सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
६५८ सूर्य-सिद्धान्त होने पर देख पड़ता है। जब यह पूर्व में अस्त होता है तब मार्गी रहता है अर्थात् इसकी गति उसी ओर को होती है जिस ओर को सूर्य चलता हुआ देख पड़ता है इसलिए इन दोनों का अन्तर दोनों की गतियों के अन्तर के समान प्रति दिन घटता या बढ़ता है। इसलिए शुक्र के अस्त होने की यह अवधि दो महीने के लगभग की होती है। जब तक शुक्र अस्त रहता है तब तक भी हिन्दुओं में विवाह, मुण्डन इत्यादि कोई शुभ काम नहीं किये जाते। शुक्र की तरह बुध भी जब वक्री रहता है तब पृथ्वी के निकट रहने के कारण बड़ा देख पड़ता है और इसका परम कालांश १२ होता है। परन्तु जब यह पृथ्वी से बहुत दूर सूर्य की दूसरी ओर रहता है तब छोटा देख पड़ता है और इसका परम कालांश १४ होता है। बुध के अस्त होने का विचार विवाह, मुण्डन इत्यादि में नहीं किया जाता। यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ग्रहों के उदय और अस्त होने की गणना किस प्रकार की जाती है और इनके परम कालांश क्या हैं। अब यहाँ दो प्रश्न उपस्थित होते हैं, एक तो यह कि क्या कालांश जानने की यह रीति शुद्ध है, दूसरे यह कि क्या ये परमकालांश ठीक हैं। इसका उत्तर देना इसलिए सुगम है कि इसकी जांच इन ग्रहों के प्रत्यक्ष दर्शन से की जा सकती है। क्योंकि इनके उदय अस्त की परिभाषा ही ऐसी है कि जब तक ये सूर्य के निकट होने के कारण बिना किसी यन्त्र की सहायता के देखे न जा सकें तभी तक इनको अस्त समझना चाहिये अन्यथा उदय। इस कसौटी पर कसने से तो यही सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त अथवा अन्य किसी भारतीय १ ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर निकाले हुए उदय या अस्त कालों में तो कभी-कभी दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह दिन का अन्तर पड़ जाता है। यह प्रकट है कि कालांश की शुद्ध-शुद्ध गणना तभी संभव है जब ग्रहों का स्पष्ट भोगांश और शर बिलकुल शुद्ध हों। परन्तु भारतीय सिद्धान्तों के आधार पर जाने गये भोगांश और शर ठीक नहीं होते जैसा कि पिछले अध्यायों के अनेक स्थानों में बतलाया जा चुका है। उदाहरण के लिये (पूर्णिमान्त) चैत्र कृष्ण ११ भौमवार सम्बत् १६८३ वि० तदनुसार २६ मार्च सन् १९२७ की मध्य रात्रि १. आचार्य केतकर का ज्योतिर्गणित भारतीय ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर नहीं बनाया गया है वरन् पाश्चात्य सिद्धान्तों के आधार पर बनाया गया है जिनमें अर्वाचीन आविष्कारों की भी सहायता ली गयी है।
उदयास्ताधिकार ६५६
| मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | |||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | |
| विश्व पंचांग¹ | १ | २५ | ३८ | १० | २१ | ० | १० | २६ | ५० | ० | १८ | ३६ | ७ | ६ | २६ |
| भारतभूषण पंचांग² | १ | २५ | ४० | १० | १६ | ३० | १० | २४ | ३६ | ० | १६ | ३८ | ७ | १४ | ११ |
| गणेशदत्त शर्मा का पंचांग³ | १ | २५ | ४० | १० | १६ | ३० | १० | २४ | ३६ | ० | १६ | ३८ | ७ | १४ | ११ |
| नवल किशोर प्रेस का पंचांग⁴ | १ | २६ | ५२ | १० | २१ | ४७ | १० | २४ | ४४ | ० | १५ | ४८ | ७ | १४ १८ | |
| विक्रम विजय पंचांग⁵ | १ | २५ | ४० | १० | १७ | ५८ | १० | २२ | ४२ | ० | १६ | ३७ | ७ | १४ | २० |
| ज्योतिर्गणित के अनुसार⁶ | १ | २६ | ५३ | १० | २२ | २० | १० | २३ | ५४ | ० | १५ | ३५ | ७ | १४ | ४६ |
| (नोट—निर्देशों के लिए पृष्ठ ६६० देखें) |
६६० सूर्य-सिद्धान्त काल के ५ तारा-ग्रहों के निरयन भोग ६ पंचांगों के अनुसार दिये जाते हैं जिनसे यह भी पता लगेगा कि ग्रहों की गणना में हमारे यहाँ भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार कितना भेद पड़ता है । (देखें पृष्ठ ६५६) प्रत्येक ग्रह के भोगांशों की तुलना करने से यह प्रकट हो जाता है कि शुद्ध सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाले हुए भोगांश ज्योतिर्गणित अथवा दृग्गणित से निकाले हुए भोगांशों से बहुत भिन्न है। गुरु और शनि के भोगांश तो पाँच-पाँच छः छः अंश भिन्न हैं इसके प्रतिकूल मकरंद सारणी के अनुसार जाने हुए भोगांश दृग्गणित से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। इसलिए ग्रहों के उदय अस्त का विचार सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार कदापि ठीक नहीं हो सकता । इसके सिवा यह तो दिखलाया ही जा चुका है कि दृक्कर्म संस्कार की रीति भी स्थूल है। इसलिए यह सिद्ध है कि उदय अस्त का विचार करने के लिए हमको दृग्गणित सिद्ध मूलाङ्कों से ही काम लेना चाहिये और इसके लिए या तो ज्योतिर्गणित से काम लिया जाय जो पाश्चात्य ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर बनाया गया है अथवा नया स्वतन्त्र सिद्धान्त तैयार किया जाय, क्योंकि नाविक