श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
मार्च, १८८२ | परिच्छेद १ | ५
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“क्यों जी, क्या कोई कुक साहब आया है? सुना वह लेक्चर (व्याख्यान) देता है। मुझे केशव जहाज पर चढ़ाकर ले गया था। कुक साहब भी साथ था।”
मास्टर – जी हाँ, ऐसा ही कुछ मैंने भी सुना था। परन्तु मैंने उनका लेक्चर नहीं सुना। उनके विषय में ज्यादा कुछ मैं नहीं जानता।
गृहस्थ तथा पिता का कर्तव्य
श्रीरामकृष्ण – प्रताप का भाई आया था। कुछ दिन यहाँ रहा। काम-काज कुछ है नहीं। कहता है, मैं यहाँ रहूँगा। सुनते हैं, जोरूजाता सब को ससुराल भेज दिया है। कच्चे-बच्चे कई हैं। मैंने खूब डाँटा। भला देखो तो, लड़के-बच्चे हुए हैं, उनकी देख-रेख, उनका पालपोष तुम न करोगे तो क्या कोई गाँववाला करेगा? शर्म नहीं आती, बीवी-बच्चों को ससुर के यहाँ रख दिया है, उन्हें कोई और पाल रहा है। बहुत डाँटा और काम-काज खोज लेने को कहा, तब यहाँ से गया।
(२)
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
मास्टर का तिरस्कार तथा उनका अहंकार चूर्ण करना
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्या तुम्हारा विवाह हो गया है?
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण (चौंककर) – अरे रामलाल, अरे अपना विवाह तो इसने कर डाला। रामलाल श्रीरामकृष्ण के भतीजे और कालीजी के पुजारी हैं। मास्टर घोर अपराधी जैसे सिर नीचा किए चुपचाप बैठे रहे। सोचने लगे, विवाह करना क्या इतना बड़ा अपराध है?
श्रीरामकृष्ण ने फिर पूछा – “क्या तुम्हारे लड़के-बच्चे भी हैं?”
मास्टर का कलेजा काँप उठा। डरते हुए बोले – “जी हाँ, लड़के-बच्चे हुए हैं।”
श्रीरामकृष्ण ने फिर दुःख के साथ कहा – “अरे लड़के भी हो गए!”
इस तरह तिरस्कृत होकर मास्टर चुपचाप बैठे रहे। उनका अहंकार चूर्ण होने लगा। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण सस्नेह कहने लगे, “देखो, तुम्हारे लक्षण अच्छे हैं, यह सब मैं किसी के कपाल, आँखें आदि को देखते ही जान लेता हूँ। अच्छा, तुम्हारी स्त्री कैसी है? विद्या-शक्ति है या अविद्या-शक्ति?
ज्ञान क्या है?
मास्टर – जी अच्छी है, पर अज्ञान है।
श्रीरामकृष्ण (अप्रसन्न होकर) – और तुम ज्ञानी हो?
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६ श्रीरामकृष्णवचनामृत मार्च, १८८२
मास्टर नहीं जानते, ज्ञान किसे कहते हैं और अज्ञान किसे। अभी तो उनकी धारणा यही है कि कोई लिख-पढ़ ले तो मानो ज्ञानी हो गया। उनका यह भ्रम दूर तब हुआ जब उन्होंने सुना कि ईश्वर को जान लेना ज्ञान है और न जानना अज्ञान। श्रीरामकृष्ण की इस बात से कि ‘तुम ज्ञानी हो’ मास्टर के अहंकार पर फिर धक्का लगा।
मूर्तिपूजा
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हारा विश्वास ‘साकार’ पर है या ‘निराकार’ पर?
मास्टर मन ही मन सोचने लगे, ‘यदि साकार पर विश्वास हो तो क्या निराकार पर भी विश्वास हो सकता है? ईश्वर निराकार है – यदि ऐसा विश्वास हो तो ईश्वर साकार है ऐसा भी विश्वास कभी हो सकता है? ये दोनों विरोधी भाव किस प्रकार सत्य हो सकते हैं? सफेद दूध क्या कभी काला हो सकता है?’
मास्टर – निराकार मुझे अधिक पसन्द है।
श्रीरामकृष्ण – अच्छी बात है। किसी एक पर विश्वास रखने से काम हो जायगा। निराकार पर विश्वास करते हो, अच्छा है। पर यह न कहना कि यही सत्य है, और सब झूठ। यह समझना कि निरकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है। जिस पर तुम्हारा विश्वास हो उसी को पकड़े रहो।
दोनों सत्य हैं, यह सुनकर मास्टर चकित हो गए। यह बात उनके किताबी ज्ञान में तो थी ही नहीं! तीसरी बार धक्का खाकर उनका अहंकार चूर्ण हुआ, पर अभी कुछ रह गया था; इसलिए फिर वे तर्क करने को आगे बढ़े।
मास्टर – अच्छा, वे साकार हैं, यह विश्वास मानो हुआ। पर मिट्टी की या पत्थर की मूर्ति तो वे हैं नहीं।
श्रीरामकृष्ण – मिट्टी की मूर्ति वे क्यों होने लगे? पत्थर या मिट्टी नहीं, चिन्मयी मूर्ति।
चिन्मयी मूर्ति, यह बात मास्टर न समझ सके। उन्होंने कहा – “अच्छा, जो मिट्टी की मूर्ति पूजते हैं, उन्हें समझाना भी तो चाहिए कि मिट्टी की मूर्ति ईश्वर नहीं है और मूर्ति के सामने ईश्वर की ही पूजा करना ठीक है, किन्तु मूर्ति की नहीं!”
लेक्चर तथा श्रीरामकृष्ण
श्रीरामकृष्ण (अप्रसन्न होकर) – तुम्हारे कलकत्ते के आदमियों में यही एक धुन सवार है, – सिर्फ लेक्चर देना और दूसरों को समझाना! अपने को कौन समझाए, इसका ठिकाना नहीं। अजी समझानेवाले तुम हो कौन? जिनका संसार है वे समझाएँगे। जिन्होंने सृष्टि रची है, सूर्य-चन्द्र, मनुष्य, जीव-जन्तु बनाए हैं, जीव-जन्तुओं के भोजन के उपाय सोचे हैं, उनका पालन करने के लिए माता-पिता बनाए हैं, माता-पिता में स्नेह का संचार
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मार्च, १८८२ | परिच्छेद २ | ७
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किया है - वे समझाएँगे। इतने उपाय तो उन्होंने किए और यह उपाय वे न करेंगे? अगर समझाने की जरूरत होगी तो वे समझाएँगे, क्योंकि वे अन्तर्यामी हैं। यदि मिट्टी की मूर्ति पूजने में कोई भूल होगी तो क्या वे नहीं जानते कि पूजा उन्हीं की हो रही है? वे उसी पूजा से सन्तुष्ट होते हैं। इसके लिए तुम्हारा सिर क्यों धमक रहा है? तुम यह चेष्टा करो जिससे तुम्हें ज्ञान हो - भक्ति हो।
अब शायद मास्टर का अहंकार बिलकुल चूर्ण हो गया।
वे सोचने लगे, 'ये जो कह रहे हैं वह ठीक ही तो है। मुझे दूसरों को समझाने की क्या जरूरत? क्या मैंने ईश्वर को जान लिया है, या मुझमें उनके प्रति विशुद्ध भक्ति उत्पन्न हुई है? स्वयं के सोने के लिए जगह नहीं है, और लोगों को न्यौता दे रहे हैं! स्वयं को कुछ ज्ञान नहीं, अनुभव नहीं, और दूसरों को समझाने चले हैं! वास्तव में कितनी लज्जा की बात है, कितनी हीन बुद्धि का काम है। क्या यह गणित, इतिहास या साहित्य है कि दूसरों को समझा दे? यह ईश्वरीय ज्ञान है। ये जो बातें कह रहे हैं, वे कैसे हृदय को स्पर्श कर रही हैं!
