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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ
४३४श्रीरामकृष्णवचनामृत५ जनवरी, १८८४

मणि हाथ जोड़े चुपचाप बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं - तुम जो कुछ सोच रहे हो, वह भी हो जायगा।

श्रीरामकृष्ण अब अपनी साधारण दशा में आ गये हैं। कमरे में राखाल और रामलाल बैठे हैं। रामलाल से उन्होंने गाने के लिए कहा। रामलाल ने दो गाने गाये।

श्रीरामकृष्ण - माँ और जननी। जो संसार के रूप में सर्वव्यापिनी हैं वे माँ हैं, और जो जन्मस्थान हैं वे जननी। माँ कहते ही मुझे समाधि हो जाती थी। - माँ कहते हुए मानो जगज्जननी को आकर्षित कर लेता था! जैसे धीवर जाल फेंकते हैं, फिर बड़ी देर बाद जाल खींचते रहते हैं। फिर उसमें बड़ी-बड़ी मछलियाँ आ जाती हैं।

गौरी पण्डित का कथन। काली और श्रीगौरांग एक हैं।

“गौरी ने कहा था, काली और श्रीगौरांग को एक समझने पर ज्ञान पक्का होगा। जो ब्रह्म हैं, वही शक्ति काली है, वही नर के स्वरूप में श्रीगौरांग हैं।”

श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर रामलाल ने फिर गाना शुरू किया। गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण ने मणि से कहा - “जो नित्य हैं, उन्हीं की लीला है - भक्तों के लिए। उन्हें जब नररूप में देख लेंगे तभी तो भक्त उन्हें प्यार कर सकेंगे? तभी तो उन्हें भाई, बहन, माँ, बाप और सन्तान की तरह प्यार कर सकेंगे? वे भक्तों की प्रीति के कारण छोटे होकर लीला करने के लिए आते हैं।”

□ □ □

परिच्छेद ७५

परिच्छेद ७५

ईश्वर-दर्शन के लिए व्याकुलता

(१)

दक्षिणेश्वर में राखाल, लाटू, मास्टर, महिमा आदि के साथ

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर-मन्दिर में अपने उसी कमरे में हैं। दिन के तीन बजे होंगे। आज शनिवार है, ता. २ फरवरी १८८४।

एक दिन श्रीरामकृष्ण भावावेश में झाऊतल्ले की ओर जा रहे थे। साथ में किसी के न रहने के कारण रेलिंग के पास गिर गये। इससे उनके बायें हाथकी हड्डी हट गयी और गहरी चोट आ गयी। मास्टर कलकत्ते से चोट में बाँधने का सामान लेने गये हैं।

श्रीयुत राखाल, महिमाचरण, हाजरा आदि भक्त कमरे में बैठे हैं। मास्टर ने आकर भूमिष्ठ हो श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, तुम्हें कौनसी बीमारी हुई थी? अब तो अच्छे हो न?

मास्टर – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – (महिमाचरण से) – क्यों जी, यहाँ का भाव है, 'तुम यन्त्री हो – मैं यन्त्र हूँ।' फिर भी इस तरह क्यों हुआ?

श्रीरामकृष्ण खाट पर बैठे हैं। महिमाचरण अपने तीर्थ-दर्शन की बातें कह रहे हैं। श्रीरामकृष्ण सुन रहे हैं। बारह वर्ष पहले का तीर्थ-दर्शन।

महिमाचरण – काशी, सिकरौल में एक बगीचे में मैंने एक ब्रह्मचारी देखा। उसने कहा, इस बगीचे में मैं बीस साल से हूँ। परन्तु किसका बगीचा है, वह नहीं जानता था। मुझसे पूछा, क्यों बाबू, नौकरी करते हो? मैंने कहा – नहीं। तब उसने कहा, तो क्या परिव्राजक हो?

"नर्मदा-तट पर एक साधू देखा था। अन्तर में गायत्री का जप कर रहे थे, शरीर पुलकायमान हो रहा था! और वे इस तरह प्रणव और गायत्री का उच्चारण कर रहे थे कि सुननेवालों को भी रोमांच हो रहा था।"

श्रीरामकृष्ण का बालकों का सा स्वभाव है – भूख लगी है; मास्टर से कह रहे हैं, "क्यों कुछ लाये हो?" राखाल को देखकर श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये।

४३६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ फरवरी, १८८४

समाधि छूट रही है। प्रकृतिस्थ होने के लिए श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - 'मैं जलेबी खाऊँगा', 'मैं जल पिऊँगा।'

बालस्वभाव श्रीरामकृष्ण जगन्माता से रोकर कह रहे हैं - 'ब्रह्ममयी! मुझे ऐसा क्यों कर दिया? मेरे हाथ में बड़ा दर्द हो रहा है!' (राखाल, महिमाचरण, हाजरा आदि के प्रति) - 'मेरा दर्द अच्छा हो जायगा?' भक्तगण, छोटे लड़के को जिस तरह लोग समझाते हैं, उसी तरह कहने लगे - 'अच्छा क्यों न होगा?'

श्रीरामकृष्ण - (राखाल से) - यद्यपि तू शरीर-रक्षा के लिए है, तथापि तेरा दोष नहीं, क्योंकि तू रहने पर भी रेलिंग तक तो जाता नहीं।

श्रीरामकृष्ण फिर भावाविष्ट हो गये। भावावेश में ही कह रहे हैं - 'ॐ, ॐ, ॐ, - माँ, मैं क्या कह रहा हूँ! माँ, मुझे ब्रह्मज्ञान देकर बेहोश न करना। मैं तेरा बच्चा जो हूँ! - डरता हूँ - मुझे माँ चाहिए। ब्रह्मज्ञान को मेरा कोटि कोटि नमस्कार! वह जिसे देना हो उसे दो। आनन्दमयी! - आनन्दमयी!'

श्रीरामकृष्ण उच्च स्वर से आनन्दमयी, आनन्दमयी कहकर रो रहे हैं और कह रहे हैं - 'इसीलिए तो मुझे दुःख है कि तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते, घर में चोरी हो जाय।'

श्रीरामकृष्ण फिर माँ से कह रहे हैं - 'माँ, मैंने क्या अन्याय किया है? - क्या मैं कुछ करता हूँ, माँ! तू ही तो सब कुछ करती है। मैं यन्त्र हूँ, तू यन्त्री। (राखाल के प्रति हँसते हुए) देखना, तू कहीं गिर न जाना, अभिमानवश स्वयं को कहीं ठगना नहीं।'

श्रीरामकृष्ण माँ से फिर कह रहे हैं - "माँ, चोट लग जाने से मैं रोता हूँ? - नहीं। मैं तो इसलिए रोता हूँ कि 'तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते, घर में चोरी हो।' "

(२)

ईश्वर को किस प्रकार पुकारना चाहिए। व्याकुल होओ।

श्रीरामकृष्ण बच्चे की तरह फिर हँस रहे हैं और बातचीत कर रहे हैं - जैसे बालक ज्यादा बीमार पड़ने पर भी कभी कभी हँसी-खेल की ओर चला जाता है। श्रीरामकृष्ण महिमा आदि भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - सच्चिदानन्द को प्राप्त नहीं किया तो कुछ न हुआ, भाई।

"विवेक और वैराग्य के सदृश और दूसरी चीज नहीं है।

"संसारियों का अनुराग क्षणिक है। तभी तक है जब तक तपे हुए तवे पर पानी रहता है! - कभी शायद एक फूल को देखकर कह दिया - अहा! ईश्वर की कैसी विचित्र सृष्टि है!

