सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
८७
छाती और गले की बीमारियाँ
२—अदरक के टुकड़े को भीतर से खोखला करके उसमें जरा-सी हींग और नमक भर दें और उसपर कपड़ा लपेटकर आटे की लोई में रख भूसल में गाड़ दें। जब सीमक जाय, सुगन्ध आने लगे तो आँच से निकाल, छीलकर खाय तो आवाज खुल जायगी।
३—चावल गुड़ में पकाकर सोते समय खाय। एक घण्टे पीछे दो चमचे गुन-गुना पानी पीवे। तीन दिन में आवाज खुले।
४—जो सिंदूर खाने से गला खराब हो तो दीये का गुल पान में रखकर खाय।
: १३ :
पेट की बीमारियाँ
इसे जलन्धर भी कहते हैं, इसकी तीन किस्म है। एक वह जिसमें जोड़ों में सूजन आजाती है। इसकी उत्पत्ति क्लेजे की खराबी से होती है; दूसरा जलोद्बर वाः जिसमें पेट बढ़ जाता है और चमड़ी भारी हो जाती है। पेट पानी से भरी हुई मशक की भाँति नन जाता है, नाभि का गढ़ा भर जाता है, पेट पर उँगली से ठोकने पर तबले के समान आवाज निकलती है ; तीसरा वालोद्बर जिसमें पेट कड़ा हो जाता है तथा दस्त-पेशाब का बन्द लग जाता है।
इस रोग में पानी पीने को नहीं देना चाहिए। ऊँटनी का दूध ही पिलाना चाहिए, या साँक और मकोथ की पोटली पानी में उबालकर वह पानी देना चाहिए। सूरज की ओर पीठकर धूप में बैठावे। रोगी को सहते हुए गर्म बालू रेत में छाती तक दबा दे। और जितनी देर मुमकिन हो दबाये रखे। तेज जुलाब दे।
१—एक छटाँक खिले हुए चने का बेसन लेकर उसपर थूहर
८६
पेट की बीमारियाँ
का दूध इतना निचोड़ो कि घोल हो जाय। फिर घी में उसकी पकोड़ियाँ तोड़ लो और उन्हें पानी में खरल करके कालीमिर्च-सी गोलियाँ बनालो। दो-से-चार गोली तक रोगी की ताकत देखकर जुलाव के लिए ठपड़े पानी के साथ दो। यह जुलाव दूसरे-तीसरे दिन देते रहो।
२—पुराने लोहे का मैल जो अक्सर गाँवों के खेड़े में या पुरानी जगहों में दवा मिल जाता है, आग में लाल करके तीन बार गाय के पेशाब में, तीन बार एक पाव छाछ में और तीन बार सरसों के तेल में बुझवा दो। फिर कूट-छानकर दस सेर गाय के पेशाब में घोलकर लोहे की कड़ाही में ढाल चूल्हे पर रखकर पानी जला दो। जब नमक-सा जम जाय तो कूट-छानकर एक दुअन्नी-भर उसमें से रोगी को खाने को दो।
३—खूब सड़ा हुआ हुक्के का पानी रोगी को दो। मात्रा, दो तोला।
४—गोबर जलाकर उसकी साढ़े तीन माशा राख की फंकी कराओ।
५—इन्द्रायन की जड़ पानी में पीसकर पेट पर लेप करे और फल पानी में उबाल कर पीवे।
तिल्ली पेट की बाँई और पसली के नीचे होती है। मलेरिया
मुखार के बाद या अन्य कारणों से भी यह तिल्ली कभी-कभी बढ़कर कछुए के बराबर सारे पेट
में फैल जाती है। उसका इलाज यह है—
सुगम चिकित्सा
६०
१—चूना बिना बुभा हूआ और एक रीठे की भाँग घूटकर केले की पक्की फली के टुकड़े में रखकर दाहिने पहुँचे के नीचे जोड़ पर बीच की उँगली के सामने एक पहरतक मोटे कपड़े से बाँध रखो। बम बहो फसोला पड़ जायगा। उसे चाकू से न्योलकर पानी निकाल दो। निल्ली को आराम हो जायगा।
