सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
५६२ सूर्य-सिद्धान्त चित्र १०८ उ छ गा द = पूर्व क्षितिजवृत्त उ = उत्तर बिन्दु ध = उत्तर ध्रुव क = कदम्ब उ ध अ वि ह = याम्योत्तरवृत्त ग = ग्रह गा = क्रान्तिवृत्त पर ग ग्रह का स्थान, इस समय यह पूर्व क्षितिज पर लग्न भी है। क्रान्तिवृत्त इसलिए नहीं दिखलाया गया कि चित्र सरल रहे । अ ग च छ र = ग का अहोरात्र वृत्त वि स प फ वी = विषुवद् वृत्त; क ग गा = ग का कदम्बप्रोतवृत्त ध च गा प = गा का ध्रुवप्रोतवृत्त ध छ फ = छ का ध्रुवप्रोतवृत्त। ग च = आयनदृक्कर्म; च छ = आक्षदृक्कर्म; ग गा = ग ग्रह का शर या विक्षेप गा च = ग ग्रह का स्पष्ट शर (देखो गणिताध्याय ग्रहच्छायाधिकार श्लोक) ∠ ग गा च = गा का आयनवलन ∠ उ गा ध = गा का आक्षवलन
ग्रहयुत्यधिकार ५६३ ज्या ग च ज्या ∠ ग गा च आयनवलन ज्या ――――― = ―――――――― = ――――――――― ज्या ग गा ज्या ९०° त्रिज्या ज्या ग गा × आयनवलन ज्या ∴ ज्या ग च = ―――――――――――――――― (१) त्रिज्या परन्तु ग च अहोरात्रवृत्त का खंड है और इसके सामने का कोण ध्रुव पर ग ध च के समान है जो विषुवद्वृत्त के स प खंड के समान है। इसलिए यह जानने के लिए कि ग च खंड कितनी देर में उदय होता है हमें स प खंड का जानना आवश्यक है जो इस अनुपात से जाना जाता है— ज्या ग च ज्या ग ध ज्या ग ध ――――― = ――――― = ――――― (२) ज्या स प ज्या ध स त्रिज्या परन्तु ग ध = ध स — ग स = ९०° — ग की क्रान्ति ∴ ज्या ग ध = ग की क्रान्ति कोटिज्या त्रिज्या × ज्या ग च ∴ ज्या स प = ―――――――――― ज्या ग ध त्रिज्या ज्या ग गा × आयनवलनज्या = ―――――――――――― × ――――――――――――――――― ग की क्रान्ति कोटिज्या त्रिज्या ज्या ग गा × आयनवलनज्या = ――――――――――――――――― ग की क्रान्ति कोटिज्या शर ज्या × आयनवलनज्या ∴ आयनदृक्कर्म = ―――――――――――――― क्रान्ति कोटिज्या इस क्रिया से स प का जो मान आवेगा वह कलाओं में होगा यदि ज्याओं और कोटिज्याओं की गणना भारतीय रीति से की जायगी। इसका अर्थ यह हुआ कि केवल आयनवलन के कारण ग का उदयकाल गा के उदयकाल से स प असुओं के समान आगे होगा। यदि यह जानना हो कि इतनी देर में क्रान्तिवृत्त का कौन सा खंड उदय होगा तो इसको १८०० से गुणा करके जिस राशि में ग्रह हो उसके लंकोदयासुओं से भाग देना चाहिए क्योंकि यह तो स्पष्ट ही है कि जब राशि के लंकोदयासुओं में राशि का ३० अंश या १८०० कला उदय होता है तब जितने समय में स प का उदय होता है उतने समय में राशि का कितना खंड उदय होगा। यही ग्रहच्छायाधिकार के श्लोक ४ का सार है। च छ की गणना समकोण गोलीय त्रिभुज च गा छ में गा च छ कोण समकोण है क्योंकि गा
५६४ सूर्य-सिद्धान्त च ध्रुवप्रोतवृत्त का खंड है, च छ अहोरात्रवृत्त का खंड है जो ध्रुवप्रोतवृत्त से समकोण पर होता है। गा च को भास्कराचार्यजी ने ग का स्पष्ट शर माना है और भेद दिखलाने के लिए ग गा को मध्यम शर माना है। कोण च गा छ = कोण ध गा उ = आक्षवलन । यदि गा विषवद्वृत्त के पास हो तो कोण ध गा उ अक्षांश के समान माना जा सकता है। ऐसी दशा में और यदि च गा छ त्रिभुज समतल-त्रिभुज मान लिया जाय क्योंकि ग्रह का स्पष्ट शर गा च साधारणतः बहुत छोटा होता है तब च छ गा कोण लम्बांश के समान माना जा सकता है क्योंकि ६०° - अक्षांश = लम्बांश । ऐसी दशा में चूंकि गोलीय त्रिभुज च गा छ में ज्या च छ ज्या च गा ─────────── = ─────────── ज्या ∠ च गा छ ज्या च छ गा ज्या स्पष्ट शर X ज्या आक्षवलन अथवा ज्या च छ = ─────────────────────── लम्ब ज्या परन्तु च छ का मान विषवद्वृत्त के प फ खंड के समान है जो सजातीय त्रिभुज ध च छ और ध प फ से इस प्रकार जाना जाता है :— ज्या प फ ज्या ध प त्रिज्या ─────── = ─────── = ───────────── ज्या च छ ज्या ध च ज्या (६०° - च प) त्रिज्या त्रिज्या = ─────────────────── = ───────────── ज्या (६०° - ग्रह की क्रान्ति) क्रान्ति कोटिज्या ⸪ ज्या प फ = ज्या च छ X त्रिज्या ────────────── क्रान्ति कोटिज्या ज्या स्पष्ट शर X ज्या आक्षवलन X त्रिज्या = ────────────────────────────── क्रान्ति कोटिज्या X लम्ब ज्या यही ग्रहच्छायाधिकार के ७वें श्लोक का अर्थ है। इस प्रकार प फ का जो मान कलाओं में आवेगा वही आक्षदृक्कर्म है । आक्ष और आयन दृक्कर्म किस समय जोड़ना और किस समय घटाना चाहिए इसके लिए वही नियम हैं जो पहले सूर्य सिद्धान्त के सम्बन्ध में बतलाया गया है । स्पष्ट शर को जानने की एक रीति जो कुछ स्थूल है भास्कराचार्यजी ने ग्रहच्छायाधिकार के तीसरे श्लोक में यों बतलायी है :— ग्रह के भोगांश में तीन राशि जोड़ने से जो भोगांश आवे उसकी क्रान्ति की कोटिज्या को अर्थात् द्युज्या को मध्यम शर से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से
