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सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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शर्मा श्री टहल

पीपल डालकर पकाने में जब पानी जलजाय तब दूध छान कर मिश्री, चीनी मिलाकर रोगी को देना बहुत लाभकारी है।

५—कमजोर रोगी को आटे की रोटी जो जल्द हज्म हो मके, बनाने की विधि यह है कि आटा गुंदाकर एक घण्टा तक पानी में भिगो रखना—फिर नूत्र ममलकर गोला बनाना, फिर एक बरतन में पानी चुल्हे पर चढ़ाकर वह गोला १५-२० मिनट उबालकर बाहर निकाल लेंना, फिर उसकी रोटी बनाना। यह रोटी बहुत जल्द हज्म होती है।

६—मच्छी-तरकारी—जैसे लोका-धीया, तोरई, पालक, चाँलाई आदि पतली रसदार बनाना चाहिए। ज्यादा मिर्च-ममाला न डालना चाहिए।

७—मूँह का स्वाद खराब होने पर पोदीना अदरख नीबू मिलाकर चटनी बनाई जा सकती है। या अनारदाने की चटनी भी फायदा कर सकती है। ताजे नीबू में नमक, काली-मिर्च मिलाकर गर्म करके चूसना फायदा करता है। मुनक्का बीज निकाल नमक-मिर्च मिला, सूई में छेद, गर्म करके खाये जा सकते हैं।

८—फलों में सेव, संतरा, अनार भीठा बेदना, पपीता, अंगूर, मुनक्का, अंजीर, गन्ना आदि मौका देखकर डाक्टर की सलाह से दिये जा सकते हैं।

: ८ :

प्रायदेमन्द इलाज

कुछ इलाज ऐसे हैं जिनमें दवा की जरूरत नहीं पड़ती और उनसे बहुत-सी बीमारियाँ अच्छी हो जाती हैं। ये कुदरती इलाज के तरीके हैं। इनमें न कोई खतरा है और न खर्च।

सूरज की किरणों से तन्दुरुस्ती का बड़ा गहरा सम्बन्ध है। सूरज की किरणें हमें ताकत देती हैं। उनमें बीमारी के कौड़ों को मार डालने की अनोखी ताकत होती है। अगर सूरज की किरणें हम शरीर को ज्यादा-से-ज्यादा खुला हुआ सूरज की किरणों के सामने रखें तो हम तन्दुरुस्त और मजबूत बने रहेंगे। जो हिस्सा सूरज की किरणों के सामने खुला रहता है उसमें फोड़-फुन्सी नहीं होता। तपेदिक के बीमार के लिए सूरज की रोशनी बहुत जरूरी है। हमेशा याद रखो कि बीमार को ऐसे कमरे में रखो जिसमें सूरज की रोशनी काफी हो।

याद रखो कि आन्न और पानी के बिना तो हम कुछ दिन जिन्दा रह भी सकते हैं, पर हवा के बिना कुछ मिनटों में भर

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फायदेमन्द इलाज

जावेंगे। अक्सर लोग यह भूल करते हैं कि बीमार के कमरे में हवा नहीं जाने देते। यह बड़ी भूल की बात है। जबतक हमें

साफ़ हवा और पानी साफ़ हवा साँस लेने को न मिलेगी हम कभी तन्दुरुस्त नहीं रह सकते।

इसी तरह पानी भी दुनिया में अमृत है। हमारे शरीर का जितना वजन है उसका दो हिस्सा पानी है। तन्दुरुस्त आदमी को साढ़े तीन सेर पानी पीना चाहिए। बीमार आदमी को खूब पानी पीना चाहिए। बुखार के बीमार को खास तौर पर खूब पानी पीना चाहिए पर यह उबालकर ठण्डा कर लिया जाय। खूब पानी पीने से पेशाब और पसीना खूब आयेगा—बुखार हल्का हो जायगा।

ठण्डे और गरम पानी से सिकार्ड करने से चोट लगने या दर्द होने पर बहुत फ़ायदा होता है। गरम पानी के सेक से नसें ढीली