२—अजवाइन जितनी खा सके दोनों समय खाय।
३—सरसों का तेल निल्ली पर गुन-गुना मले।
४—मूली के बीज पीसकर निरके के साथ खाय।
५—अगर बुखार न हो तो ६ माशा मन्नी गुड़ में मिलाकर खाय।
जिसमें मरोड़ के साथ आँव थोड़ा-थोड़ा चार-चार निकलना है, कभी-कभी खून भी जाता है और मवाद पेशिश पड़ जाता है।
१—सोंठ, कालीमिर्च, बड़ी हरड का छिलका, तीनों चीजें बराबर लो, फिर तबे पर घी छोड़कर उन्हें अलग-अलग भून लो। भुन जाने पर उतना ही कालानमक मिलाकर कूटकर चूर्ण बना कर छः-छः माशा की पुड़िया बनाकर आध पाव दही के साथ मिलाकर खिलाओ। दिन में दो या तीन बार दही-भात भोजन दो। जल्द आराम होगा। प्यास लगने पर गर्म पानी पीना चाहिए।
२—सोंफ को घी में भूना, फिर कूट-छानकर बराबर कच्ची खाँड़ के साथ मिलाकर मादे मात माशा खाय, और ऊपर से ताजा पानी पीवे। तो खून पेशिश को फायदा करे।
६१
पेट की बीमारियाँ
पतले दस्त होने पर अफीम और पान में खाने का चूना मिला- कर मोठ के बराबर गोली बनाकर सुवह-शाम दस्त पानी के साथ खाय ।
अगर खाना न पचने से पेट में दर्द हुआ हो तो नमक का पानी पिलाकर उल्टी कराओ । एक सेर गर्म पेट का दर्द-शूल पानी में एक चम्मच नमक काफी है । फायदा होने पर पतली खिचड़ी खिलाओ ।
बाड़ी का दर्द हो तो गेहूँ की भूसी, साम्हर और बाजरा की पोटली बना, तबे पर गर्म करके सेको । अजवाइन डेढ़ माशा की गर्म पानी से फंकी लो ।
१—सुहागा सुना सात माशो, अजवाइन तीन तोले, कालीमिचे साढ़े तीन तोले, एलुआ चार तोले आठ माशा, कूट-छानकर पाठे के रस में चने बराबर गोली बनाना । सब प्रकार के शूल को दूर करे । बाड़ी में तीन गोली अजीर्ण में दो गोली काफी है । पेट बढ़ जाने पर यह दवा बहुत गुण करती है ।
२—भूख बढ़ाने की यह दवा सबसे अच्छी है—लाल मिर्चे नीवू के रस में चालीस दिन घोटे, फिर दो रत्ती पान में रखकर खाय ।
३—सनाय, सोंफ, बड़ी हरड का छिलका, नमक सैधा, बरा- बर कूट-छानकर चूर्ण बनाना । छः माशा चूर्ण गर्म पानी से फंकी लेने से दस्त साफ लाता है ।
सुगम वाक्यस्य
६२
उल्टी और जी मिचलाना १—थोड़ा गेहूँ आग में लाल करके पानी में बुझाओ, वह पानी थोड़ा-थोड़ा पिलाने से उल्टी दूर होती है।
२—नीम की टहनी पत्तों सहित भूभल में दवा दो, गर्म होने पर पीस-छानकर पीने से जी मिचलाना और उल्टी आराम होती है।
३—इमली में रूखने से जी मिचलाना बन्द होता है।
४—अगर उल्टी में कफ निकलता हो तो यह करे कि एक चम्मच में घी गरम करो, उसमें दो बत्ताशे डाल दो, एक घड़ी के अन्तर से एक-एक बत्ताशा खाओ, तो कफ की उल्टी दूर हो।
एक माशा, हाँग एक तोला घी में गर्म करो। फिर एक मिट्टी का दीवला खूब लाल करके उसमें वह हाँग और घी डाल दो और उसे एक पाव दूध में दीवले समेत छोड़ दो। वह दूध पीने से शूल और अफारा दूर होगा।