श्रीरामकृष्ण के साथ मास्टर का यही प्रथम और यही अन्तिम तर्कवाद था।
श्रीरामकृष्ण – तुम मिट्टी की मूर्ति की पूजा की बात कहते थे। यदि मिट्टी ही की हो तो भी उस पूजा की जरूरत है। देखो, सब प्रकार की पूजाओ की योजना ईश्वर ने ही की है। जिनका यह संसार है, उन्होंने ही यह सब किया है। जो जैसा अधिकारी है उसके लिए वैसा ही अनुष्ठान ईश्वरने किया है। लड़के को जो भोजन रुचता है और जो उसे सह्य है, वही भोजन उसके लिए माँ पकाती है, समझे?
मास्टर – जी हाँ।
(३)
संसारार्णवघोरे यः कर्णधारस्वरूपकः।
नमोऽस्तु रामकृष्णाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
भक्ति का उपाय
मास्टर (विनीत भाव से) – ईश्वर में मन किस तरह लगे?
श्रीरामकृष्ण – सर्वदा ईश्वर का नाम-गुणगान करना चाहिए, सत्संग करना चाहिए – बीच बीच में भक्तों और साधुओं से मिलना चाहिए। संसार में दिनरात विषय के भीतर पड़े रहने से मन ईश्वर में नहीं लगता। कभी कभी निर्जन स्थान में जाकर ईश्वर की चिन्ता करना बहुत जरूरी है। प्रथम अवस्था में बीच बीच में एकान्तवास किए बिना ईश्वर में मन लगाना बड़ा कठिन है।
“पौधे को चारों ओर से रूँधना पड़ता है, नहीं तो बकरी चर लेगी।”
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८ श्रीरामकृष्णवचनामृत मार्च, १८८२
“ध्यान करना चाहिए मन में, कोने में और वन में। और सर्वदा सत्-असत् विचार करना चाहिए। ईश्वर ही सत् अथवा नित्य वस्तु है, और सब असत्, अनित्य। बारम्बार इस प्रकार विचार करते हुए मन से अनित्य वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।
मास्टर (विनीत भाव से) – संसार में किस तरह रहना चाहिए?
गृहस्थ तथा संन्यास। उपाय – निर्जन में साधना
श्रीरामकृष्ण – सब काम करना चाहिए परन्तु मन ईश्वर में रखना चाहिए। माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदि सब के साथ रहते हुए सब की सेवा करनी चाहिए परन्तु मन में इस ज्ञान को दृढ़ रखना चाहिए की ये हमारे कोई नहीं हैं।
“किसी धनी के घर की दासी उसके घर का कुल काम करती है, किन्तु उसका मन अपने गाँव के घर पर लगा रहता है। मालिक के लड़कों का वह अपने लड़कों की तरह लालन-पालन करती है, उन्हें ‘मेरा मुन्ना’, ‘मेरा राजा’ कहती है, पर मन ही मन खूब जानती है कि ये मेरे कोई नहीं हैं।”
“कछुआ रहता तो पानी में है, पर उसका मन रहता है किनारे पर जहाँ उसके अण्डे रखे हैं। संसार का काम करो, पर मन रखो ईश्वर में।
“बिना भगवद्-भक्ति पाए यदि संसार में रहोगे तो दिनोंदिन उलझनोंमें फँसते जाओगे और यहाँ तक फँस जाओगे कि फिर पिण्ड छुड़ाना कठिन होगा। रोग, शोक, तापादि से अधीर हो जाओगे। विषय-चिन्तन जितना ही करोगे, आसक्ति भी उतनी ही अधिक बढ़ेगी।
“हाथों में तेल लगाकर कटहल काटना चाहिए। नहीं तो, हाथों में उसका दूध चिपक जाता है। भगवद्-भक्तिरूपी तेल हाथों में लगाकर संसाररूपी कटहल के लिए हाथ बढ़ाओ।
“परन्तु यदि भक्ति पाने की इच्छा हो तो निर्जन में रहना होगा। मक्खन खाने की इच्छा हो, तो दही निर्जन में ही जमाया जाता है। हिलाने-डुलाने से दही नहीं जमता। इसके बाद निर्जन में ही सब काम छोड़कर दही मथा जाता है, तभी मक्खन निकलता है।
“देखो, निर्जन में ही ईश्वर का चिन्तन करने से यह मन भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अधिकारी होता है। इस मन को यदि संसार में डाल रखोगे तो यह नीच हो जायगा। संसार में कामिनी-कांचन के चिन्तन के सिवा और है ही क्या?
“संसार जल है और मन मानो दूध। यदि पानी में डाल दोगे तो दूध पानी में मिल जाएगा, पर उसी दूध का निर्जन में मक्खन बनाकर यदि पानी में छोड़ोगे तो मक्खन पानी में उतराता रहेगा। इस प्रकार निर्जन में साधना द्वारा ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके यदि संसार में रहोगे भी तो संसार से निर्लिप्त रहोगे।
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मार्च, १८८२ | परिच्छेद २ | ९
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“साथ ही साथ विचार भी खूब करना चाहिए। कामिनी और कांचन अनित्य हैं, एकमात्र ईश्वर ही नित्य हैं। रुपये से क्या मिलता है? रोटी, दाल, कपड़े, रहने की जगह – बस यहीं तक। रुपये से ईश्वर नहीं मिलते। तो रुपया जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। इसी को विचार कहते हैं – समझे?”
मास्टर – जी हाँ, अभी अभी मैंने ‘प्रबोधचन्द्रोदय’ नाटक पढ़ा है। उसमें ‘वस्तु-विचार’ है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वस्तु-विचार! देखो, रुपये में ही क्या है और सुन्दरी की देह में भी क्या है। विचार करो, सुन्दरी की देह में केवल हाड़, मांस, चरबी, मल, मूत्र – यही सब है। ईश्वर को छोड़ इन्हीं वस्तुओं में मनुष्य मन क्यों लगाता है? क्यों वह ईश्वर को भूल जाता है?
ईश्वर-दर्शन के उपाय
मास्टर – क्या ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, हो सकते हैं। बीच बीच में एकान्तवास, उनका नाम-गुणगान और वस्तु-विचार करने से ईश्वर के दर्शन होते हैं।
मास्टर – कैसी अवस्था हो तो ईश्वर के दर्शन हों?
