ 53 ॥

अनुवाद—वास्तवमें तो मैं प्रतिदिन जाकर उनके चरणोंका दर्शन करता हूँ, किन्तु वे इसे स्फूर्ति समझनेके कारण उसे सत्य नहीं मानती॥ 53 ॥

शचीमाताके विश्वासको उत्पन्न करनेके लिये एक दिनकी घटनाका वर्णन :- एकदिन शाल्यन्न, व्यञ्जन पाँच-सात। शाक, मोचा-घण्ट, भृष्ट-पटोल-निम्बपात॥ 54 ॥ लेम्बु-आदाखण्ड, दधि, दुग्ध, खण्डसार। शालग्रामे समर्पिलैन बहु उपहार॥ 55 ॥

अनुवाद—एक दिन माताने शाल्यन्न (विशेष प्रकारके चावल), पाँच-सात प्रकारके व्यञ्जन, साग, केलेके फूलोंकी बनी सब्जी, नीमकी पत्तियोंके साथ बने परमल, नीबूँ और अदरकके टुकड़े, दही, दूध तथा खण्डसार आदि बहुतसे नैवेद्य शालग्रामको समर्पित किये॥ 54-55 ॥

अनुभाष्य—'शाल्यन्न'—शालि-धानके चावलका अन्न; 'भृष्ट-पटोल-निम्बपात'—नीमके पत्तोंके साथ परमलको मिलाकर बनायी गयी सूखी भाजी॥ 54 ॥


प्रसाद लञा कोले करेन क्रन्दन। 'निमाइर प्रिय मोर—एसब व्यञ्जन॥ 56 ॥ निमाइ नाहिक एथा, के करे भोजन।' मोर ध्याने अश्रुजले भरिल नयन॥ 57 ॥ शीघ्र याइ' मुञि सब करिनु भक्षण। शून्यपात्र देखि' अश्रु करिया मार्जन॥ 58 ॥

अनुवाद—प्रसादको अपनी गोदमें लेकर माता रोते हुए सोचने लगीं,—'ये सब व्यञ्जन मेरे निमाइको बहुत प्रिय हैं, किन्तु निमाइ यहाँपर नहीं है, तो कौन इन्हें खायेगा?' इस प्रकार मेरा ध्यान करते हुए उनके नेत्र आँसुओंसे भर गये। मैंने शीघ्रतासे वहाँ जाकर वे सब व्यञ्जन खा लिये। माताने पात्रको खाली देखकर अपने आँसुओंको पोंछा॥ 56-58 ॥

'के अन्न-व्यञ्जन खाइल, शून्य केने पात? बालगोपाल किंवा खाइल सब भात?॥ 59 ॥ किंवा मोर कथाय मने भ्रम हञा गेल! किंवा कोन जन्तु आसिं सकल खाइल?॥ 60 ॥ किंवा आमि अन्न पात्रे भ्रमे ना बाड़िल।' एत चिन्ति' पाक-पात्र याञा देखिल॥ 61 ॥

अनुवाद—'अरे! किसने चावल और ये सब व्यञ्जन खाये, पात्र खाली क्यों है? क्या बालगोपालने सब चावल खा लिये? या फिर मेरी बातोंसे मेरे ही मनमें भ्रम उत्पन्न हो गया है। या फिर किसी जन्तुने आकर यह सब खा लिया? या फिर मैंने इस पात्रमें भ्रमवशतः कुछ रखा ही नहीं था।' यह सोचकर माता रसोईमें भोजन बनानेवाले बर्तनोंको जाकर देखने लगीं॥ 59-61 ॥