पड़ जाती हैं और ठण्डे पानी के सेकने से सिकुड़ सेकना जाती हैं। इससे खून का दौरा ठीक हो जाता है।

सेकने के लिए तीन फिट लम्बा और इतना ही चौड़ा कोई खहर का या कम्बल का टुकड़ा लेना चाहिए। सेकने के लिए आधी घाल्टी उबलता पानी चाहिए। इसे अंगीठी या चूल्हे पर रखकर गरम किया जाय। सेकने के लिए कपड़े के दो टुकड़े ही काफी हैं। एक टुकड़ा मेज या चौकी पर फैला दो। दूसरे टुकड़े को तीन तह लम्बी करके उसके दोनों छोर पकड़कर उबलते पानी में डुबो दो ताकि वे खूब भीग जायें, फिर उन दोनों छोरों को उल्टी ओर से जल्दी से मोड़ो और खींचो, इससे सब पानी निचुड़ जायगा और

सुगम चिकित्सा

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हाथ भी न जलेंगे। अब इस कपड़े को फेंले हुए कपड़े में लपेटकर जहाँ सेक करना हो वहाँ सेको। (देखो चित्र नं० १) ध्यान रखो कि चमड़ी जल न जाय। जितना ज्यादा पानी कपड़े में होगा उतना ही ज्यादा गरम मालूम होगा। रीढ़ पर, पेट पर, छाती पर या हाथ-पैरों के जोड़ों पर अक्सर सेकने की जरूरत पड़ जाती है। एक बार ५ मिनट तक सेककर कपड़ा फिर पानी में डाल दो और पाव घरुटे तक सेक रखो। तकलीफ़ ज्यादा हो तो आध घण्टे भी सेका जा सकता है। सेकने के बाद अङ्ग को गीला न रहने दो।

कमर के दर्द में तेल की मालिश करने और लेप करने की वनिस्वत सादा पानी से सेक करने से जल्द दर्द आराम हो जाता है, सूजन भी कम हो जाती है और खर्च भी कुछ नहीं होता। हर्ज भी कुछ नहीं। (देखो चित्र नं० २)

सिर दर्द होने पर या शुरू-शुरू बुखार में पेड़ की सूजन या बवाई फट जाने पर पैरों को सेकने से बहुत फायदा होता है। इसकी सीधी तरकीब है यह कि एक बड़ी बाल्टी में गर्म पानी भरकर पैर उसमें डालकर मूढ़े पर बैठ जाओ और यदि पसीना लाना हो तो कम्बल ओढ़ लो। (देखो चित्र नं० ३) यह काम बन्द मकान में करो। १५-२० मिनट पैर पानी में रखो, बीच-बीच में गरम पानी पीखो। अगर पानी में एक चम्मच पिस्ती राई डाल दी जायगी तो सेक खूब तेज़ होगी। पेशाब बन्द हो जाने पर, पेड़ की सूजन में, गर्भाशय की सूजन में, योनि या अण्डकोप

चित्र नं० १ सेंकने के लिए कपड़ा गरम करने की विधि

चित्र नं० ३ पैर सेंकने की विधि

चित्र नं० २ कमर सेंकने की विधि

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फायदेमन्द इलाज

की सूजन में, गरम पानी में बैठना बहुत फायदेमन्द है। स्त्रियों को मासिक धर्म के समय जो कष्ट होता है उसमें भी इससे बहुत फायदा होता है। कूलहे का दर्द और रुक-रुककर मासिक-धर्म होने में भी यह इलाज सुफौद है। इसकी तरकीब यह है कि एक चौड़ी परात चौकी पर रखकर उसमें गरम पानी भर दो और रोगी को उसमें बैठो दो। पैरों को दूसरी बाल्टी में गरम पानी भरकर डलवा दो। १०-१५ मिनट यह सेक करना चाहिए। बदल पर पसीना लाना हो तो कम्बल उड़ाया जा सकता है। सिर पर गीला झंगोछा लपेट लेना चाहिए। ( देखो चित्र नं० ४ )