श्रीरामकृष्ण – खूब व्याकुल होकर रोने से उनके दर्शन होते हैं। स्त्री या लड़के के लिए लोग अँसुओ की धारा बहाते हैं, रुपये के लिए रोते हुए आँखें लाल कर लेते हैं, पर ईश्वर के लिए कोई कब रोता है? ईश्वर को व्याकुल होकर पुकारना चाहिए।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –
(भावार्थ) – “मन, तू सच्ची व्याकुलता के साथ पुकारकर तो देख। भला देखें, वह श्यामा बिना सुने कैसे रह सकती हैं! तुझे यदि माँ काली के दर्शन की अत्यन्त तीव्र इच्छा हो तो जवापुष्प और बिल्वपत्र लेकर उन्हें भक्तिचन्दन से लिप्त कर माँ के चरणों में पुष्पांजलि दे।”
“व्याकुलता हुई कि मानो आसमान पर सुबह की ललाई छा गयी। शीघ्र ही सूर्य भगवान् निकलते हैं, व्याकुलता के बाद ही भगवद्दर्शन होते हैं।
“विषय पर विषयी की, पुत्र पर माता की और पति पर सती की – यह तीन प्रकार की चाह एकत्रित होकर जब ईश्वर की ओर मुड़ती है तभी ईश्वर मिलते हैं।
“बात यह है कि ईश्वर को प्यार करना चाहिए। विषय पर विषयी की, पुत्र पर माता की और पति पर सती को जो प्रीति है, उसे एकत्रित करने से जितनी प्रीति होती है, उतनी ही प्रीति से ईश्वर को बुलाने से उस प्रेम का महा आकर्षण ईश्वर को खींच लाता है।
“व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए। बिल्ली का बच्चा ‘मिऊँ-मिऊँ’ करके माँ
१० श्रीरामकृष्णवचनामृत मार्च, १८८२
को पुकारता भर है। उसकी माँ जहाँ उसे रखती, वहीं वह रहता है – कभी राख की ढेरी पर कभी जमीन पर, तो कभी बिछौने पर। यदि उसे कष्ट होता है तो बस वह 'मिऊँ-मिऊँ' करता है ओर कुछ नहीं जानता। माँ चाहे जहाँ रहे 'मिऊँ-मिऊँ' सुनकर आ जाती है।"
<div align="center">□ □ □</div>परिच्छेद ३
परिच्छेद ३
तृतीय दर्शन
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥ (गीता, ६।२९)
नरेन्द्र, भवनाथ तथा मास्टर
मास्टर उस समय वराहनगर में अपनी बहन के यहाँ ठहरे थे। जब से श्रीरामकृष्ण के दर्शन हुए तब से मन में सब समय उन्हीं का चिन्तन चल रहा है। मानो आँखों के सामने सदा वही आनन्दमय रूप दिखायी दे रहा हो, कानों में वही अमृतमयी वाणी सुनायी दे रही हो। मास्टर सोचने लगे, इस निर्धन ब्राह्मण ने इन गम्भीर आध्यात्मिक तत्त्वों को कैसे खोज निकाला, किस प्रकार उनका ज्ञान प्राप्त किया? इसके पहले उन्होंने इतनी सरलता से इन गूढ़ तत्त्वों को समझाते हुए कभी किसी को नहीं देखा था। मास्टर दिनरात यही विचार करने लगे कि कब उनके पास जाऊँ और उन्हें देखूँ।
देखते ही देखते रविवार (५ मार्च) आ गया। वराहनगर के नेपालबाबू के साथ दोपहर को तीन-चार बजे के लगभग वे दक्षिणेश्वर में आ पहुँचे। देखा, श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तखत के ऊपर विराजमान हैं। कमरा भक्तों से ठसाठस भरा हुआ है। रविवार के कारण अवसर पाकर कई भक्त दर्शन के लिए आए हैं। उस समय मास्टर का किसी के साथ परिचय नहीं हुआ था; वे भीड़ में एक ओर जाकर बैठ गए। देखा, श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ प्रसन्नमुख हो वार्तालाप कर रहे हैं।
एक उन्नीस साल के लड़के की ओर देखते हुए श्रीरामकृष्ण बड़े आनन्द के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। लड़के का नाम है नरेन्द्र*। अभी ये कालेज में पढ़ते हैं और साधारण ब्राह्मसमाज में कभी कभी जाते हैं। इनकी आँखें पानीदार और बातें जोशीली हैं। चेहरे पर भक्तिभाव है।
मास्टर को अनुमान से मालूम हुआ कि विषयासक्त संसारियों की बातें चल रही हैं। ये लोग ईश्वरभक्त, धर्मपरायण व्यक्तियों की निन्दा किया करते हैं। फिर संसार में कितने दुर्जन व्यक्ति हैं, उनके साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहिए – ये सब बातें होने लगीं।
* बाद में ये ही स्वामी विवेकानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए।
| १२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ मार्च, १८८२ |
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श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र से) – क्यों नरेन्द्र, भला तू क्या कहेगा? संसारी मनुष्य तो न जाने क्या क्या कहते हैं। पर याद रहे कि हाथी जब जाता है, तब उसके पीछे पीछे कितने ही जानवर बेतरह चिल्लाते हैं। पर हाथी लौटकर देखता तक नहीं। तेरी कोई निन्दा करे तो तू क्या समझेगा ?
नरेन्द्र – मैं तो यह समझूँगा कि कुत्ते भौंकते हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अरे नहीं, यहाँ तक नहीं। (सब का हास्य।) सर्वभूतों में परमात्मा का ही वास है। पर मेल-मिलाप करना हो तो भले आदमियों से ही करना चाहिए, बुरे आदमियों से अलग ही रहना चाहिए। बाघ में भी परमात्मा का वास है, इसलिए क्या बाघ को भी गले लगाना चाहिए? (लोग हँस पड़े।) यदि कहो कि बाघ भी तो नारायण है, इसलिए क्यों भागें? इसका उत्तर यह है कि जो लोग कहते हैं कि भाग चलो, वे भी तो नारायण हैं, उनकी बात क्यों न मानो?
“एक कहानी सुनो। किसी जंगल में एक महात्मा थे। उनके कई शिष्य थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि सर्वभूतों में नारायण का वास है, यह जानकर सभी को नमस्कार करो। एक दिन एक शिष्य हवन के लिए जंगल में लकड़ी लेने गया। उस समय जंगल में यह शोरगुल मचा था कि कोई कहीं हो तो भागो, पागल हाथी जा रहा है। सभी भाग गए, पर शिष्य न भागा। उसे तो यह विश्वास था कि हाथी भी नारायण है, इसलिए भागने का क्या काम? वह खड़ा ही रहा। हाथी को नमस्कार किया और उसकी स्तुति करने लगा। इधर महावत के ऊँची आवाज लगाने पर भी कि भागो भागो, उसने पैर न उठाए। पास पहुँचकर हाथी ने उसे सूँड से लपेटकर एक ओर फेंक दिया और अपना रास्ता लिया। शिष्य घायल हो गया और बेहोश पड़ा रहा।
“यह खबर गुरु के कान तक पहुँची। वे अन्य शिष्यों को साथ लेकर वहाँ गए और उसे आश्रम में उठा लाए। वहाँ उसकी दवा-दारू की, तब वह होश में आया। कुछ देर बाद किसी ने उससे पूछा, हाथी को आते सुनकर तुम वहाँ से हट क्यों न गए ? उसने कहा कि गुरुजी ने कह तो दिया था कि जीव, जन्तु आदि सब में परमात्मा का ही वास है, नारायण ही सब कुछ हुए हैं, इसी से हाथी नारायण को आते देख मैं नहीं भागा। गुरुजी पास ही थे। उन्होंने कहा – बेटा, हाथी नारायण आ रहे थे, ठीक है; पर महावत नारायण ने तो तुम्हें मना किया था। यदि सभी नारायण हैं तो उस महावत की बात पर विश्वास क्यों न किया? महावत नारायण की भी बात मान लेनी चाहिए थी। (सब हँस पड़े।)
“शास्त्रों में है ‘आपो नारायण:’ – जल नारायण है। परन्तु किसी जल से देवता की सेवा होती है और किसी से लोग मुँह-हाथ धोते हैं, कपड़े धोते हैं और बर्तन माँजते हैं; किन्तु वह जल न पीते हैं, न ठाकुरजी की सेवा में ही लगाते हैं। इसी प्रकार साधु-असाधु, भक्त-अभक्त सभी के हृदय में नारायण का वास है; किन्तु असाधुओं, अभक्तों
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से व्यवहार या अधिक हेल-मेल नहीं चल सकता। किसी से सिर्फ बातचीत भर कर लेनी चाहिए और किसी से वह भी नहीं। ऐसे आदमियों से अलग रहना चाहिए।”
एक भक्त – महाराज, यदि दुष्ट जन अनिष्ट करने पर उतारू हों या कर डालें तो क्या चुपचाप बैठे रहना चाहिए ?