पंचांगों के आधार पर ग्रहों का उदय अस्त जानकर अपने धार्मिक कृत्यों, मुण्डन, विवाह इत्यादि का निश्चय करना उचित नहीं जान पड़ता । १—शुद्ध सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार बनाया हुआ काशी के हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रकाशित तथा पं० मदनमोहन मालवीय, ज्योतिषाचार्य पं० रामयत्न ओझा, पं० रामव्यास पाण्डेय, पं० पूर्णचन्द्र त्रिपाठी इत्यादि द्वारा सम्पादित । २— मकरंद सारणी के अनुसार बनाया हुआ काशी के ज्योतिषाचार्य पं० रामनिहोर द्विवेदी तथा श्री रामानन्द मिश्र द्वारा विरचित तथा पं० रामयत्न ओझा द्वारा अनुमोदित ? ३- यह भी मकरंद सारणी के अनुसार बनाया गया और पं० बलदेव मिश्रात्मज पं० गणेशदत्त शर्मा द्वारा सम्पादित । ४-पं० रामप्रसाद सिद्धान्ती के पुत्र श्री पं० श्यामविहारी द्वारा बनाया गया । ५- सूर्य-सिद्धान्त संस्कृतं मकरंदीयम् काश्यक्षवृत्तीयं दृग्गणितैक्य विषैरलं- कृतम् जब्बलपुरीय पं० श्री लक्ष्मीप्रसाद विद्याभूषण विरचितम् । ६ आचार्य वेंकटेश बाबू केतकर के ज्योतिर्गणित के अनुसार लेखक द्वारा गणना किया हुआ परन्तु अयनांश २२ अंश ४१ कला मानकर, इसलिये दृग्गणित के अनुसार शुद्ध है। केवल अश्विनी का आदि बिन्दु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार स्थिर किया गया है।
उदयास्ताधिकार ६६१
| स्थान | पंचांग का विवरण | शुक्रास्तकाल | शुक्रोदयकाल | गुरु का अस्तकाल | गुरु का उदयकाल |
|---|---|---|---|---|---|
| काशी | बालकृष्ण शास्त्री का | ज्येष्ठ शुक्ल १०, ८५<br>२६ मई १६२८ ई० | अधिक श्रावण शु० १३, ८५; ३० जुलाई २८ | चैत्र शुक्ल ३, ८५ विक्रमी | वैशाख शुक्ल ८, ८५ वि० २७ |
| " | विश्वपंचांग काशी विश्वविद्यालय का | ज्येष्ठ शुक्ल १०, २६ मई | अ० श्रा० शु० १३; ३० जुलाई | २४ मार्च १६२८ ई०<br>चैत शुक्ल २, २३ मार्च | अप्रैल १६२८ ई०<br>वैशाख शु० ८, २७ अप्रैल |
| लखनऊ | रामप्रसाद सिद्धान्ती का नवल किशोर प्रेस का | ज्येष्ठ शुक्ल २, २१ मई | अ० श्रा० कृ० ३, ४ अगस्त | चैत शुक्ल ४, २५ मार्च | वैशाख शु० ७, २६ अप्रैल |
| औंध | शास्त्रशुद्ध ऐक्य वर्द्धक पंचांग | आ० कृ० ३,<br>६ जून<br>* | अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई | चैत शुक्ल ३, २४ मार्च | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
| बागलकोट | केतकी पंचांग | " " | " " | ? ? | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
| पूना | चित्रशाला पंचांग | आ० कृ० ३, ६ जून | अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई | चैत शुक्ल ३, २४ मार्च | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
*यहाँ कृष्ण पक्ष पूर्णिमान्त गणना के अनुसार लिखा गया है, अमान्त गणना से यह ज्येष्ठ कृष्ण है जो महाराष्ट्र प्रान्त में प्रचलित है।
६६२ सूर्य-सिद्धान्त
{|c|c|c|c|c|c|} \hline स्थान & पंचांग का विवरण & शुक्रास्तकाल & शुक्रोदयकाल & गुरु का अस्तकाल & गुरु का उदयकाल
\hline पूना & पंचांग प्रवर्तक कमेटी का & ज्ये० शु० १३, १ जून & श्रा० शु० १५, १ अगस्त & चैत्र शुक्ल ३, २४ मार्च & वैशाख शु० ३, २२ अप्रैल
,, & शंकर शास्त्री का & ज्ये० शु० १४, २ जून & अ० श्रा० शु० ६, २६ जुलाई & ,, २, २३ मार्च & वैशाख शु० ४, २३ अप्रैल
मुंबई & बालकृष्ण तुकाराम का & ,, १५, ३ जून & अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई & ,, १, २२ ,, & वैशाख शु० २, २२ अप्रैल
,, & गुजराती पत्राच्या न्यूज प्रेस में छपी पंचांग & ,, ३, २२ मई & अ० श्रा० कृ० ३, ४ अगस्त & ,, ४, २५ ,, & वैशाख शु० ६, २५ अप्रैल
\hline
उदयास्ताधिकार ६६३ यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि ग्रहों का उदय अस्त जानने के लिए कालांश जानने की प्राचीन रीति में ही स्थूलता है। अब यह बतला देना भी आवश्यक है कि यहाँ के परम कालांश के परिमाण में भी आजकल कितना मतभेद है। उदाहरण के लिये हम इसी वर्ष के गुरु और शुक्र के उदय अस्त के कालों को लेकर पिछले पृष्ठ पर दिखला चुके हैं कि किसने कितना परम कालांश माना है। इस कोष्ठक से यह स्पष्ट है कि काशी के दोनों पंचांगों के अनुसार शुक्रास्त और शुक्रोदय के दिन एक हैं परन्तु गुरु के अस्तकाल के दिन में एक दिन का अन्तर है। इसी प्रकार औंध के शास्त्रशुद्ध ऐक्यवर्द्धक पंचांग, बागलकोट के केतकी पंचांग और पूना के चित्रशाला पंचांग में शुक्र तथा गुरु के उदय और अस्त के दिन एक हैं। इससे जान पड़ता है कि काशी के पंचांगवालों ने इन ग्रहों के परम कालांश एकमत से कुछ माना है और महाराष्ट्र के तीन पंचागवालों ने एकमत होकर कुछ माना है। काशी के विश्वपंचांग से यह सिद्ध होता है कि इसमें ग्रहों का उदय अस्त १६२८ ई० के नाविक पंचांग के आधार पर स्थिर किया गया है। केतकी पंचांग ज्योतिर्गणित के अनुसार बनाया गया है जो अर्वाचीन ज्योतिष सिद्धान्त से मिलता-जुलता है इसलिए यह सहज ही जाना जा सकता है कि आचार्य केतकर तथा इनके अनुयायियों ने गुरु और शुक्र के परमकालांश क्या माना है। अब हम १६२८ ई० के नाविक पंचांग से शुक्र के उदय और अस्त काल के दिन के सूर्य और शुक्र के विषुवांश और क्रान्ति से परमकालांश जानने की रीति लिखते हैं:— तारीख | सूर्य का विषुवांश | सूर्य की क्रान्ति | शुक्र का विषुवांश | शुक्र की क्रान्ति | घंटा मिनट | अंश कला | घंटा मिनट | अंश कला | सेकंड | विकला | सेकंड | विकला २६ मई | ४ २४ १६.