सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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दिन और रात के काम
को इस दृष्टि से आवश्यक लेना चाहिए कि मैला उनकी जननेन्द्रिय की ओर न लग जाय। उन्हें गुदा-द्वार साफ करने के बाद भली भाँति जननेन्द्रिय को भी पानी से साफ करना चाहिए। तन्दुरुस्त आदमी का मल वैधा हुआ, चिकना और अक्सर पीला होता है और एक ही बार में आसानी से निकल जाता है, कोठा साफ और हलका हो जाता है। सुबह का पेशाब भी हल्का-साफ सुनहरे रङ्ग का होता है।
मिट्टी से और मिल सके तो साबुन से अच्छी तरह हाथ साफ करके मुँह धोना और कुल्हा-दाँत करना चाहिए। इस काम में सबसे ज्यादा ध्यान देने की बात दाँतन या मंजन है। हरेक तन्दुरुस्त आदमी के दाँत मोती से साफ और चमकदार और लोहे के समान मजबूत होने चाहिए। यह तभी हो सकता है जब वे साफ रहेंगे। क्योंकि दाँत गन्दे रहने से दाँतों की जड़ में कीड़ा लग जाता है। खाना खाने के बाद अच्छी तरह कुल्हा न करने से उनकी दराजों में अन्न का जूठन लगा रह जाता है जो रात को सड़ जाता है। सुबह यदि दाँत ठीक तौर पर साफ न किये गये तो कीड़ा बनकर दाँतों की जड़ों को सड़ा डालता है। दाँतम नीम, चतुल, खैर, महुआ, मौलासिरी की करनी चाहिए। वह कनी उँगली के बराबर मोटी और बारह अंगुल लम्बी होनी चाहिए। दाँतन इस होशियारी से दाँतों पर रगड़ना चाहिए कि जिससे मसूड़े छिल न जायें। दाँतन कर चुकने पर उसे चौरकर उससे जीभ साफ करनी चाहिए। दाँतन अगर
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न मिल सकें तो उपले की राख या नरम कोयला रगड़कर ऊंगली से दाँत साफ करना चाहिए और फिर खूब अच्छी तरह कुल्हा करता चाहिए।
जिनके मुँह, दाँत, जीभ, होठ, तालू आदि में घाव हों, जिन्हें बुखार हो, साँस-खाँसी, उल्टी, हिचकी, जुकाम, लकूआ की बीमारी हो, उन्हें दाँतन न करना चाहिए। नीचे लिखा मंजन दाँतों के लिए बहुत सुफ़ीद है :—
अम्बा हल्दी, गुलाबी फटकरी का फूला, बादाम के छिलके, कोयला, सैधा नमक और सफेद जीरा। सबको पीस-छानकर मंजन बना लेना चाहिए।
हो सके तो हफ्ते में दो-बार नहीं तो हर हफ्ते हजामत बनाने का नियम रखना चाहिए। नार्ड से बनाने के बजाय अपने हाथ से हजामत ही बनाने की आदत रखनी चाहिए। इससे एक तो खर्च की बचत होगी दूसरे नार्ड के औजारों से अक्सर छूत की बीमारी आदि के होने का डर रहता है। गाँवों में देसी उस्तद बहुत सस्ते और अच्छे मिलते हैं। शहरों में सेफ्टी-रेजर बहुत सस्ते मिलते हैं। उनसे पांच मिनट में हजामत बन जाती है। हजामत बनाकर मोटे खहर के अंगोष्ठे को पानी में भिगोकर मुँह को रगड़कर पोछना चाहिए जिससे चेहरे पर जमा मैल निकल जाय। 'नाक के बाल नहीं उखाड़ने चाहिए।' इससे आँखों की जोत कम पड़ जाती है। कभी-कभी रात को सोते समय मैस के दूध की मलाई या नीबू या संतरे के छिलके चेहरे
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दिन और रात के काम
पर रगड़ना चाहिए। इससे चेहरा चमकदार हो जाता है और भुर्रियाँ मिट जाती हैं।
