सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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कीड़ों की बीमारियाँ
कुछ बीमारियाँ कीड़ों से होती हैं। ये कीड़े बहुत छोटे होते हैं और आँख से नहीं देखे जा सकते। ये बहुत भयानक होते हैं और जो बीमारियाँ इनसे होती हैं वे भी भयानक होती हैं। १०० में ६० माँत इन्हीं बीमारियों से होती हैं जो कीड़ों से पैदा होती हैं। ये कीड़े इतने बड़े हैं कि एक रात-दिन में एक २५ करोड़ होजाते हैं। सील, अन्धेरा, सड़ा-गला, साग-पात और गद्दों का गन्दा पानी इन कीड़ों की जन्मभूमि है। ये हैजा, चेचक, मोतीभरा, लाल बुखार, तपेदिक, डिपथिरिया, ताऊन, गर्मी, मोसमी बुखार, आदि रोगों को पैदा करते हैं। इसीसे ये बीमारियाँ छूत की कहलाती हैं। क्योंकि यह उड़कर दूसरों को लगती हैं। इसलिए सब लोगों को दो बातों में होशियार रहना चाहिए। एक तो यह कि जब ऐसी बीमारियाँ फैली हों तो अपना बचाव करे; दूसरे जब ऐसे बीमार की टहल करनी पड़े तो अपनी दिफाजत रखे। याद रखने की बात है कि यह कीड़े ४ ढंग से शरीर में घुसते हैं। या तो खाने-
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पीने की चीजों के साथ मूँह के रास्ते, या नाक के रास्ते सांस के साथ हवा में, या कहींसे चमड़ी कट गई हो तो उस रास्ते से। अथवा खटमल, पिस्सू, जूँ, या मच्छर के काटने से जिनके भीतर पहले ही से ये कीड़े होते हैं। इनसे बचने की रीति यह है कि ऐसे रोगियों के कपड़े-लत्ते, बरतन, खाना अलग रखा जाय, और अपने काम में न लिया जाय। रोगी को भी अलग कमरेमें रखा जाय, उसके कपड़े, बरतन काम में लाने से पहले गर्म पानी में खूब उथाल लेने चाहिए और उसका दस्त, पेशाव, थूक बगैरा उठाकर अपने हाथ भी अच्छी तरह साफ कर लेने चाहिए। जहाँ ऐसी बीमारी फैली हो वहाँ से कहीं चला जाना चाहिए और यदि रहना पड़े तो हरी साग-सब्जी और फल खाने छोड़ देना चाहिए। पानी उबाल कर पीना चाहिए। अपने शरीर को जरक लगने से रोकना चाहिए और मक्खी, मच्छर, पिस्सू, आदि के काटने से बचाना चाहिए।
तपेदिक बहुत खराब बीमारी है। इसे क्षय रोग कहते हैं। बहुत होशियारी से इसका जल्द इलाज करने से यह आराम हो सकता है। जिनकी पतली चपटी छातियाँ होती तपेदिक हैं और कन्धे मुके हुए रहते हैं उन्हें इस बीमारी के लगने का डर रहता है। इस बीमार का शुरुमें बज्रन कम होता जाता है। जुकाम-सा मालूम देता है, सूखी खाँसी का धसका चलता रहता है। वे लोग जल्दी थक जाते हैं। कुछ हफ्ते बाद ही उन्हें शाम को हल्का बुखार रहने लगता है। और सुबह-शाम उसके की खाँसी आती है। कुछ दिन बाद रात को पसीना आने लगता है।
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कीड़ों की बीमारियाँ
कभी-कभी छाती में दर्द होता है और थूक में लाल रक्त मिला जाता है। भूख मर जाती है और रोगी चिड़चिड़ा और निराश हो जाता है। इसकी खवार में रोग के कीड़े होते हैं। इसलिए उसे होशियारी से थूकना चाहिए। अगर वह मरीज लापरवाही से इधर-उधर थूक देगा, तो वह थूक धूल में मिलकर सूख जायगा और इधर-उधर उड़कर सांस के साथ मुँह में चला जायगा और बीमारी पैदा करेगा। सबसे अच्छी बात तो यह है कि बीमारी शुरू होते ही उसका इलाज अच्छे डाक्टर या वैद्य से कराओ। हरेक बड़े शहर में इस बीमारी के खास शफाखाने बन गये हैं। जिनमें ऐसे बीमारों को दवा दी जाती है।
