सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
७० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जा दिन गर्भ सयोग भयौ जब, ता दिन वून्द छिपाहुति ताँही । द्वादस मास अधो मुख झूलत, वूडि रह्यौ पुनि वा रस माहि ॥ ता रज बीरज की यह देह सु, तू अब चालत देखत छाही । सुन्दर गर्व गुमान कहा शठ, आपुनि आदि बिचारत नाही ॥५॥ ॥ इति देह मलिनता गर्व प्रहार को अङ्ग सम्पूर्ण ॥ (५) बीरज-वीर्य।
॥ नारीनिंदा को अंग ॥ [ ७१ अथ नारीनिंदा को अंग ॥१॥ मनहर छन्द कामिनी कौ देह मानौ कहिये सघन बन, उहा कोऊ जाइ सु तौ भूलिकै परतु है । कुंजर है गति, कटि केहरि कौ भय जामैँ, बेनी काली नागनीऊ फन कौ धरतु है ॥ कुच हैं पहार जहा काम चोर रहै तहा, साधिकै कटाक्ष बान प्रान कौ हरतु है । सुन्दर कहत एक और डर अति तामैँ, राक्षस बदन खाऊ खाऊ ही करतु है ॥१॥ बिष ही की भूमि माहि बिष के अंकुर भये, नारी बिष बेलि बढी नख सिख देखिये । विष ही के जर मूल बिष ही के डार पात, बिष ही के फूल फल लागे जू बिसेखिये ॥ विष के तंतू पसारि उरझाये आंटौ मारि, सब नरबृक्ष पर लपटी ही लेखिये । सुन्दर कहत कोऊ सन्त तरु बचि गये, तिनके तौ कहु लता लागी नहिं पेखिये ॥२॥ (२) नरवृक्ष-पुरुष रूपी वृक्ष ।
२. अंग ६-१०: मन-प्रबोध, माया-निन्दा, साँच-झूठ विवेक व साधन-क्रम
७२ ] ।। सुन्दर विलास ।। उदर मैं नरक नरक अध द्वारनि मैं, कुचन मैं नरक नरक भरी छाती है । कठ मै नरक गाल चिवुक नरक विव, मुख मैं नरक जीभ लार हू चुआाती है ।। नाक मैं नरक आंखि कान मैं नरक वहै, हाथ पाव नख सिख नरक दिखाती है । सुन्दर कहत नारी नरक कौ कुण्ड यह, नरक मै जाइ परै सो नरकपाती है ॥३॥ कामिनि कौ अंग अति मलिन महा अशुद्ध, रोम रोम मलिन मलिन सब द्वार हैं । हाड मास मज्जा मेद चाम सौ लपेटि राखै, ठौर ठौर रकत के भरेई भंडार है ।। मूत्र ऊ पुरीष आत एकमेक मिलि रही, और ऊ उदर माहि बिबिध बिकार है । सुन्दर कहत नारी नख सिख निद रूप, ताहि जे सराह्रै ते तौ बडेई गवार है ॥४॥ (३) अध-नीचे के । कुच-स्तन । चिबुक-ठोडी । नरक पाती-नरक मे गिरने वाला । (४) पुरीष-मल, टट्टी । उदर-पेट ।
॥ नारीनिंदा को अंग ॥ [ ७३ कुण्डलिया छंद रसिकप्रिया रसमंजरी और सिंगार हि जानि । चतुराई करि बहुत विधि विखै बनाई आनि ॥ विषै बनाई आनि लगत विषयिन कों प्यारी । जागै मदन प्रचंड सराह्रैं नख सिख नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्टान्न खाइ रोगहि विस्तारै । सुन्दर यह गनि होइ जु तौ रसिकप्रिया धारै ॥१५॥ रसिकप्रिया के सुनत ही उपजै बहुत विकार । जो या माही चित्त दे वहै होत नर ख्वार ॥ वहै होत नर ख्वार वार तौ कछुक न लागै । सुनत विषय की वात लहरि विष ही की जागै ॥ ज्यों कोइ ऊंधै हुतौ लही पुनि सेज विछाई । सुन्दर ऐसी जानि सुनत रसिकप्रिया भाई ॥१६॥ ॥ इति नारीनिंदा को अंग सम्पूर्ण ॥