गरम पानी की भाँति ठण्डे पानी में भी इसी तरह बैठो जा सकता है। पेशाब की जलन या स्त्रियों के रक्तस्राव में इससे फायदा होता है। पास में तालाब या नदी होने पर भी यह काम किया जा सकता है। गरम पानी में बैठने के बाद जो अङ्ग गरम पानी में डूबे थे पहले उन्हें ठण्डे पानी से भीगे मोटे झंगोछे से और फिर सूखे झंगोछे से रगड़-रगड़कर पोंछ देना चाहिए।

यह यन्त्र वाज़ार में मिलता है। इसे एनीमा कहते हैं। यह बहुत काम की चीज़ है। हर गाँव में एक होना चाहिए।

पिचकारी स्त्रियों की योनि में खाज, जखम हों, सफेदे की बीमारी हो या माहवारी ठीक न हो या बच्चा पैदा होने के बाद सफाई न हुई हो तो यह पिचकारी स्त्रियों की योनि में देना चाहिए। इसकी सीधी रीति यह है कि रोगी को

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चारपाई, चटाई या तख्त पर चित्त लिटाओ। साधारण सफाई के लिए मामूली गरम पानी ही काफी हैं। पर पूंछ में दर्द हो तो पानी जरा तेज कर लेना चाहिए। बीमार से गन्ध-भर ऊँचाई पर दीवार में कील ठोककर बरतन को टाँग दी और नली को घी से चिकना करके योनि में डाल दो—पानी आने दो। मासिक-धर्म रुक-रुक कर आता हो तो दो-तीन बार दिन-भर में करना चाहिए। सकेदी की बीमारी में जरा-सी गुलाबी फटकरी पानी में मिलाकर पिचकारी देनी चाहिए।

कोठा साफ करने के लिए यही पिचकारी गुदा में लगाई जा सकती है। इसके लिए रोगी को दाहिनी करवट लिटाओ, दाहिना पैर सिकोड़ दो, बाँया फैला दो और धीरे से नली गुदा में जरा सीधी लगाकर प्रवेश कर दो। इस काम के लिए दो या डेढ़ सेर पानी होना चाहिए। सादा पानी से भी काम चल सकता है। पर पेट में भारी दर्द हो, पेट सरल हो, शुद्ध पड़ गये हों तो पानी में एक चम्मच नमक और जरा-सा साबुन नहाने का घोल दो। योनी और गुदा के काम की अलग-अलग नालियाँ बाजार में अंग्रेजी दवावालों के यहाँ मिलती हैं। इसे २। इच्छ गुदा में भीतर जाने दो। पिचकारी देने पर जब थोड़ा पानी रह जाय तब नली निकाल लो—टूटी जाने की इच्छा को जरा देर रोको और रोगी के पेट को हाथ से दबाओ। बच्चों को भी इससे लाभ होगा, पर नली छोटी होनी चाहिए। ( देखो चित्र नं० ५ )

साफ वीतल में गरम पानी भरकर खूब कसकर डांट दो और

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चित्र १-३: सेंकने की विधियाँ

चित्र नं० १

चित्र नं० २

चित्र नं० ३


चित्र नं० १— सेंकने के लिए कपड़ा गरम करने की विधि ।

चित्र नं० २— कमर सेंकने की विधि ।

चित्र नं० ३— पैर सेंकने की विधि ।

फायदेमन्द इलाज

उसे भीगे अंगोष्ठे में लपेटकर सक करने के काम में ला सकते हों, दाँत का दर्द या कमर का दर्द इससे जल्द शर्म बोलल आराम होता है। वदन में गर्मी बनाए रखने के लिए जांघ में, बगलों में, पैर की पिडलियों और टखनों के नीचे सूखे तौलिये में लपेट कर बोलले रखने से दूर तक वदन में गर्मी आयाम रन्वी जा सकती है।