अन्नव्यञ्जनपूर्ण देखि' सकल भाजने। देखिया संशय हैल किछु चमत्कार मने॥ 62 ॥

अनुवाद—चावल और अन्यान्य सभी व्यञ्जनोंसे

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[ 15/62-72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भरे बर्तनोंको देखकर माताके मनमें कुछ संशय हुआ तथा साथ ही मनमें कुछ आश्चर्य भी हुआ ॥ 62 ॥ अनुभाष्य- 'भाजन'-आधार, पात्र ॥ 62 ॥ ईशाने बोलाञा पुनः स्थान लेपाइल। पुनरपि गोपालके अन्न समर्पिल ॥ 63 ॥ अनुवाद-माताने ईशानको बुलाकर पुनः उस स्थानको साफ करवाया और उन्होंने पुनः गोपालको नैवेद्य समर्पित किया ॥ 63 ॥ अनुभाष्य- 'ईशान'-आदिलीला 10/110 संख्या देखें ॥ 63 ॥ एइमत यबे करेन उत्तम रन्धन। मोरे खाओयाइते करे उत्कण्ठाय रोदन ॥ 64 ॥ अनुवाद-इस प्रकार माता जब भी उत्तम-उत्तम व्यञ्जन बनाती हैं, तभी मुझे खिलानेकी उत्कण्ठामें रोती हैं ॥ 64 ॥ ताँर प्रेमे आनि' आमाय कराय भोजने। अन्तरे सुख माने तैँहो, बाह्ये नाहि माने ॥ 65 ॥ अनुवाद-उनका प्रेम मुझे वहाँ ले जाकर मुझे भोजन कराता है। माता अपने मनमें तो सुखी होती हैं, किन्तु बाहरसे मेरे आनेको नहीं मानतीं ॥ 65 ॥ पिछली विजया-दशमीमें भी इसी प्रकार माताके द्वारा बनाये गये अन्नका भोजन :- एइ विजया-दशमीते हैल एइ रीति। ताँहाके पुछिया ताँर कराइह प्रीति ॥” 66 ॥ अनुवाद-पिछली विजया-दशमीके दिन भी ऐसा ही हुआ था। मातासे इस विषयमें पूछकर उन्हें इसका विश्वास दिलाना॥” 66 ॥ भक्तोंके विच्छेदसे महाप्रभुकी विह्वलता :- एतेक कहिते प्रभु विह्वल हइला। लोक विदाय करिते प्रभु धैर्य धरिला ॥ 67 ॥ अनुवाद-इतना कहते-कहते महाप्रभु विह्वल हो गये, किन्तु भक्तोंको विदायी देनेके लिये महाप्रभुने धैर्य धारण कर लिया ॥ 67 ॥ प्रेमवशतः महाप्रभुके द्वारा श्रीराघव-पण्डितकी शुद्धकृष्णसेवा-प्रचेष्टाका वर्णन :- राघव-पण्डिते कहेन वचन सरस। “तोमार निष्ठा-प्रेमे आमि हइँ तोमार वश ॥ 68 ॥ इँहार कृष्णसेवार कथा शुन, सर्वजन। परम पवित्र सेवा अति सर्वोत्तम ॥ 69 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीराघव-पण्डितसे ये मधुर वचन कहे,-“तुम्हारी निष्ठा और तुम्हारे प्रेमके कारण मैं तुम्हारे वशमें हूँ। (तब महाप्रभु उपस्थित भक्तोंसे कहने लगे-) सभी लोग इनके द्वारा की जानेवाली श्रीकृष्ण- सेवाके विषयमें सुनो। इनके द्वारा की जानेवाली सेवा परम पवित्र और अति सर्वोत्तम है ॥ 68-69 ॥ श्रीराघवके द्वारा महाप्रभुको अपूर्व नारियलका भोग प्रदान करनेका वैशिष्ट्य :- आर द्रव्य रहु-शुन नारिकेलेर कथा। पाँच गण्डा करि' नारिकेल बिकाय तथा ॥ 70 ॥ अनुवाद-अन्य द्रव्योंकी बात तो छोड़ दो, नारियल भेंट करनेकी ही बात सुनो। इनके गाँव पाणिहाटीमें नारियल 'पाँच गण्डे' (एक पैसे)का मिलता है ॥ 70 ॥ वाटिते कत शत वृक्षे लक्ष लक्ष फल। तथापि शुनेन, यथा मिष्ट नारिकेल ॥ 71 ॥ एक एक फलेर मूल्य दिया चारिचारि पण। दशक्रोश हैते आनाय करिया यतन ॥ 72 ॥ अनुवाद-यद्यपि इनके अपने घरमें नारियलके सैकड़ों वृक्ष हैं जिनपर लाखों फल लगे रहते हैं, तथापि ये जाननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं कि मीठे नारियल कहाँ मिलेंगे? तब ये एक-एक फलका चार-चार पण (अर्थात् सोलह पैसे) मूल्य देकर दस कोसकी (तीस 10 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/71-83 ] किलोमीटरकी) दूरीसे भी उन फलोंको बहुत ही यत्नपूर्वक मँगवाते हैं॥ 