ग्रहयुत्यधिकार ५६५ भाग दे देना चाहिए। यह नियम चित्र १०८ के गोलीय समकोण त्रिभुज ग गा च से स्पष्ट है। क्योंकि ग्रह के भोगांश में ६०° जोड़ने से जो आता है उसकी क्रान्ति अयनवलन के समान होती है (देखो चन्द्रग्रहणाधिकार श्लोक २५) जो यहाँ ग गा च कोण के समान है इसलिए उसकी क्रान्ति-कोटिज्या अयनबलन-कोटिज्या के समान होगी। यदि गा ग च त्रिभुज समतल समकोण त्रिभुज मान लिया जाय तो ∠ गा ग च = ६०° - ∠ ग गा च = ६०° - आयनवलन ज्या ग गा ज्या गा च ज्या गा च ∵ ————————————— = ———————————————— = —————————————————— ज्या ∠ ग च गा ज्या ∠ गा ग च ज्या ६०°—आयनवलन ज्या ग गा × ज्या (६०° - आयनवलन) ∴ ज्या गा च = ———————————————————————————————— ज्या ६०° ज्या मध्यम शर × ज्या (६०° - आयनवलन) = ———————————————————————————————————— त्रिज्या मध्यम शर ज्या × अयनवलन कोटिज्या = ————————————————————————————————— त्रिज्या ग्रहों के विम्बमान— कुजार्किज्ञामरेज्यानां त्रिंशत्सार्धार्धवर्धिता । विष्कम्भश्चन्द्रकक्ष्यायां भृगोष्षष्टिरुदाहृतः ॥१३॥ चित्रतुःकर्णयोगाप्तास्ते द्विघ्नास्त्रिज्यया हताः । स्फुटाः स्वकर्णास्तिथ्याप्ता भवेयुर्मानलिप्तिकाः ॥१४॥ अनुवाद—(१३) मंगल, शनि, बुध, गुरु और शुक्र के बिम्बों के व्यास चन्द्रकक्षा में क्रमानुसार ३०, ३७।।, ४५, ५२।। और ६० योजन हैं । (१४) किसी ग्रह के बिम्ब का स्पष्ट व्यास जानने के लिए उस ग्रह के ऊपर लिखे हुए व्यास के दुगुने को त्रिज्या (३४३८) से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या और उस ग्रह के चतुर्थ शीघ्रकर्ण के योग से भाग देने से जो लब्धि आती है वही बिम्ब का स्पष्ट व्यास होता है। यदि इसको १५ से भाग दे दिया जाय तो कलाओं में बिम्ब का परिमाण मालूम हो जाता है। विज्ञान भाष्य—१३वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि ग्रहों के बिम्बों के व्यास चन्द्रकक्षा में क्या हैं। इसके आधार पर चन्द्रग्रहणाधिकार के श्लोक १-३ के अनुसार यह विलोम रीति से जाना जा सकता है कि अपनी कक्षा में ग्रह के बिम्ब का व्यास क्या है। परन्तु युति के सम्बन्ध में यह जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती। यहाँ तो केवल यह जानना चाहिए कि युतिकाल में ग्रहबिम्ब का कलात्मक
५६६ सूर्य-सिद्धान्त मान क्या होता है । परन्तु किसी पिण्ड का कोणात्मक या कलात्मक मान उसकी दूरी पर अवलंबित होता है (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८५) और पृथिवी से ग्रह की दूरी एक सी नहीं रहती, घटा-बढ़ा करती है इसलिए पहले यह जानना आवश्यक है कि ग्रहबिम्ब का मध्यम कोणात्मक मान क्या है । यहाँ चन्द्रमा की कक्षा में ग्रहबिम्ब का जो परिमाण योजनों में समझा गया था वही दिया गया है । साथ ही साथ अगले श्लोकों में यह भी बतलाया गया है कि अभीष्ट काल में ग्रहबिम्ब का जो स्पष्टमान योजनों में आवे उसको १५ से भाग देने पर उसका स्पष्ट कलात्मक मान आ जाता है । चन्द्रग्रहणाधिकार के पृष्ठ ४५२ पर यह बतलाया गया है कि चन्द्रकक्षा का १५ योजन १ कला के समान कैसे होता है । इसलिए यह स्पष्ट है कि चन्द्रकक्षा के बिम्बमानों को १५ से भाग देने पर इसका परिमाण कला में क्यों आ जाता है । इस प्रकार चन्द्रकक्षा में ग्रहों के बिम्बों का कलात्मक मान नीचे लिखे अनुसार हुआ :— मंगल का बिम्ब = ३० योजन = ३० ÷ १५ = २ कला शनि ,, = ३७।। योजन = ३७।। ÷ १५ = २।। कला बुध ,, = ४५ योजन = ४५ ÷ १५ = ३ कला गुरु ,, = ५२।। योजन = ५२।। ÷ १५ = ३।। कला शुक्र ,, = ६० योजन = ६० ÷ १५ = ४ कला इनसे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्य मंगल के बिम्ब को सबसे छोटा समझते थे । इससे बड़ा शनि का बिम्ब समझा था, इत्यादि । परन्तु स्पष्टाधिकार के ६६ पृष्ठ की सारणी से प्रकट होता है कि यदि सब ग्रह द्रष्टा से उतनी दूर हों जितनी दूर सूर्य पृथ्वी से है तो बुध के बिम्ब का व्यास सबसे छोटा अर्थात् ६.६८ विकला है । मंगल का इससे बड़ा अर्थात् ६.३६ विकला है । इसके बाद शुक्र, शनि और गुरु के बिम्बों के व्यास क्रमानुसार १६.८०, १६६.५ और १६४.७२ विकला हैं। इस प्रकार यह सिद्ध है कि हमारे आचार्यों ने स्थूल यन्त्रों के द्वारा बिम्बों के जो परिमाण निकाले थे वे अत्यन्त अशुद्ध हैं जैसा कि म० म० सुधाकर द्विवेदी जी भी ने लिखा १ है । १. सूक्ष्म दूरदशक यन्त्राविना बुध शुक्रयोरपि शशिवत् सितवृद्धि हानित्वं शृङ्गोन्नतिश्चोपलभ्यते । आचार्य समये तादृश यन्त्राणामभावाद् दृष्ट्या शृङ्गोन्नतिः सितासित बिम्बमितिश्च नोपलब्धाऽतोऽनुमानेन रवेरासन्नेत्वादित्यादि कल्पना न समीची- नेति सर्वं स्फुटम् । ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त ग्रहयुत्यधिकार श्लोक ३-४ की टीका ।