५६ | २१ ३७ ३७.६ | ३ ४७ २.६७ | १६ १२ १६.४ ३० जुलाई | ८ ३७ ४६.८६ | १८ ३१ ८.८ | ६ ११ ३७.२६ | १७ ३७ ६.१ ६ जून | ४ ५७ ३.३२ | २२ ३६ ३८.२ | ४ २७ ५४.५६ | २१ २० १८.७ २८ जुलाई | ८ २६ ५७.३८ | १९ ५६ ३२.७ | ६ १ ३६.६ | १८ १८ ६.५
६६४ सूर्य-सिद्धान्त २६ मई को सूर्य की क्रान्ति २१ अंश ३७ कला ३७.६ विकला अथवा २१°३८' है और शुक्र की क्रान्ति १६ अंश १२ कला १६.४ विकला अथवा १६°१२' है। यह जानने के लिए कि सूर्य और शुक्र किस समय क्षितिज पर आवेंगे पहले इनके चरकाल जानना आवश्यक है (देखो चित्र ६० पृष्ठ ३०८)। काशी का अक्षांश २५°२०' है। उदयकालिक सूर्य की चरज्या = स्परे २१°३८' X स्परे २५°२०' = .३९६६ X .४७३७ = .१८७६ ∴ चरांश = १०°५०' ∵ चरकाल = ४३ मिनट २० सेकंड सूर्य की क्रान्ति उत्तर है इसलिए सूर्य के विषुवांश से यह चरकाल घटाने पर यह ज्ञात होगा कि सूर्योदय के समय विषुवद्वृत्त का कौन सा विन्दु पूर्व में लग्न है (देखो चित्र ६०)। घं० मि० से० सूर्य का विषुवांश ४ २४ १७ चरकाल ४३ २० अन्तर ३ ४० ५७ इसलिए सूर्योदय काल में विषुवद्वृत्त का वह विन्दु पूर्व में लग्न है जो वसंत सम्पात से ३ घण्टा ४० मि० ५७ सेकंड या ३ घण्टा ४१ मिनट आगे है। उदयकालिक शुक्र की चरज्या = स्परे १६°१२' X स्परे २५°२०' = .३४८२ X .४७३७ = .१६४६ ∵ चरांश = ६°३०' ∴ चरकाल = ३८ मिनट घं० मि० शुक्र का विषुवांश ३ ४७ चरकाल ३८ अंतर ३ ६ इसलिए शुक्र जिस समय पूर्व क्षितिज पर आवेगा उस समय विषुवद्वृत्त का वह विन्दु पूर्व में लग्न होगा जो वसंत सम्पात से ३ घण्टा ६ मिनट आगे है।
उदयस्ताधिकार ६६५ ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य के लग्न काल में विषुवद्वृत्त का ३ घण्टा ४१ मिनट लग्न था इसलिए सूर्य और शुक्र के लग्नकालों में ३ घण्टा ४१ मिनट — ३ घण्टा ६ मिनट = ३२ मिनट का अन्तर होगा । इसलिए विश्वपंचांग के अनुसार पूर्व अस्त होने के समय शुक्र का परमकाल ३२ मिनट और परमकालांश ८ है । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि नाविक पंचांग के जो विषुवांश ऊपर के कोष्ठक में दिये गये हैं वे ग्रीनविच के २६ मई के मध्यम मध्याह्न काल के हैं जो काशी के साढ़े पाँच बजे संध्या के लगभग के हैं। यथार्थ में इस दिन के काशी के सूर्योदय काल के विषुवांशों और क्रान्तियों से काम लेना चाहिए परन्तु शुक्र और सूर्य की गतियों में बहुत थोड़ा अन्तर है इसलिए इन दोनों का सापेक्ष अन्तर प्रातःकाल भी प्रायः उतना ही समझ लेने में कोई हर्ज नहीं है जितना सायंकाल के लिए समझा गया है । दूसरी बात और भी विचार करने की है । विप्रश्नाधिकार में बतलाया गया है कि वातावरण के कारण प्रकाश में वर्तन हो जाता है जिससे सूर्य यथार्थ उदयकाल से दो-ढाई मिनट पहले ही देख पड़ने लगता है (देखो पृष्ठ ३७८) । इसलिए ऊपर की गणना से शुक्र का जो परमकाल ३२ मिनट होता है वह यथार्थ में ३० ही मिनट या उससे भी आधा मिनट कम ठहरता है । अब देखना चाहिए कि ६ जून को शुक्र का कालांश क्या है। इसके लिए प्रातःकाल के विषुवांश और क्रान्ति से काम लिया जायगा क्योंकि इससे अधिक शुद्धता होगी । यहाँ सेकंड और विकलाओं की गणना नहीं की जायगी ।
सूर्य | शुक्र पूना की | विषुवांश | क्रान्ति | विषुवांश | क्रान्ति घंटा मिनट | अंश कला | घंटा मिनट | अंश कला ५ जून की संध्या में | ४ ५३ | २२ ३३ | ४ २३ | २१ ६ ६ जून की संध्या में | ४ ५७ | २२ ४० | ४ २८ | २१ २० ६ जून के सूर्योदय | ४ ५५ | २२ ३६ | ४ २५·५ | २१ १३ काल में
पूना का अक्षांश १८° ३०' । ∴ पूना में सूर्य की चरज्या = स्परे १८° ३०' × स्परे २२° ३६ = ·३३४६ × ·४१६३ = ·१३६३ १५