एक भाक मोटे ग्वहर के टुकड़े को लेकर ठण्डे पानी में भिगोओ। और घिना निचोड़े हवा में फैलाकर २-४ मटके दो और द्विताओ हमसे कपड़ा विलकुल ठण्डा हो जायगा। उसकी ठरही गही गही बनाकर मिर पर रखने से बुखार की गर्मी कम होती है। पेड़ पर रखने से पेशाब उत्तरता है। इसमें मिर पर रखने के लिए थोड़ा सिकी और पेड़ पर रखने के लिए शोरा भी मिलाया जा सकता है।

तीसरा को जब हम नहला नहीं मकने तो स्पंज करके उसके वदन को साफ करना चाहिए। इन काम में दो अंगोष्ठे होने चाहिए। पहले भीगे अंगोष्ठे को निचोड़कर स्पंज, उससे एक-एक थक साफ करता, पीछे सूखे से पोछने जाना चाहिए। बुखार उतारने में भी स्पंज बहुत मदद देता है।

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बुखार और उसका इलाज

बुखार की बीमारी सब जीव जन्तुओं को जन्मते और मरते समय जरूर होती है। सब बीमारियों में बुखार खास है। बुखार कई किसम के होते हैं। यहाँ हम थोड़े में खास-खास बुखारों का वर्णन करेंगे।

सब किसम के बुखारों में शुरू में ये लक्षण होते हैं। मुँह का स्वाद खराब हो जाना, शरीर का भारीपन, खाने-पीने में अरुचि, आँखों में बेचैनी, नींद ज्यादा आना, हाथ-पैरों का दूटना, जम्हाई आना, बदन कोंपना, सर्दी लगना, थकान बढ़ना, रौंगटे खड़े होना, और आलस।

पीछे जब वायु का जोर हुआ तो जम्हाई आती है, पित्त का जोर होने पर अरुचि हो जाती है। सब किसम के बुखारों में चमड़ी खूब गर्म हो जाती है।

थर्मामीटर बुखार देखने की एक काँच की नली होती है। इसमें

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बुखार और उसका इलाज

भीतर पारा भरा रहता है और नलीपर नम्वर लिखे रहते हैं। इसके नीचे के हिस्से को जिसमें पारा भरा रहता है थर्मामीटर बगल में दबाकर रखना चाहिए। पहले वहाँ का पसीना पोंछ लेना चाहिए। बगल में नली इस तरह रखनी चाहिए कि पारे का हिस्सा बाहर न रह जाय। बदने की गर्मी से पारा ऊपर उठेगा। ऊपरी हिस्से में निशान और नम्वर लिखे रहते हैं। पारा जहाँतक उठे उसी हिसाब से बुखार जानना चाहिए। अक्सर चाँई बगल में नली लगाई जाती है पर मुँह में भी लगाते हैं। मुँह में जीभ के नीचे नली लगाना चाहिए। छोटे बच्चों के गुदा में लगाना चाहिए। बुखार को देखने का सबसे अच्छा समय सुबह-शाम है। लेकिन ज्यादा बीमारी हो तो १-१ या २-२ घण्टे में भी देखा जा सकता है।

(तन्दुरुस्त आदमी के शरीर की गर्मी ६०। डिग्री होती है। २५ वर्ष से कम उम्र के आदमी की कुछ ज्यादा होती है। कसरत करने, दौड़ने, छूप में रहने तथा भोजन करने से कुछ बढ़ जाती है और दिन में सोने, थकने आदि से कम हो जाती है।) मामूली बुखार में १०१। डिग्री गर्मी हो तो फिक की बात नहीं है। १०४ डिग्री तक होने से बुखार तेज गिना जाता है, १०६। होने से खतरा और १०८। होने से मृत्यु होती

सुगम विक्रिप्सा

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है । पर 'कुछ बुखार' जैसे निमोनिया में या सन्निपात में या दाह- ष्वर में १०६ या १०७ डिग्री बुखार कुछ देर को होजाता है । पर १०१ और १०५ डिग्री के भीतर बुखार ठहर जाय तो वह 'स्तर- नाक' बात है । पुराने बुखारों में रात को ष्वर कम होजाता है ।

कुछ किसिम के बुखार शोक, आनन्द, जागने, थकने, भीगने, जुकाम, नजले आदि से पैदा होजाते हैं । इन में पूरा आराम करना चाहिए । और उनके कारणों को दूर करना चाहिए ।