ग्रहयुत्यधिकार ५६७ अब यह प्रकट है कि जब १३वें श्लोक में दिये हुए बिम्बों के परिमाण ही अशुद्ध हैं तब इन्हीं के आधार पर अगले श्लोक के अनुसार स्पष्ट बिम्ब के परिमाण ठीक-ठीक कैसे जाने जा सकते हैं। अब यह विचार किया जायगा कि अगला श्लोक कहाँ तक शुद्ध है। इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का सार यह है :— मध्यम बिम्ब × २ × त्रिज्या स्पष्ट बिम्ब = ----------------------------------- त्रिज्या + चतुर्थ शीघ्रकर्ण मध्य बिम्ब × त्रिज्या अथवा स्पष्ट बिम्ब = ---------------------------- त्रिज्या + चतुर्थ शीघ्रकर्ण
२ इसको त्रैराशिक के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है :— त्रिज्या + चतुर्थ शीघ्रकर्ण --------------------------- : त्रिज्या : : मध्यबिम्ब : स्पष्ट बिम्ब २ नियम के इस रूप से सिद्ध होता है कि हमारे आचार्य को यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि जब त्रिज्या की दूरी पर ग्रह बिम्ब अपने मध्यम मान के समान होता है तब इससे अधिक दूरी पर स्पष्ट बिम्ब का मान कम होगा और कम दूरी पर स्पष्ट बिम्ब का मान अधिक होगा जैसा कि स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८५ में दिखलाया गया है। परन्तु त्रिज्या को ३४३८ मानने से काम नहीं चल सकता। यदि त्रिज्या की जगह वह दूरी रखी जाय जो चन्द्रमा से पृथ्वी की दूरी है और त्रिज्या + चतुर्थ शीघ्रकर्ण --------------------------- की जगह वह दूरी रखी जाय जो इष्टकाल में पृथ्वी से २ इष्ट ग्रह की दूरी है तो यह अनुपात ठीक हो सकता है। कोई कोई आचार्य इस त्रैराशिक के पहले पद में त्रिज्या की जगह तृतीय कर्ण लेते हैं। परन्तु इससे भी उतनी शुद्धता नहीं आ सकती जैसी आनी चाहिये। पृथ्वी से किसी ग्रह की दूरी इष्टकाल में क्या होती है इसकी गणना करने के लिये पहले यह जानना होता है कि सूर्य से उस ग्रह की दूरी स्पष्टाधिकार के पृष्ठ १७६-८० में दिये हुए सूत्र के अनुसार क्या है। फिर उसी अधिकार के पृष्ठ १८३ में दिये हुए चित्र के अनुसारं पृथ्वी से उस ग्रह की दूरी अर्थात् शीघ्र कर्ण जानना चाहिये। अब यदि ८६ पृष्ठ में दिये हुए मध्यबिम्ब को पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से गुणा करके इसी शीघ्र कर्ण से भाग दिया जाय तो ग्रह का स्पष्ट बिम्ब शुद्धतापूर्वक जाना जा सकता है।
५६८ सूर्य-सिद्धान्त आचार्य केतकर की ज्योतिर्गणित के अनुसार पंचतारा ग्रहों के बिम्बों के लघुतम और परम मान तथा लघुतम और परम लम्बन त्रिप्रश्नाधिकार के पृष्ठ ४१० में
| ग्रह | स्पष्ट बिम्ब | शीघ्र कर्ण | ||
|---|---|---|---|---|
| लघुतम | परम | परम | लघुतम | |
| विकला | विकला | |||
| मंगल | ४.४ | २१.२ | २५२४ | ५२४ |
| बुध | ४.८ | १०.६ | १३८७ | ६१३ |
| गुरु | ३१.६ | ४६.७ | ६२०३ | ४२०३ |
| शुक्र | ९.६ | ६०.० | १७२३ | २७७ |
| शनि | १५.८ | १६.५ | १०५३६ | ८५३६ |
- यह बड़े हर्ष की बात है कि आचार्य वेङ्कटेश बापू केतकर अभी जीवित हैं और अपने सुपुत्र के साथ बीजापुर में रहते हैं और पिता पुत्र दोनों ज्योतिष के अध्ययन में अभी तक लगे हुए हैं। मैंने भूल से आपके नाम के पहले पृष्ठ १८६ में आपको 'स्वर्गीय' लिख दिया था क्योंकि मैं समझता था कि आप स्वर्गीय हो गये होंगे । परन्तु श्रीमान् पदम एस० एम० गोड्रेज Padam S. M. codrez के पत्रों से मालूम हुआ कि आप अभी जीवित हैं। इस सूचना के लिए मैं इन महाशय का बड़ा कृतज्ञ हूँ । पूना के महाराष्ट्रीय पंचांगैक्य मंडल के १८८२ वि० के प्रथम अधिवेशन के वृत्तान्त से सिद्ध होता है कि आप वृद्ध होते हुए भी ज्योतिष संबंधी वाद विवादों में सम्मिलित होते हैं । लेखक
ग्रहयुत्यधिकार ५६६ दिये गये हैं । उनसे यह प्रगट होता है कि बिम्बों का परिमाण लम्बन के अनुसार बदलता है अर्थात् यदि लंबन अधिक होता है तो स्पष्ट बिम्ब भी अधिक होता है और लंबन कम होता है । तो स्पष्ट बिंब कम होता है । परन्तु लंबन का परिमाण दूरी के विलोम अनुपात के अनुसार बदलता है अर्थात् जब दूरी अधिक हो जाती है तब लम्बन कम हो जाता है और जब दूरी कम हो जाती है तब लंबन अधिक हो जाता है (देखो पृष्ठ ३८५) । चित्र ३४ (देखो पृष्ठ १८३) से प्रकट हैं कि जिस समय ग्रह का शीघ्र केन्द्र शून्य होता है उस समय पृथ्वी से ग्रह की दूरी अत्यन्त अधिक होती है अर्थात् उस समय ग्रह का शीघ्र कर्ण अत्यन्त अधिक होता है तथा यह पृथ्वी से सूर्य की दूरी और सूर्य से ग्रह की दूरी के योग के समान होता है । परन्तु जिस समय ग्रह का शीघ्र केन्द्र १८० अंश होता है उस समय पृथ्वी से ग्रह की दूरी अत्यन्त कम होती है तथा यह पृथ्वी से सूर्य की दूरी और सूर्य से ग्रह की दूरी के अंतर के समान होती है । ग्रह के शीघ्रकर्ण और बिम्बों का संबंध पिछले पृष्ठ की सारणी से अच्छी तरह प्रकट होता है । यहाँ पृथ्वी से सूर्य की दूरी अथवा सूर्य का शीघ्रकर्ण १००० माना गया है । युतिकाल में ग्रहों को बेध करने की गति— छायां भूमौ विपर्यस्ते स शङ्क्वग्रे प्रदर्शयेत् । ग्रहः स्वदर्पणान्तस्थ शंव्वग्रे सम्प्रदृश्यते ॥ १५॥ पञ्चहस्तोच्छ्रितौ शङ्क यथा दिग्भागसंस्थितौ । ग्रहान्तरकलाक्षिप्तौ अधोहस्तनिखातितौ ॥१६॥ कर्णं सूत्रे तथा दद्याच्छायाग्राच्छङ्कुमूर्धगे । छायाकर्णाग्रसंयोगे संस्थितस्य प्रदर्शयेत् ॥१७॥ स्वशङ्कुमूर्धगो व्योम्नि ग्रहो दृक्तुल्यतामितौ । अनुवाद—(१५) समतल भूमि पर जिस पर शंकु गाड़कर छाया नापी जाती है, शंकु की जिस दिशा में ग्रह हो उसकी विपरीत दिशा में, ग्रह की युति- कालिक छाया के अग्र में रखे हुए दर्पण में ग्रह को दिखलाना चाहिए । ऐसे दर्पण में ग्रह शंकु की नोक के साथ मिला हुआ देख पड़ता है । (१६) पाँच हाथ के ऊँचे दो शंकुओं को उन दिशाओं में गाड़े जिनमें युतिकाल के ग्रह हों । इन शंकुओं का परस्पर याम्योत्तर अंतर उतना ही होना चाहिए जितना उन ग्रहों का अन्तर हो । इनको दृढ़तापूर्वक खड़ा रखने के लिए एक-एक हाथ पृथ्वी के नीचे गड्ढा खोदकर गाड़ना
६०० सूर्य-सिद्धान्त चाहिए। (१७) ग्रह की युतिकालिक छाया के अग्रविन्दु से शंकु की चोटी तक छाया कर्ण बतलाने वाला एक डोरा सीधा बाँधे। देखने वाले को चाहिये कि अपनी आँख छाया कर्ण के इसी सूत्र पर रखे। (१८) ऐसा करने से ग्रह आकाश में शंकु की चोटी से लगा हुआ देख पड़ेगा। विज्ञान भाष्य—यह साढ़े तीन श्लोक बड़े महत्व के हैं। इनसे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्य ज्योतिष की सूक्ष्म गणना इसीलिए करते थे कि इससे ग्रहों का प्रत्यक्ष स्थान वही आवे जो वेध से देख पड़ता है क्योंकि जब तक ग्रहों की गणना बिलकुल शुद्ध नहीं होगी तब तक हम उनको इस प्रकार देख ही नहीं सकते जैसा कि इन श्लोकों में बतलाया गया है। इससे एक बात और भी ज्ञात होती है कि हमारे आचार्यों को प्रकाश के परावर्तन का नियम भी ज्ञात था । यहाँ ग्रहों की छाया की गणना करने के लिए त्रिप्रश्नाधिकार में बतलायी हुई रीति के अनुसार युतिकालिक ग्रहों का नतकाल उनके भोगांश, क्रान्ति और चर से पृष्ठ ३३१ में बतलायी गयी रीति के अनुसार जानना चाहिए। नतकाल जान लेने पर पृष्ठ २६२ के समीकरण (ख) और (ग) के अनुसार ग्रहों के नतांश जानना चाहिए। नतांश से पृष्ठ २७३ के समीकरण (ख) के अनुसार दिगंश अथवा अग्रा जानना आवश्यक है। नतांश से छाया जानने के लिए नतांश की स्पर्श-रेखा को शंकु के परिमाण से गुणा कर देना चाहिए। यहाँ १५वें श्लोक के लिए यदि शंकु का परिमाण १२ अंगुल का हो तो कुछ हर्ज नहीं परन्तु १६वें श्लोक के लिए शंकु का परिणाम ४ हाथ का होना चाहिये । ऐसा होने से द्रष्टा खड़ा होकर ग्रहों का बेध सुगमतापूर्वक कर सकता है । १५वें श्लोक का सार चित्र द्वारा इसे प्रकार प्रकट किया जा सकता है :-- द्रष्टा का नेत्र द न रेखा के किसी विन्दु पर होने से दर्पण में ग्रह ग और शंकु की चोटी क एक साथ मिले हुए देख पड़ेंगे । यदि क ख शंकु चार हाथ का हो तो ख द छाया के अग्रविन्दु द से शंकु की चोटी क तक जो सूत्र क द ताना जायगा उस पर किसी जगह द्रष्टा का नेत्र हो तब भी ग्रह ग शंकु की चोटी क से मिला हुआ देख पड़ेगा । यही १६, १७ और १८वें श्लोक के पूर्वार्ध का सार है । यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि आजकल यह वेध तभी ठीक-ठीक आ सकता है जब ग्रह का नतांश दृग्गणित के अनुसार शुद्ध-शुद्ध जाना जाय । इस काम के लिए हमारे सिद्धान्त ग्रन्थों में नवीन बेधों के अनुसार संशोधन करना अत्यन्त आवश्यक है ।
ग्रहयुत्यधिकार ६०१ चित्र १०७ ग = युतकालिक ग्रह का स्थान क ख = समतल भूमि में गड़ा हुआ शंकु द = ख द छाया का अग्रबिन्दु जहाँ दर्पण रखा जायगा न = द्रष्टा का नेत्र इन श्लोकों से यह भी प्रकट होता है कि ज्योतिष-विज्ञान का अध्ययन ग्रन्थों के आधार पर ही नहीं होना चाहिए वरन् वेध भी करना चाहिए । इसलिए सिद्ध है कि ज्योतिष का पठन-पाठन उचित रीति से तभी सम्भव है जब ज्योतिष विद्यालय के साथ अच्छी वेधशाला भी हो । ऐसी वेधशाला में शंकु इत्यादि के स्थान में आजकल के सूक्ष्म यंत्र दूरदर्शक इत्यादि हों तभी वेधों में शुद्धता आ सकती है और सिद्धान्त ग्रन्थों में उचित संशोधन करके उनका जीर्णोद्धार भी हो सकता है । पाँच प्रकार की युतियों के लक्षण— उल्लेखं तारकास्पर्शो भेदे भेदः प्रकीर्तितः ।१८।। आरादंशुविमर्दाख्यमंशुयोगे परस्परम् । अंशादूनेऽपसध्याख्यं युद्धमेकोऽत्र चेदणुः ।।१९।। समागमस्स्यादधिके भवतश्चेद्बलाधिकौ । ११