६६६ सूर्य-सिद्धान्त ∵ चरांश = ८° ∵ चरकाल = ३२ मिनट इसलिये सूर्योदय काल में विषुवद्वृत्तीय लग्न = ४ घण्टा ५५ मिनट - ३२ मिनट = ४ घण्टा २३ मिनट शुक्र की चरज्या = स्परे १८°३०' × स्परे २१°१३' = •३३४६ × •३८८२ = •१२६६ ∵ चरांश = ७°२८' ∵ चरकाल = ३० मिनट के लगभग इसलिए जिस समय शुक्र क्षितिजस्थ होगा उस समय विषुवद्वृत्तीय लग्न होगा । ४ घण्टा २५ १/२ मिनट - ३० मिनट = ३ घण्टा ५५ १/२ मिनट परन्तु सूर्योदय काल में विषुवद्वृत्तीय लग्न = = ४ घण्टा २३ मिनट इसलिए चित्रशाला पंचांग या केतकी पंचांग के अनुसार शुक्र का परम काल हुआ । ४ घण्टा २३ मिनट - ३ घण्टा ५५ १/२ मिनट = = २७ १/२ मिनट यदि इससे २ १/२ मिनट घटा दिया जाय, क्योंकि वर्तन के कारण सूर्योदय गणनाकाल से २ या ढाई मिनट पहले ही होता है, तो शुक्र का परमकाल २५ मिनट ही होता है जो सवा ६ अंश के समान हुआ । इस प्रकार यह सिद्ध है कि दृश्य गणना से भी शुक्नोदय काल और शुक्रास्त काल में बड़ी भिन्नता पड़ जाती है क्योंकि कोई परमकालांश कुछ मानता है और कोई कुछ । इसलिए इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि भारतवर्ष भर के ज्योतिषी मिलकर इस बात का निश्चय अवश्य करें कि किस ग्रह का परम कालांश क्या माना जाय, नहीं तो पंचांगों की यह धाँधली कभी बंद नहीं हो सकती । अब अधिक उदाहरण देकर विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है । शुक्र के परमकालांश के सम्बन्ध में आचार्य बंकटेश बापू केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित के पृष्ठ ३३३ में जो लिखा है वह ज्यों का त्यों यहाँ दे दिया जाता है : - वातावरणे निर्मले सति हेमन्ततौ षण्मिते कालांशान्तरे शुक्नो दृश्यते । प्रयत्ने कृते सार्धपञ्चमिते कालांशान्तरेऽपि द्रष्टुं शक्यते । परमस्मिन्प्रसङ्गे तत्तेजोहानिरियती जायते यत्केवलास्तीक्ष्णेक्षणा ज्योतिर्विद एव तं द्रक्ष्यन्ति ।
उदयास्ताधिकार ६६७ बाल्य और वृद्धकाल यह स्पष्ट है कि वातावरण सदैव निर्मल नहीं रहता । गरमी के दिनों में तो धूल इतनी रहती है कि क्षितिज के ऊपर सूर्य भी कुछ दूर तक नहीं देख पड़ता इस- लिए ऐसी दशा में शुक्र या गुरु को देखना बड़ा कठिन होता है । दूसरी बात यह है कि देखने वाले की दृष्टि की मंदी और तीव्रता से भी ग्रहों के देखने में दो तीन दिन का अंतर हो सकता है। इन सब कारणों से ग्रहों के उदय या अस्त होने के दिन से दो तीन या चार दिन आगे पीछे तक वे अदृश्य हो सकते हैं । जान पड़ता है इसी कारण पुराने आचार्यों ने गुरु और शुक्र के बाल्य-वृद्धकाल का विचार किया है परन्तु इसमें भी एकमत नहीं है जैसा कि मुहूर्त चिंतामणि में लिखा है :— पुरःपश्चाद्गोर्बाल्यं त्रिदशाहं च वार्धकम् पक्षं पंच दिनं ते द्वेगुरोः पक्षमुदाहृते ॥२७॥ ते दशाहं द्वयोःप्रोक्तं कैश्चित्सप्तदिनं परैः । त्र्यहं त्वात्ययिकेऽप्यन्यैरर्धाहं च त्र्यहं विधोः ॥२८॥१ गुरु और शुक्र के बाल्यकाल और वृद्धकाल में भी बहुत से शुभकर्मों का वैसे ही निषेध है जैसे इनके अस्तकाल में ।२ उदय वा अस्त का विचार कालांश से होना चाहिए या उन्नतांश से ? इस सम्बन्ध में एक बात और भी विचार करने के योग्य है । ग्रहों के उदय- अस्त के विषय में अब तक जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट हो गया है कि जब ग्रह सूर्य के इतना पास आ जाते हैं कि प्रातः या सायंकाल के संधिप्रकाश (twilight) के कारण देख नहीं पड़ते तभी कहा जाता है कि वे अस्त हो गये । परन्तु सन्धिप्रकाश की तीव्रता और सीमा सब ऋतुओं और स्थान में एकसी नहीं रहती । इस बात का कोई भी अनुभव कर सकता है कि हमारे यहाँ जाड़े के दिनों में संधिप्रकाश की सीमा बढ़ जाती है और गरमी के दिनों में घट जाती है। इसका कारण यह है कि संधिप्रकाश का सम्बन्ध क्षितिज के नीचे गये हुए सूर्य के नतांश से होता है जो सूर्य की क्रान्ति और इष्टस्थान के अक्षांश पर आश्रित है (देखो पृष्ठ २६१ सूत्र १) । अनुभव से सिद्ध हुआ है कि जब तक सूर्य क्षितिज के नीचे १८° से अधिक नहीं होता तब तक इसके प्रकाश का कुछ न कुछ अंश वातावरण के द्वारा लौटकर भूतल पर आता रहता है। सूर्य के अस्तकाल से लेकर उस समय तक जब तक वह क्षितिज के नीचे १८ अंश से अधिक नहीं जाता जो मन्द प्रकाश मिलता है उसी को सन्धि प्रकाश कहते हैं । १. संस्कार प्रकरण २. देखो मुहूर्त चिंतामणि शुभाशुभ प्रकरण श्लोक ४६,४७
६६८ सूर्य-सिद्धान्त
इसी प्रकार सूर्य के उदयकाल से जब पहले वह क्षितिज से १८ अंश नीचे हो जाता है तबसे प्रातःकालिक संधि-प्रकाश का आरंभ होता है। यह प्रकट है कि जब सूर्य १८ अंश क्षितिज से नीचे रहता है तब यह खस्वस्तिक से ६०+१८=१०८ अंश नीचे होता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिस समय सूर्य का पूर्व- नतांश १०८ अंश होता है उस समय से संधिप्रकाश का आरंभ होता है और जिस समय उसका पूर्वनतांश ६० अंश होता है उस समय तक प्रातःकालिक संधिप्रकाश रहता है। इसी प्रकार जब तक सूर्य का पच्छिम-नतांश ६० से १०८ रहता है तब तक सायं-कालिक संधिप्रकाश रहता है। पृष्ठ २६१ के सूत्र (१) में बतलाया गया है कि नतांश और नतकाल का क्या सम्बन्ध है और यह अक्षांश और क्रान्ति पर किस प्रकार आश्रित है। इस सूत्र में नतांश की जगह १०८, तथा इष्टस्थान के अक्षांश और इष्टदिन की सूर्य की क्रान्ति के मान उत्थापित किये जांय तो जो नतकाल आवेगा उससे सूर्य का उदय- कालिक या अस्तकालिक नतकाल घटा दिया जाय तो उस दिन