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“व्याकुलता चाहिए। जब लड़का सम्पत्ति का अपना हिस्सा अलग कर देने के लिए अपने माँ-बाप को परेशान करने लगता है तब माँ-बाप दोनों आपस में सलाह करके लड़के का हिस्सा तुरन्त दे देते हैं। व्याकुल होने से ईश्वर जरूर सुनेंगे। जब उन्होंने हमें पैदा किया है, तब सम्पत्ति में हमारा भी हिस्सा है। वे अपने बाप, अपनी माँ हैं – उन पर अपना जोर चल सकता है। हम उनसे कह सकते हैं, ‘मुझे दर्शन दो, नहीं तो गले में छुरी मार लूँगा'।”

किस तरह माँ को पुकारना चाहिए, श्रीरामकृष्ण बतला रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – मैं माँ को इस तरह पुकारता था – माँ आनन्दमयी, तुम्हें दर्शन देना होगा।

“फिर कभी कहता था – हे दीनानाथ! जगन्नाथ! मैं जगत् से अलग थोड़े ही हूँ? मैं ज्ञानहीन हूँ, भक्तिहीन हूँ, साधनहीन हूँ, मैं कुछ भी नहीं जानता – कृपा करके दर्शन देना होगा!”

श्रीरामकृष्ण अत्यन्त करुण स्वर में गाने के ढंग पर बतला रहे हैं, किस तरह उन्हें पुकारना चाहिए। वह करुण स्वर सुनकर भक्तों का हृदय द्रवीभूत हो रहा है, महिमाचरण की आँखों से धारा बह रही है।

महिमाचरण को देखकर श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं – “मन! जिस तरह पुकारना चाहिए, उसी तरह तुम पुकारो तो सही, फिर देखो, कैसे श्यामा रह सकती है!”

(३)

सदसद्-विचार

कुछ भक्त शिवपुर से आये हैं। वे लोग इतनी दूर से कष्ट उठाकर आये हैं, श्रीरामकृष्ण और अधिक चुप न रह सके। चुनी हुई बातें उनसे कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (शिवपुर के भक्तों से) – ईश्वर ही सत्य है, और सब अनित्य। बाबू और बगीचा। ईश्वर और उनका ऐश्वर्य। लोग बगीचा ही देख लेते हैं, पर बाबू को कितने लोग देखना चाहते हैं?

भक्त – अच्छा, फिर उपाय क्या है?

श्रीरामकृष्ण – सदसद्-विचार। वे ही सत्य हैं और सब अनित्य, इसका सर्वदा विचार करना, और व्याकुल होकर उन्हें पुकारना।

भक्त – जी, समय कहाँ है?

श्रीरामकृष्ण – जिन्हें समय है वे ध्यान-भजन करेंगे।

“जो लोग बिलकुल कुछ न कर सकें वे दोनों समय भक्तिपूर्वक दो बार प्रणाम करें। वे भी तो अन्तर्यामी हैं, वे समझते हैं कि ये क्या करते हैं। तुम्हें कितने ही काम हैं। तुम्हें

४३८श्रीरामकृष्णवचनामृत२ फरवरी, १८८४

पुकारने का समय नहीं, तो उन्हें आममुख्तारी दे दो; परन्तु अगर उन्हें पा न सके, उनके दर्शन न कर सके, तो कुछ न हुआ।”

एक भक्त – आपको देखना और ईश्वर को देखना बराबर है।

श्रीरामकृष्ण – यह बात अब फिर न कहो। गंगा की ही तरंग है, परन्तु तरंगों की गंगा नहीं। मैं इतना बड़ा आदमी हूँ, मैं अमुक हूँ – यह सब अहंकार बिना गये उन्हें कोई पा नहीं सकता। ‘मैं’ रूपी मेंड़ को भक्ति के आँसुओं से भिगोकर बराबर जमीन बना दो।

संसार क्यों है? भोग के अन्त में व्याकुलता तथा ईश्वरलाभ

भक्त – संसार में क्यों उन्होंने रखा है?

श्रीरामकृष्ण – सृष्टि के लिए रखा है, उनकी इच्छा। उनकी माया। कामिनी-कांचन देकर उन्होंने रखा है।

भक्त – क्यों भुलाकर रखा है? क्या उनकी यह इच्छा है?

श्रीरामकृष्ण – वे अगर ईश्वरीय आनन्द एक बार दे दें तो फिर कोई संसार में ही न रहे – फिर सृष्टि ही न चले!

“चावल की आढ़त में बड़ी-बड़ी गोदामों में चावल रहता है। चावल का पता कहीं चूहों को ना लग जाय इस डर से दूकानदार गोदाम के सामने एक ओर गुड़ मिलाकर लावे (खीलें) रख देता है। मीठा लगने से चूहे रात भर वही खाते रहते हैं। चावल की खोज के लिए उतावले होते ही नहीं।

“परन्तु देखो, सेर भर चावल के १४ सेर लावे होते हैं। कामिनी-कांचन के आनन्द से ईश्वर का आनन्द कितना अधिक है! उनके स्वरूप का चिन्तन करने से रम्भा और तिलोत्तमा का रूप चिता की भस्म के समान जान पड़ता है।”

भक्त – उन्हें पाने के लिए व्याकुलता क्यों नहीं होती?

श्रीरामकृष्ण – भोग का अन्त हुए बिना व्याकुलता नहीं होती। कामिनी-कांचन की भोग-वासना जितनी है, उनकी तृप्ति हुए बिना जगन्माता की याद नहीं आती। बच्चा जब खेल में लगा रहता है तब वह माँ को नहीं चाहता। खेल समाप्त हो जाने पर वह कहता है – अम्मा के पास जाऊँगा। हृदय का लड़का कबूतर लेकर खेल रहा था, ‘आ-ती-ती’ करके कबूतर को बुला रहा था। जब उसे खेल से तृप्ति हो गयी तब उसने रोना शुरू कर दिया। तब एक बिना पहचान के आदमी ने आकर कहा – ‘आ, तुझे तेरी माँ के पास ले चलूँ।’ वह उसी के कन्धे पर चढ़कर चला गया, अनायास ही।

“जो नित्य-सिद्ध है, उन्हे संसार में नहीं घुसना पड़ता। जन्म से ही उनकी भोग-वासना मिट गयी है।”

पाँच बजे का समय है। मधु डाक्टर आये हैं। श्रीरामकृष्ण के हाथ में पटरियाँ

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बाँधेंगे। श्रीरामकृष्ण बालक की तरह हँस रहे हैं और कहते हैं, ऐहिक और पारत्रिक के मधूसूदन!