६०२ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—( १८ ) का उत्तरार्ध--यदि युतिकाल में दोनों ग्रहों के बिम्बों का केवल स्पर्श होता हो तो ऐसी युति को उल्लेख नामक युति कहते हैं। परन्तु यदि एक का बिम्ब दूसरे के विम्ब को भेद करे अर्थात् कुछ ढक ले तो ऐसी युति को भेद नामक युति कहते हैं। (१९) यदि दोनों ग्रहों के बिम्ब तो कुछ दूर हों परन्तु उनकी किरणें मिली हुई देख पड़ें तो ऐसी युति को अंशुविमर्द नामक युद्ध कहते हैं। यदि दोनों ग्रहों के बिम्बों का अन्तर एक-एक अंश से कम हो तो ऐसी युति को अपसव्य युद्ध कहते हैं। इस युद्ध में यदि एक का बिम्ब छोटा हो तो अपसव्य व्यक्त होता है अन्यथा अव्यक्त होता है। ( २० ) यदि दोनों बिम्बों का अन्तर एक अंश से अधिक हो तो ऐसी युति को समागम कहते हैं। यदि दोनों ग्रह बली हों अर्थात् स्थूल हों तो व्यक्त समागम होता है । अन्यथा अव्यक्त समागम होता है । विज्ञान-भाष्य—यहाँ केवल परिभाषा बतलायी गयी है जो स्पष्ट है । इसलिए इस पर कुछ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । पराजित और विजयी ग्रहों का लक्षण— अपसव्ये जितो युद्धे दूरेऽप्यणुरदीप्तिमान् ॥२०॥ रुक्षो विवर्णो विध्वस्तौ मलिनो दक्षिणाश्रितः । उदक्स्थो दीप्तिमान्स्थूलो जयो याम्येऽपि यो बली ॥२१॥ अनुवाद—(२०) अपसव्य नामक युद्ध में जिस ग्रह का बिम्ब ढक जाता है, छोटा और तेजहीन होता है, (२१) रूखा वर्णहीन या फीका होता है और दक्षिण की ओर होता है वह पराजित समझा जाता है। परन्तु जिस ग्रह का बिम्ब उत्तर की ओर होता है तेजवान और बड़ा होता है वह विजयी समझा जाता है। बली अर्थात् बड़ा और तेजवान ग्रह दक्षिण की ओर हो तब भी विजयी समझा जाता है। विज्ञान-भाष्य—यह भी स्पष्ट है । आसन्नावप्युभौ दीप्तौ भवतस्तौ समागमे । स्वल्पौ द्वावपि विध्वस्तौ भवेतां कूटविग्रहे ॥२२॥ अनुवाद—(२२) यदि दोनों ग्रह पास होते हुए भी प्रभायुक्त हैं तो समागम नामक युद्ध होता है और यदि दोनों ग्रह छोटे और फीके हैं तो कूटविग्रह नामक युद्ध होता है। उदक्स्थो दक्षिणस्थो वा भार्गवः प्रायशो जयो । शशाङ्केनैवमेतेषां कुर्यात्संयोगसाधनम् ॥२३॥
ग्रहयुत्यधिकार ६०३ अनुवाद—(२३) शुक्र चाहे उत्तर की ओर हो चाहे दक्षिण की ओर बहुधा विजयी होता है। इसी प्रकार चंद्रमा के साथ पाँचों ताराग्रहों की युति का साधन करना चाहिए । विज्ञान-भाष्य—पांच तारा ग्रहों की लघुतम और परम बिम्ब मानों की सारणी से यह प्रकट है कि शुक्र ग्रह का लघुतम बिम्ब मंगल और बुध के लघुतम बिम्बों से बड़ा है इसलिए इनकी युक्ति के समय तो शुक्र ही अधिक दीप्तिमान और स्थूल होने से विजयी होता है। जिस समय मंगल का बिम्ब परम होता है उस समय यह सूर्य से १८० अंश आगे होता है। ऐसी दशा में शुक्र के साथ इसकी युति हो ही नहीं सकती; शुक्र और मंगल की युति तभी हो सकती है जब मंगल भी सूर्य के पास रहे। ऐसी दशा में मंगल का बिम्ब शुक्र के बिम्ब से सदैव छोटा रहेगा। इसलिए मंगल और बुध से शुक्र सदैव अधिक दीप्तिमान और विजयी होता है। हाँ, गुरु या शनि के साथ शुक्र की जब युति होती है तब शुक्र पूर्व में अस्त होने के पहले और पच्छिम में उदय होने पर कुछ समय तक इनसे छोटा होता है। इसलिए यह शनि या गुरु से पराजित कहा जा सकता है परन्तु ऐसी अवस्था बहुत कम होती है । इसीलिए इस श्लोक में कहा गया है कि शुक्र प्रायः विजयी होता है । भावाभावाय लोकानां कल्पनेयं प्रदर्शिता । स्वमार्गगाः प्रयान्त्येते दूरमन्योन्यमाश्रिताः ॥२४॥ अनुवाद—(२४) लोगों के शुभाशुभ फल के लिए ग्रहों के युद्ध समागम इत्यादि की कल्पना की गयी है । यथार्थ में ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में भ्रमण करते हैं और एक दूसरे से बहुत दूर हैं परन्तु परस्पर आश्रित अथवा बहुत निकट देख पड़ते हैं । विज्ञान भाष्य—इस श्लोक में आचार्य ने फलित ज्योतिष के सम्बन्ध में कुछ संकेत किया है परन्तु इस पर अच्छी तरह विचार नहीं किया है कि किस प्रकार के युद्ध या समागम से कैसा फल होता है। इसका कारण यही जान पड़ता है कि यह सिद्धान्त ज्योतिष का ग्रन्थ है इसलिए इसमें विस्तार के साथ फलित ज्योतिष की चर्चा करने के लिए स्थान नहीं है । इस प्रकार ग्रहयुत्यधिकार नामक सातवें अधिकार का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।