तपेदिक कई तरह की होती है। छाती की तपेदिक में खाँसी मुख्य बात है। कपटमाल भी तपेदिक ही की बीमारी है। इसमें स्वर सूखा होजाता है और निगलने में तकलीफ होती है। हड्डियों में तपेदिक होने से टॉंग छोटी पड़ जाती है क्योंकि यह ज्यादातर फूलहे के जोड़ पर होता है। रीढ़ की हड्डी पर होने से कूबड़ निकल जाता है। बच्चों को जब कपटमाल निकलती है वह पीला और दुर्बल हो जाता है, और दुखती है और कान बहने लगता है। गले पर और आगे-पीछे गिलियाँ निकल आती हैं।
सब किसिम के तपेदिक का बड़िया इलाज यह है कि रोगी खूब आराम करे, फिक और मिहनत से बचे, हल्का और पुष्टिकारक खाना खाए, और बढ़न की ताकत बढ़े ऐसा उपाय करे। हर-चक्र ताजी हवा में रहे, धूप, धूल, भीड़ और बन्द जगह में न रहे।
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दिन में पेड़ के नीचे चारपाई पर पड़े रहना अच्छा है। उसे दूध, मलाई, चावल, गेहूँ की रोटी, मक्खन, अंगूर, दाख, हरी तरकारी और ताजे फल दे सकते हैं। पर हाजमे का खयाल रखकर। अगर आदत हो, अण्डे और मांस का रस भी दिया जा सकता है। मछली का तेल (Cod Liver Oil) जो सब अंग्रेजी दवा बेचने वालों के यहाँ मिलता है तपेदिक की अच्छी दवा है, पर यह दवा नहीं, खुराक है। सुबह सबसे पहले एक ग्लास गर्म दूध बकरी या गाय का पीना बहुत अच्छा है। इससे खाँसी कम उठेगी। मरीज को रोज दही जाना जरूरी है। अगर बुरा तैज हो तो ठण्डे पानी से स्पंज करना चाहिए। अगर मुँह से खून आवे तो उसे बिल्कुल विस्तर पर लेटे रहना चाहिए। अगर ज्यादा खून थूके तो ठण्डे पानी में साफ कपड़े के टुकड़े भिगोकर छाती पर रखना चाहिए। आराम होने पर भी ऐसे रोगी को बहुत एहतियात से रहना चाहिए, जिससे बीमारी पीछे न लग जाय। तपेदिक के मरीज को ब्रह्मचर्य से रहना जरूरी है।
१—नर्म गेहूँ घी में भूनलो। इसे २१ बार आँखों के ताजे रस में घोटो। एक छटाँक गेहूँ में एक बार में एक छटाँकरस डालो, बिल्कुल सूख जाने पर दुबारा डालो। २१ बार घुट जाने पर सुखाकर शीशी में भरलो। खुराक ४ रत्ती से एक माशा तक की है। सुबह-शाम शहद में चटाओ। सब किसिम के तपेदिक को फायदा करेगी।
२—कैकड़ा नाम का एक जानवर पानी में मकड़ी की शकल का
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कीड़ा की वीमारियाँ
होता है। वह सूखा हुआ बड़े-बड़े पंसारी की दुकान पर भी मिलता है। उसे कुल्हिया में जलालो और उसीकी राख ६ तोला, सेलखड़ी, सफेद कत्था, कतीरा, बबूल का गोंद, पोस्त के दाने, गेरू सब १-१ तोला लो। ६-६ माशा अफीम और कपूर मिलाओ। कूट-पीट कर बेर-सी गोली बनाओ। हर बक् मुँह में रखकर चूसने को दो। इससे खून थूकने में धारास मिलेगा।
३—अड़ूसे का ताजा पत्तों का रस निकाल कर २ तोला ६ माशा शहद मिलाकर सुबह शाम पीने को दो।
४—कण्ठमाल में मुर्दे की जली हुई हड्डी चिता से लाकर अण्डे की जर्दी या सिर्फें में पत्थर पर घिसकर लेप करो फायदा करेगा। साथ में बकरी के कन्धे की हड्डी कुल्हिया में जलाकर १५ दिन खाय। खुराक चबत्ती भर पानी के साथ।
५—गाय के खुर और साँग मीठे तेल में जलाकर तेल छान कर रखले। उसका कण्ठमाल की गांठों पर लेप करे।
(६—सीतोपलादि चूर्ण और न्यवनप्राश तपेदिक का बहुत अच्छी दवा है।)
हैजें का हमला अक्सर रात को होता है। घोड़े के पेशाब के समान दस्त आने लगते हैं, पेट में ऐंठन होती है, साथ ही कैं होती है। कैं में पहले खुराक निकलती है और हैजा पीछे दस्त-जैसी चीज कैं में भी निकलने लगती है। प्यास बहुत लगती है, टाँगें, बाँह और पीठ ऐंठने लगती हैं। कुछ देर बाद आँखें भीतर धसने लगती हैं और नीचे काले गढ़े