मधु – (सहास्य) – केवल नाम का बोझ ढो रहा हूँ।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कोई नाम कम थोड़े ही है? उनमें और उनके नाम में कोई भेद नहीं है। सत्यभामा जब तुला पर स्वर्ण, मणि और मुक्ताएँ रखकर श्रीकृष्ण को तौल रही थीं तब वजन पूरा न हुआ। जब रुक्मिणी ने तुलसी पर कृष्ण-नाम लिखकर एक ओर रख दिया तब वजन पूरा उतरा।

अब डाक्टर पटरियाँ बाँधेंगे, जमीन पर बिस्तरा लगाया गया, श्रीरामकृष्ण हँसते हुए बिस्तरे पर आकर लेटे गाने के ढंग से कह रहे हैं – “'राधिका की यह दशम दशा है। वृन्दा कहती है, अभी न जाने क्या क्या होगा!'”

चारों ओर भक्तगण बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं – 'सब सखि मिलि बैठल सरोवर-कूले।' श्रीरामकृष्ण भी हँस रहे हैं और भक्तगण भी हँस रहे हैं। बैंडेज बाँधना समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं –

“कलकत्ते के डाक्टरों पर मेरा उतना विश्वास नहीं होता। शम्भू को विकार की अवस्था थी, डाक्टर (सर्वाधिकार) कहता था, यह कुछ नहीं है; दवा की नशा है! उसके बाद ही शम्भू की देह छूट गयी।”

(४)

मुख्य बात – अहैतुकी भक्ति। अपने स्वरूप को जानो।

सन्ध्या के पश्चात् श्रीमन्दिर में आरती हो गयी। कुछ देर बाद कलकत्ते से अधर आये। भूमिष्ठ हो उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। कमरे में महिमाचरण, राखाल और मास्टर हैं। हाजरा महाशय भी बीच-बीच में आते हैं।

अधर – आप कैसे हैं?

श्रीरामकृष्ण – (स्नेह-भरे शब्दों में) – यह देखो, हाथ में लगकर क्या हुआ है। (सहास्य) हैं और कैसे!

अधर जमीन पर भक्तों के साथ बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “तुम एक बार इस पर हाथ तो फेर दो।”

अधर छोटी खाट की उत्तर ओर बैठकर श्रीरामकृष्ण की चरण-सेवा कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर महिमाचरण से बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (महिमा के प्रति) – अहैतुकी भक्ति – तुम इसे अगर साध्य कर सको तो अच्छा हो।

“ 'मुक्ति, मान, रुपया, रोग अच्छा होना, कुछ नहीं चाहता, – मैं बस तुम्हें ही

४४०श्रीरामकृष्णवचनामृत२ फरवरी, १८८४

चाहता हूँ!’ इसे अहैतुकी भक्ति कहते हैं। बाबू के पास कितने ही लोग आते हैं – अनेक कामनाएँ करते हैं, परन्तु यदि कोई ऐसा आदमी आता है जो कुछ नहीं चाहता, और केवल प्यार करने के लिए ही बाबू के पास आता है तो बाबू भी उसे प्यार करते हैं।

“प्रह्लाद की भक्ति अहैतुकी है। ईश्वर पर उनका शुद्ध और निष्काम प्यार है।”

महिमाचरण चुपचाप सुन रहे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं।

“अच्छा, तुम्हारा भाव जैसा है उसी तरह की बातें कहता हूँ, सुनो –

(महिमा के प्रति) “वेदान्त के मत्त से अपने स्वरूप को पहचानना चाहिए, परन्तु अहं का बिना त्याग किये नहीं होता। अहं एक लाठी की तरह है – मानो पानी को उसने दो भागों में अलग कर रखा है। ‘मैं’ अलग और ‘तुम’ अलग।

“समाधि की अवस्था में इस अहं के चले जाने पर ब्रह्म की साक्षात् अनुभूति होती है।

“मैं महिमाचरण चक्रवर्ती हूँ, मैं विद्वान हूँ, इसी ‘मैं’ का त्याग करना होगा। विद्या के ‘मैं’ में दोष नहीं है। शंकराचार्य ने लोगों को शिक्षा देने के लिए विद्या का ‘मैं’ रखा था।

“स्त्रियों के सम्बन्ध में खूब सावधान रहे बिना ब्रह्मज्ञान नहीं होता इसीलिए गृहस्थी में उसकी प्राप्ति कठिन बात है। चाहे जितने बुद्धिमान क्यों न बनो, काजल की कोठरी में रहने से स्याही जरूर लग जायगी। युवतियों के साथ निष्काम मन में भी कामना की उत्पत्ति हो सकती है।

“परन्तु जो ज्ञान के पथ पर है उसके लिए अपनी पत्नी के साथ भोग कर लेना इतने दोष की बात नहीं – जैसे मल और मूत्र त्याग; वैसे ही यह भी – और जैसे शौच की बाद में हमें याद भी नहीं रहती।

“‘छेने की मिठाई कभी खा ही ली!’” महिमाचरण हँसते हैं।

संन्यासियों के कठिन नियम और श्रीरामकृष्ण

“संसारियों के लिए भोग उतने दोष की बात नहीं।

“पर संन्यासी के लिए इसमें बड़ा दोष है। संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। संन्यासी के लिए स्त्रीप्रसंग, थूककर चाटने के बराबर है।

“स्त्रियों के बीच में बैठकर संन्यासी को बातचीत न करनी चाहिए। चाहे स्त्री भक्त ही क्यों न हो, जितेन्द्रिय होने पर भी वार्तालाप न करना चाहिए।

“संन्यासी कामिनी-कांचन दोनों का त्याग करें – जैसे स्त्रियों का चित्र उन्हें न देखना चाहिए वैसे ही कांचन-रुपया भी न छूना चाहिए। रुपया पास रहने से भी बुराई है। हिसाब किताब, दुश्चिन्ता, रुपये का अहंकार, लोगों पर क्रोध आदि रुपया रहने से ही होता है। सूर्य दीख पड़ता था, बादलों ने आकर उसे घेर लिया।

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“इसीलिए तो मारवाड़ी ने जब हृदय के पास रुपये जमा करने की इच्छा प्रकट की, तब मैंने कहा, 'यह बात न होगी, रुपये पास रहने से ही बादल उठेंगे।'

“संन्यासी के लिए ऐसा कठोर नियम क्यों है? उसके मंगल के लिए भी है और लोगों की शिक्षा के लिए भी। संन्यासी यद्यपि स्वयं निर्लिप्त हो – जितेन्द्रिय हो, तथापि लोगों को शिक्षा देने के लिए उसे कामिनी-कांचन का इस तरह त्याग करना चाहिए।

“संन्यासी का सोलहों आना त्याग देखकर ही दूसरे लोगों को साहस होगा। तभी वे कामिनी-कांचन छोड़ने की चेष्टा करेंगे।

“त्याग की यह शिक्षा यदि संन्यासी न देगा तो कौन देगा?

“उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर संसार में रहा जा सकता है। जैसे मक्खन उठाकर पानी में डाल रखना। जनक ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर संसार में रहे थे।

“जनक दो तलवारें चलाते थे – ज्ञान की और कर्म की। संन्यासी कर्मों का त्याग करता है। इसलिए उसके पास एक ही तलवार है – ज्ञान की। जनक की तरह का ज्ञानी संसार-पेड़ के नीचे का फल भी खा सकता है और ऊपर का भी। साधु-सेवा, अतिथि-सत्कार, ये सब कर सकता है। मैंने माँ से कहा था, 'माँ, मैं सूखा साधु न होऊँगा।'

“ब्रह्मज्ञान-लाभ के पश्चात् खानपान का भी विचार नहीं रहता। ब्रह्मज्ञानी ऋषि ब्रह्मानन्द के बाद कुछ भी खा सकते थे – शूकरमांस तक।

चार आश्रम, योगतत्त्व और श्रीरामकृष्ण

(महिमाचरण से) “संक्षेप में योग दो प्रकार के हैं, कर्मों के द्वारा योग और मन के द्वारा योग।

“ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास – इनमें से प्रथम तीनों में कर्म करना पड़ता हैं। संन्यासी को दण्ड-कमण्डल और भिक्षापात्र लेने पड़ते हैं। संन्यासी चाहे कभी कभी नित्यकर्म कर ले, परन्तु उसके मन में कभी आसक्ति नहीं होती। उसे उन कर्मों का ज्ञान नहीं रहता। कोई कोई संन्यासी कुछ कुछ नित्यकर्म करते हैं, परन्तु वह होता है लोकशिक्षा के लिए। गृहस्थ अथवा दूसरे आदमी यदि निष्काम कर्म कर सकें तो उन कर्मों के द्वारा उनका ईश्वर से योग हो जाता है।

“परमहंस अवस्था में – जैसी शुकदेव आदि की थी – कर्म सब छूट जाते हैं; पूजा, जप, तर्पण, सन्ध्या, ये सब कर्म। इस अवस्था में केवल मन का योग होता है। बाहर के काम कभी कभी वह इच्छापूर्वक करता है – लोकशिक्षा के लिए। परन्तु वह सदा ही स्मरण और मनन किया करता है।”

४४२ श्रीरामकॄष्णवचनामृत २ फरवरी, १८८४

(५)

स्तवपाठ

बातचीत में रात के आठ बज गये। श्रीरामकृष्ण महिमाचरण को शास्त्रों से कुछ स्तव आदि सुनाने के लिए कह रहे हैं। महिमाचरण एक पुस्तक लेकर उत्तरगीता के आरम्भ में ही परब्रह्म सम्बन्धी जो श्लोक हैं वही सुनाने लगे – ‘यदेकं निष्कलं ब्रह्म व्योमातीतं निरंजनम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं विनाशोत्पत्तिवर्जितम्।’

फिर तृतीय अध्याय का सातवाँ श्लोक पढ़ते हैं – ‘अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्। प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्।’ अर्थात् ब्राह्मणों के देवता अग्नि हैं, मुनियों के देवता हृदय में हैं, स्वल्पबुद्धि मनुष्यों के लिए प्रतिमा ही देवता हैं और समदर्शी महायोगियों के लिए देवता सर्वत्र हैं।

‘सर्वत्र समदर्शिनाम्’ – इस अंश का उच्चारण होते ही श्रीरामकृष्ण एकाएक आसन छोड़कर खड़े हो गये और समाधिमग्न हो गये। हाथ में वही लकड़ी और बैण्डेज बँधा हुआ है। भक्तगण चुपचाप इस सर्वदर्शी महायोगी की अवस्था देख रहे हैं।

बड़ी देर तक इस तरह खड़े रहने के बाद श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हुए। फिर उन्होंने आसन ग्रहण किया। महिमाचरण को अब हरिभक्तिवाले श्लोक पढ़ने के लिए कह रहे हैं।

महिमाचरण – (‘नारदपंचरात्र’ से) –

“अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्।
नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्॥
आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्।
नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्॥
विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स।
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शङ्करं ज्ञानसिन्धुम्॥
लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम्।
भवनिगडनिबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च॥”

श्रीरामकृष्ण – अहा! अहा!

भाण्ड और ब्रह्माण्ड। तुम ही चिदानन्द, नाहं, नाहं

श्लोकों को सुनकर श्रीरामकृष्ण फिर भावावेश में आने लगे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने भाव रोका। अब यतिपंचक का पाठ हो रहा है –

२ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४४३

२ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४४३

“यस्यामिदं कल्पितमिन्द्रजालं।
चराचरं भाति मनोविलासम्॥
सच्चित्सुखैकं जगदात्मरूपं।
सा काशिकाहं निजबोधरूपः॥”

‘सा काशिकाहं निजबोधरूपः’ यह सुनते ही श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कह रहे हैं – जो कुछ भाण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है।

अब पाठ हो रहा है निर्वाणषट्कम् से –

“ॐ मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं,
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु,
श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥”

जितनी बार महिमाचरण कह रहे हैं – ‘चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्’, उतनी ही बार श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – नाहं, नाहं – तुम, तुम – चिदानन्द हो।

महिमाचरण जीवन्मुक्ति-गीता से कुछ श्लोक पढ़कर षट्चक्रवर्णन पढ़ रहे हैं। उन्होंने स्वयं काशी में योगी की योगावस्था में मृत्यु देखी थी, यह बात उन्होंने कही।

अब वे भूचरी और खेचरी मुद्रा का वर्णन कर रहे हैं। साथ ही शाम्भवी विद्या का भी। शाम्भवी यह कि मनुष्य जहाँ-तहाँ जाया करता है, उसका कोई उद्देश्य नहीं है।

महिमा – राम-गीता में बड़ी अच्छी अच्छी बातें हैं।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – तुम राम-गीता, राम-गीता कर रहे हो, तो तुम घोर वेदान्ती हो! साधु महात्मा यहाँ कितना पढ़ते थे।

महिमाचरण, प्रणव शब्द कैसा है, यही पढ़ रहे हैं – ‘तैलधारमविच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत्।’ फिर समाधि के लक्षण कह रहे हैं –

“ऊर्ध्वपूर्ण अधःपूर्ण मध्यपूर्ण यदात्मकम्।
सर्वपूर्ण स आत्मेति समाधिस्थस्य लक्षणम्॥”

अधर और महिमाचरण प्रणाम करके बिदा हुए।

(६)

श्रीरामकृष्ण की बालक जैसी अवस्था

दूसरे दिन रविवार है, ३ फरवरी १८८४। दोपहर के भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए हैं। कलकत्ते से राम, सुरेन्द्र आदि भक्त उनके चोट लगने का हाल पाकर चिन्तित हो, आये हैं। मास्टर भी पास बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण के हाथ में लकड़ी

४४४श्रीरामकृष्णवचनामृत२ फरवरी, १८८४

बँधी हुई है। भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (भक्तों से) - ऐसी अवस्था में माँ ने रखा है कि छिपाने की मजाल नहीं, बालक जैसी अवस्था।

"राखाल मेरी अवस्था नहीं समझता। कहीं कोई देखकर निन्दा न करे, इसलिए टूटे हाथ को कपड़े से छिपा देता है। मधु डाक्टर को अलग ले जाकर सब बातें कह रहा था। तब चिल्लाकर मैंने कहा, कहाँ हो मधूसूदन, देखो आकर मेरा हाथ टूट गया है।