२—नाभी में हाँग का फाया रखने से भी अफारा दूर होता है।
३—निसोत दो हिस्सा, पीपल चार हिस्सा, हरड्ड बड़ी पाँच हिस्सा, सबके बराबर गुड़, कूट-पीसकर चार आने-भर की गोली बनाकर गर्म पानी से सेवन करने से अफारा दूर होता है।
दिल के पास, पसलियों के नीचे, नाभि के नजदीक और मसाने में एक गाँठ पैदा होजाती है, उसे गोले वाय गोला की बीमारी कहते हैं। जब यह बीमारी पैदा होने को होती है तब भूख नहीं लगती, दस्त में कब्ज हो जाता है, पेट
६३
पेट की बीमारियाँ
में गुड़-गुड़ आवाज़ आती है, पेट फूल जाता है, तथा दर्द रहता है। जहाँ गोला होता है वहाँ दर्द ज्यादा रहता है।
१—साँठ चार तोला, सफेद तिल सोलह तोला, पुराना गुड़ आठ तोला, इकट्ठा पीयकर आधा तोला या एक तोला गरम दूध के साथ इस्तेमाल करने से सब प्रकार का गोला आराम होता है।
२—आधा तोला सज्जी और इतना ही गुड़ मिलाकर खाने से भी चायगोला आराम होता है।
इस बीमारी में हल्का भोजन करना और ज्यादा मिहनत नहीं करना चाहिए। पेट साफ रखना भी बहुत जरूरी है।
: १४ :
बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
ये बीमारियाँ बहुत मुश्किल से आराम होती हैं। इनका इलाज हमेशा अच्छे वैद्य या डाक्टरों से कराना चाहिए। फिर भी हम यहाँ उनके विषय में साधारण इलाज लिखते हैं।
गुदा के ठीक सँह पर या कुछ भीतर छोटी-छोटी गिल्टियाँ बन जाती हैं। ये गिल्टियाँ इस भाग की नसों के सिकुड़ने से पड़ जाती हैं। इसकी जड़ कब्ज है। इसलिए इस बवासीर रोग में सबसे पहला काम कब्ज को दूर करना है। बवासीर दो प्रकार की होती है, एक खूनी दूसरी वादी।
खूनी बवासीर में एकाएक रक्त को बन्द नहीं करना चाहिए। हाँ खून ज्यादा निकले और रोगी कमजोर होजाय तो बन्द कर देना चाहिए।
१—चूतड़ की हड्डी पर सींगी लगावे तो बवासीर को आराम हो।
२—एक बड़ी मूली लेकर खोखली कर लो और उसमें जितना ,
६५
बड़ी बड़ी बीमारियाँ
गूगल समा सके भर दो। फिर उसीके छिलके से बन्द करके डोरे से लपेटकर साफ भरती में गाढ़ दो और पत्ते तोड़ दो। समय समय पर पानी देते रहो दस पन्द्रह दिन में दुबारा पत्ते निकलेंगे तब उखाड़ मिट्टी दूरकर मूली और दवा घोट-पीसकर वेर के समान गोली बना लो। एक गोली सुबह एक शाम को खूनी में गर्मपानी से और बादी में ताजे से ला; फायदा होगा।
अगर बवासीर का दौरा हो रहा हो, दर्द, चमक खुल जारी हो तब यह दवा बनावे। गूगल तीन तोला नीम की निचोली तीन तोला, गुड़ पुराना तीन तोला कूट-पीटकर २२ गोली बनाओ एक सुबह एक शाम को ताजा पानी से लो। ११ दिन में फायदा हो जायगा।
३—अगर गुदा सूख गई हो, तकलीफ ज्यादा हो तो यह पुल-टिस बाँधो। भांग, हल्दी, पोस्त के डोडे, गुगल, प्रत्येक एक-एक तोला। बकरी का दूध दश तोला, दूध में लुगदी के समान पीस आग पर पुलटिस-सी पकाकर गर्ग-गर्मे बाँध दो। बहुत आराम मिलेगा।
४—क्रुञ्ज हो तो एनीमा दो।