दुनिया में आँखें बड़ी चीज हैं। हाथ मुँह धोने के समय आँखों को साफ ताजा पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। छँटि आँखों की सफाई मार-मार कर आँखें धोना अच्छा है। आँखले के पानी से आँखें धोने से आँखों की रोशनी तेज होती है। कभी-कभी प्याज का टुकड़ा आँखों पर मलना चाहिए। इससे जहरीला पानी निकल जाता है। असली रसौत भी आँखों में हर आठवें दिन आँजना अच्छा है। (सँथा नमक और मिश्री दोनों बराबर लेकर खव बारीक घोट लो। उनका सुर्मा आँखों की बड़ी बढिया दवा है) रोज सलाई भरकर लगाने से आँखें साफ और तेज रहती हैं।
कसरत करने से शरीर फुर्तीला, सुईल और सुखी रहता है। हाजमा सुधरता है। बुढ़ापा पास नहीं फटकता। दण्ड भरना, सुन्दर फेरना, बैठक लगाना, लाठी चलाना, दौड़ना, कुरती लड़ना, कबड्डी खेलना, ये सबसे अच्छी कसरतें हैं। इनमें कौड़ी भी खर्च नहीं होती। जब सांस जोर-जोर से आने लगे, थकावट मालूम पड़े, और साथे पर पसीना आ-जाय तब कसरत बन्द कर दो। ज्यादा कसरत करने से मांस, खॉसी, दमा, आदि रोग होजाते हैं। कसरत करके अच्छा मुखारक न खाने से शरीर मूख जाता है। भरे-पेट और रात में कसरत नहीं करना चाहिए। सर्दी में बराण्ड में और गर्मी में खुले मैदान
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में कसरत करना चाहिए। छोटे-छोटे बच्चों को खेल-कूद, दौड़-धूप, और दिल खुश रखनेवाली कसरतें करनी चाहिए। शुरू में थोड़ी-थोड़ी कसरत करे पीछे धीरे-धीरे बढ़ाये।
कसरत के बाद शरीर में तेल की मालिश करनी चाहिए। तिल का तेल सबसे अच्छा है। सिर में, हाथों में, छाती-पगली और रीढ़ की हड्डी में तथा पैर के तलुओं में खूब मालिश की जानी चाहिए। कान में भी तेल डालना चाहिए। बुखार के मरीज, बड़हजमी वाले और जिन्हें दस्त लग रहे हों, मालिश न करें। खियों को कभी-कभी उबटना भी करना चाहिए। मुने जौ का आटा या बेसन उबटन के लिए अच्छा है।
सबसे अच्छा स्नान बहती नदी या कुए का है। ताल में भी स्नान हो सकता है, पर पानी साफ़ होना चाहिए। बरसात में नदी में न नहाना चाहिए। स्नान के समय तमाम बदन को खूब रगड़-रगड़कर धोना चाहिए। जिन्हे गठिया की बीमारी हो या अजीर्ण हो, जुकाम हो, आँख, कान और दस्तों की बीमारी हो, उन्हें नहाना नहीं चाहिए। नहाकर सूखे तौलिये से बदन पोंछ डालना चाहिए।
साफ़-सादा और हल्के हों। न बहुत तङ्ग न ढीले। कम-से-कम कपड़े पहनने चाहिए। बनियान जरूरी चीज है, जो तमाम बदन के पसीने को सोख लेती है। यह स्नान के बाद रोज़ धुलना चाहिए। इसके बाद कुर्ता और धोती काफ़ी पोशाक है। कपड़ों में खहर सबसे सस्ता और आराम-
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दिन और गत के काम
देह है। हरेक स्त्री-पुरुष को स्नान के समय अपने कपड़े साबुन या सोडा जो सुलभ हो सके, उससे रोज थो डालने चाहिए। रक्तीन और गोटे-किनारी के कपड़े जहाँतक सम्भव हो काम में न लाने चाहिए। उन्हें साफ करने में बड़ी दिक्कत पेश आती है। मैले कपड़े पहनना बड़ी शर्म की बात है। जो लोग साफ कपड़े पहनते हैं, उनकी सब इज्जत करते हैं।