"मथुर बाबू और उनकी पत्नी जिस घर में सोते थे, उसी में मैं भी सोता था। वे ठीक बच्चे के समान मेरी देखभाल करते थे। तब मेरी उन्माद-अवस्था थी। मथुर बाबू कहते थे, 'बाबा, क्या हम लोगों की कोई बातचीत तुम्हारे कान तक पहुँचती है?' मैं कहता था, 'हाँ पहुँचती है।'

"मथुर बाबू की पत्नी ने उन पर (मथुर बाबू पर) सन्देह करके कहा था, 'अगर कहीं जाना तो भट्टाचार्य महाशय को साथ ले जाना।' वे एक जगह गये, मुझे मकान में नीचे बैठा दिया। फिर आध घण्टे बाद आकर कहा, 'चलो बाबा, चलें, गाड़ी पर बैठो चलकर।' घर आकर उनकी पत्नी ने पूछा तो मैंने ठीक यही सब बातें सुना दीं। मैंने कहा, 'सुनो, एक मकान में हम लोग गये थे, उन्होंने मुझे नीचे बैठा दिया था, आप ऊपर गये थे, आध घण्टे के बाद आकर कहा, चलो बाबा, चलें!' उनकी पत्नी ने, इससे जो कुछ समझना था, समझ लिया।

"मथुर का एक हिस्सेदार यहाँ के पेड़ों के फल और गोभियाँ गाड़ी में लादकर घर भेज देता था। दूसरे हिस्सेदारों ने जब पूछा, तब मैंने यही बात बता दी।"

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परिच्छेद ५६

ईश्वर ही एक मात्र सत्य है।

(१)

दक्षिणेश्वर मन्दिर में राखाल, मास्टर, मणिलाल आदि के साथ

श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद कुछ विश्राम कर रहे हैं। जमीन पर मणि मल्लिक बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण के हाथ में अब भी तख्ती बँधी हुई है। मास्टर आकर प्रणाम करके जमीन पर बैठ गये। आज रविवार है, दि. २४ फरवरी १८८४।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – किस तरह आये?

मास्टर – जी, आलमबाजार तक किराये की गाड़ी पर आया, वहाँ से पैदल।

मणिलाल – ओह! बिलकुल पसीने-पसीने हो गये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इसलिए सोचता हूँ कि मेरे सब अनुभव सिर्फ मस्तिष्क के ही खयाल नहीं हैं; नहीं तो ये सब इतने 'इंग्लिशमैन' (अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग) इतनी तकलीफ करके क्यों आते हैं!

श्रीरामकृष्ण अपने स्वास्थ के बारे में बोल रहे हैं, हाथ टूटने की बात हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – मैं इसके लिए कभी कभी अधीर हो जाता हूँ। – इसे दिखाता हूँ, फिर उसे दिखाता हूँ, और पूछता हूँ, क्यों जी, क्या यह अच्छा हो जायगा?

“राखाल चिढ़ता है, मेरी अवस्था समझता तो है नहीं। कभी कभी दिल में आता है, यहाँ से जाय, तो चला जाय – परन्तु फिर माँ से कहता हूँ, माँ कहाँ जायगा? – कहाँ जलने-मरने जाय?

“मेरी बालक जैसी अधीर अवस्था आज नयी थोड़े ही है? मथुर बाबू को नाड़ी दिखाता था, पूछता, क्यों जी, मुझे कोई बीमारी हो गयी है?

“अच्छा, तो फिर ईश्वर पर निष्ठा कहाँ रही? जब मैं उस देश को* जा रहा था, तब बैलगाड़ी के पास डाकुओं की तरह लाठी लिये हुए कुछ आदमी आये। मैं देवताओं के नाम लेने लगा। परन्तु कभी कहता था राम राम, कभी दुर्गा दुर्गा, कभी ॐ तत् सत् –


* उनकी जन्मभूमि कामारपुकुर को

४४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ फरवरी, १८८४

इसलिए कि किसी के नाम का असर तो इन डाकुओं पर पड़ेगा ही! (मास्टर से) “अच्छा, मुझमें इतनी अधीरता क्यों है?” मास्टर – आप सदा ही समाधिस्थ हैं। भक्तों के लिए सिर्फ थोड़ासा मन शरीर पर रखा है। इसीलिए शरीर-रक्षा के निमित्त कभी कभी अधीर होते हैं। श्रीरामकृष्ण – हाँ; थोड़ा-सा मन शरीर पर है। भक्ति और भक्तों को लेकर रहने के लिए।

मणिलाल मल्लिक प्रदर्शनी की बात कह रहे हैं। यशोदा कृष्ण को गोद में लिये हैं – बड़ी सुन्दर मूर्ति है, यह सुनकर श्रीरामकृष्ण की आँखों में आँसू आ गये! उस वात्सल्यरस की प्रतिमा यशोदा की बात सुनकर श्रीरामकृष्ण की उद्दीपना होने लगी, रो रहे हैं। मणिलाल – आपका जी अच्छा नहीं, नहीं तो आप भी एक बार जाकर देख आते – किले के मैदान की प्रदर्शनी। श्रीरामकृष्ण – (मास्टर आदि से) – मैं जाऊँ तो भी सब कुछ मुझे देखने को न मिलेगा। कोई एक चीज देखने ही से बेहोश हो जाऊँगा – और चीजें फिर देखने को रह जायेंगी। चिड़ियाखाना दिखाने के लिए ले गये थे। सिंह देखकर ही समाधि हो गयी। ईश्वरी भगवती के वाहन को देखकर ईश्वरी उद्दीपना हुई। तब फिर दूसरे जानवरों को कौन देखता है, सिंह देखकर ही लौट आया। इसलिए यदु मल्लिक की माँ ने एक बार कहा था, इनको प्रदर्शनी ले चलो, – फिर उसने कहा, नहीं रहने दो। मणि मल्लिक पुराने ब्राह्मसमाजी हैं। उम्र पैंसठ की होगी। श्रीरामकृष्ण उन्हींके भावों में बातचीत करते हुए, उपदेश दे रहे हैं। श्रीरामकृष्ण – जयनारायण पण्डित बड़ा उदार था। जाकर मैंने देखा, उसका भाव बड़ा अच्छा है। लड़के बूट पहने हुए थे। उसने खुद कहा, मैं काशी जाऊँगा। जो कुछ कहा, अन्त में वही किया। काशी में रहा और उसकी देह भी वहीं छूटी। “उम्र होने पर इस तरह चले जाकर ईश्वर-चिन्तन करना अच्छा है, क्यों?” मणिलाल – जी हाँ। संसार की अड़चनों से जी ऊब जाता है। श्रीरामकृष्ण – गौरी फूलदल देकर अपनी स्त्री की पूजा करता था। सभी स्त्रियाँ भगवती की एक एक मूर्ति हैं। (मणिलाल से) “अपनी वह बात जरा इन लोगों से भी तो कहो।” मणिलाल – (सहास्य) – नाव पर चढ़कर कुछ लोग गंगा पार कर रहे थे। उनमें एक पण्डित अपनी विद्या का खूब परिचय दे रहा था। ‘मैंने अनेक शास्त्र पढ़े हैं – वेद – वेदान्त – षड्दर्शन।’ एक से उसने पूछा, ‘वेदान्त क्या है, जानते हो?’ उसने कहा, ‘जी नहीं’। ‘फिर तुम सांख्य-पतञ्जलि जानते हो?’ उसने कहा – ‘जी नहीं’। ‘दर्शन आदि कुछ