५—जख्म हो गये हों तो यह भरहम लगाओ; छुरी या बन्दूक की गोली, या सीसे का टुकड़ा लेकर ताजा सकखन में घिसकर नीलेखा का भरहम बनालो। आवदस्त के बाद जंगली से अच्छी तरह यह भरहम लगाओ। तुरन्त ठण्डक पड़ेगी।
बवासीर के बीमार को मूली, वधुवा, जमीकन्द, गाजर और छाछ फायदा करती है।
सुगम चिकित्सा
६६
यह बहुत घुरी बीमारी है। इस में आँतों में खराबी पैदा हो जाती है और खाया हुआ पदार्थ ज्यों-का-त्यों निकल जाता है।
कभी-कभी तो २० से ३० तक दस्त दिन-रात में संग्रहण्यो होते हैं, पर कभी-कभी सिधे-सिधे ही दस्त होते हैं। पर बहुत भारी और कच्चे दस्त के बाद रोगी सुस्त और कमजोर होजाता है, खून की कमी हो जाती है। और फिर हाथ पैर और सर्वाङ्ग में सूजन आजाती है। और तब रोग असाध्य हो जाता है। रोग शुरू होते ही अच्छे चिकित्सक का इलाज कराना चाहिए। रोगी को पलंग पर लेटे रहना चाहिए। टट्टी भी लेटे-लेटे ही करनी चाहिए।
इस रोगी को सिर्फ़ गाय की छाछ या दही या गाय का फोका का दूध ही दिया जा सकता है। अन्न बिल्कुल बन्द कर देना चाहिए; जैसे दुखती आँख में रेत डाल देने से कष्ट होता है उसी भाँति इस रोग में अन्न खाने से कष्ट होता है, क्योंकि आँतें सूजी हुई रहती हैं। और उनमें घाव हो जाते हैं।
यद्यपि इस रोग का इलाज कठिन है फिर भी यहाँ हम एक बहुत उम्दा नुसखा लिखते हैं—
१—शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक दो तोला, सोंठ, मिर्च, पीपल प्रत्येक तीन-तीन तोला, हींग एक तोला। सबके वजन के बराबर भाँग, जो धोकर सुखाकर साफ़ कर ली गई हो, सबको कूट-छानकर चूर्ण कर लेना चाहिए। इस चूर्ण की मात्रा एक मासो से दो मासो तक है। दिन में ३ बार ताजा गाय की छाछ देना
६७
. वही-वही बीमारियाँ .
चाहिए। सिर्फ छाछ ही पीने को देना, और सब अन्न-जल बन्द करना चाहिए। रोग चाहे कैसा ही बढ़ गया हो फायदा हो जायगा। इस दवा में गन्धक पारा शुद्ध लिखा है—सो इन चीजों को शोधने की विधि अन्यत्र है, उसीके अनुसार शोधना चाहिए। आराम होने पर भी रोगी को परहेज कर खाना खाना चाहिए—खासकर मिठाई से बचना चाहिए।
रुखा, ठण्डा और खराब खाना बहुत दिन तक खाने से यह रोग होता है। कभी-कभी चोट लगने, गठिया वाय और लकूआ गर्मी की बीमारी होने और अन्य कारणों से भी यह बीमारी होती है। इसके बहुत भेद हैं। हम सिर्फ मोटी-मोटी बातें लिखेंगे।
गठिया-वाय में हाथ-पैरों के जोड़ों में पहले दर्द रहता है फिर वे जकड़ जाते हैं और फिर बड़ा कष्ट होता है। इसका एक बहुत अच्छा नुसखा यहाँ हम लिखते हैं—
१—एक तोला संखिया, एक तोला अक्रकरा, एक तोला लोंग और १०० बड़ला पान। तीनों दवाइयों को खरल में डालकर कूटना शुरू करो। एक-एक पान डालते जाओ, जब सब पान घुट जायें, मोठ के समान गोली बनालो। एक गोली सुबह एक शाम को गर्म पानी या दूध के साथ देना। तर पुष्टिकर भोजन करना। मूंग की दाल न खाना। गर्मी करे तो घी ज्यादा खाना। यह इस बीमारी की बहुत कारगर दवा है।