के संधिप्रकाश का परिमाण मालूम हो जायगा। उदय या अस्तकाल का नतकाल जानने के लिए नतांश का परिमाण ६० अंश ३५ कला लेना पड़ेगा क्योंकि उदय या अस्त होते हुए सूर्य या किसी ग्रह का प्रत्यक्ष नतांश ६० होता है परन्तु वातावरण के वर्तन के कारण यथार्थ नतांश ३५ कला और बढ़ जाता है (देखो पृष्ठ ३७८-३८०) इसलिये सूर्य का उदय या अस्तकालिक नतांश यथार्थ में ६०°३५' होता है। इस प्रकार यह सिद्ध है कि संधिप्रकाश सब ऋतुओं में और सब स्थानों में एकसा नहीं होता इसलिए ग्रहों के दर्शन और लोप का दिन जानने के लिए सब स्थानों और सब ऋतुओं के लिए एक ही ग्रह का परम कलांश भिन्न-भिन्न मानाना पड़ेगा जहाँ संधिप्रकाश देर तक रहेगा वहाँ उसी परम कलांश से काम न चलेगा जो थोड़े संधिप्रकाश के लिए काम दे सकता है। इन सब बातों का विचार करने से यही युक्तियुक्त जान पड़ता है कि ग्रहों के लोप और दर्शन का विचार उनके उन्नतांश से किया जाय न कि कालांश से जैसा कि आचार्य केतकर जी पृष्ठ ३३३ में लिखते हैं :- सर्वे ग्रहाः शीघ्रकेन्द्रगत्या सूर्यमुपेत्य कानिचिद्दिनान्यदृश्या भवन्ति । इयं चमत्कृती रविग्रहयोरुदयास्तमययोः कालयोरन्तरमाश्रयत इति पूर्वा चार्याणां मतं न समञ्जसम्। यतः संध्यारुणदीप्तिः सूर्यस्य क्षितिजादपस्तनावत्रांशाननुसरति न च कालांशान् । यन्न देशे ३५° अक्षांशास्तत्र विषुवदिवसे संधिप्रकाशः सूर्यस्योदयास्त- कालात्प्राक् पश्चात् ३ घ० ४० पल वर्तते। परमयन्त्रवृत्तिदिवसे स एव ४ घड़ी
उदयस्ताधिकार ६६६ ४० पल भवति। एतयोः कालांशाः क्रमेण २२°, २८° भवन्ति । अतएव सिद्धं यदेकैरेव कालांशैर्यद्दर्शननादर्शन गणितं पूर्वाचार्यैरुक्तं तदुपपत्ति विरुद्धं स्थूलं चेति । अतो ग्रहाणां लोपदर्शन गणितं तेषामुन्नतांशश्रयेणैव कार्यम् । आचार्य केतकर के मत से शुक्र का उदयास्तकालिक उन्नतांश ६°.४ और गुरु का ११° है । (देखो ज्योतिर्गणित पृ० ३५१) उदाहरण—काशी में सायन मकर संक्रान्ति, सायन मेष संक्रांति और सायन कर्क संक्रान्ति के दिन संधि प्रकाश की अवधि क्या होती है ? काशी का अक्षांश २५°१८' सायन मकर संक्रान्ति तथा सायन कर्क संक्रान्ति के दिन सूर्य की क्रान्ति २३°२७' (देखो पृष्ठ ३०६) और सायन मेष या तुला संक्रान्ति के दिन सूर्य की क्रान्ति शून्य होती है । सायन कर्क संक्रान्ति के दिन का सन्धि-प्रकाश जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है— बतलाया गया है कि संधि प्रकाश के आरंभ या अन्त में सूर्य का नतांश १०८ होता है इसलिए २६१ पृष्ठ के सूत्र (१) के अनुसार कोज्या १०८° - ज्या २५°१८' X ज्या २३°२७' कोज्या नतकाल = -------------------------------------------- कोज्या २५°१८' X कोज्या २३°२७'
- ज्या १८° - ज्या २५°१८' X ज्या २३°२७' = ------------------------------------------- कोज्या २५°१८' X कोज्या २३°२७'
- •३०६० - •४२७४ X •३६७६ = --------------------------------- •९०४१ X •९१७५
- •३०६० - •१७०१ = ------------------- •८२६५
- •४७६१ = ---------- •८२६५ = - •५७७६ यहाँ कोज्या नतकाल ऋणात्मक है इसलिए नतकालांश ९० अंश से अधिक है । यदि यह ९० अंश से अ अंश अधिक हो तो कोज्या नतकाल = कोज्या (९० + अ = - ज्या अ = - •५७७६ ∵ अ = ३५°१७' ∴ संधि प्रकाश के आरंभ काल का नतकाल = ९०° + ३५°१७' = १२५°१७'
६७० सूर्य-सिद्धान्त पृष्ठ ३७६ के अनुसार काशी में सूर्योदयकालिक नतकाल = १०१° ५०' + ४३' = १०२° ३३' इसलिए संधिप्रकाश काल = १२५° १७' - १०२° ३३' = २२° ४४' = १ घंटा ३० मि० ५६ सेकंड सायन मकर संक्रान्ति के दिन का संधिप्रकाश काल— इस समय सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है इसलिए उपर्युक्त सूत्र में ऋण चिह्न धन हो जायगा (देखो पृष्ठ २६३) और संधिप्रकाश के आरम्भ का नतकाल नीचे लिखे समीकरण से सिद्ध होगा—
- ज्या १८° + ज्या २५° १८' X ज्या २३° २७' कोज्या नतकाल = --------------------------------------------- कोज्या २५° १८' X कोज्या २३° २७'
- .३०६० + .१७०१ = ------------------- .८२६५
- .१३५६ = --------- .८२६५ = - .१६७५ ∴ कोज्या नतकाल = कोज्या (६० + अ) = - ज्या अ = - .१६७५ ∴ अ = ६° ३८' ∴ संधिप्रकाश के आरम्भ काल का नतकाल = ६०° + ६° ३८' = ६६° ३८' पृष्ठ ३७६ के अनुसार सूर्योदयकालिक नतकाल = ७८° १०' + ४३' = ७८° ५३' ∴ संधि प्रकाशकाल = ६६° ३८' - ७८° ५३' = २०° ४५' = १ घंटा २३ मिनट सायन मेष या तुलासंक्रान्ति के दिन सन्धि प्रकाशकाल— इस दिन सूर्य की क्रान्ति शून्य होती है इसलिए ज्या क्रांति भी शून्य के समान होगी परन्तु कोज्या १ होगी इसलिए संधिप्रकाश के आरम्भ काल का नतकाल इस सूत्र से जाना जायगा । कोज्या १०८° कोज्या नतकाल = ----------------- कोज्या २५° १८'
- ज्या १८° = --------------- .९०४१