गृहस्थ तथा तमोगुण
श्रीरामकृष्ण – दुष्ट जनों के बीच रहने से उनसे अपना जी बचाने के लिए कुछ तमोगुण दिखाना चाहिए; परंतु कोई अनर्थ कर सकता है, यह सोचकर उलटा उसी का अनर्थ न करना चाहिए।
“किसी जंगल में कुछ चरवाहे गौएँ चराते थे। वहाँ एक बड़ा विषधर सर्प रहता था। उसके डर से लोग बड़ी सावधानी से आया-जाया करते थे। किसी दिन एक ब्रह्मचारीजी उसी रास्ते से आ रहे थे। चरवाहे दौड़ते हुए उनके पास आये और उनसे कहा – ‘महाराज, इस रास्ते से न जाइए; यहाँ एक साँप रहता है, बड़ा विषधर है।’ ब्रह्मचारीजी ने कहा – ‘तो क्या हुआ, बेटा, मुझे कोई डर नहीं, मैं मन्त्र जानता हूँ।’ यह कहकर ब्रह्मचारीजी उसी ओर चले गए। डर के मारे चरवाहे उनके साथ न गए। इधर साँप फन उठाये झपटता चला आ रहा था, परन्तु पास पहुँचने के पहले ही ब्रह्मचारीजी ने मन्त्र पढ़ा। साँप आकर उनके पैरों पर लोटने लगा। ब्रह्मचारीजी ने कहा – ‘तू भला हिंसा क्यों करता है? ले, मैं तुझे मन्त्र देता हूँ। इस मन्त्र को जपेगा तो ईश्वर पर भक्ति होगी, तुझे ईश्वर के दर्शन होंगे; फिर यह हिंसावृत्ति न रह जाएगी।’ यह कहकर ब्रह्मचारीजी ने साँप को मन्त्र दिया। मन्त्र पाकर साँप ने गुरु को प्रणाम किया, और पूछा – ‘भगवन्, मैं क्या साधना करूँ?’ गुरु ने कहा – ‘इस मन्त्र को जप और हिंसा छोड़ दे।’ चलते समय ब्रह्मचारीजी फिर आने का वचन दे गए।
“इस प्रकार कुछ दिन बीत गए। चरवाहों ने देखा कि साँप अब काटता नहीं, ढेला मारने पर भी गुस्सा नहीं होता, केंचुए की तरह हो गया है। एक दिन चरवाहों ने उसके पास जाकर पूँछ पकड़कर उसे घुमाया और वहीं पटक दिया। साँप के मुँह से खून बह चला, वह बेहोश पड़ा रहा; हिल-डुल तक न सकता था। चरवाहों ने सोचा कि साँप मर गया और यह सोचकर वहाँ से वे चले गए।
“जब बहुत रात बीती तब साँप होश में आया और धीरे धीरे अपने बिल के भीतर गया। देह चूर चूर हो गयी थी, हिलने तक की शक्ति नहीं रह गयी थी। बहुत दिनों के बाद जब चोट कुछ अच्छी हुई तब भोजन की खोज में बाहर निकला। जब से मारा गया तब से सिर्फ रात को ही बाहर निकलता था। हिंसा करता ही न था। सिर्फ घास-फूस, फल-फूल खाकर रह जाता था।
१४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ मार्च, १८८२
“सालभर बाद ब्रह्मचारी फिर आए। आते ही साँप की खोज करने लगे। चरवाहों ने कहा, ‘वह तो मर गया है’, पर ब्रह्मचारीजी को इस बात पर विश्वास न आया। वे जानते थे कि जो मन्त्र वे दे गए हैं, वह जब तक सिद्ध न होगा तब तक उसकी देह छूट नहीं सकती। ढूँढ़ते हुए उसी ओर वे अपने दिए हुए नाम से साँप को पुकारने लगे। बिल से गुरुदेव की आवाज सुनकर साँप निकल आया और बड़े भक्तिभाव से प्रणाम किया। ब्रह्मचारीजी ने पूछा, ‘क्यों कैसा है?’ उसने कहा, ‘जी अच्छा हूँ।’ ब्रह्मचारीजी – ‘तो तू इतना दुबला क्यों हो गया?’ साँप ने कहा – ‘महाराज, जब से आप आज्ञा दे गए, तब से मैं हिंसा नहीं करता; फल-फूल, घास-पात खाकर पेट भर लेता हूँ; इसीलिए शायद दुबला हो गया हूँ।’ सत्त्वगुण बढ़ जाने के कारण किसी पर वह क्रोध न कर सकता था। इसी से मार की बात भी वह भूल गया था। ब्रह्मचारीजी ने कहा, ‘सिर्फ न खाने ही से किसी की यह दशा नहीं होती, कोई दूसरा कारण अवश्य होगा, तू अच्छी तरह सोच तो।’ साँप को चरवाहों की मार याद आ गयी। उसने कहा – ‘हाँ महाराज, अब याद आयी, चरवाहों ने एक दिन मुझे पटक-पटककर मारा था। उन अज्ञानियों को तो मेरे मन की अवस्था मालूम थी नहीं। वे क्या जानें कि मैंने हिंसा करना छोड़ दिया है!’ ब्रह्मचारीजी बोले – ‘राम राम, तू ऐसा मूर्ख है? अपनी रक्षा करना भी तू नहीं जानता? मैंने तो तुझे काटने ही को मना किया था, पर फुफकारने से तुझे कब रोका था? फुफकार मारकर उन्हें भय क्यों नहीं दिखाया?’
“इस तरह दुष्टों के पास फुफकार मारना चाहिए, भय दिखाना चाहिए, जिससे कि वे अनिष्ट न कर बैठें; पर उनमें विष न डालना चाहिए, उनका अनिष्ट न करना चाहिए।”
भिन्न भिन्न स्वभाव। क्या सब आदमी बराबर हैं?
श्रीरामकृष्ण – परमात्मा की सृष्टि में नाना प्रकार के जीवजन्तु और पेड़-पौधे हैं। पशुओं में अच्छे हैं और बुरे भी। उनमें बाघ जैसा हिंस्र प्राणी भी है। पेड़ों में अमृत जैसे फल लगें ऐसे भी पेड़ हैं और विष जैसे फल हों ऐसे भी हैं। इसी प्रकार मनुष्यों में भी भले-बुरे और साधु-असाधु हैं। उनमें संसारी जीव भी हैं और भक्त भी।
“जीव चार प्रकार के होते हैं। बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य।
“नारदादि नित्यजीव हैं। ऐसे जीव औरों के हित के लिए उन्हें शिक्षा देने के लिए संसार में रहते हैं।
“बद्ध जीव विषय में फँसा रहता है। वह ईश्वर को भूल जाता है, भगवच्चिन्तन वह कभी नहीं करता।
“मुमुक्षु जीव वह है जो मुक्ति की इच्छा रखता है। मुमुक्षुओं में से कोई कोई मुक्त हो जाते हैं, कोई कोई नहीं हो सकते।
५ मार्च, १८८२ | परिच्छेद ३ | १५
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“मुक्त जीव संसार के कामिनी-कांचन में नहीं फँसते, जैसे साधु-महात्मा। इनके मन में विषय-बुद्धि नहीं रहती। ये सदा ईश्वर के ही पादपद्मों की चिन्ता करते हैं।
“जब जाल तालाब में फेंका जाता है, तब जो दो-चार होशियार मछलियाँ होती हैं, वे जाल में नहीं आतीं। यह नित्य जीवों की उपमा है। किन्तु अनेक मछलियाँ जाल में फँस जाती हैं। इनमें से कुछ निकल भागने की भी चेष्टा करती हैं। यह मुमुक्षुओ की उपमा है। परन्तु सब मछलियाँ नहीं भाग सकतीं। केवल दो चार उछल-उछलकर जाल से बाहर हो जाती हैं। तब मछुआ कहता है, अरे एक बड़ी मछली बह गयी। किन्तु जो जाल में पड़ी हैं, उनमें से अधिकांश मछलियाँ निकल नहीं सकतीं। वे भागने की चेष्टा भी नहीं करतीं, जाल को मुँह में फाँसकर मिट्टी के नीचे सिर घुसेड़कर चुपचाप पड़ी रहती हैं और सोचती हैं, अब कोई भय की बात नहीं, बड़े आनन्द में हैं। पर वे नहीं जानतीं कि मछुआ घसीटकर उन्हें ले जाएगा। यह बद्ध जीवों की उपमा है।
संसारी मनुष्य – बद्ध जीव
“बद्ध जीव संसार के कामिनी-कांचन में फँसे हैं। उनके हाथ पैर बँधे हैं; किन्तु फिर भी वे सोचते हैं कि संसार में कामिनी-कांचन में ही सुख है और यहाँ हम निर्भय हैं। वे नहीं जानते, इन्हीं में उनकी मृत्यु होगी। बद्ध जीव जब मरता है, तब उसकी स्त्री कहती है, ‘तुम तो चले, पर मेरे लिए क्या कर गए?’ माया भी ऐसी होती है कि बद्ध जीव पड़ा तो है मृत्युशय्या पर, पर चिराग में ज्यादा बत्ती जलती हुई देखकर कहता है, ‘तेल बहुत जल रहा है, बत्ती कम करो!’