71-72॥ प्रतिदिन पाँच-सात फल छोलाञा। सुशीतल करिया राखे जले डुबाइञा ॥ 73 ॥ भोगेरे समय पुनः छुलि' संस्करि' । कृष्णे समर्पण करे, मुख छिद्र करि' ॥ 74 ॥ कृष्ण सेइ नारिकेल-जल पान करि' । कभु शून्य फल राखेन, कभु जल भरि' ॥ 75 ॥ जलशून्य फल देखि' पण्डित - हरषित । फल भाङ्गि' शस्ये करे शतपात्र पूरित ॥ 76 ॥ शस्य समर्पण करि' बाहिरे धेयान । शस्य खाञा कृष्ण करे शून्य भाजन ॥ 77 ॥ कभु शस्य खाञा कृष्ण पुनः पात्र भरे शाँसे। श्रद्धा बाड़े पण्डितेर, प्रेमसिन्धु भासे ॥ 78 ॥ अनुवाद - ये प्रतिदिन पाँच-सात नारियल छीलकर उन्हें सुशीतल करनेके लिये जलमें डुबो करके रखते हैं। भोग लगानेके समय ये पुनः नारियलको छीलकर और साफ करके उसके मुखमें छेद करके उसे श्रीकृष्णको समर्पित करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उस नारियलके जलका पान करके कभी तो फलको खाली कर देते हैं और कभी उसे पुनः जलसे भर देते हैं। खाली नारियल देख ये बहुत प्रसन्न होते हैं कि श्रीकृष्णने नारियलके जलको ग्रहण कर लिया है। तब ये नारियलको तोड़कर उसकी मलाईको अनेक पात्रोंमें भरकर उसे श्रीकृष्णको समर्पित करके बाहर बैठकर ध्यान करते हैं। इस बीच श्रीकृष्ण मलाईको खाकर उस पात्रको खाली कर देते हैं। कभी-कभी श्रीकृष्ण मलाई खाकर पुनः उस पात्रको मलाईसे भर देते हैं। यह सब देखकर इनकी श्रद्धा बढ़ जाती है और ये प्रेम-सिन्धुमें निमग्न हो जाते हैं ॥ 73-78 ॥ एक दिनकी घटनाका वर्णन :- एक दिन फलदश संस्कार करिया । भोग लागाइते सेवक आइल लञा ॥ 79 ॥ अवसर नाहि हय, विलम्ब हइल। फल-पात्र-हाते सेवक द्वारे त' रहिल ॥ 80 ॥ द्वारेर उपर भिते तैं हो हात दिल। सेइ हाते फल छुँइल, पण्डित देखिल ॥ 81 ॥ अनुवाद - एक दिन इनका सेवक दस नारियलोंको छीलकर भोग लगानेके लिये लेकर आया। उस दिन भोग लगानेके लिये बहुत कम समय बचा था, क्योंकि किसी कारणसे इन्हें आनेमें विलम्ब हो गया था। और इनकी प्रतीक्षामें सेवक अपने हाथमें नारियलके पात्रको लेकर द्वारपर ही खड़ा रहा। तभी इन्होंने देखा कि सेवकने द्वारके ऊपरकी दीवारको अपने हाथोंसे छुआ और उसी हाथसे फिर नारियलको छू लिया ॥ 79-81 ॥ अनुभाष्य - 'उपर-भिते'- ऊपरकी दीवारपर; 'तैंहों'- श्रीराघव पण्डितका सेवक ॥ 81 ॥ पण्डित कहे, - 'द्वारे लोक करे गतायाते। तार पदधूलि उड़ि' लागे उपर-भिते ॥ 82 ॥ सेइ भिते हात दिया फल परशिला। कृष्ण-योग्य नहे, फल अपवित्र हैला ॥ '83 ॥ अनुवाद - इन राघव पण्डितने उस सेवकसे कहा, - 'द्वारसे लोग आवागमन करते हैं। उनके पैरोंकी धूलि उड़कर ऊपरवाली दीवारपर भी लग जाती है। उसी दीवारपर हाथ लगाकर तुमने नारियलको स्पर्श किया है। इसी कारण ये फल श्रीकृष्णको समर्पित करनेके योग्य नहीं हैं, ये अपवित्र हो गये हैं ॥ '82-83 ॥ अनुभाष्य - श्रीराघव पण्डित साधारण 'शुचि- वायुरोग'-ग्रस्त अर्थात् सफाईके लिये पागल मायाबद्ध व्यक्ति नहीं थे। अथवा प्राकृत कनिष्ठ भक्तकी भाँति द्वैतबुद्धिवाले होकर 'भौमे इज्यधी' अर्थात् जड़में चिद् । 11