२४ फरवरी १८८४ परिच्छेद ७६ ४४७

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भी नहीं पढ़ा?' 'जी नहीं।'

"पण्डितजी बड़े गर्व से बातचीत कर रहे हैं, दूसरा चुपचाप बैठा है कि इतने में जोरों की आँधी आयी – नाव डूबने लगी। उस आदमी ने पूछा, 'पण्डितजी, आप तैरना जानते हैं?' पण्डितजी ने कहा, 'नहीं।' उसने कहा, मैंने दर्शन-फर्शन तो नहीं पढ़ा पर तैरना जानता हूँ!' "

ईश्वर ही वस्तु और सब अवस्तु। लक्ष्य-भेद

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अनेकानेक शास्त्रों के ज्ञान से क्या होगा? भवनदी किस तरह पार की जाती है, यही जानना आवश्यक है। ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु।

"लक्ष्य-भेद के समय द्रोणाचार्य ने अर्जुन से पूछा था, 'तुम क्या देख रहे हो? – क्या तुम इन राजाओं को देख रहे हो?' अर्जुन ने कहा – 'नहीं।' 'मुझे देख रहे हो?' 'नहीं।' 'पेड़ देख रहे हो?' 'नहीं।' 'पेड़ पर पक्षी देख रहे हो?' 'नहीं।' 'तो क्या देख रहे हो?' 'बस पक्षी की आँख, जिसे भेदना है।'

"जो केवल पक्षी की आँख देखता है, वही लक्ष्य-भेद कर सकता है।

"जो देखता है, ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु हैं, वही चतुर है। अन्य खबरों से हमें क्या काम है? हनुमान ने कहा था, 'मैं तिथि और नक्षत्र, यह सब कुछ नहीं जानता। मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया करता हूँ।'

(मास्टर से) "यहाँ के लिए पंखे मोल ले दो।

(मणिलाल से) "ए जी, तुम एक बार इनके (मास्टर के) बाप के पास जाना। भक्त को देखकर उद्दीपना होगी।"

(२)

मणिलाल आदि को उपदेश। नरलीला

श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हैं। मणिलाल आदि भक्तगण जमीन पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण की मधुर बातें सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – "इस हाथ के टूटने के बाद से एक बड़ी विचित्र अवस्था हो रही है। केवल नर-लीला अच्छी लगती है।

"नित्य और लीला। नित्य – अर्थात् वही अखण्ड सच्चिदानन्द।

"लीला – ईश्वर-लीला, देव-लीला, नर-लीला, संसार-लीला।

"वैष्णवचरण कहता था कि नर-लीला पर विश्वास होने से पूर्ण ज्ञान हो जाता है। तब उसकी बात मैं न सुनता था। अब देखता हूँ, ठीक है। वैष्णवचरण मनुष्य की तस्वीरें देखकर जिनमें कोमल भाव, प्रेम-भाव पाता था, उन्हें पसन्द करता था।

४४८श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ फरवरी, १८८४

(मणि से) “ईश्वर ही मनुष्य बनकर लीला कर रहे हैं – वे ही मणि मल्लिक हुए हैं। सिक्ख लोग शिक्षा देते हैं कि तू ही सच्चिदानन्द है। कभी कभी मनुष्य अपने सत्य स्वरूप की झलक पा जाता है और आश्चर्य से चकित हो निर्वाक् रह जाता है। ऐसे समय में वह आनन्द-समुद्र में तैरने लगता है। एकाएक आत्मियों को देखकर जैसा होता है। (मास्टर से) उसी दिन गाड़ी पर आते हुए बाबूराम को देखकर जैसा हुआ था। शिव, जब अपना स्वरूप देखते हैं, तब ‘मैं क्या हूँ’ कहकर नृत्य करते हैं।

“अध्यात्म-रामायण में वही बात है। नारद कहते हैं, हे राम, जितने पुरुष हैं, सब तुम हो और जितनी स्त्रियाँ हैं, सब सीता।

“रामलीला में जिन जिन लोगों ने भाग लिया था उन्हें देखकर मुझे यही जान पड़ा कि इन सब रूपों में एकमात्र नारायण की ही सत्ता है। असल और नकल दोनों बराबर जान पड़े।

“कुमारी पूजा क्यों करते हैं? सब स्त्रियाँ भगवती की एक-एक मूर्ति हैं। शुद्धात्मा कुमारी में भगवती का अधिक प्रकाश है!

(मास्टर से) “तकलीफ होने पर क्यों मैं अधीर हो जाता हूँ? मुझे बच्चे के स्वभाव में रखा है। बालक का सब अवलम्ब माँ पर है।

“दासी का लड़का बाबू के लड़के से लड़ाई करते समय कहता है, ‘मैं अपनी माँ से कह दूँगा!’

“राधाबाजार में मुझे फोटो उतरवाने के लिए ले गये थे। उस दिन राजेन्द्र मित्र के घर जाने की बात थी। सुना था, केशव सेन और दूसरे लोग भी जायेंगे। कुछ बातें कहने के लिए सोच रखी थीं। राधाबाजार जाकर सब भूल गया। तब मैंने कहा, माँ, तू कहेगी! – मैं भला क्या कहूँगा!

“मेरा ज्ञानियों जैसा स्वभाव नहीं है। ज्ञानी अपने को बड़ा देखता है, कहता है, मुझे फिर रोग कैसे?

“कुँवरसिंह ने कहा, ‘आप अब भी देह की चिन्ता में रहते हैं।’

“मेरा यह स्वभाव है – मेरी माँ सब जानती हैं। राजेन्द्र मित्र के यहाँ वे ही (माँ) बातचीत करेंगी। वही बात बात है। सरस्वती के ज्ञान की एक किरण से एक हजार पण्डित दाँत में उँगली दबा लेते हैं।

“भक्त की अवस्था में – विज्ञानी की अवस्था में मुझे रखा है; इसीलिए राखाल आदि से मजाक किया करता हूँ। ज्ञानी की अवस्था में रखने से यह बात न होती!

“इस अवस्था में देखता हूँ, माँ ही सब कुछ हुई हैं! सब जगह उन्हीं को देखता हूँ।

“काली-मण्डप में देखा, दुष्ट मनुष्य में भी एवं भागवत पण्डित के भाई में भी माँ का ही प्रकाश है।

२४ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७६ | ४४९

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“रामलाल की माँ को डाटने के लिए गया तो सही, पर फिर हो न सका। देखा उन्हीं का एक रूप है। माँ को कुमारी के भीतर देखता हूँ, इसलिए कुमारी-पूजन करता हूँ।

“मेरी स्त्री पैरों पर हाथ फेरती है, फिर मैं उसे नमस्कार करता हूँ।

“तुम लोग मेरे पैर छूकर नमस्कार करते हो, – हृदय अगर रहता तो किसकी मजाल थी, जो पैरों में हाथ लगाता! – वह किसी को पैर छूने ही न देता!