उदयास्ताधिकार ६७१ $= \frac{- \cdot ३०६}{\cdot ६०४०}$ $= - \cdot ३४१८$ $\because$ कोज्या नतकाल $=$ कोज्या ($६० +$ अ) $= -$ ज्या अ $= - \cdot ३४१८$ $\because$ अ $= १६^\circ ५६'$ $\because$ संधिप्रकाश के आरम्भ का नतकाल $= ६० + १६^\circ ५६'$ $= १०६^\circ ५६'$ पृष्ठ ३८० के अनुसार सूर्योदय का नतकाल ६०$^\circ$३८'$\cdot$७ या ६०$^\circ$३६' है । इसलिए संधिप्रकाशकाल $= १०६^\circ ५६' - ६०^\circ ३६' = १६^\circ २०'$ $= १$ घंटा १७ मिनट २० सेकंड इस प्रकार यह सिद्ध है कि किसी स्थान पर संधिप्रकाश काल सब ऋतुओं में एकसा नहीं होता । ऊपर जो गणना की गयी है उसमें सूर्य उस समय क्षितिज पर समझा गया है जिस समय सूर्य का केन्द्र क्षितिज पर आता है परन्तु सूर्य का ऊपरी बिम्ब १ मिनट के लगभग पहले ही क्षितिज को छू लेता है क्योंकि सूर्य का बिम्बार्ध १६ कला के लगभग होता है । इस कारण संधि प्रकाश काल १ मिनट और कम हो जाता है । उदयास्तकाल के कितने दिन बीते हैं या शेष हैं— तत्कालांशान्तरकला भुक्त्यन्तर विभाजिताः । दिनादितत्फलं लब्धैर्भुक्तियोगेन वक्रिणः ॥१०॥ यल्लग्नासुहृते भुक्तौ अष्टादश शतोद्धृते । स्यातां कालगतीताभ्यां दिनादि गत गम्ययोः ॥११॥ अनुवाद—(१०) ग्रह के इष्टकालिक कालांश और परमकालांश के अंतर को कलाओं में लिखकर सूर्य और ग्रह की दैनिक कालगतियों के अन्तर से (यदि ग्रह मार्गी हो ) और योग से ( यदि ग्रह वक्री हो ) भाग देने से जो आता है वह दिनों की संख्या है । (११) सूर्य या ग्रह जिस राशि में हो उसके लग्नासुओं को स्पष्ट दैनिक गति से गुणा करके गुणनफल को १८०० से भाग देने पर जो प्राप्त होता है वही ग्रह की कालगति होती है । सूर्य और ग्रह की कालगतियों ( के अन्तर या योग ) से ही उदय या अस्तकाल के गत या गम्य दिन जाने जाते हैं । विज्ञान भाष्य—यदि किसी दिन यह जानना हो कि किसी ग्रह के उदय
६७२ सूर्य-सिद्धान्त या अस्त होने को कितने दिन हैं या उदय अथवा अस्त होने के उपरान्त कितने दिन बीत गये हैं तो उस दिन का ग्रह का कालांश ४-५ श्लोकों के अनुसार जान लेना चाहिए जिससे यह मालूम हो जाता है कि ग्रह सूर्योदय से कितने पहले उदय होता है या सूर्यास्त से कितना पीछे अस्त होता है । यदि यह कालांश परमकालांश से अधिक तथा सूर्य का भोगांश ग्रह के भोगांश से अधिक हुआ—और यह ग्रह मार्गी बुध या शुक्र है तो समझ लेना चाहिये कि अभी इसके अस्त होने में कुछ दिन शेष हैं परन्तु यदि यह ग्रह मङ्गल, गुरु या शनि अथवा वक्री बुध या शुक्र है तो समझना चाहिए कि इसके उदय हुए कुछ दिन बीत गये हैं । परन्तु यदि कालांश अधिक तथा सूर्य का भोगांश ग्रह के भोगांश से कम हुआ और ग्रह मङ्गल, गुरु या शनि अथवा वक्री बुध या शुक्र है तो समझना चाहिए कि अभी इनके अस्त होने में कुछ दिन शेष हैं । इसके विपरीत यदि कालांश परमकालांश से कम तथा सूर्य का भोगांश ग्रह के भोगांश से अधिक हुआ—तो समझना चाहिए कि मार्गी बुध या शुक्र के अस्त हुए कुछ दिन बीत गये और मङ्गल, गुरु या शनि तथा वक्री बुध या शुक्र के उदय होने में कुछ दिन शेष हैं । परन्तु यदि सूर्य का भोगांश भी ग्रह के भोगांश से कम हुआ तो समझना चाहिए कि मार्गी बुध और शुक्र के उदय होने में कुछ दिन शेष हैं तथा मङ्गल, गुरु, शनि और वक्री बुध या शुक्र के अस्त हुए कुछ दिन बीत गये हैं । सब दशाओं में इन दिनों की संख्या जानने के लिए कालांश और परमकालांश का अन्तर निकालना चाहिए और देखना चाहिए कि यह अन्तर कितने दिन में घट कर शून्य हो जायगा वा शून्य बढ़ते बढ़ते इतना हुआ है । ऐसा करने के लिए इस अन्तर को सूर्य और इष्ट ग्रह की दैनिक गतियों के अन्तर से भाग देना चाहिए यदि ग्रह मार्गी हो परन्तु यदि वक्री हो तो इनकी दैनिक गतियों को जोड़ लेना चाहिए जैसा कि ग्रहयुत्यधिकार में बतलाया गया है । परन्तु सूर्य या ग्रह की दैनिक गति साधारणतः क्रान्तिवृत्तीय होती है और कालांश विषुवद्- वृत्तीय होता है इसीलिए क्रान्तिवृत्तीय दैनिक गतियों को विषुवद्वृत्तीय में बदलने के लिए ११ वें श्लोक में बतलाया गया है कि सूर्य या ग्रह जिस राशि में हो उसके लग्नासुओं को सूर्य या ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके १८०० से भाग देना चाहिए क्योंकि राशि के उदय होने का समय उसके लग्नासुओं के समान होता है इसलिए ग्रह की जितनी दैनिक गति होती है उसके उदय होने का समय भी उसी अनुपात से समझना चाहिए । दैनिक गति छोटी होने के कारण साधारणतः कलाओं में लिखी जाती है इसीलिए एक राशि को भी १८०० कलाओं में लिखा जाता है इससे ग्रह की जो दैनिक गति आती है वह विषुवद्वृत्तीय हो जाती है इसीलिए