[ 15/81–91 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


[बायाँ स्तम्भ]

वस्तुका आरोप करनेवाले मनोधर्मी नहीं थे। वे नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण सेवक थे। उनमें जड़ीय कामकी गन्ध भी नहीं थी। वे अप्राकृत-सेवाके भावमें निमग्न रहकर सब समय अपनी आराध्य वस्तुकी सेवा करते थे। पक्षान्तरमें, अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिये कर्ममिश्रा-बिद्धा भक्तिका आश्रय करनेवाले कनिष्ठ भक्तोंमें अप्राकृत-सेवा-बुद्धि नहीं होती। इसलिये केवल श्रीराघव पण्डितके बाह्य आचरणका अनुकरण करके लौकिक कृत्रिम पवित्रता-अपवित्रताका विचार करनेसे ही वे शुद्धकृष्णभक्त नहीं हो सकते। उनका ऐसा आचरण उनकी श्रीकृष्णप्रीतिवाञ्छाका परिचय नहीं देता। (अन्त्यलीला 4/174, 176 संख्या)में— “भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174ख ॥ 'द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब—'मनोधर्म'। 'एइ भाल, एइ मन्द',—एइ सब 'भ्रम' ॥” 176 ॥ [अर्थात् “‘अप्राकृत' वस्तुमें भद्र और अभद्र अर्थात् अच्छे और बुरेका कोई विचार होना उचित नहीं है। 'द्वैत' अर्थात् प्राकृत वस्तुमें भद्र और अभद्रका ज्ञान करना तो 'मनका धर्म' है। 'यह अच्छा है, यह बुरा है'—यह सब तो भ्रम है।”] भागवत 11/28/4 श्लोक देखें ॥ 81–83 ॥

जगत्में श्रीराघवकी अपूर्व पवित्र श्रीकृष्णसेवा :— एत बलि' फल फेले प्राचीर लङ्गिया। ऐछे पवित्र प्रेम-सेवा जगत् जिनिया ॥ 84 ॥ तबे आर नारिकेल संस्कार कराइल। परम पवित्र करि' भोग लागाइल ॥ 85 ॥ एइमत कला, आम्र, नारिकेल, काँठाल। याहा याहा दूर-ग्रामे शुनियाछे भाल ॥ 86 ॥ बहुमूल्य दिया आनि' करिया यतन। पवित्र संस्कार करि' करे निवेदन ॥ 87 ॥ एइमत व्यञ्जनेर शाक, मूल, फल। एइमत चिड़ा, हुडुम, सन्देश सकल ॥ 88 ॥


[दायाँ स्तम्भ]

एइमत पिठा-पाना, क्षीर-ओदन। परम पवित्र, आर करे सर्वोत्तम ॥ 89 ॥ काश्मन्दि, आचार आदि अनेक प्रकार। गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार, सर्वद्रव्य-सार ॥ 90 ॥ एइमत प्रेमेर सेवा करे अनुपम। याहा देखि' सर्वलोकेर जुड़ाय नयन ॥” 91 ॥