“बद्ध जीव ईश्वर का स्मरण नहीं करता। यदि अवकाश मिला तो या तो गप करता है या फालतू काम करता है। पूछने पर कहता है, ‘क्या करूँ, चुपचाप बैठ नहीं सकता, इसी से घेरा बाँध रहा हूँ।’ कभी ताश ही खेलकर समय काटता है।” (सब स्तब्ध होकर सुन रहे हैं।)
(२)
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।। (गीता, १०।३)
उपाय – विश्वास
एक भक्त – महाराज, इस प्रकार के संसारी जीवों के लिए क्या कोई उपाय नहीं है?
श्रीरामकृष्ण – उपाय अवश्य है। कभी कभी साधुओं का संग करना चाहिए और कभी कभी निर्जन स्थान में ईश्वर का स्मरण और विचार। परमात्मा से भक्ति और विश्वास
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१६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ मार्च, १८८२
की प्रार्थना करनी चाहिए।
“विश्वास हुआ कि सफलता मिली। विश्वास से बढ़कर और कुछ नहीं है।”
“(केदार के प्रति) विश्वास में कितना बल है, यह तो तुमने सुना है न? पुराणों में लिखा है कि रामचन्द्र को, जो साक्षात् पूर्णब्रह्म नारायण हैं, लंका जाने के लिए सेतु बाँधना पड़ा था, परन्तु हनुमान रामनाम के विश्वास ही से कूदकर समुद्र के पार चले गए, उन्होंने सेतु की परवाह नहीं की। (सब हँसते हैं।)”
“किसी को समुद्र के पार जाना था। विभीषण ने एक पत्ते पर रामनाम लिखकर उसके कपड़े के खूँट में बाँधकर कहा कि तुम्हें अब कोई भय नहीं, विश्वास करके पानी के ऊपर से चले जाओ, किन्तु यदि तुम्हें अविश्वास हुआ तो तुम डूब जाओगे। वह मनुष्य बड़े मजे में समुद्र के ऊपर से चला जा रहा था। उसी समय उसकी यह इच्छा हुई कि गाँठ को खोलकर देखूँ तो इसमें क्या बँधा है। गाँठ खोलकर उसने देखा तो एक पत्ते पर रामनाम लिखा था। ज्योंही उसने सोचा कि अरे इसमें तो सिर्फ रामनाम लिखा है - अविश्वास हुआ कि वह डूब गया।”
“जिसका ईश्वर पर विश्वास है, वह यदि महापातक करे – गो-ब्राह्मण-स्त्री-हत्या भी करे – तो भी इस विश्वास के बल से वह बड़े बड़े पापों से मुक्त हो सकता है। वह यदि कहे कि ऐसा काम कभी न करूँगा तो उसे फिर किसी बात का भय नहीं।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने इस मर्म का बँगला गीत गाया –
“दुर्गा दुर्गा अगर जपूँ मैं, जब मेरे निकलेंगे प्राण। देखूँ कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान।। गो-ब्राह्मण की हत्या करके, करके भी मदिरा का पान। जरा नहीं परवा पापों की, लूँगा निश्चय पद निर्वाण।।”
नरेन्द्र – होमापक्षी
नरेन्द्र की बात चली। श्रीरामकृष्ण भक्तों से कहने लगे, “इस लड़के को यहाँ एक प्रकार देखते हो। चुलबुला लड़का जब बाप के पास बैठता है, तब चुपचाप बैठा रहता है और जब चाँदनी पर खेलता है, तब उसकी और ही मूर्ति हो जाती है। ये लड़के नित्यसिद्ध हैं। ये कभी संसार में नहीं बँधते। थोड़ी ही उम्र में इन्हें चैतन्य होता है, और ये ईश्वर की ओर चले जाते हैं। ये संसार में जीवों को शिक्षा देने के लिए आते हैं। संसार की कोई वस्तु इन्हें अच्छी नहीं लगती; कामिनी-कांचन में ये कभी नहीं पड़ते।
“वेदों में ‘होमा’ पक्षी की कथा है। यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊँचाई पर रहती है। वहीं यह अण्डे देती है। अण्डा देते ही वह गिरने लगता है; परन्तु इतने ऊँचे से वह गिरता है कि गिरते गिरते बीच ही में फूट जाता है। तब बच्चा गिरने लगता है। गिरते ही गिरते
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उसकी आँखें खुलती और पंख निकल आते हैं। आँखें खुलने से जब वह बच्चा देखता है कि मैं गिर रहा हूँ और जमीन पर गिरकर चूर चूर हो जाऊँगा, तब वह एकदम अपनी 'माँ की ओर फिर ऊँचे चढ़ जाता है।”
नरेन्द्र उठ गए।
सभा में केदार, प्राणकृष्ण, मास्टर आदि और भी कई सज्जन थे।
श्रीरामकृष्ण – देखो, नरेन्द्र गाने में, बजाने में, पढ़ने-लिखने में – सब विषयों में अच्छा है। उस दिन केदार के साथ उसने तर्क किया था। केदार की बातों को खटाखट काटता गया। (श्रीरामकृष्ण और सब लोग हँस पड़े।) – (मास्टर से) अंग्रेजी में क्या कोई तर्क की किताब है?