कुछ लोग स्नान के बाद हवाखोरी करते हैं और कुछ लोग इसके पहले। हवाखोरी के लिए खुले मैदान या सुन्दर बगीचों में जाना अच्छा है। खेतों में भी हवाखोरी के लिए हवाखोरी जाना अच्छा है। पर वहाँ गन्देशी न रहनी चाहिए। रोजाना कम-से-कम दो मील का चक्कर लगाना चाहिए। काम-काज के लिए घूमना और हवाखोरी एक बात नहीं है। हवाखोरी में मरित्पक् प्रफुल्ल रहना चाहिए। सब चिन्ता त्याग देना चाहिए। धूल उड़ती हो या तेज धूप हो या बारिश हो उस समय हवाखोरी नहीं करनी चाहिए। पूर्वी हवा भारी-भारम, और चिकनी होती है। गठिया बाय, बवासीर, बुखार और दमे के बीमारों को पुर्वा हवा में नहीं घूमना चाहिए। पच्छिमा हवा तेज, ठण्डी, और रुखी है। ज्वरम भरती है, चर्बी को सुखाती है। हवाखोरी के लिए अच्छी है। उत्तरी हवा ठण्डी और गीला करने वाली है। वरसात के दिनों में बादल खुले हों तो उत्तरी हवा में घूमना चाहिए। उत्तरी हवा में भीगना खतरनाक है। दक्षिणी हवा मन को खुश करनेवाली, खून को साफ करनेवाली, हल्की,
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ठण्डी, ताकत देने वाली और आँखों को हितकारी है। इसमें खूब धूमना चाहिए। जब चारों ओर की हवा चले तो समझना चाहिए कि कोई चवाई बीमारी फैलेगी। खबरदार हो जाना चाहिए।
भोजन हमारे शरीर को बलवान रखता है और काम करने से जो हमारी ताकत खर्च होती है, वह भोजन से पूरी होती है।
भोजन में तीन चीजें होनी चाहिए, एक पुष्टिकारक, दूसरी चिकनाई, तीसरा नमक। गेहूँ, जौ, चना, मटर, ज्वार, बाजरा, चावल, दाल, तरकारी फल आदि बारी-बारी से खाने चाहिए। अकेले चावल या दाल-रोटी ही न खानी चाहिए। हरी तरकारी भोजन की जरूरी चीजें हैं। फल अधपके खाने चाहिए। दूध, दही, छाछ और ताजा घी भोजन में जरूर रहना चाहिए। सर्दियों के दिनों में गुड़, काजू, अखरोट, मूगफली, बादाम खाने से चदन में चिकनाई और पुष्टि बनी रहती है। फलों में आड़ू, अंगूर, आम, केला, अमरुद और नारंगी बहुत अच्छे हैं। पर बीमारों को अंगूर और अनार ही खाना चाहिए। बच्चों को मिठाई न खिलाकर फल और तरकारी खिलाना चाहिए। चना, मूँग, और मोठ, ज्वार पानी में भिगोकर टोकरे में भरकर एक गीली चोरी से ढक दी जाय, जब वह उपज आवे तो उबाल कर या कच्चा ही खाने से बहुत गुणकारी होता है।
भोजन को पकाने के तीन तरीके हैं। उबालना, भूलना, और तलना। तलना अच्छा नहीं है। तला हुआ भोजन देर में पचता
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दिन और रात के काम
है, क्योंकि वह पेट में २-३ घन्टे पड़ा रहता है। रसोई घर साफ-सुथरा रहना चाहिए और वर्तन भी। वहाँ सील न रहनी चाहिए, न अँवैरा रहना चाहिए। हवा आवे और धुआँ निकलने को उसमें काफी खिडकियाँ रहनी जरूरी हैं। कूड़े-कचरे के लिए ढ़कनेदार कनस्तर या कोई वर्तन रक्खा जाय। नालियाँ पकी हों। खाना जालीदार आलमारी में रक्खा जाय जिससे मक्खी, मच्छर उस पर न बैठ सकें। चूहे, मक्खी, चीड़टी, मींगुर, और दूसरे चिन्तने कीड़े बहुत मैले होते हैं, उनके पैरों में हजारी भयानक रोगों के जन्तु चिमटे रहते हैं, जब वे भोजन पर बैठते हैं तो गन्दगी भोजन में छोड़ देते हैं। इसलिए इनसे भोजन को बिल्कुल बचाना चाहिए। चावल, दाल, तरकारी को खूब साफ पानी में धोना चाहिए और वर्तन खूब साफ करके तब खाना पकाना चाहिए। पका हुआ खाना गरम रहते खा लिया जाय। बासी खाना बहुत-सी बीमारियों की जड़ है।
खाना खाने की जगह उजालेदार और साफ-सुथरी रहे। खाना खाने के समय खूब प्रसन्न रहना तथा धीरे-धीरे चबाकर खाना चाहिए। भोजन का समय दोपहर और शाम को नियत कर लेना जरूरी है। रात को सोने से ३ घण्टा पहले खाना जरूर खा लेना चाहिए। चड़े आदमी को २४ घण्टे में दो बार और बच्चों की तीन बार खाना काफी है। जबतक पहला खाया भोजन पच न जाय दुबारा नहीं खाना चाहिए। भोजन के बाद थोड़ा दहलना और विश्राम करना चाहिए।