अनुवाद—यह कहकर इन्होंने उन नारियलोंको दीवारके दूसरी ओर फेंक दिया। इनकी ऐसी पवित्र प्रेम-सेवा जगत्को जीतनेवाली है। तब इन्होंने पुनः अन्य नारियलोंको सावधानी और पवित्रतासे छिलवाया और उनका भोग लगाया। इसी प्रकार केले, आम, सन्तरे, कटहल और अन्यान्य जिन-जिन पदार्थोंके विषयमें सुनते हैं कि कहीं दूर ग्राममें भी बहुत अच्छे मिल रहे हैं, तो ये यत्न करके बहुत अधिक मूल्य देकर भी उन्हें मँगवाते हैं और अच्छेसे पवित्र करके छीलकर उन्हें भगवान्को निवेदन करते हैं। इसी प्रकार शाक, मूल, फल आदि, चिड़वा, सख्त मूड़ि, अनेक प्रकारके सन्देश, पीठा-पाना और गाढ़ी खीर आदि व्यञ्जनोंको परम-पवित्रतासे अति उत्तम और स्वादिष्ट बनाते हैं। इसी प्रकार ही कासुन्दी (सरसोंसे बनी चटनी) और अनेक प्रकारके आचार आदि भी श्रीकृष्णको निवेदित करते हैं। ये सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ताके इत्यादि सुगन्धित द्रव्य, वस्त्र और अलङ्कारादि भी निवेदन करते हैं। इस प्रकार राघव पण्डित प्रेमपूर्वक अनुपम सेवा करते हैं, जिसे देखकर सभी लोगोंको बहुत आनन्द होता है ॥” 84–91 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'हुडुम'—एक प्रकारका धान, इसकी खील उड़ीसामें विशेषरूपसे प्रचलित है (पूर्वी- बङ्गालमें 'मुड़ि'को 'हुडुम' कहते हैं)। 'काश्मन्दि'—कासुन्दि (सरसोंके दानोंसे बनी तीखी चटनी) ॥ 88–90 ॥