मास्टर – जी हाँ है, अंग्रेजी में इसको न्यायशास्त्र (Logic) कहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, कैसा है कुछ सुनाओ तो।
मास्टर अब मुश्किल में पड़े। आखिर कहने लगे – एक बात यह है कि साधारण सिद्धान्त से विशेष सिद्धान्त पर पहुँचना; जैसे, सब मनुष्य मरेंगे, पण्डित भी मनुष्य हैं, इसलिए वे भी मरेंगे।
“और एक बात यह है कि विशेष दृष्टान्त या घटना को देखकर साधारण सिद्धान्त पर पहुँचना। जैसे यह कौआ काला है, वह कौआ काला है और जितने कौए दीख पड़ते हैं, वे भी काले हैं, इसलिए सब कौए काले हैं।
“किन्तु उस प्रकार के सिद्धान्त से भूल भी हो सकती है; क्योंकि सम्भव है ढूँढ़-तलाश करने से किसी देश में सफेद कौआ मिल जाय। एक और दृष्टान्त – जहाँ वृष्टि है, वहाँ मेघ भी है, अतएव यह साधारण सिद्धान्त हुआ कि मेघ से वृष्टि होती है। और भी एक दृष्टान्त – इस मनुष्य के बत्तीस दाँत हैं, उस मनुष्य के बत्तीस दाँत हैं, और जिस मनुष्य को देखते हैं, उसी के बत्तीस दाँत हैं, अतएव सब मनुष्यों के बत्तीस दाँत हैं।
“इस प्रकार के साधारण सिद्धान्त की बातें अंग्रेजी न्यायशास्त्र में हैं।”
श्रीरामकृष्ण ने इन बातों को सुन भर लिया। फिर वे अन्यमनस्क हो गए इसलिए यह प्रसंग और आगे न बढ़ा।
(३)
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।। (गीता, २।५३)
समाधि में
सभा भंग हुई। भक्त सब इधर-उधर घूमने लगे। मास्टर भी पंचवटी आदि स्थानों में घूम रहे थे। समय पाँच के लगभग होगा। कुछ देर बाद वे श्रीरामकृष्ण के कमरे में आए
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१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ मार्च, १८८२
और देखा उसके उत्तर की ओर छोटे बरामदे में अद्भुत घटना हो रही है।
श्रीरामकृष्ण स्थिर भाव से खड़े हैं और नरेन्द्र गा रहे हैं। दो-चार भक्त भी खड़े हैं। मास्टर आकर गाना सुनने लगे। गाना सुनते हुए वे मुग्ध हो गए। श्रीरामकृष्ण के गाने को छोड़कर ऐसा मधुर गाना उन्होंने कभी कहीं नहीं सुना था। अकस्मात् श्रीरामकृष्ण की ओर देखकर वे स्तब्ध हो गए। श्रीरामकृष्ण की देह निःस्पन्द हो गयी थी और नेत्र निर्निमेष। श्वासोच्छ्वास चल रहा था या नहीं – बताना कठिन है। पूछने पर एक भक्त ने कहा, यह 'समाधि' है। मास्टर ने ऐसा न कभी देखा था, न सुना था। वे विस्मित होकर सोचने लगे, भगवच्चिन्तन करते हुए मनुष्यों का बाह्यज्ञान क्या यहाँ तक चला जाता है? न जाने कितनी भक्ति और विश्वास हो तो मनुष्यों की यह अवस्था होती है!
नरेन्द्र जो गीत गा रहे थे, उसका भाव यह है –
“ऐ मन, तू चिद्धन हरि का चिन्तन कर। उसकी मोहनमूर्ति की कैसी अनुपम छटा है, जो भक्तों का मन हर लेती है वह रूप नये नये वर्णों से मनोहर है, कोटि चन्द्रमाओं को लजानेवाला है, – उसकी छटा क्या है मानो बिजली चमकती है! उसे देख आनन्द से जी भर जाता है।”
गीत के इस चरण को गाते समय श्रीरामकृष्ण चौंकने लगे। देह पुलकायमान हुई। आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे। बीच बीच में मानो कुछ देखकर मुसकराते हैं। कोटि चन्द्रमाओं को लजानेवाले उस अनुपम रूप का वे अवश्य दर्शन करते होंगे। क्या यही ईश्वर-दर्शन है? कितनी साधना, कितनी तपस्या, कितनी भक्ति और विश्वास से ईश्वर का ऐसा दर्शन होता है?
फिर गाना होने लगा।
(भावार्थ) – “हृदय-रूपी कमलासन पर उनके चरणों का भजन कर, शान्त मन और प्रेमभरे नेत्रों से उस अपूर्व मनोहर दृश्य को देख ले।”
फिर वही जगत् को मोहनेवाली मुसकराहट! शरीर वैसा ही निश्चल हो गया। आँखें बन्द हो गयीं – मानो कुछ अलौकिक रूप देख रहे हैं, और देखकर आनन्द से भरपूर हो रहे हैं।
अब गीत समाप्त हुआ। नरेन्द्र ने गाया –
(भावार्थ) – “चिदानन्द-रस में – प्रेमानन्द-रस में – परम भक्ति से चिरदिन के लिए मग्न हो जा।”
समाधि और प्रेमानन्द की इस अद्भुत छवि को हृदय में रखते हुए मास्टर घर लौटने लगे। बीच बीच में दिल को मतवाला करनेवाला वह मधुर गीत याद आता रहा।
□ □ □
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परिच्छेद ४
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चतुर्थ दर्शन
(१)
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ (गीता, ६।२२)
नरेन्द्र, भवनाथ आदि के संग आनन्द
उसके दूसरे दिन (६ मार्च को) भी छुट्टी थी। दिन के तीन बजे मास्टर फिर आए। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं। फर्श पर चटाई बिछी है। नरेन्द्र, भवनाथ तथा और भी दो एक लोग बैठे हैं। सभी अभी लड़के हैं, उम्र उन्नीस-बीस के लगभग होगी। प्रफुल्लमुख श्रीरामकृष्ण तखत पर बैठे हुए लड़कों से सानन्द वार्तालाप कर रहे हैं।
मास्टर को कमरे में घुसते देख श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, “यह देखो, फिर आया।” सब हँसने लगे। मास्टर ने भूमिष्ठ हो प्रणाम करके आसन ग्रहण किया। पहले वे खड़े खड़े हाथ जोड़कर प्रणाम करते थे – जैसा अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग करते हैं। पर आज उन्होंने भूमिष्ठ होकर प्रणाम करना सीखा। श्रीरामकृष्ण नरेन्द्रादि भक्तों से कहने लगे, “देखो, एक मोर को किसी ने चार बजे अफीम खिला दी। दूसरे दिन से वह अफीमची मोर ठीक चार बजे आ जाता था! यह भी अपने समय पर आया है।” सब लोग हँसने लगे।
मास्टर सोचने लगे, ये ठीक तो कहते हैं। घर जाता हूँ, पर मन दिन-रात यहीं पड़ा रहता है। कब जाऊँ, कब उन्हें देखूँ इसी विचार में रहता हूँ। यहाँ मानो कोई खींच ले आता है! इच्छा होने पर भी दूसरी जगह जा नहीं पाता, यहीं आना पड़ता है। इधर श्रीरामकृष्ण लड़कों से हँसी-मजाक करने लगे। मालूम होता था कि वे सब मानो एक ही उम्र के हैं। हँसी की लहरें उठने लगीं। मानो आनन्द की हाट लगी हो।
मास्टर यह अद्भुत चरित्र देखते हुए सोचते हैं कि पिछले दिन क्या इन्हीं को समाधि और अपूर्व प्रेमानन्द में मग्न देखा था? क्या ये वे ही मनुष्य हैं, जो आज प्राकृत मनुष्य जैसा व्यवहार कर रहे हैं? क्या इन्हीं ने मुझे पहले दिन उपदेश देते हुए धिक्कारा था? इन्हीं ने मुझे 'तुम ज्ञानी हो' कहा था? इन्हीं ने साकार और निराकार दोनों सत्य हैं,
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कहा था? इन्हीं ने मुझे कहा था कि ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य? इन्हीं ने मुझे संसार में दासी की भाँति रहने का उपदेश दिया था?