बात के बुखार में- कांपना, कभी सदी कभी गर्मी लगना, होठ और गला सूखना, नींद न आना, छाँक न आना, कंठज होना आदि लक्षण होते हैं ।

पित्त के बुखार में तेज बुखार, पतला दस्त, नींद कम, उल्टी, पसीना, मुँह का स्वाद कड़ुआ, जलन होना, प्यास ज्यादा, गला, होठ और नाक का पक जाना आदि लक्षण होते हैं ।

कफ के बुखार में मन्दा बुखार, आलस, मुँह का स्वाद मीठा, भूख नहीं, जी मिचलाना, नींद ज्यादा, जुकाम आदि लक्षण होते हैं ।

१—करंजुआ के बीज की मींग १ पाव लेकर उसमें १ छटाँक काली मिर्च मिलाकर चने-सी गोली पानी में बनाकर ताजे पानी के साथ काम से लेने से सब प्रकार के बुखार को फायदा करती है ।

२—गिलोय, सोंठ और पीपलामूल एक-एक पैसा-भर का काढ़ा सुबह-शाम पीने से वायु का और कफ का बुखार आराम होता है ।

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बुखार और उसका इलाज

३—गिलोय, धनिया, नीम काँ छाल, लाल चन्दन, कमलगट्टे की मींग, हरक ५-५ माशा कूट-छानकर ३ पाव जल में औंटाये, आध पाव रहे तो ६ माशा शहद मिलाकर पीये। सब प्रकार के गर्मी के बुखार को फायदा करता है।

सन्निपात के बुखार में, जिसमें रोगी बेहोश होजाता है, चक-बाद करता है या उठ-उठकर भागता है, जीभ जली हुई के जैसी होजाती है, बदन में लाल या काले चकत्ते पड़ जाते हैं, सिर में सूजन आजाती है। ऐसे रोगी का इलाज बहुत होशियार डाक्टर-बैच से कराना चाहिए। नीचे लिखा काढ़ा इसमें बहुत फायदा करेगा—

१—कटहली, सोंठ, गिलोय और कूट इनको ६-६ माशा लेकर १ पाव पानी में पकावे। १ छटॉक रहने पर छानकर दो या तीन बार पीझो।

२—काला जीरा, कूट, अरएड की जड़, बड़ा गूलर, सोंठ, गिलोय, दशमूल, कपूर, काकड़ासी, जवासा और विसखपरा सब ५-५ माशा डेढ़ पाव गाय के पेशाब में पकाकर १ छटॉक रहने पर छानकर पीने से सन्निपात में बेहोश पड़ा बीमार भी अच्छा होगा।

सन्निपात के बुखार में जब हालत बहुत खराब होजाय और नाड़ी कमजोर हो जाय, बदन ठण्डा हो जाय तो कस्तूरी और कपूर १-१ रत्ती मिलाकर पान के रस में देना और हाथ-पैरों में गरम घोलल रखना। निमोनिया में दोनों फेफड़े सूज जाते हैं। खाँसी होती है, तन्वाकू रङ्ग का मटमैला चिकना कफ़ बड़ी तकलीफ़ से निकलता

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है। छाती के छूने में दर्द होता है। यह रोग बड़ी मेहनत से आराम होता है। अतः अच्छे डाक्टर-वैद्य से इलाज कराना चाहिए।

कभी-कभी खून भी निकलता है। सातवें दिन निमोनिया पेशाब और पसीना ज्यादा आता है। तन्त्र की चाल १ मिनट में १२० तक हो जाती है, स्वर १०४ डिग्री का होता है। नींद नहीं आती, साँस कष्ट से लिया जाता है। कभी-कभी मुँह पर फुन्सी हो जाती है। कभी-कभी फेफड़ा सड़ जाता है और सड़े हुए दूध की मलाई की भाँति बदबूदार बलगम निकलता है। बूढ़े और बालक को बहुत मुश्किल से आराम होता है।