अनुभाष्य—'क्षीर-ओदन'—दूधमें पकाये चावलकी खीर ॥ 89 ॥


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पन्द्रहवाँ अध्याय 15/92-99 ] महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंका यथायोग्य अभिनन्दन :- एत बलि' राघवेरे कैल आलिङ्गने। एइमत सम्मानिल सर्व भक्तगणे ॥ 92 ॥ अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभुने श्रीराघव पण्डितका आलिङ्गन किया। इसी प्रकार उन्होंने सभी भक्तोंको सम्मानित किया ॥ 92 ॥ श्रीशिवानन्दको खर्चीले श्रीवासुदेव-दत्तके धनका रक्षक बननेका आदेश :- शिवानन्दसेने कहे करिया सम्मान। “वासुदेव-दत्तेर तुमि करिह समाधान ॥ 93 ॥ परम उदार इँहो, ये दिन ये आइसे। सेइ दिने व्यय करे, नाहि राखे शेषे ॥ 94 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको सम्मान देते हुए कहा,-“आप वासुदेव-दत्तका ध्यान रखना। ये परम उदार हैं। जिस दिन इनके पास जितना भी धन आता है, ये उसे उसी दिन ही खर्च कर देते हैं, अपने पास कुछ भी बचाकर नहीं रखते ॥ 93-94 ॥ अनुभाष्य-श्रीशिवानन्द सेन और श्रीवासुदेव दत्त ठाकुर-दोनों ही उस समय कुमारहट्ट अथवा हालिसहर और काँचड़ापाड़ामें वास करते थे ॥ 93 ॥ गृहस्थ वैष्णवोंके लिये लौकिक-कर्त्तव्यका उपदेश :- 'गृहस्थ' हयेन इँहो, चाहिये सञ्चय। सञ्चय ना कैले कुटुम्ब-भरण नाहि हय ॥ 95 ॥ इहार घरेर आय-व्यय, सब-तोमार स्थाने। 'सरखेल' हञा तुमि करिह समाधाने ॥ 96 ॥ अनुवाद-वासुदेव दत्त 'गृहस्थ' हैं, इसलिये उन्हें कुछ-न-कुछ सञ्चय करनेकी आवश्यकता है। सञ्चय किये बिना कुटुम्बका भरण-पोषण नहीं होता। इनके घरके आय-व्यय आदिका सब कुछ आप इनके 'सरखेल'के रूपमें ध्यान रखना ॥ 95-96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सरखेल'-तत्त्वावधायक (हिसाब- किताब रखनेवाले) ॥ 96 ॥ प्रत्येक वर्ष मार्गमें कर-संग्रहकर्त्ताका समाधान करके सभी भक्तोंको पुरीमें लानेकी आज्ञा :- प्रतिवर्षे आमार सब भक्तगण लञा। गुण्डिचाय आसिबे सबाय पालन करिया ॥ "97 ॥ अनुवाद-आप प्रत्येक वर्ष मेरे सब भक्तोंको अपने साथ लेकर उनका पालन-पोषण करते हुए रथयात्राके समय नीलाचलमें आना ॥ "97 ॥ श्रीसत्यराज और श्रीरामानन्दको प्रतिवर्ष रेशमी डोरी लानेका आदेश :- कुलीनग्रामीरे कहे सम्मान करिया। “प्रत्यब्द आसिबे यात्राय पट्टडोरी लञा ॥ 98 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कुलीनग्रामवासियोंको सम्मान देते हुए कहा,-“आप लोग प्रत्येक वर्ष रथयात्रामें मजबूत रेशमी-डोरियाँ (जिनसे बाँधकर श्रीजगन्नाथ, श्रीबलदेव और श्रीसुभद्राको उठाकर लाया जाता है) लेकर आना ॥ 98 ॥ श्रीमुखसे मालाधर-वसु-कृत 'श्रीकृष्णविजय' की महिमाका वर्णन :- गुणराज-खाँन कैल श्रीकृष्णविजय। ताँहा एकवाक्य ताँर आछे प्रेममय ॥ 99 ॥ अनुवाद-इन गुणराज खाँनने श्रीकृष्णविजय नामक ग्रन्थकी रचना की है। उस ग्रन्थमें श्रीकृष्णके प्रति उनके हृदयके प्रेमको प्रकाशित करनेवाला एक वाक्य है॥99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'श्रीकृष्णविजय'-एक विशेष ग्रन्थ। बहुतसे लोगोंने विवेचना की है कि यह ग्रन्थ ही बङ्गला-भाषाका सर्वप्रथम पद्य-काव्य-ग्रन्थ है ॥ 99 ॥ अनुभाष्य-“आदिकवि गुणराज खाँन महाशय तेरह सौ पिचानवें (1395) शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना । 13