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पड़ जाते हैं। नाक नोकीली होजाती है। गालों में गढ़े पड़ जाते हैं, आंठ नीले और दँत काले होजाते हैं, शरीर ठण्डा हो जाता है। चमड़ी गीली और चिपचिपी हो जाती है। हाथों और उँगलियों की चमड़ी खुरदरी होजाती है। साँस ठण्डा आता है और पेशाब बहुत कम होजाता है। कभी-कभी कुछ ही घण्टों में रोगी मर जाता है और कभी-कभी दो-तीन दिन जीता है। रोगी के दस्तकै में रोग के अनगिनत कीड़े रहते हैं। इसलिये उसे होशियारी से फ़ैरन जला दिया जाय, बरना इधर-उधर डाल देंगे से बीमारी फैलने का भारी अन्देशा है। रोगी की सेवा करनेवाले की जान भी ख़तरे में समझनी चाहिए। इसलिये उसे बड़ी होशियारी से अपने हाथ साफ़ करने चाहियें। बच्चों को अक्सर हैजा ज़्यादा ख़तरनाक नहीं होता।
इस बीमारी का इलाज जल्द ही कर देना चाहिए। रोग शुरू होते ही पास के अच्छे चिकित्सक को बुलाओ। मरीज को चार-पाई पर लिटा दो। लेंटे-लेंटे ही दस्त कराओ। बार-बार नींबू का रस मिलाया हुआ पानी पिलाओ। खट्टी और बासी छाछ धूप में रखकर वह पीने को दो। खाना शुरू में १२ घण्टे तक कुछ मत दो। पेट पर सेक करो। बीमार को गरम रखो, गरम पानी की बोटलें बगल और जाँघों में रखो, कमबल लपेट दो, २ सेर गरम पानी में एक चम्मच नमक डालकर गुदा में पिचकारी दो। यह काम दिन में ३ बार करो। गुलाबी दवा (पोटासियम परमेग्नेट) भी पिचकारी की दवा में मिला दो। पीने के पानी में भी घोल दो। एक
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कीड़ों की बीमारियाँ
गिलास पानी में एक रस्ती दवा काफी है। यह दवा अंग्रेजी दवा-खानों में मिल जाती है। दस्त बन्द हो जायें तो चावल का माण्ड खाने को दो। पर नमक, पानी की पिचकारी और नींबू का रस मिला पानी बराबर देते रहो। पीठ के नीचे सेक भी करो। खबरदार रहो, सामूली दस्त बन्द करने की दवा न दो।
१—आक का जड़ और अदरक बराबर लेकर घोटकर काली मिर्च के बराबर गोली बना लो। हर ३ घण्टे पर एक गोली पानी से दो। रोग कम होने पर ढेर में दो।
बीमार के अच्छा होने पर उस कोठरी को चूने से पुतवा दो। बरतन आग में तपा डालो और बिस्तरा जला दो। बरना जरा-सी भूल में नारे गांव में हैजा फैलने का डर है। ईन्धे के दिनों में कच्चे फल, तरकारी, खीरे, खरबूचे आदि न खाये जायें, पानी पका लिया जाय और भूखा न रहा जाय, न ठण्डा-वासी खाया जाय।
ताऊन की बीमारी चूहों से फैलती है। पहले चूहों को यह बीमारी होती है। ऐसे चूहों के शरीर पर अनगिनत पिस्सू लिपटे रहते हैं जिनके पेट में ताऊन के कीड़े रहते हैं।
ताऊन
जब चूहे को ताऊन की बीमारी होती है, तब वह नौखलाया हुआ आंगन में चक्कर खाता है और थोड़ी देर में मर जाता है। मुनासिब है कि यह हालत देखते ही घर खाली कर देना चाहिए या उसे फिनाइल से धुलवाना चाहिए। फिनाइल का दीन वाज़ार में खूब सस्ता मिलता है। आमतौर पर यह बीमारी
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३ किसिम की होती है। एक गांठवाला, दूसरी बिना गाँठ की; इसमें उल्टी या दस्त के रास्ते खून आता है; तीसरी वह जिसमें फेफड़े सूजकर निमोनिया होजाता है। इनमें सबसे खराब वह है जिसमें गाँठ नहीं निकलती। गाँठवाला वह मरीज भी जिसकी बगल में गाँठ हो, ज्यादा खतरनाक है। तीसरी किसिम की ताऊन अकसर आराम हो जाती है। गाँठ पककर फूट जाना आराम होने की निशानी है। बदन पर खून के बिन्ते या दहोरे पड़ जाना बहुत खराब हैं। मुँह, नाक, दस्त और पेशाब के रास्ते खून गिरना भी इसी तरह खतरनाक है। गाँठ का बैठ जाना भी बुरा चिन्ह है। ताऊन का बीमार कुछ घण्टों से लेकर एक महीने तक जिन्दा रह सकता है। कभी-कभी चौबीस घण्टे के अन्दर, कभी दूसरे या तीसरे दिन, और कभी-कभी पाँचवे-छठे और सातवें दिन मरीज मर जाता है। बीमारी ज्यों-ज्यों पुरानी होती है बीमार के बचने की आशा होती जाती है।