२—भिलावा १० नग, धतूरे का पूरा पेड़ एक, सीठा तेलिया
सुगम चिकित्सा
६८
१० तोला, मीठा तेल आध सेर, मालकगनी १० तोला सबको आग पर पकाओ। जब भिलावे जलकर तैरने लगें तब उतारलो इस तेल की मालिश से सब किसम का बादी का दर्द आराम होता है। यह तेल मुँह-आँख में न लगना चाहिए।
लकुए की बीमारी का इलाज आसान नहीं है। ज्यादा दिन न घुलाकर जल्द ही उसका इलाज करना चाहिए। रोगी को खूब आराम से रखना चाहिए। लकुआ दो किसम का होता है, एक दाएँ से बाँया आँख अङ्ग का, दूसरा ऊपर या नीचे के धड़ का।
१—उर्दू, कौच की जड़, अरएड की जड़ और खरेटी इनको ६-६ माशा लेकर एक पाव पानी में काढ़ा करना। इसमें एक माशा हींग और एक माशा सैन्धा नमक मिलाकर पिलाता। अगर किसी का मुँह टेढ़ा होगया हो तो लहसन कूटकर मक्खन के साथ खाने से फ़यदा होता है।
२—१५ कुचलों को १५ दिन पानी में भिगोवे, तीसरे दिन पानी बदलता रहे। १५वें दिन जब नरम होजायें छीलकर सुखाले, और आँख में भस्म करले, जब धुआ न रहे, तो पानी में काली मिर्च के समान गोली बनाये। एक-एक गोली रोज़ खाय। लकुआ, अधर्झवात और कमर के दर्द को फ़ायदा करे, ठण्डी प्रकृति को गरम करे।
कोढ़ की बीमारी दूसरे कोढ़ी के छूत से लगती है। यह रोग कीड़ों द्वारा पैदा होता है। शुरु में इस रोग में सिर दर्द और शरीर के भिन्न-भिन्न अङ्गों में दर्द होता है, ठण्ड लगती है और बदन सुन्न
६६
बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
हो जाता है। पसीना ज्यादा आता है। पसीना या तो सारे शरीर में या एक अङ्ग में होता है। चेहरे और दूसरे अङ्गों में दाने निकल आते हैं। दाढ़ में माथे में, गालों में, नाक में, कान में, आँठों में गांठें पड़ जाती हैं, डाढ़ी-मूँछ और पलकों के बाल भड़ जाते हैं। और अन्त में पलकें, नाक, उँगलियाँ, अँगूठे और शरीर के और-और भाग सड़कर गिर पड़ते हैं।
दूसरे प्रकार के कोढ़ में चमड़ी सुन्न हो जाती है। इसमें पहले हाथों और टांगों में तेज दर्द होता है, पीछे चमड़ी पर धन्ने दीखते हैं, वे पहले लाल और पीछे सफेद हो जाते हैं। बाल भड़ जाते हैं, ऊँगलियाँ पड़ जाती हैं, कुछ दिन बाद नसें सुन्न हो जाती हैं, उँगलियाँ-अँगूठे और शरीर के दूसरे अङ्ग सड़कर भड़ जाते हैं।
मालूम होना चाहिए कि देश के हर सूवे में कहीं-न-कहीं सर्-कारी कोढ़ के अस्पताल बने हुए हैं। जहाँ कोढ़ के बीमारों को ठीक तौर पर रखकर उनका इलाज किया जाता है और कुछ खर्च भी नहीं होता। इस रोग के शुरू होते ही फौरन ही अस्पताल में बीमार को भेज देना चाहिए।
अगर ऐसा होना किसी कारण से मुमकिन न हो तो कोढ़ की सबसे बढ़िया दवा चोलमोगरे का तेल है जो किसी भी अच्छे अंग्रेजी दवा फ़रौश के यहाँ से मिल सकता है। इस तेल की आठ से बीस चूँद तक रोगी को मिश्री या वताशे में डालकर दिन में तीन बार बीमार को देना चाहिए। यह तैल साधारण खुजली से लेकर