[ 15/99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेमें नियुक्त हुए और चौदह सौ दो (1402) शकाब्दमें ग्रन्थको समाप्त किया।” “श्रीकृष्णविजय-ग्रन्थकी रचना अति सरल है, यहाँ तक कि, बङ्गालकी अर्द्धशिक्षित महिलाएँ और साधारण वर्णज्ञान जाननेवाले निम्नश्रेणीके व्यक्ति भी इस ग्रन्थको अनायास ही पढ़ और समझ सकते हैं। इस ग्रन्थकी भाषा अलंकृत नहीं है, इसके पद्य अनेक स्थानोंपर अधिक मधुर भी नहीं हैं। चौदह अक्षरोंवाले पयारमें अनेक स्थानोंपर सोलह-सत्रह अक्षर अथवा बारह-तेरह अक्षर दिखलायी देते हैं। इसके अनेक शब्द ही उस कालमें व्यवहारमें आनेवाले शब्द हैं। उन सब शब्दोंके अर्थ केवल राढ़देशवासी लोग ही समझ सकते हैं। इस पुस्तकका अभाव रहनेपर किसी बङ्गाली पुस्तकालयको 'सम्पूर्ण' नहीं कहा जा सकता।” “यह ग्रन्थ पारमार्थिक-लोगोंके लिये परम आदरणीय है। वैष्णवोंमें अग्रणी पूज्यपाद श्रीगुणराज-खाँन महाशयने सर्वशास्त्र-शिरोमणि श्रीमद्भागवत-ग्रन्थके दसवें और ग्यारहवें स्कन्धका साधारण व्यक्तियोंके द्वारा ग्रहण करने योग्य अनुवाद करके इस ग्रन्थकी रचना की है। इस कारण वैष्णव-जगत्में यह ग्रन्थ सर्वत्र पूजनीय है। जिस ग्रन्थको पढ़कर महाप्रभुने इतनी प्रशंसा की है, वह ग्रन्थ गौड़ीय-वैष्णव-समाजमें कितना आदर प्राप्त करेगा, यह कहनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये यह काव्य बङ्गालवासियोंके लिये बहुत ही आदरणीय धन है; विशेषतः कोई-कोई कहते हैं, - यह ग्रन्थ ही बङ्गलाभाषाका सर्वप्रथम काव्य है।” “श्रीश्रीमहाप्रभुके आविर्भावसे दो वर्ष पूर्व 1405 शकाब्दमें श्रीदेवानन्द वसुके हाथसे यह ग्रन्थ लिखा गया है।” (श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर-लिखित 'श्रीकृष्ण-विजय'- ग्रन्थकी 'प्रस्तावना'से उद्धृत)। “बङ्गालके सम्राट आदिशूर कान्यकुब्जसे पाँच सु-ब्राह्मणोंके साथ जिन पाँच सु-कायस्थोंको लाये थे, उनमेंसे दशरथ वसु एक थे; उन्हींके ही वंशमें तेरहवीं पीढ़ीमें श्रीगुणराज-खाँन उत्पन्न हुए। इनका वास्तविक नाम-श्रीमालाधर वसु है, 'गुणराज खाँन' इन्हें गौड़ीय सम्राटके द्वारा प्रदान की गयी उपाधि है। दशरथ वसुकी वंश परम्परा इस प्रकार है:-

  1. दशरथ वसु, 2) कुशल, 3) शुभशङ्कर, 4) हंस, 5) शक्तिराम (बागाण्डा), मुक्तिराम (माइनगर) और अलङ्कार (बङ्गज);
  2. मुक्तिराम, 6) दामोदर, 7) अनन्तराम, 8) गुणीनायक और वीणानायक;
  3. गुणीनायक, 9) माधव, 10) लक्ष्मीनाथ, चक्रपाणि, उदयचाँद, लौह, तौहु, श्रीपति और अच्युतानन्द;
  4. श्रीपति, 11) यज्ञेश्वर, त्रिलोचन, वटेश्वर, प्रजापति, ईशान, सागर और कृपाराम;
  5. यज्ञेश्वर, 12) भगीरथ, कामेश्वर, सदानन्द और वशिष्ठ;
  6. भगीरथ, 13) मालाधर वसु-(उपाधि-गुणराज खाँन)। गुणराज खाँनके चौदह पुत्र थे, उनमेंसे दूसरे लक्ष्मीनाथवसुकी उपाधि-श्रीसत्यराज खाँन है; उन्हींके पुत्र-श्रीरामानन्द वसु हैं, इसलिये श्रीरामानन्द वसु-पन्द्रहवीं पीढ़ीके हैं। श्रीमालाधर वसु महाशय अतिप्रसिद्ध धनशाली व्यक्ति थे। उनके गढ़ और देवालय (मन्दिर) आदिका दर्शन करनेसे लगता है, उनकी राजश्री (अर्थात् राज्यकी धन-सम्पत्ति) अत्यन्त समृद्धिशाली थी। गुणराज खाँन महाशयके एक सामाजिक साहसका परिचय इस कार्यसे मिलता है। उन्होंने बलाल सेनसे कुल परम्पराके माध्यमसे चली आ रही प्रथाको सारहीन जानकर अपने पुत्र पुरन्दर खाँनके भी अनुरोधको अस्वीकार करके कान्यकुब्जसे आये श्रीपुरुषोत्तम दत्त-वंशीय तेरहवीं पीढ़ीके श्रीपति दत्त महाशयकी कन्याके साथ अपने ज्येष्ठ पुत्रके विवाहका कार्य सम्पन्न किया था।” (1292 बङ्ग-वर्षके (1886 ई.) शीतकालमें श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरके द्वारा श्रीकुलीनग्राम-पाटसे संगृहीत) ॥99॥ 14 |