पेट में जो कंठुए पड़ जाते हैं, वे लम्बे और गोल होते हैं, इनका छोर तुकौला होता है। ये ४ से ६ इञ्च तक लम्बे होने हैं।
ये छोटी आँतों में होते हैं; पर मेदे में भी जा सकते हैं। कभी-कभी जब उल्टी होती है वे गले तक चढ़ आते हैं। खास-नाली में चले आने से बालक का दम घुटकर मर जाने का बड़ा अन्देशा रहता है। जब बालक के पेट में कंठुए हो जाते हैं तो उसकी भूख बन्द हो जाती है और उसका जी मिचलाने लगता है, कभी-कभी पेट में दर्द भी होने
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कीड़ों की बीमारियाँ
लगता है। बालक नाक मलता है और दांत कट-कटाता है।
जब यह मालूम होजाय कि किसी बालक के पेट में केंचुएँ हैं तो दोपहर को उसे परएडी का तेल पिलादो, उसी दिन शाम को आधा ग्रैन सेन्टोनीन थोड़ी चीनी मिलाकर पिलादो। दूसरे दिन सुबह और फिर शाम को भी आधा-आधा ग्रैन सेन्टोनीन दो। इसके दो घण्टे बाद परएडी का तेल पिलाओ। इन दो दिनों में उसे कुछ तरकारी खाने को मत दो, सिर्फ चावल का माण्ड दो। सेन्टोनीन अंग्रेजी दवा है, वह बाल-बच्चे दारों को अपने घर में हरवक्त बनाए रखनी चाहिए। बच्चों के पेट में एकाध केंचुएँ होना हर हालत में मुश्किल है, ऐसी हालत में साल में एक बार सेन्टोनीन दे देना ही अच्छा है। क्योंकि ज्यादा केंचुएँ होने से तो पता चल जाता है पर थोड़ी केंचुएँ होने से न उल्टी होती है न दस्त होते हैं। ये केंचुएँ चुपचाप खुराक के रस को चूसते रहते हैं जिससे बालक की बढ़ती रुक जाती है। परन्तु यदि रखो कि सेन्टोनीन ज़हर है, उसे ज्यादा मत दो, उसके देने से पेशाब पीला होजाता है और पीला ही दीखने लगता है, पर इससे डरने की बात नहीं, एक-दो दिन में यह बात जाती रहती है।
पेट के केंचुएँ पेट में नहीं पैदा होते, खुराक और पानी के साथ इनके अण्डे पेट में जाते हैं। आँतों के ये कीड़े अनगिनत अण्डे देते हैं, और ये अण्डे दस्त के रास्ते बाहर निकलते हैं, और ज़मीन में, नदी या तालाब के पानी में, या बगीचों की हरियाली में अपनी जगह बना लेते हैं। इनमें बच्चे के लिए यह बहुत
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ज़रूरी है कि उवाला हुच्चा पानी काम में लाया जाय। सड़ी तर-कारी जो बाज़ार से मौल ली जाय उसे पकाकर खाया जाय, फलों को खाने से पहले गर्म पानी में थोकर छील लेना चाहिए। बच्चों को मुँह में उँगली नहीं डालने देनी चाहिए; न अष्ट-सष्ट चीज़ों की मुँह में रखने की आदत पड़ने देनी चाहिए। इस किसम के कीड़ों के अण्डे कुत्तों और विल्लियों की आँतों में भी होते हैं, जब वे बालक के हाथों को चाटते हैं तो ये कीड़े उनके हाथ में लग जाते हैं, फिर बालक उँगलियों को मुँह में डालकर या उन्हीं हाथों से खाना खाकर उन कीड़ों को मुँह में डाल लेता है।
दस आदमियों में से चार को कद्दूदाने की बीमारी होती है। जिनके पेट में ये कीड़े होते हैं वे बहुत सुस्त और ठीले-ढाले रहते
कद्दूदाने हैं। कद्दूदाना एक सफेद गोलाकार लम्बा और बारीक कीड़ा है। वह तिहाई इच्छ से आध इच्छ