अष्टम अध्याय नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १—नक्षत्रों के भोग से उनके ध्रुव कैसे जाने जाते हैं। श्लोक २-६- नक्षत्रों के भोग और विक्षेपों के मान । श्लोक १०, ११ और १२ का पूर्वार्ध—अगस्त्य, मृगव्याध, अग्नि और ब्रह्म-हृदय नामक तारों के भोग, ध्रुव और विक्षेप । श्लोक १२ का उत्तरार्ध—ध्रुव और विक्षेप को परीक्षा करने की रीति । श्लोक १३—रोहिणी-शकट भेद कब हो सकता है। श्लोक १४-१५—तारे के साथ ग्रह की युति का काल और स्थान जानने की रीति । श्लोक १६-१६—नक्षत्र पुंजों का कौन तारा योगतारा है। श्लोक २०-२१—प्रजापति, अपाम्वत्स और आप ताराओं के ध्रुव और विक्षेप । ] इस अधिकार में यह बतलाया गया है कि सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के मार्ग में कौन-कौन नक्षत्र पुंज पड़ते हैं, उनके स्थान कहाँ हैं और ग्रहों के साथ उनके मुख्य तारे अथवा योगतारे की युति का समय कैसे जाना जाता है। कुछ ऐसे तारों की भी चर्चा आ गयी है जो अत्यन्त प्रतिभावान होने के कारण प्राचीनकाल के साहित्य में विशेष स्थान रखते हैं, परन्तु जिनके साथ ग्रहों की युति नहीं होती । परन्तु ऐसे सब तारों या तारापुंजों की चर्चा यहाँ मालूम नहीं क्यों नहीं की गयी। मैं परिशिष्ट में ऐसे तारों या तारापुंजों की भी चर्चा करूँगा जो इस अधिकार में नहीं दिये गये हैं परन्तु प्राचीन साहित्य में आये हैं अथवा विशेष महत्व रखते हैं जैसे सप्तर्षि, काश्यप मंडल, इत्यादि । इन ताराओं के विषय में आजकल नवीन वेधों से जो कुछ मालूम हुआ है वह भी संक्षेप में वहीं दिया जायगा । प्रोच्यते लिप्तिका भानां स्वभोगेन दशाहताः । भवन्त्यतीतधिष्ण्यानां योगलिप्तायुता ध्रुवाः ॥१॥ अनुवाद- (१) अश्विनी आदि तरीकों के जो भोग आगे कहे जाते हैं उनको दस से गुणा करके गुणनफल को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से जो आता है वही उन तारों के ध्रुव हैं । विज्ञानभाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध में जो स्वभोग शब्द आया है उसका
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०५ चित्र ११० वक्रा = क्रान्तिवृत्त धतता = त तारे का ध्रुवप्रोतवृत्त व वि = विषुवद्वृत्त कतति = त तारे का कदम्बप्रोतवृत्त व = वसन्त सम्पात अता = त का ध्रुवाभिमुख भोग या ध्रुव अ = अश्विनी का आदि बिन्दु तता = त का ध्रुवाभिमुख विक्षेप त = तारे का स्थान अति = त का कदम्बाभिमुख भोग अथवा भोग क = कदम्ब तति = त का कदम्बाभिमुख विक्षेप अथवा विक्षेप ध = ध्रुव
६०६ सूर्य-सिद्धान्त अर्थ भोगांश नहीं है और न इसका परिमाण अंशों या कलाओं में ही है। तारे के स्वभोग का अर्थ है तारे का अपने नक्षत्र के आदि विन्दु से अन्तर। यह अन्तर ऐसी इकाई में है जिसको न तो अंश कह सकते हैं और न कला । इसीलिए यह बतलाया गया है कि यदि इस स्वभोग को दस से गुणा किया जाय तो इसका परिमाण कलाओं में मालूम होता है। ऐसा जान पड़ता है कि प्रचलित इकाइयों से भिन्न इकाई का प्रयोग संक्षेप के लिए किया गया है। दस से गुणा करने पर जो आता है वही तारे की अपने नक्षत्र के आदि बिन्दु से कलाओं में दूरी होती है। इस दूरी को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से अश्विनी के आदि बिन्दु से अर्थात् राशि-चक्र के आदि विन्दु से उक्त तारे का ध्रुव कलाओं में जाना जाता है। पहले बतलाया गया है कि अश्विनी के आदि विन्दु से किसी ग्रह का क्रान्तिवृत्त पर जो अन्तर होता है वह भोगांश कहलाता है और क्रान्तिवृत्त से उस ग्रह का कदम्ब-प्रोतवृत्त पर जो अन्तर होता है वह विक्षेप कहलाता है। परन्तु यहाँ भोगांश न कहकर ध्रुवांश या ध्रुव कहा गया है। यह चित्र ११० से स्पष्ट हो जाता है। यदि त तारे से जाते हुए कदम्बप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त खींचे जायें तो ये क्रान्तिवृत्त पर दो भिन्न विन्दुओं पर मिलते हैं। क्रान्तिवृत्त के जिस विन्दु ति पर कदम्बप्रोतवृत्त मिलता है उससे अश्विनी के आदि का जो अन्तर होता है उसे तारे का भोग अथवा कदम्बाभिमुख भोग कहते हैं। जैसा कि पहले के अध्यायों में बतलाया गया है और इसी विन्दु से तारे के अन्तर तति को विक्षेप या शर कहते हैं। जिसे यहाँ कदम्बाभिमुख विक्षेप कहना अधिक उपयुक्त होगा परन्तु इस अध्याय में भोग और विक्षेप दूसरे अर्थ में प्रयोग किये गये हैं। भोग का अर्थ कदम्बाभिमुख भोग नहीं है वरन् ध्रुवाभिमुख भोग है और आगे जिस विक्षेप की चर्चा की गयी है उसका अर्थ कदम्बाभिमुख विक्षेप नहीं वरन् ध्रुवाभिमुख विक्षेप है। यह बात चित्र के नीचे जो विवरण दिया है उससे और भी स्पष्ट हो जाती है। एक ही परिभाषिक शब्द से दो भिन्न अर्थ प्रकट करने में भ्रम हो जाता है इसलिये इसको अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिये । ग्रहयुत्यधिकार में यह बतलाया गया है कि ग्रहों के भोगों और विक्षेपों में आयन दृक्कर्म और आक्षदृक्कर्म दो संस्कार करने पड़ते हैं। ग्रहों के भोग में आयन दृक्कर्म का संस्कार करने से जो आता है वही ग्रह का ध्रुवाभिमुख भोग अथवा ध्रुव होता है। इसलिए जब इस अध्याय में ग्रहों का ध्रुवाभिमुख भोग ही लिखा गया है, तब नक्षत्रों के साथ आयनदृक्कर्म की आवश्यकता न पड़ेगी, केवल आक्षदृक्कर्म की आवश्यकता पड़ेगी जैसा कि इसी अध्याय के १४वें श्लोक में बतलाया गया है। इस