७४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ दृष्ट को अंग ॥१०॥ मनहर छंद अपनै न दोष देखैं परके औगुन पेखै, दुष्ट कौ सुभाव उठि निंदा ई करतु है । जैसे कोऊ महल सवारि राख्यो नीकै करि, कीरी तहा जाइ छिद्र ढूढत फिरतु है ॥ भोर ही तै साझ लग साझ ही तैं भोर लग, सुन्दर कहत दिन ऐसैं ही भरतु है । पाव के तरे की आगि सूझै नही मूरिख कौ, और सौ कहत सिर ऊपर बरतु है ॥१॥ इन्दव छंद घात अनेक रहैं उर अंतरि,- दुष्ट कहै मुख सौ अति मीठी । लोटत पोटत व्याघ्रही ज्यौ नित, ताकत है पुनि ताहि की पीठी ॥ ऊपर तै छिरकै जल आनि सु, हेठ लगावत जारि अगीठी । या महिं कूर कछू मति जानहु, सुन्दर आपुनि आखिनि दीठी ॥२॥ (२) घात-हानि करने का विचार । हेठ नीचे ।
॥ दुष्ट को अंग ॥ [ ७५ आपुन काज सवारन कै हित, और की काज विगारत जाई । आपुनौ कारज होइ न होइ, बुरी करि और की डारत भाई ॥ आपुहुं खोवत और हु खोवत, खोड दोऊ घर देत बहाई । सुन्दर देखत ही वनि आवत, दुष्ट करे नहि कौन बुराई ॥३॥ ज्यौ नर पोषत है निज देह हि, अन्न विनाश करै तिहि वारा । ज्यों अहि और मनुष्य हि काटत, वाहि कछू नहि होइ अहारा ॥ ज्यों पुनि पावक जारि सबै कछु, आपुहु नाश भयौ निरधारा । त्यौ यह सुन्दर दुष्ट सुभाव हि, जानि तजौ किन तीन प्रकारा ॥४॥ (३) हेठ-नीचे । (४) अहारा-भोजन ।
७६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सर्प डसै सु नही कछु तालक, वीछु लगै सु भलौ करि मानौ । सिंह हु खाइ तौ नाहि कछू डर, जौ गज मारत तौ नहि हानी ॥ आगि जरौ, जल बूडि मरौ, गिरि जाइ गिरौ, कछु भै मति आनौ । सुन्दर और भले सब ही दुख, दुर्जन सग भलौ जनि जानौ ॥५॥ ॥ इति दुष्ट को अङ्ग सम्पूर्ण ॥ (५) तालक-ताल्लुक, चिंता ।
An exact transcription of the Devanagari text from the image, line by line:
॥ मन को अंग ॥ [ ७७ ॥ अथ मन को अंग ॥११॥ मनहर छंद हटकि हटकि मन राखत जु छिन छिन, सटकि सटकि चहु ओर अब जात है । लटकि लटकि ललचाइ लोल बार बार, गटकि गटकि करि बिष फल खात है ॥ झटकि झटकि तार तोरत करम हीन, भटकि भटकि कहु नैकु न अघात है । पटकि पटकि सिर सुन्दर जु मानी हारि, फटकि फटकि जाइ सुधौ कौन बात है ॥१॥ पल ही मैं मरि जात पल ही मैं जीवत है, पल ही मैं परहाथ देखत बिकानौ है । पल ही मैं फिरै नवखंडहु ब्रह्माण्ड सब, देख्यौ अनदेख्यौ सु तौ या ते नहि छानौ है ॥ जातौ नहि जानियत आवतौ न दीसै कछु, ऐसी सी बलाइ अब तासौं पर्यौ पानौ है । सुन्दर कहत याकी गति नही जानी परै, मन की प्रतीति कोऊ करै सु दिवानौ है ॥२॥ (१) हटकि-हठ करके । सटकि-झट से सरक कर । लटकि-उछलकर । लोल-चंचल । झटकि-झटका देकर । तार-भगवान मे ध्यान का तार । (२) बलाइ-आफत ।