उदयस्ताधिकार ६७३ इसको कालगति कहा गया है क्योंकि इससे काल का पता सहज ही लग जाता है। बीजगणित की भाषा में १०-११ श्लोकों के नियम को इस प्रकार लिखा जा सकता है :- इष्ट दिन का ग्रह का कालांश ∾ ग्रह का परमकालांश = कालांशान्तर (१) किसी ग्रह की दैनिक कालगति = ग्रह की दैनिक गति × ग्रह की राशि के लग्नासु १८०० (२) गत या गम्य दिनों की संख्या कालांशान्तर = ────────────────────────── (३) सूर्य की कालगति ∾ ग्रह की कालगति यदि ग्रह वक्री हो तो अन्तिम समीकरण में धन का चिह्न रखना चाहिए, नहीं तो दोनों अन्तर का निकालना चाहिए। यहाँ ऋण के चिह्न की जगह अंतर का चिह्न अधिक युक्तियुक्त है क्योंकि किसी ग्रह की कालगति सूर्य की कालगति से अधिक होती है और किसी की कम। ग्रह की कालगति जानने का जो नियम दिया गया है वह कुछ स्थूल है। इसका कारण यह है कि ग्रह की गति क्रान्तिवृत्त पर नहीं होती वरन् अपने कक्षावृत्त पर होती है जो क्रान्तिवृत्त से कुछ भिन्न है परन्तु इससे विशेष हानि नहीं है। यदि ग्रह का विषुवांश और क्रान्ति मालूम कर ली जांय तो विषुवांश में प्रतिदिन का जो अन्तर होता है वही कालगति होती है। विषुवांश जान लेने पर ग्रह का कालांश भी सुविधा और शुद्धतापूर्वक जाना जा सकता है क्योंकि फिर दृक्कर्म की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। इसलिए मेरी सम्मति में ग्रहों या तारों का उदय अस्त और युति की गणना करने के लिए ग्रहों या तारों के भोगांश की जगह विषुवांश के ज्ञान की अधिक आवश्यकता है जिसकी शुद्ध शुद्ध जानकारी अर्वाचीन ज्योतिष सिद्धान्त और यन्त्रों की सहायता से ही हो सकती है। इस बात के लिए आवश्यकता है एक वेधशाला की, जहाँ हमारे ज्योतिषी ग्रहों और तारों का वेध करके इनके स्थानों और मूलांकों का ठीक-ठीक पता लगा सकें। तारों के परम कालांश स्वाथ्यगस्त्यमृगव्याध चित्रा ज्येष्ठाः पुनर्वसुः । अभिजित् ब्रह्महृदयं त्रयोदशभिरंशकैः ॥१२॥ ∾ यह अन्तर का चिन्ह है और सूचित करता है कि इसके दाहिने बायें की संख्याओं में जो बड़ी हो उससे छोटी को घटाना चाहिये।
६७४ सूर्य-सिद्धान्त हस्तश्रवण फाल्गुन्यौ धनिष्ठा रोहिणी मघाः । चतुर्दशांशकैर्दृश्या विशाखाऽश्विनिदैवतम् ॥१३॥ कृत्तिकामैत्रमूलानि सार्परौद्रक्षमेय च । दृश्यन्ते पञ्चदशभिराषाढाद्वितयं तथा ॥१४॥ भरणीतिष्यसौम्यानि सौक्ष्म्यात्त्रिस्सप्तकांशकैः । शेषाणि सप्तदशभिस्तथा दृश्यानि भानि तु ॥१५॥ अनुवाद—(१२) स्वाती, अगस्त्य, मृगव्याध या लुब्धक, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, अभिजित्, ब्रह्महृदय तारों के परम कालांश १३ हैं । (१३) हस्त, श्रवण, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, धनिष्ठा, रोहिणी, मघा, विशाखा और अश्विनी के परम कालांश १४ हैं। (१४) कृत्तिका, अनुराधा, मूल, आश्लेषा, आर्द्रा, पूर्वाषाढ़, और उत्तराषाढ़ नक्षत्रों के परम कालांश १५ हैं। (१५) सूक्ष्म होने के कारण भरणी, पुष्य और मृगशिरा के परम कालांश २१ हैं। इससे अधिक होने पर वे दृश्य और कम होने पर अदृश्य होते हैं। शेष नक्षत्रों के परम कालांश १७ हैं । विज्ञात भाष्य—१५ वें श्लोक में जिन शेष नक्षत्रों के लिए संकेत है वे वही हैं जिनकी चर्चा नक्षत्र ग्रहयुत्यधिकार में हुई है परन्तु जिनके नाम यहाँ नहीं दिये गये हैं। तारों के इन कालांशों से यह भी प्रगट होता है कि हमारे आचार्यों के मत से कौन तारा चमक में किस श्रेणी का है। चमक में प्रथम श्रेणी के तारे १२वें श्लोक में दिये गये हैं जिनके कालांश १३ हैं। दूसरी श्रेणी में वे तारे आते हैं जो १३वें श्लोक में दिये गये हैं और जिनके कालांश १४ हैं। तीसरी श्रेणी के तारे १४वें श्लोकमें लिखे गये हैं जिसके कालांश १५ हैं। इनके सिवा १५वें श्लोक में जो तारे आये हैं उनकी श्रेणी का ठीक ठीक पता नहीं लगाया जा सकता । आजकल चमक के अनुसार तारों का विभाग बहुत ही सूक्ष्मरीति से किया जाता है। अँधेरी रात में बिना किसी यन्त्र की सहायता के तेज आँखवाले मनुष्य सारे आकाश में जितने तारे देख सकते हैं उनकी संख्या ६००० से अधिक नहीं है । इन ६ हजार तारों को ६ श्रेणियों (magnitudes) में विभक्त किया गया है । इन श्रेणियों का विभाग इस प्रकार किया गया है कि प्रथम श्रेणी का कोई विशेष तारा छठी श्रेणी के किसी विशेष तारे से चमक में १०० गुना होता है। इससे यह फल निकलता है कि किसी श्रेणी का तारा अपने नीचे वाली श्रेणी के तारे से २.५११६ गुना चमकीला होता है अर्थात् १ली श्रेणी का तारा २री श्रेणी के तारे से २.५११६ गुना चमकीला होता है, दूसरी श्रेणी वाला तारा तीसरी श्रेणी वाले तारे से २.५११६ गुना चमकीला होता है परन्तु पहली श्रेणी वाला तारा तीसरी श्रेणी वाले