तक लम्बा और सीने के धागे के जैसा मोटा होता है। अगर सीने के मामूली धागे को आध इच्छ के छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला जावे तो वे कद्दूदाने के जैसे दीख पड़ेंगे। ये छोटे कीड़े बच्चों और बड़ों दोनों के जिसम में घुस जाते हैं। कभी-कभी वे गिनती में बहुत कम, यानी १०-२० ही होते हैं, पर कभी-कभी उनकी गिनती हजारों तक पहुँच जाती है। वे कीड़े आँत की भीतरी परत में चिपक जाते हैं और खून को चूसने लगते हैं। वे सिर्फ़ खून ही को नहीं चूसते वहाँ घाव भी बना देते हैं जिनसे खून रिस्ता रहता है। इस तरह लगातार खून रिसने रहने से और इस जहर से जो
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कीड़ों की बीमारियाँ
इन कीड़ों से पैदा होता है आदमी दुबला और पीक पड़ जाता है, ताकत कम हो जाती है और तपेदिक होने का खतरा हो जाता है। बच्चे, जिनके पेट में कद्दूदाने होते हैं, छोटे ही रहते हैं और उनकी बढ़ावार रुक जाती है, वे १८ वीस वर्ष की उम्र में १०-१२ वर्ष के बालक से लगते हैं।
अगर तुम यह देखो कि किसी बालक की चमड़ी पीली पड़ गई है, वह सुस्त हो गया है और उसे चूना या मिट्टी रखने की इच्छा होती है तो जान लो कि इसके पेट में कद्दूदाने की बीमारी है। पाँव के तलुए और अँगूठों के बीच में खुजली चलने से यह समझना चाहिए कि कद्दूदाने पैर की चमड़ी के जरिये शरीर में घुस रहे हैं।
ये कद्दूदाने पेट में अनगिनत अण्डे देते हैं, पाखाने के साथ ये बाहर निकलते हैं, जब पाखाना इधर-उधर फँक दिया जाता है, तो ये भी फैल जाते हैं, १० दिन में इनमें से कीड़े निकल आते हैं, और घर के आँगन या बगीचे की मिट्टी में रेंगने लगते हैं। जो आदमी या बच्चे नंगे पैर चलते हैं उनके पैरों पर चढ़ जाते हैं और सौका पाकर चमड़ी में छेद करके भीतर घुस जाते हैं। और आँतों तक पहुँच जाते हैं। वहाँ मजे में खून चूसते रहते हैं।
इनके रोकने की सबसे अच्छी तरकीब यह है कि पक्के पाखानों को काम में लाया जाय, इधर-उधर मैला न फँका जाय। टह्रियों में ढकनेदार बालटियाँ हों, पाखाना दूर ले जाया जाय या गाड़ दिया जाय। अगर घर में पक्का पाखाना नहीं है तो
सुगम चिकित्सा
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यह तरकीब करो कि एक गढ़ा खोदो। उसपर लकड़ी का एक बक्स उल्टा ढक दो—उसके पीछे में एक छेद कर दो। छेद पर एक तरखा ढक दो। सन्दूक के ऊपर मिट्टी चढ़ा दो और उसे पाखाने के लिए काम में लो। कुछ दिन बाद बक्स दूसरी जगह बदल दो और पहले गढ़े को भर दो। कददूदाने मिट्टी में ६ महीने तक बने रह सकते हैं। इसलिए खेतों में और बगीचों में नंगे पैर हरगिज मत जाओ। न कभी तरकारी खाओ और न कच्चा पानी पियो। बालकों को नंगा मत रखो। ज्योंही किसी बालक या बच्चे आदमी के पेट में कददूदाने का शक हो तो उसे फौरन डाक्टर को दिखाओ।
ये बहुत छोटे कीड़े बच्चों के पाखाने की जगह होते हैं, इनसे उस जगह बड़ी खुजली चलती है, और जलन होती है, लड़कियों के पेशाब की जगह तक ये फैल जाते हैं। ऐसे चूर्न बच्चों की खुराक पर सबसे पहले ध्यान दो, ज्यादा मत खाने दो। पहले गरण्डी के तेल का एक जुलाव दो, फिर नमक के पानी की पिचकारी दे दो। वैसलीन या गोले का तेल गुदा पर चुपड़ दो। इस पर आराम न हो तो किसी डाक्टर से सलाह लो। बच्चों के पाखाने की जगह को साफ रखो।
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चमड़ी की बीमारियाँ