७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ घेरिये तौ घेर्यौ हू न आवत है मेरौ पूत, ' जोई परमौधिये मु कान न धरतु है । नीति न अनीति देखै शुभ न अशुभ पेखै, पल ही मैं होती अनहोती हु करतु है ॥ गुरुकी न साधू की न लोक वेद हू की शक, काहू की न मानै न तौ काहू तै डरतु है । सुन्दर कहत ताहि धीजिये सु कौन भांति, मन कौ सुभाव कछु कह्यौ न परतु है ॥३॥ काम जब जागै तब गनत न कोऊ साख, जानै सब जेई करि देखत न माधी है । क्रोध जब जागै तब नेकु न सभारि सकै, ऐसी बिधि मूल की अविद्या जिन साधी है ॥ लोभ जब जागै तब त्रिपत न क्यौही होइ, सुन्दर कहत इति ऐसे ही मै खाधी है । मोह मतवारौ निश-दिन हि फिरत रहै, मन सौ न कोऊ हम देख्यौ अपराधी है ॥४॥ देखिवे कौ दौरै तौ अटकि जाइ वाही ओर, सुनिवे कौ दौरै तौ रसिक सिरताज है । सूँघवे कौ दौरै तौ अघाइ न सुगध करि, खाइवे कौ दौरै तौ न धाप महाराज है ॥ (४) साख-रिश्ता, सबन्ध । माधी-पाप बुद्धि ।
॥ मन को अंग ॥ [ ७६ भोग हू कौ दोरै तौ तृपत नही क्यौ ही होइ, सुन्दर कहत याहि नैक हु न लाज है । काहू को कह्यौ न करै आपुनि ही टेक परै, मन सौ न कोऊ हम जान्यौ दगाबाज है ॥५॥ देखै न कुठौर ठौर कहत और की और, लीन जाइ होत हाड मास हू रकत मैं । करत बुराई सर औसर न जानै कछु, धका आइ देत राम नाम सौ लगत मैं ॥ बाहे सुर असुर बहाये सब भेष जिन, सुन्दर कहत दिन घालत भगति मै । और ऊ अनेक अन्तराय ही करत रहै, मन सौ न कोऊ है अधम या जगत मै ॥६॥ जिन ठगे शकर बिधाता इन्द्र देव मुनि, आपनौ ऊ अधिपति ठग्यौ जिनि चन्द है । और योगी जगम सन्यासी सेख कौन गिनै, सबही कौ ठगत, ठगावै न सुछद है ॥ तापस ऋषीश्वर सकल पचि पचि गये, काहू कै न आवै हाथ ऐसी या पै बद है । सुन्दर कहत बस कौन विधि कीजै ताहि, मन सौ न कोऊ या जगत माहि रिन्द है ॥७॥
(६) अंतराय-विघ्न बाधा । लीन-मगन । (७) अधिपति-स्वामी, यथा "चन्द्रमा मनो भूत्वा
८० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ रक कौ नचावै अभिलाषा धन पाइवै की निस दिन सौचि करि ऐसैं ही पचतु है । राजा ही नचावै सब भूमि हू कौ राज लेव, और ऊ नचावै जोई देह सौ रचतु है ॥ देवता असुर सिद्ध पन्ग सकल लोक, कीट पसु पखी कहु कैसैं कै वचतु है । सुन्दर कहत काहु सत की कह्यो न जाइ, मन कै नचाये सब जगत नचतु है ॥८॥ इन्दव छंद केतक द्यौस भये समुझावत, नैकु न मानत है मन भोदू । भूलि रह्यौ विषिया सुख मैं, कछु और न जानत है शठ दौदू ॥ आंखि न कान न नाक बिना सिर, हाथ न पाव नही मुख पौदू । सुन्दर ताहि गहै कोऊ क्यौ करि, नीकसि जाइ बडौ मन लोदू ॥६॥ प्राविशत्" बद-दाव रेंच । रिंद-जिद शैतान । (८) अभिलाषा-इच्छा, लोभ लालच । पनग-पन्नग, सर्प । (९) भोदू-मूर्ख । दोदू-काम । पोदू पीठ । लोदू-वेढगा ।
॥ मन को अंग ॥ [ ८१ दौरत है दस हू दिसि कौ शठ, वायु लगो तब तै भयौ बैंडा । लाज न काज कछू नहिं राखत, सील सुभाव की फोरत मेडा ॥ सुन्दर सीख कहा कहि देइ, भिदै नहिं बान छिदै नहि गैडा । लालच लागि गयौ मन बीखरि, बारह वाट अठारह पेंडा ॥१०॥ श्वान कहू कि शृगाल कहू कि, विडाल कहू मन की मति तैसी । ढेढ कहू किधौ डूम कहूं किधौ, भाड कहू कि भडाइ दे जैसी । चौर कहू, वट मार कहू, ठग जाइ कहूं, उपमा कहू कैसी । सुन्दर और कहा कहिये अव, या मन की गति दीसत ऐसी ॥११॥ (१०-११) वैडा-वाका टेढा। मैडा-कार, सीमा, मर्यादा । गैडा-मेंडे की तरह । श्वान-कुत्ता । शृगाल-गीदड । विडाल-बिलाव ।
८२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कै बर तू मन रक भयौ शठ, मागत भीख दसौँ दिस डूल्यौ । कै वर तै मन छत्र धर्यौ सिर, कामिनि सग हिडोरनि भूल्यौ ॥ कै वर तू मन छीन भयौ अति, कै बर तू सुख पाइक फूल्यौ । सुन्दर कै बर तोहि कह्यौ मन, कौन गली किहि मारग भूल्यौ ॥१२॥ इन्द्रिनि के मुख चाहत है मन, लालच लागि भ्रमै शठ यौ ही । देखि मरीचि भर्यौ जल पूरन, धावत है मृग मूरिख ज्यौ ही ॥ प्रेत पिशाच निशाचर डोलत, भूख मरै नहि धापत क्यौ ही । वायु बघूर हि कौन गहै कर, सुन्दर दौरत है मन त्यौ ही ॥१३॥ कौन सुभाव पर्यो उठि दौरत, अमृत छाडि च्चोरत हाडै । ज्यौ भ्रम की हथिनि दृग देखत, आतुर होइ परै गज खाडै ॥ (१४) चचोरत हाडै-हड्डी चूसता है। भ्रम की-नकली, बनावटी । राडै-रडवे की तरह । भ्रमवो-भटकता है ।
॥ मन कौ अगँ ॥ [ ८३ सुन्दर तोहि सदा समुझावत, एक हु सीख लगै नहि राडै । बादि वृथा भटकै निस वासर, रे मन ! तूं भ्रमबौ किन छाडै ॥१४॥ व्है सब कौ सिरमौर ततक्षिन, जौ अभि अन्तरि ज्ञान विचारै । जौ कछु और विषै सुख वंछत, तौ यह देह अमोलिक हारै ॥ छाडि कुबुद्धि भजै भगवत हि, आपु तिरै पुनि और हि तारै । सुन्दर तोहि कह्यौ कितनी वर, तू मन क्यौ नहि आपु सभारै ॥१५॥ जौ मन नारि की ओर निहारत, तौ मन होत है ताहि कौ रूपा । जौ मन काहु सौं क्रोध करै जब, क्रोधमई हो जाइ तद्रूपा ॥ जौ मन माया ही माया रटै नित, तौं मन डूबत माया के कूपा । सुन्दर जौ मन ब्रह्म विचारत, तौ मन होत है ब्रह्मस्वरूपा ॥१६॥