सुगम चिकित्सा
१००
आतशक, कोढ़ और चमड़ी की सब बीमारियों पर फायदेमन्द है। वात रक्त की बीमारी, जिसमें घुटनों से नीचे और कोहिनियों से नीचे घाव होजाते हैं उसमें भी मुफ़ीद है। कण्ठमाला की बीमारी में भी यह फायदेमन्द है। बढ़ते-बढ़ाते इसकी मात्रा बीस बूँद तक की जा सकती है, पर खयाल रखना चाहिए कि यह दवा हज्म देर से होती है। जिन रोगियों का हाज्म खराब हो उन्हीं कम देना चाहिए। यह दवा खाली पेट नहीं देना चाहिए, बल्कि खाना खाने के एक या आधे घण्टे के पीछे देना चाहिए। यह दवा असाध्य कोढ़ को भी फायदा करनेवाली बताई जाती है। कोढ़ की शुरुआत में इसका उपयोग किया जाय तो जल्द फायदा होगा। यह तेल दूध में भी डालकर दिया जा सकता है। जबतक यह दवा सेवन की जाय, नमक, मिर्च, मसाला खटाई आदि बिल्कुल छोड़ देना चाहिए। धी-दूध मक्खन झबू खाय। गुड़ खाएड त्याग देना चाहिए। खयाल रखना चाहिए कि बढ़िया दुकान से खालिस तेल खरीदा जाय, क्योंकि अक्सर लोग मिलावट कर देते हैं।
सफेद दागों का एक अच्छा नुसखा यहाँ लिखते हैं। अगर रोग तीन साल से कम का होगा तो दो-तीन महीने में अवश्य अच्छा हो जायगा। गेरू, हल्दी, कवाव चीनी, बाबची चारों चीजें बराबर लेकर चूर्ण बनाओ। छः माशा दवा रात को मिट्टी के शकोरे में भिगोदी जाय। सुबह ऊपर का पानी नित्यारकर शहद छः माशा मिलाकर पीलिया जाय। बाद को गांठों पर लेप कर लिया जाय।
शरीर के ऊपरी हिस्से की बीमारियाँ / ९९
मुँह के रोग—
१—होंठ फट जाय या घाव हो जाये तो घी में मोम मिलाकर लगाओ ।
२—दुखती डाढ़ में होशियारी से सेहुंड के दूध का फाया रक्खो । दर्द उसी समय बन्द हो जायगा और डाढ़ टूट-टूट कर गिर जायगी, कष्ट न होगा । पर दूसरी डाढ़-दाँतों में न लगे ।
३—मौलसिरी की छाल का कुल्ला करने से भी दुखती डाढ़ को आराम होता है ।
४—जो दाँत सड़ गया हो, पीप जाती हो, जड़ें हिल गई हों, काला पड़ गया हो, उसे जल्द-से-जल्द उखाड़ दो । वरना जहर पेट में जाकर और बीमारियाँ खड़ी करेगा ।
५—जीभ फट गई हो या छाले पड़ गये हों या मैली रहती हो तो सबसे पहले जुलाब लो, फिर केले की जड़ का रस और मिश्री लगाओ ।
६—मुँह सूज गया हो तो जामुन, आम, मौलसिरी और चमेली के पत्तों के पानी का ग़रारा करो ।
कान के रोग—
१—कान में दर्द हो तो लौंग कड़वे तेल में जलाकर गुन-गुना कान में डाले ।
२—कान बहने लगा हो तो पिचकारी से साफ़ कर कौड़ी पीली कुल्हिया में जलाकर काग़ज़ की नलकी से उसकी राख कान में फूँक दो ।
सुगम चिकित्सा
१०२
३—कान बहरे होजायें या घुन-घुन शब्द सुनाई दे ती अदरक का रस शहद, सैधा नमक और तिल का तैल मिलाकर कान में वार-वार भरो।
४—कान में कोई कीड़ा घुस गया हो तो कोई-सा भी तेल गुन-गुना करके कान में डाल दो।
५—कान बेथते समय अनाड़ीपन से कान सूज जायें तो मुल-हठी, मजीठ और अरण्ड की जड़ पीस घी-शहद मिलाकर लेप कर दो, पक जायें तो ज़रूम की तरह इलाज करो।