मुगम चिकित्सा
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दिन काम-काज के लिए बनाया है। इसलिए सुबह उठते ही काम-काज दिन-भर के काम का प्रोग्राम बनालो और उसीके अनुसार काम करो। दिन में सोना घुरी आदत है। गर्मी के दिनों के अलावा कभी दिन-में न सोना चाहिए।
तन्दुरुस्त आदमी को ज्यादा-से-ज्यादा ८ घण्टे सोना काफ़ी है। यों ६ घण्टे की अच्छी नींद भी काफ़ी है। रात को जल्दी सो जाना और सुबह जल्दी उठना बहुत जरूरी है। सोने का कमरा हवादार, खुला और साफ़ हो, ज्यादा आदमी एक कमरे में या एक विस्तार पर नहीं सोने चाहिए। बिछौने पर चादर जरूर बिछाई जाय और वह ४-५ दिन में धो डाली जानी चाहिए। सर्दियों में भी कमरा बन्द न करना चाहिए। न मुँह ढाँपकर सोना चाहिए। जलती हुई अँगूठी कमरे में रख- कर सोना बहुत खतरनाक है, ऐसा कभी न करना चाहिए।
: ४ :
ऋतु-चर्या
हिन्दुस्तान में ६ ऋतुयें होती हैं। चैत-वैसाख वसन्त। जेठ-अमाह गर्मी। सावन-भादों वरसान। कार-कातिक शरद। अगहन-पूस हेमन्त। माह-फागुन शिशिर।
गंगा के दक्षिणी किनारों के देशों में ४ महीने वर्षा होती है। एक वर्ष में दो अयन होते हैं। १-उत्तरायण २-दक्षिणायण। मकर की संक्रान्ति से कर्क की संक्रान्ति तक ६ महीने उत्तरायण और कर्क की संक्रान्ति से मकर की संक्रान्ति तक ६ महीने दक्षिणायन होता है। शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म उत्तरायण में और वर्षा, शरद हेमन्त दक्षिणायन में गिने जाते हैं। उत्तरायण में सूर्य बलवान होते हैं इससे धरती का रस सोखने से सब वनस्पति और प्राणि कमजोर हो जाते हैं। दक्षिणायण में चन्द्रमा बलवान होने से अमृत वर्षा करते हैं। इससे धरती के प्राणियों और वनस्पतियों को नया बल मिलता है।
सुगम चिकित्सा
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वसन्त ऋतु में आस्मान साफ रहता है। ढाक, कमल, मौलसिरी और आम फूलते हैं। बन-जङ्गल की शोभा बढ़ती है, ठण्डी-मन्द हवा चलती है वृक्षों में नये पत्ते और कोपल फूलते हैं।
वसन्त
वसन्त-ऋतु में सर्दी का इकट्ठा हुआ कफ पाचन-शक्ति को मन्द करता है इससे इस मौसम में कफकारी चीज नहीं खानी चाहिए। हल्का-रूखा, कडुची, कसैली और नमकीन चीज खानी चाहिए। पोशाक और बिछोना हल्का होना चाहिए। दिन में नहीं सोना चाहिए। सूख कसरत करना, धूम्रना, तैरना, गेहूँ, चावल, मूँग, जो, चना ज्यादा खाना चाहिए।
ग्रीष्म में सूरज की किरणें तेज होती हैं। धूप तेज पड़ती है। नैऋत्य कोण की भूलसाने वाली हवा चलती है। पानी सूख जाता है। वनस्पति मुर्छा जाती है। इस ऋतु में मीठी,
ग्रीष्म
चिकनी, ठण्डी चीजें—शर्बत, छाछ, दूध-लस्सी, दाल-भात, तरकारी खाना, छत पर सोना, दोनों समय स्नान करके सक्रेद कपड़े पहनना और धूप से बचना चाहिए।
वर्षा में बारिश होती है। नदियाँ जल से भर जाती हैं। धरती हरी-भरी हो जाती है। पुरवा हवा चलती है। इस ऋतु में हाजमा कम होजाता है। हल्की और जल्दी हजम होने
वर्षा
वाली चीजें सेवन करना चाहिए। थोड़ा सिरके का सेवन अच्छा है। नींबू चूसना भी फायदेमन्द है। इस मौसम में सब मौसम आ जाती हैं। कभी गर्मी, कभी सर्दी, कभी वर्षा। इसलिए पहचियात रखनी चाहिए। पानी छानकर पीना, बदन को