कभी-कभी इसमें वेहोशी और सरसाम भी हो जाता है। इस के लिए अगर डाक्टर का बन्दोबस्त न हो तो दशमूल के काढ़े में पीपल का चूर्ण बुरकी डालकर दिन-रात में ३-४ बार पीना चाहिए। वाजरा और नमक की पोटली से सेकना चाहिए। गरम पानी पीने को दो। कफ निकलने में कष्ट हो तो अदरक का रस नमक मिला, गरम-गरम मुँह में भरकर शूकना चाहिए।

पुराना बुखार—१० दिन बीतने पर बुखार पुराना हो जाता है। इसके लिए यह काढ़ा बहुत अच्छा है—

गिलोय, नीम की छाल, लाल चन्दन, पद्माख, मुलहठी, बुरकी, मोथा और बड़ी हरड। ४-५ माशे का काढ़ा शहद मिलाकर पीना चाहिए।

स्वर में प्यास—ज्यादा हो तो पके हुए पानी में सौँफ की पोटली बनाकर चूसने को दो।

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बुखार और उसका इलाज

ज्वरदाह—हो तो गीले कपड़े से शरीर को संज करो। हाथ-पैरों के तलुओं पर काँसे के बरतन धिसो।

ज्वर में पसीना ज्यादा हो—तो गरम-गरम भुने चने झिलिका उतारकर पोटली बनाकर पसीने की जगह फेरो। पेट्रोल या तार-पीन का तेल मलो।

( ज्वर में उल्टी होने पर—खस, चन्दन धिसकर मिश्री मिलाकर पिलाओ।

ज्वर में कब्ज होने पर—२॥ तोला अरएडी का तेल गर्म दूध या पानी में पिलाओ।

ज्वर में पेशाब रुक जाय तो—२ रस्ती से ६ रस्ती तक शोरा ठण्डे पानी में मिलाकर दो-दो घण्टे में दो।

ज्वर में हिचकी हो—तो राई का चूर्ण ६ माशा आध-सेर पानी में मिलाकर थोड़ी देर रखदो, वही पानी निथार कर रोगी को पिलाओ।

ज्वर में सूवास हो तो—मोर का पंख जलाकर शहद में चढ़ाओ।

ज्वर में खाँसी हो तो—बहेड़ा घी चुपड़ भूभल में दवा दो और मुँह में रखकर रस चूसने दो।

ज्वर में अश्वि हो तो—सैन्धा-नमक और अदरक का रस मुँह में रखकर कुल्ले करादो।

ज्वर आराम होने पर—खान-पान आदि का ऐसा बन्दोबस्त रखो कि कब्ज न रहे और बददुष्मी न हो। ज्यादा मिहनत भी न करो। बरना दुबारा बुखार आना बहुत घुरा है।

सुगम चिकित्सा

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मलेरिया, मोतीभूरा, चेचक तथा छूत के बुखारों का वर्णन हमने अन्यत्र किया है।

नीचे बुखार के कुछ आजमूसा नुसखे लिखे जाते हैं। जिनसे सब प्रकार के बुखार आराम होते हैं।

१—नीलोफर ६ माशा, खूबकलों ४। माशा दोनों को ढेढ़ पाव पानी में ओटाओ, आधपाव रहे तो छानकर थोड़ी मिश्री डालकर पियो।

२—सफेद कृष्ण ४ भाग, कपूर १ भाग, पानी में जड़ली बेर के समान गोली बनाकर सेवन करनेसे गर्मी का ज्वर दूर होता है।

३—सफेद कृष्ण १ माशा, संखिया १ रत्ती, पीस मोठ के बराबर गोली बनावे। जाड़ा चढ़ने से पहले १ गोली खाय। जाड़े बुखार की बढ़िया दवा है।

४—हरताल तबक्री, फटकरी प्रत्येक १ तोला २। माशा ग्वार-पाठा के रस में नीम के सोटे से घोंटे जिसमें पैसा जड़ा हो। १६ पहर घोटकर टिकिया बनावे और छाया में सुखाकर मिट्टी के बर्तन में ऊपर नीचे पीपल की राख भरकर कपरोड़ी कर गढ़ा खोद जड़ली उपलों की आँच दे। ठण्डा होने पर निकाले, एक चाबल खुराक है। भोजन दूध चाबल दे। एक दिन में कफ और पित्त के ज्वर को आराम करेगा।