नजला-जुकास कहने को मामूली रोग हैं, पर बड़ी तकलीफ देता है। यह खयाल शलत है कि ठण्ड लगने से जुकास होता है।
नाक के रोग जुकास तो दूसरे बीमारों से उद्दरक लगता है।
झोंक आना, नाक बन्द होना या बहना, सिर का भारीपन जुकास का साधारण चिन्ह है। इस बीमारी में पसीना लेना अच्छा है। खूब मेहनत करो, गरम पानी से नहाओ और गरम पानी पियो। गरम पानी में पैरों को रखो और गरम पानी बहुत-सा पियो। ऊपर कम्बल ओढ़ लो, जिससे खूब पसीना आवे। झन्झ हो तो हल्का जुलाव भी ले लो।
( १—गोहूँ की भूसी चार माशा, गिलोय चार माशा, सोफ चार माशा, काली मिर्च सात दाने, मुनकका सात दाने। पाँच छटाँक पानी में पकाओ, दो छटाँक रहे तो दो तोला मिश्री मिला-छानकर पीओ, जुकास की बहुत अच्छी दवा है। )
२—वनकसा एक तोला इसी तरह पकाकर पियो।
१०३
बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
( नाक कभी गीली रहे कभी सूखी और सुगन्ध-दुर्गन्ध का ध्यान भी न रहे तो यह पीनस रोग कहाता है। इस रोग में शुरु में ही गुड़ और दही के साथ काली मिर्च का चूर्ण खाने से बहुत फायदा होता है।
३—उपले की राख आक के दूध में तर करके छाया में सुखाले, उसका नास लेने से बहुत बढ़िया नास होजाता है। तड़ा-तड़ झोंक आती है। सिर हलका हो जाता है।
१—सुनी फटकरी साड़े तीन तोला, हल्दी सात माशा, अफीम पांच माशे, पके काराजी नींबू के रस से लोहे की कड़ाही में मन्दी आँख से पकाओ और पानी में रगड़कर आँख और से ऊपर पतला-पतला लेप करो, तो आँख का दुखना, सूजन और कोयों की सुर्खा को फायदा करेगा।
२—ग्वारपाठे का गूढ़ा एक माशा, अफीम एक रत्ती, पीसकर पोटली बाँध, पानी में भिगोकर आँखों पर फेरो। एक बूँद आँख में भी टपका दो। आँख दुखने के लिए बहुत अच्छी है।
३—गर्मी से आँख दुख रही हो तो मंह के पानी में थोड़ी-सी फटकरी डालकर दिन में तीन-चार बार पीपल के पत्ते से टपका दो।
(४—नीम की कोपल पीसकर उसका रस कान में टपकाने से बच्चों की आँख आनी अच्छी हो जाती है। पर दाहिनी आँख आई हो तो बायें कान में और बाई आँख आई हो तो दाहिने कान में टपका ले। बड़े आदमी के कानों में इसीभाँति धतूरे के पत्ते का रस गुन-गुना कर टपकाने से फायदा होगा।
सुगम चिकित्सा
१०४
५—बड़ का दूध आँख में आँजने से आँख आना जल्द अच्छा होता है।
६—लड़की के मूत्र में फाया भिगोकर बाँधने से बच्चों की आँख आना आराम होती है।
७—काली मिर्च, कबीला और पीपल छोटी वरावर ले, महीन पीस सुर्मे की भांति आँख में आँजने से रतौंध आराम होता है।
८—प्याज का रस आँखों में लगाने से रतौंध दूर होता तथा नेत्रों की ज्योति ठीक होती है।
९—हूक के नेचे का चीकट आँख में आँजने से रतौंध आराम होता है।