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ऋतु-चर्या
भीगने से बचना जरूरी है। घर के चारों ओर घास-फूस न इकट्ठी होने देना चाहिए, न सील होने देना चाहिए। हवादार छप्पर या वरांडे में सोना, मच्छरों से बचना और मच्छरदानी काम में लाना बहुत जरूरी है। नीम की लकड़ी के घुएँ से मच्छर भागते हैं। दही-छाछ, उर्दू की दाल, नदी स्नान, वारिश में भीगना त्याग देना चाहिए।
शरद ऋतु में पित्त का कोप होता है। इसलिए मौसमी बुखार आता है। घी के बने भोजन, गेहूँ, जो, चना, मूँग, चावल आदि शरद पदार्थ खाने चाहिए। यह मौसम जुलाब के लिए अच्छा है। ज्यादा मिहनत न करे, गरम चटपटे पदार्थ न खाय, दिन में न सोवे, सर्दी और धूप से बचे।
हेमन्त में उत्तरी हवा चलती है। यह ऋतु ठण्डी और बलकारी है। खट्टे-मीठे, नमकीन पदार्थ खाय। तेल हेमन्त मालिश करे। गेहूँ, उर्दू, बाजरा, तिल, ईख का गर्म रस, सेवन करे। गर्म कपड़े पहने। शिशिर में भी हेमन्त की भांति रहे।
जो आदमी तन्दुरुस्त रहना चाहता है उसे चाहिए कि रोज के काम-काज, खान-पान, रहन-सहन ऋतु और अपनी शक्ति के अनुसार रखे। मन, बचन, कर्म से पवित्र रहे। ईश्वर से डरता रहे। दीन दुखियों पर दया रखे। पड़ोसियों और सम्बन्धियों से प्रेम रखे। सत्य व्यवहार करे। काम, क्रोध, लोभ, मोह से दूर रहे। मन और इन्द्रियों को वश में रखे। क्रोध न करे। झोटों का अपराध चूमा करे। मेहमानों की खातिर करे। मीठा बोले। पराई खी और
भुगम चिकित्सा
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पराये धन पर दुरी नजर न डाले । पाप से बचे । खराब खवारी, दरखत, पहाड़ पर फजूल न चढ़े । विना बात हंसना, छींकना, नाक में उझली देना, व्यादा चक्कावास करना, दाँत कटकड़ाना, नाखूत घिसना छोड़ दे । सुने घर में अकेला न रहे, जङ्गल में न घूमें, मल-मूत्र, छींक, डकार के वेग को न रोके, अपरिचित स्थान में न जाय । इन नियमों के पालन करने से मनुष्य नीरोग रहकर बड़ी उम्र पाता है । बीमार होने पर रोग को मामूली न समझे, तुरन्त उसका बन्दोबस्त करे । रोग होने पर डरे नहीं, घर में रोगी हो तो उसे तसल्ली दे और अच्छे वैद्य का इलाज कराये । रोगी के पास विश्वासी, प्रेमी आदमी रहे । भीड़-भाड़ न रहे । रोगी का घर सूखा, हवादार हो, उसके कपड़े साफ और आरामदेह हों । जैसे डाक्टर बतावें उसी भांति दवा-पानी का बन्दोबस्त करे । इस तरह करने से असाध्य रोगी भी अच्छा हो जाता है ।
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तत्त्व की बातें
श्रुति—सत्त्व-रज-तम इनकी साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं।
पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, ये पञ्च महाभूत कहाते हैं।
इन्द्रियार्थ—गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द, ये ५ क्रम से इन्द्रियार्थ हैं।
ज्ञानेन्द्रिय—आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, ये ५ ज्ञानेन्द्रिय हैं।
कर्मेन्द्रिय—हाथ, पैर, मुख, उपस्थ और वागेन्द्रिय, ये पाँच कर्मेन्द्रिय हैं।
उभयेन्द्रिय—मन उभयेन्द्रिय है।
चौबीस तत्त्व—५ महाभूत, ५ इन्द्रियार्थ, ५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार और जीवात्मा इनको चौबीस तत्त्व कहते हैं।