५—हींग और नमक दो माशे सेर भर जल में ओटावे जब ६ माशा रहजाय पीवे, चौथैया जाय।

६—नोसादर ३ रत्ती कालीमिर्च दो नग वारी के दिन कूटकर खाने से वारी रुक जाती है।

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कीड़ों की बीमारियाँ

कुछ बीमारियाँ कीड़ों से होती हैं। ये कीड़े बहुत छोटे होते हैं और आँख से नहीं देखे जा सकते। ये बहुत भयानक होते हैं और जो बीमारियाँ इनसे होती हैं वे भी भयानक होती हैं। १०० में ६० माँत इन्हीं बीमारियों से होती हैं जो कीड़ों से पैदा होती हैं। ये कीड़े इतने बड़े हैं कि एक रात-दिन में एक २५ करोड़ होजाते हैं। सील, अन्धेरा, सड़ा-गला, साग-पात और गद्दों का गन्दा पानी इन कीड़ों की जन्मभूमि है। ये हैजा, चेचक, मोतीभरा, लाल बुखार, तपेदिक, डिपथिरिया, ताऊन, गर्मी, मोसमी बुखार, आदि रोगों को पैदा करते हैं। इसीसे ये बीमारियाँ छूत की कहलाती हैं। क्योंकि यह उड़कर दूसरों को लगती हैं। इसलिए सब लोगों को दो बातों में होशियार रहना चाहिए। एक तो यह कि जब ऐसी बीमारियाँ फैली हों तो अपना बचाव करे; दूसरे जब ऐसे बीमार की टहल करनी पड़े तो अपनी दिफाजत रखे। याद रखने की बात है कि यह कीड़े ४ ढंग से शरीर में घुसते हैं। या तो खाने-

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पीने की चीजों के साथ मूँह के रास्ते, या नाक के रास्ते सांस के साथ हवा में, या कहींसे चमड़ी कट गई हो तो उस रास्ते से। अथवा खटमल, पिस्सू, जूँ, या मच्छर के काटने से जिनके भीतर पहले ही से ये कीड़े होते हैं। इनसे बचने की रीति यह है कि ऐसे रोगियों के कपड़े-लत्ते, बरतन, खाना अलग रखा जाय, और अपने काम में न लिया जाय। रोगी को भी अलग कमरेमें रखा जाय, उसके कपड़े, बरतन काम में लाने से पहले गर्म पानी में खूब उथाल लेने चाहिए और उसका दस्त, पेशाव, थूक बगैरा उठाकर अपने हाथ भी अच्छी तरह साफ कर लेने चाहिए। जहाँ ऐसी बीमारी फैली हो वहाँ से कहीं चला जाना चाहिए और यदि रहना पड़े तो हरी साग-सब्जी और फल खाने छोड़ देना चाहिए। पानी उबाल कर पीना चाहिए। अपने शरीर को जरक लगने से रोकना चाहिए और मक्खी, मच्छर, पिस्सू, आदि के काटने से बचाना चाहिए।

तपेदिक बहुत खराब बीमारी है। इसे क्षय रोग कहते हैं। बहुत होशियारी से इसका जल्द इलाज करने से यह आराम हो सकता है। जिनकी पतली चपटी छातियाँ होती तपेदिक हैं और कन्धे मुके हुए रहते हैं उन्हें इस बीमारी के लगने का डर रहता है। इस बीमार का शुरुमें बज्रन कम होता जाता है। जुकाम-सा मालूम देता है, सूखी खाँसी का धसका चलता रहता है। वे लोग जल्दी थक जाते हैं। कुछ हफ्ते बाद ही उन्हें शाम को हल्का बुखार रहने लगता है। और सुबह-शाम उसके की खाँसी आती है। कुछ दिन बाद रात को पसीना आने लगता है।