८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद कवहू कै हसि उठै कवहू कै रोइ देत, कबहु वकत कहू अंत हू न लहिये । कवहूक खाइ तौ अघाऽ नहि काहू करि, कवहूक कहै मेरै कछु नहि चहिये ॥ कवहू आकाश जाइ कवहू पाताल जाइ, सुन्दर कहत ताहि कैसे करि गहिये । कबहूक आइ लागै कवहू उतरि भागे, भूत के से चिन्ह करै ऐसौ मन कहिये ॥१७॥ कबहु तौ पाख कौ परेवा कै दिखावै मन, कबहूक धूरि के चावरि करि लेत है । कबहु तौ गोटिका उछारत आकास ओर, कबहूक राते पीरे रग श्याम शेत है ॥ कबहु तौ श्राब कौ उगाइ करि ठाडौ करै, कबहू तौ शीस धर जुदे कर देत है । बाजीगर कौ सौ ख्याल सुन्दर करत मन, सदाई भ्रमत रहै ऐसौ कोऊ प्रेत है ॥१८॥ (१८) परेबा-पक्षी । चौररि-चावल । गोटिका-गोली । शीस धर जुदे-शिर को धड से अलग ।
॥ मन को अंग ॥ [ ८५ कबहूंक साध होत कबहूक चोर होत, कबहूक राजा होत कबहूक रक सौ । कबहूक दीन होत कबहू गुमानी ह त, कबहूंक सूधौ होत कबहूंक बक सौ ॥ कबहूक कामी होत कबहूक जती होत, कबहूंक निर्मल होत कबहूंक पक सौ । मन कौ स्वरुप ऐसौ सुन्दर फटिक जैसौ, कबहूक सूर होत कबहूं मयक सौ ॥१६॥ हाथीकौ सौ कान किधौ पीपर कौ पान किधौ, ध्वजा कौ उडान कहु थिर न रहतु है । पानी कौ सौ घेरि किधौ पौन उग्झेर किधौ, चक्र कौ सौ फेरि कोऊ कैसे कै गहतु है ॥ अरहट माल किधौ चरखा कौ ख्याल किधौ, फेरि खात वाल कछु सुधि न लहतु है । घूमकौ सौ घाव ताकौ राखिबे कौ चाव ऐसौ, मन कौ सुभाव सु तौ सुन्दर कहतु है ॥२०॥ (१६) गुमानी-अभिमानी, घमंडी । जती-साधु । पक- कीचड । सूर-सूर्य सा गर्म । मयक-चद्रमा सा ठंडा । (२०) घेर-चक्कर, भंवर । पौन उरझेर-हवा का चक्कर, भभूला । घूम को घाव-धुआ उडान ।
८६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सुख मानै दुख मानै सम्पति विपति मानै, हर्ष मानै शोक मानै मानै रक धन है । घटि मानै वढि मानै शुभ हू अशुभ मानै, लाभ मानै हानि मानै याँह तै कृपन है । पाप मानै पुन्य मानै उत्तम मध्यम मानै, नीच मानै ऊच मानै मानै मेरो तन है । सुरग नरक मानै बध मानै मोक्ष मानै, सुन्दर सकल मानै तातै नाम मन है ॥२१॥ जोई जोई देखै कछु सोई सोई मन आहि, जोई जोई सुनै सोई मन ही कौ भ्रम है । जोई जोई सूँ घै जोई खाई जौ सपर्श होइ, जोई जोई करै सोई मन ही कौ क्रम है ॥ ज ई जोई ग्रहै जोई त्यागै जोई अनुरागै, जहाँ जहां जाइ सोई मन ही कौ श्रम है । जोई जोई कहै सोई सुन्दर सकल मन, जोई जोई कलपै सु मन ही कौ ध्रम है ॥२२॥ एक ही विटप विश्व ज्यौ कौ त्यौ ही देखियत, अति ही सघन ताके पत्र फल फूल है । (२२) श्रम दम, काम । ध्रम धर्म, गुण, स्वभाव ।