१०—पलकों का मोटा होजाना, खुजली चलना, खुरकी होना, बालों का गिर जाना, इसके लिए यह दवा बहुत उत्तम है। जस्त दो तोला चार माशा, लोहे के वासन में कोयले की आँच कर पिघलाकर उसपर थोड़ा-थोड़ा वशुए का रस टपकावे। पीलिया सफेद भस्म हो जायगा। उसे आँख में आँजना चाहिए।
(११—जब आँखों के आगे मच्छर या मक्खी उड़ते दिखाई दें और दिन-दिन इसमें विशेषता होती जाय तो जानना चाहिए कि मोतियाबिन्द होगा। इसका शुरू में ही इलाज हो सकता है। बाद में कटवाना ही पड़ता है। नौसादर को सुर्मे की भांति पीसकर आँजने से मोतियाबिन्द में बहुत फायदा करता है।
१२—यह दवा मोतियाबिन्द की बहुत बढ़िया है—इमली के
१०५
बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
पत्ते दस तोले फूल-कांसी के कटोरे में नीम के सोटे से घोटे, जिस में पैसा गड़ा हो, यहोंतक कि गाढ़ा होजाय । पीछे बेटी की माँ के दूध में चालीस पहर घोटकर आँख में आँजे ।
जाला-भाड़ा नाखून—
१३—अरहर के पत्तों का रस १४ माशा, छानकर नीम के सोटे से, जिसमें पैसा गड़ा हो, दस कागजी नींबुओं के रस में खरल कर, गोलिएँ बनावेँ और आँखों में आँजे ।
१४—नौसादर की कलम से नाखूने को छूने से नाखूना आराम होता है ।
१५—काली घोंतल तोड़कर उसका टुकड़ा फूल की थाली पर नींबू के रस में रगड़ो, भरहम-सा होने पर गोली या वतियाँ बनाकर सुखा लो, दो-तीन बार आँख में लगाने से जाला कट जाता है । दलका—
१६—समुद्रफेल, कल्या सफेद, सुनी फटकरी, बड़ी हरड की बकल, रसौत, अफीम, नीलाथोथा सबको बराबर पानी में घोटकर रगड़ा बनावे, तो कोयों की सुर्खी, दलका और खुजली को बहुत फायदा करे ।
कोए का नासूर—
१७—जो नाक की थोर के कोए में होता है और दवाने से उसमें से राय-खोह निकलता है । दीए की चीकट कपड़े पर लगाकर उसकी बत्ती नासूर में भरे ।
सुगम चिकित्सा
१०६
परवाल—
१८—पहले वालों को उखाड़ लो, फिर नवसादर वकरी के पिन्ने में मिलाकर पतला-पतला लेप करें।
सिर दर्द कई कारणों से होता है। कभी-कभी गर्मी से भी होजाता है और बहुधा कब्ज से होता है। सिर के रोग इसलिए पहले उसके कारणों को दूर करे।
१—नौसादर, हल्दी तथा पान का चूना मिलाकर सूँघने से आधासीसी और दूसरे प्रकार का दर्द आराम होता है।
२—जौ का आटा पानी में घोल सिर पर लेप करने से गर्मी का सिर दर्द आराम होता है।
मिर्गी-पागलपन, हिस्टीरिया
या मिर्गी की बीमारी बच्चों और बड़ों को भी होती है। ऐसे आदमी चलते-चलते गिर जाते हैं। हाथ-पैर फेंकते हैं, मुंह से भाग गिराते हैं और आँखों की पुतली फैल जाती है। दाँती भिंच जाती है। बेसुध होजाते हैं। इस रोग के दौरे कभी-कभी तो कई दिनों में और कभी-कभी दिन में कई बार होते हैं।
१—जब मिरगी के दौरे हों तो सौंठ, मिर्च, पीपल, नौसादर, इन्द्रायन, कलौंजी इनमें जो-जो चीज मिल जाय, बारीक पीसकर नाक में फूँक दो। ठण्डे पानी के छींटे मुंह पर दे।
२—कूठ, सौंठ, कबाब चीनी, देवदारु प्रत्येक दस माशा। काला मोंगरा, काली मिर्च, अकरकरा, गजपीपल और सने के