जीव—गर्भाशय में गया रज-वीर्य जीव कहाता है।
गर्भ—जीव, प्रकृति और २४ तत्त्व मिलकर गर्भ कहाता है।
सुगम चिकित्सा
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शरीर—सात धातु, आशय, भ्रमनी, सिरापेशी, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय सब मिलकर शरीर कहाता है।
पुरुष—शरीर, मन और आत्मा के समवाय सम्बन्ध को पुरुष कहते हैं।
वात, पित्त, कफ, तीन दोष हैं। देह को दूषित करने के कारण इन्हें दोष कहते हैं। वात, खुरक, हल्दी, चंचल और नेता है,
पित्त गर्म, द्रव और तेज है, कफ ठण्डा चिकना और भारी है। तीनों दोष सारे शरीर में रहते हैं।
वात ५ प्रकार का है—१— उदान वायु कण्ठ में रहता है। बोलना, हँसना इसीसे होता है, इसमें खराबी होने पर हँसकी से ऊपर के रोग होते हैं। २— प्राणवायु हृदय में रहता है, यह मूह में जाता है, अन्न को यही ले जाता है, इसमें खराबी आने से हिचकी और दम की बीमारी होती है। ३— समानवायु भेद में रहता है, यह खुराक को पचाकर मल-मूत्र को अलग करता है। इसमें खराबी आने से मन्दाग्नि और अतिसार वायगोला आदि बीमारी होती हैं। ४— छ्पान वायु आँतों में रहता है; यही दस्त, पेशाब, वीर्य और गर्भ को बाहर निकालता है। ५— व्यानवायु तमाम शरीर में रहता है। इसीसे खून शरीर में दौरा करता है और यही पसीना निकालता है। इसी प्रकार पित्त भी पाँच प्रकार का होता है। पाचक पित्त भेद में रहकर खाना हजम करता है। रंजक जिगर में रहकर खून को शुद्ध करता है। साधक हृदय में रहकर बुद्धि और स्मृति को ठीक रखता है। आलेखक आँखों में रहकर रूप दिखाता है। आजक
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तत्व की वाते
चमड़ी में रहकर लेप को सुखाता है। कफ भी पाँच प्रकार का है। क्लेदन कफ आमाशय में रहकर अन्न को नर्म करता है। अवलम्बन हृदय को ठीक रखता है और सिर के वीभ को धारण करता है। रसन जीभ में रहकर स्वाद लेता है, स्नहन इन्द्रियों को पुष्ट करता है। विश्लेषण जोड़ों को ठीक रखता है।
धातु सात हैं। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य। रस का काम प्राणों को धारण करना, रक्त का जीवन धारण करना, धातु मांस का शरीर को पुष्ट रखना, मेद का शरीर को चिकना रखना, हड्डी का शरीर को खड़ा रखना, मज्जा का पूर्ण करना और वीर्य का गर्भ उत्पादन करना है।
शरीर में आठ अंग हैं। सिर, गर्दन, दोनों हाथ, छाती, पेट, दोनों कोख, पाठ और पैर। सिर में सुषुम्ना, चेष्टा- बहा और संज्ञावहा नाडियाँ, ललाट, भेजा, अंग भौं, दोनों आँखें, कनपटी, दो कान; नाक, हाँठ, गाल, दाँत, मसूड़े, जीभ, ठोड़ी और मुँह हैं। छाती में फेफड़े, हृदय, स्वास नाली, पेट और पीठ में तिल्ली, जिगर, गुर्दे और आँतें हैं।
चमड़ी सारे शरीर पर लिपटी हुई है। इसीमें छूने की शक्ति है, चमड़ी पसीना निकालने के छेद इसीमें हैं। यह दो प्रकार की है। भीतरी और बाहरी। बाहरी बहुत पतली है, गौरा-काला रङ्ग इसीमें है। जलने से फफोला इसीमें पड़ता है। भीतरी चमड़ी में ६ पतें हैं। यह मोटी है। छूने की शक्ति इसीमें है।
सुगम चिकित्सा
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रक्त जीवन का साधन है। शरीर को जीवित और चैतन्य रखता है। हृदय में इसका भण्डार है। शरीर में घूमने से वह