॥ मन को अंग ॥ [ ८७ आगिले झरत पात नये नये होत जात, ऐसौ याही तरु कौ अनादि काल मूल है ॥ दश च्यारि लोक लौ पसरि जहा तहा रह्यो, अध पुनि ऊरध सूखिम अरु थूल है । कोऊ तौ कहत सत्य कोऊ तौ कहै असत्य, सुन्दर सकल मत ही कौ भ्रम भूल है ॥२३॥ तौ सो न कपूत कोऊ कतहूं न देखियत, तौ सो न सपूत कोऊ देखियत और है । तूं ही आप भूलि महा नीच हूं तें नीच होइ, तूं ही आपु जाते तें सकल शिरमोर है ॥ तू ही आपु भ्रमै तब भ्रमत जगत देखै, तेरे थिर भये सब ठौर ही कौ ठौर है । तूं ही जीव रूप तू ही ब्रह्म है अकाशवत, सुन्दर कहत मन तेरी सब दौर है ॥२४॥ मन ही कै भ्रम तै जगत यह देखियत, मन ही कौ भ्रम गयौ जगत विलात है । मन ही कै भ्रम जेवरी मैं उपजत साप, मन कै विचारै साप जेवरी समात है ॥ (२३) विटप-वृक्ष । दश-च्यार-चौदह ।
८८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मन ही कै भ्रम तै मरीचिका कौ जल कहै, मन ही कै भ्रम सीपि रूपौ सो दिखात है । सुन्दर सकल यह दीसै मन ही कौ भ्रम, मन ही कौ भ्रम गये ब्रह्म होइ जात है ॥२५॥ मन ही जगत रूप होइ करि विसतर्यौ, मन ही अलख रूप जगत सौ न्यारौ है । मन ही सकल घट व्यापक अखंड एक, मन ही सकल यह जगत पियारौ है ॥ मन ही आकाशवत हाथ न परत कछु, मन के न रूप रेख बुद्ध ही न वारौ है । सुन्दर कहत परमारथ बिचारै जब, मन मिटि जाइ एक ब्रह्म निज सारौ है ॥२६॥ ॥ इति मन को अङ्ग सम्पूर्णं ॥ (२५) मरीचिका-मृगतृष्णा । रूपौ-चांदी ।
॥ चांनक को अंग ॥ [ ८६ अथ चांनक को अंग ॥१२॥ मनहर छंद जोई जोई छूटिबे कौ करत उपाइ अज्ञ, सोई सोई दिढ करि बंधन परतु है । जोग जज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि और, झपापात लेत जाइ हिंमारै गरतु है ॥ कानऊ फराइ पुनि केसऊ लुचाई अग, बिभूति लगाइ सिर जटाऊ धरतु है । बिनु ज्ञान पाये नहि छूटत हृदै की ग्रन्थि, सुन्दर कहैत यौं ही भ्रमि कै मरतु है ॥१॥ निर्मांत्रिक छंद जप तप करत धरत ब्रत जत सत, मन बच क्रम भ्रम कष्ट सहत तन । वलकल बसन अशन फल पत्र जल, कसत रसन रस तजत बसत वन ॥ जरत मरत नर गरत परत सर, कहत लहत हय गय दल वल धन । पचत पचत भव भय न टरत शठ, घट घट प्रगट गृहत न लखत जन ॥२॥ (१) दिढ-दृढ, मजबूत । झपापात-पहाड की चट्टान से गिरना । हिमारै-हिमालय । ग्रन्थि-गाठ, घुण्डी । (२) वालकल-वल्कल, छाल । वसन-वस्त्र । अशन- भोजन । रसन-जीभ । हय-घोडे । गय-गज । कपट-कष्ट ।