श्रीरामकृष्ण आनन्द कर रहे हैं और बीच बीच में मास्टर को देख रहे हैं। मास्टर को सविस्मय बैठे हुए देखकर उन्होंने रामलाल से कहा - "इसकी उम्र कुछ ज्यादा हो गयी है न, इसी से कुछ गम्भीर है। ये सब हँस रहे हैं; पर यह चुपचाप बैठा है।"
मास्टर की उम्र उस समय सत्ताईस साल की होगी।
बात ही बात में परम भक्त हनुमान की बात चली। हनुमान का एक चित्र श्रीरामकृष्ण के कमरे की दीवार पर टँगा था। श्रीरामकृष्ण ने कहा, "देखो तो, हनुमान का भाव कैसा है! धन, मान, शरीरसुख कुछ भी नहीं चाहते, केवल भगवान् को चाहते हैं। जब स्फटिक-स्तम्भ के भीतर से ब्रह्मास्त्र निकालकर भागे, तब मन्दोदरी नाना प्रकार के फल लेकर लोभ दिखाने लगी। उसने सोचा कि फल के लोभ से उतरकर शायद ये ब्रह्मास्त्र फेंक दें; पर हनुमान इस भुलावे में कब पड़ने लगे? उन्होंने कहा - मुझे फलों का अभाव नहीं है। मुझे जो फल मिला है, उससे मेरा जन्म सफल हो गया है। मेरे हृदय में मोक्षफल के वृक्ष श्रीरामचन्द्रजी हैं। श्रीराम-कल्पतरु के नीचे बैठा रहता हूँ; जब जिस फल की इच्छा होती है, वही फल खाता हूँ। फल के बारे में कहता हूँ कि तेरा फल मैं नहीं चाहता हूँ। तू मुझे फल न दिखा, मैं इसका प्रतिफल दे जाऊँगा।"
इसी भाव का एक गीत श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं। फिर वही समाधि; देह निश्चल, नेत्र स्थिर। बैठे हैं, जैसी मूर्ति फोटोग्राफ में देखने को मिलती है। भक्तगण अभी इतना हँस रहे थे पर अब सब एक दृष्टि से श्रीरामकृष्ण की इस अद्भुत अवस्था का दर्शन करने लगे। मास्टर दूसरी बार यह समाधि-अवस्था देख रहे थे।
बड़ी देर बाद अवस्था का परिवर्तन हो रहा है। देह शिथिल हो गयी, मुख सहास्य हो गया, इन्द्रियाँ फिर अपना अपना काम करने लगीं। नेत्रों से आनन्दाश्रु बहाते हुए 'राम राम' उच्चारण कर रहे हैं।
मास्टर सोचने लगे, क्या ये ही महापुरुष लड़कों के साथ दिल्लगी कर रहे थे? तब तो यह जान पड़ता था कि मानो पाँच वर्ष के बालक हैं।
श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ होकर फिर प्राकृत मनुष्यों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मास्टर और नरेन्द्र से कहने लगे कि तुम दोनों अंग्रेजी में बातचीत करो, मैं सुनूँगा।
यह सुनकर मास्टर और नरेन्द्र हँस रहे हैं। दोनों परस्पर कुछ बातचीत करने लगे, पर बँग्ला में। श्रीरामकृष्ण के सामने मास्टर को तर्क करना सम्भव न था; क्योंकि तर्क का तो घर उन्होंने बन्द कर दिया है। अतएव मास्टर अब तर्क कैसे कर सकते हैं! श्रीरामकृष्ण ने फिर कहा, पर मास्टर के मुँह से अंग्रेजी तर्क न निकला।
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(२)
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं, त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता, सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ (गीता, ११।१८)
अन्तरंग भक्तों के संग में। 'मैं कौन हूँ'?
पाँच बजे हैं। भक्त लोग अपने अपने घर चले गए। सिर्फ मास्टर और नरेन्द्र रह गए। नरेन्द्र मुँह-हाथ धोने के लिए गए। मास्टर भी बगीचे में इधर-उधर घूमते रहे। थोड़ी देर बाद कोठी की बगल से 'हंस तालाब' की ओर आते हुए उन्होंने देखा कि तालाब की दक्षिण तरफवाली सीढ़ी के चबूतरे पर श्रीरामकृष्ण खड़े हैं और नरेन्द्र भी हाथ में गड़ुआ लिए खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, "देख, और जरा ज्यादा आया-जाया करना - तूने हाल ही में आना शुरू किया है न? पहली जान-पहचान के बाद सभी लोग कुछ ज्यादा आया करते हैं, जैसे नया पति। (नरेन्द्र और मास्टर हँसे।) क्यों, आएगा नहीं?" नरेन्द्र ब्राह्मसमाजी लड़के हैं, हँसते हुए कहा, "हाँ, कोशिश करूँगा।"
फिर सभी कोठी की राह से श्रीरामकृष्ण के कमरे की ओर आने लगे। कोठी के पास श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से कहा, "देखो, किसान बाजार से बैल खरीदते हैं। वे जानते हैं कि कौनसा बैल अच्छा है और कौनसा बुरा। वे पूँछ के नीचे हाथ लगाकर परखते हैं। कोई कोई बैल पूँछ पर हाथ लगाने से लेट जाते हैं। वे ऐसे बैल नहीं खरीदते। पर जो बैल पूँछ पर हाथ रखते ही बड़ी तेजी से कूद पड़ता है, उसी बैल को वे चुन लेते हैं। नरेन्द्र इसी बैल की जाति का है। भीतर खूब तेज है।" यह कहकर श्रीरामकृष्ण मुसकराने लगे। "फिर कोई कोई ऐसे होते हैं कि मानो उनमें जान ही नहीं है - न जोर है, न दृढ़ता।"
सन्ध्या हुई। श्रीरामकृष्ण ईश्वर-चिन्तन करने लगे। उन्होंने मास्टर से कहा, "तुम जाकर नरेन्द्र से बातचीत करो, और फिर मुझे बताना कि वह कैसा लड़का है।"
आरती हो चुकी। मास्टर ने बड़ी देर में नरेन्द्र को चाँदनी के पश्चिम की तरफ पाया। आपस में बातचीत होने लगी। नरेन्द्र ने कहा कि मैं साधारण ब्राह्मसमाजी हूँ, कालेज में पढ़ता हूँ, इत्यादि।
रात हो गयी। अब मास्टर घर जाएँगे, पर जाने को जी नहीं चाहता; इसलिए नरेन्द्र से बिदा होकर वे फिर श्रीरामकृष्ण को ढूँढ़ने लगे। उनका गीत सुनकर मास्टर मुग्ध हो गए हैं। जी चाहता है कि फिर उनके श्रीमुख से गीत सुनें। ढूँढ़ते हुए देखा कि कालीमाता के मन्दिर के सामने जो नाट्यमण्डप है, उसी में श्रीरामकृष्ण अकेले टहल रहे हैं। मन्दिर में मूर्ति के दोनों तरफ दीपक जल रहे थे। विस्तृत नाट्यमण्डप में एक लालटेन जल रही थी। रोशनी धीमी थी। प्रकाश और अँधेरे का मिश्रण-सा दीख पड़ता था।
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मास्टर श्रीरामकृष्ण का गीत सुनकर मुग्ध हो गए हैं, जैसे साँप मन्त्रमुग्ध हो जाता है। अब बड़े संकोच से उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव से पूछा, “क्या आज फिर गाना होगा?” श्रीरामकृष्ण ने जरा सोचकर कहा, “नहीं, आज अब न होगा।” यह कहते ही मानो उन्हें फिर याद आयी और उन्होंने कहा, “हाँ, एक काम करना। मैं कलकत्ते में बलराम के घर जाऊँगा, तुम भी आना, वहाँ गाना होगा।”
मास्टर – आपकी जैसी आज्ञा।
श्रीरामकृष्ण – तुम जानते हो बलराम बसु को?
मास्टर – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – बलराम बसु – बोसपाड़ा में उनका घर है।
मास्टर – जी मैं पूछ लूँगा।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के साथ टहलते हुए) – अच्छा, तुमसे एक बात पूछता हूँ – मुझे तुम क्या समझते हो?