बरसात के मौसम में सैकड़ों क्रिस्म के कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाते हैं, उनमें कुछ इतने छोटे होते हैं जो आँखों से देखे ही नहीं जा सकते। वे कीड़े खाने-पीने की चीजों पर खुजली चढ़कर हमारे जिस्म पर पहुँच जाते हैं और चमड़ी में छेद करके कई चमड़ी की बीमारियाँ पैदा कर देते हैं। आजकल चमड़ी की जो बीमारियाँ पैदा होती हैं, उनमें खाज सब से बढ़कर है। खुजली के कीड़े पहले उँगलियों के बीच में कलाई की जड़ में या छाती और नाक के पास फुन्सियाँ पैदा करते हैं। इसमें पहले खुजली होती है, फिर खुजाने से छाले-फुन्सी और लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। यह बीमारी बड़ी छूत की है और यह छूत दूसरे को लग जाती है। इसलिए इस बात का पूरा ख्याल रखो कि जिस आदमी को खुजली की बीमारी हो रही हो उसको छूओ मत, न उसके पलंग-बिस्तर पर बैठो, न उसका भूठा खाना-पीना खाओ-पियो। उसका भूठा ढुका भी मत पियो।
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इस बीमारों का इलाज यह है कि पहले गर्म पानी में नीम की पत्तियाँ उबालकर उससे बदन को खूब मलकर साफ कर लो, पत्तियाँ न उबाल सको तो सावन से नहा लो, इसके बाद गन्धक आँवलासार तीन हिस्सा और नारियल का तेल एक हिस्सा लेकर खूब मिलाकर मलहम बना लो। यह मलहम तीन दिन तक रोज सुबह-शाम खुजलीवाली जगहों पर खूब मलो। तीन दिन तक न कपड़े बदलो, न बिछोना बदलो। तीन दिन बाद गर्म-पानी, सावुन से खूब मल-मल कर नहा डालो। जो बिछोना इस बीच में काम में लो उसे गर्म-पानी में उबालकर धोवी को दो।
बरसात के दिनों में काले और लाल मुंहवाली फुंसियाँ चहरे, कन्धों और पीठ पर अक्सर हो जाती हैं। ऐसे लोगों को कि जिन्हें
फुंसियाँ फुंसियाँ हो जायँ, मिठाइयाँ, पकवान, तम्बाकू, शराब, तेल और मिर्च-मसाले की चीजें खाना
छोड़ देना चाहिए। ठंडा पानी खूब पीना चाहिए। अगर पानी में नींबू तिचोड़ दिया जाय तो और भी अच्छा हो। नहाने के बाद, मोटे तौलिया से फुंसियों को रगड़ के मलना चाहिए। पेट साफ रखना बहुत जरूरी है। और कुछ न हो तो सनाय और नमक का चूर्न बनाकर रात को सोते वक्त गरम पानी से खा लेना चाहिए। फुंसियों के लिए यह भरहम बड़े काम का है —नीम की पत्तियों को घी में जला लो और फिर उस घी में बराबर मोम मिला लो, फुंसियों के मुंह को सूई की नोक से खोल सकते हो, मगर सूई के नोक को आग पर गर्म कर लेना चाहिए।
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चमड़ी की बीमारियाँ
अम्होरियाँ भी इस मौसम में बड़ी तकलीफ देती हैं। ये पसीने निकलने से पैदा होती हैं। इसके आराम करने की तरकीब यह है कि चमड़ी को ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर पोछो और फिर उस पर गेहूँ का मैदा छिड़क दो इससे बहुत फायदा होगा।
दाद की बीमारी आमतौर से रानों के जोड़ पर और जिसमें दूसरे हिस्से पर भी बहुत आदमियों को होती है और बरसात
में वह ज्यादा तकलीफ देती है। जिन लोगों को दाद होती है उनके कपड़े इस्तैमाल करने से
दूसरों को भी दाद हो जाता है। बाजार में दाद की बहुत-सी दवाई मिलती हैं, सबसे अच्छी दवा कैम्पकम्पनी का दाद का मलहम है जो बाजार में सब जगह मिलता है। दूसरी दवा—“गंधक, सुहागा, कल्या, तीनों चीज बराबर और सब का बारहवाँ हिस्सा तूतिया, इनको नींबू के रस में घोटकर गोली बना ली जाय और वह गोली घिसकर दाद पर मलदी जाय तो दाद को आराम हो जाता है।
चर्बों के सिर पर जब दाद हो जाती है तो उससे थाल सफेद भी हो जाते हैं और भड़ जाते हैं। यह दाद बड़ी मुश्किल से आराम होती है। वालों को मुँडवाकर दवा लगानी चाहिए।
अगर जल्द आराम न हो तो जल्द किसी अच्छे डाक्टर को दिखाना चाहिए। नहीं तो बीमारी बढ़ जायगी और बालक गंजा हो जायगा।