प्रकार यह प्रगट है कि तारों का ध्रुवांश लिखने में यही सुभीता है कि इसमें आयनदृक्कर्म नहीं करना पड़ता । तारों के स्वभोग और विक्षेप-- अष्टार्णवाः शून्यकृताः पञ्चषष्टिर्नगेषवः । अष्टार्या गोऽब्धयोऽष्टागा षड्मा मनवस्तथा ॥२॥ कृतेषवो युगरसाः शून्यबाणा वियद्रसा । खवेदास्सागरनगा अष्टागाः सागरर्तवः ॥३॥ नवोऽथ रसा वेदा वैश्वमाप्याधभोगगम् । आप्यस्यान्तेऽभिजित्तारा वैश्वान्ते श्रवणस्थितः ॥४॥ त्रिचतुः पादयोः सन्धौ श्रविष्ठा श्रवणस्य तु । स्वभोगतो वियन्नागाः षट्कृतिर्यमलाश्विनः ॥५॥ रन्ध्राद्रयः क्रमादेषां विक्षेपाः स्वादपक्रमात् । विङ्मासविषयास्सौम्ये याम्ये पञ्च दिशो भवाः ॥६॥ सौम्ये रसाः खं याम्येऽगाः सौम्ये खार्का स्त्रयोदश । दक्षिणे रुद्रयमलाः सप्तत्रिंशत्तथोत्तरे ॥७॥ याम्येऽध्यर्धं त्रककृता नव सार्धशरेषवः । उत्तरस्यां तथा षष्टिः त्रिंशत्षट्त्रिंशदेव हि ॥८॥ दक्षिणेऽतोर्धभागास्तु चतुर्विंशतिरुत्तरे । भागाः षड्विंशतिः खञ्च दस्त्रादीनां यथाक्रमम् ॥६॥ अनुवाद—अश्विनी से लेकर पूर्वाषाढ़ तक के योग-तारों के स्वभोग क्रम से ४८, ४०, ६५, ५७, ५८, ४, ७८, ७६, १४, ५४, ६४, ५०, ६०, ४०, ७४, ७८, ६४, १४, ६, ४ हैं; उत्तराषाढ़ का योगतारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के आधे पर, अभिजित के योग तारे का भोग पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के अंत में, श्रवण का योग-तारा उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अन्त में, धनिष्ठा का योग-तारा श्रवण नक्षत्र के तीसरे और चौथे चरणों की सन्धि में अर्थात् तीसरे चरण के अंत में हैं। शतभिषक् पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्र पद, और रेवती के योग तारों के स्वभोग क्रम के ८०, ३६, २२ और ७६ हैं। क्रान्तिवृत्त से इन अश्विन्यादि योग-तारों के विक्षेप क्रम से १२, १२, ५, उत्तर की ओर; ५, १०, ६ दक्षिण की ओर; ६, ० उत्तर की ओर; ७ दख्खिन की ओर; ०, १२, १३ उत्तर की ओर; ११, २ दक्षिण की ओर; ३७ उत्तर की ओर; १ १/२, ३, ४, ६, ५ १/२, ५ दक्षिण की ओर; ६०, ३०, ३६, उत्तर की ओर; १/२ दक्षिण की ओर; २४, २६, और ० अंश उत्तर की ओर हैं।
६०८ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—प्रत्येक तारे के स्वभोग को पहले श्लोक के अनुसार १० से गुणा करने पर तारे की स्वभोग-कला आ जायगी। इसको गत नक्षत्रों की भाग- कक्षाओं में जोड़ देने से उस तारे का ध्रुव ज्ञात होगा। जैसे अश्विनी तारे का स्वभोग ४८ है, इसको १० से गुणा किया तो इसका स्वभोग ४८० कला हुआ। अश्विनी तारा अश्विनी नामक पहले ही नक्षत्र में है इसलिए गत नक्षत्र शून्य हुआ इसलिए ४८० कला अथवा ८ अंश अश्विनी तारे का ध्रुव हुआ। इसी प्रकार रोहिणी तारे का स्वभोग कलाओं में ५७० हुआ। रोहिणी के पहले तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका गत हैं इसलिए इनका भोग ३ x ८०० कला हुआ क्योंकि एक नक्षत्र ८०० कलाओं के समान होता है (देखो स्पष्टाधिकार श्लोक ६४)। इसलिए रोहिणी तारे का ध्रुव = ५७० + ३ + ८०० कला = ५७० x २४०० कला = २६७० कला = ४६ अंश ३० कला। इसी प्रकार प्रत्येक तारे का ध्रुवांश जाना जा सकता है। उत्तराषाढ़, अभिजित, श्रवण और धनिष्ठा तारों के स्वभोगों में विशेषता है, इसलिए इनके ध्रुवांश नीचे लिखे अनुसार बतलाये जाते हैं :— उत्तराषाढ़ का तारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के आधे पर अर्थात् पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के ४०० कला पर है। पूर्वाषाढ़ के पहले अश्विनी से मूल तक १६ नक्षत्र होते हैं जिनके भोग १६ x ८०० कला = १५२०० कला के समान है। इसलिए उत्तराषाढ़ का ध्रुव ४०० + १५२०० कला = १५६०० कला = २६० अंश हुआ। अभिजित तारा पूर्वाषाढ़ के अंत में बतलाया गया है, इसलिए इसका ध्रुव २६० अंश + ४०० कला अर्थात् २६६ अंश ४० कला हुआ। श्रवण तारे का ध्रुव उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अंत में है। एक नक्षत्र = १३ अंश २० कला। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का अंत २६६ अंश ४० कला पर होता है, इसलिए उत्तराषाढ़ के अंत में श्रवण तारे का ध्रुव २८० अंश हुआ। धनिष्ठा तारा श्रवण नक्षत्र के तीसरे चरण के अंत में हैं। नक्षत्र के तीन चरण ६०० कला। अथवा १० अंश के समान होते हैं। इसलिए धनिष्ठा का ध्रुव २८० + १० = २६० अंश हुआ। विक्षेप तो अंशों में दिया ही हुआ है, इसलिए इस पर अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि ऊपर दिये हुए तारों के ध्रुव सब सिद्धान्त ग्रन्थों में समान नहीं हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं—(१) वेधों की