मास्टर चुप रहे। श्रीरामकृष्ण ने फिर से पूछा, “तुम्हें क्या मालूम होता है? मुझे कितने आने ज्ञान हुआ है?”
मास्टर – 'आने' की बात तो मैं नहीं जानता पर ऐसा ज्ञान, या प्रेमभक्ति, या विश्वास, या वैराग्य, या उदार भाव मैंने और कहीं कभी नहीं देखा।
श्रीरामकृष्ण हँसने लगे।
इस बातचीत के बाद मास्टर प्रणाम करके विदा हुए। फाटक तक जाकर फिर कुछ याद आयी, उल्टे पाँव लौटकर फिर श्रीरामकृष्णदेव के पास नाट्यमण्डप में हाजिर हुए।
उस धीमी रोशनी में श्रीरामकृष्ण अकेले टहल रहे थे – निःसंग – जैसे सिंह वन में अकेला अपनी मौज में फिरता रहता है। आत्माराम, और किसी की अपेक्षा नहीं!
विस्मित होकर मास्टर उन महापुरुष को देखने लगे।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्यों जी, फिर क्यों लौटे?
मास्टर – जी, वे अमीर आदमी होंगे – शायद मुझे भीतर न जाने दें – इसीलिए सोच रहा हूँ कि वहाँ न जाऊँगा, यहीं आकर आपसे मिलूँगा।
श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, तुम मेरा नाम लेना। कहना कि मैं उनके पास जाऊँगा, बस कोई भी तुम्हें मेरे पास ले आएगा।
“जैसी आपकी आज्ञा” – कहकर मास्टर ने फिर प्रणाम किया और वहाँ से विदा हुए।
<p align="center">☐ ☐ ☐</p>परिच्छेद ५
परिच्छेद ५
बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण तथा प्रेमानन्द में नृत्य
(१)
रात के आठ-नौ बजे का समय होगा – होली के सात दिन बाद। राम, मनोमोहन, राखाल, नृत्यगोपाल आदि भक्तगण श्रीरामकृष्ण को घेरकर खड़े हैं। सभी लोग हरिनाम का संकीर्तन करते करते तन्मय हो गए हैं। कुछ भक्तों की भावावस्था हुई है। भावावस्था में नृत्यगोपाल का वक्षःस्थल लाल हो गया है। सब के बैठने पर मास्टर ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने देखा राखाल सोए हैं, भावमग्न, बाह्यज्ञान-विहीन। वे उनकी छाती पर हाथ रखकर कह रहे हैं – 'शान्त हो, शान्त हो।' राखाल की यह दूसरी बार भावावस्था थी। वे कलकत्ते में अपने पिता के साथ रहते हैं; बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आ जाते हैं। इसके पूर्व उन्होंने श्यामपुकुर में विद्यासागर महाशय के स्कूल में कुछ दिन अध्ययन किया था।
श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से दक्षिणेश्वर में कहा था, 'मैं कलकत्ते में बलराम के घर जाऊँगा, तुम भी आना।' इसीलिए वे उनका दर्शन करने आए हैं। फाल्गुन कृष्णा सप्तमी, शनिवार, ११ मार्च १८८२ ई.। श्रीयुत बलराम श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण देकर लाए हैं।
अब भक्तगण बरामदे में बैठे प्रसाद पा रहे हैं। दासवत् बलराम खड़े हैं। देखने से समझा नहीं जाता कि वे इस मकान के मालिक हैं।
मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास कुछ दिनों से आने लगे हैं। उनका अभी तक भक्तों के साथ परिचय नहीं हुआ है। केवल दक्षिणेश्वर में नरेन्द्र के साथ परिचय हुआ था।
(२)
सर्वधर्मसमन्वय
कुछ दिनों बाद श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में शिव-मन्दिर की सीढ़ी पर भावाविष्ट होकर बैठे हैं। दिन के चार-पाँच बजे का समय होगा। मास्टर भी पास ही बैठे हैं।
थोड़ी देर पहले श्रीरामकृष्ण, उनके कमरे के फर्श पर जो बिस्तर बिछाया गया है, उस पर विश्राम कर रहे थे। अभी उनकी सेवा के लिए सदैव उनके पास कोई नहीं रहता
| २४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ११ मार्च, १८८२ |
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था। हृदय के चले जाने के बाद से उनको कष्ट हो रहा है। कलकत्ते से मास्टर के आने पर वे उनके साथ बात करते करते श्रीराधाकान्त के मन्दिर के सामनेवाले शिव-मन्दिर की सीढ़ी पर आकर बैठे। मन्दिर देखते ही वे एकाएक भावाविष्ट हो गए हैं।
वे जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, सभी कहते हैं, मेरी घड़ी ठीक चल रही है। ईसाई, हिन्दू, मुसलमान सभी कहते हैं मेरा धर्म ठीक है, परन्तु माँ, किसी की भी तो घड़ी ठीक नहीं चल रही है। तुम्हें ठीक ठीक कौन समझ सकेगा, परन्तु व्याकुल होकर पुकारने पर, तुम्हारी कृपा होने पर सभी पथों से तुम्हारे पास पहुँचा जा सकता है। माँ, ईसाई लोग गिर्जाघरों में तुम्हें कैसे पुकारते हैं, एक बार दिखा देना। परन्तु माँ, भीतर जाने पर लोग क्या कहेंगे? यदि कुछ गड़बड़ हो जाय तो? फिर लोग कालीमन्दिर में यदि न जाने दें तो फिर गिर्जाघर के दरवाजे के पास से दिखा देना।”
(३)
भक्तों के साथ भजनानन्द में - 'प्रेम की सुरा'
एक दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटी खाट पर बैठे हैं। आनन्दमयी मूर्ति है। सहास्य वदन। श्रीयुत कालीकृष्ण* के साथ मास्टर आ पहुँचे।
कालीकृष्ण जानते न थे कि उनके मित्र उन्हें कहाँ ला रहे हैं। मित्र ने कहा था, कलार की दूकान पर जाओगे तो मेरे साथ आओ। वहाँ पर एक मटकी शराब है। मास्टर ने अपने मित्र से जो कुछ कहा था, प्रणाम करने के बाद श्रीरामकृष्ण को सब कह सुनाया। वे सभी हँसने लगे।
वे बोले, “भजनानन्द, ब्रह्मानन्द, यह आनन्द ही सुरा है, प्रेम की सुरा। मानवजीवन का उद्देश्य है ईश्वर से प्रेम, ईश्वर से प्यार करना। भक्ति ही सार है। ज्ञान-विचार करके ईश्वर को जानना बहुत ही कठिन है।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाना गाने लगे जिसका आशय इस प्रकार है -
“कौन जाने काली कैसी हैं? षड्दर्शन उन्हें देख नहीं सकते। इच्छामयी वे अपनी इच्छा के अनुसार घट घट में विराजमान हैं। यह विराट् ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड जो काली के उदर में है उसे कैसा समझते हो? शिव ने काली का मर्म जैसा समझा वैसा दूसरा कौन जानता है? योगी सदा सहस्रार, मूलाधार में मनन करते हैं। काली पद्म-वन में हंस के साथ हंसी के रूप में रमण करती हैं। 'प्रसाद' कहता है, लोग हँसते हैं। मेरा मन समझता है, पर प्राण नहीं समझता - वामन होकर चन्द्रमा पकड़ना चाहता है।”
* कालीकृष्ण भट्टाचार्य - परवर्ति काल में आप विद्यासागर कालेज में संस्कृत भाषा तथा साहित्य के प्रधान अध्यापक हुए थे।