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एकजैमा बड़ी खराब बीमारी है, इससे चमड़ी पर चकत्ते होजाते हैं और खुजाने से उसमें पानी निकलने एकजैमा लगता है, पीछे पपड़ी पड़ जाती है और कभी-
कभी चमड़ी फट जाती है।
एकजैमा चेहरे पर, खोपड़ी पर, और जोड़ों के पास चमड़ी के तहों पर होता है। इसका इलाज बहुत ही मुश्किल है। किसी अच्छे डाक्टर से इलाज कराना चाहिए। शराब, तम्बाकू और मांस खाना छोड़ देना चाहिए। पेट को साफ रखने, फल खूब खाओ और पानी में नींबू का रस मिलाकर पीओ। साबुन और पानी उस जगह को मत छूने दो। पपड़ी को हटाने के लिए नारि- यल का तेल चुपड़ दिया करो।
जो बच्चे अक्सर लापरवाही से धूल-गर्द में खेलते रहते हैं, उनके जिस्म पर फोड़े-फुन्सी अक्सर होजाते हैं। जिन बालकों को फोड़े-फुन्सियाँ निकल रहे हों, उन्हें मच्छर और मकड़ी से सुरक्षित रखो। अगर उनकी खाल पर खरोंच लग गई है या खोंच लग गई है तो उस जगह को फौन धोकर और सुखाकर टिचर- आइडिन लगा दो, मगर घाव से पानी-जैसा निकलता हो, तो टिचर-आइडिन मत लगाओ। बोरिक पाउडर छिड़क दो और पट्टी बाँध दो। इससे वह हिस्सा पकेगा नहीं। टिचर-आइडिन और बोरिक एसिड ये बहुत मामूली दवाइयाँ हैं और बहुत सस्ती बाजार में मिल सकती हैं। ये दवाइयाँ हमेशा घर में रखनी चाहिए।
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चमड़ी की बीमारियाँ
अगर चोट लगकर चमड़ी कट जाय और घाव खुल जाय तो यह तरकीब करो कि एक गिलास ठण्डे पानी में एक बड़ा चम्मच नमक मिला दो। उस पानी में कपड़ा तर करके दो-तीन तह बनाकर घाव पर रख दो और उसके ऊपर एक माफ कागज तेल या घी में चुपड़कर रख दो और पट्टी बाँध दो, ये पट्टी हर घण्टे तर करके रखो। इससे घाव बहुत जल्द पुर जायगा।
चेचक की बीमारी उड़कर बहुत जल्दी लगती है। अगर हम इसके रोगी से बचकर नहीं रहें तो पचास कीसदी हमें बीमार
होने और मर जाने का डर है। यह रोग सबसे
आसानी से फैल जाता है। रोगी बहुत कष्ट
पाता है, जो इससे आराम होकर बच जाते हैं, उनके जिसमें भड़े और चेहरा दाग-दशीला होजाता है। दुनिया में जितने ग्रंथे दोख पड़ते हैं, उनमें से ज्यादातर इसीकी बर्दीलत हैं।
चेचक का जहर खून में, उसके दानों में, दानों की पपड़ी में, मांस में, और पसीने में होता है। इन्होंने जरिये वह एक से दूसरे आदमी में फैलता है। इसका असर देर तक रहता है। रोगी के कपड़ों में भी इसका जहर रम जाता है, इसलिये उसके काम में आड़े हुड़े चीजों, कपड़ों, चारपाइयों और मकान को बिना धोये और दवाई के पानी से साफ किये कभी काम में नहीं लाना चाहिए।
जिस आदमी को चेचक का असर होता है वह शुरू दिनों में मुस्त रहता है। फिर सदी लगकर बुखार चढ़ता है। बुखार १०४
सुगम चिकित्सा
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डिग्री तक चढ़ जाता है—बड़ी भारी बेचैनी होजाती है। तमाम बदन में और खासकर पीठ और पेट में बहुत दर्द रहता है। जी मिचलाता है, गला सूज जाता है, और जुकाम की शिकायत होजाती है।
तीसरे या चौथे दिन दाने दीख पड़ते हैं। ये दाने पहले माथे और मुँह पर नजर आते हैं, इसके बाद ही एक-दो दिन में छाती, पेट और बाकी हिस्सों में भी नजर आते हैं। शुरु-शुरु में ये बहुत बारीक और लाल रंग के होते हैं—फिर ये धीरे-धीरे ऊपर को उभरते हैं और बड़े होते जाते हैं। छूने से बहुत सख्त जान पड़ते हैं। दूसरे या तीसरे दिन उनमें पानी भर जाता है। पाँचवें दिन उनके बीच में गढ़ा पड़ जाता है और उसके आस-पास लाल चक्कर-सा मालूम देता है। इसके बाद उनमें मवाद होने लगता है और दाने फफोले की शकल में हो जाते हैं। एक-दो दिन में ये फफोले फूट जाते हैं और खुरएड बँध जाता है—या वे काले पड़ जाते हैं। फिर वे धीरे-धीरे सूखने लगते हैं। दाने के ऊपर का खुरएड ४-५ दिन में उतर पड़ता है और उसकी जगह लाल चट्टा रह जाता है। अगर दाने का असर खाल में तहतक घुस गया हो तो यह दाग हमेशा के लिए रह जाता है।