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०६ भिन्नता (२) अश्विनी के आदि विन्दु की स्थिति के निश्चय करने में भिन्नता (३) योग तारों के निश्चय में भिन्नता और (४) सम्पात विन्दु की गति । पहला कारण तो स्पष्ट है क्योंकि वेध यन्त्रों की स्थूलता के कारण वेध के फलों में भिन्नता स्वाभाविक है। दूसरा कारण भी विशेष महत्व का है। इससे यह जान पड़ता है कि अश्विनी के आदि विन्दु के निश्चय में पुराने आचार्यों में भी मतभेद था जैसा कि आजकल है। परन्तु इस मतभिन्नता से आजकल संक्रान्तियों और मलमासों के निश्चय करने में बड़ी कठिनाई उपस्थित हो रही है जिससे अखिल भारतीय तिथियों और पर्वों की स्थिरता ही नहीं हो सकती । इस बात पर सब प्रान्तों के ज्योतिषाचार्यों में एकता हो जाय तो बड़ा भारी काम हो जायगा और इसके उद्योग में जो सज्जन तन मन धन लगावेंगे वे बड़े पुण्य के भागी होंगे । महाराष्ट्र और गुजरात प्रान्तों में इसके सम्बन्ध में बहुत दिनों से उद्योग हो रहा है परन्तु अभी तक कुछ निश्चय नहीं हुआ । इसी प्रकार सम्पात विन्दु की गति के कारण तारों के ध्रुवों और विक्षेपों में अन्तर पड़ता जाता है यद्यपि इनके कदम्बाभिमुख भोगों और शरों में स्थिरता रहती है। अब १०-१२ श्लोकों में बतलाये गये तारों के ध्रुवक और विक्षेप देकर कई सारणियों में यह बतलाने का उद्योग किया जायगा कि तारों के ध्रुवांशों के सम्बन्ध में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के क्या मत हैं। अशीतिभागं र्यस्यायामगस्त्यो मिथुनान्तगः । विंशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधो व्यवस्थितः ॥१०॥ विक्षिप्तो दक्षिणे भागैः खार्णवैस्त्वावपक्रमात् । हुतभुग्ब्रह्म हृदयौ वृषद्वाविंशभागगौ ॥११॥ अष्टाभिः त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरेण तौ । गोलं बद्ध्वोपरिक्षेत्रं विक्षेपध्रुवकान् स्फुटान् ॥१२॥ अनुवाद-(१०) अगस्त्य तारे का ध्रुव मिथुन राशि के अन्त में अर्थात् ६० अंश और दक्षिण विक्षेप ८० अंश है। मृगव्याध अथवा लुब्धक तारे का ध्रुव मिथुन के २० अंश पर अर्थात् ८० अंश है। (११) इसका विक्षेप क्रान्तिवृत्त से दक्षिण ४० अंश पर है। अग्नि और ब्रह्महृदय दोनों तारों के ध्रुव वृषराशि के २२ अंश पर अर्थात् ५२ अंश हैं। (१२) इनके विक्षेप क्रम से ८ अंश और ३० अंश क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर हैं। गोलयंत्र के द्वारा इन स्फुटविक्षेपों और ध्रुवकों की परीक्षा करना चाहिए । विज्ञान-भाष्य-१२ वें श्लोक का उत्तरार्ध बड़े महत्व का है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्यों को लकोर का फकीर होना इष्ट नहीं था इसीलिए
६१० सूर्य-सिद्धान्त नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख भोग ( ध्रुव ) ( देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५२ )
| नक्षत्र की क्रम संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त | लल्ल तंत्र | दामोदरीय भट तुल्य | सुन्दर सिद्धान्त | ग्रहलाघव | शंकर बालकृष्ण दीक्षित | अन्य तारों के अंग्रेजी नाम | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | |||
| १ | अश्विनी | ८ | ० | ८ | ० | ८ | ० | ८ | ३० | ८ | ८ | ७ | ४३ | |||
| २ | भरणी | २० | ० | २० | ० | २० | ० | २१ | १५ | २० | २१ | २१ | ५१ | |||
| ३ | कृत्तिका | ३७ | ३० | ३७ | २८ | ३६ | ० | ३७ | ४५ | ३८ | ३८ | ३६ | २ | |||
| ४ | रोहिणी | ४६ | ३० | ४६ | २८ | ४६ | ० | ४६ | ० | ५० | ४६ | ४७ | ३७ | |||
| ५ | मृगशिरा | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६३ | ६२ | ६१ | २६ | |||
| ६ | आर्द्रा | ६७ | ० | ६७ | ० | ७० | ० | ६६ | ० | ६७ | ६६ | ७५ | ४३ | |||
| ७ | पुनर्वसु | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ४५ | ६२ | ६४ | ६१ | २१ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१९ ८ पुष्य १०६ ० १०६ ० १०५ ० १०६ ० १०६ १०६ १०५ ४३ ९ आश्लेषा १०६ ० १०८ ० ११४ ० १०७ १५ १०८ १०७ १०८ ३८ १० मघा १२६ ० १२६ ० १२८ ० १२६ ० १२६ १२६ १२६ ५६ ११ पूर्वा फाल्गुनी १४४ ० १४७ ० १३६ २० १४८ १४८ १४४ ३१ १२ उत्तरा फाल्गुनी १५५ ० १५५ ० १५४ ० १५५ ३० १५५ १५५ १५४ १ १३ हस्त १७० ० १७० ० १७३ ० १७० ० १७० १६५ ६ १४ चित्रा १८० ० १८३ ० १८४ ० १८३ ० १८३ १८३ १८० ० १५ स्वाती १६६ ० १६६ ० १६७ ० ११८ ३० १६६ १६८ १६३ २८ १६ विशाखा २१३ ० २१२ ५ २१२ ० २१२ १५ २१२ २१२ २०२ ११ १७ अनुराधा २२४ ० २२४ ५ २२२ ० २२४ १५ २२४ २११ ८ १८ ज्येष्ठा २२६ ० २२६ ५ २२८ ० २२६ ३० २२६ २३० २२२ ५६ १९ मूल २४१ ० २४१ ० २४१ ० २४२ ० २४० २४० ४५