“इस अवस्था में रखा है, इसीलिए नमस्कार के बदले नमस्कार करना पड़ता है।

“देखो, दुष्ट आदमी तक को अलग करने की जगह नहीं है। तुलसी सूखी हो, छोटी हो, श्रीठाकुरजी की सेवा में लग ही जाती है।”

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परिच्छेद ७७

परिच्छेद ७७

गृहस्थ तथा संन्यासियों के नियम

(१)

दक्षिणेश्वर मन्दिर में नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ

“श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर में, अपनी उसी छोटी खाट पर बैठे हुए गाना सुन रहे हैं। ब्राह्मसमाज के श्री त्रैलोक्य सान्याल गा रहे हैं। आज रविवार है, २ मार्च १८८४। जमीन पर भक्तगण बैठे हुए गाना सुन रहे हैं। – नरेन्द्र, सुरेन्द्र मित्र, मास्टर, त्रैलोक्य आदि कितने ही भक्त बैठे हैं।

श्रीयुत नरेन्द्र के पिता-बड़ी अदालत के वकील थे। उनका देहान्त हो जाने पर उनके परिवार को इस समय बड़ी तकलीफ है, यहाँ तक कि कभी-कभी फाका भी करना पड़ता है।

श्रीरामकृष्ण का शरीर, जब से हाथ टूटा, अब तक अच्छा नहीं हुआ। हाथ में बहुत दिनों तक तख्ती बँधी थी।

त्रैलोक्य माता का संगीत गा रहे हैं। गाते हुए, कह रहे हैं, माँ, अपनी गोदी में लेकर, आँचल से ढककर मुझे अपनी छाती से लगा रखो।

(संगीत का भाव)

“माँ, मैं तेरे हृदय में छिपा रहूँगा। तेरे मुँह की ओर ताकताककर, माँ-माँ कहकर पुकारूँगा। चिदानन्द-रस में डूबकर महायोग की निद्रा के आवेश में निर्निमेष नयनों से, तेरी दृष्टि पर दृष्टि जमाये हुए, तेरा रूप देखूँ। संसार का तमाशा देखकर और सुनकर भय से हृदय काँप उठता है। मुझे अपने स्नेह के आँचल से ढककर तुम हृदय से लगा लो, फिर कभी अलग न करना।”

गाना सुनते हुए श्रीरामकृष्ण की आँखों से प्रेम के आँसू टपक रहे हैं। भाव में गद्गद कण्ठ से कह रहे हैं – अहा! कैसा भाव है!

त्रैलोक्य फिर गा रहे हैं – (भाव)

(१) “हरे! तुम अपने भक्तों की लाज रखनेवाले हो। तुम मेरी मनोकामना पूर्ण करो। ऐ ईश्वर! तुम भक्तों के सम्मान हो। बिना तुम्हारे और कौन रक्षा कर सकता है?

२ मार्च १८८४ | परिच्छेद ७७ | ४५१

२ मार्च १८८४परिच्छेद ७७४५१

प्राणपति, प्राणाधार तुम्हीं हो। मैं तो तुम्हारा गुलाम हूँ।”

(२) “तुम्हारे चरणों को सार समझकर, जाति-पाँति का विचार छोड़ लाज और भय को भी मैंने तिलांजलि दे दी। अब रास्ते का बटोही होकर मैं कहाँ जाऊँ? अब तो तुम्हारे लिए मैं कलंक-भागी हो चुका; तुम्हें मैं प्यार करता हूँ, इसलिए लोग मेरी कितनी निन्दा करते हैं। अब मेरी शर्म और भ्रम सब तुम्हारा ही है। चाहे तुम मेरी रक्षा करो और चाहे न करो, उत्तरदायित्व और भार तुम्हीं पर है। परन्तु यह सोच लेना कि दास का मान तुम्हारा ही मान है। तुम मेरे हृदय के स्वामी हो, तुम्हारे ही मान से मेरा भी मान है, अतएव जैसी तुम्हारी रुचि हो, वही करो।”

(३) “घर से बाहर निकालकर अगर तुमने मुझे अपने प्रेम में फँसाया है तो मुझे अपने श्रीचरणों में जगह भी तो दो। ऐ प्राणप्यारे, सदा ही मुझे अपना प्रेममधु पिलाते रहो। जो तुम्हारे प्रेम का दास है, उसका परित्राण करो।”

श्रीरामकृष्ण की आँखों से प्रेम की धारा बह रही है। वे जमीन पर आकर बैठे और रामप्रसाद के भावों में गाने लगे –

“यश, अपयश, कुरस, सुरस सब तुम्हारे ही रस हैं। माँ, रसेश्वरि! रस में रहकर रसभंग क्यों करती हो?”

त्रैलोक्य से कह रहे हैं – ‘अहा! तुम्हारे गाने कैसे हैं! तुम्हारे गाने बहुत ठीक हैं। केवल वही जो समुद्र को गया है, वहाँ का जल ला सकता है।’ त्रैलोक्य फिर गाते हैं –

“हरि, तुम्हीं नाचते हो, तुम्हीं गाते हो और तुम्हीं ताल ताल पर हथेली बजाते हो। मनुष्य तो एक पुतला मात्र है, वृथा ही वह ‘मेरा मेरा’ कहता है। जैसे कठपुतली के खिलौने हैं, वैसा ही जीवों का जीवन भी है। मनुष्य यदि तुम्हारे रास्ते पर चलता है, तो वह देवता बन जाता है। देहयन्त्र में यन्त्रीस्वरूप तुम्हीं हो, आत्म-रथ में तुम्हीं रथी हो, जीव तो अपनी स्वाधीनता के फल से केवल पापों का भोग करता है। तुम सब के मूलाधार हो, तुम प्राणों के प्राण और हृदय के स्वामी हो, तुम अपने पुण्य के बल से असाधु को भी साधु बना देते हो।” गाना समाप्त हुआ। श्रीरामकृष्ण अब बातचीत कर रहे हैं।

नित्यलीला योग। पूर्ण ज्ञान अथवा विज्ञान

श्रीरामकृष्ण – (त्रैलोक्य और दूसरे भक्तों से) – हरि ही सेव्य हैं और हरि ही सेवक हैं – यह भाव पूर्ण ज्ञान का लक्षण है। पहले नेति-नेति करने पर, ईश्वर ही सत्य हैं और सब मिथ्या है, यह बोध होता है। इसके बाद वह देखता है, ईश्वर ही सब कुछ हुए हैं – ईश्वर ही माया, जीव, जगत्, यह सब हुए हैं। अनुलोम हो जाने पर फिर विलोम होता है। यह पुराणों का मत है। जैसे एक बेल में गूदा, बीज और खोपड़ा है। खोपड़ा और बीज निकाल देने पर गूदा रह जाता है; परन्तु बेल का वजन कितना था, यह जानने की