गन्दा होकर नीले रङ्ग का होजाता है। वह रक्त नालियों में होकर हृदय में आता है। वहाँ से
फेफड़ों में जाता है। वहाँ साँस के साथ गई हवा गन्द्गी चूस लेती है, जिससे खून साफ होजाता है और फिर लाल होकर शरीर में लौट जाता है।
छाती में बाईं ओर सातवीं पसली के नीचे हृदय है। यह माँस का बना होता है। इसमें चार कोठरी हैं। सूत में बन्द कमल के फूल के
समान उल्टा धरा है। थड्कन के साथ खुलता और हृदय बन्द होता है। इसकी लम्बाई ४ इञ्च, चौड़ाई ३। इञ्च,
मोटाई २। इञ्च है। जवान आदमी का हृदय चार से छः छटाँक तक वजनी होता है, बूढ़ी में वजन कम होजाता है। १०—१५ तोला खून हर वक्त हृदय में बना रहता है। जितनी बार हृदय थड्कता है उतनी ही बार नाड़ी चलती है।
फेफड़े साँस लेने के काम में आते हैं। ये स्पंज की तरह छेद वाले हैं। छाती के दोनों ओर दो होते हैं। इनके बीच में हृदय
फेफड़े है। इनकी शकल सूँड के आकार की है।
वजन अन्दाज़न १। सेर होता है। दाहिना कम लम्बा पर, वजनी होता है। स्त्रियों का फेफड़ा पुरुषों से हल्का होता है।
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तत्व की यातें
सूँह और गले में दो नालियाँ हैं। एक आगे एक पीछे। आगे साँस-नाली और पीछे आहार-नाली है। साँस-नाली का मुँह पर एक ढकना है, नाक का छेद भी यहाँ तक है। खाने-पीने की जरा-सी चीज भी इसमें जाने से फन्दा लग जाता है। साँस-नाली ४-५॥ इक्ष लम्बी नर्म हड्डियों के छल्ले से बनी है। नीचे जाकर इसकी शाखायें सारे फेफड़े में फैल गई हैं। यह एक इक्ष मोटी है।
आँत दो प्रकार की हैं; एक छोटी दूसरी बड़ी। छोटी आँत का सूँह मंदे से मिला है। यह कोई २० फीट लम्बी है, इसका दूसरा सिरा बड़ी आँत से मिला है। बड़ी आँत ४ से ६ फीट लम्बी है। इसका दूसरा सिरा गुदा तक जाता है। इसीमें होकर मल निकलता है।
पेट में दाहिनी ओर ज़िगर है। इसके दो हिस्से हैं और १०-१२. इक्ष चौड़ा है। वजन ११-२ सेर होता है। इसके नीचे पित्तकोष है जो अमरूद के फल के समान है।
पेट में चाँई और पसलियों के नीचे तिल्ली है। यह ५ इक्ष लम्बी २ इक्ष चौड़ी और ११ इक्ष मोटी होती है। इसका वजन १५ से २१ तोला तक है। इसका काम खून को रंगना है।
गुदे पीठ के वांस के दोनों ओर हैं। बड़े सेम के बीज के आकार के हैं। लम्बाई ४ इक्ष, चौड़ाई २॥ इक्ष, मोटाई १। इक्ष
सुगम चिकित्सा
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गुर्दे हैं। वजन ११-१२ तोला तथा रंग गुलाबी है। इनका काम पेशाब बनाना है। तन्दुरुस्त गुर्दे दिन-रात में ११ सेर के क्रीव पेशाब बनाते हैं।
मसाना नाभी से नीचे है। इसीमें गुर्दे से पेशाब बनकर आता है। यह एक प्रकार की थैली है, जब भर मसाना जाती है तब पेशाब निकल जाता है।
गर्भाशय—(स्त्रियों के) गर्भाशय दाहिनी तरफ कोख में कलश के आकार का होता है।
मस्तक अस्त्ररोट के गूदे के समान ११ सेर वजन का है। खोपड़ी में रखा है। ज्ञान और चैष्टावहा नाड़ियों मस्तक इसीमें मिली हैं। स्त्री का मस्तक कुछ हलका होता है।
मस्तिष्क की बनावट
१. बृहन् मस्तिष्क २. लघु मस्तिष्क ५. प्राचीन मस्तिष्क या सेतु ४. सुप्पुन्ना नाड़ी (Spinal cord) ३. कशेरुकायें (Vertebrae)
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