तारे से २.५११६ × २.५११६ = ६.३०६६. गुना चमकीला होता है इत्यादि । यह तो हुई उन तारों की बात जिन्हें तेज आँख वाले बिना किसी यन्त्र की सहायता के देख सकते हैं। दूरदर्शक यन्त्र से १५वीं श्रेणी तक के तारे देखे गये हैं। यहाँ तक बतला देना आवश्यक है कि जो तारे एक श्रेणी में हैं वे भी सब समान चमक के नहीं हैं। पहली श्रेणी में जो तारे रखे गये हैं उनकी संख्या २० से अधिक नहीं हैं परन्तु इनमें सबसे अधिक चमकीला लुब्धक है। उसके बाद अगस्त्य का नम्बर आता है। इन दोनों की चमक में भी इतना अन्तर है कि कोई भी सहज ही देख सकता है। इसलिए अधिक सूक्ष्म गणना करने के लिए प्रत्येक श्रेणी में दस और विभाग किये गये हैं। यह तो प्रकट है कि तारे की चमक जितनी ही अधिक है उसकी श्रेणी की क्रम संख्या उतनी ही छोटी है इसलिए प्रथम श्रेणी के सबसे चमकीले तारे लुब्धक की श्रेणी ऋणात्मक और — १.४ है और इसकी चमक ६.१ मानी गयी है। श्रेणी और चमक का सम्बन्ध नीचे की सारणी १ से सहज ही समझ में आ सकता है:—
६ठीं श्रेणी के तारे की चमक = १ ५वीं ,, ,, ,, = २.५ गुनी ४थी ,, ,, ,, = ६.३ ,, ३री ,, ,, ,, = १५.८ ,, २री ,, ,, ,, = ३६.६ ,, १ली श्रेणी के तारे की चमक = १०० गुनी १ली श्रेणी के सबसे चमकीले तारे लुब्धक की चमक } = ४०० ,, सूर्य की चमक = २४०००००००००० गुनी
किसी तारे की चमक सदैव एकसी नहीं रहती इसलिए पुरानी और नयी पुस्तकों में प्रथम श्रेणी के २० तारों के क्रम में भी दो-चार जगह भिन्नता हो गयी है । इस भिन्नता का कारण यह भी है कि चमक परखने की कसौटी भी पहले कुछ स्थूल थी और अब सूक्ष्म हो गयी है। इस बात का पता अगले पृष्ठ की सारणी २ से चलेगा :—
१. सर नारमन लाकयर के (Elementary Lessons in Astronomy) पृष्ठ १० से उद्धृत । २. देखो The Twentieth Century Atlas of Popular Astronomy by Heath, Second edition pp. 112
६७६ सूर्य-सिद्धान्त नाम | श्रेणी | चमक | नयी श्रेणी १ सूर्य ... ... ... —२६.५ पूर्ण चन्द्रमा ... ... —१२.० शुक्र ... ... ... — ३.० ३६.८ लुब्धक α canis majoris, sirius — १.४ ६.१ अगस्त्य α Argus, canopus — ०.८ ५.२ — १.५८ ब्रह्महृदय α Aurigae, caplela ०.१ २.३ —०.८६ स्वाती α Bootis, Arcturus ०.२ २.१ ०.२१ α centauri ... ०.२ २.१ ०.२४ अभिजित α Lyrae, Vega ०.२ २.१ ०.०६ β Orionis, Regel ... ०.३ १.६ ०.१४ α Eridani, Achernar ... ०.४ १.७ ०.३४ प्रश्वा α canis minoris, Procyon ०.५ १.६ ०.६० β centauri ... ... ०.७ १.३ ०.४८ α orionis, Betelguese ... ०.६ १.१ ०.८६ α crucis ... ... ०.६ १.१ परिवर्तनशील श्रवण α aquilae, Altair ... ०.६ १.१ ०.८६ रोहिणी α tauri, Aldebaran १.० १.० १.०६ चित्रा α Virginis, spica ... १.१ ०.६ १.२१ पुनर्वसु α Geminorum, Pollux १.२ ०.८ १.२१ ... ज्येष्ठा α scorpii, Antares १.२ ०.८ १.२२ मघा α Leonis, Regulus १.३ ०.८ १.३४ कुम्भज α Piscis Australis, १.३ ०.८ १.२६ Fomalhaut ... ... α cygni, Deneb १.४ ०.७ १.३३ १. यह १६२६ ई० के Nautical almanac के अनुसार है ।
उदयास्ताधिकार ६७७ पूर्ण चन्द्रमा से सूर्य ६३१००० गुना चमकीला है। चौथे स्तम्भ में जो नयी श्रेणी दी गयी है उससे प्रकट होता है कि कई तारों के क्रम में अन्तर पड़ गया है। इसके अनुसार अगस्त्य के बाद centauri और अभिजित आते हैं न कि ब्रह्महृदय जैसा कि पुरानी श्रेणी में दिखलाया गया है। इसी प्रकार अन्य तारों के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए। गतगम्य दिन जानने की दूसरी रीति— अष्टादशशताभ्यस्तान् दृश्यांशःस्वोदयासुभिः । विभज्यलब्धाः क्षेत्रांशास्तैः दृश्यादृश्यताथवाः ।।१६।। अनुवाद—(१६) अथवा दृश्यांश (कालांश) को १८०० से गुणा करके राशि के लग्नासुओं से भाग देने से जो क्षेत्रांश (भोगांश) आवे उससे भी दृश्य और अदृश्य होने का दिन जाना जा सकता है। विज्ञान भाष्य—यह नियम १० वें और ११ वें श्लोकों में बतलाये हुए नियम का विलोम है। वहाँ कालांशांतर को दैनिक काल-गतियों के अन्तर से भाग देने को कहा गया है और यहाँ बतलाया गया है कि दैनिक गति से दैनिक कालगति कैसे जानी जा सकती है। यहाँ दैनिक काल-गति जानने की आवश्यकता नहीं वरन् कालांशांतर को ही क्रान्तिवृत्तीय भोगांशान्तर में बदलने के लिए बतलाया गया है। इसलिए इसकी उपपत्ति वही है जो वहाँ बतलायी गयी है। यदि यह श्लोक ११ वें श्लोक के बाद दिया गया होता तो अधिक उपयुक्त होता क्योंकि इसका सम्बन्ध १५ वें श्लोक से तो बहुत कम है। तारों का उदय अस्त जानना— प्रागेषामुदयः पश्चादस्तं दृक्कर्म पूर्ववत् । गतैष्य दिवसप्राप्तिर्भानुभुक्त्या सदैव हि ।।१७।। अनुवाद—(१७) तारों का पूर्व में उदय और पच्छिम में अस्त होता है। तारों का आक्ष दृक्कर्म संस्कार पहले की तरह करना चाहिए और उदयास्त का गत- गम्य दिन जानने के लिए सूर्य की ही गति से काम लेना चाहिए। विज्ञान भाष्य—नक्षत्रों में कोई गति नहीं देख पड़ती इसलिए सूर्य ही उनके पास पहुँचता हुआ देख पड़ता है। जब सूर्य उनके इतना पास हो जाता है कि वे इसके प्रकाश में दब जाते हैं तभी उनका अस्त समझा जाता है। इसलिए इनका अस्त सदैव पच्छिम में होता है जैसा कि मंदगामी मंगल, गुरु और शनि ग्रहों के साथ होता है। जब सूर्य इनके इतना आगे बढ़ जाता है कि वे देख पड़ने लगते हैं तभी