कभी-कभी आँखों पर जहर चढ़ जाता है और वे सूज जाती हैं और वहाँ भी दाने नजर आते हैं। इसीसे आखीर में आँखों में फूला पड़ जाता है, पुतली बाहर निकल पड़ती है या वे बिल्कुल ही जाती रहती हैं।
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चमड़ी की बीमारियाँ
यह देखा गया है कि चर्बों और चूड़ों पर इसका ज्यादा जोर होता है। दाने ज्यादा निकलने से, तेज बुखार आने से, फेफड़ों पर सूजन आने से रोगी की न से १३ दिन के भीतर खतरनाक हालत हो जाती है और वह मर जाता है। जवान आदमी बहुत कम मरते हैं—लेकिन गर्भवती स्त्रियों के बच्चे जीज जाते हैं। इस रोग में वृद्ध से बहुत बढ़ाव आती है।
इससे बचने की सबसे अच्छी तरकीब टीका लगवाना है। सन् १७६८ ईस्वी में डाक्टर एडवर्ड जेनर ने सबसे पहले इस तरकीब को ढूँढ़ निकाला। इस खोज से चेचक के हमले का डर जाता रहा। जिस देश में चेचक का टीका लगाने का रिवाज है वहाँ कोई ही इस रोग की चपेट में आता है और अगर आ भी गया तो उसका फौरन इलाज हो जाता है।
टीका लगवाने में जरा भी तकलीफ नहीं होती। आजकल बहुत होशियारी से टीका लगाया जाता है। वहाँ में नश्तर से तीन या चार निशान करके ग्लेसरीन में दवा मिलाकर लगा देते हैं। अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाय तो किसी बात का भी आदेश नहीं रहता। बचा अगर तन्दुरुस्त है तो उसपर कुछ भी घुरा असर नहीं पड़ेगा। टीका लगाने के तीन दिन बाद उस जगह फुसियाँ निकली हुई मालूम देती हैं जो बाद में लाल होती जाती हैं। इसके बाद ही इनके भीतर साफ पानी मालूम पड़ने लगता है। इनकी शक़ल फफोलों की तरह हो जाती है जो आठवें दिन पक जाते हैं। पानी का पीब बनता है। वह सूख जाता है, और
सुगम विक्रिता
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खुरएड जम जाता है । क़रीब-क़रीब तीसरे हफ़्ते में वह सूखकर छूट जाता है और टीके का निशान वोह पर बना रहता है । इस बात का खयाल रखना चाहिए कि खुरएड को कभी खुजाना नहीं और अपने हाथ से उखाड़ना भी नहीं । उसमें धूल-मिट्टी नहीं लगनी चाहिए, न भटका लगना चाहिए ।
यह टीका इतना सहल और मामूली है कि हम यह कभी नहीं सोच सकते कि इसके लिए कितनी भारी खोज की गई होगी । इस टीके के बारे में खोज करने के लिए जो बड़े-बड़े डाक्टरों का रॉयल कमीशन बैठा था उसने जाँच करके यह बताया था कि इस सीधीसादी तरकीब से चेचक का बहुत-कुछ बचाव होता है । अगर चेचक निकलती भी है तो ज़हर बहुत-कम असर करता है । आदमी कम मरते हैं । रोगी को तकलीफ़ भी बहुत-कम होती है ।
पहले लोगों का यह खयाल था कि बचपन में टीका लगवाने से जन्म-भर के लिए चेचक का डर नहीं रहता । लेकिन फिर यह देखा गया कि अगर १२ बरस की उम्र में फिर एक बार टीका लगा दिया जाय तो चेचक कभी नहीं निकल सकती ।
बच्चों को तीन हफ़्ते की उम्र होने के बाद तीन महीने की उम्र के भीतर-भीतर टीका लगवा देना चाहिए । दुबारा ज़रूरत हो तो १२ बरस की उम्र में लगवाया जाय ।
अगर किसी बच्चे या बड़े आदमी के चेचक निकल भी आवे तो इन बातों की संभाल रखो:—