४५२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ मार्च, १८८४

अगर इच्छा हुई तो खोपड़ा और बीज के निकाल देने से काम न बनेगा। इसी तरह जीव-जगत् को छोड़कर पहले सच्चिदानन्द में जाया जाता है। फिर उन्हें प्राप्त कर लेने पर मनुष्य देखता है, यह सब जीव-जगत् भी वे ही हुए हैं। जिस वस्तु का गूदा है, उसका खोपड़ा और बीज भी है, जैसे मट्ठे का मक्खन और मक्खन का मट्ठा।

“परन्तु कोई-कोई कह सकते हैं कि सच्चिदानन्द इतने कड़े क्यों हो गये - इस पृथ्वी को दबाने से वह बड़ी कठिन जान पड़ती है। इसका उत्तर यह है कि शोणित और शुक्र तो इतना तरल पदार्थ है, परन्तु उन्हीं से इतने मनुष्य, बड़े-बड़े जीव तैयार हो रहे हैं! ईश्वर से सब कुछ हो सकता है। एक बार अखण्ड सच्चिदानन्द तक पहुँचकर फिर वहाँ से उतरकर यह सब देखो।”

संसार और ईश्वर। योगी और भक्त में भेद

“वे ही सब कुछ हुए हैं। संसार उनसे अलग नहीं है। गुरु के पास वेद पढ़कर श्रीरामचंद्र को वैराग्य हो गया। उन्होंने कहा, संसार अगर स्वप्नवत् है तो इसका त्याग करना ही उचित है। इससे दशरथ डरे। उन्होंने राम को समझाने के लिए गुरु वशिष्ठ को भेज दिया। वशिष्ठ ने कहा, 'राम, हमने सुना है - तुम संसार छोड़ना चाहते हो। तुम हमें समझा दो कि संसार ईश्वर से अलग एक वस्तु है। यदि तुम समझा सको कि ईश्वर से संसार नहीं हुआ तो तुम इसे छोड़ सकते हो।' राम तब चुप हो रहे, कोई उत्तर न दे सके।

“सब तत्त्व अन्त में आकाश-तत्त्व में लीन हो जाते हैं। सृष्टि के समय आकाश-तत्त्व से महत्-तत्त्व, महत्-तत्त्व से अहंकार, ये सब क्रमशः तैयार हुए हैं। अनुलोम और विलोम। भक्त इन सब को मानते हैं। भक्त अखण्ड सच्चिदानन्द को भी मानते हैं और जीव-जगत् को भी।

“परन्तु योगी का मार्ग अलग है। वह परमात्मा में पहुँचकर फिर वहाँ से नहीं लौटता! उसी परमात्मा से युक्त हो जाता है।

“थोड़े के भीतर जो ईश्वर को देखता है, उसे खण्ड ज्ञानी कहते हैं। वह सोचता है, उसके परे और उनकी सत्ता नहीं है।

“भक्त तीन श्रेणी के होते हैं। अधम, मध्यम और उत्तम। अधम भक्त कहता है, वे हैं ईश्वर, और ऐसा कहकर आकाश की ओर उँगली उठा देता है। मध्यम भक्त कहता है, वे हृदय में अन्तर्यामी के रूप में विराजमान हैं। उत्तम भक्त कहता है वे ही यह सब हुए हैं, - जो कुछ मैं देख रहा हूँ, सब उन्हीं के एक-एक रूप हैं। नरेन्द्र पहले मजाक करके कहता था, अगर वे ही सब कुछ हुए हैं तो ईश्वर लोटा भी है और थाली भी। (सब हँसते हैं)

२ मार्च १८८४ | परिच्छेद ७७ | ४५३

२ मार्च १८८४परिच्छेद ७७४५३

ईश्वरदर्शन और कर्मत्याग। विराट् शिव।

“परन्तु उनके दर्शन होने पर सब संशय दूर हो जाते हैं। सुनना एक बात है और देखना दूसरी बात। सुनने से सोलहों आना विश्वास नहीं होता। साक्षात्कार हो जाने पर फिर विश्वास में कुछ बाकी नहीं रह जाता।

“ईश्वर-दर्शन करने पर कर्मों का त्याग हो जाता है। इसी तरह मेरी पूजा बन्द हो गयी। काली-मन्दिर में पूजा करता था, एकाएक माँ ने दिखाया, सब चिन्मय है – पूजा की चीजें, वेदी – मन्दिर की चौखट – सब चिन्मय है। मनुष्य, जीव, वस्तु, सब चिन्मय है। तब पागल की तरह चारों ओर फूल फेंकने लगा! जो कुछ दृष्टि में आता, उसी की पूजा करने लगा!

“एक दिन पूजा करते समय शिवजी के मस्तक पर चन्दन लगा रहा था, उसी समय दिखलाया, यह विराट् मूर्ति – यह विश्व ही शिव है। तब शिव-लिंग तैयार करके पूजा करना बन्द हो गया। मैं फूल तोड़ रहा था, उसी समय मुझे दिखलाया – फूल के पेड़ फूल के एक एक गुच्छे हैं।”

काव्यरस और ईश्वर-दर्शन में भेद

त्रैलोक्य – अहा! ईश्वर की रचना कैसी सुन्दर है!

श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, आँखों के आगे पेड़ एकाएक फूल के गुच्छे बन गये – यह कुछ मेरा केवल मानसिक भाव ही नहीं था। दिखा दिया, एक एक फूल का पेड़ एक एक गुच्छा है और उस विराट् मूर्ति के सिर पर शोभायमान हो रहा है। उसी दिन से फूल तोड़ना बन्द हो गया। आदमी को भी मैं उसी रूप में देखता हूँ। मानो वेही मनुष्य के आकार में झूम-झूमकर टहल रहे हैं। मानो तरंग पर एक तकिया बह रहा है – इधर उधर हिलता हुआ चला जा रहा है, लहर के लगने पर कभी कभी ऊँचा चढ़ जाता है और फिर लहर के साथ नीचे आ जाता है।

“शरीर दो दिन के लिए है। वही ईश्वर सत्य है। शरीर तो अभी अभी है, अभी अभी नहीं। बहुत दिन हुए, जब पेट की बीमारी से बड़ी तकलीफ मिल रही थी, हृदय ने कहा, माँ से एक बार कहते क्यों नहीं जिससे अच्छे हो जाओ! रोग के लिए मुझे कहते हुए बड़ी लज्जा लगी। मैंने कहा, माँ! सोसायटी (Asiatic Society) में मैंने आदमी का अस्थिपंजर (Skeleton) देखा था, तारों से जोड़कर आदमी के आकार का बनाया गया था, माँ, बस केवल उतना ही इस शरीर को रहने दो, अधिक मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हारा नाम लेता रहूँ – तुम्हारे गुण कीर्तन करता रहूँ, उतनी ही इच्छा है।

“बचने की इच्छा क्यों है? जब रावण मारा गया तब राम और लक्ष्मण लङ्का के भीतर गये। जहाँ रावण रहता था, वहाँ जाकर देखा, उन्हें देख रावण की माँ निकषा भाग